Monday, 9 October 2017

67. दहशत का दौर- अनिल‌ मोहन

जुगल किशोर जैसे खतरनाक इंसान का खूनी खेल।
दहशत का दौर, थ्रिलर उपन्यास, एक्शन।

जुगल किशोर  के प्रतिशोध की कहानी।

अनिल मोहन का पात्र है जुगल किशोर।
क्या आप जुगल किशोर को जानते हैं? अरे! वही
जुगल किशोर
गुण्डा
मवाली
जेबकतरा
दस नंबरी- (पृष्ठ- 07)
और भी न जाने क्या-क्या है बदमाश।
   "छोटे- मोटे गुण्डों-बदमाशों की आँखों में धूल झोंक कर उनके माल पर हाथ साफ करना जुगल किशोर का धंधा था। वक्त आने पर इतना खतरनाक हो जाता था कि उसे देखकर सामने वाले के पसीने छूट जाते थे।"- (पृष्ठ-07)
                     बस जेबतराशने के साथ-साथ कभी कभार छोटा-मोटा हाथ भी मार लेता है। बस कमबख्त से यहीं एक गलती हो गयी। शहर के डाॅन राजबहादुर कोठारी के रुपयों पर हाथ साफ कर बैठा। अब रुपये कार में रखे थे, कार में कोई था नहीं, कार के लाॅक भी न था। जुगल किशोर के हाथों में खुजली होने लगी। अब खुजली का तो एक ही इलाज है और वह है कार में रखा रुपयों से भरा।ब्रीफकेस।
  आदमी हरामी है, दस नंबरी है, बस ब्रीफकेस उठा लिया। लेकिन वाह री किस्मत उसी समय ब्रीफकेस के रक्षकों ने जुगल किशोर को देख लिया। पर जुगल किशोर कहां किस के हाथ आने वाला था। पीछे से गोलियाँ भी चली पर, जुगल किशोर अपनी जान बचा गया पर पहचान पीछे छोङ गया।
 राजबहादुर कोठारी शहर का डाॅन, जिसके नाम से लोग कांपते है। उसके माल पर कोई हाथ साफ कर जाये। लानत है...।
बस यहीं से राजबहादुर कोठारी ने जुगल किशोर की मौत का फरमान जारी कर दिया।
अमृतपाल, कोठारी का वहशी दरिंदा है। जुगल किशोर का पता जानने के लिए अमृतपाल ने जुगल किशोर की प्रेयसी करूणा को अमानवीय यातना देकर मार दिया।
बस यहीं से...ठीक यहीं से ...ठन गयी...दोनों में ठन गयी....राजबहादुर कोठारी और जुगल किशोर में भई ठन गयी।
और जिसका परिणाम इतना भयंकर निकला की पूरा शहर कांप उठा। राजबहादुर कोठारी और शहर के दूसरे डाॅन भूपेन्द्र सिंह के ठीकाने तबाह हो गये।
जब जुगल किशोर जैसा युवक अपने प्रतिशोध लेने को उतरा तो तबाही का वह तूफान उठा जिसनें शहर से अंडरवर्ल्ड को खत्म कर दिया।
"वह खोखली धमकियां नहीं दे रहा है। उसने जो कहा है उसे वह कर दिखाने की हिम्मत रखता है। इसका अंदाज आप उसके चंद दिनों के कारनामों से लगा सकते हो। उसने ऐसे कारनामों को अंजाम दिया है कि अंडरवर्ल्ड में सनसनी फैल गयी। उस अकेले ने तबाही मचा दी।"-(पृष्ठ 194)
  कमबख्त अकेला ही दुश्मनों‌ से जा टकराया, आखिर हवा थी उसकी, सीने में दम था। तभी तो सामंत सिंह के ठिकाने पर जाकर उसके साथियों के सामने सामंत सिंह को ललकार दिया। विश्वास नहीं होता तो आप स्वयं पढ लो ये संवाद।
" साले, हरामी!"- जुगल किशोर ने धधकते स्वर में कहा, "जुगल किशोर पर गोली चलाना बच्चों का खेल नहीं है। मुझ पर गोली चलाने के लिए तेरे को अभी तगङी ट्रेनिंग की जरूरत है। क्योंकि आजकल मेरी हवा है। समझे बेटे।"- (पृष्ठ-213)

भाषा शैली  और संवाद-
  यह एक थ्रिलर उपन्यास है। जिसमें ज्यादा अच्छे संवादों की कल्पना नहीं की जा सकती।
"इंसान कभी अकेला नहीं होता। उसके साथ अपने इरादे होते हैं। कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है।"-(पृष्ठ-54)
      उपन्यास भाषा के स्तर पर प्रचलित उपन्यासों की भाषा शैली बनाये हुए है।
    एक्शन और थ्रिलर पाठकों के लिए यह एक अच्छा उपन्यास हो सकता है। कहानी के स्तर पर कुछ भी नया या याद रखने योग्य नहीं है। जुगक किशोर को हद से ज्यादा बहादुर दिखाया गया है। एक अकेला सब पर भारी।
उपन्यास में जहां पुलिस और मुजरिम के आपसी संबंधों का चित्रण है वहीं कर्तव्य को सर्वोपरि मानने वाले पुलिस वाले भी उपन्यास में उपस्थित हैं।
  उपन्यास का सार यही है कि बुराई का अंत बुरा।
  उपन्यास में छुटपुट गलतियां है लेकिन उपन्यास एक बार पढा जा सकता है।
  यह उपन्यास मुझे माउंट आबू से सूरतगढ (राजस्थान) ट्रेन से आते वक्त पाली मारवाड़ जंक्शन के एक पुस्तक विक्रेता से मिला था।
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उपन्यास-  दहशत का दौर
लेखक-    अनिल मोहन©
प्रकाशक- शिवा पॉकेट बुक्स- गांधी मार्ग, मेरठ।
प्रकाशन वर्ष- ........
पृष्ठ-       239
मूल्य-      20₹
श्रृंखला- जुगल किशोर

