Tuesday, 22 January 2019

167. सत्यानाशी- प्रतिमा जायसवाल

कुछ प्रेम कथा, कुछ समाज कथा।

सत्यानाशी- प्रतिमा जायसवाल, कहानी संग्रह

          दिल्ली विश्व मेला 2019 के दौरान कुछ नये लेखकों की पुस्तकें भी खरीदी थी, जिनमें से एक प्रतिमा जायसवाल जी का कहानी संग्रह है 'सत्यानाशी'।
वेदप्रकाश कंबोज जी का जासूसी उपन्यास 'दांव खेल, पासे पलट गये', राम पुजारी जी का 'अधूरा इंसाफ...एक और दामिनी' तथा द्वय लेखक सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' व मनीष खण्डेलवाल का उपन्यास 'रावायण- लीला आॅफ रावण' आदि उसी समय की खरीदी गयी रचनाएँ हैं।
               प्रतिमा जायसवाल, सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' और पुजारी जी की ये प्रथम रचनाएं हैं। वेदप्रकाश कंबोज जी तो सन् 1957 ई. से निरंतर लेखन कर रहे हैं।

             'सत्यानाशी' लघु- गुरु कुल बारह कहानियों का संग्रह है, सभी कहानियाँ कथ्य के स्तर पर अलग हैं। जहां इनका कथ्य और परिवेश अलग है वहीं इनमें एक बात सामान्य है वह है इनकी मार्मिकता और संवेदना। कहानियाँ पढते वक्त ऐसा लगता है जैसे ये कहानियाँ अपने आस पास के वातावरण की हो।
संग्रह की कहानियां
1. सत्यानाशी
2. कब्रिस्तान- श्मशान
3. राजनीति
4. आशिका का आशियाना
5. दिमागी अपाहिज
6. बाजार
7. कृष्णा- अर्जुन
8. चौधराइन का इस्तीफा
9. फिर मिलेंगे
10. संस्कारी सुहागरात
11. स्टेज
12. शेरा दे दिलरे दी जन्नत


"वो मुझसे जब भी मिलती थी, मेरे साथ कुछ अच्छा ही होता था, फिर भी ना जानें सब उन्हें 'सत्यानाशी' क्यों कहते थे।" (पृष्ठ-01)
            'सत्यानाशी'  इस संग्रह की प्रथम कहानी है और इसी पर इस संग्रह का नाम भी है। कहानी भारतीय समाज में‌ प्रचलित अंधविश्वास गहरी चोट करती एक सार्थक रचना है। हम लड़कियों की प्रतिभा की परख न कर लड़कों को महत्व देते हैं। लेखिका ने इस कहानी में जो छाप छोड़ी है वह प्रशंसनीय है।
कहानी बाजार भी रिश्तों पर आधारित एक अच्छी कहानी है।
      कहानी राजनीति चाहे शीर्षक से राजनैतिक लगती हो लेकिन यह एक पारिवारिक कथा है। परिस्थितियाँ बदलते ही कैसे लोग बदलते हैं यह इसी कहानी में स्पष्ट होता है। हालांकि कहानी का अंत थोड़ा फिल्मी लगता है। लेकिन कहानी एक पंक्ति भारतीय राजनीति की निकृष्टता जाहिर करती है। "इस लड़के में दम है, कैलाश जी.... ये बेरोजगार लड़के़ दंगों और आंदोलनों में बड़े काम आते हैं।" (पृष्ठ-31)


     आशिक का आशियाना
 एक एक मार्मिक रचना है। यह कहानी है माया और रोमित की। दोनों की परिस्थितियाँ उन्हें एक ऐसे मोड़ पर ले आती है जहाँ उनका मिलना और मिलकर विलग होना तय है। "हम दोनों बचपन से आशियाने के लिए तरसे हैं।" (पृष्ठ-66)
लेकिन यह आशियाना इतनी आसानी से मिलना भी संभव नहीं।

      'दिमागी अपाहिज' कहानी हमारे समाज में व्याप्त जातिवाद को परिभाषित करती एक अच्छी कहानी है। "हिम्मत देखों उस कमीने की...छोटी जाति का होकर बैंड-बाजे का शौक करेगा।" (पृष्ठ-67)। यह परिस्थिति बहुत बार समाचार पत्रों में पढने को मिलती है। समाज को इंगित करती एक और कहानी है 'क्रबिस्तान- श्मशान'।

        कृष्णा-अर्जुन इस संग्रह की एक प्रेम कथा है। इस संग्रह में और भी कई प्रेम कहानियां है लेकिन यह कहानी अन्य सभी कहानियों से बिलकुल अलग। यह कहानी 'थर्ड जेंडर' पर आधारित है और बहुत कुछ कहने में सक्षम है।
"वैसे अर्जुन तुझे नहीं लगता कि तुम दोनों नदी के दो किनारे हो, जो एक-दूसरे को देख तो सकते हैं लेकिन‌ कभी मिल नहीं सकते....।" (पृष्ठ-74)
       यह कृष्णा और अर्जुन की प्रेम कथा। कृष्णा एक थर्ड़-जेंडर' है जिसे अर्जुन प्यार करता है लेकिन पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियाँ उसके प्यार को मान्यता नहीं देती। "कृष्णा-अर्जुन अगर साथ मिल गए, तो महाभारत होगा और हमें योद्धा बनकर अपनों के खिलाफ युद्ध लड़ना पड़ेगा।" (पृष्ठ-75)
क्या कृष्णा-अर्जुन समाज से जीत पाये?

        'चौधराइन का इस्तीफा' एक छोटी सी रचना है। एक अपराध बोध से ग्रस्त व्यक्ति के जीवन को परिभाषित करती अच्छी कहानी है। ऐसी ही दो और छोटी-छोटी कहानियाँ है 'फिर मिलेंगे' और 'संस्कारी सुहागरात'। दोनों अलग- अलग स्वभाव की कहानियाँ है।
इस संग्रह की अधिकाश कहानियाँ प्रेम परक हैं। प्यार है और प्यार के साथ धोखा है‌। प्यार के दोनों रंग इस कहानी संग्रह में उपस्थित हैं।

             कहानी 'स्टेज' भी समय ले साथ बदलते संबंधों की कहानी। जीवन के स्टेज पर विभिन्न पर प्रकार के कलाकार मिलते हैं। लेकिन उनकी वास्तविकता क्या होती है यह हमें नहीं पता। जैसे स्टेज पर एक कलाकार विभिन्न भूमिका अदा करता है, वैसे ही वास्तविकता जीवन में भी वह कई भूमिकाएं अदा करने लग जाता है।
             संग्रह की अंतिम कहानी 'शेरा दे दिलरे दी जन्नत' एक अलग तरह की रोचक कहानी है। कहानी सिर्फ मनोरंजन है, जैसे खुशवंत सिंह की कहानियाँ होती। मनोरंजन, हल्का सा सस्पेंश और ढेर आनंद इसी कहानी में मिलेगा वह भी हैप्पी एंडिग के साथ। अब 'हैप्पी एंडिंग' किस का कहानी का या कहानी संग्रह का। यह तो भाई आप इस कहानी संग्रह को पढकर ही जान पायेंगे।
         कहानी संग्रह को पढ ही लीजिएगा 'Best Seller' जैसे तथाकथित शोर से दूर एक अच्छा व रोचक कहानी संग्रह है।

निष्कर्ष-
          इस संग्रह की सभी कहानियाँ मन को छू लेने वाली संवेदनशील कहानियाँ है। अधिकांश कहानियाँ आपकी आँखों को नम करने में सक्षम है।
लेखिका का यह प्रथम कहानी संग्रह है यह कहानी संग्रह पढकर ही पता चलता है, कुछ कहानियों में अनावश्यक विस्तार और कुछ में सुखद समापन लाने के लिए कहानियाँ एक स्तर से उपर नहीं उठ सकी। उम्मीद और विश्वास है लेखिका महोदया का आगामी कथा संग्रह एक परिपक्व कथा संग्रह होगा।
एक अच्छे प्रयास के लिए प्रतिमा जी को हार्दिक धन्यवाद।
पाठक वर्ग को यह कहानी संग्रह अच्छा लगेगा यह मेरा विश्वास है। पठनीय कहानियाँ है, आप भी पढें।
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पुस्तक- सत्यानाशी
लेखिका- प्रतिमा जायसवाल
प्रकाशक- nation press
मूल्य- 149₹
पृष्ठ- 118
संपर्क- nationpress.com

प्रतिमा जायसवाल जी के साथ।

Monday, 14 January 2019

166. दांव खेल, पासे पलट गये- वेदप्रकाश कांबोज

दो जासूसों की टक्कर।
दांव-खेल, पासे पलट गये- वेदप्रकाश कांबोज। जासूसी उपन्यास

नयी दिल्ली विश्व पुस्तक मेला  2019 के दौरान गुल्ली बाबा पब्लिकेशन द्वारा 06.01.2019 को वेदप्रकाश कंबोज जी के दो उपन्यास 'दांव- खेल' और 'पासे पलट गये' के संयुक्त संस्करण का विमोचन किया गया। विवरण यहाँ देखें- विश्व पुस्तक मेला- 2019                   
       इस अवसर पर हम मित्रगण भी उपस्थित थे। पुस्तक मेले से काफी पुस्तकें ली। यह उपन्यास तो खेर लेना ही था, क्योंकि वेदप्रकाश कांबोज जी द्वारा हम आमंत्रित भी थे।
                  
