Monday, 23 April 2018

108. डाकघर- रवीन्द्रनाथ टैगोर

एक बच्चे की करणामयी कथा।
डाकघर- रवीन्द्रनाथ टैगोर, लघु नटक, संवेदनशील रचना, पठनीय।
रवीन्द्रनाथ टैगोर को पढने का अर्थ है भावना के समुद्र में बह जाना, मानवीय संवेदना को छू जाना।  
प्रकाशक लिखता है- रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियाँ एवं नाटक विशेष रूप से कला, शिल्प, शब्द- सौन्दर्य, सभी दृष्टियों से अनुपम एवं महत्वपूर्ण हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियाँ एवं‌ नाटक वास्तव में जिसने नहीं पढे उसने कुछ नहीं पढा। 
            रवीन्द्रनाथ टैगौर द्वारा रचित 'डाकघर' एक लघु नाटक है। डाकघर एक नन्हें बच्चे की कहानी है। एक‌ नन्हा बच्चा 'अमल' जो किसी रोग से ग्रस्त है। वैद्य जी ने उसे कमरे से भी बाहर निकले को मना किया है। उसकी रक्षा का एकमात्र उपाय है उसे किसी तरह शरत्ऋतु की धूप और हवा से बचाकर घर में बंद रखना। (पृष्ठ-10)
          अमल घर में, कमरे में कैद है। खिड़की से वह आते-जाते लोगों को देखता है, उनसे बातें करता है।‌ कितनी विवशता है। बच्चा सबको देखता है, उसका मन भी खेलने को होता है, घूमने को होता है लेकिन वह मजबूर है। बस अपना दर्द समेटे बैठा है। कमरा ही उसकी दुनियां है। लेकिन कमरे से बाहर एक और दुनियां है अमल उसी दुनियां को जीना चाहता है।    
           बच्चों का मन बहुत कल्पनाशील होता है। अमल भी बाहर की दुनियां की बाते सुन- सुन कर अपनी एक काल्पनिक दुनियां बना लेता है।
          एक ऐसे दुनियां जिसमें शास्त्र पढे पण्डित नहीं होंगे, उसमें तो दही बेचने वाला होगा, घूमने वाले होंगे, डाकिया होगा, भिखारी होगा, पहाड़ पर जाने वाले होंगे। अमल कभी डाकिया बनना चाहता है, कभी दहीवाला, कभी भिखारी तो कभी कुछ-कभी कुछ।
            नाटक में रोचक प्रसंग और मोड़ तब आता है जब अमल के घर के सामने  राजा का डाकघर खुलता है। अमल स्वयं को उसी डाकघर से जोड़ लेता है। उसकी काल्पनिक दुनियां में डाकघर एक नया पात्र है। अमल को लगता है एक दिन उसको राजा का पत्र आयेगा और डाकिया उसे देकर जायेगा। मेरे नाम‌ की चिट्ठी आयेगी तो वे मुझे पहचान कर दे जायेँगे।(पृष्ठ-29)
            गांव में एक तथाकथित चौधरी है जो एक बीमार बच्चे के दर्द को न महसूस कर राजा को बच्चे की शिकायत कर देता है।
- क्या अमल का रोग सही हुआ?
-  क्या अमल को राजा की चिट्ठी आयी?
-  गाँव के चौधरी ने क्या किया?
नाटक का आरम्भ बहुत रोचक ढंग से होता है। माधवदत्त जी अमल के अभिभावक हैं और एक है वैद्य जी। दोनों के संवाद बहुत रोचक हैं।
माधवदत्त- बड़ी मुसीबत में पड़ गया। जब वह नहीं था, तब नहीं ही था, किसी बात की चिंता ही न थी। अब न जाने कहाँ से आकर उसने मेरा घर घेर लिया है; उसके चले जाने से मेरा घर फिर घर ही नहीं रह जाएगा। वैद्यजी, आप क्या समझते हैं उसे? (पृष्ठ-07)
      वैद्य जी प्रत्येक बात पर शास्त्रों की चर्चा करते हैं जो माधव की समझ से बाहर है।
शास्त्रों में लिखा है, 
- 'पैत्तिकान् सन्निपातजान कफवातसमुद्भवात'। (पृष्ठ-07)
- 'अपस्मारे ज्वरे काशे कामलाया हलीमके'(पृष्ठ-08)
- 'पवने तपने चैव'(पृष्ठ-08)
एक और मार्मिक संवाद देखें।
तुम्हें क्या हुआ है बाबू?
मुझे नहीं मालूम। मैं पढा लिखा नहीं हूँ न।(पृष्ठ-15)
         नाटक के सभी पात्र, चाहे उनका किरदार कम ही क्यों न हो, पर सभी प्रभावी हैं। 
         नाटक शुरू से अंत तक बहुत ही रोचक है और इसका समापन सहृदय की आँखों में आँसू ले आयेगा।
निष्कर्ष:-
          सहृदय पाठक के लिए यह लघु नाटक मन के अंदर तक उतरने की क्षमता रखता है।‌ नाटक का कलेरव चाहे छोटा हो लेकिन उसकी संवेदना बहुत गहरी है। 
               यह लघु नाटक कम पृष्ठों में बहुत कुछ कह जाता है। पठनीय रचना है, अवश्य पढें।
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किताब- डाकघर (लघु नाटक)
लेखक- रवीन्द्रनाथ टैगोर
प्रकाशक- रमन बुक सेंटर, मथुरा(UP)
पृष्ठ- 50
मूल्य- 75₹

Friday, 6 April 2018

107. काजर की कोठरी- देवकीनंदन खत्री

जब शादी के दिन गायब हो गयी पत्नी...
काजर की कोठरी- देवकीनंदन खत्री, थ्रिलर, औसत।
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संध्या होने में अभी दो घण्टे की देर है मगर सूर्य भगवान के दर्शन नहीं हो रहे, क्योंकि काली-काली घटाओं ने आसमान को चारों तरफ से घेर लिया है। जिधर निगाह दौङाइए मजेदार समा नजर आता है और इसका तो विश्वास भी नहीं होता कि संध्या होने में अभी कुछ कसर है।
                यह पंक्तियां देवकीनंदन खत्री जी के प्रसिद्ध उपन्यास 'काजर की कोठरी' की हैं।
अय्यारी, तिलस्मी जैसे उपन्यासों में महारथ हासिल खत्री का यह उपन्यास उनके अन्य उपन्यासों से थोङा सा अलग है क्योंकि इसमें तिलिस्म या अय्यारी नहीं बल्कि धोखेबाजी मुख्य है। पाठक को प्रथम पृष्ठ से ही सब कुछ पता चल जाता है की उपन्यास का अंत क्या होगा।
    
       जिमींदार कल्याण सिंह के पुत्र हरनंदन की शादी लाल सिंह की पुत्री सरला से होने वाली है। शादी के दिन सरला घर से गायब पायी जाती है। उसके कमरे में खून के छींटे मिलते हैं।
                दूसरी तरफ कल्याण सिंह के कमरे में एक पिटारा मिलता है जिसमें खून से सने वे कपङे होते हैं जो कल्याण सिंह के परिवार की तरफ से सरला को रस्म अनुसार दिये गये थे।
                     दोनों परिवार हैरान-परेशान और दुखी हैं कि आखिर सरला कहां गायब हो गयी।
आखिर हरनंदन सिंह सरला के गायब होने ले रहस्य को सुलझाने का निर्णय लेता है।
- सरला आखिर कहां गायब हुयी?
- क्या सरला जिंदा/ मुर्दा थी?
- कौन थे अपराधी?
- क्या हरनंदन सिंह अपने कार्य में सफल हुआ?
- खून से सने कपङों‌ का क्या रहस्य था?
    ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों का उत्तर तो देवकीनंदन खत्री के उपन्यास काजर की कोठरी को पढकर ही मिल सकते हैं।
      
    उपन्यास सामान्य है। पाठक को उपन्यास के आरम्भ में ही मूल कथा और खलनायक का पता चल जाता है।  शेष उपन्यास में मात्र यही रहस्य बाकी रह जाता है की हरनंदन सिंह कैसे सरला का पता लगता है।
संपादक महोदय ने उपन्यास के आरम्भ में ही इतना कुछ लिख दिया की उपन्यास बिना पढे भी काम चल सकता है। आप भी पढ लीजिएगा।
   काजर की कोठरी सन् 1900 के आसपास लिखा गया उपन्यास है जिसमें वेश्या सरीखी, दुष्चरित्र, धोखेबाज और कुटिल समझी जाने वाली स्त्री के चरित्र का औदात्य दिखाया गया है। जमींदार और वेश्या के आत्मीय, सरल और सहज संबंधों को इस उपन्यास में वाणी दी गयी है।
            यह उपन्यास मूलतः वेश्या जीवन पर लिखा गया है। जमींदार हरनंदन सिंह का विवाह सरला के साथ होने वाला है। किंतु वह विवाह पूर्व ही गायब कर दी जाती है- गायब होने के स्थान पर खून से सनी एक पोटली मिलती है। हरनंदन सिंह शादी में आयी वेश्या से संबंध स्थापित कर लेते है और गायब हुयी सरला का पता लगाते हैं। सरला का चचेरा भाई उसका विवाह हरनंदन सिंह के साथ नहीं करना चाहता- बल्कि चाचा की वसीयत के अनुसार उसका विवाह कहीं अन्यत्र करा, वह आधे धन का मालिक बनना चाहता है। हरनंदन सिंह वेश्या को अपने विश्वास में लेकर अंत में सरला का पता लगा लेते हैं और अपराधी दण्डित होते हैं।
 
