Sunday, 9 December 2018

156. यमराज का नोटिस- विमल मित्र

तीन रोचक कहानियाँ


         विमल मित्र जी का एक छोटा सा कहानी संग्रह यमराज का नोटिस मेरे विद्यालय के पुस्तकालय में उपलब्ध था।‌ खाली समय था,  जिसका सदुपयोग पढने में किया।
    इस कहानी संग्रह में विमल मित्र जी की तीन बांगला भाषा की कहानियों का हिंदी अनुवाद है। तीनों कहानियाँ रोचक, बहुत रोचक हैं। कहानियाँ का आकार मध्यम है इसलिए पढने में ज्यादा समय नहीं लगा।
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        इस संग्रह में शामिल कहानियाँ है।
       1.  यमराज का नोटिस (यमराजेर नोटिस)
       2. चुहिया सुंदरी           (ईदुरेर स्त्रीर कथा)
       3. सबसे ताकतवर कौन (सब थेके शक्तिमान के?)

प्रथम कहानी यमराज का नोटिस एक अच्छी और भावुक कहानी कही जा सकती है। भावुकता के साथ साथ इसमें हास्य का पुट है। यह हास्य कहानी में भावुकता को हावी नहीं होने देता।

       लेखन ने लेखन शैली में भी रोचकता कायम रखी है। बड़े बाजार से भवानी पुर। भवानी पुर से बालीगंज। बालीगंज से बेहला। इस बेहला के भूमिपति बाबू के मकान पर आते ही केष्ठो बाबू बिलकुल आटे की तरह अटक गये। (पृष्ठ-3)
      यह कहानी भी केष्ठो और भूमिपति बाबू पर आधारित है।  जब यमराज का नोटिस आता है तो मनुष्य की स्थिति क्या होती है। भूमिपति बाबू के लिए यह नोटिस भी उनका नौकर केष्ठो लेकर आया था।
        क्या मालिक एक नौकर का आदेश मानेगा या नहीं?

       नौकर यमराज का नोटिस कैसे लाया?   

       
         द्वितीय कहानी चुहिया सुंदरी बचपन में पढी हुयी कहानी है। आज इस कहानी के लेखक का भी पता चल गया की यह रचना विमल मित्र जी की है।  शायद यह कहानी लगभग पाठकों ने पढी होगी।
      यह कहानी एक ऐसे चूहे की है जो एक साधु के आशीर्वाद से चूहे से बिलाव और बिलाब कुत्ता.... क्रमश: शरीर बदलता रहा लेकिन वह कभी संतुष्ट न हो सका।
      इस कहानी का अंत बहुत रोचक और अलग है। कहानी पूर्णतः हास्य पर आधारित है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से संदेश भी देती है कि ज्यादा उच्चाकांक्षा अच्छी चीज नहीं है, उसमें खतरा है।(पृष्ठ-33)

          इस संग्रह की अंतिम कहानी सबसे ताकतवर कौन है भी एक अच्छी व पठनीय कहानी है। जो बचपन में लगभग बाल पुस्तकों में पढने को मिलती थी। लेखक भी लिखता है यह कहानी बचपन में पिताजी से सुनी थी।
     यह कहानी एक साधु और कुत्ते की है। कुत्ते की इच्छा होती है सबसे ताकतवर के साथ रहने की। इसलिए वह इधर-उधर भटकता रहता है और एक दिन साधु के पास पहुंच जाता है।
     सबसे ताकतवर तो मनुष्य भी नहीं है।
     साधु बाबा ने कहा,"तुमने भूल की है। मुझसे ताकतवर जीव भी संसार में है।"
     "कौन है वह?"

    उस ताकतवर की तलाश है यह कहानी ।

इस संग्रह की तीनों कहानियाँ रोचक और पठनीय है। बच्चों के लिए अच्छा संग्रह है। अगर इस संग्रह में कुछ और कहानियाँ होती तो बहुत अच्छा था। मात्र तीन कहानियों का संग्रह बहुत छोटा होता है। वह भी जब शब्दों का आकार बढाकर इसे 64 पृष्ठ में किया गया है।
        फिर भी कहानियाँ पठनीय है।
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कहानी संग्रह- यमराज का नोटिस
लेखक- विमल मित्र
प्रकाशक- सुरुचि साहित्य, शाहदरा, दिल्ली
संस्करण- 1997
मूल्य-50₹
पृष्ठ-64

      

Saturday, 1 December 2018

155. एक खून और- सुरेन्द्र मोहन पाठक

खून और खून और खून।
एक खून और - सुरेन्द्र मोहन पाठक, रोचक मर्डर मिस्ट्री, पठनीय।
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      कुछ कहानियाँ इतनी रोचक होती हैं की वे प्रथम पृष्ठ से ही पाठक को प्रभावित कर लेती हैं। यह रोचकता जब आदि से अंत तक बनी रहे तो पाठक एक बैठक में ही पुस्तक को पढ जाना चाहता है।
        प्रस्तुत उपन्यास 'एक खून और' भी इतनी ही रोचक और दिलचस्प उपन्यास है।

            माला और सरिता अपने करोड़पति अंकल की संपत्ति की वारिस थी। अंकल की मौत के बाद दोनों के हिस्से में तीन-तीन करोड़ संपत्ति आती।
      करोड़पति माला जायसवाल से स्थानीय समाचार पत्र का खोजी पत्रकार सुनील चक्रवर्ती इंटरव्यू लेने पहुंचा।
      "....मैं तो यहाँ अपने अखबार के लिए आपका इंटरव्यू लेने आया था।"
      "अखबार! इंटरव्यू! तुम क्या चीज हो।"
      .......
      और सुनील ने अपना  विजिटिंग कार्ड निकाल कर उसकी और बढाया।"
      माया जायसवाल ने कार्ड लिया, उस पर एक सरसरी निगाह डाली और कार्ड को मेज पर उछाल दिया।
      .....
      "अभी मुझे वक्त नहीं है।  फिर आना।"
      "फिर कब?"
      "आधी रात को ।"
      "जी"
              यह थी करोड़पति बहन सरिता जायसवाल की करोड़पति बहन माला जायसवाल। सरिता शादी शुदा थी और माला अभी शादी के लिए लड़का तलाश कर रही थी। वह भी एक अजीब तरीके से।
              "और तुम्हें मेरे साथ जिंदगी भर बंधे रहने की भी जरूरत नहीं। तुम्हें सिर्फ दो तीन महिने मेरा पति बन कर रहना होगा...।"
              ........
              "दो तीन महि‌ने बाद मैं तुम्हें तलाक दे दूंगी और साथ में पच्चीस हजार रुपये बोनस दूंगी"
              तो यह थी माला जायसवाल। अजीब फितरत की मालकिन। कम सुनील चक्रवर्ती भी नहीं था। वह भी पट्ठा रात को, आधी रात को माला जायसवाल का इंटरव्यू लेने जा पहुंचा। लेकिन वहाँ तो स्थिति ही कुछ और थी।
              "ड्राइंगरूम के बीचो-बीच औंधे मुँह माला जायसवाल पड़ी थी। उसके सिर का पिछला भाग तरबूज की तरह फट गया था और उसमें से खून बह-बह कर उसकी गरदन और कंधों के आस पास जमा हो रहा था।"

              यही थी माला जायसवाल की जिंदगी, करोड़पति माला जायसवाल एक रात को अपने घर में मृत्यु पायी गयी। जिसका न कोई दुश्मन ना न कोई बैरी,न कोई बैगाना। आखिर ऐसा क्या हुआ की माला जायसवाल को कोई मौत के घटा उतार गया।

             सुरेन्द्र मोहन पाठक वर्तमान उपन्यास जगत में टाॅप मर्डर मिस्ट्री राइटर माने जाते हैं। उनके सुनील सीरिज और सुधीर सीरिज उपन्यास मर्डर मिस्ट्री होते हैं, लेकिन दोनों सीरिज का फ्लेवर अलग-अलग है। जहाँ स्वयं पाठक जी को सुनील ज्यादा पसंद हैं वहीँ मेरे जैसे ज्यादा पाठक सुधीर को पसंद करते हैं।
                 प्रस्तुत उपन्यास एक रोचक मर्डर मिस्ट्री है जो मुझे बहुत पसंद आयी‌। कुछ दिन पूर्व पाठक जी का सुनील सीरिज 'सिंगला मर्डर केस' उपन्यास पढा था, एक दम बकवास लगा। लेकिन यह उपन्यास उसके विपरीत है। वह चाहे कहानी के स्तर पर हो या पृष्ठ संख्या के स्तर पर।

                      बात करे इस उपन्यास 'एक खून और' की तो यह काफी दिलचस्प उपन्यास है। पहला कैरेक्टर उभर कर आता है माला जायसवाल का। वह भी एक अजीब तरीके से। माला शादी तो करवाना चाहती है लेकिन दो या तीन महिनों के लिए। आखिर इसके पीछे क्या कारण था?
                      माला इसी दौरान अपने घर में मृत्यु पायी जाती है और उस समय सुनील चक्रवर्ती भी वहाँ उपस्थित होता है।  
    पत्रकार सुनील इस केस को हल करता है, लेकिन यह कातिल को सहन नहीं होता। वह तो सुनील को भी धमकी दे देता है।
    सुनील को एक लिफाफा मिलता है। जिसमें लिखा था।

खुल गया।                      खुल गया।              खुल गया।
    फ्री शशान घाट
    अब आपको मरने के बाद इस बात की चिंता करने की जरूरत नहीं की आपका क्रिया कर्म कैसे होगा?
    हमारे श्मशान घाट की अनोखी आॅफर।
    फ्री लकड़ियाँ।
    फ्री कफन।
    फ्री आहुति।
    हमारी सेवाओं से आज ही लाभ उठाईये। और जल्दी से जल्दी जिंदगी से किनारा कीजिए।
    काजी दुबला बाहर के अंदेशे जैसी नियत वाले अखबार के रिपोर्टरों के लिए एडवांस बुकिंग विशेष सुविधा है।
     सुनील को ऐसी क्लासिक धमकी आज तक नहीं मिली थी।

    सुनील जैसे -जैसे सत्य के नजदीक पहुंचता जाता है वैसे -वैसे उपन्यास में रोचकता बढती जाती है, एक तरफ जहाँ उपन्यास रोचक होता है, वही सुनील के लिए और इंस्पेक्टर प्रभुदयाल के लिए परेशानियां बढती जाती हैं।
        इन परेशानियों ‌में सुनील प्रभुदयाल को फोन करता है।
  "मैं सुनील बोल रहा हूँ।"
  "अब क्या हो गया।"
  "एक खून और" सुनील बोला।

         एक खून और फिर एक खून......यह सिलसिला खतरनाक हो उठता है।
         आखिर कातिल कौन था?
         वह कत्ल क्यों कर रहा था?

