Tuesday, 1 July 2025

656. नीलमणि- आचार्य चतुरसेन शास्त्री

परिवार और आधुनिक में घिरी औरत की कहानी
नीलमणि- आचार्य चतुरसेन शास्त्री

हिंदी कथा साहित्य में आचार्य चतुरेसन शास्त्री जी का नाम उनके उपन्यासों के कारण ज्यादा जाना जाता है । उनके लिखे सामाजिक, ऐतिहासिक और प्रेमपरक उपन्यास पाठकों में प्रिय रहे हैं।
श्री चतुरसेन शास्त्री जी का उपन्यास पढने का यह पहला अवसर है। इनके एक जिल्द में दो उपन्यास मिले थे, एक था 'नीलमणि' और दूसरा था 'अदल- बदल' । दोनों सामाजिक उपन्यास बदलते परिवेश को आधार बनाकर लिखे गये हैं।
पहले उपन्यास 'नीलमणि' का प्रथम पृष्ठ पढे-
मालकिन रसोईघर में बैठी बड़ी तत्परता से पकवान बना रही थीं। महाराजिन सामने बैठी उनकी मदद कर रही थी। रसोई के द्वार के पास मही बैठी दरांत से तरकारी काट रही थी। बहुत-से मीठे और नमकीन पकवान बन चुके थे और उनकी सोंधी सुगन्ध घर में भर रही थी। दिन काफी चढ़ चुका था; हवा में अधिक उष्णता न थी । सूरज की धूप खिल गई थी। परिश्रम और चूल्हे की गर्मी के कारण मालकिन के उज्ज्वल ललाट पर पसीने की बूंदें मोती की लड़ी के समान सोह रही थीं। उन्होंने फुर्ती से हाथ चलाते हुए महरी से कहा - "देख तो री रधिया, यह लड़की अभी सोकर उठी या नहीं। इस लड़की से तो भई नाक में दम है, दिन बांस-भर चढ़ आया और महारानी अभी सो रही हैं। लड़की क्या है, कुम्भकरण की दादी !"

Monday, 30 June 2025

655. सिरकटी लाशें- कर्नल रंजीत

विचित्र हत्याएं और विश्वासघात
सिरकटी लाशें- कर्नल रंजीत

अपराधों की बाढ़
इंस्पेक्टर शेखर प्रधान ने अपने सामने खुली पडी फाइल पर सूखे पेंसिल से जगह-जगह निशान लगाए और फिर जहां-जहां उसने सुखं निशान लगाए थे उन्हें अपनी डायरी में नोट करने लगा।
रात के ग्यारह बज चुके थे लेकिन वह अभी तक अपने ऑफिस में बैठा अपने काम में जुटा हुआ था। लक्ष्मी इस बीच उसे तीन बार फोन कर चुकी थी और हर बार उसने यही कह दिया था कि वह दस-पन्द्रह मिनट में काम खत्म करके आ रहा है। लेकिन नौ बजे से बैठे-के ग्यारह बज चुके थे उसका काम खत्म नहीं हुआ था।

इंस्पेक्टर शेखर प्रधान ज्यों-ज्यों उस फाइल को पढ़ता चला जा रहा था उसकी चिन्ता और परेशानी में बद्धि होती चली जा रही थी। उसे इस पुलिस स्टेशन का चार्ज लिए बभी एक सप्ताह ही हुआ था। पुलिस कमिश्नर मिस्टर देश-पांडे ने उसकी नियुक्ति इस पुलिस स्टेशन पर करते समय उससे कहा था- "इंस्पेक्टर प्रधान, मैं बहुत कुछ सोच-समझ कर ही आपका ट्रांसफर इस पुलिस स्टेशन पर कर रहा हूं। पिछले कुछ महीनों से ऐसा महसूस होने लगा है कि बांदरा एरिया में रहने वाले सभी शरीफ आदमी इलाके को छोड़कर किसी दूसरे इलाके में चले गए हैं और उनके स्थान पर बड़े-बड़े स्मगलर, और घंटे हुए जरायम पेशा लोग आ बसे है या फिर इस इलाके में रहने वाले शरीफ आदमियों ने गैर-कानूनी कामों को अपना लिया है। पिछले छः महीनों में शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरा हो जब इस इलाके में कोई लाश न मिली हो, फौजदारी की वारदात न हुई हो। चोरी, डकैती, मार-पीट ता बहुत ही मामूली बात है। मैं आपकी सूझ-बूझ, साहस और कर्तव्यपरायणता से भली-भांति परि-चित हूं। मुझे पूरा-पूरा विश्वास है कि आप इस इलाके में बढ़ते हुए अपराधों की बाढ़ को रोकेंगे ही नहीं बल्कि उस स्रोत को ही समाप्त कर देंगे जहां से इन अपराधों की धारा निकलती है।"
 (सिरकटी लाशें- कर्नल रंजीत, प्रथम दृश्य)