    उपन्यास में विशेष तौर से वेश्या जीवन के दोहरे चरित्र का खूब वर्णन किया है।
 
उपन्यास कोई विशेष नहीं है। मात्र देवकीनंदन खत्री का उपन्यास होने के नाते या वेश्या जीवन के दोहरे चरित्र को देखने की दृष्टि से पढा जा सकता है।
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उपन्यास- काजर की कोठरी
लेखक-    देवकीनंदन खत्री (18.06.1861- 04..8.1913)
वर्ष- 1900 (लगभग)
प्रकाशक- साहित्यागार, SMS हाइवे -जयपुर
पृष्ठ- 83

Thursday, 5 April 2018

106. सूरज का सातवाँ घोङा- धर्मवीर भारती

टुकङो में विभक्त एक दर्द भरी प्रेम कहानी।
सूरज का सातवाँ घोङा- धर्मवीर भारती, साहित्यिक उपन्यास, रोचक, पठनीय, उत्तम।
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    धर्मवीर भारती द्वारा लिखा गया उपन्यास सूरज का सातवाँ घोङा एक प्रयोगात्मक उपन्यास है। कथा और शिल्प दोनों स्तरों पर इसमें अपने समय में प्रयोग किये गये थे। यह प्रयोग सफल भी रहा। क्योंकि सन् ..में प्रकाशित इस उपन्यास को आज भी पाठक उतने ही चाव से पढता है जितना इसके प्रकाशन के वक्त पढा गया था।
      निर्देशन श्याम बेनेगल द्वारा इस उपन्यास पर इसी शीर्षक से निर्मित फिल्म सफल भी रही और उसे राष्ट्रीय...पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
     
       सूरज का सातवाँ घोङा एक प्रेम कथा है। यह एक कहानी है या उपन्यास ऐसा पाठक को लग सकता है । मूलतः यह उपन्यास है लेकिन इसके प्रस्तुतीकरण का तरीका कहानी जैसा ही है। यह स्वयं में एक प्रयोग है।
     पूरा घटनाक्रम माणिक मुल्ला के कथित है।
गर्मि का समय है, दोपहर का। कुछ बच्चे माणिक मुल्ला के कमरें में हर रोज एकत्र होते हैं और माणिक मुल्तान उन्हें हर रोज एक प्रेम कहानी सुनाता है। ये कहानियाँ प्रथम दृष्टया अलग -अलग नजर आती है लेकिन अंत में जाकर एक हो जाती हैं। लेकिन किसी भी कहानी में कॊई बिखराव नहीं है। सभी एक दूसरे से आबद्ध है। इन सभी कहानियाँ को आपस में आबद्ध करने का कार्य स्वयं माणिक मुल्ला ही करता है क्योंकि वह प्रत्येक कहानी से स्वयं भी जुङा हुआ है।
         
    कहानी चाहे जमुना की हो, चाहे लिली या सती की। सभी से माणिक मुल्ला का संबंध रहा है और सभी कहानियाँ में एक टीस भी है। एक ऐसी टीस जो पाठक के हृदय को चीर जाती है। 
        
      उपन्यास में माणिक मुल्ला के माध्यम से क ई कहानियों व्यक्त हुयी हैं लेकिन कोई भी प्रेम कहानी अपने लक्ष्य तक न पहुंची। यही जीवन की विडंबना है और इसी विडंबना को विभिन्न पात्रों के माध्यम से व्यक्त किया गया है।
            जमुना को तन्ना बहुत पसंद है, वह उससे शादी की इच्छुक है। लेकिन समाज की मर्यादा इस प्रेम में बाधक है। तन्ना का बाप महेसर भी इस प्रेम को स्वीकृति नहीं दे पाता। जमुना माणिक मुल्ला के प्रति भी बहुत लगाव रखती है लेकिन इसका प्रेम कहीं भी सफलता प्राप्त नहीं कर पाता।
        एक है लिली उर्फ लीला जो माणिक मुल्ला से स्नेह रखती है। लेकिन आधुनिक विचारों की समर्थक है। लीला का विवाह तन्ना से हो जाता है। लेकिन एक बच्चे के पश्चात भी दोनों में दाम्पत्य प्रेम की कमी दिखाई देती है।
         सती जो की एक आत्मनिर्भर महिला की भूमिका में है लेकिन उसकी पारिवारिक स्थिति उसे इस स्थिति में‌ ले आती है जहाँ वह न जी सकती है न‌ मर सकती है। सती और माणिक मुल्ला में स्नेह की डोर है। लेकिन परिस्थितिया इस डोर को तोङ देती हैं।  दूसरी तरफ तन्ना का बाप महेसर सती की आर्थिक व पारिवारिक परिस्थितियों का भरपूर फायदा उठाने की सोचता है।
     
एक तरह से सभी कहानियाँ माणिक मुल्ला से संबंध रखती हैं और अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी।
इस उपन्यास में मात्र प्रेम कहानियाँ ही नहीं है, इनके साथ-साथ भारत के मध्यवर्गीय समाज का चित्रण, प्रेम की पीर, मार्क्सवाद और आधुनिक कहानी के संबंध में भी बहुत कुछ पढने को मिलता है।
  
        आजकल के लेखक जिस प्रकार कहानी के शीर्षक को अति आकर्षक बनाने में लगे रहतॆ हैं उस पर माणिक मुल्ला के माध्यम से व्यंग्य किया गया है- "...तुम लोग कहानी सुनने आये हो या शीर्षक सुनने? या मैं उन कहानी लेखकों में से हूँ जो आकर्षक विषयवस्तु के अभाव में आकर्षक शीर्षक देकर पत्रों के संपादकों और पाठकों का ध्यान खींचा करते हैं।" (पृष्ठ-43)
"टेकनीक पर ज्यादा जोर वही देता है जो कहीं न कहीं अपरिपक्व है...फिर भी टेकनीक पर ध्यान देना बहुत स्वस्थ प्रवृत्ति है बशर्ते वह अनुपात से अधिक न हो।" (पृष्ठ-84)
     
मध्यमवर्गीय समाज के संबंध में लिखा है- " हम‌ सभी निम्न मध्य श्रेणी के लोगों की जिंदगी में हवा का ताजा झोंका नहीं है...।"(पृष्ठ-42)
कुछ विशेष कथन-
- प्यार आत्मा की गहराइयों में सोये हुए सौन्दर्य के संगीत को जगा देता है। (पृष्ठ-69)
उपन्यास खण्ड और शीर्षक-
उपन्यास को सात खण्डों में विभक्त किया गया है।  प्रत्येक खण्ड का नाम‌ दोपहर दिया गया है, क्योंकि यह कहानियाँ गर्मी की दोपहर में सुनायी गयी हैं। हिंदी साहित्य में विभिन्न ग्रंथों में खण्डों के नाम अलग-अलग मिलते हैं, जैसे समय( पद्मावत में), अंक, भाग, इत्यादि।
    प्रत्येक खण्ड से पूर्व एक छोटा सा अध्याय भी अनध्याय नाम से मिलता है।
निष्कर्ष-
  धर्मवीर भारती द्वारा लिखा गया उपन्यास सूरज का सातवाँ घोङा एक प्रयोगशील उपन्यास है।
कथा स्तर पर यह उपन्यास मानव के अंतर का चित्रण करता है। यह उस मध्यमवर्गीय समाज का चित्रण करता है जो करना कुछ और चाहता है लेकिन उसकी परिस्थितियां उसे करने नहीं देती। ऐसी ही विषम परिस्थितियों में घिरे माणिक मुल्ला, जमुना, लिली, सती और तन्ना का चित्रण इस उपन्यास में मिलता है।
       कहानी रोचक और मन को छू लेने वाली है। उपन्यास का कलेवर लघु है और कहानी में तीव्रता भी है जो पाठक को स्वयं में समेटे रखती है।
      अगर आप यथार्थवादी प्रेम कहानी पढना पसंद करते हो तो यह उपन्यास अवश्य पढें ।
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उपन्यास- सूरज का सातवाँ घोङा
लेखक- धर्मवीर भारती
प्रकाशक-
वर्ष-
पृष्ठ- 114
मूल्य-
 इस उपन्यास को इस लिंक पर निशुल्क पढा जा सकता है।-  सूरज का सातवाँ घोङा