   उपन्यास की मिस्ट्री अजब है। पाठक के लिए प्रथम पृष्ठ से ही रहस्य बनता जाता है। एक ऐसा रहस्य जो धीरे धीरे उलझता ही जाता है।   
   उपन्यास में पात्र भी सीमित हैं लेकिन असली कातिल को पहचानना बहुत मुश्किल है। शक सभी पर हो कसता है लेकिन सत्य की पहचान कठिन है।
        उपन्यास में सुनील के साथ यूथ क्लब के मालिक रमाकांत का किरदार भी बहुत अच्छा है, हालांकि उसको उपन्यास में ज्यादा स्पेश नहीं, स्पेश तो ज्यादा प्रभुदयाल को भी नहीं मिला। यही वजह है की उपन्यास में कसावट है। अक्सर लेखक पात्रों का अनावश्यक विस्तार देकर कहानी को धीमी कर देते हैं।
               इस उपन्यास में सीमित पात्र, दमदार कथानक, तेज रफ्तार और जबरदस्त मर्डर मिस्ट्री पाठक को प्रभावित करने में सक्षम है।
                अगर आप मर्डर मिस्ट्री पढने की इच्छा रखते हैं तो यह उपन्यास अवश्य पढें। इसमें वह सभी मनोरंजन सामग्री उपलब्ध है जो किसी पाठक को प्रभावित कर सकती है।

निष्कर्ष-   अगर आप मर्डर मिस्ट्री पढना पसंद करते हैं तो यह उपन्यास आपको अवश्य पसंद आयेगा। उपन्यास एक ऐसी मर्डर मिस्ट्री पर आधारित है जिसे हल करते-करते एक के बाद एक और खून होते चले जाते हैं।
            पाठक को तेज प्रवाह में बहा लेने जाने में सक्षम और एक ही बैठक पठनीय उपन्यास कहानी के अतिरिक्त कुछ सोचने का अवसर भी नहीं देता।
              उपन्यास रोचक, दिलचस्प और पठनीय है।
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उपन्यास - एक खून और
लेखक- सुरेन्द्र मोहन पाठक
पृष्ठ-100
             
             
     

Tuesday, 27 November 2018

154. The जिंदगी- अंकुर मिश्रा

 जिंदगी के विविध रंगों की कथा...

The जिंदगी- अंकुर मिश्रा कहानी संग्रह, रोचक, पठनीय। ---------- 
          कहानी सुनना या सुनाना मनुष्य का आदिकाल से मनोरंजन का साधन रहा है। कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो मानव मन के हृदयतल को छू जाती हैं। कहानियाँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप मनुष्य जीवन से संबंध रखती हैं। मनुष्य जीवन में हमेशा विविधता रही है, कभी सुख, कभी दुख तो कभी समभाव। जिंदगी के कई रंग होते हैं,‌ जिंदगी के इन रंगों से मिलकर बनी है अंकुर मिश्रा जी की किताब 'The जिंदगी। जैसे मनुष्य की जिंदगी में विविधता है, ठीक वैसे ही इस कहानी संग्रह की कहानियोों में विविधता मिलेगी। पहला रंग कहानी संग्रह के शीर्षक में ही देखा जा सकता है- The जिंदगी। 

             कहानी संग्रह को दो भाग में विभक्त किया गया है। प्रथम भाग 'किस्से-कहानियाँ' जिसमें छह कहानियाँ है। द्वितीय भाग 'लघुकथाएं' जिसमें दस लघुकथाएं शामिल की गयी हैं। लेकिन साथ में एक और प्रयोग भी शामिल है वह है प्रत्येक कहानी से पूर्व एक कविता। छह कहानियाँ है और सभी से पूर्व एक-एक कविता है जो कहानी के भाव को स्पष्ट करने की क्षमता रखती है।

              प्रथम कहानी 'अभी जिंदा हूँ मैं' से पूर्व एक कविता है।

           'ये जो बैठे हुए हैं, 
           चुपचाप से, 
            सहते हैं, 
                       पर बोलते नहीं, 
                       पास कुछ रहता तो है, 
                       पर उगलते नहीं, ...................।
 'अभी जिंदा हूँ मैं' खत्म होती मानवीय संवेदना की कहानी है। भौतिकवादी युग में मनुष्य एक यंत्र होकर रह गया है। पूंजीवाद सभी पर हावी हो रहा है जिसके नीचे मनुष्य की संवेदना दब गयी है और आत्मसम्मान। आत्मसम्मान तो सब किताबी बातें हैं। (पृष्ठ-22) कहानी का नायक नीलेश भी एक ऐसी ही जिंदगी जीता है। जहाँ मनुष्य पर यांत्रिकता हावी है। ऐसी एक और कहानी है 'घुटन'। दोनों कहानियाँ बहुत ही अच्छी और मन को छूने वाली हैं।
             'लाल महत्वाकांक्षाएं' हमारे तेज रफ्तार जीवन की कहानी है। वह जीवन, जिसके लिए हम कमाते तो हैं, लेकिन उसके लिए हमारे समय नहीं है। है ना अजीब बात। बस ऐसी ही अजीब है यह कहानी। मनुष्य जीवन इतना यंत्र बन गया की उसके लिए मानवीय रिश्ते भी कोई महत्व नहीं रखते। हमारी बढती महत्वाकांक्षा एक दिन हमें ही लील जायेंगी। कहानी 'अभी जिंदा हूँ मैं' का नायक कहता है "दरअसल पूंजीवाद हमको सोचने की इजाजत नहीं देता।(पृष्ठ-23)। वही स्थिति 'लाल महत्वाकांक्षाएं' के नायक मनीष की है। हम जो सोचते हैं वह बहुत ही निकृष्ट सोचते हैं। पूंजीवाद हमारी सोच के दायरे को बहुत छोटा कर रहा है। कहानी नायक मनीष भी अपनी पत्नी को इसी सोच से प्रेरित होकर कहता है -" कैरियर के इतने गोल्डन पीरियड में तुमने ऐसा डिसीजन कैसे ले लिया बच्चा पैदा करने का?"(पृष्ठ-33) 
               अब इससे आगे कहने/लिखने को कुछ भी नहीं रहा। अगर कुछ है तो यही, यह एक युद्ध है मानवता और स्वार्थ के बीच। (पृष्ठ-25) 
       
              मेरे मन को अगर किसी ने सर्वाधिक प्रभावित किया या जिस कहानी को पढकर आँखों से आंसू बह निकले वह कहानी है -आत्महत्या। दरअसल 'अभी जिंदा हूँ मैं', 'घुटन' और 'आत्महत्या' तीनों कहानियाँ का केन्द्र बिंदु एक ही है लेकिन उनका विस्तार अलग-अलग है। तीनों कहानियाँ के गर्भ में एक घुटन है जिससे बच कर कोई 'अभी जिंदा हूँ मैं' कहकर संतुष्टि प्राप्त करता है और कोई उस घुटन में दबकर आत्महत्या कर लेता है।
             कहानी 'आत्महत्या' तो वास्तव में राज‌न की मौत के बाद मनीषा के उस संघर्ष पूर्व जीवन की कथा है जहाँ पर वह निर्दोष होकर भी सजा भुगत रही है। यह कहा‌नी हमारे समाज के एक वर्ग का यथार्थवादी चित्रण करती है। ऐसा चित्रण जो पाठक के मर्म को अंदर तक सालता है। ऐसी ही एक और संवेदनशील कहानी है 'वो कुछ अजीब सा था'। हालांकि इस कथ्य पर बहुत सी कहानियाँ बहुत बार लिखी और पढी गयी हैं लेकिन अपने प्रस्तुतीकरण के कारण यह रचना भी अच्छी है।
          
                     "कोई इबादत कहता है,
                     तो कोई आदत कहता है, 
                     आंसुओं का सैलाब है,
                      दरिया-ए-आग है इश्क़। 
                                           पर जो भी है, 
                                            हल्की सी चुभन, 
                                            मीठी सी तड़प है, 
                                            रुसवाइयों में, 
                                           जीने का बहाना है इश्क़। 

                       ये पंक्तियाँ है कहानी 'इश्क़ ऐसा भी' के आरम्भ से पूर्व की। यह कहानी कथा शिल्प के आधार पर सभी कहानियों से अलग है। लेखक ने भाषा का प्रयोग कहानी के अनुरूप ही किया है जो कहानी को वास्तविकता प्रदान करता है। लेकिन कथ्य के स्तर पर कहा‌नी कोई प्रभावशाली नहीं लगी। कहानी में चार दोस्तों का प्रसंग भी कहानी से कोई संबंध नहीं रखता। 