66. पहरेदार- अनिल मोहन

एक उपन्यास- दो कहानियाँ, एक पूरी, एक अधूरी।

अनिल मोहन द्वारा लिखित उपन्यास पहरेदार एक ऐसा उपन्यास है जिसमे दो‌ अलग-अलग कहानियाँ है जो की देवराज चौहान के कारण एक बार आपस में मिलती हैं और फिर अलग अलग हो जाती हैं।
दोनों कहानियाँ की विशेषता ये है की मुख्य कहानी जो की एक इंस्पेक्टर सूरज यादव पर केन्द्रित है तो इसी उपन्यास में संपूर्ण हो जाती है वहीं देवराज चौहान की कहानी अधूरी रह जाती है।

    पहरेदार एक ऐसे जाबांज इंस्पेक्टर की कहानी है जो सत्य के लिए गृहमंत्री तक को गोली मारने से पीछ नहीं हटता।
CBI का एक एजेंट सूरज यादव उन ‌लोगों की तलाश में है जो भारत की आंतरिक ‌सुरक्षा से जुङी महत्वपूर्ण फाइलें अन्य देशों तक पहुंचाते हैं।
इसी सिलसिले में सूरज यादव जा टकराता है देश के गृहमंत्री से भी जा कटराता है। सूरज यादव की जिंदगी का यही निर्णय, गृहमंत्री से टकराना उसके जीवन में तूफान खङा कर देता है।
  सूरज यादव गृहमंत्री पर इल्जाम तो लगा देता है पर उसे सही साबित नहीं कर पाता। इस चक्कर में उसकी नौकरी पर भी तलवार लटक जाती है और उसके मित्र इंस्पेक्टर मेहता की जान भी चली जाती है।
दूसरी तरफ गृहमंत्री से छीने गये महत्वपूर्ण कागजात भी सूरज मेहता डकैती मास्टर देवराज चौहान को गलतफहमी में सौंप देता है।
  यही से कहानी एक नया मोङ लेती है और सूरज यादव के इंस्पेक्टर मित्र की जान भी।
  अपने मित्र की मौत का बदला लेने, स्वयं को बेगुनाह साबित करने और असली मुजरिम को सामने लाने के लिए सूरज यादव जा टकराता है कानून के दुश्मनों से।
द्वितीय कहानी है देवराज चौहान द्वारा एक गोल्ड वाॅल्ट लूटने की लेकिन वह कहानी इस उपन्यास में पूर्ण नहीं होती‌।
"एक वजह से गोल्ड वाॅल्ट में आज तक  डकैती करने की किसी की हिम्मत नहीं हुयी। और वह वजह थी बीस फीट की गैलरी। सारी सुरक्षा व्यवस्था तोङकर अगर गोल्ड वाॅल्ट के भीतर पहुंच भी जाया जाए तो बीस फीट की गैलरी रूपी मौत के रास्ते को पार करके वाल्ट के उस दरवाजे तक नहीं पहुंचा जा सकता, जिसके पास करोङों अरबों की दौलत मौजूद है।"-(पृष्ठ-65)

जासूस की जिंदगी को लेकर बहुत अच्छी बात कही है-
"हम लोग जिस धंधे में हैं, उसमें तभी तक जिंदगी बची रह सकती है जब मन की बात मन में रहे। सीक्रेट एजेंट उस वक्त तलवार की धार पर बैठता है जब उसकी मूवमेंट की खबर दुश्मनों को मिलने लगती है।"- (पृष्ठ-132)

उपन्यास में कमी
- उपन्यास में अगर गलतियों की  बात करें तो बहुत ज्यादा गलतियाँ नजर आती है जो एक अच्छी कहानी को भी खराब कर देती है।
1. उपन्यास को जबरन देवराज चौहान सीरीज बनाने की कोशिश की गयी है।
2. उपन्यास में दो कहानियाँ है। मुख्य सूरज यादव की व दूसरी देवराज चौहान की।
सूरज यादव की कहानी इस उपन्यास में खत्म हो जाती है, वहीं देवराज चौहान की कहानी अधूरी रह जाती है।
3. उपन्यास में खलनायक का किरदार बहुत कम व बहुत कमजोर दिखाया गया है ।
गृहमंत्री से दुश्मनी करने वाला एक सामान्य सा  व्यक्ति बन कर रह गया।
4. सूरज यादव CBI का एक होनहार एजेंट है, पर वह गृहमंत्री वाले केस में निर्णय ऐसे लेता है जैसे कोई अतिउत्साहित नव युवक हो।
5. उपन्यास के अंत में हमशक्ल वाला जो किस्सा दिखाया गया है वह बिलकुल ही उचित नहीं लगता।
एक देश का गृहमंत्री, वह भी नकली हो, किसी का हमशक्ल हो और शासन चला रहो हो,  तो क्या वहाँ का प्रशासन, सरकार असली नकली में भेद ही नहीं कर सकती।

