Sunday, 30 September 2018

144. हंस- पत्रिका

हंस पत्रिका- नवसंचार के जनाचार

हंस पत्रिका का सितंबर -2018 अंक नवसंचार के जनाचार को समर्पित है। यह हंस का विशेषांक है। इस अंक में वर्तमान सोशल मीडिया संबंधी आलेख पढने को मिलेंगे।

संपूर्ण अंक को कई भागों में बांटा गया है।

मेमरी ड्राईव- आदिकाल

इमाॅटिकाॅन- छवि भाषा

डिजिटल डेमाॅक्रैसी- वायरल जनतंत्र

हैशटैग- अस्मिता विमर्श

बुकमार्क

इस प्रकार समस्त आलेख दस भागों में विभक्त हैं। प्रत्येक खण्ड/भाग में शीर्षक संबंधी सामग्री समेटने की कोशिश की गयी।

वर्तमान में सोशल मीडिया का किस तरह से प्रयोग हो रहा है इस विषय को गंभीरता से उठाया गया है। सोशल मीडिया ने चाहे अभिव्यक्ति को स्वतंत्रता दे दी लेकिन इसके गंभीर खतरे भी हैं।


संपादकीय में बहुत अच्छी बात लिखी है- लेखन का अर्थ सत्ता की चाकरी, कुर्सी और पद बचाने के लिए किसी भी हद तक गिर जाना नहीं बल्कि रीढ और साख को सही सलामत रखना है। (पृष्ठ-10)

       रवि रतलामी का आलेख 'धड़ल्ले से कैसे लिखें देवनागरी में?' देवनागरी लेखन‌ को प्रेरित और लेखन में आयी समस्या-समाधान को समर्पित है। इंटरनेट पर पहले हिंदी लेखन एक समस्या थी, फाॅट की समस्या बहुत ज्यादा थी लेकिन वर्तमान में यह समस्या बहेहद तक सुलझ गयी।

फाॅट को लेकर उत्पन्न समस्या पर आधारित है डाॅ. प्रकाश हिंदुस्तानी का आलेख 'इंटरनेट पर हिंदी का आना।

हिंदी फाॅट की समस्या एक समय बहुत ज्यादा थी , जिसका सामना उस समय के कम्प्यूटर प्रयोक्ता को करना पड़ता था। 

अनूप शुक्ल का आलेख चाहे ब्लॉगिंग से संबंधित है, पर फाॅट समस्या उनको भी झेलनी पड़ी। इनके आलेख 'ब्लाॅगिंग: आदिम डिजिटल विधा' में ब्लॉग सबंधित काफी अच्छी जानकारी दी गयी है।

एक समय था तक ब्लॉग सोशल मीडिया में खूब प्रचलन में था। "अभिव्यक्ति की बेचैनी ब्लॉगिंग का प्राण तत्त्व है।"


          बालेन्दु शर्मा दधीज ने 'रचना के फिसलते मौके' में सोशल मीडिया के बारे में बहुत अच्छी बात कही है। वो लिखते हैं- "....आखिर क्यों हम अपने समाज, साहित्य, कला और देश के लिए सकारात्मक ढंग से इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहे?" (पृष्ठ-36)

        आज हमारे पास सोशल मिडिया जैसा सार्वजनिक मंच है जहां हम‌ अपनी बात स्वतंत्रता के साथ कह सकते हैं लेकिन क्या हम इस मंच का सार्थक उपयोग कर पा रहें हैं। अगर हम सोशल मीडिया जैसे मंच का सार्थक उपयोग कर पाये तो यह हमारी उपलब्धि होगी।

           सुशील जी 'छवियों का कुरुक्षेत्र' में लिखते है की हम बिना सोचे- समझे किसी भी तस्वीर को शेयर कर देते हैं। हम उस तस्वीर की सच्चाई जानने की कोशिश भी नहीं करते। हमारी एक छोटी सी भूल किसी के जीवन के लिए खतरा भी हो सकती है। हम जाने -अनजाने में किसी असत्य बात का प्रचार कर देते हैं। इसलिए आवश्यक है की किसी भी चित्र को सोशल मिडिया पर शेयर करने से पूर्व उसकी सत्यता परख लें


              यह अंक हंस का अन्य अंको से अलग है। उस अंक में कथा-कहानी या कविता को स्थान न देकर मात्र नवसंचार के जनाचार को ही स्थान दिया गया है।

अगर वर्तमान सोशल मीडिया को समझना है तो यह अंक काफी उपयोगी होगा।

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त्रिका- हंस

अंक- सितंबर -2018(पूर्णांक-383, वर्ष-33, अंक-2)

संपादक- संजय सहाय

www.hanshindimagazine.in

हंस का सितंबर अंक




Saturday, 29 September 2018

143. कपालकुण्डला- बंकिमचन्द्र चटर्जी

कपालकुण्डला- बंकिमचन्द्र चटर्जी

बंकिमचन्द्र चटर्जी बांग्ला भाषा के सुप्रसिद्ध रचनाकार हैं। इनकी रचनाएँ विभिन्न भाषाओं में‌ अनुदित होती रही हैं।
इनकी एक रचना है, लघु उपन्यास है -कपालकुण्डला। मेरे लिए यह शब्द 'कपालकुण्डला' सदा से ही जिज्ञासा का विषय रहा है की आखिर इस शब्द का अर्थ क्या है।
जब यह उपन्यास मेरे विद्यालय राजकीय उच्च माध्यम विद्यालय-आबू पर्वत (माउंट आबू, सिरोही) के पुस्तकालय में नजर आया तो इसे तुरंत उठा लिया।
जब पढना आरम्भ किया तो बहुत रोचक और दिलचस्प लगा।
आज से अढाई सौ साल पहले माघ महिने में एक नाव यात्रियों से लदी हुई गंगासागर से वापस आ रही थी। उन दिनों समुद्री डाकू तथा पुर्तगाली लुटेरों के डर के कारण कोई भी नाव अकेले न आती थी क्योंकि अकेल आना खतरे से खाली न था। पर वह नाव अकेले ही आ रही थी। गहरे कुहरे तथा रात के अंधकार के कारण मल्लाह दिशा भूलकर गलत रास्ते को चल पड़े और उन्हें यह न पता चला कि किस ओर जा रहे हैं।


