ब्लैकमेल, हमशक्ल और मर्डर मिस्ट्री
ट्रिपल क्राॅस- सुरेन्द्र मोहन पाठक
सुनील सीरीज- 54
सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित प्रसिद्ध उपन्यास 'ट्रिपल क्रॉस' सुनील श्रृंखला संख्या का 54 वां उपन्यास है । यह एक थ्रिलर मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। उपन्यास में मर्डर मिस्ट्री गौण अन्य कथा प्रधान है और यही कथा उपन्यास को ज्यादा रोचक बनाती है।
ट्रिपल क्राॅस उपन्यास जैसा की अपने शीर्षक से ही अपनी कथा का आभास करवा रही है। अब देखना यह है की कौन, किसको और कैसे क्राॅस कर रहा है और किस माध्यम से और किसलिए ।
उपन्यास की समीक्षा से पूर्व हम उपन्यास के प्रथम पृष्ठ पर एक नजर डालते हैं और फिर समीक्षा को आगे बढाते हैं।
डिफेन्स कालोनी की एक आलीशान इमारत के सामने एक हवाईजहाज जैसी लम्बी-चौड़ी शेवरलेट कार आकर रुकी । वर्दीधारी ड्राइवर कार से बाहर निकला और उसने बड़ी तत्परता से कार का पिछला दरवाजा खोला ।
कार में से जो आदमी बाहर निकला वह सूरत से ही नेता मालूम हो रहा था। वह झक सफेद खादी का कुर्ता, पाजामा, जवाहर जैकेट और गांधी टोपी पहने था । उसकी आरामतलबी और ऐशपरस्ती की जिन्दगी की सबसे बड़ी चुगली उसकी तोंद कर रही थी जिसकी विशालता का काफी हद तक अनुमान इस बात से लगाया जा सकता था कि वह अभी कार में ही था कि तोंद दरवाजे से बाहर निकल आई थी
वह कार से बाहर निकला और हांफने लगा। कार से निकलकर फुटपाथ पर आने की सहज और सरल क्रिया ने ही उसे हंफा दिया था ।
"गाड़ी ले जाओ ।" - वह ड्राइवर से बोला - "मुझे यहां वक्त लगेगा । वापसी में मैं फोन कर दूंगा ।"
“यस, सर ।” - ड्राइवर तत्पर स्वर में बोला । उसने 'सर' को सलाम ठोका और वापस कार में जा बैठा ।
सड़क से पार उसी क्षण काले रंग की एम्बैसेडर कार आकर रुकी थी । उसकी ड्राइविंग सीट पर सिर पर आंखों तक झुका फैल्ट हैट लगाये एक हष्ट-पुष्ट आदमी बैठा था । कार रोकने के बाद उसने कार से बाहर निकलने का उपक्रम नहीं किया। उसकी निगाह सड़क से पर खड़ी शेवरलेट पर टिकी हुई थी । (ट्रिपल क्राॅस, सुरेन्द्र मोहन पाठक, प्रथम पृष्ठ से)
यह कहानी है नेता कामेश्वर नाथ ओझा (प्रतिरक्षा विभाग उपमंत्री) की जो एक कैबरे डांसर लड़की (देविका) के प्रेमजाल में फंस कर ब्लैकमेल हो जाते हैं।
कहीं दूसरे शहर विशालगढ में अम्बिका नामक एक युवती भी संयोग से देविका से टकराती है।
"पेट कैसे पालती हो ?" - अम्बिका ने पूछा ।
पहले तो देविका के दिल में आया कि वह साफ ही बता दे कि वह एक मिनिस्टर की रखैल थी और कैबरे अभी भी इसलिए करती थी कि लोगों को उसकी आय का कोई प्रत्यक्ष साधन दिखाई देता रहे लेकिन प्रत्यक्षतः वह बोली - "आज तक दिल्ली में कैबरे डांसर थी लेकिन आगे पता नहीं क्या करूंगी।"
"कमाल है !" - अम्बिका के मुंह से निकला ।
"क्या ?"
"हमारी सूरतें ही नहीं, हमारी जिन्दगी की एक-एक बात हूबहू मिलती है ।"
"यानी कि तुम भी कैबरे डांसर हो ?"
"थी । विशालगढ में।"
"आगे क्या इरादा है ?"
"यही कुछ फिर शुरू करना पड़ेगा। इसके अलावा मुझे आता क्या है ?"