105. तीन इक्के- गुलशन नंदा

सुनहरे सपनों से दर्द तक तक सामाजिक कथा।
तीन इक्के- गुलशन नंदा, सामाजिक उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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     साधना अभी काॅलेज से अपनी शिक्षा समाप्त करके निकली है। अन्य लङकियों की तरह उसके मन में भी नये सपने, नयी उमंग है। समाज को कुछ नया कर दिखाने की। अपनी प्रतिभा के दम पर एक नयी इबारत निकले की।
               लेकिन अभी साधना के सपनों ने उडान भी नहीं भरी थी की उसका सामना पडोसी आंटी ‌के घर दिल्ली से आये प्रकाश से हो जाता है। शायद मैं एक भेंट में प्रकाश पर छा जाना चाहती थी। ब्याह का संबंध हो या हो, मैं उसके मस्तिष्क पट पर एक ऐसा चित्र अंकित करना चाहती थी जो उसे सदा मेरी याद दिलाता रहे। (पृष्ठ-31)
मुलाकात से प्यार और प्यार से यह रिश्ता शादी तक पहुंच जाता है।
      
     दोनों परिवार आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से संपन्न हैं। साधना को एक नयी प्यार की दुनिया मिलती है। लेकिन यह स्वप्न कुछ समय पश्चात ही खण्डित हो जाते हैं जब उसके समक्ष प्रकाश का एक नया रूप आता है।
       साधना के दिव्यस्वप्न टूट जाते हैं। लेकिन साधना जैसी शिक्षित लङकी हार नहीं मानती वह परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने की हर संभव कोशिश करती है।
  
         उपन्यास में मूलतः इस बात पर ध्यान केन्द्रित है की कैसे एक लङकी अपने संसार को बचाने की कोशिश करती है।
   
  उपन्यास समाज के कई पक्षों का सहज ही चित्रण कर डालता है। पाठक जैसे जैसे कहानी में आगे बढता है उसे समाज/ व्यक्ति के कई रूप नजर आते हैं।  यह हमारे समाज की वास्तविकता को भी रेखांकित नरता है।
- साधना  और उसकी सहेलियों का शिक्षा पश्चात अपने पैरों पर खङा होने की चर्चा लेकिन साधना के माध्यम से यह भी दर्शाया गया है कई बार शिक्षण के पश्चात सपने पूर्ण नहीं होते।
- लङकी की जल्द शादी की कोशिश करना।
- प्रकाश जैसे व्यक्ति जो किसी भी लङकी को बहला सकते हैं।
- साधना की आंटी जैसे औरत जो साधना को भी सत्यता नहीं बताती।
- मिस्टर कपूर जैसे दोहरे चरित्र के आदमी ।
लेकिन समाज में बुराई है तो अच्छाई भी है। इसका चित्रण कई व्यक्तियों के द्वारा किया गया है।
साधना- जो प्रत्येक परिस्थिति का सामान मजबूती से करती है।
जाॅनी ड्राइवर- सरल हृदय के व्यक्ति ।
प्रकाश के पिता- जो अपनी बहू को बेटी के समान मानते हैं।
      उपन्यास में समाज की कई  बुराईयों का भी चित्रण है।     आजकल सोशल पार्टी के नाम पर लोग असामाजिक कार्य करते हैं। इनका विरोध साधना के माध्यम से दर्शाया गया है।
"तुम इतना पढ-लिखकर भी इन सोशल पार्टियों को बुरा कहती हो।"
"वह पार्टी या सभा, जहाँ मानव अपना चरित्र खो दे, सोशल(Social) नहीं कहलाती।" (पृष्ठ-43)
 
उन लोगों का भी चित्रण उपन्यास में है जो पहले जो लाङ- प्यार में अपनी संतान का व्यवहार खराब कर लेते हैं और फिर पश्चात करते हैं।
मुझे आज भली प्रकार उनकी विवशता का ध्यान हया। लाङ और प्यार से वह अपने बेटे को बिगाङ तो चुके थे ही, अब उसे सुधारने के लिए वह उसे कोई कठोर शब्द भी न कह सकते थे। (पृष्ठ-64)
संवाद और भाषा शैली -
                                 उपन्यास एक सामान्य कथा है इसमें कोई विशेष प्रभावी संवाद का प्रयोग नहीं है। और न ही ऐसी कोई कथा की मांग दृष्टिगत होती है। फिर भी यह एक अच्छा उपन्यास है और इसकी भाषा शैली सहज और सरल है।
फिर भी दो उदाहरण उपन्यास के संपूर्ण वातावरण को चित्रित करने में सक्षम है।
"कभी-कभी अनजान राही ठोकर लगने पर  अपने मार्ग से विचलित हो जाते हैं।" (पृष्ठ-66)
"हर वह स्थान जहाँ आप मेरे संग हैं, मेरे लिए हनीमून का स्थान है, हर वह मार्ग धरती का टुकङा जहाँ क्षण भर भी आप रुककर बात करते हैं, मेरी ओर देखकर मुस्कुराते हैं, मेरे लिए पवित्र स्थान बन जाता है...और आपका हर श्वास जिसमें मेरी याद रची है, मेरे लिए मधुर गीत है....यही मेरा ऐश्वर्य है।"-(पृष्ठ- 68)
उपन्यास शीर्षक-     
                       उपन्यास का शीर्षक तीन इक्के क्यों है। यह मुझे समझ में नहीं आया। साधना और प्रकाश के अतिरिक्त अन्य कोई भी प्रभावी पात्र नहीं है। जिसके आधार पर उपन्यास का नाम ती‌न इक्के रखा जाये।
     हालांकि उपन्यास में दो जगह ताश के खेल में तीन इक्के अवश्य आते हैं। जहाँ हार जीत में समर्पण अवश्य होता है।
शायद यही आधार उपन्यास के नामकरण में होगा।
निष्कर्ष-
    ‌‌‌       गुलशन नंदा का उपन्यास तीन इक्के एक पारिवारिक रचना है जो पाठक को सहज ही आकृष्ट करती है। भारतीय समाज में जो सामान्य परिस्थितियाँ होती है उन्हीं पर यह उपन्यास आधारित है।
      उपन्यास पाठक को आरम्भ से अंत तक अपने में बांधे रखता है। रचना छोटी सी है, प्रवाह तीव्र है इसलिए पाठक कहीं भी मानसिक थकान महसूस नहीं करता।
      उपन्यास पठनीय और रोचक है। सामाजिक उपन्यासों के पाठकों के अलावा अन्य पाठकों को भी उपन्यास पसंद आयेगा।
धन्यवाद।
- गुरप्रीत सिंह
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उपन्यास- तीन इक्के
लेखक- गुलशन नंदा
प्रकाशक- अशोक पॉकेट बुक्स- दिल्ली
वर्ष- 
पृष्ठ-
मूल्य

Tuesday, 3 April 2018

104. गुनाह के फूल- गुलशन नंदा

जब गुनाह के फूल खिले.....
गुनाह के फूल- गुलशन‌ नंदा, मर्डर मिस्ट्री, रोचक, पठनीय।
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     गुलशन मूलतः एक सामाजिक उपन्यासकार हैं और अपने समय के सर्वाधिक चर्चित उपन्यास लेखक भी रहें हैं। इनके सामाजिक उपन्यासों पर बहुत सी चर्चित फिल्में भी बन चुकी हैं। 
            गुलशन नंदा का प्रस्तुत उपन्यास गुनाह के फूल एक‌ मर्डर मिस्ट्री है। मेरे विचार से ऐसा इनका यह एकमात्र उपन्यास ही होना चाहिए। घटना चाहे कोई भी हो वह समाज से विलग नहीं हो सकती, ठीक उसी तरह यह मर्डर मिस्ट्री भी समाज की ही एक घटना पर आधारित है। लेकिन लेखन ने इस पर समाजिकता हावी नहीं होने दी और इसी कारण से गुलशन नंदा का यह उपन्यास उनके अन्य सामाजिक उपन्यासों से अलग हटकर मर्डर मिस्ट्री की श्रेणी में आ जाता है।
        उपन्यास की कथा कोई ज्यादा बङी नहीं है और न ही पात्र ज्यादा हैं और ठीक उसी अनुपात में उपन्यास के पृष्ठ हैं। उपन्यास की कहानी, पात्र और पृष्ठ के अनुपात में उपन्यास रोचक और पठनीय बना है।
 