नाव रास्ता भटकी गयी और फिर नाव से अलग होकर एक युवक जंगल में रास्ता भटक गया। यह युवक है नव कुमार, उपन्यास का नायक। अनजान व्यक्ति निश्चय ही जंगल में थोडी़ दूर जाने पर ही रास्‍ता भूल जाता है। वही दशा युवक की भी हुयी। (पृष्ठ-08)
इस भटकाव में युवक की मुलाकात एक कापालिक से होती है। गले में रुद्राक्ष की माला थी। मुख पर लंबी दाडी़ तथा सिर पर जटाओं के होने से उसकी शक्ल पहचानना मुश्किल था। (पृष्ठ-06)
उसी कापालिक साधु के माध्यम से उसे वहाँ एक लड़की‌ मिलती। उस लड़की नाम है -कपाल कुण्डला।
ऐसे सुनसान जंगल में वह उस अपूर्व सुंदरी को देखकर दंग रह गया। वह युवती भी अपनी चंचल आंखों से उसे लगातार देखे जा रही थी। (पृष्ठ-8)
यहीं से नव कुमार और कपाल कुण्डला की प्रेम‌कथा आरम्भ होती है। कापालिक साधु तांत्रिक सिद्धियों की प्राप्ति के लिए नव कुमार की बलि देना चाहता है। लेकिन कपालकुण्डला की मदद से वह, कपालकुण्डला को साथ लेकर शैतान कापालिक के जाल से निकल भागता है।
यह तो है कहानी का एक भाग या यूं‌ कह सकते हैं यह कहानी का मध्यांतर से पूर्व का भाग है। नव कुमार का बचपन में ही रिश्ता तय हो जाता है, लेकिन उस लड़की की विपरीत परिस्थितियों के चलते वह नव कुनार को मिल नहीं पाती। जब नवकुमार को मिलती है तो तब नव कुमार कपालकुण्डला के साथ शांतिपूर्वक वैवाहिक जीवन जी रहा होता है।
एक तरफ नव कुमार का वैवाहिक जीवन है, एक तरफ नव कुमार की बचपन की पूर्व मंगेतर पद्मावती (लुत्फुन्निया) है और एक तरफ शैतान कापालिक है।
लुत्फुन्निया ही नव कुमार और कपालकुण्डला के बीच दूरी पैदा करना चाहती है। "कपालकुण्डला के प्रति उसके पति के मन में घृणा पैदा करके उससे संबंध विच्छेद करना तभी मेरा कार्य सफल होगा।" (पृष्ठ-41)
यह कहानी मूलतः आपसी प्रेम और विश्वास की कहानी है। प्रेम तभी सफल जोतेहै जब तक उसमें विश्वास स्थापित रहता है। जब विश्वास नहीं होता तो प्रेम भी खत्म हो जाता है।
कपालकुण्डला एक संन्यासिन का जीवन जी चुकी है। उसके लिए प्रेम महत्वपूर्ण है, विश्वास महत्वपूर्ण है। जब वैवाहिक जीवन में विश्वास नहीं तो वह वैवाहिक जीवन कैसा। नवकुमार जब कपालकुण्डला पर अविश्वास प्रकट करता है तो वह कहती है- "क्या विश्वास की केवल आपको जरूरत है मुझे नहीं हो सकती? मेरे प्रति आपके दिल में बुरे भाव पैदा होना क्या मेरा अनादर नहीं है?" (पृष्ठ-62)
यही भाव दोनों की वैवाहिक जीवन को खत्म कर देता है।

उपन्यास का आरम्भ एक नाव से होता है जो रास्ता भटक गयी, तब लगता है यह उपन्यास कोई साहसिक समुद्री यात्रा से संबंधित है, बाद में नव कुमार जंगल में भटकता है और कापालिक से मिलता है, तब लगता है यह कोई हाॅरर कथा है। उपन्यास को पढने पर पता चलता है यह एक प्रेम कथा है जो आपसी विश्वास और प्रेम की बात करती है।
उपन्यास में लुत्फुन्निया का संबंध मुगल शासक वर्ग से दिखाया गया है और मुगल शासक सलीम का वर्णन भी उपन्यास में है। यह प्रकरण मेरे विचार से उपन्यास में‌ अनावश्यक सा लगता है। इसकी जगह पद्मावती उर्फ मोती बीबी उर्फ लुत्फुन्निया का वर्णन अन्य तरीक़े से होता तो ज्यादा अच्छा था।

उपन्यास का समापन बहुत ही मार्मिक है जो पाठक के हृदय में एक दर्द की टीस पैदा कर जाता है। उपन्यास आकार में छोटा है। पढने में रोचक और दिलचस्प है
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उपन्यास- कपाल कुण्डला
लेखक- बंकिमचन्द्र चटर्जी
प्रकाशक- सन्मार्ग प्रकाशन, 16 UB, बैग्लो रोड़, दिल्ली-07
वर्ष- 1990
पृष्ठ-


उपन्यास के कुछ अंश यहाँ पढे जा सकते हैं।

https://www.pustak.org/books/bookdetails/3559





142. किराये के हत्यारे- चन्दर

कसमकस की जिंदगी.....
किराये के हत्यारे- चन्दर, थ्रिलर उपन्यास, रोचक।
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‌जासूसी उपन्यासकार चन्दर का पहली बार कोई उपन्यास पढने को मिला। यह उपन्यास एक जासूसी उपन्यास है।
उपन्यास की कहानी एक वकील साहब के परिवार के चारों तरफ घूमती है। परिवार में वकील सूरज,उनकी पत्नी करूणा देवी, नौकर मंगलसिंह और एक नौकरानी कल्लो है।
यह कहानी नौकर मंगल सिंह के माध्यम से ही आगे बढती है। मंगल सिंह वकील साहब के घर का नौकर है और इस उपन्यास का नायक भी है।
एक गांव है हजरतबल। एक बार वकील जी के काम से मंगल सिंह हजरतबल गांव गया। हजरत बल गांव में हर व्यक्ति डरपोक था।(पृष्ठ-01)....ऐसे गाँव में वकील साहब ने अपना मेहनतामा वसूल करने के लिए मुझे इसलिए भेजा था मैं ही एक मर्द नौकर उनके यहाँ था। (पृष्ठ-06)
    कहानी का आरम्भ हजरतबल गांव के कुछ डरावने दृश्यों से होता है।
जैसे
पहलवान भोलाराम का सिर उसी के गंडासे से कटा मिला।
- गबरू झींवर की लड़की पना का शव गांव के बाहर पेङ से लटका मिला।
  गांव था ही इतना ख़तरनाक। ग्रामीण भी यही कहते थे।
"भैया, तुम यहाँ न रुको। अच्छा, तुम लौट जाओ भैया। यह गांव मनहूस है। यहाँ हत्यारों का राज है हत्यारों का।"
"कौन हत्यारे?"- मेरे दिल में एक ठण्डी छुरी सी उतरती चली गयी।
   यह दोनों दृश्य उपन्यास में सस्पेंश बनाये रखते हैं। इसी तरह वकील का अपनी पत्नी को कत्ल करने की साजिश रचना भी उपन्यास का एक पहलु है लेकिन अफसोस इन घटनाओं का उपन्यास में कोई तालमेल ही नहीं बैठता और न ही इनका कहीं कोई स्पष्टीकरण मिलता है। इन घटनाओं के कारण जो रहस्य और रोमांच बना था वह अंत में निराशा में बदल जाता है।
        