"यही हाल अपना है।" (उपन्यास अंश)
यहीं से उपन्यास में एक नया मोड़ आता है और कहानी ज्यादा रोचक होती चली जाती है।
अम्बिका और देविका का हमशक्ल होना अम्बिका के लिए खतरनाक हो जाता है। क्योंकि देविका जिस नेता कामेश्वर नाथ ओझा (प्रतिरक्षा विभाग उपमंत्री) को ब्लैकमेल करती थी वह अब अम्बिका कि जान के पीछे पड़ा है और सिर्फ वह नेता ही नहीं कुछ और 'लोग' भी उस ब्लैकमेल वाली वस्तु को हथियाना चाहते हैं ताकि वह नेता जी को ब्लैकमेल कर सके और यही सब घटनाएं अम्बिका के लिए जान का खतरा बनती हैं।
इसी अम्बिका की मुलाकात राजनगर के प्रसिद्ध समाचार पत्र 'ब्लास्ट' के रिपोर्टें सुनील चक्रवर्ती से कुछ ऐसी परिस्थितियों में होती है की उसे सुनील की मदद लेनी पड़ती है।
"लेकिन वायदा कीजिए कि जिस जंजाल में मैं फंस गई हूं आप उसमें से मुझे निकालने में मेरी मदद करेंगे।"
“किया। किया वायदा। आप तो ऐसा कोई वायदा न भी करवातीं तो भी मैं आपकी मदद करता।"(पृष्ठ- 56)
जैसे ही सुनील कथा का नायक बनता है वैसे ही कहानी में एक हत्या हो जाती है और उस हत्या का जिम्मेदार अम्बिका को समझा जाता है। लेकिन सुनील अम्बिका से वायदा कर चुका है और अब सुनील इस खेल को कैसे पलटता है यह पठनीय भी है और रोचक भी।
ब्लैकमेल से आरम्भ हुयी यह कथा अंत में बदलने पर एक नया मोड़ ले लेती है और उस मोड़ पर खड़ा है खोजी पत्रकार सुनील चक्रवर्ती । सुनील को लगता है यह हत्या जो की देखने में साधारण है लेकिन इसके पूछे कुछ और भी रहस्य हैं। और जब सुनील पुलिस इंस्पेक्टर प्रभुदयाल के समक्ष इन रहस्यों को खोलता है तो सब चकित रह जाते हैं।
आदि से अंत तक 'ट्रिपल क्राॅस' एक रोचक कथानक है जो पाठक का अच्छा मनोरंजन करता है।
कहानी में कई जगह घटनाएं बहुत ही नाटकीय और संयोगवश घटित होती हैं, जो कभी-कभी थोड़ी अतिशयोक्तिपूर्ण लगती हैं।
उदाहरण देखॆं-
सुनील ने अन्धेरे में तीर छोड़ा।
तीर निशाने पर बैठा।(पृष्ठ-110)
सुनील सीरीज के बहुत से ऐसे और उपन्यास हैं जिनमें सुनील अंधेरे में तीर छोड़ता है जो की सही निशाने पर लगते हैं। जब एक ही तथ्य की पुनरावृत्ति होने लगती है तो वह नीरस लगने लगता है। पढे गये सुधीर सीरीज के उपन्यास 'वन वे स्ट्रीट' में ही यही प्रसंग आता है।
प्रस्तुत उपन्यास में सुनील अपनी बात को आगे कैसे बढाता है देखें-
“बिल्कुल तुक्का मारा था। संयोगवश तीर निशाने पर बैठा।"(पृष्ठ-112)
उपन्यास पात्र:-
उपन्यास में पात्रों की संख्या सीमित है और जो भी पात्र है वह अपनी भूमिका में सराहनीय रहा है। एक -एक पात्र पाठक की स्मृति में रह सकता है।
कम पात्र उपन्यास को उलझाव से बचाते हैं और पाठक भी आसानी से पात्रों को याद रखस सकता है।
सुनील- ब्लास्ट पत्र का रिपोर्टर
कामेश्वर नाथ ओझा- प्रतिरक्षा विभाग उपमंत्री
जगत राम- दलाल
देविका- काॅलगर्ल
उमेश- मंत्री का सचिव
भूषण- देविका का मित्र
अम्बिका- कैबरे डांसर
सागर- अम्बिका का मित्र
आनंद प्रकाश- नश्तर अखबार का मालिक
परमानंद- आनंद प्रकाश का मित्र
रोचक संवाद-
दिल पर काबू कीजिए और फिर मुंह खोलिए। कहीं ऐसा न हो कि वह अपने स्थान से उछले और मुंह के रास्ते निकलकर यहां से रफूचक्कर हो जाए..." —
निष्कर्ष:- ट्रिपल क्रॉस' सुरेन्द्र मोहन पाठक के बेहतरीन और अत्यंत रोमांचक उपन्यासों में से एक है। इसकी कहानी राजनीति, अपराध, ग्लैमर, और दो हमशक्ल चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती है। उपन्यास का ताना-बाना इतनी कुशलता से बुना गया है कि पाठक शुरू से अंत तक रहस्य के जाल में बंधा रहता है। इसमें एक तरफ जहाँ राजनीतिक भ्रष्टाचार और ब्लैकमेलिंग का काला चेहरा दिखाया गया है, वहीं दूसरी तरफ मानवीय कमजोरियों और संयोगों के कारण उत्पन्न होने वाली विडंबनाओं का बहुत ही सजीव चित्रण किया गया है।
उपन्यास- ट्रिपल क्राॅस
लेखक- सुरेन्द्र मोहन पाठक
संस्करण- 1975
पृष्ठ- 142
प्रकाशक- तुलसी साहित्य पब्लिकेशन,मेरठ
सुनील सीरीज- 54
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