    क्रिसमस की छुट्टियों के दौरान सुशील अपने छोटे भाई नवीन के साथ मुंबई एक्सप्रेस से अपनी‌ जीजी से मिलने भोपाल जा रही थी । वह अकेली न थी, बल्कि उसका छोटा भाई नवीन भी उसके सामने वाली सीट पर बैठा था। नवीन का अकेले बहन के संग रेल में यात्रा करने का पहला अवसर था। सुशील काॅलेज में पढती थी और नवीन तीसरी कक्षा का विद्यार्थी था। दोनों क्रिस्मस की छुट्टियां काटने अपनी बङी बहन के पास भोपाल जा रहे थे। (पृष्ठ-03)  लेेकिन रास्ते में, ट्रेन में, रात के अंधेरे में किसी शैतान ने सुशील से दुराचार कर उसकी हत्या कर दी और उसके छोटे भाई को हाथ बांध कर टाॅयलेट में बंद कर दिया।
        सुशील का जीजा हरदयाल जो की भोपाल रेल्वे पुलिस का इंचार्ज था। वह इस केस की छानबीन करता है और एक मोङ पर जाकर वह स्वयं आश्चर्यचकित रह जाता है।  तस्वीर को ध्यान से देखते ही उसके मस्तिष्क पर एक अँधेरा सा छाने लगा। उसके हृदय की धङकने तेज हो गयी। टाँगें क्षण भर के लिए लङखङा सी गयी। पाँव तले की धरती खिसकती हुयी दिखाई देने लगी। उसे विश्वास न आ रहा था कि यह तस्वीर उस अपराधी की है...कहीं बहुत बङी भूल तो नहीं हो गयी.....कठिनता से अपने आपको सँभालते हुए वह पास के बिछे हुए बैंच पर बेसुध सा बैठ गया। (पृष्ठ-75) लेकिन अंतत: वह अपराधी को पकङने में कामयाब होता है।
            उपन्यास की‌ कहानी हालांकि छोटी सी है। एक हत्या और फिर मुजरिम को पकङना लेकिन उपन्यास में विशेष है इस दौरान की छोटी-छोटी घटनाएं । छोटे-छोटे तथ्यों और सबूतों के आधार पर कैसे एक पुलिसकर्मी अपराधी तक पहुंच पाता है। उपन्यास में कुछ ट्विस्ट भी हैं जो स्वयं हरदयाल को भी विचलित कर देते हैं। लेकिन एक कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार हरदयाल अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होता।
     
                 गुलशन नंदा का उपन्यास पढना स्वयं में एक रोचकता है, और वह भी जब मर्डर मिस्ट्री हो तो क्या कहना। उपन्यास में कहीं भी अनावश्यक वार्तालाप, दृश्य नहीं है। उपन्यास बहुत ही हल्का-फुल्का है। अन्य जासूसी या मर्डर मिस्ट्री उपन्यासों की तरह उलझा हुआ नहीं है। यही उपन्यास की विशेषता है।
         उपन्यास पूर्णतः पठनीय है। अगर आप कम समय के लिए कोई रोचक उपन्यास पढना चाहो तो यह उपन्यास अवश्य पढें इसमें पाठक को कहीं भी अनावश्यक दिमाग लगाने की आवश्यकता नहीं है। उपन्यास का धीमा प्रवाह पाठक को अपने साथ धीरे-धीरे बहा ले चलता है।
       एक सामाजिक उपन्यासकार का मर्डर मिस्ट्री उपन्यास पढना स्वयं में रोचक है।
उपन्यास पठनीय है।
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उपन्यास -    गुनाह के फूल
लेखक-       गुलशन नंदा
प्रकाशक-    अशोक पॉकेट बुक्स- 4/36, रूपनगर, दिल्ली
पृष्ठ-          109

103. फरेब- अमित श्रीवास्तव

प्यार, दोस्ती और फरेब
फरेब- अमित श्रीवास्तव, मर्डर मिस्ट्री, रोचक, पठनीय
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राजस्थान के आबू रोङ शहर के युवा लेखक अमित श्रीवास्तव का उपन्यास फरेब बहुत रोचक और पठनीय है।
   इनका यह प्रथम उपन्यास है लेकिन लेखन और कहानी की दृष्टि से कहीं भी ऐसा महसूस नहीं होता की यह लेखक की प्रथम कृति है।  उपन्यास जितना उलझा हुआ है उतना ही रोचक है। पाठक पृष्ठ दर पृष्ठ रहस्य की झील में तैरता रहता है। उपन्यास का आरम्भ जितना रोचक है उतना ही जबरदस्त इसका क्लाइमैक्स है।
उपन्यास की पृष्ठभूमि राजस्थान के हिल स्टेशन माउंट आबू पर आधारित है। माउंट आबू की प्रसिद्ध झील नक्की के बाॅट कांट्रेक्टर चन्द्रेश मल्होत्रा की पत्नी गायब हो जाती है। एक दिन जब चन्द्रेश मल्होत्रा अपने घर पहुंचा तो एक खूबसूरत युवती को पाया।
चन्द्रेश ने खङे-खङे महिला से कहा, -"कौन हैं आप?"
"आप मुझे नहीं जानते?"- महिला ने आश्चर्य से पूछा।
" मैं आपको कैसे पहचानूँगा ? मैं तो आपको पहली बार देख रहा हूँ ।"- चन्द्रेश के स्वर में हैरानी‌ के भाव थे।
"क्या पीकर घर आये हैं, जो अपनी वंशिका को नहीं पहचान पा रहे हैं।"- वंशिका के स्वर में चंचलता थी।
" तुम मेरी पत्नी ? कोई मजाक है क्या?"- चन्द्रेश के स्वर में हैरानी की जगह गुस्से ने ले ली। (पृष्ठ-)

Monday, 12 March 2018

102. दस बजकर दस मिनट- अरुण सागर

कत्ल की अनोखी साजिश
दस बजकर दस मिनट- अरुण सागर, जासूसी उपन्यास, मर्डर मिस्ट्री, पठनीय।
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विनोद कपूर राजधानी दिल्ली का नंबर वन गार्डन डिजायनर था। (पृष्ठ-07) और उसकी‌ पत्नी किरण कपूर एक प्रसिद्ध जासूसी उपन्यासकार। किरण के पास कोई अज्ञात एस. एस. नामक आदमी प्रेम पत्र भेजता है और कभी उसे जान से मारने की धमकी देता।
          विनोद कपूर इस समस्या का हल  ढूंढने के लिए क्राइम एक्सपर्ट सूरज खन्ना की मदद लेता है। जासूस- क्राइम एक्सपर्ट सूरज खन्ना जब विनोद कपूर की कोठी पहुंचता तब दस बजकर दस मिनट पर किरण कपूर की हत्या हो जाती है।
                                  सूरज खन्ना अभी इस मर्डर मिस्ट्री का हल नहीं ढूंढ पाता उधर सिरफिरा कातिल और भी कत्ल कर देता है।
          यह मर्डर मिस्ट्री बहुत उलझी हुयी है। जासूस सूरज खन्ना के लिए एक चुनौती है की कातिल उसकी उपस्थिति में कत्ल कर गया और उसे पता तक न चला और कत्ल भी इस अंदाज से की‌ पाठक चौंक जाये।
लेखक अपने लेखकिय में लिखता है - अपने प्रथम उपन्यास दस बजकर दस मिनट में मैं‌ मर्डर का एक ऐसा तरीका दिखा रहा हूं जो आपने तो किसी से सुना होगा और कहीं पढा होगा। इस उपन्यास में किरण कपूर का कत्ल तो गोली से, जहर से और किसी अन्य तरीके से हुआ। (लेखकीय पृष्ठ से) और वास्तव में लेखक ने यहाँ एक नया प्रयोग किया है। यह प्रयोग क्या है यह तो बस उपन्यास पढकर ही जाना जा सकता है।
 
    उपन्यास का आरम्भ बहुत ही रोचक ढंग से होता है। उपन्यास के आरम्भिक पृष्ठ ही पाठक को स्वयं में कैद करने में इतने सक्षम हैं की पाठक पूरा उपन्यास पढता चला जाता है।
कुछ रोचकता देखिएगा।
- किरण कपूर अपने विशेष मित्र सुरेश साहनी से अक्सर मिलती है।
- विनोद कपूर को किरण कपूर और सुरेश साहनी पर संदेश है।
- विनोद कपूर अपनी पर्सनल सक्रेटरी ज्योति पाठक को पसंद करता है।
- ज्योति पाठक एक अन्य युवक को पसंद करती है।
- वह अन्य युवक किरण कपूर को इमोशल ब्लैकमेल करता है।
- एक है डबल एस. (एस.एस.) जो किरण कपूर को एक तरफा प्यार करता है।
- एक है स्वीटी जो किरण को बचपन से ही प्यार करता है।
- सुरेश साहनी भी किरण को चाहता है और विनोद कपूर तो सुरेश साहनी से नफरत करता है।
          
