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Tuesday, 5 May 2020

308. अवैध- एम. इकराम फरीदी

अवैध रिश्तों की रक्त गाथा
अवैध- एम. इकराम फरीदी

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे समाज के नियमों के अन्तर्गत चलना पड़ता है। मनुष्य और पशु में यही एक बड़ा अंंतर है और वह है बौद्धिक क्षमता का। इसी बौद्धिक क्षमता के चलते मनुष्य ने आज प्रगति की राह चला है।
        लेकिन कभी कभी मनुष्य अपने स्वार्थ के चलते अपनी बौद्धिकता का अवैध प्रयोग कर समाज के बनाये नियमों की अवहेलना करना आरम्भ कर देता है। जब वह समाज नियमों के विरुद्ध अवैध कार्य में रत होता है तो वहाँ से कोई न कोई 'अवैध' जैसी कहानी पनप जाती है।
         एम. इकराम फरीदी जी का प्रस्तुत उपन्यास 'अवैध' हमारे समाज में कुछ ऐसे लोगों की कहानी कहता है जो अपनी मर्यादा का उल्लंघन करते हैं, जो निति सम्मत राह की जगह कुराह पर चलते हैं, जो सामाजिक बंधनों, रक्त सम्बन्ध की जगह 'अवैध' सम्बन्धों को महत्व देते हैं।

Friday, 27 September 2019

225. होटल चैलेंज- एम. इकराम फरीदी

एक डायन की खतरनाक कहानी।
एक सत्य घटना पर आधारित काल्पनिक उपन्यास।
          एम.इकराम फरीदी जी का नवीनतम उपन्यास 'चैलेंज होटल' पढने को मिला। जैसा की पाठकवर्ग को विदित है की फरीदी जी के प्रत्येक उपन्यास का कथानक हर बार नये विषय पर आधारित होता है। यह परम्परा इसी उपन्यास में भी जीवित है। मात्र जीवित ही नहीं बल्कि प्रथम उपन्यास में स्थापित पूर्व परम्परा का खण्डन भी यह उपन्यास करता नजर आता है।
           इस उपन्यास के साथ दो बातें और विशेष हैं। प्रथम तो यह की प्रस्तुत उपन्यास सत्य घटना से प्रेरित है और द्वितीय इसी उपन्यास के साथ फरीदी जी ने स्वयं का प्रकाशन संस्थान 'थ्रिल वर्ल्ड' आरम्भ कर दिया है। 'चैलेंज होटल' इस संस्थान की प्रथम सौगात है।

     अब कुछ चर्चा उपन्यास के विषय में भी कर ली जाये। वैसे मुझे यह उपन्यास अच्छा लगा।
यह कहानी है महाराष्ट्र के जलगांव जिले के चालीसगांव की। जहाँ लेखक महोदय सौलर प्लाट लगाने गये थे।

अक्टूबर 2017 में मैंने दिल्ली से चालीसगांव की जर्नी की थी क्योंकि मेरी नई सौलर साइट चालीसगांव में ही बैठ रही थी जो औरंगाबाद रोड़ पर दस किलोमीटर दूरी पर एक खतरनाक वन्य जीव वाले पहाड़ के नीचे समतल में थी। (पृष्ठ-24)
यहाँ एक छोटा सा गांव है चुरई। जिस की यह कहानी है।

महाराष्ट्र के जलगांव डिस्ट्रिक्ट में चालीसगांव नगर से दस किलोमीटर दूर खतरनाक वन्यजीवों वाली पहाड़ी, जो उस क्षेत्र में घाट के नाम से पुकारी जाती है। यहाँ एक छोटा सा गांव है चुरई।


बताया जाता है कि यहां वैम्पायर भी रहते हैं।
यानी खून पीने वाले पिशाच।
रक्तपिशाच।

        लेखक को यहाँ जो अनुभव मिले जो देखा और समझा उसे अपनी कल्पना शक्ति से नये रंग भर के एक रोचक और हाॅरर उपन्यास के रूप में पाठकों के समक्ष ले आये।
लेखक को यहाँ लेबर के ठहराने के लिए जो जगह मिली वो था एक लंबे समय से बंद होटल था। यही चैलेंज होटल इस कथा का मूलाधार है। वहीं उपन्यास के गांव में एक मर्डर होता है। ग्रामवासियों का कहना है यह डायन का काम है।
ऐसे केस हमारे यहाँ होते रहते हैं, यदाकदा.....कोई डायन किसी मर्द को रूप -जाल में फंसा लेती है और रात के सन्नाटे में कहीं ले जाकर खून पी जाती है। (पृष्ठ-59)

वहीं चैलेंज होटल में भी ऐसी भयानक घटनाएं घटती हैं की सभी सिहर उठते हैं। एक डायन का होना तो खतरनाक ही होगा।

"क्या तुमने खुद अपनी आँखों से डायन देखी है?"
बबलू तुरंत बोला-"हां साब देखी है, यहीं चैलेंज होटल में देखी है।"
......
"कैसी होती है?"
"बाल खुले हुए, चेहरा दिखाई देता है, चारों तरफ से बाल पड़े होते हैं, दांत बड़े-बड़े....।"
"वो खून पीती है। यहाँ गरदन पर हमला करती है....।"
(पृष्ठ-63)


तो यह किस्सा एक डायन का है। जो कभी घूंघरू बजाती है, कभी खूले बालों के साथ घूमती, कभी किसी का खून पी जाती है तो कभी किसी को प्रेमालाप के लिए आमंत्रित करती है।
तो आखिर वह डायन कौन थी?
क्या रहस्य था उसका?
जब भूत-प्रेतों पर विश्वास न करने वाले, वैज्ञानिक सोच रखने वाले लेखक एम.इकराम फरीदी का सामना इन घटनाओं से हुआ तो उनकी बुद्धि और वैज्ञानिक सोच दोनों स्थिर हो गये।
मेरी सारी फिलाॅसफी धरी की धरी रह गयी थी जैसे कोई रेत की दीवार भुरभुराकर गिर पड़ती है। मेरा दृढ निश्चय ऐअए ही भुरभुराकर गिर पड़ा।(पृष्ठ-87)
पोलो मैदान,माउंट आबू, राजस्थान

उपन्यास के दो पात्र प्रभावित करने में सक्षम है। एक तो प्रेमा, दबंग प्रेमा और दूसरा इंस्पेक्टर गोरख पुर्णे। हालांकि दोनों मुँहफट्ट और दबंग हैं पर प्रेमा हर किसी पर भारी पड़ती है।
प्रेमा की उम्र पैंतालीस साल थी। गोल मुखड़ा था, लिपिस्टिक की मेहरबानी से हमेशा होंठ लाल रहते थे, अधिकांश बालों का जूड़ा बांध कर रखती थी। ब्लाऊज और घाघरा पहनती थी, बहुत छोटी सी चुनरी इधर-उधर कहीं पड़ी रहती थी। (पृष्ठ-28)
‌‌पुरुष वर्ग के प्रति प्रेमा के विचार देख लीजिएगा
अरे भई इन आदमियों को जितना सिर पर चढाओगे, उतना परेशान करेंगे, यह डण्डे के यार होते हैं...।(पृष्ठ-34)
चलो फिर प्रेमा और एस. आई. कुमावत के बीच का भी नोकझोक दृश्य देख लेते हैं।-
         कुमावत बोला पड़ा- "तूने हमे गालियां बकी, पुलिसियों को, साले किसी में हिम्मत नहीं है जो हमें गालियां दे सके।"
"ओय चोट्टी के आवाज नीच कर, इस वर्दी को यूं नुचवा लूंगी यूं- तू मेरी राजनीतिक पहुंच नहीं जानता है अभी, इस गांव की सरपंच बनने वाली हूँ।
(पृष्ठ-69)