                    इस कहानी संग्रह का द्वितीय भाग 'लघुकथाएं' है। जिसमें दस लघुकथाएं' संकलित हैं। इस संग्रह की कहानियाँ जितनी अच्छी हैं लघुकथाएं उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी। मेरा लघुकथाओं के साथ काफी समय बीता है। लघुकथाएं अपने एक निश्चित दायरे से आगे नहीं बढ पायी। ज्यादातर लेखक कुछ निश्चित विषयों से आगे नहीं सोच पा रहे। 

                          प्रथम लघुकथा 'फिजुलखर्ची' एक संवेदनशील कथा है। जो वर्तमान संबंधों का यथार्थ चित्रण करती है। लघुकथा 'नारी' लघुकथा है या कविता। यह अभी समझना बाकी है। क्योंकि इस कथा में कथा तो नहीं है सिर्फ संवेदना है और वह भी काव्यनुमा।
                  'द्विसंवाद' हमारे दोहरे व्यक्तित्व को प्रदर्शित करती है। यह लघुकथा हर दूसरी-तीसरी लघुकथा पत्रिका पात्रों के नाम परिवर्तन के साथ मिल जायेगी। यही हाल 'बरसातें और भी हैं' का है। 
                     अन्य लघुकथाएं कुछ स्तर ठीक हैं और पठनीय हैं। मेरे विचार से लेखक धैर्य के साथ कुछ और कहानियों के साथ एक अच्छा कहानी संग्रह प्रकाशित करवाता तो ज्यादा अच्छा रहता। 
          कहानी संग्रह की भाषाशैली सामान्य पाठक को भी समझ आने वाली और रोचक है। कहीं किसी प्रकार की क्लिष्टता नहीं है। भाषा शैली का एक रोचक उदाहरण देखें। एक ढलकी हुई, खाँसती हुई, तानों के बोझ से झुकी हुई, शीत ऋतु की घनी अंधकारमय रात सी बूढी पर लंबी जिंदगी। (56) 

      प्रस्तुत कहानी संग्रह मानव मन को छू लेने वाला है। कहानियाँ पाठक प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं।
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पुस्तक- the जिंदगी (कहानी संग्रह) 
लेखक- अंकुर मिश्रा 
Email- mynameankur@mail.com
 प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स- 
पृष्ठ-90 
मूल्य-100

Friday, 23 November 2018

153. लव जिहाद-राम पुजारी

   जिहाद से लव की ओर...
लव जिहाद...एक चिड़िया- राम पुजारी,सामाजिक उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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लव जिहाद...एक चिड़िया उपन्यास मूलत एक प्रेम कथा है,वह प्रेम कथा जो समाज, धर्म, राजनीति के कई पहलुओं को उजागर करती है।
           उपन्यास प्रेम को आधार बना कर लिखा गया है। एक हिंदू लड़की और एक मुस्लिम लड़के की प्रेम कथा है। दोनों काॅलेज में मिलते हैं, साहिल का काॅलेज में यह अंतिम साल था और सोनिया का ये पहला साल था। (पृष्ठ-03) फिर धीरे-धीरे दोनों में प्रेम प‌नपता है।  बहरहाल दोनों- साहिल और सोनिया, एक ही कश्ती में सवार थे- प्रेम की कश्ती। (पृष्ठ-35)
        कवि बोधा ने कहा है। -"यह प्रेम को पंथ कराल महां, तरवारि की धार पर धावनो है।"
        यह प्रेम का रास्ता बहुत विकट है, यह तो तलवार की धार पर चलने जैसा है और प्रेमी फिर भी चलते हैं। साहिल और सोनिया भी इस राह पर चलते हैं।
   दोनों ही आने वाले भविष्य से बेखबर, ख्वाबों की दुनियां में प्रेम की उड़ान भर रहे थे। (पृष्ठ-35)। लेकिन यह उड़ान सोनिया के परिवार को रास नहीं आयी।  सोनिया के परिवार को रास नहीं आयी लेकि‌न साहिल का तो किस्सा ही कुछ और था।
- एक तरफ जहां, सोनिया पर पाबंदियाँ लगाई जाने लगी और ये रोक-टोक दिन प्रतिदिन बढने लगी। (पृष्ठ-49)। वहीं साहिल के सिर पर एक खतरनाक तलवार लटक रही थी। हमसे गद्दारी की सजा सिर्फ मौत है-सिर्फ मौत। (पृष्ठ-259)
-       जो प्रेम की राह पर चलते हैं, उन्हें पता है यह राह बहुत कठिन है। लेकिन वो फिर भी चलते हैं। इसी राह पर सोनिया चली, घर और समाज की बंदिश तोड़ कर चली। लेकिन क्या साहिल इस राह पर चल पाया। यही प्रश्न  सोनिया ने साहिल से पूछा-मैंने तुम्हें अपना दिल दिया बस और बदले में तुम्हारा प्यार चाहती हूँ । बोलो क्या तुम मेरा साथ दोगे। -(पृष्ठ-196)
- क्या साहिल सोनिया का साथ दे पाया?
     इस प्रेम कथा के साथ एक और कथा है, वह है धार्मिक -साम्प्रदायिक। यह समाज में व्याप्त राजनीति के घिनौने रूप को पाठक के समक्ष लाती है। 
...पिछले कुछ दिनों से उत्तम प्रदेश के एक इलाके सलामतगंज की स्थिति कुछ असामान्य सी थी। दो धार्मिक गुटों में किसी बात को लेकर विवाद हो गया था। (पृष्ठ-52)
          उपन्यास एक प्रेम कथा होने के साथ-साथ समाज में व्याप्त और भी बहुत सी बुराईयों का वर्णन करता है।
          समाज में औरत का क्या स्थान है और हम उसे कौनसा स्थान देते हैं। क्या हम औरत की इज्जत करते हैं। इस उपन्यास के संदर्भ में प्रकाशन ने भी लिखा है।- क्या हमारी बेटियों की ईज्जत का पैमाना इस बात पर निर्भर होगा कि वह लड़की किस जाति, धर्म और सम्प्रदाय की है। (प्रकाशक कथन)। औरत होने की पीड़ा रज्जो तो भुगत रही है पर वह चाहती है की उसकी बेटी सोनिया न भुगते।
- औरत होने की सजा रज्जो, इस घर में भुगत रही थी और सोनिया को ये सजा कभी भी भुगतनी पड़ सकती थी। (पृष्ठ--88)।
औरत होने की सजा नेहा और रोशनी को आखिर भुगतनी पड़ती है। आखिर कसूर क्या था दोनों का, प्रेम करना।
   उपन्यास में अंकुर का भी दोहरा व्यक्तिगत सामने आता है। वह स्वयं प्रेम करता है लेकिन अपनी बहन के प्रति सख्त है।- अपनी बहन को यूँ किसी लड़के के साथ हँसी-मजाक करना, अंकुर को रास न आया। (पृष्ठ-82)
     उपन्यास का मुख्य विषय 'लव जिहाद' है। क्या यह वास्तविक है, या काल्पनिक। क्या सच में कुछ ऐसा चल रहा है कि हमारी लड़कियों को 'दूसरे लोग' अपने प्यार में फंसा कर शादी करते हैं और इसके एवज में उन्हें रुपया-पैसा दिया जाता है। (पृष्ठ-203)।
            आखिर कौन है ये लोग?
            क्या है इनका मकसद?
            कौन फंसा लव जिहाद?
            क्या रहा परिणाम?
  इन प्रश्नों के उत्तर तो 'लव जिहाद...एक चिड़िया' उपन्यास पढकर ही मिल सकते हैं।
      भोपाल के पाठक मित्र बलविन्द्र सिंह ने इस उपन्यास पर टिप्पणी करते हुए कहा है की "जिसे पढते वक्त आपके भाव कुछ और होंगे, समाप्त करने के बाद कुछ और।"
          जैसे -जैसे कहानी आगे बढती है वैसे ही कहानी में रोचकता बढती जाती है। पाठक की जिस सोच के साथ उपन्यास आरम्भ होता है वह सोच पृष्ठ दर पृष्ठ बदलती रहती है। कभी सोच सकारात्मक होती है तो कभी नकारात्मक। एक अच्छे लेखक की यह खूबी है की वह कहानी में‌ निरंतर सस्पेंश बना कर रखे, उसमें रोचकता बना कर रखे। इस उपन्यास को पढते वक्त रोचकता और सस्पेंश बना रहता है।
कहानी का विस्तार  'जुलाई 2013, दिल्ली' से लेकर 'मई 2014 कश्मीर' से उत्तम प्रदेश(उत्तर प्रदेश) होते हुए बैंगलोर तक फैला है।
संवाद
         किसी भी कहानी के संवाद उसके महत्व को बढाने में सहायक होते हैं। संवाद पात्र और परिस्थितियों का वर्णन करने में सक्षम होते हैं।
     इस उपन्यास के संवाद भी बहुत अच्छे हैं।
- लड़की के किशोरावस्था से युवा होने तक का समय हर माता-पिता के लिए चिंता का विषय होता है।(पृष्ठ-49)
- जब ये दंगा होता है न। तो ये गाँव, इलाका‌ नहीं देखता- बस भड़कता जाता है और ऐसे में मारे जाते हैं-गरीब, बूढे, बच्चे और औरतें। (पृष्ठ-53)
- लड़कियों‌ का भी अजीब ही मसला है, खूबसूरत हो तो समाज में बैठे 'शिकारियों' का डर और खूबसूरत न हो तो लड़के वालों से शादी के इंकार का डर। (पृष्ठ-81)
नारी की इज्जत, किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, जाति और वर्ण से ऊपर होती है। (पृष्ठ-175)
ये समाज की ऊँच-नीच, धर्म और राजनीति के ठेकेदार,...क्या उन्हें प्रेम के मायने भी मालूम हैं। (पृष्ठ-196)
- शादी के बाद लड़कियां अपनी किस्मत से समझौता करने की जिंदगी में आगे बढ जाती हैं। (पृष्ठ-204)
आजकल अपराधी तो रोशनी में ही ऐसे-ऐसे अपराध करके चुपचाप निकल जाते हैं जिनके बारे में पहले कभी शैतान सोच भी नहीं पाता था। (पृष्ठ-217)
- बसी हुयी दुनियां को उजाड़ने में एक पल नहीं लगता, मगर लाख कोशिशों के बाद भी उजड़ी हुई दुनियां अपने पहले वाले रुप में नहीं लौट पाती। (पृष्ठ-273)
उपन्यास में कमियाँ-
किसी रचना में कमियाँ रह जाना स्वाभाविक है। कुछ कमियाँ सामान्य हैं जिससे कहानी पर कोई असर नहीं पड़ता।
     - उपन्यास की सबसे बड़ी कमी‌ मेरी दृष्टि में उपन्यास का अतिविस्तार है। अगर लेखक इसमें कुछ कोशिश करता तो इस विस्तार को कम करके उपन्यास को कसावट दी जा सकती थी।
     