 
उपन्यास में ऐसे कई रोचक प्रसंग हैं जो उपन्यास को रोचक बनाने में पूर्णतः सक्षम है।
            उपन्यास में रोचक प्रसंग ही नहीं बल्कि रोचक पात्र भी है। एक पात्र है स्वीटी और दूसरा पात्र है प्राणनाथ कपूर।
                        स्वीटी का उपन्यास में जब भी आगमन होता है वह हर बार एक नया रहस्य पैदा कर जाता है। कभी वह पागल लगता है, कभी प्रेमी, कभी हत्यारा और कभी सनकी। और एक बात और बात भी ये की वो बात भी बहुत करता है।
उपन्यास में प्राणनाथ का नाम खूब चर्चा में रहता है लेकिन वह स्वयं उपन्यास के अंतिम चरण में पाठक के समक्ष आता है। और जब वह सामने आता है तो स्वयं सूरज खन्ना के मुँह से एक ही बात निकलती है-  बाहर आकर उसने पांच मिनट तक गहरी- गहरी साँस ली और फिर बुदबुदा उठा- "क्या कैरेक्टर था यार।" (पृष्ठ209)
      उपन्यास के पात्र दमदार हैं तो कुछ संवाद भी पठनीय है।
" ....फिर भी औरत, औरत होती है और वो हमेशा पूजा के काबिल होती है।"(पृष्ठ-200)
" बुजदिल बार-बार मरते हैं। मौत से डरने वाला भला जिंदगी का आनंद क्या जाने।"(पृष्ठ-222)
गलतियाँ-
              किसी भी रचना में लेखक या मुद्रण के दौरान कुछ गलतियाँ रह जाना स्वाभाविक है। प्रस्तुत उपन्यास में एक दो जगह शाब्दिक गलतियाँ है। लेकिन ये गलतियाँ उपन्यास के प्रवाह को बाधित नहीं करती।
- जैसा हर फिल्म में शाहरुख खान का कैरेक्टर दिखाया गया था। (पृष्ठ-39)
   यहाँ हर की जगह डर शब्द आना था।
- "क्या नाम है उसका?"
  "किरण कौल"
  "ओह! तो किरण कपूर आपकी वाइफ है..।"(पृष्ठ-40)
यहाँ पहले किरण कौल लिखा और फिर किरण कपूर जबकि सही नाम किरण कपूर ही है‌।
- "विनोद भैया के डैडी। प्राणनाथ ....." कौल।..."(पृष्ठ-123)
यहाँ प्राणनाथ कपूर नाम आना था।
     उपन्यास के कुछ पृष्ठ इतने धुंधले हैं की पढने में भी परेशानी का सामना करना पङा।
   निष्कर्ष-     
                अरुण सागर का प्रस्तुत उपन्यास 'दस बजकर दस मिनट' एक जबरदस्त मर्डर मिस्ट्री है। जो की आरम्भ से अंत तक पाठक का भरपूर मनोरंजन करेगी, कातिल भी पाठक की आँखों के सामने होगा पर पाठक वहाँ तक पहुंच नहीं पायेगा और जब क्राइम एक्सपर्ट कातिल तक पहुंचता है तो पाठक भी चौंके बिना नहीं रह पाता।
        दस बजकर दस मिनट एक पठनीय उपन्यास है जो पाठक को किसी भी स्तर पर निराश नहीं करेगा।
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उपन्यास - दस बजकर दस मिनट
लेखक -   अरुण सागर
प्रकाशक-  शिवा पॉकेट बुक्स- मेरठ
वर्ष-       -
पृष्ठ        - 239
मूल्य      -
लेखक का पता-
   - अरुण आनंद
      540, G.H.-13
       पश्चिम विहार, नई दिल्ली- 110087
         

Tuesday, 6 March 2018

101. चालीसा का रहस्य- डाॅ. रुनझुन सक्सेना

हनुमान चालीसा और मर्डर मिस्ट्री का अनोखा संयोग।
चालीसा का रहस्य- रुनझुन सक्सेना, जासूसी उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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  लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में जहां परम्परागत आधार पर उपन्यास लेखन की अंधानुकरण परम्परा रही है, वहीं कुछ लेखकों ने नये प्रयोग भी किये हैं। हालांकि ऐसे प्रयोग बहुत कम देखने को मिलते हैं । ऐसा ही एक प्रयोग किया है डाॅ. रुनझुन सक्सेना शुभानंद ने अपने प्रथम उपन्यास 'चालीसा का रहस्य' में। 
      उपन्यास में हनुमान चालीसा को आधार बना कर कैसे एक रहस्य को सुलझाया जाता है यह वास्तव में पठनीय है। लेखिका का यह प्रयोग कामयाब भी रहा है। हनुमान चालीसा के छंदों को एक नये रूप में प्रस्तुत करना प्रशंसनीय कार्य है।
               डाॅ. अंजना एक मशहूर शोधकर्ता होने ले साथ -साथ एक सुशिक्षित प्रोफेसर एवं अत्यंत प्रतिभाशाली गाइड भी थी। (पृष्ठ-5) और एक दिन दिल का दौरा पङा और उसके कुछ दिन उनकी मृत्यु हो गयी। सभी को डाॅ. अंजना की मृत्यु संदिग्ध लगी।
      डाॅ. अंजना का एक सुयोग्य शिष्य संजीव जो की डाॅ. अंजना के सानिध्य में P.HD. कर रहा होता है। जब संजीव डाॅ. अंजना की मृत्यु के पश्चात अपने थीसिस के पेपर लेने अंजना के घर जाता है वहाँ से उसे एक रहस्यम बक्सा मिलता है और उस बक्से के साथ एक हनुमान चालीसा की छोटी सी पत्रिका।
       लेकिन न तो वह बक्सा कोई सामान्य था और न वह हनुमान चालीसा। वह कोई साधारण बक्सा न था। वह एक विशेष पद्धति से खुलने वाला एक बक्सा था। 
और जब वह बक्सा खुला तो कई रहस्य सामने आये।

- क्या डाॅ. अंजना की मृत्यु स्वाभाविक थी या अस्वाभाविक?
- क्या था उस बक्से में?
- वह बक्सा कैसे खुला? (उपन्यास का यह एक सस्पेंश भाग है)
- संजीव की थीसिस का क्या हुआ?
- डाॅ. अंजना के कातिल कौन थे?
- डाॅ. अंजना की हत्या क्यों हुयी, कैसे हुयी?
- हत्यारा कैसे पकङा गया?
- क्या रहस्य था हनुमान चालीसा में?
    ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों के उत्तर डाॅ. रुनझुन सक्सेना शुभानंद द्वारा लिखे गये उपन्यास 'हनुमान चालीसा' को पढकर ही‌ मिलेंगे।
         
          उपन्यास कई दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। जहाँ एक तरफ यह उपन्यास मर्डर मिस्ट्री है और उस मर्डर मिस्ट्री को हल करने वाले युवा हैं, वहीं उपन्यास में मेडिकल क्षेत्र की बहुत सी जानकारी भी उपन्यास में उपलब्ध है। इनके साथ-साथ हनुमान चालीसा की व्याख्या भी बहुत सुंदर ढंग से दी गयी।
           अगर बात सिर्फ हनुमान चालीसा की व्याख्या की करें तो यह व्याख्या मात्र धार्मिक दृष्टिकोण से न देकर आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दी गयी है। इसमें राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, रावण आदि को प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
उदाहरण देखें- "...नायक भगवान राम हैं। वह शरीर है, जो कि तुम हो।.....माँ सीता ' आत्मा' है जो तुम्हारे सुक्ष्म शरीर (Astral body) का प्राण है.........इसी तरह लक्ष्मण तुम्हारी 'चेतना' या यूँ कहो कि 'विवेक' और 'इच्छा शक्ति' का रूप है।..।" (पृष्ठ-45)
          इसी प्रकार हनुमान चालीसा भी एक सामान्य पत्रिका न होकर हमारे मन को जानने का एक रास्ता है।
- हनुमान चालीसा तुम्हे तुम्हारे अंतस को जानने का रास्ता दिखाती है और हमारे सभी प्रश्नों के उत्तर भी वहीं छिपे होते हैं। बस जरूरत  सिर्फ यह जानने की है कि कैसे कोई अपने अंतस को पहचानकर उसके भीतर गहरे में छिपे गूढ ज्ञान को जानकर सारे उत्तर ढूँढने में सफल हो सकता है।"-(पृष्ठ-42)

गलती-

Friday, 2 March 2018

100. आग का खेल- आरिफ मारहर्वी

एक छोटी सी मर्डर मिस्ट्री
आग का खेल- आरिफ मारहर्वी, मर्डर मिस्ट्री, औसत
उपन्यास
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      आरिफ माहरवी अपने समय के चर्चित उपन्यासकार रहे हैं। मैंने इस उप‌न्यास से पहले उ‌नका लिखा गया कोई भी उपन्यासोमनाथपढा।
  आग का खेल उनका लिखा गया एक छोटा सा परंतु रोचक उपन्यास है।
        