लेखक अगर कोशिश करता तो इन दोनों पात्रों को और बढा सकता था, दोनों की नोकझोक आगे भी दिलचस्प हो सकती थी।

        लेखक की एक विशेषता यह भी है की वे किसी न किसी सामाजिक बुराई को अपने उपन्यास में उजागर करते रहते हैं। जो की कहानी का भाग न होने पर भी पठनीय होती है। प्रस्तुत उपन्यास में सट्टा बाजार के बारे में लिखा है।

       उपन्यास में शाब्दिक गलतियाँ काफी हैं। हालांकि यह प्रूफ रीडर की गलती मानी जाती है पर कहीं न कहीं पाठक भी इससे प्रभावित होता है।
एक जगह नाम 'गोरव पुर्णे' (पृष्ठ-44) और बाद में 'गोरख पुर्णे'। पूरे उपन्यास में दो जगह नाम आया है दोनों जगह अलग-अलग है।
साइट को साइड लिखा है।
कुछ और गलतियाँ
प्रेमा के पति राजन का कहीं वर्णन नहीं मिलता।
- मितराज को रात को एक लड़की नजर आयी। उसका कहीं को विशेष स्पष्टीकरण नहीं।
मितराज बोला-"मैं चैनल गेट के पास खड़े होकर बाहर को देख रहा था, तभी थोड़ी देर मुझे सफेद कपड़ों में एक लड़की नजर आई, उसके बाल खुले हुए थे...।"(पृष्ठ-210)

        एम. इकराम फरीदी जी का प्रथम उपन्यास जो की किशोरवर्ग का उपन्यास कहा जा सकता है। अंधविश्वास के विरुद्ध वैज्ञानिक चेतना का विकास करता है। वहीं प्रस्तुत उपन्यास शुद्ध रूप से एक हाॅरर उपन्यास है।

        अगर आप हाॅरर उपन्यास पढना पसंद करते हैं तो यह उपन्यास रोचक लगेगा। कहानी है, सस्पेंश है और अच्छे पात्र हैं।
       प्रस्तुत उपन्यास अपने अंदर बहुत सी घटनाओं को समेट हुए है। हम जिस समाज का एक भाग है उसी के अंदर बहुत कुछ अच्छा और बुरा घटित होता रहता है।‌लेकिन मानवता के नाते हमारा दायित्व यह बनता है की हम गलत के खिलाफ आवाज उठाकर अपने इंसान होने का परिचय दें । यह उपन्यास सिर्फ एक डायन होने या न होने का जिक्र भर नहीं है, बल्कि यह हमारे इंसान होने का वर्णन भी करती है।
आप चाहे उपन्यास मनोरंजन की दृष्टि से पढे पर उपन्यास की कुछ घटनाएं आपको अंदर तक कचोट जायेंगी।

उपन्यास में कुछ अलग है तो वह है लेखकीय- किसान अपना माल खुद बाजार में लाया है। लेखक के प्रकाशन संस्थान 'थ्रिल वर्ल्ड' की जानकारी है।
वहीं एक आर्टिकल स्वयं मेरा (गुरप्रीत सिंह) का है। शीर्षक- क्या लोकप्रिय साहित्य का दौर लौट रहा है? जिसमें वर्तमान लोकप्रिय जासूसी साहित्य के दिनों का वर्णन है।

उपन्यास- चैलेंज होटल- एक हाॅन्टेड पैलेस
लेखक- एम.इकराम फरीदी
प्रकाशन- थ्रिल वर्ल्ड
पृष्ठ- 256
मूल्य- 100₹
संस्करण- 15.09.2019(प्रथम संस्करण).  

उपन्यास में प्रकाशित मेरा आर्टिकल


Wednesday, 18 September 2019

223. धुरंधरों के बीच- एम. इकराम फरीदी

प्रेम और नफरत के बीच
धुरंधरों के बीच- एम.इकराम फरीदी, उपन्यास

सुरज पॉकेट बुक्स से प्रकाशित एम.इकराम फरीदी जी का नया उपन्यास पढने को मिला। उपन्यास संस्करण नया (जून-2019)है लेकिन ये लेखक महोदय का बहुत पहले का लिखा हुआ है।- इसकी रचना मैंने सन् 1998 में की थी, तब से लेखन क्षेत्र में मेरा संघर्ष और सफर जारी है।
बात उपन्यास की करे तो यह एक थीम पर आधारित है। उपन्यास की एक पंक्ति उपन्यास को बहुत प्रभावशाली तरीके से व्यक्त कर सकती है। - अपने लिए जीना ज़िंदगी नहीं होती। अपनों के लिए जीना ज़िंदगी होती है।
उपन्यास के कुछ पात्र अपने लिए जीते हैं और कुछ अपनों के लिए जीते हैं। यह संघर्ष और विरोध कहानी को रोचक और पठनीय बनाता है।
      यह रिश्तों पर आधारित एक प्रेमकथा है, भावना प्रधान कथानक, आपसी द्वेष और बदले पर आधारित है।

       उपन्यास के कथानक की बात करें तो यह कहानी दो अलग-अलग स्तर पर चलती है जो अंत में जाकर एक हो जाती है।
मुकेश और मोनिका एक दूसरे से प्यार करते हैं लेकिन मोनिका का भाई राजेश इसे बर्दाश्त नहीं करता।
वह मोनिका के आगे आकर स्थिर हुआ। उसकी आँखों में आँखें डाली। "तू मेरी बहन है, मैं तेरा भाई। भाई पर जो बहन की जिममेदारियाँ होती हैं मैंने निभायी और आगे भी निभाता। मैं रिश्ते को खूब अच्छी तरह से समझता हूँ। हर जायज बात को हर वक्त मानने को तैयार रहता हूँ लेकिन नाजायज़ हरकत किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं कर सकता।

      वहीं मोनिका मुकेश के अतिरिक्त और किसी को पसंद नहीं करती। मोनिका तो मुकेश को भी स्पष्ट कहती है- या तो तुम्हें मुझसे कोर्ट-मैरिज करनी होगी या फिर मैं आत्महत्या कर लूँगी। यह मेरा अटल फ़ैसला है। मुझे इस फ़ैसले से कोई डिगा नहीं सकता।" दो टुक शब्दों में बात की थी उसने। कहीं कोई आवाज़ में कंपन नहीं। लहजा अटल विश्वास से ठसाठस था।

     उपन्यास का दूसरा कथानक बृजेश नामक एक युवक का है।- बृजेश की उम्र कोई पच्चीस बरस थी। लम्बे कद और कसरती जिस्म का एक खूबसूरत युवक था वह। पर्सनॉल्टी दमदार थी।
      बृजेश का भाई बहुत गंभीर रूप से बीमार है। वह अपने भाई को बचाने के लिए अपने शादी ले रिश्ते तक को तोड़ देता है। बृजेश का मित्र विकास समझाते हुए बोला- "समझने की कोशिश कर मेरे यार! शादी को कुल पंद्रह दिन रह गये हैं। वे लोग सारी तैयारियाँ पूरी कर चुके हैं और जो रह गयी है, वो भी कर कर रहे हैं। अब हम मना करेंगे तो उनके दिल पर क्या बीतेगी। दाग़ लग जाएगा लड़की के दामन पर।"
एकाएक बृजेश हत्थे से उखड़ गया। "और मेरे दिल पर क्या बीत रही है यह पता है तुझे? पचास लाख रुपये का खर्चा बताया है डॉक्टर ने। कहाँ से आएगा इतना रुपया? किसी पेड़ पर लगा है जो झाड़ लूँ? और तू कह रहा है कि मैं ख़ुशियाँ मनाऊँ। नाचूँ, गाऊँ।"