     वेदप्रकाश कांबोज का उपन्यास 'दांव खेल, पासे पलट गये' एक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर आधारित उपन्यास है। भारत की प्रगति को सहन न करने वाले देश भारत के आगामी विकास कार्य को समझना चाहते हैं। उसकी योजना को खत्म करना चाहते हैं।
आर्यभट।
भारतीय तकनीशियनों द्वारा रूस के सहयोग से निर्मित संतति में छोड़ा गया भारत का पहला उपग्रह।
          चीनी जासूसों को भारत के इस प्रयास के बारे में काफी देर जानकारी मिली थी और जब उन्हें इस प्रयास के बारे में जानकारी मिली तो वे कुछ नहीं कर सकते थे।
(पृष्ठ-06)
          एक बार फिर चीन को एक जानकारी मिली। "एक भारतीय शिष्टमंडल मॉस्को गया हुआ है"- चीनी बाॅस ने कहा-" ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत और रूस केcomबीच फिर कोई गुप्त समझौता होने जा रहा है........अगर ऐसा है तो हमें यह मालूम होना चाहिए कि उसकी योजना क्या है।"(पृष्ठ-08)
               इस बार भारत और रूस की जो भी योजना थी उसकी डील इरान में होनी थी। इस डील के भारतीय जासूसी विजय को नियुक्त किया गया। वहीं चीन इस डील की तह तक पहुचना चाहता था, चीन ने अपना जासूस हुचांग मैदान में उतारा।
       दोनों तरफ खतरनाक, धुरंधर और चालबाज जासूस हैं। दोनों ही एक दूसरे की शक्ति को जानते हैं। दोनों चाल पर चाल चलते हैं। दोनों को पता है जरा सी गलती पासे पलट कर रख देगी।
हुचांग दाँव खेलना चाहता था। लेकिन जब तक दुश्मन की शक्ति के बारे में मालूम न हो तब तक दाँव खेलना भी मूर्खता थी। (पृष्ठ-57)
               हुचांग,  विजय की शक्ति को पहचानता है। इसलिए उसने विजय को फंसाने के लिए चाल चल दी। लेकिन विजय भी किसी से कम न था। उसने भी चाल पर चाल चल दी। ऐसी चाल जो हुचांग के लिए भी खतरा बन गयी।
  हुचांग को लगा जैसे उसने जो जाल विजय को फँसाने के लिए तैयार किया था, उसमें वह स्वयं ही  उलझकर रह गया था। (पृष्ठ-58)
          लेकिन कम हुचांग भी न था, स्वयं विजय भी उसका लोहा मान गया। इसलिए तो विजय को कहना पड़ा तो   "....मैंने वास्तव में यह नहीं सोचा था कि यह आदमी इतना भारी निकलेगा कि हम सभी के पर काटके रख देगा।(पृष्ठ-193)
             हुचांग विजय के अकेले के बस का रोग न था‌ इसलिए विजय ने दो और साथी साथ लिए। एक तातारी और दूसरा कबाड़ी। दोनों एकदम जाहिल और मूर्ख से, बस नजर आते हैं। पर हैं दोनों रोचक आदमी। नमूना देख लीजिएगा-
"जी हाँ मैं शादी-शुदा कुँवारा हूँ।" तातारी बोला "और शादी-शुदा कुँवारा वैसे भी कुँवारे से अधिक बेचारा होता है।" (पृष्ठ-105)
 
- क्या सौदा था रूस और भारत के बीच?
- क्या हुचांग इस डील की जानकारी ले पाया?
- कबाड़ी और तातारी की वास्तविकता क्या थी?
- विजय और हुचांग की टक्कर का क्या परिणाम रहा ?

     इन प्रश्नों के उत्तर तो प्रस्तुत उपन्यास को पढकर ही मिल सकते हैं।
          उपन्यास का घटनाक्रम दो जासूस विजय और हुचांग की टक्कर और उनकी चालकियों पर आधारित हैं। दोनों जासूस एक दूसरे को जैसे टक्कर देते हैं, कैसे सफलता और असफलता से जूझते हैं।
-           
            
     उपन्यास का विस्तार बहुत ज्यादा है।‌ भारत और रूस का सौदा इरान में होना तय है और चीनी जासूस उनके पीछे हैं। कथानक इरान से निकल कर अफगानिस्तान और तुर्की तक जा पहुंचता है। कहां अफगानिस्तान, कहाँ तेहरान और कहाँ तबरिज। (पृष्ठ-118)
        उपन्यास का आरम्भ एक अच्छे कथानक से होता है लेकिन उपन्यास जैसे-जैसे आगे बढता है वैसे-वैसे ही कथानक कमजोर और धीमा होता जाता है। नायक से हटकर सह नायक कबाड़ी और तातारी पर आश्रित हो जाता है।
          उपन्यास में कोई रोचक प्रसंग नहीं जो कमजोर कथानक को सहारा से सके। अनावश्यक विस्तार भी कथानक का और नीरस बना देता है जिस पर तातारी और कबाड़ी के नीरस प्रसंग उपन्यास को आगे बढने ही नहीं देते।
             
निष्कर्ष-  
              यह उपन्यास वेदप्रकाश जी के दो उपन्यास 'दांव खेल' और 'पासे पलट गये' का संयुक्त संस्करण है। उपन्यास मूलतः एक छोटे से कथानक पर आधारित है, जिसे अनावश्यक विस्तार देकर खींचा गया है। आदि से अंत तक कहीं कोई रोचकता नहीं है।
           उपन्यास मनोरंजन के दृष्टि से पढा जा सकता है।
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उपन्यास-  दांव खेल, पासे पलट गये
लेखक-    वेदप्रकाश कांबोज
प्रकाशक- गुल्ली बाबा पब्लिकेशन
पृष्ठ-         215
मूल्य-       199₹
ISBN-      978-93-88149-52-2
Site-        gullybaba.com
लेखक-      vedprajashkamboj39@gmail.com
वेदप्रकाश कांबोज जी के साथ। उपन्यास विमोचन पर
उपन्यास का पुराना संस्करण
         

Saturday, 12 January 2019

165. रावायण- सिद्धार्थ अरोड़ा, मनीष खण्डेलवाल

अब हर घर में रावण है।

रावायण- लीला आॅफ रावण, सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर', मनीष खण्डेलवाल

                दिल्ली पुस्तक मेला-2019 के दौरान हमें भी अवसर मिला इस मेले में भ्रमण का। दिनांक 06.01.2019 को वेदप्रकाश कंबोज जी और राम पुजारी जी के उपन्यासों का 'गुल्लीबाबा पब्लिकेशन' से विमोचन था। इस कार्यक्रम में हम भी शामिल थे।
   ‌            सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' और मनीष खण्डेलवाल कृत 'रावायण- लीला आॅफ रावण' की चर्चा फेसबुक पर काफी दिनों से चल रही थी। इस अवसर पर 'राॅक पिजन' की स्टाॅल पर 'सहर जी' भी मिलना भी हो गया और उपन्यास भी खरीद लिया।

     
       'कलयुग बैठा मार कुण्डली जाऊं तो मैं कहां जाऊं,
       अब हर घर में रावण बैठा, इतने राम कहां से लाऊं'

               यह एक प्रसिद्ध भक्ति गीत की पंक्तियाँ हैं। जो हमारे समाज की वास्तविकता का चित्रण करती नजर आती हैं। आज हमारे मन में, घर में, समाज में अनेक रावण पैदा हो गये हैं। हमें वास्तविकता का पता है लेकिन हम उस वास्तविकता से मुँह चुराते नजर आते हैं। प्रस्तुत उपन्यास उसी वास्तविकता का चित्रण करता नजर आता है। हमारे दोहरे व्यक्तित्व का पर्दाफाश करता है।
                     अगर आपने हिन्दी के प्रसिद्ध रचनाकार मोहन राकेश का नाटक 'आधे-अधूरे' नाटक पढा है तो आपको याद होगा उसमें एक परिवार का बिखराव दिखाया गया है। उस परिवार के पीछे आर्थिक कारण हैं। वहीं 'रावायण' उपन्यास का परिवार एक बिजनेस मैन का परिवार है।

कहानी चाहे एक परिवार की नजर आती है लेकिन यह सत्य पूरे समाज का है।
                     हम आर्थिक दृष्टि से इतने समृद्ध होते जा रहे हैं नैतिक दृष्टि से हमारा उतना ही पतन हो रहा है।
                     यह उपन्यास आरम्भ होता है कथानायक से। "मेरा घर कुछ मामलों में बहुत रोचक था। कब, कौन किस दिन आ धमके कुछ पता नहीं चलता था.....मैं बचपन से ही सोचता आ रहा हूँ की हमारे घर को धर्मशाला क्यों नहीं कहते थे।" (पृष्ठ-08)
                     खैर इस धर्मशाला में मेरे सिवा मेरे पापा, मेरी छोटी बहन और मेरे तीन और भाई भी रहते थे....इसके बाद घर की डाॅन मेरी माँ। (पृष्ठ-08)
                     कहानी का नायक है जीतू। जिसे उसके बदतमीज व्यवहार के कारण घर से निष्कासित किया जाता है। वह कहता है-  "मैं बदतमीज हूँ इसलिए बाहर हूँ। बदचलन होता तो घर के अंदर होता।" (पृष्ठ-72)      
                     लेकिन जीतू स्वयं को पहचाना भी है। वह स्वीकार करता है अपनी कमियों, जिसे हमें छुपाना चाहते हैं।
"है मुझमें भी....इसलिए सबको बोला, पर मुझे पता है कि मेरी कमी क्या है, बाकी इसी मुगालते में जी रहें हैं कि उनमें कोई कमी ही नहीं।" (पृष्ठ-30)
                    
                     उर्मी की परिस्थितियाँ भी कुछ ऐसी होती हैं की वह घर से बाहर जाने को मजबूर हो जाती है। यहीं से दोनों शमशेर उर्फ रावण के संपर्क में आते हैं। रावण के बारे में लोगों की एक ही राय है।
"अरे वो कमीना जिसको उसकी बीवी छोड़कर चली गई थी।" (पृष्ठ-31)
                     लोगों की उसके प्रति धारणा भी यही होती है की इसका व्यक्तित्व रावण की तरह नाकारात्मक है।
                     मूलतः यह कथा हमारे आंतरिक और बाहरी व्यवहार को रेखांकित करती है। उपन्यास अंतिम चरण में इस तथ्य को बखूबी परिभाषित कर देती है की जो बाहर से अच्छा दिखता है वह जरूरी नहीं की अंदर से अच्छा हो। कुछ लोगों का बाहरी व्यक्तित्व अच्छा नहीं होता लेकिन अंदर से बहुत अच्छे होते हैं।
                     उपन्यास में उन लोगों को बेनकाब किया है जिबके हृदय में रावण रूपी विकृतियाँ विकसित हैं
                    
- कौन रावण है और कौन नहीं ?
- जीतू और उर्मी को घर से क्यों निकाला  ?
- रावण उर्फ शमशेर को लोग गलत क्यों कहते थे ?
- उर्मी और जीतू का भविष्य क्या रहा ?