  सेठ सोमनाथ जो की शहर के एक प्रसिद्ध व्यवसायी है। एक रात उनके कमरे में आग लग जाती है और सेठ जी उस आग में जल कर मर जाते हैं।
                   CID के अफसर को यह मामला दिया जाता है और वे अपने विवेक से इस मर्डर मिस्ट्री को हल करते हैं। और अनंतः असली अपराधी को पकङ लेते हैं।
     उपन्यास की यही एक छोटी सी कहानी है और शेष उपन्यास इस पर केन्द्रित है। 
- सेठ सोमनाथ का हत्यारा कौन है?
- सेठ सोमनाथ की हत्या क्यों की गयी?
- हत्यारा कैसे पकङा गया।
                          उपन्यास में बार-बार कई पात्रों पर शक होता है की ये पात्र हत्यारा हो सकता है। और कभी ये अभी लगता है कहीं कोई गहरी साजिश तो नहीं।
          
     किसी भी मर्डर मिस्ट्री में तीन प्रश्न महत्वपूर्ण होते हैं (मृतक और हत्यारा, हत्या का कारण, हत्यारा कैसे पकङा गया) और कहानी इन्हीं पर ही आधारित होती है। आग का खेल उपन्यास में यही तीनों बाते संतुलन बना कर चलती हैं।
  
      हत्या होने के पश्चात पाठक के मन में सर्वप्रथम यही प्रश्न उठता है की हत्यारा कौन है। यहाँ भी सेठ सोमनाथ की हत्या के पश्चात् यही प्रश्न पूरे उपन्यास में घूमता है।
        और CID के होनहार सदस्य इरफान(उपन्यास में इर्फान लिखा है) और कैसर इस रहस्य को सुलझाते हैं।
  
  उपन्यास में दृश्य भी ज्यादा नहीं है। चार-पांच जगह से ज्यादा के दृश्य नहीं है।
सेठ सोमनाथ का घर, सोहन लाल का घर , होटल, CID का ऑफिस इत्यादि।
           उपन्यास के में एक लेखक दादर साहब के दृश्य को छोङकर कहीं भी ऐसा नहीं लगता के उपन्यास में कोई अनावश्यक विस्तार हो।  और उपन्यास का यही दृश्य हास्य उत्पन्न करने वाला है।
  "रोमांस तो लेखकों का भाग्य होता है बेगम...वह वास्तविक जीवन में नहीं तो उपन्यास के पन्नों में रोमांस लङाते हैं। बाल सफदे भी हो जायें तो भी ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे उपन्यास के हीरो हम ही हैं।" (पृष्ठ-24)
   
  निष्कर्ष में कह सकते हैं की आरिफ मारहर्वी का उपन्यास आग का खेल एक औसत स्तर का उपन्यास है। उपन्यास छोटा सा है लेकिन किसी भी स्तर पर पाठक को निराश भी नहीं करता। कहानी एक बार तो पढने योग्य है। 
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उपन्यास- आग का खेल
लेखक - आरिफ माहरवी
प्रकाशक- स्टार पॉकेट बुक्स, 4/5 B, आसफ रोङ, नई दिल्ली-01
वर्ष- नवंबर, 1971
पृष्ठ- 128
मूल्य-

Saturday, 17 February 2018

99. इंसाफ का सूरज- वेदप्रकाश शर्मा

 रहस्य के आवरण में लिपटी एक रोचक कहानी।
इंसाफ का सूरज- वेदप्रकाश शर्मा, जासूसी उपन्यास, रहस्य-रोमांच, उत्तम।

 वेदप्रकाश शर्मा को सस्पेंश का बादशाह कहा जाता है। उनके उपन्यास में सस्पेंश इस हद तक होता है की पाठक भी आश्चर्यचकित सा रह जाता है की आखिर ये हो क्या गया।  पृष्ठ दर पृष्ठ जिस प्रकार इनके उपन्यासों की कहानी बदलती है पाठक सोच भी नहीं सकता।  इन्हीं विशेषताओं के कारण वेदप्रकाश शर्मा को सस्पेंश का बादशाह कहा जाता है।
       वेदप्रकाश शर्मा का उपन्यास इंसाफ का सूरज भी इसी प्रकार का उपन्यास है जिसमें‌ प्रत्येक पृष्ठ पर रहस्य/सस्पेंश का जाल बिछा हुआ है। पाठक एक रहस्य से बाहर निकलता है तो दूसरा रहस्य उसका इंतजार करता है। 
विवेकानंद उद्यान- माउंट आबू


    उपन्यास की कहानी है एक ठाकुर परिवार की हवेली की। ठाकुर परिवार में मुखिया है ठकुराईन सुलोचना देवी और उसके पुत्र श्रीकांत, उसकी पत्नी और एक छोटा बेटा विक्की,  ठकुराईन का दूसरा पुत्र है शूरवीर सिंह । उपन्यास की कहानी आरम्भ होती है शूरवीर सिंह की शादी से...   "उस अभिशप्त हवेली की दुल्हन बनने वाली हर लङकी को शादी के कुछ दिन बाद कत्ल कर दिया जाता है..शूरवीर की दो पत्नियों को कत्ल किया जा चुका है- पहले माधवी और फिर निशा, एङी-चोटी का जोर लगाने के बावजूद पुलिस आज तक पता नहीं लगा पाई कि हवेली की दुल्हन की हत्याएं कौन करता है?" (पृष्ठ-06) 

Thursday, 1 February 2018

98. डार्क हाॅर्स- नीलोत्पल

  IAS की तैयारी करते युवाओं की संघर्ष दास्तान।
डार्क हाॅर्स -नीलोत्पल, उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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  नीलोत्पल मृणाल का उपन्यास डार्क हाॅर्स कहानी है दिल्ली के मुखर्जी नगर में IAS की तैयारी करने वाले उन युवाओं की जो एक स्वर्णिम भविष्य के निर्माण के लिए संघर्षपूर्ण जिंदगी जी रहें हैं।
       यह उपन्यास मात्र कल्पनाओं की उपज नहीं है वरन लेखक के जीवन का यथार्थ अनुभव है। लेखक ने इस विषय पर लेखकीय में लिखा है- संभवतः जिस उम्र में आदमी के पास  सबसे अधिक ऊर्जा रहती है, कुछ करने का पुरजोर  उत्साह होता है और दुनिया को देखने -समझने की सबसे ज्यादा जिज्ञासा होती है, मैंने अपने जीवन का वह सबसे चमकदार दौर आईएएस की तैयारी के लिए मुखर्जीनगर में गुजार दिया।
     