     अनिल मोहन का पहरेदार उपन्यास का द्वितीय भाग सुलग उठा बारूद है, लेकिन दोनों उपन्यासों में मुझे आपस में कोई तारतम्य नजर नहीं आता।
  जहां पहरेदार में सूरज यादव की कहानी खत्म हो जाती वहीं देवराज चौहान की कहानी सुलग उठा बारूद में समाप्त होती है।

समग्र दृष्टि से देखे तो कहानी के स्तर पर प्रस्तुत उपन्यास बहुत रोचक है। रोचकता भी ऐसी की पाठक कहीं भी बोरियत महसूस नहीं करता।
यहाँ तक की देवराज चौहान के आगमन से उपन्यास में रोचकता भी बढ जाती है।
 

एक पठनीय उपन्यास है। अनिल मोहन व  देवराज चौहान के प्रशंसकों के लिए यह एक पठनीय उपन्यास है।

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उपन्यास- पहरेदार
लेखक- अनिल मोहन
प्रकाशक- राजा पॉकेट बुक्स- दिल्ली
पृष्ठ- 238
मूल्य- 20₹

Sunday, 24 September 2017

65. टेक थ्री- कंवल शर्मा

कंवल शर्मा जेम्स हेडली चेइस के उपन्यासों का हिंदी अनुवाद करते-करते स्वयं भी लेखन क्षेत्र में आये। इनकी कहानी कहने की व भाषा- संवाद पर जबरदस्त व अनूठी पकङ के कारण पाठक इनसे प्रभावित होते है। प्रभावित भी इस स्तर पर की इनके उपन्यासों का इंतजार करते रहते हैं।
वन शाॅट, सैकण्ड चांस के बाद इनके तृतीय उपन्यास को भी पाठकों ने हाथो-हाथ लिया। इनके चौथे उपन्यास देवा जू का भी इंतजार है।
कंवल शर्मा के क्रमशः तीन उपन्यास वन शाॅट, सैकण्ड चांस, टेक थ्री अंकों की शृंखला से आये यह भी स्वयं में एक रोचक था, हालांकि लेखक के अनुसार उन्होंने उपन्यासों का नामकरण जानबूझकर नहीं किया यह सब कहानी की मांग के अनुसार स्वयं होता चला गया।

मात्र तीन उपन्यासों के दम पर कंवल शर्मा ने उपन्यास जगत में अपना जो स्थान स्थापित किया है, वह प्रशंसनीय है।

कहानी- उपन्यास का नायक एक बार मानसिक शांति की तलाश में सिक्किम जैसे बेहद खूबसूरत राज्य के शहर गंगटोक में घूमने जाता है।
होटल के जिस रूम में ठहरा वहाँ पर एक हादसा हुआ, हादसा यानि नायक के रूम में हत्या। और जिसका आरोप कथानायक पर आरोपित हुआ।
होटल मैनेजर, होटल के कर्मचारी, शहर का मेयर और यहाँ तक की पुलिस विभाग भी इस हत्या में कथानायक को आरोपी मानता है।
लेकिन जब कथा नायक अपनी बेगुनाही साबित करने उतरा तो कई सफेदपोश चेहरे बेनकाब होते गये।
एक छोटे से शहर से जुङे अंतरराष्ट्रीय अपराधी तक सामने आ गये जिसे अपने तरीके से कथा नायक निपटता चला गया।
- कौन है कथा नायक?
- क्यों एक पर्यटक को वहाँ के लोग अपराधी बनाने पर तुले हुए थे?
- क्यों पुलिस विभाग सही जांच नहीं कर रहा था?.
- कौन था मृतक?
- कौन था असली कातिल?
- क्यों हुयी हत्या?
ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्न है जो पाठक के मस्तिष्क में उठते हैं और उनके उत्तर तो सिर्फ कंवल शर्मा के बेहद तॆज रफ्तार उपन्यास 'टेक थ्री' में ही उपस्थित हैं।

  उपन्यास का कथानक उस तेज बरसात की तरह है जो सब कुछ अपने साथ बहाकर ले जाती है। पाठक एक बार उपन्यास आरम्भ करता है तो तेज बहाव में बहता चला जाता है। क्योंकि कथानक ही इस प्रकार का है जिसमें पाठक तो क्या स्वयं कथा नायक तक उलझ कर रह जाता है।

कहानी कई प्रकार से रोचक है।
सबसे पहली तो यही पहेली है की उपन्यास का नायक जब एक शहर में घूमने के उद्देश्य से आया तो वहाँ उसके अचानक दुश्मन कैसे पैदा हो गये।
स्वयं नायक भी यही सोचता है-
"कौन है जिसने यहाँ शहर में आते ही मुझे कत्ल के केस में फंसा दिया?"
"मैं नहीं जानता।"
"तो कौन जानता है?"
'पता कर।"
"पता ही तो कर रहा हूँ....तेरे से।" (पृष्ठ -161)
किन लोगों ने एक आदमी की हत्या कर उसे उपन्यास नायक के कमरे में शिफ्ट कर दिया।
- उपन्यास में एक छोटी सी डकैती भी है।
बहुत सख्त  सिक्योरिटी होने के बाद भी एक कैसिनो की करोङों की रकम तबाह कर दी जाती है।
- उपन्यास में सिक्किम की सबसे मजबूत जेल की सुरक्षा व्यवस्था को भी भेद दिया जाता है।
उपन्यास में ऐसे कई रोचक प्रकरण है जो पाठक का जबरदस्त मनोरंजन करते हैं। कोई भी प्रकरण या घटना में अव्यवस्थित नहीं है। सभी व्यवस्थित व क्रमबद्ध हैं।