इन प्रश्नों के उत्तर तो 'रावायण' उपन्यास पढने पर ही मिलेंगे।

                   इन दिनों 'नई वाली हिन्दी' नामक फण्डा खूब चल रहा है। कुछ लेखक हो रोमन को ही हिन्दी समझने लगे हैं। अगर आप 'रावायण' उपन्यास पढते हैं तो आपको इसमें नयी वाली हिन्दी का फण्डा नहीं मिलेगा। उपन्यास हिन्दी में होकर नयी वाली हिन्दी फण्डे का नकारती है। दम कहानी में होना चाहिए 'किसी फण्डे' में नहीं।
      भाषा शैली के स्तर पर उपन्यास अच्छी है। भाषा शैली सहज, सरल और प्रवाहमयी है। कहीं कोई क्लिष्ट शब्दावली नहीं है।
    रोचकता का एक उदाहरण देखिएगा  
कपि छ: फिट से निकलते कद का हाथी-ब्राण्ड बालक था। (पृष्ठ-94)

     उपन्यास के कुछ संवाद प्रभावशाली हैं।
'मैं बदतमीज हूँ इसलिए बाहर हूँ। बदचलन होता तो घर के अंदर होता।" (पृष्ठ-72)
"अपने घर की छत कभी टपकती नहीं जीतू, और टपके भी तो सुकून होता है...।" (पृष्ठ-85)
"तजुर्बा महंगी शै होता है, क ई कीमती घड़ियाँ चुकाने पर ही मिलता है।" (पृष्ठ-88)
"बात खत्म करने और बात टालने में फर्क होता है।" (पृष्ठ-89)

              उपन्यास में कहीं-कहीं हल्की सी कमियां दृष्टिगत होती हैं। एक अभाव सा महसूस होता है। कुछ एक शाब्दिक गलतियाँ भी है। लेकिन ऐसी कोई कमी नहीं है जो कथा के महत्व को प्रभावित करती हो।
          संपादन की दृष्टि से उपन्यास का प्रत्येक परिच्छेद थोड़ा नीरस सा लगता है। अगर परिच्छेद थोड़ा आगे पीछे होता तो ज्यादा अच्छा लगता।
          कुछ शाब्दिक गलतियाँ हैं, जैसे 'सब्जी' को 'सवजी' (पृष्ठ-22), 'शरारत' को 'सरारत'(पृष्ठ-22) 'अनेक' शब्द को 'अनेकों' लिखा है(पृष्ठ-77), 'ढीठ' को जगह-जगह 'ढीट' (पृष्ठ-111, )लिखा है, 'समृद्धि' को 'सम्रद्धि' (पृष्ठ-78), 'नुकसान' को 'नुक्सान'(पृष्ठ-83) लिखा है।
          ये सब सामान्य टंकण गलतियाँ है इससे कथा पर कहीं कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

   
निष्कर्ष-
            लघु कलेवर का यह उपन्यास हमारे समाज में व्याप्त दोहरे आचरण की भूमिका पर गहरा कटाक्ष करता है। हमारे अंदर के रावण का अच्छा चित्रण करता है। यह भ्रांति भी दूर करता है की हमें किसी के बाहरी व्यक्तित्व को उसकी वास्तविकता न समझें।
            उपन्यास रोचक और पठनीय है। मनोरंजन की दृष्टि से पाठक को कहीं कोई निराशा नहीं होगी।

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उपन्यास- रावायण- लीला आॅफ रावण
लेखक द्वय- सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर', मनीष खण्डेलवाल
ISBN- 978-93-87507-05-0
प्रकाशक- राॅक पिजन
पृष्ठ-142
मूल्य- 135₹
                
संपर्क-
www.rockpigeonpublication.com   

164. लल्लू- वेदप्रकाश शर्मा

एक खतरनाक साजिश...

लल्लू- वेदप्रकाश शर्मा, जासूसी उपन्यास,  रोचक, पठनीय।

               वेदप्रकाश शर्मा जी का एक बहुचर्चित उपन्यास है 'लल्लू'। जब इस उपन्यास का शीर्षक घोषित हुआ था तो पाठकवर्ग में यह चर्चा थी की यह क्या नाम हुआ?. सबसे अलग नाम था 'लल्लू'। लेकिन उपन्यास ने जो सफलता हासिल की वह स्वयं में एक कीर्तिमान स्थापित कर दिया।
तहलका मचा देने वाला वह उपन्यास जिसने हिन्दी उपन्यास मार्केट को हिलाकर रख दिया।
           कई वर्ष पूर्व यह उपन्यास पढा था एक बार फिर इस उपन्यास को पढने की इच्छा जागृत हुयी।

नीता उनकी एकमात्र पुत्री। विनाश नामक एक युवक एक दिन मिस्टर खन्ना की जान बचाकर उनके घर का एक सदस्य बन जाता है। लेकिन मिस्टर खन्ना की एकमात्र पुत्री सुनीता इस शख्स को बिलकुल भी पसंद नहीं करती और वह उसे लल्लू कह कर बुलाती है।
यह भी संयोग था की मिस्टर खन्ना मरते समय एक अजीब सी वसीयत कर गये। वसीयत अजीब इसलिए थी की सुनीता मिस्टर खन्ना की संपत्ति की मालकिन तभी बन सक सकती है जब वह लल्लू से शादी करेगी।
सुनीता तो अमित से प्यार करती थी। अमित जो हद से आगे जाकर विनाश को बोलता है- "अब मैं यही रहूंगा लल्लूराम। तुम्हारी बीवी के बेडरूम में सोया करूंगा। चाहो तो इसे चरित्रहीन सिद्ध करके तलाक ले सकते हो।" (पृष्ठ-65)
      एक दिन लल्लू को सुनीता और अमित के प्यार की भेंट चढ जाता है। लेकिन यह सब इंस्पेक्टर केकड़ा के होते हुए इतना आसान तो न था। केकड़ा एक खतरनाक इंस्पेक्टर था। उसके जिस्म पर पुलिस इंस्पेक्टर की वर्दी थी। बेहद पतला-दुबला था वह। लम्बा चेहरा, बड़े-बडे़ कान, तोते जैसा नाक और बाहर को उबली हुयी आँखें, पतले होठों के ऊपर मौजूद दो बैठी हुयी मक्खियों जैसी मूँछे उसे कुछ ज्यादा ही हास्यास्पद बनाये दे रही थी। (पृष्ठ-11)
       केकड़ा स्वयं को इस हद तक समझदार मानता है की वो कहता है- "क्या तुमने अपनी पिछली लाइफ में ऐसा पुलसिया देखा है जो मर्डर होने से पहले मर्डर स्पाॅट का निरीक्षण करने गया हो?" (पृष्ठ-71)

- मिस्टर खन्ना की हत्या कौन करना चाहता है?
- मिस्टर खन्ना इतनी अजबी वसीयत क्यों करके गये?
- अमित और सुनीता के प्रेम प्रकरण से विनाश के दिल पर क्या बीती?
- इस प्रेम कहानी का परिणाम क्या निकला?
- विमला कौन थी? विनाश उससे क्यों डरता था?
- केकड़ा जैसा खतरनाक इंस्पेक्टर क्या रंग दिखाता है?
- क्या केकड़ा वक्त से पहले सब जान जाता है या फिर वह भी कोई चाल चल रहा है?
           ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों के उत्तर तो वेदप्रकाश शर्मा के इस बहुचर्चित उपन्यास 'लल्लू' को पढकर ही मिल सकते हैं।

      उपन्यास के सभी पात्र एक से बढकर एक हैं। विनाश उर्फ लल्लू तो स्वयं में एक अजूबा है।‌ एक तरफ तो उसका नाम 'विनाश' ही खतरनाक है और दूसरी तरफ उसे लोग 'लल्लू' कहते हैं।
क्या वह वास्तव में 'लल्लू' (मूर्ख) था या वह विनाश (विनाशक) था।
केकड़ा तो पूरे उपन्यास में सभी पर भारी पड़ता है। वह भी ऐसा कर्मशील और रिश्वतखोर भी "...तो जनाब, हम भी जो खाते हैं मेहनत का खाते हैं, दिमाग का खाते हैं, भले ही दुनिया उसे रिश्वत कहती फिरे।" (पृष्ठ-119)
        लेकिन कम इंस्पेक्टर अविनाश भी नहीं है। वह तो सभी पात्रों को बुरी तरह से हिलाकर रख देता है।
उपन्यास के अन्य पात्र भी दमदार हैं।

     प्रस्तुत उपन्यास बहुत दिलचस्प है। वेदप्रकाश शर्मा को 'सस्पेंश का जादूगर या बादशाह' कहा जाता है। उस उपन्यास को पढकर पता चलता है की यह उपाधि किसनी सत्य है।
         उपन्यास आरम्भ के कुछ पृष्ठों पर अपनी पकड़ इतनी मजबूत बना लेता है की पाठक उस पकड़ से आजाद होना भी नहीं चाहता। उपन्यास का एक -एक पात्र स्वयं में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवाने सक्षम है। जब भी नया पात्र आता है तो वह एक रहस्य ही बनता है। चाहे वह विमला हो या विनाश।
     इस प्रसिद्ध उपन्यास पर फिल्म नायक अक्षय कुमार की सुपर हिट फिल्म 'सबसे बडा़ खिलाड़ी' भी बन चुकी है। यह इस उपन्यास की प्रसिद्ध का एक उदाहरण है। उपन्यास केे विषय में ज्यादा चर्चा करने का मतलब है कहानी का वास्तविक रस खत्म करना। यह उपन्यास अपने प्रकाशन दिवस से लेकर आज तक चर्चा में है। अगर आपने आज तक यह उपन्यास नहीं पढा तो एक बार अवश्य पढें। 

निष्कर्ष-
प्रस्तुत उपन्यास एक बहुत ही पेचीदा उपन्यास है। पृष्ठ दर पृष्ठ रहस्य से लिपटा यह उपन्यास पाठक को रोमांच की एक नयी दुनियां में ले जायेगा।  उपन्यास में मनोरंजन के सभी तत्व समान मात्रा में उपलब्ध हैं।     

 अगर आप रोचक, मर्डर मिस्ट्री जैसे उपन्यास पढने के इच्छुक हो तो यह उपन्यास अवश्य पढें।

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उपन्यास- लल्लू
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- तुलसी पैपर बैक्स, मेरठ
पृष्ठ- 288
मूल्य- 80₹

Friday, 4 January 2019

163. काले कुएं- अजीत कौर

 मन को छू लेने वाली संवेदनशील कहानियां।

      'काले कुएं' अजीत कौर का कहानी संग्रह है। हालांकि इससे पहले अजीत कौर जी की कोई भी रचना नहीं पढी। एक बार विकास नैनवाल जी के ब्लॉग पर अजीत कौर जी के बारे में पढा तो इनकी रचनाएँ पढने की इच्छा जगी।
           मेरे पास अजीत कौर जी का कहानी संग्रह 'काले कुएं' उपलब्ध था, समय मिलते ही पढना आरम्भ किया तो एक के बाद एक रचना में उतरता चला गया। शब्द और भाव का एक ऐसा प्रवाह है जिसमें पाठक बहता चला जाता है।
इस संग्रह में कुल 09 कहानियाँ है। सभी कहानियाँ बेहतरीन और पठनीय है।  