तभी बाहर से किसी ने झाँककर दरवाजे पर दस्तक दी।(पृष्ठ-)
    यहाँ 'झाँककर' गलत है, हालांकि यह टंकण में गलती हो कसती है।
- अंकुर उर्फ 'भैया जी' ऊँचे तबकों वालों के गाँव के स्थानीय नेता मलखान सिंह का बेटा था। (पृष्ठ-80)
सोनिया ग्राम सभा के मुखिया की बेटी थी। (पृष्ठ-175)
मलखान सिंह को कभी 'ग्राम मुखिया', कभी...ग्रामों का सरपंच और एक जगह MLA दिखाया गया है।
   ये सामान्य गलतियाँ है जो कथा को प्रभावित ‌नहीं करती।
निष्कर्ष-
           हमारे समाज में पनप रहे जातिवाद, धर्मगत भेदभाव आदि प्रासंगिक विषयों को आधार बना कर लिखा गया यह उपन्यास एक अच्छी रचना है। उपन्यास में वर्तमान में पनप रही बुराइयों का भी चित्रण है।  उपन्यास का अतिविस्तार कहानी को बहुत धीमा बना देता है, जो पाठक को नीरस बना देता है।
              उपन्यास एक बार पढा जा सकता है। मन को छू लेने वाली कथा।
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उपन्यास- लव जिहाल...एक चिड़िया
ISBN- 978-93-86276-55-1
लेखक- राम पुजारी
प्रकाशक- गुल्ली बाबा
पृष्ठ- 280
मूल्य- 180
उपन्यास लिंक- Amazon link
समाचार पत्र में प्रकाशित समीक्षा- लव जिहाद उपन्यास

Friday, 9 November 2018

152. स्वामी विवेकानंद- अपूर्वानंद

स्वामी विवेकानंद-संक्षिप्त जीवनी तथा उपदेश
- स्वामी अपूर्वानंद
स्वामी विवेकानंद जी युवाओं के प्रेरणा स्रोत हैं। इनके जन्म दिवस (12 जनवरी) को 'युवा दिवस' के रूप में मनाया जाता है। कम उम्र में स्वामी‌ जी ने जो मार्ग/उपदेश विश्व को दिया वह अतुलनीय है।
      प्रस्तुत पुस्तक स्वामी जी सम्पूर्ण जीवन की एक छोटी सी झलक प्रस्तुत करती है। उनके जीवन का आदि -अंत इस पुस्तक में वर्णित है। स्वामी जी के जीवन को पढना बहुत रोचक और प्रेरणादायक है। उनके जीवन के संघर्ष मनुष्य को बहुत कुछ सिखाते हैं।
       उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने तो वह विवेकानंद जी के बारे में कहा था,-"नरेन्द्र मानो सहस्रकमल है। इतने सारे लोग यहाँ आते हैं, किंतु नरेन्द्र जैसा दूसरा कोई भी नहीं आया।"
          गुरु रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद (नरेंद्र) की दैवीय प्रतिभा को सबसे पहले पहचान‌ लिया था। उन्हीं के ही मार्गदर्शन में स्वामी जी आगे बढे और आगे 'स्वामी विवेकानंद  रामकृष्ण की वाणी के मूर्तरूप थे।(पृष्ठ-03)
          प्रस्तुत पुस्तक में स्वामी जी के जीवन का काफी रोचक वर्णन मिलता है।  नरेन्द्र के अंतर में जो विराट पुरुष वास करता था, उसी की सक्रिय शक्ति के प्रभाव से उसमें बाल्यावस्था से ही महान तेज दिखायी देता था। (पृष्ठ-7)
             स्वामी विवेकानंद ने भारतवर्ष का भ्रमण भी किया और इस दौरान उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला। स्वामी जी भारत की दशा देखकर बहुत परेशान होते थे। वे कहते थे-"मैंने समूचे भारत का भ्रमण किया है।....सर्वत्र ही आम जनता का भयावह दुःख-दैन्य मैंने अपनी आँखों से देखा। वह सब देखकर मैं व्याकुल हो उठता हूँ। "(पृष्ठ-37)
             गुरु रामकृष्ण जी के सोलह शिष्य थे जिन्होंने संन्यास ग्रहण किया और यही वो शिष्य थे जो बाद में विवेकानंद जी के सहयोगी रहे।
          कुछ सीखने के उद्देश्य से स्वामी जी विदेश यात्रा पर भी गये और यही विदेश यात्रा ने संपूर्ण विश्व के सम्मुख भारत की पहचान बदल दी। विवेकानंद जी के लिए यह यात्रा प्रवास बहुत ही कठिन रहा। श्वेतांग युरोपीय न होने के कारण उन्हे पग-पग पर अपमान और तिरस्कार का सामना करना पड़ा। (पृष्ठ-47)
            11 सितंबर 1883 ई. सोमवार धर्मजगत के इतिहास में चिरस्मरणीय रहेगा। ...इसी दिन प्राचीन भारत के वेदांत धर्म ने स्वामी विवेकानंद को अपना यंत्र बनाकर महान् धर्मसम्मेलन में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था।(पृष्ठ-48)
                     उन्होंने अपना संबोधन 'बहनों और भाईयों '  शब्दों से आरम्भ किया। स्वामी जी के संबोधन में विश्व भ्रातृत्व का बीज, विश्व मानवता की झंकार, वैदिक ऋषि की वाणी सभी कुछ निहित था। (पृष्ठ-49)। स्वामी जी के भाषण से आर्यधर्म, आर्यजाति और आर्य भूमि संसार की नजरों में पूजनीय हो गयी। (पृष्ठ-51)
          स्वामी जी की शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के लिए मार्गदर्शन का काम करती है। उनके विचार किसी धर्म, सभ्यता या देश के न होकर सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याणार्थ हैं।
         
                    हमारे प्रिय प्रेरणा पुरुष भारतीय धर्म संस्कृति के ध्वजावाहक अपने पीछे हम युवा वर्ग पर एक जिम्मेदारी छोड़ कर इस नश्वर संसार से चले गये।
4 जुलाई 1902 ई. को स्वामी विवेकानंद की आत्मा देह-पिंजर से मुक्त होकर असीम में विलीन हो गयी। (पृष्ठ-78)
                        शान्ति:! शान्तिः! शान्तिः!!
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पुस्तक-   स्वामी विवेकानंद, संक्षिप्त जीवनी तथा उपदेश
लेखक-   स्वामी अपूर्वानंद
अनुवाद-  स्वामी वागीश्वरानंद, स्वामी विदेहात्मानंद
प्रकाशक- स्वामी ब्रह्मास्थानंद, धंतोली, नागपुर-440012
पृष्ठ-         90
मूल्य-       10₹
प्रथम प्रकाशन- 1984
प्रकाशन-    सत्रहवाँ-07.06.2013
 

Wednesday, 7 November 2018

151. सिंगला मर्डर केस- सुरेन्द्र मोहन पाठक

सिंगला मर्डर केस- सुरेन्द्र मोहन पाठक, मर्डर मिस्ट्री, मध्यम स्तर।

     - हिमेश सिंगला एक पचास वर्ष का गंजा व्यक्ति था जो विग लगाकर अपना बचाव करता था।
      - हिमेश सिंगला मामूली शक्ल- सूरत वाला व्यक्ति था लेकिन औरतों का रसिया था।
    - हिमेश सिंगला एक लम्पट प्रवृत्ति वाला व्यक्ति था जो एक रात अपने घर के ड्राइंगरूम में मरा पड़ा था।