    उपन्यास का आरम्भ हजरतबल गांव की उक्त दो घटनाओं से होता है। उपन्यास में रोचकता भी जगती है फिर वकील का अपनी पत्नी को मरवाने का षड्यंत्र रचना भी इस उत्सुकता में बढोत्तरी करता है लेकिन उपन्यास अपने तृतीय चरण में कहीं और घूम जाता है। यह तृतीय चतण ही उपन्यास की मूल कथा है। यहाँ से उपन्यास पूर्णत: एक नयी दिशा को मुङ जाती है। हालांकि यह तीसरा मोड़ उपन्यास को रोचकता तो देता है लेकिन उपन्यास को गति प्रदान नहीं कर पाता। और फिर तीनों घटनाओं/प्रकरण/मोड़ का आपसी तालमेल भी नहीं बैठता। हालांकि लेखक ने एक कोशिश की है की पहली दो घटनाओं को आपसे से संबंधित किया जाये।

         उपन्यास का आरम्भ बहुत अच्छा है। इसे लेखक मेहनत से बहुत अच्छा बना सकता है। उपन्यास की घटनाएं और भाषा शैली इतनी रोचक है की पाठक स्वयं इससे जुड़ाव महसूस करता है लेकिन लेखक की कमी के कारण एक बेहतरीन उपन्यास बेहतर न बन सका।
            उपन्यास का नायक मंगल सिंह एक नौकर है। ऐसा प्रयोग कम ही देखने को मिलता है की एक नौकर कथा नायक हो। वह भी एक सामान्य नौकर जिसमें कोई अतिरिक्त खूबी नहीं है वह तो बस परिस्थितियों के अनुसार चलता है।
करुणा देवी भी मंगल सिंह के सीधेपन लिए कहती है।
"हमारे इस बुद्धु राम के लिए सब माँ ही माँ है। बस, भोजन अच्छा बनाना आना चाहिए।"
मंगल सिंह है भी भोजन भट्ट उसे तो खाना चाहिए। वह खुद भी कहता है। "यों ही दो रोटी दूसरों से ज्यादा खा लेता हूँ।"
        
      कम तो पहलवान भी नहीं है। वह भी नायक के साथ-साथ सत्य की खोज करता है। वह कहता है- "बेटे, जिस बात का तालमेल मेरे दिमाग में नहीं बैठता। उसकी तह तक पहुंचने का आदि हूँ।"
संवाद और भाषा शैली-
       किसी भी उपन्यास में उसकी भाषा शैली और संवाद बहुत महत्व रखते हैं। संवाद ही कथा को गति प्रदान करते हैं। इस उपन्यास के संवाद भी पठनीय है।
         इस उपन्यास की भाषा शैली की बात करें तो यह बहुत रोचक है। जहाँ वकील और करूणा देवी की भाषा में ....वहीं मंगल सिंह की भाषा शैली इनसे अलग है।
  कल्लो के संवाद और उसका लहजा उपन्यास में सबसे अलग है। वह ग्रामीण हरियाणवी अंदाज में बात करती है।
झज्जन,  और खलनायक द्वय की भाषा भी रोचक है।
बुजदिल बदमाश बहादुर बदमाश से कहीं ज्यादा खतरनाक होता है।
-औरत के रुतबे और हैसियत का भी कोई ठिकाना होता है भला। पति ने जितना चढाया उतनी चढ गयी। जितना उतारा उतनी उतर गयी
निष्कर्ष-
            इस उपन्यास की कहानी कई स्तर पर अलग-अलग घुमाव लेती है, लेकिन कहानी में कोई तारतम्य स्थापित नहीं होता। कहानी मूल विषय से भटकी सी‌ नजर आती है।
         उपन्यास में कहानी की बजाय इसकी शैली बहुत रोचक है। अपनी भाषा शैली के कारण उपन्यास स्वयं रोचकता बनाये रखता है।
            उपन्यास एक बार पढा जा सकता है।
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उपन्यास- किराये के हत्यारे
लेखक-    चन्दर
वर्ष- सितंबर, 1974
पृष्ठ- 125
प्रकाशक- सुबोध पॉकेट बुक्स, दिल्ली।



141. दौलत और खून- सुरेन्द्र मोहन पाठक

दौलत और खून- सुरेन्द्र मोहन‌ पाठक
विमल सीरिज -02

अगर आदमी की किस्मत बुरी हो तो उसका हर अच्छा काम भी बुरा हो जाता है, अगर किस्मत बुरी हो तो घर बैठे भी मुसीबत आ जाती है। ऐसी ही बुरी किस्मत है सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल उर्फ विमल खन्ना उर्फ गिरीश की।
विमल एक मुसीबत से बचता है तो आगे एक और नयी मुसीबत तैयार होती है। उसकी बेबस जिंदगी का हर कोई फायदा उठाना चाहता है।

'दौलत और खून' उपन्यास विमल सीरिज का दूसरा उपन्यास है लेकिन दोनों की कहानी पूर्णतः अलग-अलग है, पर दोनों कहानियों को दो बातें आपसे में जोड़ती हैं। एक तो स्वयं विमल और दूसरा वह हार जो विमल 'लेडी शांता गोकुलदास' से चुरा कर लाया था।(उपन्यास 'मौत का खेल')
        यही हार इस बार विमल के लिए मौत का हार बनता है। मुंबई से फरार विमल जा पहुंचता है‌ मद्रास। तंगहाली की जिंदगी जीने वाला विमल उस हार को बेच कर कुछ रुपयों की व्यवस्था करना चाहता है और यहीं से वह कुछ गलत लोगों की‌ नजर में चढ जाता है। "अपना नाम गिरीश बताने वाला यह युवक शर्तिया वही विमल कुमार खन्ना है जिसकी लेडी शांता गोकुलदास की हत्या के इल्जाम में पुलिस को तलाश है।" (पृष्ठ-120) 