Thursday, 26 June 2025

654. अधूरी औरत- कर्नल रंजीत

सात हत्याओं की अनोखी कहानी
अधूरी औरत- कर्नल रंजीत

नकाबपोश ने अपनी बाईं बांह मिसेज जैसवाल की पीठ पर लपेट ली और दायां हाथ अपने चौगे से निकालकर नकाब उठाया। मिसेज जैसवाल ने तड़पकर नकाबपोश से अलग होने की कोशिश की। नकाबपोश के हाथों में काले दस्ते का चाकू था।
"आखिरी का !" यह कहकर नकाबपोश ने वह चाकू पूरे जोर से मिसेज जैसवाल की पीठ में घोंप दिया और फिर एक बार उन्हें अपने सीने से सटाकर अलग कर दिया।

प्रेम और हत्या की अनेक उत्तेजक तथा रोमांचपूर्ण घटनाओं से ओतप्रोत एक जासूसी उपन्यास- 

अधूरी औरत

Sunday, 22 June 2025

653. सफेद खून- कर्नल रंजीत

कर्नल रंजीत मार्का असली उपन्यास
सफेद खून- कर्नल रंजीत

इन दिनों कर्नल रंजीत के  उपन्यास पढे जा रहे हैं। जो लाफी रोचक और रहस्यमयी होते हैं। वैसे कर्नल रंजीत का लेखन सबसे अलग तरह का होता था, कहानी में अत्यधिक घुमाव और अत्यधिक ही रहस्य होता था।
मैंने अप्रेल माह में कर्नल रंजीत के पांच उपन्यास पढे थे- मृत्यु भक्त, लहू और मिट्टी, हांगकांग के हत्यारे, 11 बजकर 12 मिनट और एक उपन्यास था बोलते सिक्के
फिर मई माह में कर्नल के उपन्यास नहीं पढे लेकिन जून में एक बार फिर कर्नल रंजीत पढना आरम्भ किया है। जून माह में 'काला चश्मा, सफेद खून, चांदी की मछली, रात के अंधेरे में और एक उपन्यास आग का समंदर आदि पढे और पढे जायेंगे।
अब हम चर्चा कर रहे हैं, उस उपन्यास का नाम है -सफेद खून।
और सफेद खून के बाद 'चांदी की मछली' उपन्यास की समीक्षा प्रकाशित की जायेगी जो 'सफेद खून' के साथ ही संलग्न है।
पहले हम प्रस्तुत उपन्यास का प्रथम दृश्य पढते हैं जिसका शीर्षक है बनफ्शई आंखें
            बनफ्शई आंखें
वह शहर का सबसे महंगा होटल था। उसका नाम भी बहुत प्यारा था-'महबूबा', 'होटल महबूबा', जैसे वह होटल न हो, मेहमानों की महबूबा हो। उसका हर कमरा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात प्रेम-कथाओं के हीरो और हीरोइनों के मोहक चित्रों से सजा हुआ था, जैसे सेम्सन और डिलायला, अन्तोनी और क्लियोपेट्रा, रोमियो और जूलियट, हीर-रांझा, सोहनी महिवाल आदि। होटल महबूबा की दूसरी मंजिल के 29 नम्बर फ्लैट में दो स्त्रियां कामकाजी बातें कर रही थीं। उनमें एक स्त्री की आयु कुछ अधिक थी और दूसरी भरपूर जवान थी। लेकिन अधिक आयु वाली स्त्री भी अत्यधिक सुन्दर और आकर्षक थी। अधिक आयु की स्त्री युवा स्त्री का इंटरव्यू लें रहीं थी।