      हिमेश सिंगला की अस्वाभाविक मौत या हत्या के शक के दायरे में कई लोग आते हैं।
          हिमेश सिंगला का एक भाई है शैलेष सिंगला जिसके बुलावे पर ब्लास्ट समाचार पत्र के रिपाॅर्टर सुनील चक्रवर्ती का इस केस में हस्तक्षेप होता है। सुनील ही वह व्यक्ति है जो असली कातिल तक पहुंचता है।
    -  एक बड़े सम्पन्न परिवार का रोशन चिराग बताया जाता है। यानि कि फाईनांशल फैमिली बैकग्राउंड तो बढ़िया है ही, ऊपर से ब्रोकेज का उसका अपना बिजनेस भी ऐन फिट है। कैसानोवा जैसी छवि का आदमी था और सोसायटी के लिहाज से पेज थ्री पर्सनैलिटी माना जाता था। (पृष्ठ-16)
 और एक दिन इसी पर्सनैलिटी की कोई हत्या कर देता है।
वो एक सॊफाचेयर बैठा हुआ था जबकि किसी ने उसका भेजा उड़ा दिया था। (पृष्ठ-17)
         उसके घर में, उसी की गन से, उसी के सोफाचेयर पर किसी ने उसकी हत्या कर दी। इंस्पेक्टर प्रभुदयाल इस केस की जाँच करता है और दूसरी तरफ पत्रकार सुनील चक्रवर्ती भी इस केस पर कार्यरत है। लेकिन दोनों का तरीका अलग-अलग है। पुलिस की जाँच में एक व्यक्ति स्वयं को कातिल के तौर पर पुलिस के समक्ष प्रस्तुत करता है लेकिन वह सुनील को कातिल नजर नहीं आता।
 एक आदमी अपनी जुबानी कहता है की वो कातिल है, तुम कहते हो नहीं है। (पृष्ठ-189) 
           सुनील जो की एक खोजी पत्रकार है वह इस मर्डर केस पर कार्य करता है। इसके लिए वह समय-समय पर अपने मित्र रमाकांत और पुलिस विभाग से भी जानकारी एकत्र करता है। सुनील का अपना एक अलग तरीका है जो पुलिस विभाग से अलग है। इस मर्डर की छानबीन पुलिस भी करती है लेकिन सुनील चक्रवर्ती अपने तरीके से पुलिस से कुछ ज्यादा सक्रिय है लेकिन जहां उसे पुलिस की जरूरत होती है वह पुलिस की मदद लेता है।

      उपन्यास में एकमात्र रमाकांत ही ऐसा व्यक्ति है जो कुछ स्तर तक प्रभावित करता है स्वयं सुनील भी कोई अच्छा प्रभाव पाठक पर स्थापित नहीं कर पाता।
- यूथ क्लब के रमाकांत का अंदाज ही निराला है- "मैं कार पर यहाँ से निकला तो मोड़ पर ही एक्सीडेंट हो गया। फौरन मैंने महाराज को फोन खड़काया तो जानते हो क्या जवाब मिला?"
- "क्या?"
- कार कुंभ राशि थी और उसके लिए उस शनिवार की भविष्यवाणी थी कि गैराज से ..बाहर न निकाले।"
- "क्या कहने।"
- "दो राशियां क्लैश कर गयी इसलिए नतीजा उलट हुआ।" (पृष्ठ-163)
    रमाकांत का बोलने का अंदाज उपन्यास को कुछ हद तक संभालने में सक्षम है।
     उपन्यास मूलतः एक मर्डर मिस्ट्री है। जो एक कत्ल से आरम्भ होकर एक -एक संदिग्ध से होकर आगे बढती है। उपन्यास में या पात्रों में भी ज्यादा रोचकता या कहानी में कोई घूमाव नहीं बस एक जगह जब एक पात्रों स्वयं को कातिल के तौर पर प्रस्तुत करता है तो कुछ रोचकता बढती है।
         
- उपन्यास इतनी धीमी रफ्तार से आगे बढता है की पाठक उकता जाता है। कहानी का अनावश्यक विस्तार और धीमी गति और उस पर एक जैसे दृश्य उपन्यास के पाठन को बाधित करते हैं। पत्रकार सुनील के पास भी ज्यादा संभावनाएं नहीं है वह बस चंद पात्रों से प्रश्न-उत्तर करता रहता है जिससे सभी दृश्य एक जैसे नजर आते हैं।
     उपन्यास कहानी के स्तर पर अच्छी है लेकिन प्रस्तुतीकरण इसका अच्छा न हो सका
निष्कर्ष- 
                    प्रस्तुत उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री है जिसे सुनील नामक पत्रकार हल करता है।   उपन्यास की रफ़्तार बहुत ही धीमी है। इसलिए उपन्यास ज्यादा दिलचस्प नहीं बन पाया। उपन्यास नीरस ज्यादा लगता है।
  उपन्यास को बस एक बार पढा जा सकता है।
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उपन्यास- सिंगला मर्डर केस
लेखक- सुरेन्द्र मोहन‌ पाठक
प्रकाशक- राजा पॉकेट बुक्स- दिल्ली
पृष्ठ- 263
मूल्य- 100₹



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असली अपराधी - सुरेन्द्र मोहन पाठक
थ्रिलर।

उपन्यास के साथ एक और कहानी उपलब्ध है लगभग पचास पृष्ठ की यह कहानी उपन्यास पर भारी पड़ती है। जो लगभग 250 पृष्ठ का उपन्यास न कर सका वह मनोरंजन 50 पृष्ठ की कहानी कर गयी।
        यह कहानी भी एक मर्डर मिस्ट्री है। तीन व्यापारिक दोस्त हैं,बंसल, माथुर और विनोद बाली।
        एक व्यापारिक बात पर माथुर और बाली की आपस में बहस होती है और उसी रात माथुर का कत्ल हो जाता है। कत्ल का इल्जाम आता है विनोद बाली पर।

              यह कहानी क्रिमिनालोजिस्ट विवेक आगाशे सीरिज की है। "मैं क्रिमिनालोजिस्ट हूँ। अब तक दिल्ली में फेमस हो चुकी 'क्राइम क्लब' का संचालक हूँ।" 
                'मुझे हर उस मर्डर केस में दिलचस्पी है जिसमें मुझे कोई पेच दिखाई दे।"
                और उस पेच के बल विवेक आगाशे इस केस को देखता है। अपने स्तर पर कार्यवाही करता है।
              विनोद बाली अपने पक्ष में जो भी सबूत इकटे करता है वे भी एक-एक कर गायब हो जाते हैं। विवेक आगाशे भी इस घटना हैरान है।
              कहानी में रहस्य शुरु से अंत तक जबरदस्त है। कहानी स्वयं में बांधने में सक्षम है।
              पाठक भी आश्चर्यचकित होता है की आखिर ये सब कैसे हो रहा है हालांकि पाठक भी यहाँ एक जासूस बनता‌नजर आता है लेकि‌न यह लेखक की प्रतिभा है की वो असली कातिल तक किसी जो भी पहुंचने नहीं देता।
                कहानी जबरदस्त, रोचक और पठनीय है।

       


      

Wednesday, 31 October 2018

150. अंतरिक्ष का खुदा- राज भारती

 वह बन बैठा चाँद का शैतान.....
अंतरिक्ष का खुदा- राज भारती, थ्रिलर उपन्यास, मध्यम स्तर।

वह खुद को अंतरिक्ष का खुदा मानता है।
वह चाँद की धरती पर अपना राज्य स्थापित करना चाहता था।
चाँद वासी उसे नक्षत्रों का खुदा कहते थे।
वह चन्द्र वासियों को मार रहा था।
वह पृथ्वी वासियों का दुश्मन था।
वह चन्द्रयान‌ को गायब/ नष्ट करता था।
वह ब्रह्माण्ड पर अपना विजयी परचम फहराना चाहता था।

कौन था वह?
वह कहां से आया था?

ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर तो सिर्फ राज भारती के उपन्यास 'अंतरिक्ष का खुदा' को पढ़कर ही मिल सकते हैं।


               लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में राज भारती एक ऐसे लेखक हैं जिन्होंने विभिन्न सीरिज लिखे हैं। हो सकता है यह अतिशयोक्ति हो पर राज भारती ने विभिन्न सीरिज और असंख्य उपन्यास लिखे हैं। (राज भारती द्वारा लिखे गये उपन्यासों की सही सख्या किसी को भी ज्ञात नहीं)
                      राज भारती द्वारा लिखा गया उपन्यास 'अंतरिक्ष का खुदा' विजय- सिंहगी सिरिज का उपन्यास है। इस उपन्यास का सारा घटनाक्रम चाँद की धरती पर घटित होता है।
              अमेरिका ने अपना अंतरिक्ष यान चाँद की धरती पर भेजा, जो पूर्णतः सफल रहा।
       चन्द्र विजय मानव की एक‌ महान विजय थी। इसलिए सारा विश्व हर्ष विभोर था। (पृष्ठ-06)
         इस अभियान से प्रेरित होकर अन्य देश भी इस लक्ष्य को हासिल करने को प्रेरित हुये। जिनमें एक भारत भी था। भारत के वैज्ञानिक बनर्जी जी ने व्यक्तिगत तौर पर एक घोषणा की "वह शीघ्र ही दो रॉकेटों के निर्माण में सफल हो जायेगा जो.. मानव को एक बार फिर चाँद की धरती पर उतारने में सफलता प्राप्त करेंगे।" (पृष्ठ- 09-10)
   