     बृजेश को रूपयों की अतिआवश्यता है और इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार है। इस 'कुछ' भी में उसकी मदद उसका दोस्त करता है।

उपन्यास में इंस्पेक्टर कात्याल का किरदार दमदार है जो पाठक को प्रभावित करने में भी सक्षम है। कात्याल स्वयं के बारे में कहता है- “कात्याल कोई काम अधूरा नहीं करता ।” कात्याल में हास्य की प्रवृत्ति भी दृष्टिगोचर होती है- कात्याल ने स्वर में स्वर मिलाया– “शर्म साली साथ छोड़कर भाग गयी। अब आने की कोई उम्मीद भी नहीं है।”
लेकिन कात्याल का इस बार सामना कुछ ऐसे धुरंधरों से हुआ है जो स्वयं जो अपराध में महारथी समझने की भूल कर बैठते हैं।
     अब उपन्यास का एक रोचक दृश्य देख लीजिएगा। उपन्यास में ऐसे छोटे-छोटे ट्विस्ट उपन्यास को रोचक बनाये रखते हैं।
“मगर मर्डर करना किसका होगा?”
“मेरा।”
“तेरा मर्डर?” एक बार फिर हैरत ने पूरे लश्कर के साथ धावा बोला। अगर इस बार भी कप हाथ में होता तो यकीनन छूट जाता। खुद को नियंत्रित करता हुआ..... बोला– “क्या दिमाग तो नहीं फिर गया है तेरा?”
“साला दिमाग ही तो नहीं फिरना चाह रहा है वरना यह काम करने की जरूरत ही क्या थी?”

      उपन्यास का एक संवाद भी पढ लीजिएगा। यह मात्र संवाद ही नहीं है बल्कि जीवन में आगे बढना का मंत्र भी है।
आदमी से बढ़कर कुछ नहीं होता। जब आदमी कुछ करने की ठान ही लेता है तो उस काम का अंजाम खुद झुककर उस आदमी को सलाम करता है।”
       धुरंधरों के बीच उपन्यास पारिवारिक सम्बन्धों पर आधारित कथा है। एक भाई है जो अपनी बहन का किसी से प्यार सहन नहीं कर सकता और एक भाई है जो अपने बीमार भाई के लिए अपनी शादी का रिश्ता तक खत्म कर देता है। इस पारिवारिक कहानी में कुछ नेपथ्य के पीछे के किरदार हैं। सच तो ये है की वहीं किरदार उपन्यास के पात्रों को चलाते हैं।
          पारिवारिक अपराध और कुछ रहस्य-रोमांच से लिपटी यह उपन्यास मध्यम स्तर की है।


     एम. इकराम फरीदी का उपन्यास 'धुरंधरों के बीच' पढा। यह एक औसत स्तर का उपन्यास है। स्वयं लेखक भी स्वीकारता है की यह उनकी 21 साल पुरानी एक अपरिपक्व रचना है। एक समय था इस तरह की बहुत सी कहानियाँ लिखी गयी थी। लेकिन वह समय नहीं रहा और इसी वजह से अब ऐसी अपरिपक्व रचनाएँ अच्छी भी नहीं लगती। हालांकि कहानी कोई 'विशेष कमी' नहीं है, कमी है तो प्रस्तुतीकरण की।
रचना एक बार पढी जा सकती है। एक बार मनोरंजन कर सकती है। लेकिन फरीदी साहब से जो उम्मीद होती है, उस उम्मीद पर उपन्यास खरी नहीं उतरती।

उपन्यास- धुरंधरों के बीच. 

लेखक-    एम.इकराम फरीदी
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स
संस्करण-  जून, 2019
एमेजन लिंक-  धुरंधरों के बीच 



Friday, 22 March 2019

180. सम-प्रीत- एम. इकराम फरीदी

समलैंगिकता से उपजी एक मर्डर मिस्ट्री
समप्रीत- एम. इकराम फरीदी, उपन्यास

मनोज ने अंकिता के गले में हाथ डाला और भीतर चलते हुए बोला-"आज मैं बहुत खुश हूँ सखी।"
अंकिता ने गर्दन मोड़कर मनोज को देखा और चेहरे पर जबरदस्ती मुस्कान लाती हुयी बोली -"ऐसा क्या? "
मनोज रहस्यपूर्ण मुस्कान के साथ बोला -"कल मेरे पति आ रहे हैं?
"व्हाट, क्या मजाक है यह?"
"मेरी जान यह मजाक नहीं है, यह मेरी सच्चाई है, जिससे अभी तक तुम वाकिफ नहीं थी लेकिन अब हो जाओगी।" वह फ्रिज से पानी की बोतल निकालते हुए बोला "आज मैं बहुत खुश हूँ। तुमसे शादी करके मैं‌ जरा भी खुश नहीं रहा हूँ क्योंकि मुझे तुम्हारी नहीं बल्कि एक पति की जरूरत थी।"

           उक्त कथन एम. इकराम फरीदी जी के उपन्यास 'सम-प्रीत' उपन्यास का है। जहाँ एक पुरुष अपने लिए एक पति की तलाश में है।
              जब एक पत्नी को पता चलता है की उसका पति समलैंगिक है तो उसके मन पर क्या बीतती है। एक पत्नी जो अपने पति के साथ अनेक ख्वाब संजोय बैठी होती है उसके सारे ख्वाब एक झटके से टूट जाते हैं। यही अंकिता के साथ होता है। जब उसे पता चलता है की उसका पति एक समलैंगिक है और हद तो तब हो जाती है जब मनोज अपने तथाकथित पति सन्नी को घर ले आता है और उस पर मनोज चाहता है की वह सन्नी की आवभगत करे। ऐसी परिस्थितियों में अंकिता को याद अपना प्रेमी ऋषभ।

             इस कथानक के मुख्य चार पात्र हैं‌। मनोज, अंकिता, सन्नी और ऋषभ। यह कथानक इन चारों के इर्दगिर्द घूमता है। कभी लगता है मनोज और सन्नी के बीच अंकिता पिस रही है तो कभी लगता है अंकिता और मनोज के कारण ऋषभ परेशान है, कभी मनोज से सन्नी परेशान लगता है तो कभी सन्नी से मनोज परेशान लगता है। कभी मनोज को अंकिता अपनी पत्नी लगती है तो कभी सन्नी उसे अपना पति लगता है और हद तो तब हो जाती है जब उसे ऋषभ उसे पूर्वजन्म का पति लगता है।
               
                 और एक दिन एक मर्डर हो जाता है। यह मर्डर किसका है? यह कहना सरल नहीं है। अक्सर उपन्यासों में यह होता है की एक कत्ल होता है और उसके बाद कातिल की तलाश होती है लेकिन यहाँ लेखक की प्रतिभा है की एक कत्ल होने के बाद भी पाठक तो क्या पुलिस को भी पता नहीं चलता की आखिर यह कत्ल हुआ किसका है।
उपन्यास का आरम्भ जहाँ समलैंगिकता जैसे विषय से होता है वहीं समापन एक मर्डर मिस्ट्री से होता है। मर्डर मिस्ट्री का जहाँ प्रसंग आता है वह काफी रोचक है। लेखक ने वहाँ जबरदस्त समां बाधा है।