Tuesday, 17 June 2025

652. चांदी की मछली - कर्नल रंजीत

मेजर बलवंत की एक मर्डर मिस्ट्री कहानी
चांदी की मछली- कर्नल रंजीत

SVNLIBRARY में आप इन दिनों लगातार पढ रहे हैं कर्नल रंजीत द्वारा लिखित रोचक उपन्यास । यह उपन्यास जहाँ मनोरंजन करने में सक्षम है वहीं आपको तात्कालिक जटिल कहानियों से भी परिचित करवाते हैं। 
तो अब आप पढें कर्नल रंजीत के उपन्यास 'चांदी की मछली' की समीक्षा-
गरीबी और बेकारी
रमणीक देसाई के लिए जीवन अचानक एक कटु यथार्थ बन गया था। ऐसा विषैला घूंट जिसे हलक से उत्तारना कठिन था। वह रेलवे - हड़ताल का शिकार हो गया था। उसने किसी प्रकार की तोड़-फोड़ में भाग नहीं लिया था, लेकिन उस पर तोड़-फोड़ करने के आरोप में मुकदमा चल रहा था। उसे आशा थी कि उसके साथ न्याय किया जाएगा। वह तीन महीने से बेकार था। बेकारी के भूत ने उसका स्वास्थ्य चौपट कर दिया था। चिन्ता और परेशानी से उसका रंग पीला पड़ गया था। उसकी जेब में आज केवल अट्ठाईस रुपये बाकी रह गए थे। उसकी आंखों में उसका भविष्य अंधकारमय हुआ जा रहा था और उसको यह भी दिखाई दे रहा था कि राधिका और उसके प्रेम की धज्जियां उड़ जाएंगी और उसका प्यार आत्महत्या कर लेगा।

Sunday, 1 June 2025

651. काला चश्मा- कर्नल रंजीत

चित्रों की चोरी और अंधेरे का रहस्य
काला चश्मा- कर्नल रंजीत

इन दिनों मेरे द्वारा कर्नल रंजीत के उपन्यास पढे जा रहे हैं। इस क्रम में एक और उपन्यास शामिल होता है जिसका नाम है 'काला चश्मा'।
वह काला चश्मा जिसे लोग काली रात में भी पहनते हैं, क्यों?

इसके लिए उपन्यास पढना होगा। पर अब हम बात करते हैं उपन्यास के प्रथम दृश्य की को एक बैंक डकैती से संबंधित हैं और अध्याय का नाम भी 'बैंक डकैती' है।

      सुबह के ठीक नौ बजे थे। प्रिन्सेज स्ट्रीट के दोनों ओर बड़ी बहुमंजिला इमारतों में स्थित शोरूम, विभिन्न कम्पनियों के कार्यालय, बैंक और दुकानें खुलने लगी थीं। बाजार में भीड़-भाड़ बढ़ने लगी थी।
नेशनल ग्रांड बैंक का आगे की ओर का दरवाजा अभी तक बन्द था लेकिन बैंक के कर्मचारी पिछले दरवाजे से अन्दर आ चुके थे। उन्होंने अपनी-अपनी सीटें संभाल ली थीं और अब साढ़े नौ बजने की प्रतीक्षा कर रहे थे ।
ठीक साढ़े नौ बजे दरबान शक्तिसिंह ने ब्रांच मैनेजर रविराय से सामने वाले दरवाजे की चाबियां लीं और बाले खोलकर शटर ऊपर उठा दिया ।
बाहर खड़े चार-पांच व्यक्ति अन्दर आ गए । बैंक के काम की दैनिक प्रक्रिया आरम्भ हो गई। लेकिन बैंक का काम आरम्भ हुए अभी पन्द्रह मिनट भी नहीं हुए थे कि अचानक हॉल में हल्का-हल्का-सा अंधेरा छाने चगा।

Saturday, 31 May 2025

650. अभागी विधवा- वेदप्रकाश वर्मा

दो भाइयों की गृहक्लेश कथा
अभागी विधवा- वेदप्रकाश वर्मा

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में तीन 'वेद' थे। प्रथम वेदप्रकाश काम्बोज, द्वितीय वेदप्रकाश शर्मा और तृतीय नाम जो सामने आता है वह है वेदप्रकाश वर्मा । मेरठ जिले के निवासी वेदप्रकाश वर्मा जी का नाम मैंने 2017 के बाद ही सुना था और वह भी सोशल मीडिया के माध्यम से । एक ऐसा लेखक जिसने सौ से ऊपर उपन्यास लिखे पर संयोग
से कभी उनको पढने का अवसर ही नहीं मिला। वेदप्रकाश वर्मा जी के कुछ उपन्यास मेरे पास काफी समय से उपलब्ध थे पर पढने का अवसर अब मिला।

वेदप्रकाश वर्मा जी का जो उपन्यास मैंने सबसे पहले पढा है उसका नाम है 'अभागी विधवा ।' उपन्यास लेखकीय के अनुसार लेखक महोदय का कहना है की यह कहानी लम्बे समय से उनके दिमाग में थी पर उसे उपन्यास का रूप देने मे समय लगा।
अब हम अभागी विधवा उपन्यास का प्रथम पृष्ठ पढते हैं-
पुलिस का सायरन पूरी आवाज से चीख उठा ।