        अमेरिका का अपोलो सीरिज और भारत का साइको सीरिज चन्द्रयान चन्द्रमा की धरती पर पहुंचते हैं। यह भारत और विश्व के लिए खुशी का समय था। लेकिन एक समस्या आ गयी।
        एक भयानक घटना हो गयी।
        जिसने सारे विश्व को चौंका दिया बल्कि विश्व के वैज्ञानिकों को भी भयभीत कर दिया।
(पृष्ठ-49) यह घटना थी ऐसी की चन्द्रयान के यात्री भी दहल उठे।
अचानक अंतरिक्ष में रोशनी की एक लंबी और विचित्र सी लकीर खिंचती चली गयी और अपोलो तरह से टकरा गयी। (पृष्ठ-50)  इस समस्या का कोई समाधान भी नजर नहीं आ रहा था। अंतरिक्ष यात्रियों ने तुरंत पृथ्वी पर अपना संदेश भेजा।
हमें किसी अज्ञात खतरे का आभास हो रहा है। पता नहीं किस प्रकार बिजली की एक तेज लकीर अंतरिक्ष में उत्पन्न हुयी और हमारे यान को चारों तरफ से घेर लिया। (पृष्ठ-50,51)
यह बिलकुल नये ढंग की विपत्ति थी जिसका हल न तो अंतरिक्ष यात्रियों‌ के पास था और न धरती के वैज्ञानिकों के पास। (पृष्ठ-55) और किसी को यह भी नहीं न पता की वह अज्ञात लकीर कहां से आती है और उसे कौन भेजता है। कौन है वह शैतान।
चाँद की वह शक्ति नहीं चाहती कि चाँद की पृथ्वी पर कोई अन्य व्यक्ति उतरे। (पृष्ठ-57) और वह शक्ति अज्ञात है।
भारतीय अंतरिक्ष यान भी इस चमकती लकीर की चपेट में आकर नष्ट हो गया।
साइको प्रथम अंतरिक्ष में नष्ट हो चुका था। इस बारे में कोई संदेह न रह गया था।  क्योंकि धरती की प्रयोगशालाओं में टेलिविज़न स्क्रीनों पर उसे नष्ट होते हुए स्पष्ट देखा गया था।(पृष्ठ-69)
आखिर क्या रहस्य था चाँद पर जहां से अंतरिक्ष यान नष्ट हो गया?
   इसी रहस्य को सुलझाने को निकल पड़े दो और अंतरिक्ष यान।  भारत से साइको और अमेरिका से अपोलो। भारत का जासूस विजय, अशरफ, प्रोफेसर बनर्जी और अमरीका से जासूस माइक अपने अंतरिक्ष यात्रियों के साथ।
   लेकिन चाँद की तो दुनिया ही अलग थी। वहाँ तो चन्द्रवासी लोगों की आबादी थी। जब अंतरिक्ष यात्रियों ने वहाँ लोगों को देखा तो हैरान रह गये।  "मैं तुम्हारी दशा समझ सकता हूँ पृथ्वी के वासियो। तुम मुझे यहाँ देखकर चकित हो लेकिन तुम नहीं जानते कि चाँद पर मैं पचास वर्ष पूर्व आया था।" (पृष्ठ-129) और यहाँ  चाँद पर एक मूल‌ जाति का निवास है। (पृष्ठ-130)
   "पृथ्वी के वैज्ञानिक.... वे  यह भी नहीं जानते कि पचास वर्ष पूर्व एक पृथ्वी का वासी चाँद पर पहुँच चुका है।" (पृष्ठ-130)
   लेकिन चाँद के वासी भी एक शैतान से परेशान हैं। वह शैतान जिसने चाँद के लोगों का जीना हराम कर रखा है।  "चाँद पर इतनी शक्ति किसी के पास नहीं है जो इस शैतान से टक्कर ले सके।" (पृष्ठ-157)
  
   -  क्या जासूस मित्र इस रहस्य को सुलझा पाये?
   - कहां गायब हो गये चन्द्रयान?
   - पचास वर्ष पूर्व चाँद पर पहुंचने वाला व्यक्ति कौन था?
   - चाँद का शैतान कौन था?
    राज भारती का यह उपन्यास एक अलग विषय को प्रस्तुत करता एक जासूसी-थ्रिलर उपन्यास है।
उपन्यास की कहानी अलग विषय और पृष्ठभूमि पर आधारित है। जो पाठक के लिए रोचकता पैदा करती है। लेकिन उपन्यास में लेखक चाँद की धरती को प्रस्तुत तो करता है लेकिन पाठक को कहीं यह अहसास दिलाने में सफल नहीं हो पाता की घटनाक्रम चाँद पर घटित हो रहा है।
              उपन्यास पढते वक्त कुछ अलग अहसास नहीं होता। लेखक अगर कोशिश करता तो यह उपन्यास बहुत अच्छा बन सकता था। लेकिन अब यह मात्र एक एक्शन उपन्यास बन कर रह गया। अगर चाँद की भूमि का अच्छा वर्णन होता, वहाँ के लोगों के बारे में और जानकारी मिलती तो अच्छा था। चन्द्र वासियो और शैतान की लड़ाई का  भी ज्यादा वर्णन नहीं है। एक वह व्यक्ति जो चाँद पर पहुँच गया, वहाँ अपना अधिकार जमा लिया, वह शक्तिशाली तो रहा होगा लेकिन विजय-माइक के समक्ष वह एक मामूली सा गुण्डा नजर आता है जो अनावश्यक डायलाॅग बाजी करता रहता है।
                 उपन्यास का आरम्भ वैज्ञानिक/ तकनीकी जानकारी से संबंधित है तो उपन्यास का अंत एक्शन दृश्यों से भरपूर है।  अगर उपन्यास के अंत में विलन को खत्म करते वक्त कुछ तकनीक इस्तेमाल होती हो उपन्यास में रोचकता अवश्य बढती लेकिन लेखक उपन्यास के अंत में जासूस और खलनायक को आपस में ऐसे उलझते दिखाता है जैसे दोनों सड़क पर लड़ने वाले बदमाश हों।
        अगर इस उपन्यास पर अच्छी मेहनत की जाती तो यह एक अच्छा विज्ञान गल्प उपन्यास साबित हो सकता था।
             
                      
   निष्कर्ष-
                  उपन्यास मध्यम स्तर का है। उपन्यास अपने पृषठभूमि के आधार पर पठनीय है, लेकिन इस उपन्यास को जिस स्तर तक रोचक होना था उतना रोचक है नहीं।
           उपन्यास एक बार अच्छा मनोरंजन साबित हो सकता है।
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उपन्यास- अंतरिक्ष का खुदा
लेखक-    राज भारती
प्रकाशक- पवन पॉकेट बुक्स- दिल्ली
पृष्ठ-       203
उपन्यास लिंक-     अंतरिक्ष का खुदा- राज भारती        



149. वेयरवुल्फ- नितिन मिश्रा

खून का प्यासा मानव भेड़िया
वेयरवुल्फ- नितिन मिश्रा।
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एक शाॅर्ट फिल्म 'वेयरवुल्फ' के लिए फिल्म की टीम एक खतरनाक जंगल में अपनी फिल्म की शुटिंग करने के लिए पहुंची।
             अभी शुटिंग आरम्भ भी न हुयी और एक खतरनाक वेयरवुल्फ अर्थात् मानव भेडिया वास्तव में वहां आ पहुंचा।
             जो घटनाक्रम एक शाॅर्ट फिल्म में दर्शाना था वह खूनी खेल वहाँ वास्तव में खेला गया।
             क्या यह संयोग था या एक षड्यंत्र?
            
उपन्यास की कहानी वास्तव में दिल दहला देने वाली है। पाठक पृष्ठ दर पृष्ठ यही सोचता है की आखिर वास्तविकता क्या है। क्या यह षड्यंत्र है या फिर संयोग। अगर संयोग है तो बहुत भयानक संयोग है अगर षड्यंत्र है तो कौन है षड्यंत्र कर्ता।
            
                         उपन्यास का आरंभ होता है शांंतनु से। शांतनु ने अपने जीवन की सारी जमा पूंजी अपने आखरी दाँव, अपनी शाॅर्ट फिल्म 'वेयरवुल्फ' पर लगा दी। शांतनु अपनी टीम के साथ 'ब्लैक आॅर्किड वुड्स' नामक  जंगल में फिल्म की शुटिंग के लिए पहुंचा।
वेयरवुल्फ अर्थात् मानव भेड़िया पर आधारित थी यह शाॅर्ट फिल्म। लेकिन आपसी तकरार के चलते फिल्म के पात्र फिल्म में काम‌ करने के लिए मना कर देते हैं और शुटिंग स्थल से फिल्म को छोड़ कर निकलने की तैयारी करते हैं।
          इसी दौरान कहानी में‌ प्रवेश होता है मानव भेड़िये का।  सभी सदस्यों पर मानव भेड़िये के आक्रमण आरम्भ हो जाता है।  इस बार पेड़ के पीछे से निकलने वाली आकृति एक मानव भेड़िये यानी वेयरवुल्फ की थी। (पृष्ठ-24)
        

Thursday, 25 October 2018

148. बम ब्लास्ट- वेदप्रकाश कंबोज

वेदप्रकाश कंबोज जी ले साथ। 3.06.2018
न्यूट्रॉन बम का ब्लास्ट
वेदप्रकाश कंबोज उपन्यास जगत के एक वो सितारे हैं जिनकी लौ उस सुनहरे समय के समाप्त होने के बाद भी जगमगा रही है। उनके उपन्यास की चर्चा आज भी है।

      वेदप्रकाश कंबोज जी का मेरे द्वारा पढे जाना वाल शायद यह प्रथम उपन्यास है। अगर किशोरावस्था में कोई पढा भी होगा तो याद नहीं रहा। वह दौर भी ऐसा था जिसमें पढा तो खूब लेकिन आज स्मृति में नहीं।