          हिन्दी लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में मेरे विचार से 'समलैंगिकता' जैसे विषय पर कोई उपन्यास नहीं लिखा गया। यह एक साहसिक कदम था जो एम.इकराम फरीदी जी ने उठाया। ऐसे साहसिक उपन्यास वेदप्रकाश शर्मा जी ही लिख सकते थे, 'क्योंकि वे बीवियां‌ बदलते थे' जैसे अमानवीय विषय पर वेद जी की कलम चली थी और अब उनके शिष्य एम. इकराम फरीदी जी ने भी ऐसा एक ज्वलंत विषय पर उपन्यास लिख कर लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के क्षेत्र में श्रीवृद्धि की है।
 ‌‌‌‌‌‌                   हालांकि उपन्यास 'समलैंगिकता' विषय पर कुछ नहीं बोलता यह तो 'समलैंगिकता' से उपजी त्रासदी का स्टिक चित्रण करता है। उपन्यास 'समप्रीत' समलैंगिकता से उपजी एक मर्डर मिस्ट्री है। जिसके मूल में एक पति-पत्नी है या यूं कह सकते है जिसके मूल में 'समलैंगिकता' है।
उपन्यास की कहानी बहुत रोचक है लेकिन‌ जैसे जैसे कथानक आगे बढता तो वह अपनी रोचकता खोता चला जाता है। उपन्यास अंत में आते -आते 'मनोहर कहानियाँ' नामक पत्रिका में छपने वाली अपराध कथा की तरह नजर आने लगता है। अंत में अपराधी का सहज कबूलनामा तो बिलकुल तो इस कथा को और कमजोर बना देता है।
उपन्यास के अंत में हत्याप्राण के विषय में एक अजीब सी उलझन उठती है और कोई सार्थक स्पष्टीकरण के बिना उपन्यास समाप्त हो जाता है।
            उपन्यास का कथानक लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के क्षेत्र में एक नया प्रयोग था लेकिन वह अपना कोई विशेष प्रभाव न छोड़ पाया। उपन्यास में अतिरिक्त मेहनत की जरूरत है।

निष्कर्ष-
‌‌          एम. इकराम फरीदी का उपन्यास 'समप्रीत' समलैंगिक विषय पर लिखा गया लोकप्रिय उपन्यास साहित्य का प्रथम उपन्यास है।
यह समलैंगिकता से उपजी एक मर्डर मिस्ट्री पर आधारित रोचक कथानक है जो पाठक को 'समलैंगिकता' के विषय में तो हालांकि कुछ नहीं बताते लेकिन इससे लोगों से पैदा हुए हालात का अच्छा चित्रण करता है। बस उपन्यास का समापन कुछ विशेष नहीं।
उपन्यास पढनीय और दिलचस्प है।


उपन्यास- समप्रीत
लेखक- एम. इकराम फरीदी
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स
पृष्ठ- 253
मूल्य- 100₹
'नक्की झील-माउंट आबू'

Sunday, 13 May 2018

112. रिवेंज- एम. इकराम फरीदी

रहस्य से भरी एक बदले की कथा।
रिवेंज- एम. इकराम फरीदी, सस्पेंश-थ्रिलर, रोचक, पठनीय।
----------------------
उत्तर प्रदेश के युवा लेखक एम. इकराम ‌फरीदी ने जो कम समय में पाठकवर्ग में जो अपनी पहचान स्थापित की है वह वास्तव में प्रशंसनीय है।‌ इनकी पहचान स्थापित होने की एक वजह तो यह है की लेखक लंबे समय से गुमनामी में संघर्ष करता रहा और जब पाठकवर्ग के सामने आया तो एक से बढकर एक रचनाएँ दी और सभी रचनाएँ समाज को संदेश देने के साथ-साथ विषय वस्तु में नवीनता लिए हुए हैं।
                    द ओल्ड फोर्ट, ट्रेजङी गर्ल, गुलाबी अपराध, ए टेरेरिस्ट और अब प्रस्तुत उपन्यास रिवेंज सभी की कहानी एक दूसरे से पूर्णतः अलग है। इसी विशेषता के चलते फरीदी साहब के पाठकों में‌ वृद्धि हुयी।


प्रस्तुत उपन्यास की कहानी बहुत रोचक है, हालांकि इनका पूर्व उपन्यास 'गुलाबी अपराध' भी मर्डर मिस्ट्री था लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि बहुत अलग है।

"सर.....।"- सुधीर ने भूमिका तैयार की और चेतना का मोबाइल दिखाता हुआ बोला-" यह मेरी बेटी का फोन है, अभी थोङी देर पहले इस पर धमकी मिली है कि मेरे पूरे परिवार को मार दिया जाएगा- मेरे बेटे मोनू को इस वीक के लास्ट तक‌ मर्डर कर दिया जायेगा।"
................
इंस्पेक्टर ने नंबर देखा। काॅल हिस्ट्री देखी।
................
"कौन है यह?"
"बकौल इसके मेरा भतीजा अंशु है, जो चार महीने पहले एक सङक दुर्घटना में मर चुका है।"
"मतलब?"- इंस्पेक्टर तो चौंक उठा- " जो मर चुका है, वह कैसे फोन कर सकता है?"
"कल रात ग्यारह बजे वह मेरे बेटे सोनू से मिलने भी उसके कमरे में आया था।"
"कौन आया था?"
"मेरा भतीजा अंशु।"
"जो मर चुका है?"
"जी हां, सर।"
"तुम पागल तो नहीं हो- तुम लोग कहीं पागलखाने से तो नहीं छूटे हो?"
"सच्चाई वही है सर जो मैं बता रहा हूँ ।"-सुधीर रो‌ देने वाले स्वर में बोला।
(पृष्ठ-31-32)
.....और अनंतः इंस्पेक्टर भी इस बात को मानने को मजबूर हो जाता है।
"अजीब बात है।"- इंस्पेक्टर बेंत को ठकठकाते हुए इधर-उधर चहलकदमी करता हुआ बोला- " जो धमका रहा है कत्ल करने को, वह मर चुका है- वैरी इंस्ट्रेस्टिंग -लेकिन अब उसको ढूंढा कहां जाये- क्या श्मशान घाट में?" (पृष्ठ-39)
कत्ल हुआ बाकायदा धमकी देकर हुआ लेकिन कोई कातिल साबित न हुआ, कोई सबूत न‌ मिला और सबसे सामने कत्ल हुआ।
और दूसरी तरफ एक मैना थी। जिसने चैलेंज किया था।
मैना चलकर थोङा करीब आई। मात्र थोङा सा गैप देकर खङी हुयी और आँखों में आँखें डालकर फुसफुसाई -"फ्राइङे को मोनू का कत्ल हो जाएगा- रोक सको तो रोक लेना।"(पृष्ठ-47)