कंवल शर्मा अपनी विशेष भाषाशैली के लिए भी जाने जाते हैं जो की इस उपन्यास में भी उपस्थित है।
"बीस की उम्र में आदमी अपनी मर्जी से फैसले करता है, तीस की उम्र में अपनी अक्ल से लेकिन चालीस की उम्र आते-आते बंदा बहादुर अपने तजुर्बों से फैसले लेने लगता है।"- (पृष्ठ-207)

उपन्यास का घटनाक्रम सिक्किम के शहर गंगटोक में घटित होता है लेकिन लेखक वहाँ का जीवंत दृश्य उपस्थित न कर सकता। अधिकतर घटनाएं होटल, कैसिनो या किसी घर में ही घटित होती हैं। गंगटोक के खूबसूरत दृश्य से पाठक वंचित रह जाता है। हालांकि प्रारंभ में एक जगह वहाँ की खूबसूरती का चित्रण है।
इसके अतिरिक्त सिक्किम या गंगटोक के भौगोलिक वातावरण का चित्रण भी कहीं नजर नहीं आता।
- उपन्यास में नायक कभी कार पर होता है तो कभी कार छोङ कर भाग जाता है। अब पता नहीं क्यों पुलिस नायक की कार को हिरासत में क्यों नहीं लेती।
लेखक की एक विशेषता यह भी है की उपन्यास में समय-समय पर वर्तमान भारत की कुछ घटनाओं का जिक्र भी किया है, जिससे भविष्य में उपन्यास के समय का पता भी लगया जा सकेगा व यह भी तय होगा की कहानी किस समय की है।
जैसे- उपन्यास नें केस लेश इंडिया,स्वच्छ भारत अभियान आदि का नाम मात्र वर्णन आता है।
इसके लिए लेखक विशेष धन्यवाद के पात्र हैं।

"ऐसे गधे खुद तो कभी कूङा, कचरा पेटी में डालेंगे नहीं लेकिन निजाम के स्वच्छ भारत अभियान के फेल होने का डंका जरूर पीट लेंगे।"- (पृष्ठ-168)

अगर समग्र रूप से कहा जाये तो कंवल शर्मा का टेक थ्री एक तेज रफ्तार व पठनीय उपन्यास है। जो पाठक को अपने से अलग नहीं होने देता।
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उपन्यास- टेक थ्री
लेखक- कंवल शर्मा
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 278
मूल्य-80₹
संपर्क-
लेखक- kanwal.k.sharma@gmail.com

64. सैकण्ड चांस- कंवल शर्मा

जिंदगी के सैकण्ड चांस की कहानी।

सैकण्ड चांस, थ्रिलर उपन्यास, पठनीय, उत्तम।
वन शाॅट के पश्चात रवि पॉकेट से प्रकाशित होने वाल यह प्रस्तुत उपन्यास सैकण्ड चांस कंवल शर्मा का द्वितीय मौलिक उपन्यास है।इनका प्रस्तुत उपन्यास सैकण्ड चांस भी एक जबरदस्त उपन्यास है। यह एक ऐसे युवक की कहानी है जिसे प्रथम बार जीवन में बहुत बुरी तरह से धोखा मिलता है लेकिन जिंदगी उसे सैकण्ड चांस भी देती है। अब पठनीय यह भी  है की वह युवक जिंदगी के सैकण्ड चांस में सफल हो पाया या फिर उसी तरह फिर फंस गया।
   जब कोई खूबसूरत बला किसी को दौलतमंद बनाने के रास्ते उसे एक मामूली फोन काॅल के बदले पांच लाख का आॅफर दे तो कौन आदमी भला मना करेगा। लेकिन फिर जब वही फोन काॅल किसी र ईस  जबर बिल्डर की इकलौती औलाद के अगवा किये जाने की साजिश का हिस्सा हो तो कोई मूढ, जङबुद्धि, अहमक या बेवकूफ ही इसमें हाथ डालेगा
   और कैजाद पैलोंजी- भूतपूर्व पत्रकार और मौजूदा एक्स-जेलबर्ड में सारी खूबियां थी। (लेखक की कलम से)
           कैजाद पैलोंजी जो की एक पत्रकार था लेकिन ईमानदरी के चलते एक जेल की सजा पा गया। जब जेल से छूट कर बाहर आया तो उसे एक आॅफर मिला। सिर्फ एक फोन काॅल करनी है और बदले में पांच करोङ रकम मिलेगी। अब कौन मूर्ख होगा जो पांच करोङ की दौलत को ठुकरा देगा।
बस यही एक फोन काॅल पत्रकार के गले की मुसीबत बन गयी। कैजांद पैलोंजी के गले एक लाश पङ गयी।
 
