Friday, 24 October 2025

676. राघव की वापसी - अनिल सलूजा

जम्मू के डाॅन से बलराज गोगिया की टक्कर
राघव की वापसी - अनिल सलूजा
बलराज गोगिया सीरीज-
#साठ लाख सीरीज + 

नमस्ते पाठक मित्रो,
   आज प्रस्तुत है एक्शन लेखक अनिल सलूजा जी के पात्र 'बलराज गोगिया' शृंखला के उपन्यास 'राघव की वापसी' की समीक्षा । यह एक एक्शन प्रधान और 'लंगड़ा यार / साठ लाख' शृंखला का उपन्यास है। जिसमें बलराज गोगिया, राघव और सुनीता जम्मू के एक गैंगस्टर से टकराते नजर आये हैं।
सर्वप्रथम हम  राघव की वापसी उपन्यास का प्रथम पृष्ठ पढते हैं।
                     खुली अलमारी के सामने खड़ी सुनीता ने बांये हाथ मे पकड़ी पांच-पांच सौ के नोटों की गड्डी में से बारह नोट गिन कर बाकी नोट अलमारी के लॉकर में रखे और अलमारी बन्द कर वापिस मुड़ी तो नजर सामने कुर्सी पर बैठे राघव पर पड़ी जो हाथ में पकड़े रिमोट के सामने टी.वी. का चैनल बदल रहा था।
उसकी इकलौती लटक रही टांग आगे-पीछे झूल रही थी और घुटने के पास कटी हुई दूसरी टांग कुर्सी से थोड़ी आगे निकली हुई थी।
कमरे में जहां राघव बैठा था-वहां तीन कुर्सियां और पड़ी थीं और दो कुर्सियां सामने थीं और एक उसके बाईं तरफ थी।
बीच में साधारण-सी सेंटर टेबल रखी थी।
कोने में रखा टी.वी. भी साधारण था और वो एक ऊंची टेबल पर रखा हुआ था।

Tuesday, 21 October 2025

675. मुझे मौत चाहिए - अनिल सलूजा

दिल्ली के डाॅन से बलराज गोगिया की टक्कर
मुझे मौत चाहिए - अनिल सलूजा
# साठ लाख शृंखला +
- बलराज गोगिया सीरीज- 14

  एक कातिल को ढूंढकर उस मौत के घाट उतारने का काम मिला था बलराज गोगिया को। तफ्तीश करते हुये वह आगे बढा तो उल्टा अपनी ही जान के लाले पड़ गये उसे और....
और किसने कहा था- मुझे मौत चाहिए

"नहीं... नहीं... भगवान के लिये मेरे बेटे को कुछ मत कहना... मुझ गरीब का बस एक ही बेटा है...। अगर उसे कुछ हो गया तो मेरी पत्नी रो-रो कर अपनी जान दे देगी...। त... तुम मेरी पत्नी की हालत जा कर देखो... बेटे की जुदाई में वह मरने को हो रही है।" अपने कमरे की तरफ बढ़ते बलराज गोगिया के कदम वहीं ठिठक गये।
मोहन गेस्ट हाउस के बारह नम्बर कमरे में ठहरा हुआ था वह... ।

Friday, 10 October 2025

674. शूटर- अनिल सलूजा

एक मंत्री की हत्या का मामला
शूटर- अनिल सलूजा
- बलराज गोगिया- राघव सीरीज - 05

   आज हम चर्चा कर रहे हैं अनिल सलूजा जी और बलराज गोगिया सीरीज के पांचवें उपन्यास शूटर की। यह एक एक्शन-थ्रिलर उपन्यास है। बलराज गोगिया एक महिला की सहायता के लिए मंत्री की हत्या करने मैदान में उतरता है और एक गहरी साजिश में फंस जाता है।
     आपने पिछले दो भागों में विभक्त उपन्यास 'बारूद की आंधी' और 'खूंखार' में पढा होगा की बलराज गोगिया और राघव का पासपोर्ट और वीजा तैयार है और दोनों शांति का जीवन जीने के लिए देश छोड़ने के लिए एयरपोर्ट पहुंचते हैं लेकिन वहां की विक्टर बनर्जी के धोखे के चलते पुलिस पहुँच जाती है और दोनों जान बचाकर दिल्ली छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
एक लम्बे समय पश्चात दोनों आगरा से दिल्ली पहुंचते हैं और वह भी सीधे विक्टर बनर्जी के दरवाजे पर दस्तक देते हैं।

"खट... खट... खट।"
दरवाजे पर दस्तक पड़ी।
विक्टर बनर्जी फोल्डिंग पलंग से नीचे उतरा... चप्पल पहनी और चश्मा उतारकर उसे अपनी मैली शर्ट के पल्लू से साफ करते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ा।
"कौन...?"