Sunday, 20 August 2017

58. गुलाबी अपराध - एम. इकराम फरीदी

गुलाबी अपराध- एक अनसुलझी मर्डर मिस्ट्री
-------------
एक हिंदू स्त्री सुनीता का प्रेमविवाह एक मुस्लिम व्यक्ति फुरकान से हो जाता है। इस विवाह से सुनीता के घरवाले व फुरकान के घरवाले दोनों नाराज हैं। दोनों परिवार अपने लिए अपने बच्चों को मरे हुए मान लेते हैं।
सुनीता की सहेली की लङकी पल्लवी के दो बाॅयफ्रेण्ड एक बार पल्लवी की मम्मी के कानों से झुमका व गले से चेन लूट लेते हैं। बाद में सुनीता उन दिनों लङकों को पहचान लेती है। और ये दोनों लङके किसी तरह सुनीता की हत्या कर स्वयं को सुरक्षित करना चाहते हैं।
पल्लवी का एक और बाॅय फ्रेण्ड है डाक्टर आदिल खान, वह किसी कारणवश सुनीता की हत्या करना चाहता है।
सुनीता का पति भी सुनीता की हत्या का इच्छुक है।
और एक शाम को घर पर सुनीता की हत्या हो जाती है।
हत्यारा कौन है?
- पल्लवी के बाॅय फ्रेण्ड अनन्य- रोहित?
- सुनीता का पति फुरकान?
- डाॅक्टर आदिल खान?
- फुरकान का छोटा भाई?
- सुनीता का भाई?
इस मर्डर मिस्ट्री को हल करने के लिए पुलिस विभाग के आॅफिसर इंस्पेक्टर बुट्टर और सब इंस्पेक्टर जाखङ मैदान में आते हैं, लेकिन अंत तक कोई भी इस मर्डर मिस्ट्री को हल नहीं कर पाता।
अगर पाठक को हत्यारे का नाम पता है तो वह वह हत्यारे का नाम व सिचुवेशन(स्थिति) बताये और नगद ईनाम दस हजार प्राप्त कर सकता है।
     उपन्यास जगत का यह एक बेहतरीन प्रयोग है। इस प्रकार एक बार प्रयोग टाइगर अपने उपन्यास 'किसका कत्ल करुं?' में कर चुके हैं।
   लेकिन टाइगर ने अपने आगामी किसी उपन्यास में  हत्यारे के जिक्र का कोई वर्णन किया या नहीं ऐसा 'किसका कत्ल करुं? ' में कोई क्लू नहीं दिया।
गुलाबी अपराध उपन्यास बहुत ही रोचक व सस्पेंशपूर्ण है।
पाठक के सामने एक स्थिति स्पष्ट होती है और उसे लगता है की यह हत्यारा है लेकिन तब स्थिति बदल जाती है और शक दूसरे, तीसरे, चौथे व्यक्ति तक क्रमशः सतत चलता रहता है।
गुलाबी अपराध-  एक ऐसी मर्डर मिस्ट्री है जिसने तेजतर्रा इन्वेस्टीगेटर का दिमागी संतुलन बिगाङ दिया। वह मानसिक शांति माने के लिए बुद्ध की शरण में जाने को तैयार हो गया।
        भौतिक सुख सुविधाओं को हासिल करने के लिए सही-गलत हर तरह के रास्ते अपना कर हर तरह की खुशियाँ अपने दामन में भर लेने को आतुर आधुनिक महानगर के ऐसे पात्रों की रोमांचक खून आलूदा दास्तान जिनके हाथ अंत में खाली के खाली रह जाते हैं....और रह जाते हैं सिर्फ टीसते जख्म, जो ताउम्र उन्हें अहसास दिलाते हैं कि वो इस अंधी दौड़ में शामिल हुए तो क्यों हुए।

कहानी-
           अगर उपन्यास की कहानी की बात करें तो यह सामाजिक मर्डर मिस्ट्री है। सुनीता नामक एक ऐसी महिला की कहानी है जिसकी मृत्यु के  कई इच्छुक हैं। और एक दिन सुनीता की उसी के घर में हत्या हो जाती है।
यहीं से कहानी में पुलिस विभाग का प्रवेश होता है जो की हत्यारे की तलाश में असफल रहती है।
अब हत्यारा कौन है ये लेखक के आगामी किसी उपन्यास में रहस्य खुलेगा।
हालांकि उपन्यास का कोई अन्य भाग नहीं है। मात्र ऐसा प्रयोग इमाम के तौर पर किया गया एक अच्छा प्रयोग है।
लेखक के आगामी उपन्यास ' ए टरेरिस्ट' के अंत में ' गुलाबी अपराध' के हत्यारे का नाम पर उसके कत्ल करने की वजह और कत्ल के वक्त की परिस्थिति का वर्णन होगा।
एक संदेश-
               कहानी लेखन का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन ही होता है, लेकिन एक अच्छा लेखक मनोरंजन के साथ-साथ समाज को एक संदेश भी देता है। क्योंकि वह कहानी का चयन भी समाज से करता है तो कहीं न कहीं उसका एक नैतिक दायित्व भी है की वह समाज के लिए एक अच्छा संदेश दे सके। अगर इस दृष्टिकोण से देखा जाये तो लेखक एम. इकराम फरीदी इस दृष्टिकोण से खरे उतरे हैं।
प्रस्तुत उपन्यास में उन्होंने एक नहीं कई छोटे-छोटे विषयों को उठाता है जो समाज के लिए घातक हैं।
1. युवावर्ग का व्यवहार-
              वर्तमान युवा वर्ग अपने ऐशो आराम व फिजुल खर्ची के लिए किस तरह अपराध की दुनिया में जा रहा है इसका एक उदाहरण उपन्यास के दो पात्र अनन्य और रोहित हैं।
2. अभिभावकों का उत्तरदायित्व-
             बच्चों के गलत राहे पर जाने में उनके अभिभावकों का भी अप्रत्यक्ष योगदान है। वे अपने बच्चों पर उचित नजर नहीं रख पाते जिसका परिणाम ये निकलता है की बच्चे गलत राह पकङ लेते हैं।
3. मुस्लिम समाज में तलाक प्रथा-
                मुस्लिम समाज में तलाक प्रथा का कितना गलत प्रयोग हो रहा है इसकी भी एक छोटी सी छलक उपन्यास में देखने को मिलती है।
जब उपन्यास का एक पात्र जाने- अनजाने तीन बार तलाक शब्द बोल देता है तो उसका अपनी पत्नी से तलाक हो जाता है।
" कभी तो इतना गुस्सा आता कि इससे तीन बार बोलू तलाक़, तलाक, तलाक और घर से रवाना कर दूं।" - (पृष्ठ- )
और देखिए पाठक महोदय यहाँ तलाक भी हो गया। ऐसी प्रथा के विरुद्ध लेखक ने आवाज उठायी है।
4. स्वार्थपूर्ति के सामाजिक संगठन-
                  उपन्यास में कुछ ऐसे संगठनों का चित्रण भी है जो अवसर आने पर अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने से बाज नहीं आते।
5. प्रेम विवाह-
            लेखक एक ओर बात की तरफ इशारा किया है- वह है प्रेम विवाह।
ज्यादातर इस प्रकार के प्रकरण में युवक- युवती अपने घर-परिवार, समाज से विद्रोह कर कर शादी तो कर लेते हैं  लेकिन जब इश्क का बुखार उतरता है तब वे बहुत पश्चाताप करते हैं।
  लेकिन इस तात्पर्य यह भी न लें की लेखक प्रेम विवाह के खिलाफ है। वह मात्र उन लोगों का विरोध करता है जो प्रेम विवाह के पश्चात उसे निभा नहीं सकते।