संवाद/ कथन
   उपन्यास के जबरदस्त संवाद के लिए लेखक कंवल शर्मा को विशेष धन्यवाद देना चाहुंगा की उन्होंने जितना अच्छा उपन्यास लिखा है, उसकी कहानी है उतने ही अच्छे उपन्यास के संवाद हैं।
जहां संवाद कहानी को रोचक बनाते हैं वहीं पात्र के विचारों को और स्वयं पात्र को भी परिभाषित करते हैं।
- वेबकूफी और अक्लमंदी में केवल एक ये महीन फर्क होता है कि अक्लमंदी की एक हद होती है। (पृष्ठ-36)
- रिश्ते टूटने में अक्सर ये सबसे बङी वजह होती है कि बाज दफा लोग टूटना पसंद करते हैं, झुकना नहीं।"- (पृष्ठ- 38)
- पैसे वाला जहां अपनी कमाई में‌ किसी को कोई हिस्सा देकर राजी नहीं, वहीं गरीब अपनी किस्मत को कोसने के अलावा अपने हाथ -पांव हिलाने को राजी नहीं । इस मुल्क में कोई संतुष्ट नहीं । यहाँ हर कोई परेशान है, हर कोई गर्म है। (पृष्ठ-40)
- शादीशुदा जिंदगी हवा में उङती उस पतंग की तरह होती है जिसे आसमान में और ऊंचा चढाने, उठाने के लिए उसकी डोर को अपनी ओर खींचना पङता है, उसे धक्का नहीं देना होता। (पृष्ठ-74)
- जब जहरीला सांप पकङना हो तो हाथ हमेशा अपने दुश्मन का इस्तेमाल करो। (पृष्ठ- 91)
- जीवन को दो ही शब्द नष्ट करते हैं- अहम और वहम। (पृष्ठ-123)
              सैकण्ड चांस उन उपन्यासों में से ही जिन्हें आपने एक बार पढना आरम्भ कर दिया तो क्लाइमैक्स पढकर ही आप किताब को बंद करोगे।
कहानी है हि इतनी जबर्दस्त की पाठक स्वयं को भूल जाता है।
      उपन्यासकार टाइगर का एक उपन्यास है आखिरी केस। यह उपन्यास पूर्णतः उसी उपन्यास पर आधारित है। पूरी कहानी वही है लेकिन लेखक ने इसमें कुछ अच्छे प्रयोग किये हैं जो इस उपन्यास को मूल उपन्यास से भी अच्छा बनाते हैं।
   बात करें इसके क्लाइमैक्स की तो इसका क्लाइमैक्स आखिरी केस उपन्यास से बहुत ही अलग है। जहां आखिरी केस वकील मोनिका पण्डित पर आधारित है और वही उस केस को हल करती है वहीं सैकण्ड चांस में वकील की पूरी भूमिका ही गायब है।
  अपने प्रयोग के तौर पर कंवल शर्मा कामयाब रहे हैं लेकिन लेखक कंवल शर्मा ने इस उपन्यास में कहीं भी टाइगर के उपन्यास आखिरी केस का वर्णन नहीं किया। यह नैतिक दृष्टि से पूर्णतः अनुचित है।
     हालांकि दोनों उपन्यास ही पठनीय है और रोचक हैं।
आखिरी केस उपन्यास की समीक्षा यहाँ उपलब्ध है।
आखिरी केस - टाइगर
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उपन्यास- सैकण्ड चांस
ISBN- 81-7789-494-3
लेखक- कंवल शर्मा
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ-317
मूल्य- 80₹

63. आखिरी केस- टाइगर

मोनिका पण्डित के पास रात के साढे तीन बजे एक आदमी आया जिसने कत्ल नहीं किया था, लेकिन फिर भी उसे झूठे कत्ल के इल्जाम में फंसाया गया। उसने अपनी सारी कहानी मोनिका पण्डित को सुनाई तो मोनिका पण्डित ने कसम खाई कि वह बाइज्जत बरी करवाएगी और अगर वह नहीं करवा सकी तो ये उसका होगा.....
                       आखिरी केस
प्यार, बेवफाई, दोस्ती, नफरत और इन्वेस्टीगेशन की एक ऐसी अनूठी दास्तान जिसे आप एक बार पढनें बैठेंगे तो जब तक आप कातिल कर बारे में न जान लेंगे आप इस उपन्यास को छोङेंगे नहीं। ( उपन्यास के अंदर के शीर्षक पृष्ठ से)
यह मोनिका पण्डित सीरीज का पांचवा उपन्यास है। 

Nakki lake- Mount Abu
कहानी-

Wednesday, 20 September 2017

62. जेल से फरार- अनिल मोहन

अपहरण की योजना पर आधारित देवराज चौहान सीरीज का एक रोमांचकारी उपन्यास।
अनिल ‌मोहन के चर्चित किरदार देवराज चौहान पर आधारित उपन्यास जेल से फरार एक अपहरण की योजना, क्रियान्विति व उसके परिणाम पर आधारित एक बहुत ही रोचक उपन्यास है।

कहानी:-
देवराज चौहान, जो की एक इश्तिहारी मुजरिम है। वह अपने सहयोगी मित्र जगमोहन के साथ मिलकर शहर के पूर्व कुख्यात डान विक्रम सिंह रंधावा के पुत्र सूरज रंधावा के अपहरण की योजना बनाता है। इस योजना में उसके साथ शहर की‌ कुख्यात लेडी डाॅन चीमा नारंग व एक अन्य अपराधी जुगल‌ किशोर साथ होते हैं।
सूरज रंधावा के अपहरण तक कहानी सामान्य चलती है पर इसके पश्चात कहानी में पल-पल, पृष्ठ दर पृष्ठ इतने रोमांचक मोङ आते हैं की पाठक कहानी के बहाव में बहता चला जाता है।
अपहरण के पश्चात भी सूरज रंधावा देवराज चौहान के हाथ से निकल जाता है और जो व्यक्ति सूरज रंधावा को ‌देवराज से छीन ले जाते हैं उनके साथ भी चोर पे मोर वाली कहावत लागू होती है।
इनके चक्कर में देवराज चौहान जेल‌ पहुंच जाता है।
लेकिन देवराज चौहान को जेल ज्यादा समय तक कैद न रख सकी।
"तुम‌? देवराज चौहान को‌ देखते ही उसका मुँह खुला रह गया।
" तुम...म तो ...जेल ‌में थे!"
"तो‌ क्या हो गया।"- देवराज चौहान हंसा- " जेल में था तो जेल ‌से फरार भी हो सकता हूँ।"
"जेल‌ से‌ फरार...?"- जयचंद भाटिया का मुँह फिर खुला‌ का ‌खुला ‌रह गया।
" हां, मैं जेल‌से फरार होकर सीधा यहाँ ही आया हूँ।"
"सी...धा......यहाँ....क्...यों?"- (पृष्ठ148)

