Saturday, 19 September 2026

743. दो प्रेत- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय

नैतिकता हीन राजनीति की कथा
दो प्रेत- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक
जगन- बंदूक सिंह सीरीज

दो प्रेत- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

ओमप्रकाश शर्मा जी अपने उपन्यासों में समाज का वह विद्रूप चेहरा पाठक के सामने प्रस्तुत करते हैं जिसे हम सब जानते हैं पर एक अज्ञात भय से चुप हो जाते हैं। भारतीय राजनीति में व्याप्त अनैतिकता और बाहुबल को उजागर करता है प्रस्तुत उपन्यास - दो प्रेत ।
न जाने कब तब उनका वासना और अपराधों का घृणित खेल चलता रहता - मगर एक दिन ! हां, वह एक औरत ही थी, जिसने रिपोर्ट की कि उसका पति गायब है - और..!

   उपन्यास समीक्षा से पूर्व हम उपन्यास का प्रथम पृष्ठ देखते हैं हो उसकी भूमिका भी निभाता है और ओमप्रकाश शर्मा जी की लेखन शैली की भी बात करता है।
भारत का ही एक प्रान्त !
कहीं उत्तर भारत में ही। समझ लीजिए कि प्रान्त है उत्तरांचल और राजधानी का नाम है, विक्रमपुरी और भारत का प्रत्येक नगर अथवा महानगर नदी के किनारे बसा है, तो नदी का नाम है रेणुका ।
प्रान्तीय राजधानी के इस नगर में पहुंचते हैं केन्द्रीय खुफिया विभाग के दो कुख्यात जासूस जगन और बन्दूकसिह।
        अभी पड़ाव नहीं डाला था। कार सर्वप्रथम नगर के उस पुलिस स्टेशन के प्रांगण में रोकी गई, जिसका क्षेत्र था विधान सभा, विधान परिषद मंत्रियों के आवास । विधायकों और सरकारी अफसरों के घरोंदे।
पुलिस स्टेशन के इंचार्ज मिस्टर महावीरसिंह ने परिचय पाकर कुछ अधिक ही उत्साह प्रदर्शित किया । आदरपूर्वक बैठाने के बाद पूछा- "यह कहिए कि क्या लीजिएगा ? चाय या कॉफी ?"
- "सोचने का समय दीजिए।" जगन ने कहा ।
"जी ?"
- "जी हां, थोड़ी बातचीत कर लें, इस बीच सोचने का अवसर भी मिल जाएगा ।" जगन ने एक फाइल खोलकर अपने सम्मुख रखते हुए कहा "क्या यह सही है कि आपने श्रीमती कावेरी की रिपोर्ट लिखने से इन्कार कर दिया था?"
"जी ।"
"सचमुच आप महावीरसिंह हैं। सच्चाई को बहादुरी के साथ आज के जमाने में कौन स्वीकार करता है।"
- "जी मैं नाम का ही महावीरसिंह हूं, वास्तव में मेरा नाम अब चूहासिंह हो जाना चाहिए ।"
- "ऐसा ?" जगन मुस्कराया ।
- "जी-बिल्कुल ऐसा। सच्चाई है कि मेरी स्थिति उस वस्तु जैसी है, जिसे कद्दूकस में कसा जाना हो।"
(दो प्रेत- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा, प्रथम पृष्ठ)
  नमस्ते पाठक मित्रो,
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी अपने विशेष लेखन के लिए जाने जाते हैं‌ । उनकी एक विशेष शैली, धीमा कथानक, ज्यादा बातें और अहिंसक जासूस । जासूस भी ऐसे जो थप्पड़ भी न मारें और अपना काम भी सफल कर लेते हैं।
       ओमप्रकाश शर्मा जी के दो प्रसिद्ध और बातूनी पात्र हैं जगन और बंदूक सिंह । इन दोनों पात्रों का यह रोचक उपन्यास है 'दो प्रेत'।
अब चलते हैं मूल कथानक पर...
आज से तेइस दिन पहले !
तब जबकि सारा विधान सभा हॉल चौंक पड़ा था।
चन्द्रकान्त ने, विरोधी दल के नेता के रूप में एक ध्यानाकर्षण प्रस्ताव रखा था उसी प्रस्ताव पर चन्द्रकान्त ने बोलते हुए कहा था