1. मौत अलीबाबा की
2. ना मारो
3. सूरज, चिड़ियाँ और रब्ब
4. काले कुएं
5. आक के फूल
6. बाजीगरनी

7.सन्नाटे की चीख

8. शहर या घोंघा
9. चौरासी का नवम्बर

       प्रथम कहानी मौत अलीबाबा की हमारे सिस्टम या समाजें व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करती एक सशक्त कहानी है। इस भ्रष्टाचार के अंदर भी कुल लोगों का जमीर जिंदा है। यह कहानी वर्तमान भ्रष्टाचार की तह को खोलती नजर आती है।

         कहानी 'चौरासी का नवम्बर' जो इस संग्रह की अंतिम कहानी है लेकिन मुझे सर्वाधिक इसी कहानी ने प्रभावित किया है। कहानी का आधार दिल्ली में हुए सन् 1984 के दंगे है। उन दंगों से उपजी पीड़ा को इस कहानी के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। कहानी पढने वक्त उस समय को लेखिका ने स्वयं के माध्यम से जीवंत कर दिया है। एक-एक दृश्य और घटना सजीव लगती है।
         नवंबर का महीना था। नवम्बर के शुरु के दिन थे वे। चौरासी का नवम्बर। (पृष्ठ-135)
         इस काले अतीत को जिसने भोगा है, वही इसे अच्छी तरह से समझ सकता है। लेखिका ने स्वयं इस यातना को सहा है इसलिए इनके शब्दों में चौरासी की वास्तविकता अभिव्यक्त हुयी है।
         टी.वी. पर, रेडियों पर बस मरने वाली मलिका के शब्द बार-बार बजाये जा रहे थे "मेरे खून की एक-एक बूँद..." खून-खून-खून....।(पृष्ठ-136)
           खून की ये बूंद यही नहीं बिखरी बल्कि यह पंजाब में भी बिखरी। या यूं कहें पंजाब में बिखरी खून की बूंदों का दिल्ली से गहरा संबंध है। कहानी 'ना मारो' की पृष्ठभूमि में चाहे पंजाब के काले अतीत का आतंकवाद रहा हो लेकिन कहानी में मानवीय संवेदना जिंदा है।
           वे कहते थे, मेरे भाई की हत्या आतंकवादियों ने की थी। मैं नहीं जानती। उसकी किसी से क्या दुश्मनी थी? पर हत्या तो कोई भी कर सकता  था। आतंकवादी भी और कोई दूसरा भी। (पृष्ठ-18)
            एक बहन का भाई चला गया, एक माँ का एकमात्र पुत्र चला गया।  लेकिन वह पीछे एक दर्द छोड़ गया। यह दर्द चाहे एक बहन का हो या माँ का लेकिन कहानी में उतर कर यह दर्द सभी का हो गया। माँ को अब अपने पुत्र का ही नहीं हर एक उस युवक का दर्द होता है जो 'मार दिये जाते हैं।'
               ये दोनों कहानियाँ बहुत ही संवेदनशील हैं।
   'सूरज, चिड़िया और रब्ब' मनुष्य के मनुष्य होने की कथा है। सच्चा मनुष्य वही है जो सभी के लिए जीता है। उसके लिए तो प्रत्येक जीव में ईश्वर का वास है।
   'काले कुएं' एक प्रतीकात्मक कहानी है। इस कहानी का शिल्प पक्ष बहुत मजबूत है। शब्दों का जो प्रयोग इस कहानी में लेखिका ने किया है वह प्रशंसनीय है।  चाहे कहानी में संवाद या कोई तय कथा नहीं है, मात्र प्रतीक हैं और भावनाएं हैं लेकिन प्रस्तुतीकरण बेहतरीन है।
   'आक के फूल' कहानी एक ऐसी औरत की कहानी है जिसके जीवन में अकेलापन है। निर्मल वर्मा की एक कहानी है 'परिंदे' जो अकेलेपन और विषाद की कथा है। 'आक के फूल' भी एक उसी तरह के भावों से लबरेज कथा है।
   यह कहानी है मनसुखानी और राज नामक दो स्त्रियों की। जो एक साथ एक कमरे में रहती है। जहां मनसुखानी के जीवन में अकेलापन और विषाद है वहीं राज के जीवन में आने वाली खुशियाँ उससे सहन नहीं होती।
  
कहानी 'शहर या घोंघा' अपनी जड़ों को तलाश करती एक स्त्री की कथा है। हम चाहे वक्त मे साथ कितना भी बदल जाये  लेकिन अपने अतीत विस्मृत करना मुश्किल है।

                'सन्नाटे की चीख' कहानी वर्तमान समाज का नग्न चित्रण है। अपने परिवार से ज्यादा जब व्यक्ति अपनी सफलता को महत्व देने लग जाता है तो उसका क्या हश्र होता है। यही इस कहानी में दर्शाया गया। कहानी की नायिका मिसेज मल्होत्रा, वही मिसेज मल्होत्रा जो कहानी 'आक के फूल' में हाॅस्टल वार्डन है। मिसेज मल्होत्रा हाॅस्टल वार्डन होने के साथ-साथ एक लेखिका भी है। जिसे सफलता नहीं मिली। इसी सफलता की प्राप्ति के लिए वह अपना परिवार तक तबाह कर लेती है।

        इस संग्रह की कहानियों की कई विशेषताएं हैं। प्रत्येक कहानी के पीछे एक और कहानी है वह कहानी मुख्य कहानी के आयाम को विस्तार देती नजर आती है। कहानी 'आक के फूल' की मनसुखानी के जीवन में कुछ ऐसा हुआ जिसके कारण वह पुरुष वर्ग से नफ़रत करती नजर आती है।
        कई कहानियाँ एक दूसरे से संबंध रखती हैं। कहानियों के पात्र चाहे एक दूसरी कहानी में पहुंच गये लेकिन कहानियों का भाव अलग-अलग है।
इस कहानी संग्रह के संवाद शैली की बात करें तो यह एक आकर्षण पैदा करती है, स्वयं को अपने में समाहित करती है।

           यह पुस्तक मुझे दरियागंज (दिल्ली) में प्रति रविवार को लगने वाले पुस्तक बाजार से मिली थी। यह एक बेहतरीन कहानी संग्रह है जो बहुत ही मार्मिक है।
      अगर आप कहानियाँ पढने में रुचि रखते हैं तो यह कहानी संग्रह अवश्य पढें।

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पुस्तक- काले कुएं (कहानी संग्रह)
लेखिका- अजीत कौर
प्रकाशक- किताबघर प्रकाशन
पृष्ठ-147
मूल्य- 120₹      

162. मैं जल्लाद हूँ- एन. सफी

मेजर राजन और राजेश का खतरनाक सफर....

मैं जल्लाद हूँ- एन. सफी, जासूसी उपन्यास, एक्श‌न, रोचक

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     एन. सफी का कोई भी उपन्यास मैंने पहली बार पढा है। उस उपन्यास से एन. सफी के विषय में कहीं से कोई भी जानकारी तो उपलब्ध नहीं होती। बस फेसबुक से उनके कुछ उपन्यासों की जानकारी उपलब्ध होती है। वह जानकारी आप यहाँ देख सकते हैं- एन. सफी, साहित्य देश

              प्रस्तुत उपन्यास 'मैं जल्लाद हूँ' एन. सफी का एक एक्शन प्रधान उपन्यास है। जो आदि से अंत तक एक्शन से भरपूर है, उपन्यास में सिर्फ एक्शन ही नहीं रोमांच भी भरपूर है। 

          एक विशाल जहाज तेजी से आगे बढ रहा था। चारों ओर खिली हुयी चांदनी का साम्राज्य फैला हुआ था। उस चांदनी रात में सभी लोग अपनी-अपनी मस्ती में खोये वातावरण का आनंद ले रहे थे। (प्रथम पृष्ठ से) 

            यहाँ से उपन्यास का आरम्भ होता है। इस जहाज में मेजर राजन और राजेश भी सफर कर रहे हैं। इस समय मेजर राजन इंग्लैंड अपने पिता की अथाह संपति की वसीयतनामे के सिलसिले में यात्रा कर रहे थे। (पृष्ठ-04)

            उपन्यास में कुछ ट्विस्ट आते हैं, एक ट्विस्ट खत्म होता है और दूसरा आरम्भ हो जाता है। उपन्यास अंत में स्वयं एक ट्विस्ट बन कर पाठक को सोचने को मजबूर करते हुए खत्म हो जाता है।

            उपन्यास को कुल तीन भागों में बांटा जा सकता है।

प्रथम- तूफान और जहान का पतन

             अगर उपन्यास को तीन भागों में विभक्त करें तो उपन्यास का आरम्भ जलयान से ही होता है। कुछ पृष्ठों के पश्चात ही जलयान जलमग्न हो जाता है। यहीं से राजन और राजेश अलग- अलग हो जाते हैं।

             कुछ क्षण पश्चात वहां जहाज का नामोनिशान न था। अथाह जल राशि चारों तरफ थी। विशाल सागर अपना सीना गर्व से फैलाये हुये था। (पृष्ठ-11) 

द्वितीय-  कैप्टन माइकल का जहाज

              'आप निश्चित रहें आप इस समय एक मछली मार विशेष जलयान पर यात्रा कर रहे हैं।'(पृष्ठ-12)

              प्रथम जहाज के जलमग्न होने के बाद राजेश किसी तरह बच कर, सात दिन बेहोश रहने के बाद, होश में आता है तो स्वयं को एक और जहाज में पाता है। 

              उपन्यास का यह भाग काफी रोचक है। इसमें खतरनाक विलेन और कुछ नये साथी भी हैं और एक दिन उसे राजन भी मिल जाता है। 

              कैप्टन माइकल जो एक इस जहाज का मालिक और खतरनाक स्मगलर भी है। जो लोगों को गुलाम बनाकर अपने जहाज पर काम करवाता है। राजेश और राजन को भी वह गुलाम बनाना चाहता है।

              उपन्यास का यह भाग गजब और रोचक है। कैप्टन माइकल और राजेश का द्वंद भी चलता है और अन्य जलदस्यु के साथ मुकाबला करने पर दोनों एक साथ भी हैं।

              एक दिन यह जहाज भी खत्म हो जाता है। जहाज एक भयंकर आवाज के साथ समुद्र में जल समाधि बन गया था। (पृष्ठ-70)

              किसी तरह राजन और राजेश बच जाते हैं। लेकिन एक नयी मुसीबत में फंस जाते हैं।         

तृतीय- राजन और राजेश महारानी महामाया की कैद में।

            महारानी महामाया एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी है। उसकी राजेश और राजन से पहले भी भिड़ंत हो चुकी है। 

            समुद्र से किसी तरह बच कर राजन और राजेश निकल आते हैं लेकिन महारानी महामाया के जाल में फंस जाते हैं।

- जहाज पानी में कैसे डूब गये?