140. मौत का खेल- सुरेन्द्र मोहन पाठक

विमल के विस्फोटक संसार का प्रथम उपन्यास
मौत का खेल- सुरेन्द्र मोहन पाठक, थ्रिलर उपन्यास, रोचक, पठनीय।
विमल सीरीज-01
-------------------
"कौन हो तुम?"- उसने नम्र स्वर में पूछा।
" भूखा हूं, जनाब"
"मैंने तुमसे यह नहीं पूछा है।"
"मैं इस वक्त आपको अपना इससे बेहतर परिचय देने की स्थिति में नहीं हूँ।"
        यह एक छोटा सा परिचय है उपन्यास के नायक विमल का। विमल जो की वक्त का मारा एक ऐसा पात्र है जिसकी जिंदगी 'होइहि सोइ जो राम रचि राखा' की तर्ज पर चलती है।
समय की मार और अपनों की बेवफाई से परेशान विमल नये शहर में नये नाम के साथ जीवन जीना चाहता है। लेकिन वक्त विमल के पक्ष में‌ न था।
           विमल को एक और महिला लेडी शांता गोकुलदास से परिचय हुआ। विमल जो की 'दूध का जला छाछ फूंक-फूंक कर पीने वाला' शख्स था। लेकिन दूध का जला यहाँ छाछ से भी जल गया।
         लेडी शांता गोकुलदास से उसे एक सड़क से उठा कर अच्छी जिंदगी दी और बदले चाहा..."मिस्टर, जरा सोचो, कल तुम भूखे-नंगे, बेघर, बेदर, गंदे गटर में कुलबुलाते कीड़े से भी गयी- गुजरी जिंदगी जीने वाले इंसान थे और आने वाले कल में तुम एक लखपति बन सकते हो।  और तुम्हे बताने की जरूरत नहीं कि आज की दुनिया में प्रतिष्ठा और सम्मान का हकदार केवल पैसे वाला ही बम सकता है।.....और यह सब कुछ बड़ी आसानी से हो सकता है, तुम्हें केवल अपने नारकीय जीवन से दुखी एक वृद्ध को अगले कुछ दिनों में अपने हाथ से फिसल जाने देगा होगा।" (पृष्ठ-45) 

Wednesday, 26 September 2018

139. वंदे मातरम् - वेदप्रकाश शर्मा

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की रहस्यमय मृत्यु आधारित

          वेदप्रकाश शर्मा का उपन्यास 'जय हिन्द' का द्वितीय भाग है 'वंदे मातरम'। मुझे लगे समय से इस उपन्यास की तलाश थी बहुत कोशिश के पश्चात संगरिया निवासी रतन लाल कूकणा जी ( हनुमानगढ, राजस्थान) से यह उपन्यास मिला।
                 मुझे वेदप्रकाश शर्मा जी के उपन्यास काफी रोचक लगते हैं। अगर आप उनके उपन्यासों को फिल्म की तरह पूर्णतः काल्पनिक रूप से लीजिएगा फिर देखिएगा की उनके उपन्यास कितने जबरदस्त होते हैं‌, इसलिए तो वेदप्रकाश शर्मा हिन्दी जासूसी साहित्य में सर्वाधिक चर्चित लेखक रहे हैं।
वेद जी के उपन्यास सामाजिक थ्रिलर होते थे,‌ उनकी कहानी बहुत अलग प्रकार की होती थी। वे उपन्यासों में प्रयोग ही इतने अच्छे करते थे की पाठक उनसे बंधा रह जाता था। जैसा की उन्होंने 'जय हिन्द' उपन्यास में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को प्रस्तुत किया। ऐसा ही प्रयोग उनके उपन्यास 'इंकलाब-जिंदाबाद' में है, कहां झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के पुत्र दामोदर को पेश किया है।
                 अब बात करते हैं उपन्यास 'वंदेमातरम' की। यह उपन्यास 'जय हिन्द' उपन्यास का द्वितीय और अंतिम भाग है। जय हिन्द उपन्यास वहाँ खत्म होता है जब सीक्रेट सर्विस के चीफ के समक्ष स्वयं नेताजी सुभाषचन्द्र प्रस्तुत होते हैं।

नेताजी जी का व्यक्तित्व हमेशा रहस्यमय रहा है।‌ विशेषकर उनके जीवन और मृत्यु को लेकर इतिहास असमंजस में हैं। इसी असमंजस को लेकर वेदप्रकाश जी ने एक काल्पनिक ऐतिहासिक उपन्यास रच दिया।

                उपन्यास का कथानक नेताजी जी के नये संगठन 'अखण्ड हिन्द फौज' की विध्वंसक गतिविधियों से आरम्भ होता है। अखण्ड हिन्द फौज और नेताजी से प्रेरित होकर असंख्य युवक इस फौज में शामिल हो जाते हैं। यहाँ तक की कुछ पुलिसवाले भी इस संगठन के सदस्य हैं।
वहीं दूसरी तरफ भारतीय सिक्रेट सर्विस के प्रमुख नेताजी के अस्तित्व को नकारते हैं। जहाँ जासूस विजय नेताजी को नकली मानता है वहीं जासूस विकास उनसे प्रभावित होता है।

- अखण्ड हिन्द फौज के सभी जवानों के दिमाग में यह बात ठूंसो कि ....स्टेडियम में जो सुभाष आ रहा है वह नकली है। (पृष्ठ-159)

- स्टेडियम में उस कथित नेताजी के पहुंचते ही उसे कत्ल कर दो।

- इस देश के महान सेनानी सुभाष के प्रगट होने को विदेशी एजेन्टों का षड्यंत्र बतायेंगे या उन्हें गोली मारेंगे।

- क्या नेताजी जिंदा हैं?
- तो क्या वास्तव में नेताजी जी नकली थे?
- क्या यह विदेशी लोगों का षड्यंत्र था?
- कौन लोग थे जो नेताजी का कत्ल करना चाहते थे?

इन सभी उलझे प्रश्नों के उत्तर तो 'वंदेमातरम' उपन्यास पढकर ही मिलेगा।

                'वंदेमातरम' उपन्यास एक काल्पनिक पर रोचक कथानक है। जिसमें नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को प्रस्तुत किया गया है। यहाँ एक तरफ यह विदेशी षड्यंत्र लगता है वहीं नेताजी के जीवित होने का अहसास भी होता है। लेखक ने बहुत कुशलता से एक अच्छे कथानक को रचा है जिसमें दिग्गज जासूस विजय-विकास भी उलझ कर रहे जाते हैं।
               उपन्यास में अंतर्राष्ट्रीय मुजरिम अलफांसे का किरदार भी अच्छा है। हालांकि अलफांसे को किरदार उपन्यासकारों में कम दिखाई देता है लेकिन वह अपनी जबरदस्त उपस्थित दर्शाता है।
'अलफांसे की चाल इसी को कहते हैं मिस्टर चीफ, आदमी सबकुछ समझते हुए भी उसमें फंसने के लिए मजबूर होता है। (पृष्ठ-113

                प्रस्तुत उपन्यास एक एक अलग प्रकार का अहसास करवाने वाला अच्छा व रोचक उपन्यास है। जो अपने अंदर कई रहस्य समेटे हुए है। पाठक पल-पल इस द्वंद्व से गुजरता है की क्या नेताजी सुभाषचंद्र बोस जीवित है या नहीं।