एक करोङ की फिरौती के लिए देवराज चौहान ने विक्रम रंधावा के पुत्र का अपहरण कर उसे अपना दुश्मन भी  बना लिया और विक्रम रंधावा का पुत्र भी हाथ से निकल गया। फिरौती की जगह जेल की हवा भी खा ली।
लेकिन जब विक्रम सिंह रंधावा जैसे खुंखार पूर्व डाॅन ने देवराज चौहान को ही अपने पुत्र को सही सलामत घर पहुंचाने का काम सौंपा तो अपहरणकर्ता व दुश्मनों में खलबली मच गयी।

- किसने किया देखराज चौहान के साथ धोखा?
- किसने किया धोखेबाज से भी धोखा?
- किसने पहुंचाया देवराज चौहान को जेल?
- कैसे हुआ देवराज चौहान जेल से फरार?
- आखिर क्यों विक्रम रंधावा ने अपहरणकर्ता को ही अपने पुत्र को वापस लाने का काम सौंपा?

उपन्यास में कुछ विशेष व रोचक बातें हैं वो है सब चोर पर मोर हैं।
1. एक तो यह की अपहरण करने वालों से भी कोई अपहर्ता को छीन लेता है और फिर उनसे भी आगे कोई और व्यक्ति सूरज रंधाना को छीन लेता है। एक आदमी का तीन बार अपहरण होता है।
2. दूसरी रोचक बात ये है की यहाँ सब एक दूसरे पर गुप्त नजर रखते हैं, चोरी-चोरी पीछा किया जाता है।
एक दूसरे का पीछा करता है तो तीसरा दूसरे का।
- "यह ठीक है की करण चौधरी ने देवराज चौहान की पार्टी का पीछा बेहद सावधानी से किया था कि किसी को उनके बारे में पता न चला। परंतु जयचंद भाटिया ने उससे भी ज्यादा सावधानी बरती और करण चौधरी का पीछा किया।
  देवराज चौहान- करण चौधरी- जयचंद भाटिया।
- जुगल किशोर का पीछा जगमोहन करता है।
उपन्यास का कौनसा पात्र कब बदल जाये कुछ पता ही नहीं चलता। सब एक दूसरे को धोखा देने को तैयार बैठ हैं और मौका मिलते ही अपना रंग दिखा जाते हैं।
देवराज चौहान, जगमोहन व जुगल किशोर से चीमा नारंग धोखा करती है।
- जुगल किशोर व महेन्द्र सिंह से करण चौधरी धॊखा करता है।
- जयचंद भाटिया, बिल्ला और महेन्द्र सिंह जगमोहन से धोखा करते हैं।
- और एक जुगल किशोर है जो अपने पेशे से गद्दारी नहीं करना चाहता, पर मजबूर है।

भाषा शैली व संवाद-
     उपन्यास की भाषा शैली सामान्य है। लेखक ने कोई नया प्रयास नहीं किया, जो ठीक भी है। सभी पात्र सामान्य प्रचलित हिंदी बोलते हैं।
उपन्यास के संवाद सामान्य प्रचलित संवाद हैं कोई विशेष या याद रखने लायक नहीं।
जिस स्तर के संवाद इस प्रकार के उपन्यासों में होते हैं वही संवाद है।
"धूप ‌से सङती सङक पर पङी..."- (पृष्ठ 06)
धूप से कभी सङक सङती नहीं‌। यह एक भाषागत गलती है।
उपन्यास बहुत ही रोचक व पढने लायक है। पाठक एक बार बहाव में बह गया तो उपन्यास का समापन करके ही रहेगा।
उपन्यास में अपहरण, देवराज को जेल व प्रत्येक व्यक्ति द्वारा डबल क्राॅस करना काफी रोचक है।
नये- नये पात्रों का सामने आना व सभी का खलनायक होना भी काफी रोचक है।
       उपन्यास पढने योग्य है, मिले तो अवश्य पढें।

उपन्यास- जेल से फरार (देवराज चौहान सीरीज)
लेखक- अनिल ‌मोहन
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 208
मूल्य- 80₹
संस्करण - 2017 (द्वितीय संस्करण)