- राजन और राजेश अलग-अलग कैसे हुए?

- समुद्र में राजन और राकेश कैसे मिले?

- महामाया की राजन और राजेश से क्या दुश्मनी थी?

- राजन और राजेश भारत कैसे पहुंचे?

          राजन और राजेश का यह खतरनाक सफर कैसा रहा? यह जानने के लिए इस उपन्यास को पढना पढेगा।

    उपन्यास की कहानी में कहीं तारतम्य ‌नहीं है। ऐसा कहां जा सकता है राजेश और राज‌न के सफर के दौरान कुछ खतरनाक घटनाएं घटी और उन्हीं घटनाओं को यह उपन्यास रोचक तरीके से प्रस्तुत करता है।

    लेखक की विशेषता यह रही की उपन्यास को दिलचस्प बना कर रखा है। उपन्यास में घटनाओं का प्रवाह तीव्र है जो कहीं बोरियत महसूस नहीं होने देता।

उपन्यास का शीर्षक 'मैं जल्लाद हूँ' कहीं कुछ स्पष्ट नहीं होता। पता नहीं कौन जल्लाद है।

निष्कर्ष-

            एन. सफी का प्रस्तुत उपन्यास 'मैं जल्लाद हूँ' एक एक्शन उपन्यास है। जिसमें घटनाएं तो बहुत है लेकिन कोई कहानी नहीं है। अगर यात्रा को एक कहानी मानकर चले तो भी उसमें कुछ बातें तर्कसंगत नहीं है।

            मनोरंजन की दृष्टि से यह उपन्यास एक बार पढा जा सकता है।

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उपन्यास-  मैं जल्लाद हूँ

लेखक -   एन. सफी

प्रकाशक- कंचन पॉकेट बुक्स- मेरठ

प्रकाशन- ....

पृष्ठ- 138

मूल्य-

161. मेरे प्रिय- इरा टाक

प्रिय को समर्पित कविताएं

    इरा टाक का नाम पहली बार कब सुना यह तो  याद नहीं लेकिन इतना याद जरूर है की इरा जी का पहली बार नाम 'राजस्थान पत्रिका' समाचार पत्र में ही पढा था।
    इरा जी अच्छी लेखिका के साथ-साथ एक अच्छे चित्रकार भी हैं। चित्र और कविता दोनों ही अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अच्छा माध्यम है जिसमें इरा टाक जी सफल रहे हैं।

   'मेरे प्रिय' कविता संग्रह में छोटी -छोटी कविताओं का संग्रह है, लगभग पांच से दस पंक्तियों की ये कविताएं मर्मस्पर्शी हैं।  सभी कविताएँ 'मेरे प्रिय' को संबोधित है।
                    एक कविता कहीं
                    गुम हो गी।
                    सम्भाल न सके तुम
                    मेरे प्रिय।

  इस 'प्रिय' को समर्पित इन कविताओं में आपसी प्रेम, समर्पण,  उपालंभ और नाराजगी है। लेकिन उस नाराजगी में भी प्रेम है जो इस रिश्ते को और भी ज्यादा परिपक्व करता है।

               कई बार लगता है भूला दूँ
                              मैं तुम्हें
               जैसे हम कभी मिले ही नहीं हों
                       पर ऐसा कर नहीं पाती
               मेरी हर खुशी और दुख
                       की वजह बन गए हो
                                मेरे प्रिय।

                               
              
  पुस्तक की भूमिका में प्रभात रंजन लिखते हैं- 'इरा टाक की कविताओं में 'मैं' से 'तुम' तक की यात्रा है। मैं से तुम तक की इस यात्रा के बीच निजी और सार्वजनिक का वह द्वंद्व है जो कविता का सबसे बड़ा निकष है।'

      इस संग्रह की कविताएं चाहें आकर में छोटी हैं लेकिन भावना के स्तर पर इनका विस्तार बहुत है। कविताएं अपने परिवेश की सी महसूस होती हैं। जिनके साथ सहज ही संबंध स्थापित हो जाता है।

लेखिका संपर्क-
ब्लॉग- www.eratak.blogspot.in
FB पेज- www.fb.com/merepriye

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पुस्तक- मेरे प्रिय (कविता संग्रह)
लेखिका- इरा टाक
प्रकाशक- बोधि प्रकाशन
ISBN- 978-93-83878-30-7
पृष्ठ    - 104
मूल्य  - 70₹  

Saturday, 22 December 2018

160. दहशतगर्दी- सुरेन्द्र मोहन पाठक

एक खतरनाक दहशत का खेल...
दहशतगर्दी- सुरेन्द्र मोहन पाठक

सुरेन्द्र मोहन पाठक जासूसी उपन्यास साहित्य में किसी परिचय के मोहताज नहीं है। उपन्यास पर लिखा उ‌नका नाम ही पाठक के लिए बहुत होता है।
        ‌पाठक जी मूलतः 'मर्डर मिस्ट्री ‌लेखक' हैं। लेकिन प्रस्तुत उपन्यास 'दहशतगर्दी' उनका मर्डर मिस्ट्री न होकर एक थ्रिलर उपन्यास है।
            यह उपन्यास मुख्यतः आतंकवादियों को आधार बनाकर लिखा गया है। 
"अपनी ताकत दिखाने का हमारे पास एक ही कार आमद तरीका है।"- खान गर्जा " और वो है दहशतगर्दी।" 
दहशतगर्दों का एक  टारगेट है भारत से सिंगापुर को चलने वाली लग्जरी  कन्टीनैंटल एक्सप्रेस ट्रेन को निशाना बनाना। दूसरी तरफ भारत, बांग्लादेश, फ्रांस और स्विटजरलैंड की पुलिस/जासूस/अधिकारी  है जो इन दहशतगर्दों/ आतंकवादियों के विरोध में, उनके मिशन को असफल करने में और असली अपराधी को पकड़ने के लिए सक्रिय हैं। 
    रूसी सर्कस के अंदर पी. सेनगुप्ता को मारने के लिए जो हत्यारा भेजा जाता है वह बिलकुल फिल्मी तरीका अपनाता है।  हत्यारा 'काॅमेडियन' का वेश धारण करके स्टेज पर काॅमेडी करता नजर आता है।
    एक लंबा, बहुत लंबा दृश्य/ संवाद भी देख लीजिएगा। दोपहर का वक्त था जब कलकता के ग्रैड होटल के एक डीलक्स सुइट में चार व्यक्तियों की एक मीटिंग का आयोजन था। (पृष्ठ-57) चार आदमियों का यह आयोजन पृष्ठ संख्या 57 से आरम्भ होकर पृष्ठ संख्या 74 पर जाकर खत्म होता है। इस दृश्य का अनावश्यक रूप से विस्तार दिया गया है।
            दहशतगर्दी एक थ्रिलर उपन्यास है। उपन्यास की कहानी एक ट्रेन को बम विस्फोट से उठाने की है। उपन्यास का भारी कथानक, अनावश्यक विस्तार और बोझिलपन कहानी को नीरस बना देता है।
            पहली बार पाठक जी के किसी उपन्यास को पढकर ऐसा लगा की ये उपन्यास शायद ही पाठक जी ने लिखा हो।
                उपन्यास एक बार पढा जा सकता है।
उपन्यास- दहशतगर्दी
लेखक-    सुरेन्द्र मोहन पाठक
प्रकाशक-  मनोज पब्लिकेशन
पृष्ठ-     261
मूल्य- 25₹
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      एक ऐसा षड्यंत्र जिसकी नींव पेरिस, जनेवा और सिंगापुर में रखी गयी।  जिसकी चपेट में भारत को लाने के लिए एक खतरनाक टैरेरिस्ट, एक इंटरनेशनल आर्म्स डीलर, एक प्रोफेशन किलर,  एक गद्दार इन्डस्ट्रिलिस्ट और एक वतन फरोश कर्नल एक ही थैली के चट्टे- बट्टे बने हुए थे। (उपन्यास के अंतिम आवरण पृष्ठ से)
क्या वो अपने नापाक मंसूबों में कामयाब हो सके?
       सुरेन्द्र मोहन पाठक मूलतः एक 'मर्डर मिस्ट्री लेखक' हैं, लेकिन यह उपन्यास उनके जेनर से अलग तरह का है। इसका कथानक भी ऐसा है जिसे पाठक जी ने कभी नहीं लिखा। लेखकीय में लिखा है उपन्यास मैंने लिख तो लिया है लेकिन बड़े संकोच के साथ कहना पड़ता है कि भविष्य में दोबारा शायद  कभी मैं न करुं। (पृष्ठ-05, लेखकिय)
'दहशतगर्दी' उपन्यास की कहानी कश्मीरी दहशतगर्दों पर आधारित है जो कश्मीर को भारत से अलग करने की घटिया कोशिश में असफल होने पर भारत के विभिन्न जगहों पर अपनी दहशतगर्दी फैलाना चाहते हैं।
          उपन्यास का आरम्भ ही इतना नीरस लगता है की 10-15 पृष्ठ के पश्चात ही बोरियत महसूस होने लगती है। उपन्यास बहुत ज्यादा 'भारी' सा महसूस होता है, कथानक है ही इतना भारी की पाठक को समझना ही मुश्किल हो जाता है की लेखक लिख क्या रहा है।
    कुछ दृश्य और संवाद अनावश्यक रूप से विस्तार पाकर उपन्यास को नीरस बनाने में सहायक बने हैं।
निष्कर्ष-
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Friday, 21 December 2018