प्रस्ताव था-माननीय सिचाई मंत्री श्री जगेशचन्द्र जी यह
बताने की कृपा करें कि बाबूसिंह कहां है, बाबूसिंह की पत्नी श्रीमती कावेरी सम्पूर्ण सदन से आग्रह करती है कि जगेशचन्द्र को विवश किया जाए कि वह बाबूसिंह के बारे में बताएं।
(पृष्ठ-11)
    मंत्री महोदय श्री जगेशचन्द्र जी ने पहले साधारण शिक्षित बाबू सिंह और उसकी पत्नी कावेरी को अपने मंत्रालय में नौकरी लगवाई और फिर उन दोनों को अपने घर पर रख लिया।
मंत्री महोदय के विषय में एक बात कही जाती है- 'माननीय मंत्रीजी को निजी जीवन में राजा इन्द्र की भांति अप्सराओं का समूह रखने का शौक है, वह भी उनकी एक अप्सरा बनकर रह गई थी। (पृष्ठ-12)
   एक बार मंत्री महोदय की पत्नी कावेरी जो अपने साथ अपने मायके ले गयी और जब तीन दिन बाद कावेरी लौटी तो उसे अपने क्वार्टर पर बाबू सिंह नहीं मिला।
क्वार्टर का ताला बन्द था।
जब कावेरी ने माननीय से पूछा, तो नकारात्मक उत्तर मिला । माननीय ने कहा कि उन्हें जानकारी नहीं है।(पृष्ठ-13)
  मंत्री महोदय रंगीन मिजाज है और जैसा की आपने पढ ऊपर पढ लिया मंत्री स्वयं को इन्द्र समझते थे और महिलाओं को अप्सराएँ ।
अब तो मंत्री जी पास मौका था। बाबू सिंह जी घर पर नहीं और कावेरी अकेली।
  उसी रात ।
मुझे सचमुच खेद है कि मैं सदन में घृणित बात की ओर संकेत कर रहा हूं।
नशे में डूबे माननीय कावेरी के क्वार्टर में पहुंचे- यह कोई नयी बात नहीं थी ।
वह लगभग एक घण्टा कावेरी के साथ रहे। क्यों रहे, आप सभी अनुमान लगा सकते हैं। यह भी कोई नयी बात नहीं थी ।
परन्तु चलते-चलते जब बाबूसिंह का जिक्र आया, तो शायद नशे के प्रभाव में माननीय बहुत बड़ा सच कह दिया- बाबूसिंह की बात छोड़ो और मजे की जिन्दगी जियो वह वहां गया है, जहां से जाने के बाद कोई नहीं लौटता ।
सन्देह से घिरी कावेरी की रात भयानक बीती ।
सुबह वह माननीय के खिलाफ नामजद रिपोर्ट लिखाने पुलिस स्टेशन पहुंची ।
(पृष्ठ- 13)
   पुलिस ने क्या कहा यह बात आप ऊपर प्रथम दृश्य में देख चुके हैं । तब कावेरी प्रतिपक्ष नेता चन्द्रकांत जी की शरण में पहुंचती है और चन्द्रकान्त जी इस विषय को सदन में उठाते हैं।
'कृपया माननीय जगेशचन्द्र बताएं कि बाबूसिंह कहां है।'
चन्द्रकान्त के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर बहस आरम्भ हुई..!
परन्तु बहस के बीच में ही मुख्यमंत्री ने हस्तक्षेप किया !
उन्होंने घोषणा की, पूरे प्रकरण की जांच केन्द्रीय खुफिया विभाग से कराई जाएगी।
(पृष्ठ)
   तब इस केस में आगमन होता है खुफिया विभाग के तेज तर्रार जासूस जगन और बंदूक सिंह का। जो अपनी विशिष्ट शैली से बाबू सिंह को खोजने का काम करते हैं। दोनों जासूस विनम्र और बातचीत से समस्या का हल करने में विश्वास रखते हैं‌ और इसीलिए वह एक-एक संदिग्ध से मिलते हैं और अपनी खोजबीन को आगे बढाते हैं।
  कावेरी से जब उनकी मुलाकात होती है तो वह दोनों बहुत सहजता से मिलते हैं।
अभिवादन करते हुए कहा- "मेरा नाम कावेरी है सर ।"
- "मेरा नाम बन्दुकसिंह है, यह मेरे ऑफिसर मिस्टर जगत हैं। हम दोनों में से किसी का रुतबा सर कहलाने जैसा नहीं है। कुछ बातचीत करेंगे। मैं आपको आपके नाम से सम्बोधित करूंगा। आप भी हम दोनों को नाम से सम्बोधित करें।"