         अपने जीवन के इसी सत्य को लेखक नीलोत्पल मृणाल ने उपन्यास रूप में प्रस्तुत किया है।
     उपन्यास का मुख्य पात्र है संतोष कुमार। लेकिन यह मात्र एक संतोष की कहानी नहीं है। संतोष तो एक माध्यम मात्र है, संतोष के साथ-साथ न जाने अन्य कितने और अभ्यर्थियों की कहानी है जो  दिल्ली के मुखर्जी नगर में आईएएस की तैयारी करते हैं और इस दौरान वह कितनी बार जीते- मरते हैं। उनके और उनके माँ-बाप के क्या सपने हैं। इस इस उपन्यास में दर्ज हैं।
   यह उपन्यास अपने साथ अनेक कहानियाँ और घटनाएं समेटे हुए है। जहाँ कुछ कहानियाँ और घटनाएं हँसती है वहीं कुछ पाठक को रुलाती भी हैं। कुछ घटनाएं आईएएस की तैयारी के नाम पर मौज मस्ती करने वाले युवाओं की वहीं कुछ अपने स्वप्न साकार करने वाले संघर्षशील युवाओं के लिए प्रेरणा भी है।
    बत्रा- मुखर्जी नगर की वह जगह जहाँ चाय के नाम पर सिविल सर्विस की तैयारी करने वालों की महफिल  जमा होती है।  जिसने जितने अधिक मेंस लिखे हों वह महफिल का सबसे खास व्यक्ति होता  था। जिसने इंटरव्यू दे दिया वह अति-विशिष्ट की श्रेणी में आता था। (पृष्ठ -54) और बत्रा पर ऐसे -ऐसे धुरंधर जमा होते हैं जो सिगरेट के धुएँ से विश्व का नक्शा बना देते हैं।
कुछ नव युवा तैयारी के नाम पर मौजमस्ती करते हैं और इसे प्रगतिशीलता का नाम देते हैं। ऐसे युवाओं को गुरु विमलेंदू ने खूब फटकारा है।
- ये दारू पीना और सिगरेट उङाना कब से प्रगतिशीलता का पैमाना बन गया.....दारू और सिगरेट का खुलेआम पीना है ये कोई साहस नहीं बल्कि इसे उन्माद कहते हैं। (पृष्ठ-92)
और साहस क्या है- गुरु के शब्दों में
"हम में साहस है बालश्रम के विरुद्ध बोलने का । हम में साहस है दहेज प्रथा का विरोध करने का।.....हम में साहस...नारी मुक्ति...बाल विवाह...धर्म पर सवाल पूछने का। हम में साहस है सरकार की गलत नीतियों के विरुद्ध सङक पर उतर जाने का। हाँ, हममें ये साहस है। साहस इसे कहते हैं।" (पृष्ठ-92)
      मुखर्जी नगर में फैले कोचिंग सेंटर की वास्तविकता से भी परिचित करवाती है। ये कहानी मात्र मुखर्जी नगर की या आईएएस की तैयारी करने वाले युवाओं की नहीं, सभी जगह कुकरमुत्तो की तरह उगे कोचिंग सेंटर अभ्यर्थीयों के साथ मनमानी लूट करते हैं।
- पर ये तो मानना होगा कि यहाँ कुकरमुत्तों‌ की तरह उगे कोचिंग में क्वालिटी नहीं है। कुछ को छोङकर बाकी खाली मायाजाल फैलाए हुए हैं गुरु।"- विमलेन्दू ने कहा। (पृष्ठ-65)
   " हाँ, साला 2-3 साल तो ये समझने के लिए कोचिंग लेना होता है कि अब कौन सी कोचिंग में एडमिशन लेना अच्छा होगा।"- विमलेंदू ने कहा (पृष्ठ-65)
    कोचिंग सेंटर की बदतमीजी भी उपन्यास में उजागर हुयी है। एडमिशन लेते वक्त उनका व्यवहार अलग होता है और शुल्क जमा करवा देने के बाद अलग
" देखिए हमारा काम होता है हर स्टूडेंट का बेवजह उत्साह बढाना समझे आप? वर्ना हम भी जानते हैं कि सौ में दस ही सलेक्ट होते हैं बाकी गधे ही होते हैं पर हमें सबको घोङा कहना पङता है...। (पृष्ठ-100)
इन कोचिंग सेंटर की वास्तविक तो प्रफुल्ल बटोहिया, दुखमोचन और खगेंदर तूफानी जैसे सर से पता चलती है।  ये सर ऐसे है कि वे बैल को भी यह आशा बँधवा देते थे कि 'तुम एक दिन दूध दोगे, बस अच्छे से चारा-बेसन खाओ'। (पृष्ठ- 106) और ऐसे ही हैं  खगेंदर तूफानी।
खगेंदर तूफानी- खुद सात साल यहीं मुखर्जी नगर में आईएएस, पीपीएस सबकी तैयारी की थी पर न वहाँ सफल हुए न ही किसी विषय में कोई विशेषज्ञता ही हासिल कर पाए। हारकर 'लोकसेवक मेकर' नाम की कोचिंग खोली और उसके निदेशक बने। (पृष्ठ-104)
कोचिंग के दौरान पनपने वाले अनेक किस्से पाठक को खूब रोमांचित करते हैं। जहाँ अच्छे यारों के यार मिलते हैं वहीं कुछ दिलफरेब भी। जहाँ दोस्ती है, प्यार है और बेवफाई भी है। यहाँ अक्सर कोचिंग में अपने बगल में बैठी लङकी में लङका पहले अपनी प्रेमिका देखता है, फिर दुल्हन देखता है, फिर एक अच्छा दोस्त देखता है और अंत में बहन पर आकर समझौता कर लेता है। (पृष्ठ-134) और ऐसा समझौता उपन्यास का एक पात्र भी करता है।
  लेकिन कुछ अभ्यर्थी तो इससे भी दो कदम बढकर निकले-  गोरे लाल के कमरे पर जैसे ही उसकी कुक आती, एक गाना तभी हमेशा मोबाइल पर बजता था, 'हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब, एक दिन।'
संवाद-
किसी भी कहानी के संवाद उसके उद्देश्य को  स्थापित करने में महती भूमिका अदा करते हैं। इस उपन्यास के संवाद एक और जहाँ पात्र का चरित्र-चित्रण करने में सक्षम हैं वहीं कहानी को आगे बढाने में उपयोगी हैं।
अंग्रेजी जानने वाला वहाँ सियारों के बीच लकङबग्घे की तरह होता है। (पृष्ठ-61)
बुढापा आदमी का अंतिम बचपन है। (पृष्ठ-115)
लङको का मन वैसे ही साफ होता है जैसे नवंबर की दोपहर में आसमान होता है। (पृष्ठ- 134)
सिविल सेवा की तैयारी करने वालों से ज्यादा भयंकर आशावादी मानव संसार में और कहीं मिलना मुश्किल था। (पृष्ठ-147)
- अंग्रेजी व्यापार की भाषा है, उर्दू प्यार की भाषा है और हिंदी व्यवहार की भाषा है। (पृष्ठ-95)
  शीर्षक-
   किसी भी वस्तु का शीर्षक ही उसके प्रथम विशेषता होता है।
  उपन्यास का शीर्षक डार्क हाॅर्स क्यों है? हिंदी उपन्यास और अंग्रेजी शीर्षक। उपन्यास का शीर्षक चाहे जो भी हो पर इसका औचित्य उपन्यास के अंत में पता चलता है।
  लेखक ने भी इस विषय पर लिखा है- एक बात उपन्यास के शीर्षक पर भी कहूँगा।........डार्क हाॅर्स के नाम के कथानक से संबंध की तो भूमिका में नहीं बताऊँगा इसके लिए तो आपको यह उपन्यास पढना होगा।  
        सच मानिए जैसे ही आप इस शीर्षक की सत्यता तक पहुंचेंगे आपको भी यह शीर्षक रोचक लगेगा।
कमियां-
        - उपन्यास में कई जगह अश्लील शब्दों का प्रयोग किया गया है। जो कि मेरी दृष्टि में उचित नहीं है। पाठक अच्छी कहानी के कारण पढता है न कि गाली पढने के लिए। इस उपन्यास पर लेखक को साहित्य अकादमी का पुरस्कार सिर्फ अच्छे कथानक के लिए मिला है अगर इसमें से कुछ अश्लील शब्दों को हटा दिया जाये तो उपन्यास पारिवारिक रूप से भी पठनीय है।
   उम्मीद है इसका नया संस्करण जब भी आये तो उसमें से अश्लील शब्द न हों।
- मनोहर के चाचा का दिल्ली आगमन व उनका दिल्ली दर्शन विषय थोङा ज्यादा व अनावश्यक सा लगता है। हालांकि यह वर्णन भी रोचक है। क्योंकि स्वयं चाचा भी रोचक इंसान हैं।
एक उदाहरण देख लिजिएगा- लाल किले में जब चाचा को मनोहर ने खैनी खाने से मना किया तो चाचा ने भी गजब उत्तर दिया- "चलो जरा यहाँ खैनी खा लें, यादे रहेगा कि लाल किला में बैठ के खैनी खाए थे कबो।"- चाचा ने चहुँकते हुए कहा। (पृष्ठ-77)
    निष्कर्ष-
             मेरी दृष्टि में यह एक ऐसा उपन्यास है जिसे सभी उम्र वर्ग को पढना चाहिए। यह उपन्यास मात्र मनोरंजन नहीं है बल्कि संघर्षरत जीवन जीने वाले लोगों की जीवंत दास्तान है। एक ऐसी दास्तान जो कहीं आपको रुलाती है तो कभी हँसाती है।
         मैं जब इस उपन्यास को पढ रहा था तो स्वयं पात्रों के साथ जी रहा था। स्वयं को मुखर्जी नगर में पाया। कभी-कभी तो संतोष, गुरु, रायसाहब, विमलेंदू मनोहर, विदिशा और पायल के बारे में सोचने लगा था।
      उपन्यास बहुत ही रोचक है अवश्य पढें।
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बेहद दिलचस्प उपन्यास। अपने पहले ही उपन्यास में निलोत्पलने बड़ा साहस दिखाते हुए बेबाकी से यथार्थ की तलछट को कुरेदते हुए एक ऐसी दुनिया का सच लिखा है, जिस पर पहले कभी इतना नहीं लिखा गया. ये भोगे गए यथार्थ का दस्तावेज है. एक ऐसी रोचक और बौद्धिक दुनिया की गर्म भट्टी का सच लिखा है, जिसमें कई लोग तप के सोना हो जाते हैं तो कई जल कर खाक. 'डार्क हॉर्स' अंधेरे रास्ते से होकर उजाले तक का सफर है. नीलोत्पल की भाषा में रवानगी है, व्यंग में धार है, संवादों में संवेदना के गहरे उतार-चढ़ाव हैं. किस्सागोई का अपना अलग अंदाज है, जो पाठक को पढ़ने के लिए मजबूर करता है. 'डार्क हॉर्स' के रूप में शानदार शुरुआत के साथ भविष्य के एक बड़े लेखक के रूप में देख रहीं हूं. नीलोत्पल को बहुत सारी शुभकामनाएं।
- सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती चित्रा मृद्गुल
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उपन्यास- हार्क हाॅर्स
ISBN-
लेखक- नीलोत्पल मृणाल
प्रकाशक- हिंद युग्म
www.hindyugam.com
पृष्ठ- 174
मूल्य-175₹
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उपन्यास निम्न लिंक से मंगवा सकते हैं।
एमेजन- डार्क हाॅर्स