159. आखरी मौका- प्रकाश भारती

लूटेरों को मिला घर वापसी का आखिरी मौका
आखरी मौका- प्रकाश भारती, थ्रिलर उपन्यास।
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प्रकाश भारती अपने समय के एक बेहतरीन उपन्यासकार रहे हैं। इनके लिखे उपन्यासों की कहानियाँ बहुत ही जबरदस्त और अलग प्रकार की होती थी। 
          प्रचलित जासूसी उपन्यासों से अलग हटकर लेखन इनकी विशेषता रही है। 'आठवां अजूबा' और 'काली डायरी' जैसे शानदार उपन्यास प्रकाश भारती जी की कलम की विशेष रचनाएँ हैं।
              प्रकाश भारती जी का उपन्यास 'आखरी मौका' एक डकैती पर आधारित उपन्यास है। बैंक डकैती तो उपन्यास के नेपथ्य में ही है वास्तव में यह उपन्यास डकैती के बाद के घटनाक्रम पर आधारित है। 
आखरी मौका- प्रकाश भारती
टीकम गढ।
      हरिपुर, नारायण गंज और निजारा नदी के उपर शान से सर उठाये खड़े पहाड़ का सबसे ज्यादा ऊँचाई वाला शहर था।
      भारी बख्तरबंद वैन नारायणगंज से अपने अगले पड़ाव टीकमगढ के लिए रवाना हुयी और प्रभावदार चढाई चढने लगी। (पृष्ठ-07)
          इस वैन को कुछ अज्ञात लूटेरे लूट लेते हैं।  पुलिस लाख कोशिश करने के बाद भी लूटेरों का पता न लगा पायी। पुलिस को लाख सिर पटकने के बाद भी नाकामियों का मुँह सेखना पड़ा। तब हकबकाये बैंक अधिकारियों ने 'क्राइम रिपोर्टर अजय' से एक समझौता किया और अजय कूट पड़ा कातिलों और लूटरों से भरी अपराध की उस दलदल में....फिर शुरु हुआ क्राइम रिपोर्टर अजय और अपराधियों के बीच एक रोमांचक व सनसनीखेज जंग.....। 

Sunday, 16 December 2018

158. डार्क नाइट- संदीप नैयर

कुण्ठा के शिकार युवक की अश्लील कथा।

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           कुछ रचनाएँ अपनी चंद पंक्तियों से ही प्रभावित कर लेती हैं। एक ललक पैदा कर देती हैं, पढने की इच्छा जगा देती हैं। जो प्रभाव शब्दों में होता है वैसा प्रभाव और किसी में नहीं होता। ऐसे ही प्रभावशाली शब्द थे संदीप नैयर जी के उपन्यास 'डार्क नाइट' के।
      ‌‌ ‌ इस उपन्यास के सूत्रधार  'काम' के शब्दों में -
      -'आखिर सौन्दर्य है क्या? क्या सौन्दर्य सिर्फ मूर्त में है? सिर्फ रंगों और आकृतियों में‌ बसा है? क्या वह सिर्फ रूप और श्रृंगार में समाया है? क्या वह दृश्य में है? या दृश्य से परे दर्शक की दृष्टि में है? या दृश्य और दृष्टि के पारस्परिक नृत्य से पैदा हुए दर्शन में है? मगर जो भी है, सौन्दर्य में एक पवित्र स्पंदन है।  सौन्दर्य हमारी आध्यात्मिक प्रेरणा होता है। हमारे मिथकों में, पुराण में, साहित्य में, सौन्दर्य किसी गाइड की तरह प्रकट होता है, जो अँधेरी राहों को जगमगाता है, पेचिदा पहेलियों को सुलझाता है, भ्राँतियों की धुंध को चीरता है, और पथिक को कठिनाइयों के कई पड़ाव पार कराता हुआ सत्य की ओर ले जाता है।'
      - इन प्रभावशाली शब्दों को पढ कर मैं सौन्दर्य के सत्य को जानने का इच्छुक हुआ।  आखिर वह सत्य क्या है? इस सौन्दर्य से परे वह कौनसा सौन्दर्य है जिसे हम समझ नहीं पाये।
      - साहित्यकार समाज का निर्माता होता है, उसकी दृष्टि आप पाठक से अलग हटकर होती है। वह पाठक को एक नया दृष्टिकोण देता है।   मैं‌ लेखक से इसलिए प्रभावित हुआ की इस उपन्यास में मात्र पढने को ही नहीं कुछ नया समझने/ सीखने को भी मिलेगा।

            यह कहानी एक एक भारतीय युवक कबीर की जो लगभग पन्द्रह वर्ष की उम्र में ब्रिटेन का निवासी हो गया। भारतीय समाज के संस्कारों में पोषित कबीर लंदन के उन्मुक्त समाज में स्वयं को सहज नहीं बना पाता और कुण्ठा का शिकार हो जाता है।
               मूलतः लेखक इस कहानी के माध्यम से एक ऐसे युवक की कहानी दर्शाना चाहता है जो एक स्वच्छंद वातावरण में आकर कैसी घुटन महसूस करता है। वह स्वयं को एक अजीब सी स्थिति में पाता है।

        हम नारी की देह, उसके रूप, और उसके श्रृंगार में ही सौन्दर्य देखते हैं, पुरुष ही नहीं, नारी भी यही करती है। मगर नारी का सौन्दर्य, उसकी देह, रुप और शृंगार से परे भी बसा होता है।
उसके सौम्य स्वभाव में, उसकी ममता में, उसकी करुणा में उसके नारीत्व की दिव्य प्रकृति में।

          ‌ इस सौन्दर्य तक कोई पहुंच भी नहीं पाता। न तो कबीर इस सौन्दर्य को समझ पाता है और न ही प्रिया, माया, हिकमा और टीना। समझ तो इस सौन्दर्य को योग गुरु 'काम' भी नहीं पाता।
         क्योंकि कबीर का जो प्रेम है वह मात्रा शारिरिक है। उसके लिए बाहरी आकर्षण महत्व रखता है। जब वह शारीरिक सौन्दर्य की पूर्ति नहीं कर पाता तो वह मानसिक कुंठा का शिकार हो जाता है। लेखक के शब्दों में कहें तो वह 'डार्क नाइट' में चला जाता है।
             आखिर डार्क नाइट है क्या? आप भी देख लीजिएगा-
'द डार्क नाइट एक मानसिक या आध्यात्मिक संकट होता है, जिसमें मनुष्य के मन में जीवन और अस्तित्व पर प्रश्न उठते हैं, जीवन जैसा है, उसके उसे मायने नहीं दिखते, जीवन को उसने जो भी अर्थ दिये होते हैं वे टूटकर बिखर जाते हैं, जीवन उसे निरर्थक लगने लगता है।"(पृष्ठ128
            लेकिन यहाँ कबीर का कोई आध्यात्मिक संकट उत्पन्न नहीं होता, उसके एक ही संकट उत्पन्न होता है वह है शारीरिक वासना की पूर्ति न होना। क्योंकि उसका प्रेम.....कबीर का प्रेम भी देख लीजिएगा‌। वह प्यार नहीं मात्र मानसिक विकृति है, जिसे अच्छे मनोचिकित्सक की जरुरत है। 'नेहा की हील्स से उठती ताजे लेदर की गंध, उसे और उत्तेजित कर गयी।(पृष्ठ-97)
        क्या किसी चमड़े से उठती बदबू (गंध) से संबंधित लड़की से प्यार होना, कहां का प्यार है। 'हील्स से उठती मादक गंध, उसे एक बार फिर मदहोश कर गई'(पृष्ठ-98)

     योग गुरु की मदद से कबीर इस डार्क नाइट से बाहर भी निकल आता है। आखिर उसने योग गुरु से क्या सीखा, आप भी पढ लीजिएगा।   वो पूरे आत्मविश्वास से किसी लड़की पर अपना प्रेम जाहिर कर सकता है, उसे आसानी से अपनी ओर आकर्षित कर अपने बिस्तर तक ला सकता है। (पृष्ठ-)186
         तो यह है डार्क नाइट या कबीर का सच। उसका प्रेम 'बिस्तर' से आगे का नहीं है। लेखक जिसे आध्यात्मिक संकट बता रहा है वह आध्यात्मिक नहीं मात्र वासना पूर्ति का संकट है।
         वह हर लड़की से यही चाहता है।     
"कबीर, क्या तुम प्रिया को बिलकुल भूल जाना चाहते हो?"- माया ने धीमी आवाज में पूछा।
" माया, मैं तुम्हें चाहता हूँ, और तुम्हारे लिए मैं सब कुछ भूलने को तैयार हूँ।"- कबीर ने भावुक स्वर में कहा। (पृष्ठ-166,67)

    कबीर ही नहीं प्रिया भी इसी प्रकार की पात्र है। "हाँ, कबीर मुझे माया से जलन हो रही है। माया में ऐसा क्या है, क्या वो मुझसे ज्यादा हाॅट है? मुझसे ज्यादा सेक्सी है? मुझसे ज्यादा सुंदर है?"(पृष्ठ-176)
               

     एक तो यह पता नहीं चलता की लेखक आखिर साबित क्या करना चाहता है। लेखक उपन्यास का आरम्भ/ लेखकीय में‌ बहुत उच्च कोटि की दार्शनिकता दिखाता है लेकिन उपन्यास की कहानी उससे जरा भी नजदीक नहीं है।  लेखक जहां देह से परे के सौन्दर्य की बात करता है लेकिन पूरा का पूरा उपन्यास मूर्त सौन्दर्य तो क्या स्त्री की नाभि से भी उपर नहीं उठ पाता।
          उपन्यास का नायक हो सकता है किसी कुण्ठा का शिकार रहा हो, उसकी दमित इच्छाएँ हो, लेकिन क्या यह लेखक का भी अनुभव है....?
          उपन्यास का नायक अपने योग गुरु से मिलता है। जी हां, योग गुरु से। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से योग आपकी कलुषित विचारधारा को भी शुद्ध कर देता है। लेकिन उपन्यास पढकर लगता है जैसे लेखक ने योग का नाम ही सुना है वह भी योगा रूप में। जहां 'भोग से समाधि की ओर' की चर्चा चलती वहीं यह उपन्यास योग से भोग की ओर संकेत करता नजर आता है।
         
             भक्तिकाल के भक्त कवि कबीर ने कहा है-
जाका गुरु भी अँधला, चेला खरा निरंध ।
अंधहि अंधा ठेलिया, दोनों कूप पडंत ।।

                                  ‌   अज्ञानी गुरु का शिष्य भी अज्ञानी ही होगा। ऐसी स्थिति में दोनों ही नष्ट होंगे।  यहाँ नायक कबीर और उसके गुरु काम, दोनों का स्वभाव एक जैसा ही है। लेखक चाहता तो कम से कम योग गुरु को तो सही दिखा सकता था लेकिन उपन्यास के अंत तक पहुंचते पहुंचते योग गुरु भी कामवासना से आगे नहीं बढ पाता।
            साहब, आप सिर्फ 'ओम' का उच्चारण ही शुद्ध रुप से करते रहो, तो भी आपका आत्मा पवित्र हो जायेगी। यहाँ तो आपने लिख दिया योग गुरु लेकिन उस गुरु को भी योग की समझ नहीं है।

उपन्यास के कुछ संवाद बहुत अच्छे और रोचक हैं। अगर उपन्यास की कोई विशेषता है तो सिर्फ संवाद हैं।

प्रेम में समर्पण का अर्थ है....अपने प्रेमी का संबल और सम्मान बनना...।(पृष्ठ-213)
-  एक औरत किसी मर्द से क्या चाहती है....थोड़ा सा प्यार, थोड़ा सा सम्मान, थोड़ी सी हमदर्दी, थोड़ा सा विश्वास। (पृष्ठ-120)

लेखक ने एक तरफ तो ब्रिटेन का स्वच्छंद वातावरण चित्रित किया है। वहीं माया और कबीर के संबंध पर लिखता है।
          आॅफिस में भी यह फुसफसाहट होने लगी थी, कि कबीर और माया के बीच कुछ गड़बड़ है। (पृष्ठ163)
          इतने स्वच्छंद वातावरण में यह फुसफुसाहट क्यों?