61. सिंह मर्डर केस- रमाकांत मिश्र

पुलिस के दबंग डी.एस. पी. प्रशांत सिंह के पुत्र समर्थ सिंह की उसके शादी के दिन उसी के बंगले में उसी की गाङी से कुचल कर हत्या कर दी गयी।
हत्यारे को किसी ने नहीं देखा। स्थानीय पुलिस के असफल रहने पर यह केस 'सिंह मर्डर केस' सी बी आई को सौंप दिया जाता है।
- कौन था हत्यारा?
- क्यों हुयी यह हत्या?
- क्या हत्यारा पकङा गया?
रमाकांत मिश्र की सशक्त कलम से निकली एक जबरदस्त मर्डर मिस्ट्री है - सिंह मर्डर केस।
रमाकांत मिश्र एक स्थापित व प्रसिद्ध लेखक है इससे पूर्व वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखते रहें हैं। विभिन्न विधाओं में हाथ आजमाने के पश्चात पहली बार उपन्यास क्षेत्र में आये व सफल रहे।

संपूर्ण उपन्यास 16 खण्डों में विभक्त है।
कहानी-
              अगर उपन्यास की कहानी के बात करें तो यह एक जबरदस्त मर्डर मिस्ट्री है। पुलिस के DSP के पुत्र की शादी के दिन, उसी के घर में दिन दहाङे कार से कुचल कर नृशंस तरीके से हत्या कर दी जाती है और कार चालक फरार हो जाता है। बहुत कोशिश करने के पश्चात भी पुलिस हत्यारे का पता तक नहीं लगा पाती। तब सिंह मर्डर केस की फाईल CBI को सौंप दी जाती है।
   जहां एक और DSP के पुत्र की हत्या होती है वहीं दूसरी तरफ एक अजनबी शख्स इस हत्या से पहले भी कुछ लोगों की सिलसिले वार हत्या कर रहा है।
पुलिस को जांच में कभी एक शख्स की हल्की सी पहचान मिलती है तो कभी मृतक के साथ किसी महिला का जिक्र।
- आखिर कौन है जो सिलसिलेवार हत्या कर रहा है?
- हत्यारे का क्या उद्देश्य है?
- सिलसिलेवार हत्या और DSP के पुत्र की हत्या में क्या संबंध है?
   ऐसे ही एक नहीं अनेक अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर रमाकांत मिश्र के उपन्यास सिंह मर्डर केस से ही मिलेंगे।
संवाद-
              उपन्यास के संवाद मध्यम स्तर के हैं और लगता भी है की लेखक ने सभी पात्रों को सामान्य ही रखा है लेकिन फिर भी कुछ जगहों पर याद रखने लायक संवाद उपस्थित हैं।
- क्षमा इंसान को किया जाता है, शैतानों  को नहीं ।"- (पृष्ठ- 88)
- पुलिस की ट्रेनिंग और ..लंबी नौकरी के बाद पुलिस वाला दरिंदा तो हो सकता है, पर दीवाना नहीं
"-(105)
- वो न्याय का दरबार था। पर वहाँ झूठ का बोलबाला था। सच अकेला था, असहाय था, निर्धन था और उससे किसी की सहानुभूति नहीं थी (पृष्ठ-124)
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उपन्यास की विशेषता-
- उपन्यास की कहानी रोचक व संस्पेंशपूर्ण है, पाठक को बांधे रखने में सक्षम है।
- भाषा के स्तर पर उपन्यास बहुत अच्छा है। लेखक ने प्रचलित जासूसी उपन्यासों की भाषा की जगह सार्थक हिंदी शब्दावली काम में ली है।
- आवरण चित्र के लिए हनुमेन्द्र मिश्र भी बधाई के पात्र हैं।
- कागज व मुद्रण भी अच्छे स्तर का है। वैसे भी सूरज पॉकेट बुक्स अपने उपन्यासों में अच्छी किस्म का कागज इस्तेमाल करता है।

उपन्यास में कमियाँ
उपन्यास में कुछ खामियां जो पाठक को थोङा झुंझला देती हैं।
- लेखक ने उपन्यास को ऋतुओं के आधार पर विभाजित किया है जो थोङा अजीब सा लगता है।
- तो ये गजेन्द्र सिंह का संपर्क विजय वर्मा से है जो कि वास्तव में विनोद सिंह है।- (पृष्ठ- 28)
यहाँ अकस्मात ही गजेन्द्र, विजय और विनोद सिंह का जिक्र होता है और पाठक समझ नहीं पाता की ये दो नये पात्र कहां से पैदा हो गये।
-विनोद सिंह कभी पाठक को  पुलिस वाला नजर आता है और कहीं एक बैंककर्मी।
- एक बात समझ में नहीं आती जब कत्ल वर्ष 2014, दशहरे को होता है, लेकिन विवाह की विडियोग्राफी वर्ष 2015, शिशिर (प्रथम) को सी बी आई देखती है।(पृष्ठ -109)
- उपन्यास में पृष्ठ संख्या 147 पर कातिल द्वारा कार खरीद- बेच का जिक्र सी बी आई करती है, लेकिन पूरे उपन्यास में पहले ऐसा कोई जिक्र ही नहीं आता की सी बी आई ने ऐसा प्रयास किया हो। बाद में अकस्मात भी कार क्रय-विक्रय का वर्णन आ गया। अब पता नहीं जांच कब की गयी व उनको पता कैसे चला।
 
