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Sunday, 21 January 2024

597. महाबली चीका- रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश'

 महाबली चीका- रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश'

उस व्यक्ति ने गर्दन उठा कर उस इमारत की ओर देखा । दस मंजिली वह इमारत अपनी भव्यता के कारण राह चलते व्यक्तियों के लिए पर्याप्त आकर्षण रखती थी । इमारत के दाहिने कोने पर एकदम ऊपर नियोन साइन में एक नाम चमक रहा था ।
संगीता !
राजधानी की ऐश्वर्यपूर्ण महानगरी में संगीता नया खुला होटल था। डेढ़ सौ वाले कमरों को लेकर खोले गये इस होटल में एक स्वीमिंग पूल भी था और तमाम प्रकार की वे सुख-सुविधायें जिन्हें पैसों के बल पर आसानी से प्राप्त किया जा सकता है ।
उस व्यक्ति के हाथ में एक खूबसूरत सूटकेस था । लम्बे कद और चौड़े कधों वाले उस आदमी ने आँखों पर रंगीन चश्मा और सिर पर नाइट कैप लगा रखी थी । कैप कुछ इस प्रकार चेहरे पर झुकी थी किउसका मस्तक एक प्रकार से उसमें छिप सा गया था । चेहरे पर घनी मूंछें थी जो उसके व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने के से साथ-साथ रहस्यमय भी दिख रही थीं ।
उसका शरीर सूट से ढका होने पर भी काफी उभरा-उभरा और शक्तिशाली दीख रहा था । बाँहों की मछलियों की उठान स्पष्ट झलका रही थी ।
(उपन्यास प्रथम पृष्ठ से)

   लोकप्रिय जासूसी उपन्यास साहित्य में रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश' एक विशिष्ट नाम रहे हैं। उन्होंने थ्रिलर और शृंखलाबद्ध जासूसी उपन्यासों की रचना की है।  जो कथास्तर पर काफी प्रभावशाली उपन्यास हैं।

Sunday, 14 January 2024

596. सुलगती आग- रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश'

भारत -चाइना संबंधों की जासूसी कथा
सुलगती आग- रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश'

हिंदी रोमांच कथा साहित्य में रमेशचन्द्र गुप्त चन्द्रेश का नाम श्रेष्ठ उपन्यासकारों में शामिल किया जा सकता है। जनवरी 2024 में मैंने इनके चार उपन्यास पढें जो कथा और प्रस्तुतीकरण की दृष्टि में जासूसी साहित्य में श्रेष्ठ तो कहे जा सकते हैं।
  'सुलगती आग' रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश' जी का अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर आधारित एक जासूसी उपन्यास है। जिसका कथानक भारत- चीन से संबंध रखता है।
कभी 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के नारे लगते थे और फिर चीन ने अपना वास्तविक रंग दिया दिया। चीन ने भाई कहकर भारत की पीठ पर वह छुरा मारा जिसका दर्द आज भी है। सन् 1962 में भारत-चीन युद्ध हुआ और इस युद्ध का परिणाम हम सभी जानते हैं। तात्कालिक साहित्य में भी भारत-चीन की पृष्ठभूमि पर अनेक उपन्यास लिखे गये।
रोमांच/ जासूसी साहित्य में भी इस पृष्ठभूमि पर काफी उपन्यास लिखे गये हैं। जिनमें से एक है रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश' द्वारा लिखित उपन्यास 'सुलगती आग'। 
प्रभाकर समाप्त कर दिया गया था । उसकी संस्था का एक योग्य एजेण्ट मार दिया गया था। वह एक अभियान पर हांगकांग गया था । अभियान सफलतापूर्वक सम्पन्न करके वह वापस हुआ ही था कि चीनी एजेन्ट उसके पीछे लग गये थे । प्रभाकर किसी तरह बचता हुआ कलकत्ता तक आ गया था। मौत की रफ्तार समय की रफ्तार से बहुत तेज होती है । प्रभाकर ने समय को धोखा दे दिया था लेकिन मौत को नहीं दे सका था। फलस्वरूप मौत ने उसे कलकत्ते में दबोच लिया था लेकिन प्रभाकर मरते-मरते भी न केवल मौत को दाँव दे गया था बल्कि अपने मारने वालों को भी ! और मरते समय प्रभाकर किसी प्रकार चीफ तक यह सूचना देने में सफल हो गया था कि जो वस्तु वह लाया है वह कहाँ है ! चूंकि उसे अपने बच पाने की तनिक भी उम्मीद नहीं है इसलिए यह सूचना दे रहा है। उसने यह भी सूचना दी कि उसकी डायरी स्थानीय एजेण्ट के पास है उससे प्राप्त कर ली जाए। मूल वस्तु वह स्थानीय एजेण्ट को इसलिए नही दे पा रहा है क्योंकि उसके पास समय नहीं है ।
और फिर प्रभाकर मारा गया था।
आदेश मिला कलकत्ता जाओ, और प्रभाकर द्वारा लाई गई चीज वापस लेकर लौटो।
(पृष्ठ-10,11)

Saturday, 18 May 2019

187. काली आँखों वाली बिल्ली- चन्द्रेश

एक खतरनाक बिल्ली का कारनामा
जासूसी उपन्यास

        जासूसी उपन्यासकार चन्द्रेश का नाम मेरे लिए नया ही है, इस से पहले उनका कभी नाम नहीं सुना। इनका एक उपन्यास 'काली आँखों वाली बिल्ली' उपलब्ध हुआ। उपन्यास का शीर्षक भी स्वयं में रोचक है तो सहज ही पढने की इच्छा बलवती हो उठती है।
                कुछ माह पूर्व कैप्टन देवेश नामक लेखक का एक उपन्यास 'काली बिल्ली वाला' पढा था वह काफी रोचक और दिलचस्प था। उतना ही रोचक यह उपन्यास भी है।
बात करें प्रस्तुत उपन्यास की तो यह एक जासूसी उपन्यास है जिसका नायक मोहन है, मेजर मोहन। मेजर मोहन भारतीय खूफिया विभाग में कार्यरत एक जासूस है। हालांकि यहाँ भी एक मिशन पर कार्यरत है लेकिन उपन्यास में उसका साधारण व्यक्तित्व ज्यादा दर्शाया गया है। मोहन...गरीबों का हमदर्द।
मोहन को विभाग की तरफ से एक सूचना मिलती है की उसके पास कभी भी कविता नामक एक स्त्री का फोन आ सकता है और उसे कविता की मदद करनी है। एक दिन यह सच हो जाता है। मोहन के पास फोन आता है।
"हल्लो''- उसने रिसीवर उठा लिया।
''मिस्टर मोहन हैं?''- दूसरी और से बेहद दिलकश नारी अंदाज में पूछा गया।
मोहन चौंका, फिर संभलकर बोला- "मैं मोहन बोल रहा हूँ । कहिए...."
............
"काम फोन पर नहीं बताया जा सकता है। लेकिन यह समझ लीजिए कि मामला बहुत गंभीर है।"
"आप कहां से बोल रही हैं?"
"मैजिस्टिक होटल से।"- नारी स्वर में इस बार व्यग्रता थी।
(पृष्ठ-15)