  उपन्यास का सच तो यह है की लेखक ने उपन्यास के लेखकीय में जो बहुत उच्च कोटि का दर्शन दर्शाया है वहाँ तक स्वयं भी पहुंच नहीं पाया।  उपन्यास नायक कबीर के शब्दों में - "कबीर ने नशे में बात कुछ गहरी ही कह दी थी, मगर उसे खुद अपनी बात का मकसद समझ में नहीं आया था।" (पृष्ठ-180)
      यह बात इस उपन्यास के लेखकीय पर सत्य साबित होती है।

   उपन्यास में अश्लील चित्रण ज्यादा है, हद से ज्यादा है। लेखक शायद अश्लीलता बेचना चाह रहा है। लेखक वह होता है जो विकृत को भी सुंदर ढंग से प्रस्तुत करे। लेकिन यहाँ तो सुंदर को विकृत ढंग से प्रस्तुत किया गया है।   किसी बुरी चीजों को एक अंग्रेजी नाम देने से उसकी सुंदरता नहीं बढती। उपन्यास को मात्र 'इरोटिक' कह देने मात्र से उसकी अश्लीलता खत्म नहीं हो जाती। यह मात्र हल्की लोकप्रियता प्राप्त करने जैसा है।

निष्कर्ष-
            यह उपन्यास एक अच्छी थीम से आरम्भ अवश्य होता है लेकिन उस पर स्थिर नहीं रह पाता। लेखक ने 'इरोटिक' शब्द देकर स्वयं को 'साहित्य का दिनेश ठाकुर' बनाने की कोशिश की है।
             यह उपन्यास अश्लीलता से आगे बढ ही नहीं पाया। बात चाहे नारी के श्रृंगार से परे की सौन्दर्य की हो लेकिन वह लेखक की नजर में सौन्दर्य नाभि से नीचे ही रहा है।
              मैं इस उपन्यास को न पढने की राय देता हूँ।
             
            हालांकि किसी एक रचना से किसी लेखन को नकारा नहीं जा सकता। संदीप नैयर जी की 'समरसिद्धा' भी एक रोचक उपन्यास बतायी जाती है। वह एक काल खण्ड की कथा है, इस तरह के उपन्यास मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। अब 'समरसिद्धा' पठन की कतार में है।

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उपन्यास- डार्क नाइट
लेखक-     संदीप नैयर
ISBN- 978-93-87390-03-4
प्रकाशक- redgrab
www.redgrabbooks.com
पृष्ठ-
मूल्य- 175₹, $8
लेखक संपर्क- info@sandeepnayyar.com

Tuesday, 11 December 2018

157. रूठी रानी- मुंशी प्रेमचंद

मान रखे तो पीव तज, पीव रखे तज मान।

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मुंशी प्रेमचन्द उपन्यास साहित्य में 'उपन्यास सम्राट' माने जाते हैं। उनकी कहानियाँ और उपन्यास इतने सरल और रोचक होते हैं की सहज ही आकर्षित कर लेते हैं।
               सामान्य परिवेश की कहानी और रोचक भाषा शैली होने के कारण मन को छूने की क्षमता रखते हैं।
               'रूठी रानी' मुंशी प्रेमचंद जी का एक ऐतिहासिक उपन्यास है, जो पहले उर्दू में लिखा गया और फिर हिंदी में। इसका प्रकाशन वर्ष 1907 है।
                   यह कहानी है जैसलमेर के रावल लूणकरण की पुत्री उमादे की। उमादे का विवाह मारवाड़ के शक्तिशाली राव मालदेव के साथ होता है।  मालदेव एक पराक्रमी और शक्तिशाली राजा है, लेकिन उसके पराक्रम पर उसके ऐब हावी हैं। इसी ऐब के चलते, नशे की हालत में वे शादी के शुभ अवसर पर एक ऐसा कुकृत्य कर बैठते हैं जो एक राजा को शोभा नहीं देता।
                         प्रथम दिवस पर ही ऐसे कुकृत्य की खबर जब रानी उमादे को पता चलती है तो वह राव मालदेव से रूठ जाती है। स्वाभिमानिनी रानी उमादे एक बार ऐसी रूठी की वह ताउम्र राजा से नाराज ही रही। इसी रूठने के कारण वह इतिहास में 'रूठी रानी' के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।
                         मान रखे तो पीव तज, पीव रखे तज मान।
                         दोमी हाथी बाँधिये एकड़ खतमो ठान।
                        
                         यह कहानी मात्र 'रूठी रानी' की नहीं है, यह राजस्थान के उस गौरवशाली अतीत का चित्रण करती है जहां योद्धा गरदन कटने के बाद भी युद्ध करते रहे।
                         एक तरफ शक्तिशाली राव मालदेव है और दूसरी तरफ विदेशी आक्रांता हुमायूँ और शेरशाह सूरी जैसे लोग हैं।   एक पराक्रमी राजा जिसके पास शेरशाह सुरी से भी ज्यादा सेना थी, लगभग सत्तर हजार सेना आखिर वह कहां मात खा गया।
          
            कम रूठी रानी भी नहीं थी। वह चाहे अपने पति से रूठी हुयी थी लेकिन मुगलों को हमेशा टक्कर देने के लिए तैयार थी। उससे शेरशाह सूरी के सेनापति को जवाब दिया-"मैं लड़ने को तैयार हूँ, तेरा जब जी चाहे, आ जा। मैं औरत हूँ तो क्या, मगर राजपूत की बेटी हूँ।"(पृष्ठ-45)      
       
                        
                        राजस्थान के राजपूत योद्धा, छलकपट न जानते थे। वे तो बस लड़ना और शत्रु को मारना जानते थे। -"हम तो शेरशाह से यहीं जमकर लड़ेंगे। वह भी तो देख कि राजपूत जमीन के लिए कैसी बेदर्दी से लड़कर जान देते हैं।"(पृष्ठ-43)
                         जब शेरशाह सूरी का इनसे सामना हुआ था सूरी को भी कहना पड़ा -"...मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की सल्तनत हाथ से गयी थी।"(पृष्ठ-43)
                         यह उपन्यास एक तरफ रूठी रानी की कथा प्रस्तुत करता है, तो दूसरी तरफ राजमहल में पनपने वाले षड्यंत्रों का भी चित्रण करता है, तीसरी तरफ यह विदेशी आक्रमणकारी और भारतीय राजाओं की आपसी द्वेष को भी प्रस्तुत करता है।
                         उपन्यास की भाषा शैली सामान्य और सहज है। कहीं कोई क्लिष्ट शब्दावली प्रयुक्त नहीं हुयी, हां, उसमें उर्दू के शब्द काफी मात्र में मिल सकते हैं।
                         अगर आपको राव मालदेव, रूठी रानी, शेरशाह सूरी को समझना है तो यह उपन्यास कुछ हद तक आपको इतिहास के उस रोचक पृष्ठ की जानकारी देगी।
                         उपन्यास अच्छा और पठनीय है। अगर ऐतिहासिक उपन्यास कोई पढना चाहता है तो यह निराश नहीं करेगा, क्योंकि उपन्यास लघु कलेवर और तेज प्रवाह का है।
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उपन्यास- रूठी रानी
लेखक- मुंशी प्रेमचंद
प्रकाशन- साहित्यागार, जयपुर
संस्करण-1989
पृष्ठ-54
मूल्य-55₹

Sunday, 9 December 2018

156. यमराज का नोटिस- विमल मित्र

तीन रोचक कहानियाँ


         विमल मित्र जी का एक छोटा सा कहानी संग्रह यमराज का नोटिस मेरे विद्यालय के पुस्तकालय में उपलब्ध था।‌ खाली समय था,  जिसका सदुपयोग पढने में किया।
    इस कहानी संग्रह में विमल मित्र जी की तीन बांगला भाषा की कहानियों का हिंदी अनुवाद है। तीनों कहानियाँ रोचक, बहुत रोचक हैं। कहानियाँ का आकार मध्यम है इसलिए पढने में ज्यादा समय नहीं लगा।
        ‌
        इस संग्रह में शामिल कहानियाँ है।
       1.  यमराज का नोटिस (यमराजेर नोटिस)
       2. चुहिया सुंदरी           (ईदुरेर स्त्रीर कथा)
       3. सबसे ताकतवर कौन (सब थेके शक्तिमान के?)

प्रथम कहानी यमराज का नोटिस एक अच्छी और भावुक कहानी कही जा सकती है। भावुकता के साथ साथ इसमें हास्य का पुट है। यह हास्य कहानी में भावुकता को हावी नहीं होने देता।

       लेखन ने लेखन शैली में भी रोचकता कायम रखी है। बड़े बाजार से भवानी पुर। भवानी पुर से बालीगंज। बालीगंज से बेहला। इस बेहला के भूमिपति बाबू के मकान पर आते ही केष्ठो बाबू बिलकुल आटे की तरह अटक गये। (पृष्ठ-3)
      यह कहानी भी केष्ठो और भूमिपति बाबू पर आधारित है।  जब यमराज का नोटिस आता है तो मनुष्य की स्थिति क्या होती है। भूमिपति बाबू के लिए यह नोटिस भी उनका नौकर केष्ठो लेकर आया था।
        क्या मालिक एक नौकर का आदेश मानेगा या नहीं?

       नौकर यमराज का नोटिस कैसे लाया?   