उपन्यास के पात्र-
          उपन्यास में पात्रों की संख्या कहानी अनुसार उचित है। कोई भी पात्र अनावश्यक नहीं है।
सुनीता- वह मुख्य पात्र है जिसकी मौत के कुछ लोग इच्छुक हैं। हिंदू स्त्री।
फुरकान- मुस्लिम, सुनीता का पति। सुनीता की मौत का इच्छुक ।
अनन्य, रोहित- पल्लवी के बाॅय फ्रेण्ड। अपनी ऐशो आराम की जिंदगी जीने के लिए अपराध की दलदल में धंस गये।
पल्लवी- सुनीता की सहेली की बेटी, जो पैसे वाले व्यक्ति से ही प्यार जताती है।
डाॅक्टर आदिल खान- सुनीता का प्रेमी और चालाक किस्म का व्यक्ति ।
इंस्पेक्टर बुट्टर व सब इंस्पेक्टर जाखङ- पुलिस विभाग के तेज तर्रार आॅफिसर। सुनीता मर्डर केस की जांचकर्ता।
इन मुख्य पात्रों के अलावा भी सुनीता- फुरकान के घरवाले, पल्लवी का परिवार, पुलिस विभाग, आदिल के मित्र व अन्य कई पात्र उपन्यास में उपस्थित हैं।

संवाद-
             उपन्यास के संवाद काफी अच्छे हैं और कहीं-कहीं तो रोचक व प्रेरक भी हैं।
फरीदी जी के पिछले उपन्यास ' ट्रेजडी गर्ल' के संवाद भी बहुत अच्छे थे।
संवाद (Dialogue) ही वह तत्व है जो किसी कहानी को आगे बढाने का कार्य करता है और इस कार्य में फरीदी जी ने अच्छा कार्य किया है।
" और उन परेंट्स को होश है जिनकी जवान लङकियां टाइम-बे- टाइम घर से बाहर रहती हैं। आप माॅर्डन कल्चर के नाम पर कितनी छूट दे सकते हैं।"- (पृष्ठ 153)
हिंदू शब्द की बहुत व्यापक परिभाषा दी है लेखक ने जो की  प्रशंसनीय कार्य है।
"शायद आपको जानकारी में ये बात नहीं की भारत में बसने वाला हर व्यक्ति हिंदू होता है- चाहे उसका मजहब कोई सा हो।"-(पृष्ठ-220)
शीर्षक-
     उपन्यास का शीर्षक नया व कहानी के अनुसार उचित है। यह भी पहली बार है की फरीदी के किसी उपन्यास का नाम हिंदी में है। इनके पूर्व दो व आगामी दोनों उपन्यासों का नाम अंग्रेजी में है।
   ऐशो आराम, फिजुलखर्ची जैसी एक बार अच्छी लगने वाली चीजें जो युवाओं को गुलाबी सपने दिखाती है लेकिन अनतः वे उसे अपराध की ओर धकेल देती है।
उपन्यास में कमी-
उपन्यास में कुछ खामियां भी हैं, हालांकि ज्यादा नहीं है इससे कहानी के प्रवाह व भाव पर कोई असर नहीं पङता। अगर लेखक चाहता तो थोङी सी कोशिश और चंद पंक्तियाँ का विस्तार कर उन गलतियों से बच सकता था।
जैसे पृष्ठ संख्या 67 पर रोहित व अनन्य सुनीता और फुरकान को देख कर पति-पत्नी घोषित कर देते हैं।
"जिस हैसियत से दोनों साथ में चल रहे हैं, उसके मुताबिक पति- पत्नी होने चाहिए।"
"यानि सुनीता ने एक  मुस्लिम से शादी की है।"
इसी प्रकार सुनीता की हत्या पर उनके घर से बाहर बहता खून देख कर एक राहगीर ने शोर मचा दिया - "खून.....।"
क्या यह दृश्य इस प्रकार दिखाना जरूरी था। एक राहगीर ने मात्र खून देख कर हत्या की घोषणा कर दी और वह सत्य साबित हुयी।
मेरे विचार से उक्त दोनों दृश्य किसी अन्य तरीके से दिखाये जाते तो ज्यादा उचित रहता।
   उपन्यास पठनीय है। पाठक को किसी भी स्तर पर निराश नहीं करेगी। उपन्यास की भाषा शैली और प्रवाह अच्छा है जो पाठक को उपन्यास से आबद्ध रखता है।
    उपन्यास एक मर्डर के साथ-साथ सामाजिक संदेश भी देता है और दस हजार का नगद इनाम भी।
लेकिन मुख्य प्रश्न यही उठता है की सुनीता का हत्यार कौन? तो इसका उत्तर -
SP बलविंद्र सिंह के शब्दों में- " देखिए, ये एक मर्डर मिस्ट्री है, एकदम क्लियर नहीं है कि हत्यारा कौन है। क ई पात्र सामने आते हैं, हम पूरी जांच और सेटिस्फेक्शन के बाद ही कोई फैसला लेंगे।"-(पृष्ठ 223)
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उपन्यास - गुलाबी अपराध
ISBN 81-7789-509-5
लेखक - एम. इकराम फरीदी
प्रकाशन- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 260
मूल्य - 80₹
संपर्क-
एम. इकराम फरीदी
मीरगंज, बरेली
उत्तर प्रदेश- 243504
Email- moikramfareedi@gmail.com
Mob/Wtp- 9911341862