Sunday, 5 October 2025

672. बारूद की आंधी- अनिल सलूजा

बलराज गोगिया का तीसरा कारनामा
बारूद की आंधी- अनिल सलूजा

बलराज गोगिया सीरीज- 03

"अब क्या ख्याल है ?*
"कैसा ख्याल?"
"भई विदेश जाने का।
"वो तो जाना ही है, यहां रहा तो कभी न कभी पुलिस के हत्थे चढ़ जाऊंगा और अगर में एक बार पकड़ा गया तो इस बार कोई अवतार सिंह या इकबाल बचाने के लिए नहीं आने वाला और अदालत भी जल्द से जल्द फांसी पर चढ़ाने का हुक्मनामा जारी कर देगी।"
"एक जरिया था। एक वही दोस्त था लेकिन यह भी हरामजदगी दिखा गया।" एक लंबी सांस छोड़ते हुए राघव बोला।
"इसमें तेरा क्या कसूर था और फिर तूने उसे उसकी गद्दारी की सजा खुद अपने हाथों से दे दी थी।" बलराज गोगिया रुमाल निकालकर मुंह पौंछते हुए बोला।
     गंगानगर पुलिस के हाथों आते-आते बचे थे बलराज गोगिया और राघव अगर ऐन वक्त पर वे इन्दिरा गांधी नहर में छलांग न मार गए होते तो दोनों की लाशें, वहीं पुल पर हो बिछी नजर आती।

Friday, 3 October 2025

Monday, 29 September 2025

670. भयानक बौने- कर्नल रंजीत

विश्व पर छाया बौनों का आतंक
भयानक बौने- कर्नल रंजीत

चार और खूंख्वार जीव उस गढ़े में से निकले । उनकी शक्लें बौनों जैसी थीं । उनकी आंखें क्रोध से अंगारा बन गईं । चारों तेज़ी से उछले और दो बलदेव के सीने से और दो उसकी गर्दन से चिपट गए-जोंकों की तरह ! देखते ही देखते उसके सारे कपड़े खून से तर हो गए। वह आकाश की ओर देखने लगा । उसकी आंखें खुली की खुली रह गई थीं । उसपर अचानक विषैले खूंख्वार बौनों ने आक्रमण कर दिया था । एक सनसनीभरा उपन्यास, जिसमें मानवता के शत्रुओं का भयानक षड्यंत्र विफल हो जाता है ।

       कर्नल रंजीत अपने अनोखे कथानक और रहस्यमयी पात्रों के लिए विशेष तौर पर जाने जाते हैं। उनके उपन्यासों के कथानक मर्डर मिस्ट्री होते हुये भी बहुत अलग होते हैं और पात्र भी बहुत अजीब ।
   एक ऐसे ही अलग कथा पर आधारित उनका उपन्यास मिला है- भयानक बौने। प्रस्तुत उपन्यास ऐसे भयानक और जानलेवा चूहों पर आधारित है जो एक तरफ जहां लोगों की जान ले रहे हैं वहीं वह खाद्यान्न भी खत्म कर रहे हैं ।
ऐसे खतरनाक और जानलेवा चूहे कहां से आये ?

669. काली आंधी- कर्नल रंजीत

 मौत की आंधी और खतरनाक लूटेरे

668. देख लिया तेरा कानून- कर्नल रंजीत

ग्यारह हत्याओं की मिस्ट्री
देख लिया तेरा कानून- कर्नल रंजीत

ऐसे सफेदपोश लोगों की अजब-जब कहानी, जो शराफत, इन्सानियत, समाज सेवा का खूबसूरत चोला पहने हुए थे; लेकिन थे वे सिर तक अपराध में डूबे हुए, ढोंगी, मक्कार और घिनौने चेहरे ।
मुखौटेघारी ऐसे लोग, जो कहने को तो कानून के रखवाले थे; लेकिन वास्तव में थे कानून के भयानक दुश्मन ।
एक नौजवान जिसे अगले दिन फांसी दी जाने वाली थी जेल से फरार !
कड़ी सुरक्षा के बीच हथियारों और गोला-बारूद की चोरी, फांसी के फंदों में लटकाकर हत्याएं करने का अनोखा सनसनीखेज तरीका !
चीखते-पुकारते-कराहते बेगुनाह लोगों पर भी अत्याचार, और भी ढेरों रहस्य छिपे पड़े हैं कर्नल रंजीत के इस नये दमदार धमाके में ।

  देख लिया तेरा कानून

भयानक सपना
"नहीं -ऽ ऽ ऽ ई ऽऽ ई..!"
एक हृदयवेधी चीख रात के सन्नाटे को चीरती हुई नैनी सेण्ट्रल जेल के वार्ड नम्बर तीन की छत और दीवारों से टकराकर गूंज उठी ।

