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Saturday, 13 March 2021

423. शरीफ हत्यारा- श्री नारद जी

शरीफ हत्यारा- श्री नारद जी
लोकप्रिय उपन्यास आरम्भ इलाहाबाद से होता है। और इस के आरम्भिक दौर में उपन्यास पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे। ऐसे ही अपने समय की एक पत्रिका थी-जासूसी डायरी। जिसमें तात्कालिक लोकप्रिय साहित्य के लेखकों के रोचक और जासूसी उपन्यास प्रकाशित होते थे। 
NH911
 जासूसी डायरी के एक अंक में श्री नारद जी का उपन्यास 'शरीफ हत्यारा' प्रकाशित हुआ था।
   पहले प्रकाशक का कथन देख लें।
एक रक्षक ही जब भक्षक बन जाये तो फिर जनता का क्या होगा?
  मोमियों के नीच एव देशद्रोही एक उच्च अधिकारी की दास्तां जिसने रहस्यमय ढंग से गद्दारी की।
आज 'श्रीनारद जी' सर्वप्रिय उपन्यास लेखक हैं। क्योंकि संसार में अपराधियों का एक जाल सा बिछ गया है। जो एक देश से दूसरे देश में जाकर वहाँ षड्यंत्र द्वारा विज्ञान के नये-नये अनुसंधानों का सहारा लेकर ऐसी वारदातें करते हैं कि दांतों तले उंगली दबाना पड़ता है।
ऐसे ही एक रहस्यमय षड्यंत्र जिसका संचालन विदेशी कर रहे हैं, की रोचक, कहकहे से पूर्ण कहानी इस पुस्तक में लिखी ग ई है। पढकर आप आनंद विभोर हो उठेंगे।
                                         प्रकाशक
                              जासूसी डायरी, इलाहाबाद


    उपन्यास की कहानी बर्मा (वर्तमान म्यानमार) देश पर आधारित है। सन् 1935 से पूर्व बर्मा भारत का ही एक अंग था जो कि अंग्रेजी सत्ता के चलते एक अलग देश के रुप में स्थापित हुआ।
   बर्मा में तस्करी का काम बहुत ज्यादा होता था। और वहाँ की सरकार इसे रोकने में असमर्थ थी।
उन दिनों जापान धीरे-धीरे रंगून में उपद्रव की आग भड़का रहा था। कुछ ऐसे एजेंट थे जो भारतवर्ष से सोना खरीद कर जापान भेजते रहते थे। ऐसे एजेंट अधिकतर बर्मा के मोमियो निवासी थे। बर्मा का गुप्तचर विभाग जब उन एजेंटों को पकड़ने में सफल न हो सका तो विवश होकर सरकार ने मिस्टर हरीश को आदेश दिया।(उपन्यास अंश)
    मिस्टर हरीश सी. आई. डी. में कार्यरत हैं और वे अपने अधीनस्थ डेविड और विनोद के साथ बर्मा जाते हैं। लेकिन तस्करों का नेटवर्क भी बहुत मजबूत है।- यहाँ से जो भी जासूस उन बदमाशों का पता लगाने के लिए भेजा जाता था वह या तो रास्ते में ही खत्म कर दिया जाता था या दो-चार दिन बाद रंगून या मोमियो की किसी सड़क पर उसकी लाश मिलती थी। (उपन्यास अंश)
    लेकिन मिस्टर हरीश इन सब परिस्थितियों को जानते और समझते हुये भी उन तस्करों का पता लगाने के लिए बर्मा जाते हैं।
     शेष कहानी बर्मा में उन तस्करों को खोजने और पकड़ने का विवरण है।
    कैसे भारतीय सी. आई. डी. के अधिकारी अपने कार्य को अंजाम देते हैं और कौन लोग हैं जो उन तस्करों का साथ देते हैं‌? यह उपन्यास पढकर जाना जा सकता है।
   उपन्यास का कथानक रोचक है लेकिन प्रस्तुतिकरण कोई विशेष नहीं है। उपन्यास का अंत एकदम से हो जाता है और वह भी पूर्णतः नाटकीय तरीके से जो पाठक में खीझ सी पैदा कर जाता है।
     उपन्यास को इसलिए पढा जा सकता है कि यह लोकप्रिय साहित्य में पत्रिकाओं के समय की रचना है। 
उपन्यास- शरीफ हत्यारा
लेखक-   श्री नारद जी
प्रकाशक- जासूसी डायरी, इलाहाबाद