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Monday, 29 May 2023

564. खाली आंचल- सुरेश चौधरी

एक मार्मिक रचना 'खाली आंचल'
लेखक- सुरेश चौधरी

वर्तमान रोमांटिक उपन्यासों के समय में एक सामाजिक उपन्यास का आना एक आश्चर्य की तरह है। अगर आपने लोकप्रिय साहित्य में 'राजहंस, राजवंश,मनोज' जैसे लेखकों को पढा है तो सुरेश चौधरी जी का प्रस्तुत उपन्यास आपको उस दौर की याद दिला देगा।

शाम का धुंधलका धीरे-धीरे गहरे अन्धेरे में तब्दील हो गया। परन्तु सेठ मुरारीलाल की कोठी इस गहरे अन्धेरे में भी इस तरह से जगमग कर रही थी, जैसे कोई दुल्हन अपने असीम रूप की छटा बिखेरती हो। (खाली आंचल उपन्यास के प्रथम पृष्ठ से)

जीवन परिवर्तन और संघर्षशील है। ऐसा ही जीवन जीता है प्रस्तुत उपन्यास का नायक आकाश। एक अमीर घराने युवक आकाश जब एक रात अपने घर लौटता है तो एक घटना ने उसका जीवन ही बदल दिया था। आकाश चाहकर भी उस घटना की पुष्टि नहीं कर पाता। लेकिन उसका हृदय इतना परिवर्तित हो चुका था की उसे घर का हर सदस्य अब बेगाना नजर आने लगा था।

Friday, 28 August 2020

370. प्रतिशोध- सुरेश चौधरी

चम्बल के डाकू की कहानी
प्रतिशोध- सुरेश चौधरी
       हालातों ने चंदन सिंह को बेरहम डाकू तो बना दिया पर जब उसके अपने खून से उसका सामना हुआ तो जैसे उसके अंदर का इंसान फिर से जी उठा और....(आवरण पेेेज से)
          सुरेश चौधरी उभरते हुए लेखक हैं। अब तक उनके तीन उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। 'खाली आंचल', 'एहसास' और तृतीय उपन्यास है 'प्रतिशोध'। मेरठ निवासी सुरेश चौधरी जी पेशे से वकील हैं।
       मनुष्य अपने जीवन में कुछ जाने-अनजाने में अमानवीय कृत्य कर बैठता है और उसका परिणाम भी उसे भुगतना पड़ता है। ऐसा ही कुछ अपने जीवन में जमींदार भैरो सिंह ने किया और उसी राह पर चंदन सिंह भी चला। जब समय ने अपना प्रतिशोध लिया तो दोनों की जिंदगी में वह बवण्डर उठा जो उनका सब कुछ तबाह कर गया। 
        अब उपन्यास के कथानक पर कुछ चर्चा हो जाये। भैरों सिंह जमींदार थे और सरजू उनका एक खास कारिंदा था। सरजू का पुत्र था चन्दू और जमींदार की पुत्री थी बेला।
वक्त ने चंदू को जमींदार भैरों सिंह का वह रूप दिया दिया जिसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकता था। भैरों सिंह के आतंक और पुलिस के भ्रष्टाचार ने चंदू को डाकू चंदन सिंह बना दिया‌। "चंदन सिंह नाम है हमार... ।" (पृष्ठ-67)
      अब डाकू चंदन सिंह जीवन का एक ही मकसद था भैरों सिंह से प्रतिशोध लेना। "...आज के मकसद में हमारी जिंदगी भी चली जाये...तो कौनू बात नाही...लेकिन हम चाहत हैं...कि ऊ ससुरे जमींदार को पता लगी जाये कि प्रतिशोध एइसा होत है...।" (पृष्ठ-64)
       प्रतिशोध की राह पर निकला चंदन सिंह सही औत गलत की पहचान भी भूल गया। प्रतिशोध की आग मे उसे अंधा बना दिया लेकिन जब उसकी आँख खुली तो उसका अपना खून उसके सामने दीवार बन कर खडा़ था।
- चंदन सिंह की भैरों सिंह से क्या दुश्मनी थी?
- चंदन सिंह ने कैसे प्रतिशोध लिया?
- चंदन सिंह के सामने दीवार बन कर कौन खड़ा था।
- चंदन सिंह और भैरों सिंह की दुश्मनी क्या रंग लायी?
आदि प्रश्नों के उत्तर के लिए सुरेश चौधरी का उपन्यास प्रतिशोध पढना होगा।