3 जून 2018 को दिल्ली में कंबोज जी के आवास पर उनसे मिलना हुआ और उपन्यास संबंधी खूब चर्चाएँ भी चली।
         वेदप्रकाश कंबोज जी के कुछ उपन्यास घर पर उपलब्ध हैं, लेकिन पढने का समय न मिल पाया। अब आबू रोड़ के लेखक मित्र अमित श्रीवास्तव जी के पास कंबोज जी का उपन्यास 'बम ब्लास्ट' मिला तो पढने के किए ले आया।
      'बम ब्लास्ट' उपन्यास आज तक के सबसे विध्वंसक बम न्यूट्रॉन पर आधारित है। भारतीय जासूस विजय, अंतरराष्ट्रीय अपराधी अलफांसे, अफगानिस्तान के वैज्ञानिक ....बर्फीले तूफान में फंस जाते है। वह भी ऐसी परिस्थिति में जहाँ न्यूट्रॉन बम का विस्फोट होने वाला है।
           एम. एल. बिरजोई एक भारतीय वैज्ञानिक है जिसका प्लेन एक तूफान में घिर कर पड़ोसी देश जगरान के बर्फीले पहाड़ पर दुर्घटना ग्रस्त हो जाता है। एम. एल. बिरजोई के पास होता है एक न्यूट्रॉन बम।
          हमारा एक सैनिक प्लेन बिना इजाजत के दूसरे देश की सीमा में जाकर क्रैश हो गया....हमारे दुश्मन इस दुर्घटना का नाजायज़ फायदा उठाने की कोशिश करेंगे....।(पृष्ठ-34) 

Thursday, 18 October 2018

147. मुअनजोदड़ो- ओम थानवी


       मुअनजोदड़ो नाम सुनते ही आँखों के समक्ष एक तस्वीर उभरती है, एक प्राचीन और सुव्यवस्थित शहर की। इस तस्वीर के साथ एक कसक भी उठती है वह कसक है की यह शहर क्यों, कैसे जमीन में दफन हो गया। कहां गये इस प्राचीन सभ्यता के लोग। लेकिन उत्तर आज तक न मिल सके।
सिंधु घाटी सभ्यता के विषय में स्कूल, काॅलेज से ही पढते आये हैं। जितना इस सभ्यता को जाना उतनी ही इच्छा और प्रबल हो उठी।


अगर आपको सिंधु घाटी सभ्यता को समझना है तो ओम थानवी जी द्वारा लिखी गयी पुस्तक 'मुअनजोदडो' बहुत उपयोगी है। यह पुस्तक न तो इतिहास की है ना साहित्य की। यह तो साहित्य और इतिहास का मिश्रण कर उसे एक कलात्मक रूप प्रदान करती है। इस यात्रा वृतांत के माध्यम से मुअनजोदड़ो का जो कलात्मक शैली में चित्रण यहाँ किया गया है वह एक अनोखी अनुभूति देता है, एक ऐसी अनुभूति जिसमें आपको अहसास होगा की आप स्वयं मुअनजोदङो की गलियों में घूम रहे हो।
मुअनजोदड़ो अर्थात् मुर्दों का टीला। रांघेग राघव ने भी इस विषय पर एक उपन्यास लिखा है 'मुर्दों का टीला'।

यह एक संस्मरणात्मक यात्रा वृतांत है। जनसत्ता अखबार के संपादन ओम थानवी का। इस यात्रा वृतांत या मुअनजोदड़ों वर्णन की विशेषता है की यह वर्णन जीवंत है, और इस जीवन को पाठक भी महसूस करता है।
                   मुझे प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के दौरान इस वृतांत को पढने का अवसर मिला, हालांकि वह इस पुस्तक का कुछ अंश ही था, लेकिन उसने जो मन पर प्रभाव छोड़ा वह प्रभाव ही इस पुस्तक को पढने को प्रेरित करने के लिए काफी था। अब यह पुस्तक 'राजकीय आदर्श माध्यमिक विद्यालय-माउंट आबू' में‌ मिला तो पढने बैठ गया।
ओम थानवी की भाषा शैली ही इतनी अच्छी है की वह मन पर एक अमिट प्रभाव छोडती है।


               पाकिस्तान में स्थित एक प्राचीन नगर है मुअनजोदड़ो जो वक्त के साथ खत्म हो गया। उस पर न जाने कितनी मिट्टी की परतें बिछ गयी। वक्त के साथ मुअनजोदड़ो अपना अस्तित्व गया बैठा तो अपने समय का एक महानगर गायब हो गया।
                    मिट्टी के नीचे एक शहर दब गया, क्यों और कैसे यह प्रश्न आज भी अनुतरित है। इस शहर पर मिट्टी के टीले स्थापित हो गये। अब शहर न रहा वहाँ मिट्टी के टीले थे। उन्हीं टीलों पर बौद्ध धर्म के मठ स्थापित हो गये। वक्त फिर बदला और वह बौद्ध मठ भी खत्म हो गये। यहाँ एक बौद्ध स्तूप भी था।
                  एक पुरातत्त्वज्ञ यहाँ आये। सन् 1922 जब राखालदास बद्योपाध्याय‌ यहाँ आए, तब वे इसी स्तूप की खोजबीन करना चाहते थे। ....धीरे-धीरे यह खोज विशेषज्ञों को सिंधु घाटी सभ्यता की देहरी पर ले आयी। (पृष्ठ-50)
लेकिन खुदाई ले दौरान उनको एहसास हुआ की इन बौद्ध मठों/ स्तूप के नीचे भी कुछ और है। इस तरह एक स्तूप की खोज से वे विश्व की प्राचीन सभ्यता तक पहुंचे। यहाँ स्थित बौद्ध स्तूप को नागर भारत का सबसे पुराना लेंड स्केप कहा जाता है। (पृष्ठ-51)
               इस खोज से भारत की गणना भी एक प्राचीन सभ्यता वाले देश के रूप में होने लगी। मुअनजोदडो ही था जिसने सबसे पहले भारत के इतिहास को पुरातत्त्व का वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।(पृष्ठ-38)

         मुअनजोदड़ो एक विशाल और विकसित सभ्यता थी। इसकी सभ्यता की संस्कृति की झलक वहाँ से प्राप्त अवशेषों से भी होती है। यहाँ का नगर, गलियाँ, नालियाँ आदि एक तय पैमाने के अनुसार निर्मित है। वर्तमान में हमारे पास चाहे जितनी सुविधा है लेकिन हम कोई व्यवस्थित शहर नहीं बसा सके लेकिन मुअनजोदड़ो की उस समय की व्यवस्था वर्तमान चंडीगढ़ शहर से मिलती है। क्या चंडीगढ़ की प्रेरणा वहीं से आयी है। कोई घर सङक पर नहीं खुलता, उनके प्रवेश द्वार अंदर गलियों में है। (पृष्ठ-61)
                यहाँ बहुत कुछ अदभुत मिला। यहाँ से लगभग सात सौ के करीब कुएं मिले। एक तरफ यह सभ्यता सिंधु नदी के किनारे बसी थी दूसरी तरफ सात सौ के करीब कुएं, यह रहस्य समझ में नहीं आया। विद्वान इरफान हबीब कहते हैं -"सिंधु घाटी सभ्यता संसार में पहली ज्ञात संस्कृति है, जो कुएँ खोद कर भू-जल तक पहुंची। (पृष्ठ-63)
सिर्फ कुएं ही नहीं और भी बहुत कुछ यहाँ से मिला। याजक नरेश, नर्तकी मूर्ति........... यहाँ से प्राप्त एक नर्तकी की मूर्ति के विषय में पुरातत्त्वज्ञ मार्टिन वीलर ने कहा है- "मुझे नहीं लगता कि संसार में इसके जोङ की कोई दूसरी चीज होगी। (पृष्ठ-43)


                   ओम थानवी साहब ने इस संस्मरणात्मक यात्रा वृतांत को जिस भाषा शैली लिखा है वह पाठक को अनुभूति करवा देती है जैसे पाठक स्वयं उसी प्राचीन महानगर नें खड़ा है। उसकी गलियां में घूम रहा है। वहाँ के घरों को, वहाँ की सभ्यता और संस्कृति को महसूस कर रहा है।   मुअनजोदड़ो की खूबी यह है कि इस आदिम शहर की सड़को और गलियों में आप आज भी घूम-फिर  हैं। यहां की सभ्यता और संस्कृति का सामान चाहे अजायबघरों की शोभा बढ़ा रहा हो, शहर जहां था अब भी वहीं है। आप इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिका कर सुस्ता सकते हैं। वह कोई खण्डहर क्यों न हो, किसी घर की देहरी पर पाँव रख कर सहसा सहम जा सकते हैं, जैसे भीतर अब भी काई रहता हो। रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं। (पृष्ठ-49,50)

                 इस सभ्यता की खुदाई तो काफी समय तक चलती रही लेकिन‌ इसकी प्राचीनता का आंकलन काफी समय बाद हो सका। मुअनजोदड़ो के खण्डहर 1924 में दुनियां के सामने आए। इनकी खुदाई का श्रेय जाॅन‌ मार्शल को दिया जाता है। (पृष्ठ-44) और उसके बाद तो काफी पुरातत्ववेता यहाँ खुदाई करते रहे। जैसे, डीआर भण्डारकर -1911, दयाराम साहनी- 1917, राखालदास बनर्जी- 1922-23, माधोस्वरुप वत्स, काशीनाथ दीक्षित आदि।

         समय के साथ मुअनजोदड़ो की खुदाई बंद हो गयी। लेकिन कुछ प्रश्न आज भी अधूरे हैं जिनका उत्तर किसी भी विद्वान के पास नहीं। यह अधूरापन कब खत्म होगा यह तो भविष्य ही तय करेगा लेकिन जब भी इन अधूरे प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे तब सिंधु घाटी सभ्यता प्राचीन इतिहास पर ....
1. यह सभ्यता खत्म कैसे हो गयी?
2. इस शहर का वास्तविक नाम क्या था?
3. आखिर कहां और क्यों चले गये एक विकसित सभ्यता के लोग?
4. इस सभ्यता की लिपि आज तक पढी नहीं गयी।