Friday, 26 September 2025

667. टेढा मकान- कर्नल रंजीत

शिलखण्डी से सावधान
टेढा मकान - कर्नल रंजीत
मेजर बलवंत सीरीज

नमस्ते पाठक मित्रो,
आज 'SVNLIBRARY' ब्लॉग पर हम लेकर उपस्थित हैं प्रसिद्ध उपन्यासकार कर्नल रंजीत के एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास 'टेढा मकान' की समीक्षा।
इस उपन्यास का घटनाक्रम उत्तर प्रदेश के शहर गाजियाबाद से संबंध रखता है।
तो चलो हम पहले उस मकान के विषय में ही पढ लेते हैं ।
गाजियाबाद के मुकुन्दनगर मुहल्ले की आठवीं गली में एक मकान था, जो एक मंजिल का होते हुए भी बहुत ऊंचा था। अधिक पुराना नहीं था, लेकिन टेढ़ा जरूर था। यह मकान एक बहुत ही कंजूस बूढ़े का था। उस कंजूस बूढ़े के बारे में यह प्रसिद्ध था कि उसके पास सोने-चांदी और हीरे-जवाहरात का विशाल भंडार है जिसकी वह रात-दिन चौकीदारी करता रहता है और जानबूझकर फटे हाल रहता है। बूढ़े की इस बनी हुई साख ने कि उसके पास सोने-चांदी और हीरे-जवाहरात का विशाल भंडार है, उसे परेशान कर रखा था । कई बार उसके घर में सेंध लगाई गई। उसके हाथ-पांव और मुंह बांधकर मकान के फर्श की खुदाई की गई। दीवारें जगह-जगह से खोद डाली गई । छतों के शहतीर टटोले गए; लेकिन हीरे-जवाहरात का भंडार किसी को नहीं मिला। चोरों के हाथ बल आठ-दस रुपये या थोड़ी-सी रेजगारी लगी। कंजूस बूढ़ा एक समय में अपने आठ-दस रुपये से अधिक नहीं रखता था। उसके संदूक में पुराने घिसे पिटे और पैबन्द लगे कपड़े भरे रहते थे, जिन्हें चोर भी चुराना अपना अपमान समझते थे । 
    उस कंजूस बूढे का नाम था देवकीनन्दन पराशर । वह स्वयं जैसा था उसे ठीक वैसा ही एक नौकर मिल गया था। उस कंजूस पराशर के नौकर को लोग विद्वान रतनू कहते थे।
एक प्रसिद्ध कंजूस और एक कथित विद्वान । दोनों का इस दुनिया में नितांत अकेले थे और यह अकेलापन उन दोनों ने मालिक नौकर बनकर दूर किया।
और एक दिन बूढा पराशर उस मकान के सबसे गंदे कमरे में एक पुरानी और टूटी हुयी कुर्सी पर मृत्यु पाया गया ।(पृष्ठ-11)
बूढा और कंजूस पराशर तो मर गया लेकिन उसके साथ ही कुछ कहानियाँ प्रचलित हो गयी।
बूढे नौकर रतनू का बयान था कि सागरचंद के भूत ने उसके मालिक को डराकर उसकी जान ली है ।(पृष्ठ-11)
अब यह सागरचंद कौन है और वह भूत कैसे बना यह भी जान लीजिए-

Friday, 5 September 2025

666. हत्यारा पुल- कर्नल रंजीत

कहानी मस्तिष्क चोर की
हत्यारा पुल- कर्नल रंजीत

एक्सीडेण्ट या हत्या
भादों की काली-अंधियारी रात में लखनऊ से आठ मील दूर बरसाती काली रात के अंधकार में लिपटे नाहर फार्म में गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। कभी-कभी बिजली कड़ककर उस सन्नाटे को भंग कर देती थी।
नाहर फार्म की मालकिन गोमती देवी अपने बेडरूम में चुपचाप लेटी हुई थीं। वह न जाने अतीत की किन यादों में खोई हुई थीं कि उन्हें पद्मा के आने तक का पता न चला।
        पद्मा गोमती देवी की पालिता पुत्री मोलिना की गवर्नेस थी, सुशिक्षित, सभ्य, शिष्ट और सुन्दर। पद्मा को रूप और गुण प्रदान करते समय तो विधाता ने कंजूसी नहीं की थी। लेकिन वह पद्मा को सुहाग देने में कृपणता कर गया। रूप और गुणों से भरपूर पद्मा विवाह के तीन वर्ष बाद ही विधवा हो गई थी। उस समय पद्मा की उम्र चौबीस साल थी। अचानक उन्हीं दिनों गोमती देवी के भाई अजयसिंह का देहान्त हो गया। अजयसिंह की पत्नी एक बच्ची को जन्म देने के एक वर्ष बाद ही स्वर्ग सिधार चुकी थीं। गोमती देवी अपने भाई की अंतिम और एकमात्र निशानी मोलिना को ले आई। क्योंकि उनका अपना कोई बच्चा न था।