निष्कर्ष-
             'जय हिन्द' उपन्यास का द्वितीय भाग 'वंदेमातरम' नेताजी सुभाषचंद्र बोस के एक रहस्य मृत्यु को आधार बना कर रचा गया एक रोचक उपन्यास है। भारतीय जन मानस में नेताजी की मृत्यु को लेकर एक गहरा विरोधाभास है। यही विरोधाभास इस उपन्यास में एक सुखद अहसास करवाता है।
उपन्यास आदि से अंत तक रोचक और पठनीय है।


उपन्यास- वंदेमातरम
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- तुलसी पॉकेट बुक्स
पृष्ठ- 223

उपन्यास 'जय हिन्द' की समीक्षा जय हिन्द

Sunday, 16 September 2018

138. जय हिंद- वेदप्रकाश शर्मा

क्या नेताजी सुभाष चंद्र बोस जिंदा है?
जय हिंद- वेदप्रकाश शर्मा, जासूसी उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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                     उपन्यासकर वेदप्रकाश शर्मा भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण वह है इनका कथानक और कथानक में रोचकता। कहानी चाहे जैसी भी हो लेकिन उसे रोचक तरीके से जैसे वेदप्रकाश शर्मा लिखते हैं वह स्वयं रोचक हो उठती है। अगर उसमें कथानक स्वयं कुछ अलग हट कर हो तो उपन्यास की रोचकता बहुत ज्यादा बढ जाती है।
                            ऐसा हि एक अलग प्रकार के कथानक वाला उपन्यास है 'जय हिंद'। यह उपन्यास स्वयं इस दृष्टि से अलग है की यह कहानी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर आधारित है। नेताजी सुभाष चंद्र, जिनकी मृत्यु भी एक रहस्य है और जब उपन्यास में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस स्वयं उपस्थित होते हैं और अपनी मृत्यु को गलत ठहराते है तो कहानी में रहस्य का समावेश सहज ही हो जाता है।
                    इस उपन्यास में एक बड़ी ही अनोखी कल्पना की गयी है। यह कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अगर आज के भारत को देख रहे होते तो उनके दिल पर क्या गुजरती? केवल गुजर कर रह जाती या वे कुछ करते भी? चुप रहने वाले तो नहीं थे बोस। 

Friday, 31 August 2018

137. बीस लाख का बकरा- सुरेन्द्र मोहन पाठक

एक ब्लैकमेलिंग की कथा।
बीस लाख का बकरा- सुरेन्द्र मोहन पाठक, रोचक,पठनीय।
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    रणवीर राणा एक कारोबारी व्यक्ति था लेकिन वह एक युवा लड़की के प्यार के चक्कर में वह ब्लैकमेलिंग का शिकार हो गया।
   एक तरफ राणा का परिवार, समाज में इज्जत और कारोबार था और दूसरी तरफ वे ब्लैकमेलर थे जिन्होंने राणा का जीना मुश्किल कर रखा था।
    अभी राणा इस मुश्किल से निकला भी न था ब्लैकमेलर द्वारा पैदा की गयी नयी‌ मुसीबत 'एक लड़की की हत्या' का आरोप उस पर लगा दिया गया।
        लेकिन रणवीर राणा की भी जिद्द थी की  ब्लैकमेलर को एक रुपया तक नहीं देना और  फिर वह रकम बीस लाख की थी।
 
ब्लैकमेलिंग मकड़ी के उस जाले की तरह है जिसमें आदमी एक बार फंस गया तो वह उसी में उलझ कर खत्म हो जाता है। कुछ लोगों ने ब्लैकमेलिंग को अपना रोजगार बना रखा है। इस काले कृत्य ने न जाने कितनी जिंदगियां तबाह कर दी। इस जाल में‌ फंसा आदमी अपनी बात न तो किसी को कह सकता है और न सहन कर सकता है।
       ब्लैकमेलर जोक की तरह होता है जो धीरे-धीरे खून चूसता रहता है और एक दिन आदमी परेशान होकर कोई न कोई कदम उठाने को मजबूर हो ही जाता है।
       
             रणवीर राणा को जब ब्लैकमेलिंग की धमकी मिली तो पहले तो वह घबराया लेकिन उसे पता था घबराने से काम नहीं चलने वाला उसे कोई न कोई ठोस कदम उठाना ही पड़ेगा और जब रणवीर राणा ने कदम उठा ही लिया तो ....
रणवीर राणा एक फैक्ट्री का मालिक था और उसका कारोबार भी ठीक था। सभ्य और इज्जतदार आदमी था लेकि‌न एक बार एक युवा लड़की के प्यार में वह सब कुछ भूल गया।
              राणा की यह भूल उसे एक खतरनाक ब्लैकमेलर रैकेट के जाल में फंसा गयी। ब्लैकमेलर उसे उस जाल से निकालने की कीमत चाहते थे और राणा उन्हें एक रुपया तक नहीं देना चाहता था।
"क्या कीमत चाहते हो तुम इसकी ?"- राणा कठिन स्वर में बोला।
" ज्यास्ती नहीं। बहुत कम। अपुन को लालच बिलकुल नेई है।"
"कीमत बोलो।"
"बीस लाख। सिर्फ। बस।" (पृष्ठ-11)
 
           ब्लैकमेलिंग एक ऐसा जाल है जिसमें आदमी एक बार फंस गया तो उम्र भर उसी में उलझा रहेगा। इसलिए तो राणा के‌ मित्र खेतान ने उसे पहले ही सावधान कर दिया था।
"राणा, तुमने एक बार उन लोगों की मांग पूरी कर दी तो विश्वास जानो वे जिंदगी भर जोंक की तरह तुम्हारा खून चूसते रहेंगे। ब्लैकमेलिंग रैकेट ऐसे ही चलता है।" (पृष्ठ-23)
     
      रणवीर राणा घबराने वाला व्यक्ति न था। उसने तो सोच ही लिया था की वह ब्लैकमेलर से टकरायेगा।
हालात से घबराकर हथियार डाल देने वाला वह भी नहीं था। हर दुश्वारी का कोई हल होता था, हर सवाल का कोई जवाब होता था, हर भूल-भूलैया का कोई रास्ता होता था। अगर वह इतना भी‌ मालूम कर पाता कि वे मवाली असल में कौन थे तो कुछ बात बन सकती थी, उनसे निपटने की कोई सूरत निकल सकती थी। (पृष्ठ-63)
     
        और जब रणवीर राणा सक्रिय हुआ तो ब्लैकमेलर रैकेट भी कहां शांत बैठने वाला था आखिर उनका बकरा उनके हाथ से निकल रहा था।
...हैरान था कि पूरी तरह से जकड़ा हुआ बकरा एकाएक इतना बेकाबू कैसे हो गया था कि उस पर सींग चलाने तक की हिम्मत कर बैठा था?.(पृष्ठ-114)
      