       
         द्वितीय कहानी चुहिया सुंदरी बचपन में पढी हुयी कहानी है। आज इस कहानी के लेखक का भी पता चल गया की यह रचना विमल मित्र जी की है।  शायद यह कहानी लगभग पाठकों ने पढी होगी।
      यह कहानी एक ऐसे चूहे की है जो एक साधु के आशीर्वाद से चूहे से बिलाव और बिलाब कुत्ता.... क्रमश: शरीर बदलता रहा लेकिन वह कभी संतुष्ट न हो सका।
      इस कहानी का अंत बहुत रोचक और अलग है। कहानी पूर्णतः हास्य पर आधारित है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से संदेश भी देती है कि ज्यादा उच्चाकांक्षा अच्छी चीज नहीं है, उसमें खतरा है।(पृष्ठ-33)

          इस संग्रह की अंतिम कहानी सबसे ताकतवर कौन है भी एक अच्छी व पठनीय कहानी है। जो बचपन में लगभग बाल पुस्तकों में पढने को मिलती थी। लेखक भी लिखता है यह कहानी बचपन में पिताजी से सुनी थी।
     यह कहानी एक साधु और कुत्ते की है। कुत्ते की इच्छा होती है सबसे ताकतवर के साथ रहने की। इसलिए वह इधर-उधर भटकता रहता है और एक दिन साधु के पास पहुंच जाता है।
     सबसे ताकतवर तो मनुष्य भी नहीं है।
     साधु बाबा ने कहा,"तुमने भूल की है। मुझसे ताकतवर जीव भी संसार में है।"
     "कौन है वह?"

    उस ताकतवर की तलाश है यह कहानी ।

इस संग्रह की तीनों कहानियाँ रोचक और पठनीय है। बच्चों के लिए अच्छा संग्रह है। अगर इस संग्रह में कुछ और कहानियाँ होती तो बहुत अच्छा था। मात्र तीन कहानियों का संग्रह बहुत छोटा होता है। वह भी जब शब्दों का आकार बढाकर इसे 64 पृष्ठ में किया गया है।
        फिर भी कहानियाँ पठनीय है।
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कहानी संग्रह- यमराज का नोटिस
लेखक- विमल मित्र
प्रकाशक- सुरुचि साहित्य, शाहदरा, दिल्ली
संस्करण- 1997
मूल्य-50₹
पृष्ठ-64

      

Saturday, 1 December 2018

155. एक खून और- सुरेन्द्र मोहन पाठक

खून और खून और खून।
एक खून और - सुरेन्द्र मोहन पाठक, रोचक मर्डर मिस्ट्री, पठनीय।
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      कुछ कहानियाँ इतनी रोचक होती हैं की वे प्रथम पृष्ठ से ही पाठक को प्रभावित कर लेती हैं। यह रोचकता जब आदि से अंत तक बनी रहे तो पाठक एक बैठक में ही पुस्तक को पढ जाना चाहता है।
        प्रस्तुत उपन्यास 'एक खून और' भी इतनी ही रोचक और दिलचस्प उपन्यास है।

            माला और सरिता अपने करोड़पति अंकल की संपत्ति की वारिस थी। अंकल की मौत के बाद दोनों के हिस्से में तीन-तीन करोड़ संपत्ति आती।
      करोड़पति माला जायसवाल से स्थानीय समाचार पत्र का खोजी पत्रकार सुनील चक्रवर्ती इंटरव्यू लेने पहुंचा।
      "....मैं तो यहाँ अपने अखबार के लिए आपका इंटरव्यू लेने आया था।"
      "अखबार! इंटरव्यू! तुम क्या चीज हो।"
      .......
      और सुनील ने अपना  विजिटिंग कार्ड निकाल कर उसकी और बढाया।"
      माया जायसवाल ने कार्ड लिया, उस पर एक सरसरी निगाह डाली और कार्ड को मेज पर उछाल दिया।
      .....
      "अभी मुझे वक्त नहीं है।  फिर आना।"
      "फिर कब?"
      "आधी रात को ।"
      "जी"
              यह थी करोड़पति बहन सरिता जायसवाल की करोड़पति बहन माला जायसवाल। सरिता शादी शुदा थी और माला अभी शादी के लिए लड़का तलाश कर रही थी। वह भी एक अजीब तरीके से।
              "और तुम्हें मेरे साथ जिंदगी भर बंधे रहने की भी जरूरत नहीं। तुम्हें सिर्फ दो तीन महिने मेरा पति बन कर रहना होगा...।"
              ........
              "दो तीन महि‌ने बाद मैं तुम्हें तलाक दे दूंगी और साथ में पच्चीस हजार रुपये बोनस दूंगी"
              तो यह थी माला जायसवाल। अजीब फितरत की मालकिन। कम सुनील चक्रवर्ती भी नहीं था। वह भी पट्ठा रात को, आधी रात को माला जायसवाल का इंटरव्यू लेने जा पहुंचा। लेकिन वहाँ तो स्थिति ही कुछ और थी।
              "ड्राइंगरूम के बीचो-बीच औंधे मुँह माला जायसवाल पड़ी थी। उसके सिर का पिछला भाग तरबूज की तरह फट गया था और उसमें से खून बह-बह कर उसकी गरदन और कंधों के आस पास जमा हो रहा था।"

              यही थी माला जायसवाल की जिंदगी, करोड़पति माला जायसवाल एक रात को अपने घर में मृत्यु पायी गयी। जिसका न कोई दुश्मन ना न कोई बैरी,न कोई बैगाना। आखिर ऐसा क्या हुआ की माला जायसवाल को कोई मौत के घटा उतार गया।

             सुरेन्द्र मोहन पाठक वर्तमान उपन्यास जगत में टाॅप मर्डर मिस्ट्री राइटर माने जाते हैं। उनके सुनील सीरिज और सुधीर सीरिज उपन्यास मर्डर मिस्ट्री होते हैं, लेकिन दोनों सीरिज का फ्लेवर अलग-अलग है। जहाँ स्वयं पाठक जी को सुनील ज्यादा पसंद हैं वहीँ मेरे जैसे ज्यादा पाठक सुधीर को पसंद करते हैं।
                 प्रस्तुत उपन्यास एक रोचक मर्डर मिस्ट्री है जो मुझे बहुत पसंद आयी‌। कुछ दिन पूर्व पाठक जी का सुनील सीरिज 'सिंगला मर्डर केस' उपन्यास पढा था, एक दम बकवास लगा। लेकिन यह उपन्यास उसके विपरीत है। वह चाहे कहानी के स्तर पर हो या पृष्ठ संख्या के स्तर पर।

                      बात करे इस उपन्यास 'एक खून और' की तो यह काफी दिलचस्प उपन्यास है। पहला कैरेक्टर उभर कर आता है माला जायसवाल का। वह भी एक अजीब तरीके से। माला शादी तो करवाना चाहती है लेकिन दो या तीन महिनों के लिए। आखिर इसके पीछे क्या कारण था?
                      माला इसी दौरान अपने घर में मृत्यु पायी जाती है और उस समय सुनील चक्रवर्ती भी वहाँ उपस्थित होता है।  
    पत्रकार सुनील इस केस को हल करता है, लेकिन यह कातिल को सहन नहीं होता। वह तो सुनील को भी धमकी दे देता है।
    सुनील को एक लिफाफा मिलता है। जिसमें लिखा था।

खुल गया।                      खुल गया।              खुल गया।
    फ्री शशान घाट
    अब आपको मरने के बाद इस बात की चिंता करने की जरूरत नहीं की आपका क्रिया कर्म कैसे होगा?
    हमारे श्मशान घाट की अनोखी आॅफर।
    फ्री लकड़ियाँ।
    फ्री कफन।
    फ्री आहुति।
    हमारी सेवाओं से आज ही लाभ उठाईये। और जल्दी से जल्दी जिंदगी से किनारा कीजिए।
    काजी दुबला बाहर के अंदेशे जैसी नियत वाले अखबार के रिपोर्टरों के लिए एडवांस बुकिंग विशेष सुविधा है।
     सुनील को ऐसी क्लासिक धमकी आज तक नहीं मिली थी।

    सुनील जैसे -जैसे सत्य के नजदीक पहुंचता जाता है वैसे -वैसे उपन्यास में रोचकता बढती जाती है, एक तरफ जहाँ उपन्यास रोचक होता है, वही सुनील के लिए और इंस्पेक्टर प्रभुदयाल के लिए परेशानियां बढती जाती हैं।
        इन परेशानियों ‌में सुनील प्रभुदयाल को फोन करता है।
  "मैं सुनील बोल रहा हूँ।"
  "अब क्या हो गया।"
  "एक खून और" सुनील बोला।

         एक खून और फिर एक खून......यह सिलसिला खतरनाक हो उठता है।
         आखिर कातिल कौन था?
         वह कत्ल क्यों कर रहा था?

   उपन्यास की मिस्ट्री अजब है। पाठक के लिए प्रथम पृष्ठ से ही रहस्य बनता जाता है। एक ऐसा रहस्य जो धीरे धीरे उलझता ही जाता है।   
   उपन्यास में पात्र भी सीमित हैं लेकिन असली कातिल को पहचानना बहुत मुश्किल है। शक सभी पर हो कसता है लेकिन सत्य की पहचान कठिन है।
        उपन्यास में सुनील के साथ यूथ क्लब के मालिक रमाकांत का किरदार भी बहुत अच्छा है, हालांकि उसको उपन्यास में ज्यादा स्पेश नहीं, स्पेश तो ज्यादा प्रभुदयाल को भी नहीं मिला। यही वजह है की उपन्यास में कसावट है। अक्सर लेखक पात्रों का अनावश्यक विस्तार देकर कहानी को धीमी कर देते हैं।
               इस उपन्यास में सीमित पात्र, दमदार कथानक, तेज रफ्तार और जबरदस्त मर्डर मिस्ट्री पाठक को प्रभावित करने में सक्षम है।
                अगर आप मर्डर मिस्ट्री पढने की इच्छा रखते हैं तो यह उपन्यास अवश्य पढें। इसमें वह सभी मनोरंजन सामग्री उपलब्ध है जो किसी पाठक को प्रभावित कर सकती है।

निष्कर्ष-   अगर आप मर्डर मिस्ट्री पढना पसंद करते हैं तो यह उपन्यास आपको अवश्य पसंद आयेगा। उपन्यास एक ऐसी मर्डर मिस्ट्री पर आधारित है जिसे हल करते-करते एक के बाद एक और खून होते चले जाते हैं।
            पाठक को तेज प्रवाह में बहा लेने जाने में सक्षम और एक ही बैठक पठनीय उपन्यास कहानी के अतिरिक्त कुछ सोचने का अवसर भी नहीं देता।
              उपन्यास रोचक, दिलचस्प और पठनीय है।
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उपन्यास - एक खून और
लेखक- सुरेन्द्र मोहन पाठक
पृष्ठ-100