Friday, 30 May 2025

649. ब्रांच लाइन- दत्त भारती

प्रेम में असफल युवक की कहानी
ब्रांच लाइन- दत्त भारती

ब्रांच लाइन की उपन्यास की कहानी जानने से पहले हम इस उपन्यास के प्राप्त होने की और इस से संबंधित कुछ रोचक कहानियां जान लेते हैं।
जहां एक तरफ लोगों का पुस्तक पठन से रुझान कम हुआ है वहीं कुछ ऐसे पाठक भी हैं तो अंतिम सांस तक पढना ही चाहते हैं।
यहां मैं दो पुस्तक प्रेमियों का वर्णन कर रहा हूं और दोनों ही दत्त भारती जी के प्रशंसक हैं और एक उम्र विशेष में पहुकर सिर्फ दत्त भारती जी को ही पढना चाहते हैं। एक हैं गाजियाबाद से सतीश जी और दूसरे हैं राजस्थान के

648. मुसाफिर कैफे- दिव्यप्रकाश दूबे

Saturday, 10 May 2025

647. मौत के साये में- आरिफ मारहर्वी

कैसर हयात निखट्टू का कारनामा
मौत के साये में- आरिफ मारहर्वी

सर सिन्हा की आँखों में सहसा मौत नाचने लगी ।
आगे टेढ़ी-मेढ़ी और ढलवान सड़क थी। लगभग बारह मील तक तो सड़क की दाईं ओर ऊंची पहाड़ी चट्टानें और बाईं ओर खाईयाँ ही थीं। वैसे भाव नगर की सड़क पर अच्छा-खासा ट्रैफिक रहता था । राजकीय परिवहन की बसें चलती थीं प्राईवेट कारें और टैक्सियाँ भी गुजरती थीं, ट्रक भी आते जाते थे ।
सर सिन्हा ने अपनी समस्त शक्ति ब्रेकों पर लगा दी किंतु बेकार, कार की गति किसी तरह भी साठ और सत्तर मील प्रति घंटे से कम न हो सकी, इसके विपरीत कार की गति में बढ़ोतरी होती गई । सर सिन्हा की पूरी देह पसीने से तर हो गई और दिल की धड़कनें कनपटियों पर धमक पैदा करने लगीं। उनका मानसिक संतुलन अभी बिगड़ा न था अन्यथा पहला मोड़ काटते समय ही गाड़ी सीधी गार में चली जाती ।
(मौत के साये में - आरिफ मारहर्वी, उपन्यास का प्रथम पृष्ठ)
आज हम बात कर रहे हैं आरिफ मारहर्वी साहब के उपन्यास 'मौत के साये' की जो अक्टूबर 1971 में 'जासूसी पंजा' पत्रिका में प्रकाशित हुआ था । यह C.I.D. ऑफिसर कैसर हयात निखट्टू का उपन्यास है, जो एक केस को हल करता है और उसके साथ देते हैं उसके साथी राना और सोजी ।

Saturday, 3 May 2025

646. एनाकोंडा- काॅमिक्स

अमेजन के खतरनाक जंगलों में...
नमस्ते,
svnlibrary ब्लॉग पर किसी काॅमिक्स की यह पहली समीक्षा है। ब्लॉग पर ज्यादा समीक्षाएं उपन्यासों की हैं और उपन्यासों के अलावा विविध विधाओं की समीक्षाएं लिखी हैं पर किसी काॅमिक्स के विषय में लिखने का यह पहला अवसर है।
          बचपन छूटा तो काॅमिक्स का साथ भी छूट गया। कभी राज कॉमिक मेरी प्रिय हुआ करती थी। इसके अतिरिक्त बालहंस पत्रिका में छपने वाली चित्रकथा 'ठोला राम, कवि आहत' जैसी कथाएं आज भी याद आती हैं तो गुदगुदाती हैं। कभी किसी अज्ञात पत्रिका में प्रकाशित होने वाली 'इंस्पेक्टर आजाद' चित्रकथा की आधी-अधूरी याद, मन में इसलिए कसक पैदा करती है की उसे पूरा नहीं पढ पाये और ऐसी ही कसक 'बालहंस' पत्रिका की 'बिसतुईया' पैदा करती है।
समय के साथ-साथ सब काॅमिक्स/ चित्रकथाएं खत्म होती चली गयी। लेकिन जिनके मन में जुनून होता है, उनका यह जुनून समय के साथ बढता चला जाता है।
ऐसा ही जुनून था 'एनकोंडा' काॅमिक्स वालों का और जन्म लिया 'KORWA COMICS' ने और हमारे सामने आयी एक जबरदस्त काॅमिक्स 'एनकोंडा- अमेजन का दानव' ।