      ब्लैकमेलर रैकेट भी तैयार था रणवीर राणा को सबक सिखाने के लिए।
...चैंबर गोलियों से भरा चेट्टियार ने उसे बंद कर दिया-"अब समझ लो फिक्स हो गया।"
"क...कौन?"
"अपना बकरा। और कौन?"
"हां, बकरा।" (पृष्ठ-146)
- आखिर राणा इस ब्लैकमेलिंग रैकेट में कैसे फंस गया?
- क्या राणा ने बीस लाख रुपये दिये?
- ब्लैकमेलर कौन थे?
- आखिर इस कथा का परिणाम क्या निकला?
   इस प्रश्नों के उत्तर तो सुरेन्द्र मोहन‌ पाठक जी का उपन्यास 'बीस लाख‌ का बकरा' पढ कर ही जाने जा सकते हैं।
       उपन्यास रोचक है जो आदि से अंत तक जिज्ञासा बनाये रखता है।‌ पाठक  भी यह सोचता है की आगे क्या होगा।
       उपन्यास नायक रणवीर राणा को जब ब्लैकमेल किया जाता है तो उसे यह नहीं पता होता की आखिरी ब्लैकमेलर हैं‌ कौन?
     लेकिन उसके दिमाग में एक बात सवार होती है की अगर वह ब्लैकमेलर का पता लगा ले तो इस चक्रव्यूह से बाहर निकल सकता है और इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए वह तैयार हो जाता है।
‌     उपन्यास में यह रोचक प्रसंग है की रणवीर राणा ब्लैकमेलर का पता कैसे लगता है। हालांकि रणवीर राणा जिस तरह से, जिस व्यक्ति पर बार-बार शक करता है वह कुछ उचित नहीं लगता क्योंकि रणवीर राणा के पास उस व्यक्ति को ब्लैकमेलर ठहरा‌ने का कोई पुख्ता तथ्य नहीं है।
"तुम फिर आ गये।"- वह हड़बड़ा कर बोला।
" हाँ।' - राणा मेज कर करीब पहुंच कर ठिठका-"तुम्हारे ही काम से आया हूँ।"
"मेरे काम से। यानि कि वो सुबह वाली तस्वीर वापिस करने आये हो जो की तुम्हें खींचनी ही नहीं चाहिये थी।"
"नहीं।"- राणा बड़े इत्मीनान से बोला।
" तो?"
'मैं"- राणा ने जेब में हाथ डालकर नोटों से भरा लिफाफा बाहर निकाल लिया - "रोकङा अदा करने आया हूँ।"
"क्या?" नागवानी अचकचा कर बोला।
.......
.....
"तुम रुपया लेना चाहते हो या नहीं?"
"रुपया कौन नहीं लेना चाहता। लेकिन सांई, रुपया मिलने की कोई वजह भी तो  समझ में आये।"
"वजह तुम्हें नहीं मालूम?"
"नहीं"
".....यानि की तुम‌ उन लोगों में से नहीं हो।"
"किन लोगों में से नहीं हूँ मैं?"
"जब तुम‌ कुछ जानते ही नहीं हो तो बात करना बेकार है।" (पृष्ठ संख्या-91-92)
        रणवीर राणा अपने मकसद में आगे बढता है और वह सफल भी होता है लेकिन अगर वह पुख्ता तथ्यों के साथ आगे बढता तो उपन्यास में रोचकता में वृद्धि होती।
      
        उपन्यास में रणवीर राणा की पत्नी रश्मि का किरदार बहुत सशक्त होकर उभरा है। रश्मि एक ऐसी सशक्त नारी के रूप में उपन्यास में आयी है जो गंभीर परिस्थितियों में भी अपने पति के साथ डट कर खङी होती है और रणवीर राणा उसी की वजह से सफल होता है।
  
        उपन्यास का अंत बहुत रोचक है। रणवीर राणा जैसा एक सामान्य आदमी जब अपनी पर आता है तो वह बहुत खतरनाक होता है। इस उपन्यास का समापन भी ऐसे ही एक कारनामें‌ के साथ होता है
निष्कर्ष-
            प्रस्तुत उपन्यास ब्लैकमेलिंग जैसे काले कृत्य पर लिखा गया है रोचक थ्रिलर उपन्यास है। उपन्यास पठनीय है यह पाठक को किसी भी स्तर पर निराश नहीं करता।
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उपन्यास- बीस लाख का बकरा
लेखक- सुरेन्द्र मोहन पाठक
प्रकाशक- डायमंड पॉकेट बुक्स
वर्ष- 1988
पृष्ठ-
मूल्य-
थ्रिलर उपन्यास
( 'बीस लाख का बकरा' उपन्यास आबू रोड़ के लेखक मित्र अमित श्रीवास्तव जी से पढने को मिला)

सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के कुछ उपन्यासों की समीक्षा


Tuesday, 21 August 2018

136. रोड़ किलर- शुभानंद

ट्रैफिक नियम उल्लंघन करने वालों का दुश्मन...
रोड़ किलर- शुभानंद, जासूसी बाल उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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             इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर नियमों की अवहेलना कर देते हैं। वो ये नहीं देखते की इस अवहेलना से किसी को नुकसान भी हो सकता है। मात्र स्वयं को आगे रखने की यह कोशिश किसी की जान भी ले सकती है।
       अगर बात करें ट्रैफिक नियमों की तो भारत में बहुत से लोग ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करते और कुछ लोगों को नियमों का पता भी नहीं होता। जिनकों पता होता है वे भी जानबूझ कर नियमों की अनदेखी करते हैं। यह उपन्यास ऐसे ही नियमों के उल्लंघन करने वालों की कथा कहता है।

शाम का वक्त था।
चौराहे पर रेड लाइट होने पर भी किसी से सब्र नहीं हो रहा था।
गिनती के कुछ वाहन ही स्टॉप लाइन के पीछे रुके थे। बाकी सभी ने धीरे-धीरे आगे बढना आरम्भ कर दिया।
हवा में सनसनाते हुए एक के बाद एक तीर उड़ते हुए आये और स्टॉप लाइन से आगे निकले लोगों के जिस्म में घुसते चले गये। (पृष्ठ-05)

                       वह एक ऐसा व्यक्ति था जो नियमों की अवहेलना करने वालों को मौत के घाट उतार देता था। उस के कारण लोगों में दहशत है। लोग ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने से डरते हैं,  वह चाहे जो भी हो लेकिन उस के डर से लोगों ट्रैफिक नियमों का पालन करना आरम्भ कर दिया।
रोड़ किलर की करतूतों का शहर के लोगों पर कुछ असर जरूर पड़ा था।
काफी लोग सड़क पर ढंग से चलने लगे थे। (पृष्ठ-18)

- आखिर वह लोगों को क्यों मार रहा था?
- उसका ट्रैफिक नियमों से क्या संबंध था।?
- आखिर कौन था रोड़ किलर?
     