97. बनारस टाॅकिज- सत्य व्यास

        तीनों‌ मित्रों की हाॅस्टल गाथा।
बनारस टाॅकिज- सत्य व्यास, उपन्यास, रोचक, पठनीय।

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   सत्य व्यास का उपन्यास बनारस टाॅकिज कहानी है B.D. की। अच्छा तो आप B.D. का अर्थ नहीं जानते। चलो कोई बात नहीं, अक्सर ऐसा होता है। आप ने B.H.U. का नाम सुना है। अरे! क्या बात करते हो...ये भी नहीं सुना। इसीलिए कहते हैं बाउ साहब कि जरा इधर-उधर भी देखा कीजिएगा। (पृष्ठ-09)
         B.H.U. के B.D. में B.D. जीवी रहते हैं। अब आप पूछेंगे कि ये बी. डी. जीवी क्या बला है? रूम नंबर-73 में जाइए और जाकर पूछिए कि भगवान दास कौन थे? जवाब मिलेगा- घण्टा। (पृष्ठ-09)
   तो अब तो आप समझ गये होंगे किसकी चर्चा चल रही है।  ये भगवान दास है बाउ साहब। 'भगवानदास हाॅस्टल'। समय की मार और अंग्रेजी के भार से, जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय सिमट कर B.H.U. हुआ; ठीक उसी समय 'भगवानदास हाॅस्टल' सिमट कर B.D. होस्टल हो गया। (पृष्ठ-09)
               तो यह उपन्यास कहानी कहता है भगवान दास होस्टल में रहने वाले मित्रों की।  जो व्यक्ति विद्यार्थी जीवन में हाॅस्टल जिंदगी जी चुका है उसे इस उपन्यास में अपने जीवन की झलक नजर आयेगी। हाॅस्टल की जिंदगी में जो प्यार-मोहब्बत, मित्रों का स्नेह, आपसी झगङे वे सब इस उपन्यास में लेखक ने बुने हैं। लेकिन यह उपन्यास मात्र हाॅस्टल जीवन की कथा ही बयान नहीं करती इसके अलावा भी और बहुत कुछ कहती है, लेकिन वह सब कहा गया है भगवान दास हाॅस्टल के विद्यार्थी वर्ग के माध्यम से।
                वह क्या है उसका पता तो उपन्यास के अंत में जाकर ही पता चलता है। तब पाठक भी यही सोचता है की अच्छा कहानी यह थी। लेखक ने उपन्यास ने आरम्भ में स्पष्ट लिखा है।  हर घटना के पीछे कोई कारण होता है। संभव है कि यह घटित होते वक्त आपको दिखे; लेकिन अंततः जब यह सामने आएगा, आप सन्न रह जायेंगे।
          वह कौनसी घटना है यह तो उपन्यास पढकर ही जाना जा सकता है, लेकिन यह सत्य है की उस घटना को पढकर पाठक सन्न रह जाता है।
         192 पृष्ठ के उपन्यास में 168 पृष्ठ तक पाठक को पता तक नहीं चलता की आखिर लेखक इस उपन्यास में कहना क्या चाहता है, लेकिन पृष्ठ संख्या 168 से उपन्यास का वह भाग आरम्भ होता है जिस पर यह उपन्यास आधारित है।
         
उपन्यास में विभिन्न रंग पाठको को देखने को मिलेंगे। प्यार, गुस्सा, हास्य, व्यंग्य  आदि।
   उपन्यास में हास्यरंग भी जगह-जगह बिखरें हैं। ऐसा ही एक उदाहरण देखिए-
  दरअसल, परीक्षा में बैठने वाले अधिकतर लोगों को यह भी पता नहीं होता कि सवाल पूछा क्या गया है और जवाब लिखना क्या है? वो तो वही लिखते हैं जो उन्हें आता है। (पृष्ठ-129)
            यह तो मेरा भी व्यक्तिगत अनुभव है की विद्यार्थी वही लिखता है जो उसके दिमाग में है वह चाहे प्रश्न का उत्तर हो या न हो। ऐसा ही इस उपन्यास के पात्र करते हैं।
    .....पाण्डे सर ने हमसे कहा और आगे पढने लगे- "दूसरा केस है- Tyre vs.Tube......जी! आपने बिलकुल ठीक सुना। पार्टीज हैं, B. Tyre vs. C. Tube.....अब इस केस के फैक्ट पढ रहा हूँ- फ्लेंटिक अर्थात् वादी, टायर कंपनी में काम करता था। उसका काम टायर में हवा भरने का था। एक दिन अचानक टायर में हवा भरते वक्त ट्यूब फट गया। जिससे   सुनने  शक्ति  चली गयी। वादी ने अपनी टायर कंपनी से compensation  मांग की, जो कंपनी ने ठुकरा दी। इस पर वादी ने वाद दायर किया।" (पृष्ठ-131)

उपन्यास को विभिन्न खण्डों में  विभक्त किया गया है और प्रत्येक खण्ड का अलग से नाम है, जैसे- हम हैं कमाल के, ओये लकी लकी ओये, लगान, कोहराम, एक दिन अचानक

भाषाशैली-
     उपन्यास की भाषाशैली की बात करें तो यह परम्परागत कथा साहित्य से अलग हटकर है। उपन्यास में हालांकि सामान्य भाषा प्रयुक्त हुयी है लेकिन अंग्रेजी शब्दावली का जिस तरह से इस उपन्यास में प्रयोग हुआ है वह चिंतनीय है। आखिर लेखक इस तरह की भाषा को प्रयुक्त कर रहा है। क्या भारत में एक नयी भाषा शैली विकसित हो रही है। सामान्य बोलचाल के शब्दों तक तो सब ठीक था लेकि‌न लेखक ने पूरे के पूरे वाक्य ही अंग्रेजी भाषा और लिपि में लिख दिये।

           उपन्यास में कुछ जगह कुछ कमियां भी खटकी-

  उपन्यास प्रथम पुरुष में है लेकिन पृष्ठ संख्या ...में यह अन्य पुरुष में चला जाता है।

- उपन्यास में अंग्रेजी शब्दावली की भरमार तो है ही है, साथ में रोमन लिपि की की भी।
- अंग्रेजी में एक कहावत है- Birds of same feather flock to gether.(पृष्ठ-15)
- राजीव भी satellite love case का शिकार था। (पृष्ठ-50)
- हम कल रात को नंबर try किये थे। call detail में वही पहला नंबर था। (पृष्ठ-72)
- शिखा! Please don't mind - अगर मैं एक बात कहूँ?"- मैंने शिखा से कहा। (पृष्ठ-192)
    अब पता नहीं लेखक ने जगह-जगह इतनी अंग्रेजी शब्दावली/लिपि क्यों प्रयुक्त की है।
   शायद ही कोई ऐसा पृष्ठ हो जिसमें अंग्रेजी शब्दावली/लिपि न प्रयुक्त हो।

- उपन्यास में गालियों की संख्या ने स्वाद खराब कर दिया।  उपन्यास में गालियों का काफी प्रयोग हुआ है। अगर ये गालिया न भी होता तो भी चलता। पाठक गालियों के लिए नहीं, अच्छी कहानी के लिए पढते हैं।

निष्कर्ष-
     सत्य व्यास  का उपन्यास बनारस टाॅकिज  एक हाॅस्टल में रहने वाले कानून की पढाई करने वाले दोस्तों की कहानी कहता है।
       हालांकि उपन्यास में नयापन कुछ भी नहीं है, लेकिन उपन्यास का प्रस्तुतीकरण बहुत अच्छा है और उसी वजह से उपन्यास चर्चित भी रहा है।
        उपन्यास पूर्णतः मनोरंजक है पाठक को किसी भी स्तर पर निराश नहीं करेगा।
  पठनीय और रोचक उपन्यास है।

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उपन्यास- बनारस टाॅकिज।
ISBN-978-93-81394-99-1
लेखक- सत्य व्यास
प्रकाशक- हिंद युग्म
पृष्ठ- 192
मूल्य-140₹

प्रथम संस्करण- जनवरी 2015
नौवी आवृति- सितंबर 2017


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96. बसेरा- कुशवाहा कांत

एक प्रेम कहानी, एक दर्द कहानी।
बसेरा- कुशवाहा कांत, सामाजिक उपन्यास, पठनीय।
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कुशवाहा कांत का उपन्यास बसेरा दो युवा दिलों की प्रेम कहानी है। जो अपना प्रेम 'बसेरा' बसाना चाहते हैं। प्रेम और उसमें आयी परेशानियां, गलतफहमियां और संघर्ष की कहानी है 'बसेरा'।
        एक थी शमीम। जी हाँ! उसका नाम था शमीम, फूल सी कोमल, चन्द्रमा सी उज्ज्वल, मधु सी मिठास भरी एवं मदिरा सी मादक थी वह। यौवन मद से परिपूर्ण उसका ललितांग शरीर देखने वाले पर गजब ढाता था। (पृष्ठ-03)