Wednesday, 31 May 2017

47. द ओल्ड फोर्ट- एम. इकराम फरीदी

युवा लेखक एम. इकराम. फरीदी का प्रथम उपन्यास 'द ओल्ड फोर्ट- भूतों की एक गाथा' पढने को मिला। जैसा की नाम से ही स्पष्ट होता है इस उपन्यास में कहानी किस प्रकार है, वैसा ही विचार पाठक के मन में उभरता है। वह विचार एक हद तक सही भी है, लेकिन लेखक ने उपन्यास का प्रस्तुतीकरण इस प्रकार किया है की पाठक एक बार उपन्यास उठाने के बाद अंतिम पृष्ठ पढ कर ही रहेगा।
उपन्यास की कहानी की बात करें तो इसका प्रथम दृश्य ही पाठक को स्वयं में बांधने में सक्षम है।
एक गांव है बहरामपुर, उसी गांव के पास है एक है प्राचीन किला। इस किले के बारे में प्रसिद्ध है की इसमें भूत रहते हैं। इस किले का मालिक चौधरी सुखबीर सिंह इस जमीन को बेचना चाहता है लेकिन भूत किला होने के कारण लोग इसे खरीदते नहीं। जिन-जिन लोगों ने इस जमीन को खरीदने की कोशिश की तो उनको बहुत हानि उठानी पङी।
      डाॅक्टर भगनानी, जो की एक मनोवैज्ञानिक है, वे भूत-प्रेतों पत विश्वास नहीं करते। किले की जमीन का मालिक सुखबीर चौधरी इस जमीन से किले को ढहाने का सौदा एक अरब में डाॅक्टर से सौदा करते है। एक अरब में मात्र एक किला ही ढहाना है, डाॅक्टर भगनानी के कान भी खङे हो जाते हैं और भगनानी का साथी डाॅक्टर के मन में भी कातिलाना हवस जाग जाती है।
तब डाॅक्टर भगनानी व डाॅक्टर गाबा मिलकर अपने छह विद्यार्थियों की एक टीम तैयार करते हैं।
किला भी कोई मामूली नहीं। किलें में नरभक्षी वृक्ष हैं, कच्छप जितने बङे बिच्छू हैं और भेडियों का बसेरा भी है।
किले का एक दृश्य देखिएगा-
इस चीख ने सबके कलेजों को थर्रा दिया।
सबने पूछा, -"क्या हुआ?"
शुभम् की भयग्रस्त दृष्टि जिधर उठी थी, उधर ही उसने इशारा कर किया, -" वो देखो।"
सबने उधर देखा। उन सबके प्राण कांप उठे थे।
यह वही स्थान था जहां बिच्छू को मारा गया था। लोथङों में तब्दील बिच्छू वहीं होना चाहिए था, लेकिन अब नहीं था। वहीं दीवार पर खून से अंग्रेजीकैपिटल वर्ङ में लिखा था।
You are welcome
  - क्या किले में भूत है?
- सुखबीर चौधरी क्यों किले को तोङने के लिए एक अरब रुपये देने को तैयार हो गया?
- डाॅक्टर के लालच का क्या परिणाम निकला?
- किले में प्रवेश करने पर डाॅक्टर की टीम को क्या -क्या परेशानी आयी?
इन सब उलझे सवालों के जवाब तो एम. इकराम फरीदी कर उपन्यास को पढकर ही मिलेंगे।
उपन्यास किसी अंधविश्वास का समर्थन नहीं करता अपितु भूत-प्रेत आदि को स्थापित करने वाले व्यक्तियों का विरोध कर एक अच्छे समाज निर्माण का सपना दिखाता है।
"ये तो और भी हैरानी की बात हो गयी- इन गुरुओं ने भूतों को पैदा कर दिया लेकिन नाश नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा क्यों?" (पृष्ठ-17)
" हमारा टारगेट है कि लोग अंधविश्वास के विरोधी बन जायें। एक से कम इतने जागरुक तो हो जाएं की अंधविश्वास को जानने लग जाए कि अंधविश्वास कहते किसे हैं।" (पृष्ठ-27)
उपन्यास की विशेषता-
पाठक के मन में विचार उठता होगा की हम इस उपन्यास को क्यों पढें तो इसके कई कारण है।
1. उपन्यास अंधविश्वास का खण्डन करता है और एक वैज्ञानिक सोच स्थापना की कोशिश करता है।
2. भूत- प्रेत आदि के विचारों को जङ से खत्म करने में सहायक है।
3. यह उपन्यास विशेष तौर पर किशोरों के लिए अति उपयोगी है, और देखा जाये तो यह एक किशोर श्रेणी का उपन्यास है।
3. उपन्यास मनोविज्ञान को महत्व देता है।
4. मनोरंजन के साथ-साथ मानसिक समझ विकसित करने में सहायक है।
उपन्यास में कमियां-
लेखक जो भी रचना करता है उसमें कोई न कोई कोई रह जाती है। उपन्यास में भी कुछ कमियां है लेकिन वे कथ्य को निष्प्रभावी नहीं बनाती।
1.उपन्यास में शाब्दिक गलतियाँ हैं। यह मुद्रक की गलती है लेखक की नहीं ।
2. उपन्यास में सस्पेंश (रहस्य) है, लेकिन लेखक सस्पेंश को लंबा नहीं खीच पाया। सस्पेंश बनने के साथ-साथ खत्म हो जाता है।
3. डाॅक्टर गाबा का अपनी पुत्री अक्षरा को कत्ल का कहना अजीब सा लगता है। (पृष्ठ-51-55)
4. पृष्ठ संख्या 106-110 पर डाॅक्टर भगनानी का व जासूस सुभाष कौशिक का वार्तालाप कुछ लंबा व विषय से अलग भटक गया लगता है।
यह उपन्यास बहुत ही रोचक, संस्पेंशपूर्व है। जहां उपन्यास में भूत- प्रेत को विषय बनाया गया है वहीं मनोविज्ञान के माध्यम से भूत- प्रेत व अंधविश्वास का खण्डन कर एक वैज्ञानिक समाज निर्माण की इच्छा व्यक्त की गयी है।
लेखक इकराम फरीदी का प्रस्तुत प्रथम उपन्यास बहुत अच्छा है और यह सभी वर्ग के लिए उपयोगी व ज्ञानवर्धक है।

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उपन्यास - द ओल्ड फोर्ट- भूतों की एक गाथा ( हिंदी)
ISBN NO. 81-88388-96-3
लेखक- एम. इकराम फरीदी
प्रकाशन- हिंदी साहित्य सदन- दिल्ली
www.hindisahityasadan.com
मूल्य- 125₹
पृष्ठ- 223

Saturday, 13 May 2017

44. ट्रेजडी गर्ल- एम. इकराम फरीदी


एक लङकी थी जो अंधकार से निकल कर प्रकाश को लालायित थी- एक शुभचिंतक के माध्यम से उसे प्रकाश प्राप्त हुआ मगर अंधकार के अनाकोण्डा को ये गंवारा नहीं था.......
      यौवन, दुर्भाग्य, शोषण और अपराध के गर्भ में परिवेश पाकर परिपक्व हुयी एक लङकी।
        उपर्युक्त पंक्तियां नव लेखक एम. इजराम फरीदी के द्वितीय उपन्यास ट्रेजडी गर्ल के अंतिम कवर पृष्ठ से हैं।
        एक थी गुल- जी हां, ये कहानी एक गुल की है और उस गुल का नाम था -सुरभि। नाम उसका सुरभि था लेकिन अतीत उसका काला था। वही काला अतीत उसका वर्तमान बन कर जब सामने खङा हो गया। तब मुसीबतों के पहाङ उस पर टूट पङे।
  प्रस्तुत उपन्यास जहाँ एक और हमें सामाजिक लगता है वहीं दूसरी तरफ जासूसी भी दिखाई देता है। जहाँ एक तरफ प्यार है तो वहीं दूसरी तरफ इसमें नफरत भी है। दोस्त हैं, दुश्मन भी हैं और दोस्त-दुश्मन भी है।