           यह एक छोटा सा उपन्यास है जो एक ऐसे युवक की कहानी है जो ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों को मार देता है। यही से यह प्रश्न उठता ही वह कौन है और क्यों लोगों को मार रहा है। हालांकि यह रहस्य ज्यादा देर तक नहीं रहता,  एक दो पंक्तियों से ( रोड़ किलर जो गीत गुनगुनाता है) से आभास हो जाता है की वह लोगों को क्यों मार रहा है।
         लेकिन इस के बाद भी उपन्यास में यह रहस्य बना रहता है की उसके जीवन में जो घटना घटित हुयी तो कैसे जिसके कारण वह रोड़ किलर बना। उपन्यास के अंत में भी एक रोचक ट्विस्ट है, हालांकि यह ट्विस्ट पहले कई फिल्मों में प्रयुक्त हो चुका है।
       इस रोड़ किलर को खोजने के लिए राजन- इकबाल, शोभा-सलमा की चौकड़ी तैनात की जाती है और वह रोड़ किलर को खोजती है।
   
           उपन्यास अम्बाबाद शहर की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। अगर देखा जाये तो यह अम्बाबाद शहर गुजरात का अहमदाबाद लगता है। क्योंकि उपन्यास में गुजराती खानपान और बोली प्रयुक्त होती है।
   
          एक अजीब/ सनकी/ सिरफिरे रोड़ किलर और जासूस चौकड़ी का यह उपन्यास रोमांच से भरपूर है।
             
निष्कर्ष-
            एक अलग विषय पर लिखा गया यह लघु उपन्यास बहुत ही रोचक है। पृष्ठ चाहे इसके  कम हैं लेकिन कथा उतनी ही रोचक है।
         उपन्यास रोचक और पठनीय है। पाठक का भरपूर मनोरंजन करने में सक्षम है।
         
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उपन्यास- रोड़ किलर (बाल उपन्यास)
ISBN-
लेखक-    शुभानंद
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स
पृष्ठ-    ‌‌‌‌‌    
मूल्य-       50₹

   विशेष-   यह राजन -इकबाल Reborn Series का चौथा उपन्यास है।
         

135. वो भयानक रात- मिथिलेश गुप्ता

एक भयानक रात जंगल में...
वो भयानक रात- मिथिलेश गुप्ता, हाॅरर लघु उपन्यास, रोचक-पठनीय।
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वह एक भयानक रात थी, अमावश की भयानक रात और ऐसी भयानक रात में एक परिवार जंगल में फंस गया।  उस परिवार कर साथ एक हादसा हुआ एक ऐसा हादसा जिसने पूरे परिवार को दहला दिया।
       उस हादसे बाद समय रुक गया....जी हां, समय वहीं ठहर गया।
क्या यह हादसा था या परिवार का वहम।
   
            लोकप्रिय उपन्यास जगत में सूरज पॉकेट बुक्स ने बहुत कम समय में अपनी पहचान स्थापित की है। परम्परागत जासूसी उपन्यासों के कागज के स्तर से मुक्त होकर अच्छे स्तरीय कागज पर उपन्यासों का प्रकाशन आरम्भ किया।
               सूरज पॉकेट बुक्स ने सभी श्रेणी के उपन्यासों का प्रकाशन किया है और इसी क्रम में मिथिलेश गुप्ता का उपन्यास है 'वो भयानक रात'। यह एक हाॅरर उपन्यास है।
                
                  वो भयानक रात की घटना है 11 जनवरी 2004 की जब रिटायर्ड आर्मी मेजर संग्राम सिंह अपनी पत्नी अर्चना, पुत्र राहुल और पुत्रवधु गीता के साथ एक पार्टी से घर लौट रहे थे।  रास्ते में एक भयानक जंगल था और रात का समय था।
  अमावश की एक मनहूस काली रात
   चारों तरफ घनघोर अंधेरा।
एक सुनसान सड़क और सड़क के दोनों तरफ फैला हुआ एक घना जंगल।
सड़क पर तेजी से दौड़ती हुयी एक कार। (पृष्ठ-09)
   उस भयानक जंगल में कार का एक्सीडेंट हो गया।  यह भी एक रहस्य था की आखिर एक्सीडेंट किस के साथ हुआ।
"....सड़क पर तो कोई भी नहीं दिखाई दे रहा है, न ही आसपास कोई परछाई। फिर तुम टकराए किस चीज से....मतलब कार किस चीज से टकराई थी?"- संग्राम सिंह ने राहुल को अजीब तरह से घूरते हुए कहा।
" पता नहीं पापा ऐसा लगा कोई था सड़क पर....लेकिन‌ मुझे कोई दिखाई नहीं दिया लगता है ऐसा लगा जैसे कोई अचानक से कार के सामने आया हो....।"(पृष्ठ-13)
- आखिर इस परिवार के साथ जंगल‌ में क्या हादसा पेश आया?
- आखिर कार का एक्सीडेंट किस के साथ हुआ?
- क्या यह परिवार जंगल से सुरक्षित लौट पाया?
- क्या रहस्य था इस अमावस्य की काली रात का?
            मिथिलेश गुप्ता का यह उपन्यास आकार में चाहे छोटा हो लेकिन कथ्य में बहुत शानदार है। कहानी आरम्भ से अंत रहस्य के आवरण में‌ लिपटी रहती है। उपन्यास में हर पल यह रहस्य बना रहता है की इस परिवार के साथ आगे क्या होगा।
    
                 संग्राम सिंह का परिवार जब जब जंगल में कार एक्सीडेंट के पश्चात एक अदृश्य जाल में फंस जाता है। यहीं से उपन्यास में जबरदस्त मोड आरम्भ हो जाता है। राहुल जब एक्सीडेंट वाली जगह से लौट कर आता है तो वह गुमसुम सा रहता है।
       संग्राम सिंह जब राहुल को ढूंढकर लाता है तो कार के पास से अर्चना और गीता को गायब पाता है। उपन्यास में इस प्रकार के घटनाक्रम उपन्यास को बहुत रोचक बनाते हैं।
       उपन्यास में शाब्दिक/मुद्रण गलतियाँ हैं, हालांकि यह कोई ज्यादा नहीं है।
    उपन्यास का अंतिम दृश्य जो की लेखक ने मेरे विचार से फिल्मी रूप से लिख दिया, क्योंकि वहाँ कुछ स्पष्ट नहीं किया। मिल में दृश्य पाठक ले समक्ष होता है तो वहाँ दृश्य को समझाने की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन उपन्यास में दृश्य को शब्दों से जीवित करना पड़ता है।
"पापा"
"आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे?"
अचानक संग्राम सिंह राहुल की तरफ एकदम से पलटा।
उसका चेहरा देख कर राहुल सकते में गया। (पृष्ठ-47)
       अब राहुल क्यों चौंका?
        बाकी परिवार केे सदस्य क्यों नहीं चौंके?
अगर लेखक यहाँ कुछ कोशिश करता तो यह दृश्य और भी अच्छा बनता व सार्थक बनता।
    