       और जब मोलिना की देखभाल के लिए गवर्नेस की जरूरत पड़ी तो गोमती देवी ने इंटरव्यू के लिए आई हुई लगभग दो दर्जन महिलाओं में से पद्मा को चुन लिया।
          तब से यानी पिछले दस वर्ष से पद्मा गोमती देवी के साथ ही रह रही थी। गोमती देवी प‌द्मा के गुणों के कारण, जहां उसका सम्मान करती थीं, वहां उसके सौम्य स्वभाव के कारण उससे स्नेह भी करती थीं। प‌द्मा उनके परिवार की एक सदस्या बन गई थी। (हत्यारा पुल- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ)

Monday, 25 August 2025

665. रेत की दीवार - कर्नल रंजीत

समुद्रगुप्त की प्रेयसी मालिनी की रक्तरंजित गाथा
रेत की दीवार- कर्नल रंजीत

जासूसी उपन्यासकार कर्नल रंजीत की कलम से निकली एक रहस्य-रोमांच से परिपूर्ण कहानी जिसका संबंध सदियों  पूर्व की एक ऐसी औरत से है जो वर्तमान में रक्त से कहानी लिख रही है। जिसका प्रेम और प्रतिशोध वासना और हत्याओं में बदल जाता है।
इस रोचक उपन्यास 'रेत की दीवार' का हम आरम्भ करते हैं उपन्यास के प्रथम अध्याय 'चार लाख' से । यह अध्याय एक ऐसे युवक का जिसके पास जैसे ही धन आता है उसी के साथ बिन बुलाये, घर बैठे मुसीबतें आनी आरम्भ हो जाती हैं। जैसे ऊंट चढे को कुत्ता खा गया, जैसे होम करते वक्त हाथ जल गये।

   चार लाख रुपये
रांची के निकट पहुंचकर ट्रेन की गति धीमी हो गई थी। रेल-पटरी की मरम्मत हो रही थी।
पहले दर्जे के कम्पार्टमेण्ट में छब्बीस वर्ष का एक नवयुवक बाई सीट पर बैठा हुआ था। एक पुस्तक उसके घुटनों पर रखी हुई थी। वह पढ़ते-पढ़ते उकता गया था। अब वह सामने की सीट पर बैठे अधेड़ आयु के युगल को देख रहा था। वे सेव काटकर खा रहे थे।

Saturday, 23 August 2025

664. जानी दुश्मन- कर्नल रंजीत

एक फिल्म अभिनेत्री की हत्या
जानी दुश्मन- कर्नल रंजीत

नमस्ते पाठक मित्रो,
कर्नल रंजीत के उपन्यास पठन क्रम में एक रोचक उपन्यास मुझे मिला जिसका नाम है 'जानी दुश्मन' । यह एक रोचक उपन्यास है जो सिलसिलेवार हत्याओं पर आधारित है।

जानी दुश्मन
अभिनेत्री की हत्या
प्रियम्बदा ने अपने बाल संवारते हुए एक नजर आदम-कद नाइने पर पड़ते अपने अक्स पर डाली तो उसे लगा, वह आइने में जिस अक्स को देख रहीं है, वह अक्स उसका अपना नहीं किसी और का है। हर समय उदास और गम में डूबी-डूबी-सी आंखों में एक नई चमक थी, एक नया उल्लास था और चेहरे पर ऐसी ताजगी जैसी सुबह-सुबह खिले गुलाब के फूल की पंखुड़ियों पर दिखाई देती है। तराचे हुए सन्तरे की फांक जैसे भरे-भरे होंठों पर एक अन-चाही मुस्कान थिरक रही थी ।
और फिर अनचाहे, अनजाने वह हेमन्त के नए गीत के मुखड़े को गुनगुनाने लगी-
छलका दो मदिरा के प्याले, तन-मन की सुध-बुध खो जाए।
होंठों से यदि तुम छू दो तो । यह विष भी अमृत बन जाए।
गीत के बोल गुनगुनाते-गुनगुनाते अनायास ही उसके पांव बेडरूम के फर्श पर थिरक उठे। पैरों में पड़ी पायल के घुंघरू तालबद्ध लय में बज उठे ।
और फर्श पर थिरकते-गुनगुनाते उसने मेज पर रखा श्री-इन-वन ऑन कर दिया।