   हालांकि प्रत्येक पाठक का दृष्टिकोण अलग-अलग होता है, और किसी एक पाठक के दृष्टिकोण को सभी पाठकों पर लागू नहीं किया जा सकता। उपन्यास के प्रति यह मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण है।
   लेकिन फिर भी यह उपन्यास पाठक को किसी स्तर पर निराश नहीं करेगा ऐसा मेरा विश्वास है, उपन्यास पठनीय है।
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कुछ खास-
प्रस्तुत उपन्यास एक रोचक व संस्पेंशफुल उपन्यास है, भाषा के स्तर पर भी इसमें अच्छा प्रयोग हुआ है जो पाठक को भी अच्छा लगेगा।
  जैसे-जैसे पाठक उपन्यास को पढता है उसके सामने रहस्य खुलते जाते हैं और वहीं नये रहस्य जुङते भी जाते हैं।
उपन्यास का समापन भावुक पर रोचक है।
- समर्पित-
रमाकांत मिश्र महान उपन्यासकार जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा के उपन्यासों के संकलन के लिए अच्छा प्रयास कर रहें हैं प्रस्तुत उपन्यास जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा को समर्पित है।


- प्रस्तुत उपन्यास की भूमिका उपन्यासकार जितेन्द्र माथुर ( कत्ल की आदत) ने लिखी है, वे लिखते हैं- "पाठक के ह्रदय तल को स्पर्श कर लेने वाला यह उपन्यास सामाजिक कथानकों को पढने में रुचि रखने वालों तथा रहस्य -रोमांच के शौकीनों, दोनों ही पाठकवर्ग की पसंद की कसौटी पर खरा उतरता है।"
       "A very powerful storyline which offers strong dialogue, details and back story in digestible chunks that don't take readers out of the story. Very good book indeed."-
                        Dr. Jyotirmany Dubey (Senior Editor and Author)
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उपन्यास - सिंह मर्डर केस
लेखक- रमाकांत मिश्र
ISBN- 978-1-944820-56-5
संस्करण- प्रथम (जून 2016)
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स
पृष्ठ- 176
मूल्य- 199₹
संपर्क-
लेखक- ramakant63@gmail.com
प्रकाशक- soorajpocketbooks@gmail.com
www.fb.com/soorajpocketbooks

Saturday, 9 September 2017

60. काली बिल्ली वाला - कैप्टन देवेश

कैप्टन देवेश द्वारा लिखित एक संस्पेंशपूर्ण उपन्यास है काली बिल्ली वाला।
एक ऐसे रहस्यमयी शख्स की कहानी है जो अपने दुश्मनों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर देता है।
  किसी मकान के पास आकर एक काली शेवरलेट गाङी तीन बार हार्न बजाती है, और थोङी देर बाद उस मकान में रहने वालों में से कोई न कोई आत्महत्या अवश्य कर लेता है।
- क्या रहस्य है काली शेवरलेट का?
- लोग क्यों आत्महत्या करते हैं?
- कौन है काली शेवरलेट को चलाने  वाला?
- क्या है उसका उद्देश्य है?
जब पुलिस विभाग के पास इस प्रकार आत्महत्या के केस आने लगे तो पुलिस के साम‌ने भी उक्त सवाल खङे हो गये।
पुलिस सुपरिडेंट दयाल, जासूस जाफरी, कैप्टन सईद आदि जब इस अनोखे प्रकरण की सत्यता पता करने निकले तो पता चला की इस सारे काण्ड के पीछे हाथ है काली बिल्ली वाले शख्स का, जो की काली शेवरलेट चलाता है।
उपन्यास की भाषा शैली अच्छी है,
लेखक ने एक-दो जगह साहित्यिक शब्दावली का प्रयोग भी किया है जो मन को छूने  वाला है।
- पश्चिम का आकाश मटमैला पङ चुका था। शाम के गाढे धुंधलकों ने धरती पर चारों तरफ अपनी बाँहें फैला दी।  बङा सा पीला चांद एक टीले पर उगी कैक्टस की झाङियों में दुबका था। (पृष्ठ-121)
- रात सङकों पर आवारागर्दी करते-करते थककर वापस जाने की तैयारियाँ कर रही थी। (पृष्ठ-114)
   कुछ अन्य रोचक संवाद भी देखिएगा।
' आई विल किल यू।'- बर्था हलक फाङ दहाङी।
" अंग्रेजी में दी गयी धमनियों की मैं बिलकुल परवाह नहीं करता मिस बर्था।"- कैप्टन हुदहुद इत्मीनान से बोला।
संपूर्ण उपन्यास को छोटे -छोटे ग्यारह खण्ङो में विभक्त किया गया है और सभी के अलग-अलग नाम है।
जैसे- आत्महत्या से पहले, सुनहरे बालों वाली लङकी, काला फोल्डर, तीसरा आदमी आदि।
   उपन्यास की कहानी एक लयबद्ध क्रम से चलती है, कहीं भी घटनाओं में हेर-फेर नहीं है। एक सीधे क्रम में लिखी गयी यह कहानी बहुत ही रोचक व सस्पेंशपूर्ण है।
  
    कैप्टन देवेश कौन है, कहां से है  और ये उपन्यास उन्होंने कब लिखा इसकी कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं होती, पर उपन्यास बहुत ही रोचक है  जो पाठक को पढने के लिए बैचेन करता है।
उपन्यास की पृष्ठ संख्या कम होना भी उपन्यास की रोचकता ही बढता है लेख‌क ने अनावश्यक कुछ भी ‌नहीं लिखा।
इस उपन्यास को पढकर लेखक के अन्य उपन्यास पढ‌ने की भी इच्छा जागी है।
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उपन्यास- काली बिल्ली वाला
ज कैप्टन देवेश
प्रकाशन- पुष्पी प्रकाशन- इलाहाबाद
पृष्ठ- 138
मूल्य-