    यही नहीं दोनों जब चंद्रकांत जी और मंत्री जगेशचन्द्र से मिलते हैं तो दोनों से आत्मीय संबंध कायम कर लेते हैं। और यही दोनों की विशेषता है वह दोस्त और दुश्मन से एक जैसा व्यवहार रखते हैं और अंतिम क्षण तक वास्तविकता का पता तक नहीं चलने देते ।
संवाद:-
एक रोचक संवाद देखें-
गरीबी व्यक्ति की नहीं हुआ करती, गरीबी देश की हुआ करती है, देश अमीर होगा, तो वह भी अमीर होंगे।"
एक पात्र का और रोचक संवाद देखें-
"रोना दीवारों को नहीं सुनाया जा सकता। कोई तो रोता सुनने वाला होना चाहिए। शहर का मशहूर दर्जी हूं भाई साहब, इतना जबरदस्त कारीगर कि लोग नेकर के नाप का कपड़ा लाते हैं और मैं उसी कपड़े में से पतलून बना देता हूं. नेकर की पललून बनाई है, परन्तु पतलून का नेकर कभी नहीं बनाया ।"
जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा जी के उपन्यासों में एक बड़ी कमी महसूस होती है वह है अनावश्यक वार्तालाप । इनके पात्र अक्सर लम्बी, कथा से असंबद्ध वार्ता करते नजर आते हैं।
एक उदाहरण देखें-
- "मामले का चक्कर !"
"तो?"
- "शनि ग्रह का चित्र देखा है ?"
"नहीं।"
'उसके चारों ओर बड़ा खूबसूरत घेरा है।"
"होगा।"
- "शुक्र के चारों ओर कार्बन डाई ऑक्साइड के बादलों की गहरी पर्त है..।"
- "मुझे नहीं मालूम।"
- "दोनों ग्रह रहस्यपूर्ण हैं।"
-"शायद, मुझे वहां नहीं जाना है।"
- "मैं मामले की बात कर रहा था।"
-"जरूरी है ?"
- "शुक्र और शनि की भांति मामला भी गोल तो है ही, चारों तरफ से रहस्य के आवरण से घिरा भी है।"
"ऐसा ?"
"मुझे लगता है कि हमने अभी तक इस मामले में झख ही मारी है।"
- "वेरी गुड।"
– “मामले के पत्ते तो पकड़ में आते हैं, परन्तु जड़ पकड़ में नहीं आती।"
-"मुझे तुमसे सहानुभूति है।"
- "आप तो "आप तो।" बन्दूकसिंह उठकर बैठ गया -"आप तो एकदम उदासीन हो गए हैं, मानो आपका मामले से कोई सम्बन्ध ही न हो ?"
"छोकरे ?"
- "जी हुजूर ।"
-"घबराहट की बीमारी है क्या ?"
"जी ?"
- "यूं बिलाव की तरह बैठकर झपट्टा मारने की तैयारी मत करो, आराम से लेटो ।"
- "जो हुक्म ।"
-"अब सुनो...।"
- "इरशाद फरमाइए।"

अब चलते- चलते:-
"इस फाइल को क्या नाम दें, दो प्रेत या ऐसा भी होता है...?"
-"नाम से क्या फर्क पड़ता है, कोई भी नाम दीजिए । अच्छा गुरु… आपको तीन गायब फाइल याद है ?"
- "तीन गायब... खूब याद है ।"
- "तब यह बताइए कि मुल्क कौन-से जहन्नुम में जाएगा । गुण्डे हों, चोर-डाकू हों, तस्कर हों, उनसे तो पुलिस अथवा खुफिया विभाग निपट सकता है— परन्तु जब सत्ताधारी ही गुण्डापन करने लगें तो ?"

निष्कर्ष:-
  भारतीय राजनीति में सत्ता, स्वार्थ, महत्वाकांक्षा और निजी इच्छाओं का आपसी संबंध अक्सर जटिल परिस्थितियों को जन्म देता है। ओम प्रकाश शर्मा के उपन्यास ‘दो प्रेत’ का घटनाक्रम भी इसी तरह के स्वार्थ और जुनून की एक रोमांचक तस्वीर प्रस्तुत करता है। कथा में एक खूबसूरत औरत के पति का अपहरण केवल अपराध की सामान्य घटना नहीं रह जाता, बल्कि उसके पीछे उस स्त्री को पाने की निजी लालसा छिपी है। इस प्रसंग को भारतीय राजनीति के संदर्भ में देखें तो यह समझ आता है कि जब निजी स्वार्थ और सत्ता की मानसिकता हावी हो जाती है, तब रिश्ते, नैतिकता और मानवीय संवेदनाएँ पीछे छूट सकती हैं। ‘दो प्रेत’ का यह घटनाक्रम उदाहरण देता है कि व्यक्ति की महत्वाकांक्षा जब मर्यादाओं को लांघती है, तो उसका परिणाम रहस्य, षड्यंत्र और अपराध के रूप में सामने आ सकता है।

उपन्यास- दो प्रेत
लेखक-    ओमप्रकाश शर्मा- जनप्रिय

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