       उपन्यास की कहानी अच्छी व रोचक है। लेखक का प्रयास वास्तव में सराहनीय है।
          
निष्कर्ष-
           हाॅरर उपन्यास बहुत अच्छा व दिलचस्प है। कहानी में पृष्ठ दर पृष्ठ रहस्य पढता चला जाता है। पाठक प्रतिपल यही सोचता है की आगे क्या होगा।  यह रहस्य अंत तक यथावत रहता है।
उपन्यास जबरदस्त, रोचक और पठनीय है।
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उपन्यास- वो भयानक रात
लेखक- मिथिलेश गुप्ता
ISBN- 978-1-944820-21-3
प्रथम संस्करण- Set. 2015
द्वितीय संस्करण- Feb. 2017
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स
पृष्ठ- 52
मूल्य-80₹
लेखक ब्लॉग
www.mihileshgupta152.blogspot.in

Saturday, 18 August 2018

134. मौत का रहस्य- परम आनंद

आखिर आ ही गयी मौत...
मौत का रहस्य-परम आनंद, जासूसी उपन्यास, रोचक, पठनीय।

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  कुछ कहानियाँ इतनी रोचक होती हैं‌ की वे पाठक को स्वयं में समाहित कर लेती हैं। मौत का रहस्य भी एक ऐसा उपन्यास है जो पाठक को अपनी तरफ आकृष्ट करने में सक्षम है।
        दमदार कहानी, अच्छा संपादन और तेज गति का कथा‌नक पाठक को अपने साथ बहा ले जाता है।
       मौत का रहस्य की‌ कहानी एक ऐसी युवती की कहानी है जिसके परिचित यही कहते थे की इसके कारनामें एक दिन इस के मौत के कारण बनेंगे। "जल्दी या देर में कोई कोई उसे कत्ल कत्ल करने ही वाला था"- इकबाल ने जवाब दिया-" वह हरकतें ही ऐसी करती थी। (पृष्ठ-70)
दूसरी तरफ एक सीधा-सादा युवक लड़की के आकर्षण में ऐसा फंसा की वह कातिल नजर आने लगा।
मौत का रहस्य एक जबरदस्त मर्डर मिस्ट्री है जिसके रहस्य में पाठक डूब जाता है।
उपन्यास 'मौत का रहस्य' की कहानी कहानी आरम्भ होती है, प्रसिद्ध समाचार पत्र लोकवाणी के प्रबंधक राजन से।   राजन लगभग चार वर्ष से प्रसिद्ध समाचार पत्र 'लोकवाणी' के स्थानीय कार्यालय का प्रबंधक था। (पृष्ठ-03) जुलाई का महीना था। दिन का तीसरा पहर था। राजन अपने कार्यालय में बैठा ऊंघ रहा था। (पृष्ठ-03)      लोकवाणी का प्रकाशक है श्री हरिपद ठीकरी। श्री ठीकरी‌ की गणना अरबपतियों में होती थी। लोकवाणी प्रकाशन समूह में उन का स्थान पूर्णतयाः एक तानाशाह जैसा था। (पृष्ठ-03)
   श्री ठीकरी जी की बेटी मृदुला ठीकरी पढने के लिए शहर आती है और उसकी देखभाल की जिम्मेदारी राजन को मिलती है। एक दो मुलाकतों के पश्चात राजन और मृदुला नजदीकी शहर अलकापुरी में गुप्त रूप से घूमने का प्रोग्राम बनाते हैं।
    तय जगह पर जब राजन पहुंचता है तो मृदुला की लाश उसे मिलती है। परिस्थितियाँ ऐसी बनी की राजन उसका कातिल नजर आ रहा था। दूसरी तरफ श्री ठीकरी जी ने राजन को यह जिम्मेदारी दी की वह असली कातिल का पता लगाये।  श्री ठीकरी बोले-"तुम उस व्यक्ति का पता लगाकर बताओ..फिर मैं‌ उस से निपट लूंगा।"(पृष्ठ-47)
अब राज‌न को स्वयं को दोषमुक्त करने के लिए असली कातिल की‌ तलाश थी।
- मृदुला ठीकरी का कत्ल किसने किया?
- मृदुला का कत्ल आखिर क्यों किया गया?
- राजन को कौन अपराधी सिद्ध करना चाहता था और क्यों?
- क्या राजन असली कातिल तक पहुंच पाया?
    
इन प्रश्नों के उत्तर तो परम आनंद का उपन्यास 'मौत का रहस्य' पढकर ही‌ मिल सकते हैं।
     

133. द टाइम मशीन- एच. जी. वेल्स

समय से परे की एक यात्रा।
द टाइम मशीन- एच. जी. वेल्स, फतांसी उपन्यास, मध्यम।
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     अगर इस दुनियां के अलावा किसी और दुनियां की कल्पना करते हो और उस दुनियां में जाने के इच्छुक हो तो यह भी अब संभव है। अगर आप अपना अतीत या भविष्य देखना चाहते हो तो यह भी संभव है। आप को कुछ नहीं करना बस एक मशीन, टाइम मशीन में‌ बैठ कर एक बटन दबायें और पहुंच जाये अपनी‌ मनपसंद दुनियां में।
     एच. जी. वेल्स का उपन्यास 'दी टाइम मशीन' एक ऐसे ही काल्पनिक लोक की यात्रा की सैर करवाता है।
इस उपन्यास में लेखक की कल्पना की उपज टाइम मशीन, उस पर सवार होकर समय का सोपान तय करता समय यात्री.... उस की रोमांचक यात्रा में अजीबोगरीब स्थितियों में मिलते और उस की कटु मधु स्मृतियों‌ का हिस्सा बनते तिलस्मी पात्र ...सब अभिभूत कर देने वाले हैं।

Wednesday, 8 August 2018

132. जैक द क्लाक राइडर- खुशी सैफी

  एक नये संसार का रोमांचक सफर...
जैक- द क्लाॅक राइडर- खुशी सैफी, फतांसी‌ लघु बाल उपन्यास, रोचक।
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हादसे अक्सर जिंदगियां बदल देते हैं और आज भी शायद ऐसा ही कुछ हो चुका था।(पृष्ठ-13)
प्रोफेसर कैन एक वैज्ञानिक हैं और वे अक्सर कुछ प्रयोग करते हैं, एक ऐसा ही प्रयोग उनकी जिंदगी को बदल देता है। एक दिन प्रोफेसर कैन रहस्यम तरीके से अपनी लैब में से गायब हो जाते हैं।