Monday, 28 April 2025

645. बोलते सिक्के - कर्नल रंजीत

वैज्ञानिकों की हत्या का रहस्य
बोलते सिक्के - कर्नल रंजीत

अप्रैल 2025 में मैंने कर्नल रंजीत के उपन्यास पढें हैं और यह सिलसिला जारी है। कभी-कभी यह कोशिश होती है एक ही लेखक के स्वयं के पास उपलब्ध समस्त उपन्यास पढ लिये जायें हालांकि यह प्रयास कभी कभार ही पूरा होता है।
जैसे इस बार कर्नल रंजीत के उपन्यास पढने आरम्भ किये तो कुछ छुपे हुये उपन्यास और सामने आ गये। अब उनको कब तक पढा जायेगा यह कहा नहीं जा सकता। फिर भी कोशिश जारी है।
कर्नल रंजीत का उपन्यास '11 बजकर 12 मिनट' के साथ एक और उपन्यास संलग्न था जिसका नाम है 'बोलते सिक्के'।
यह उपन्यास उन लोगों की कहानी है जो धन-दौलत के लिए अपना मान-सम्मान सब कुछ बेचने को तैयार हो जाते हैं।
अब चलते हैं 'बोलते सिक्के' उपन्यास के प्रथम दृश्य की ओर, अध्याय का नाम है 'भयंकर तूफान'

भयंकर तूफान
रात आधी से अधिक बीत चुकी थी।
चारों ओर घटाटोप अंधियारा छाया हुआ था, जिसे आकाश के सीने को रौंदकर उमड़ती-घुमड़ती दैत्याकार काली-कजरारी घटाओं ने और अधिक भयावह बना दिया था।
हवा इतनी तेज चल रही थी जैसे आंधी चल रही हो। पहले हल्की-हल्की बौछारें पड़ती रही थीं लेकिन अब वे हल्की-हल्की बौछारें मूसलाधार बारिश में बदल गई थीं।

Friday, 25 April 2025

644. 11 बजकर 12 मिनट - कर्नल रंजीत

प्रोफेसर की हत्या शृंखला
11 बजकर 12 मिनट

- मिस मालिनी के खुले मुंह में जहर किसने डाल दिया?
- प्रो० पालीवाल को तलवार से किसने चीर दिया?
-वाॅलीबाॅल खेलती लड़कियों के साथ किसने बलात्कार किया ?
-क्या इस सबके लिए छात्र उत्तरदायी थे?
देश के जाने-माने वैज्ञानिकों और शिक्षकों की योजनाबद्ध हत्याओंकी अनोखी कहानी। छात्र जब देश की गरीबी के विरोध में आन्दोलन कर रहे थे तो उनके आन्दोलन को एक घिनौनी राजनीति ने जकड़ लिया।
इसी षड्यंत्र का पर्दाफाश किया आपके चहेते जासूस मेजर बलवन्त ने। कर्नल रंजीत की जादूभरी कलम का एक नया कमाल !

छात्र आंदोलन के पीछे काम करने वाले षड्‌यंत्रकारियों का पर्दाफाश करने वाली रोमांचक कहानी

11 बजकर 12 मिनट

गुजरात में लगी हुई आग सवा दो महीने के बाद बुझी। इस बीच क्या कुछ नहीं हुआ! गोदाम, मंडियां और दूकानें लूटी गई। रेलवे स्टेशनों और पुलिस चौकियों पर हमले हुए। अधिकारियों का घेराव किया गया। गाड़ियां रोकी गई। बसें जला दी गई। सरकारी इमारतों को जलाकर खाक कर दिया गया। गोलियां चलीं। आंसू गैस छोड़ी गई। कई शहरों में कर्फ्यू लगा। जीवन-क्रम अस्त-व्यस्त हो गया। पुलिस-फायरिंग से बीसियों व्यक्ति मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। चारों ओर भय, आतंक और निराशा का अंधकार छा गया। और फिर महंगाई और बेरोजगारी के विरुद्ध छात्रों द्वारा छेड़े गए आन्दोलन ने राजनीतिक रूप ले लिया। प्रदेश की विधानसभा भंग करनी पड़ी। तब कहीं जाकर गुजरात में लगी हुई आग ठण्डी हुई।