कहानी-
उपन्यास की कहानी की बात करे तो यह सुरभि नामक एक ऐसी युवती की कहानी है जिसका अतीत कभी दागदार रह चुका है। अब सुरभि एक अच्छा जीवन जी रही है, अपने अतीत को भूला कर। लेकिन एक दिन सुरभि के अतीत का मित्र ही उसके सुनहरे वर्तमान पर काला बादल बन कर छा जाता है। अब सुरभि कहां जाये।
      इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की नियति है की वह हर जगह छली जाती। इन परिस्थितियों से उसे  हर बार बचाता है सुरभि का दोस्त अजय।
अपने अतीत के ब्लैकमेलर से बचने के लिए अपने मित्र अजय का सहारा लेती है। लेकिन ब्लैकमेलर उसके पति विशाल से पास जाने की धमकी देता है।
      लेकिन जब सुरभि के पति विशाल का ब्लैकमेलर से वास्ता पङता है तब वह सुभाष कौशिक नामक जासूस को  सत्यता का पता लगाने के लिए बुलाता है।
सुरभि का दोस्त अजय जब भारी मुसीबत में‌ फंस जाता है तब सुरभि चाह कर भी उसकी मदद नहीं कर पाती और सुरभि का पति विशाल भी इस मित्रता को पसंद नहीं करता।
यहीं से कहानी में एक जबरदस्त मोङ आता है और कहानी अपने-पराये, दोस्त-दुश्मनों के चेहरों से नकाब उतारती हुयी जासूस सुभाष कौशिक के संवाद के साथ एक विषाद पूर्ण स्थिति में खत्म हो जाती है।
पल-पल बदलते पात्र-
कहानी की एक विशेषता यह है की समस्त पात्र स्वतंत्र है और एक अच्छा कहानीकार भी वही माना जाता है जो अपने पात्रों को अपनी कठपुतली न बनाकर उन्हें स्वतंत्र आचरण करने दे। इसी विशेषता के कारण ट्रेजडी गर्ल उपन्यास सत्यता के ज्यादा नजदीक नजर आता है।
     पाठक उपन्यास के किसी भी पात्र पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं कर सकता है की यह पात्र कहां तक ईमानदार है या कहां तक अपने नियमों पर बद्ध।
  कब सुरभी बदल जाती है, कब विशाल पल-पल बदलता है और कब अजय के विचारों में परिवर्तन आ जाये कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
एक जबरदस्त दृश्य-
उपन्यास का एक बहुत ही हास्य व रोचक दृश्य है। जब ब्लैकमेलर सुरभि के पति को सुरभि के काले अतीत के दम पर ब्लैकमेल करने की कोशिश करता है
आप भी देख लीजिएगा।
ब्लैकमेलर ने फोन किया- " आदमी बङे खतरनाक बोल रहे हैं हम...।"
"क...कौन?"
"नाम को जाने दो...।"
"ओह समझा- संदीप दूबे बोल रहे हो तुम।"
ब्लैकमेलर उछला- "अबे..तुझे मेरा नाम कैसे मालूम?"
"...असली संदीप दूबे जी ने....।"
"असली संदीप दूबे ? ये कौन हुआ बे?"
पाठक महोदय वास्तविकता तो ये है की ये ब्लैकमेलर ही असली संदीप दूबे और जिसे स्वयं यहाँ पहचान का संकट पैदा हो गया।
चलो अब थोङा आगे के दृश्य का रसास्वादन करते हैं-
"प्यारे, ज्यादा मेरे दिमाग को मत झुलसा- मैं पहले से परेशान  हूँ- बस मुझसे ब्लैकमेल हो जा- तू जानता है कि तेरी पत्नी के खिलाफ मेरे पास क्या-क्या है?"
"उसकी कोई जरूरत नहीं वो मैने देख रखी है"
"क..कहां- तूने क्या देख ली भई?"
"अपनी बीवी के पास - उसके मोबाइल में है।"
संदीप के आगे पूरी दुनिया घूमने लगी। उसे चक्कर आने लगा।
"कैसा पति है यार तू?"- संदीप रो देने वाले स्वर  में बोला-" अपनी बीवी की रंगरलियां देख कर खुश होता है।"
देखा पाठक मित्रो ऐसा दृश्य कहीं। जहाँ स्वयं ब्लैकमेलर पनाह मांगता नजर आता है। क्या कोई पति अपनी पत्नी के अश्लील विडियो पर खुश हो सकता है। कभी भी नहीं, तो फिर यहाँ क्या चक्कर है?

संवाद-
उपन्यास में बहुत से ऐसे संवाद है जो पात्र का चरित्र-चित्रण करने के साथ-साथ उपन्यास को गति भी देते हैं। कई संवाद तो जीवन को सही दिशा देने वाले दर्शन सूत्र की तरह भी हैं।
- 'वफा, प्यार, मोहब्बत- ये सब फैंटेसी शब्द हैं, जो दिखने में तो खूबसूरत हैं लेकिन इनकी हकीकत कुछ भी नहीं है।"-(पृष्ठ-92)
- "नियति हमारे हाथ में नहीं है, बल्कि हम उसकी कठपुतलियां हैं - गिले शिकवे अपनी जगह और यथार्थ के कङवे घूंट अपनी जगह।"-(92-93)
- " मायके का तो कुत्ता भी प्यारा होता है।" (93)
- "जमाना कहीं नहीं पहुंचा- जमाना वहीं है, आज भी रोटी चावल खा रहा है- बस अय्याशी पर पहले प्रतिबंध था, अब वह ओपन हो गयी है। बीवी अपने पति की न होकर बाकी  सबकी है, बस यही चेंजिंग आई है जमाने में।"-(125)
- "दुनिया का कोई भी ऐसा मर्द नहीं है जो अपनी पत्नी के रूप में ईमानदार सीधी-सादी, नेक और चरित्रवान लङकी को न चाहता हो जबकि प्रेमिका के रूप में वह कैसी भी लङकी को पसंद कर लेगा।"-(143)
-" आशिक का मुकद्दर ऐसा होता है की वह करवटें बदलते-बदलते एक दिन गहरी नींद सो जाता है।"-(167)
-" जब दुश्मन के साथ दोस्त मिल जाये तब तबाही को रोक पाना मुश्किल है।"-(180)
-"एक औरत की क्या नियति है? जहां जायेगी छली जायेगी।"-(226)

जो मुझे अच्छा नहीं लगा-
पृष्ठ संख्या 89 पर सुरभि अजय को अपने पति विशाल के बारे में कहती है।
- "....मेरी जुल्फों की जंजीरों में जकङा गुलाम भला मेरे खिलाफ सोच सकता है"
वर्तमान में सुरभि एक पतिव्रता व अपने पति को सच्चा प्यार करने वाली स्त्री है। तब वह अपने पति संदर्भ में गुलाम या जुल्फों में जकङा आदि शब्द प्रयोग नहीं करेगी। इन शब्दों का अर्थ की वह अपने पति से सच्चा प्यार नहीं करती।
- पूरे उपन्यास में मात्र दो पंक्तियाँ है जो बस मुझे अच्छी नहीं लगी। क्योंकि उनकी वहाँ आवश्यकता नहीं थी।
पृष्ठ संख्या 151 की प्रथम दो पंक्तियाँ ।
- महाभारत की पात्र द्रोपदी को पांचाल क्षेत्र की होने के कारण पांचाली कहा जाता है। इस उपन्यास में लेखक सुरभि को किसी संदर्भ विशेष में पांचाली कहा है इसका कारण समझ में नहीं आता।
  उपन्यास पढें-
उपन्यास की भाषा शैली बहुत ही सरल है जो पाठक को तुरंत समझ में आती है। कहानी हमारे परिवेश की होने के कारण व संस्पैंश के कारण पाठक के मर्म को छू जाती है।
      युवावस्था में भटक कर की गयी गलतियाँ भविष्य में हमारे लिए किस प्रकार मुसीबतें खङी कर सकती हैं यह तो इस उपन्यास को पढ कर ही जाना जा सकता है।
  वर्तमान उपन्यास जगत के मार-काट, जासूसी और हिंसा प्रधान या फिर सामाजिक उपन्यासों के दौर में प्रस्तुत उपन्यास बिलकुल अलग है। क्योंकि उपन्यासकार ने जासूस को तो दिखाया है पर उसे कहीं भी हावी नहीं होने दिया यही स्थिति ब्लैकमेलर की है।
लेखक एम. इकराम फरीदी की कलम को नमन जिन्होने एक संग्रहनीय उपन्यास लिखा।

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उपन्यास- ट्रेजडी गर्ल
लेखक- एम. इकराम फरीदी
प्रकाशक- धीरज पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 240
मूल्य-80₹
सन्- may-2017
(उपन्यास प्राप्त करने के लिए लेखक से भी संपर्क किया जा सकता है)
एम.इकराम फरीदी
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