          ओम थानवी का यात्रा वृतांत 'मुअनजोदड़ो' बहुत ही रोचक है। पाठक को यह प्राचीन सभ्यता के शहर मुअनजोदड़ो का भ्रमण करवाने में सक्षम है। अगर सहृदय पाठक है तो ओम थावनी जी भावों को जगाने वाली इस शैली में खो जायेगा।

किताब आवरण चित्र मुअनजोदड़ो से प्राप्त मिट्टी का मुखौटा है।
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पुस्तक- मुअनजोदड़ो (यात्रा वृतांत)
लेखक- ओम थानवी
प्रकाशक- वाणी प्रकाशन
पृष्ठ-118
मूल्य- 200₹
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किताब का लिंक- वाणी प्रकाशन



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अतिरिक्त तथ्य किताब से...
- पाकिस्तान में सबसे ज्यादा हिंदू- कोई पच्चीस लाख- सिंध में रहते हैं। (पृष्ठ-23)
- मुस्लिम राज सबसे पहले सिंध में स्थापित हुआ।(पृष्ठ-23)
सन् 711 में सिंध शासक दाहर पर मोहम्मद बिन कासिम ने हमला किया।

- पुरातत्त्व को इतिहास का रोशनदान कहा जाता है। (पृष्ठ38)
- झूले लाल जी के गीत 'दमा दम मस्त कलंदर' में आया 'सेवण' शब्द सिंध की एक जगह का नाम है।


Friday, 12 October 2018

146. सात रोचक कहानियाँ

सात अधूरी कहानियाँ....


                    राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय- माउंट आबू, सिरोही के पुस्तकालय में मुझे एक पुस्तक मिली, जिसमें कहानियाँ काफी रोचक हैं। इस कहानी संग्रह पर लेखक, प्रकाशक और पुस्तक का भी नाम भी नहीं है। पुस्तकालय के रिकाॅर्ड में भी सिर्फ पुस्तक का क्रमांक वर्णित है। इस कहानी संग्रह की कहानियाँ काफी रोचक और दिलचस्प है। 

 
                       संग्रह में कुल सात कहानियाँ है, और सभी कहानियाँ एक अधूरेपन को सूचित करती हैं। इस संग्रह की सभी कहानियाँ हत्या से से संबंधित है और सविधान की दृष्टि में हत्यारा अज्ञात हैं, लेकिन जन दृष्टि में हत्यारे कौन है यह सब को पता है।
                     इसे भारतीय सविधान का लचीलापन कहें या कमजोरी की लोग हत्या जैसा निकृष्ट कृत्य करके भी आजाद हैं और जो इस दुनियां से चला गया उसके साथ कोई इंसाफ नहीं। यह कैसी न्याय प्रणाली, यह कैसा सविधान। मूलतः यह कहानी संग्रह कुुुछ ऐसे अधूरे किस्सों का संग्रह है।


इस संग्रह में कुल सात कहानियाँ है।
1. हत्या बनाम आत्महत्या
2. इनाम कहकहे का
3. पति या प्रेमी
4. ...और वह गायब हो गयी
5. ?
6. किस्सा एक राजा की प्रेमिका का
7. किस्सा एक और राजा की प्रेमिका का।
कहानी संख्या पांच का शीर्षक प्रश्नवाचक चिह्न (?) है।

                 पहली कहानी हत्या बनाम आत्महत्या एक ऐसे प्रेमी जोड़े की कहानी है जिसमें प्रेमी की हत्या हो जाती है और शक प्रेमी पर जाता है। पूर्वी पंजाब की उस सुंदर किंतु विधवा रानी भगवान कौर ने अपने प्रेमी को अमृत के रूप में विष दिया या अभागे प्रेमी काहनचंद ने स्वयं विष पीकर अमर होने की कोशिश की, यह समस्या आज तक नहीं सुलझ सकी।
                    यह एक विधवा रानी की प्रेम कथा है जो काहन चंद नामक व्यक्ति से प्रेम कर बैठती है। लेकिन समय के साथ और लोक लाज के कारण रानी प्रेम राह से कदम पीछे हटा बैठी।
               एक दिन महल में प्रेमी काहन चंद का शव मिलता है और इल्जाम लगता है रानी पर। लेकिन संदेह का लाभ देते हुए रानी को बरी कर दिया गया।
                 माननीय जजों के उस मान्य फैसले के बावजूद जनसाधारण के दिमाग में मुद्दतों एक प्रश्न रह-रहकर उभरता रहा कि आखिर - वह हत्या थी या आत्महत्या?

              दूसरी कहानी 'इनाम कहकहे का' तीस वर्षीय नौजवान नवाब मुहम्मद नवाज खां की कहानी है। नवाब की बगल में उसकी प्रेयसी शमशाद बाई मृत्यु पड़ी थी। उसकी हत्या किसी ने गोली मार कर दी। लेकिन नवाब साहब का कहना वह हत्या उन्होंने नहीं की- "भला मैं शमशाद बाई को कैसे कत्ल कर सकता था? वह मुझे बहुत पसंद थी।"
यह मुकदमा भी किन्हीं कारणों से अधूरा रह गया।


तीसरी कहानी पति या प्रेमी है।  यह कहानी यह कहानी है अंबाला शहर की, 6 फरवरी 1950 ई. की। मैं बाहर बैठी थी कि उन्होंने पूछा, दवा कहां है? मैंने बता दिया कि अलमारी में है- बस, गलती से वे नेगेटिव धोने की दवा पी गये। (पृष्ठ-33) यह बयान है मृतक की पत्नी पलविन्द्र कौर  का।
                     हत्या का इल्जाम लगा पत्नी पलविन्द्र कौर पर और उसके एक भाई कथित प्रेमी पर। कारण- अपनी जांच-पड़ताल द्वारा पुलिस भी इस नतीजे पर पहुंची थी कि अपने ताऊ के लड़के महेन्द्र सिंह के साथ पलविन्द्र कौर के अनुचित संबंध थे।(पृष्ठ-37)
                          इस हत्याकाण्ड के बाद महेन्द्र सिंह फरार हो गया। एक लंबी जांच के पश्चात पलविन्द्र कौर को बरी कर दिया गया, लाश कहीं मिली नहीं। लेकिन प्रेमी महेन्द्र सिंह अब भी लापता था।(पृष्ठ-42)


                       .....और वह गायब हो गयी!  
शीर्षक स्वयं में बहुत रोचक है। ऐसी ही रोचक यह कहानी है। यह कहनी है लखनऊ की बाईस वर्षीय बिसलिया की। लेखक लिखता है- आज से बाईस वर्ष पूर्व 26 मई 1943 की रात को वह ऐसी गायब हुयी की आज तक उसका सुराग नहीं मिल सका।
           बिलसिया गायब कर दी गयी या स्वयं कहीं चली गयी यह रहस्य तो आज भी यथावत है। लेकिन स्थानीय जनता जानती है की असली कहानी क्या है।
          लखनऊ की एक सरकारी अफसरों की बस्ती में अपने इस रंग-रूप तथा यौवन के कारण बिलसिया आफत की परकाला कहलाती थी, और एक आई. सी. एस. अफसर ब्रजभूषण सिंह के यहाँ आया का काम करती थी। (पृष्ठ-43)
           गरीब बिलसिया को प्रेम करने की सजा उसके अफसर ने ऐसी दी की बिलसिया का आज तक पता न चला। क्या प्रेम इतना बङा गुनाह हो गया जिसकी सजा उसे मौत के रूप में‌ मिली।
बिलसिया गायब हो गयी या कर दी गयी अदालत यह तय ना कर पायी और अफसर ब्रजभूणष सिंह को बरी कर दिया गया। और यह भी सिध्द नहीं होता कि बिलसिया वाकई मर चुकी है या गायब हो हुयी है। हालांकि कुछ गवाह, पुलिस और मरने वाली की हड्डियां अदालत में पेश भी की गयी।
               कहते हैं भगवान के घर न्याय अवश्य मिलता है। यही ब्रजभूणष सिंह के परिवार और स्वयं ब्रजभूणष सिंह के साथ हुआ- बरी होने के कुछ माह बाद ही आई. सी. एस. अफसर ब्रजभूषण सिंह अपने रिवॉल्वर से अपने भेजे में गोली मार कर आत्महत्या कर ली। (पृष्ठ-53)
बिलसिया की आत्मा को शांति मिली या न मिली यह तो पता नहीं पर ब्रजभूषण सिंह को अपने कृत्य की सजा आखिर मिल ही गयी।

कहानी ? तो एक ऐसा प्रश्नचिह्न है जो पुलिस से लेकर सी. बी. आई. के लिए एक प्रश्नचिह्न बन कर रह गया।
      यह घटना कानपुर में 4 जुलाई 1955 की रात को एक ऐसी भयकंर दुर्घटना घटित हुयी कि उसका उदाहरण भारतीय अपराधों के इतिहास में मुश्किल से मिलेगा। (पृष्ठ-54)

      एक ही परिवार के दो सदस्यों की हत्या और एक का अपहरण। अगले दिन एक सड़क के किनारे अपहरणकर्ता और अपहर्त लङकी की लाश कार में मिलती है।

         आखिर यह क्या मामला था। 4 जुलाई की रात को हुई ये चार हत्याएं पुलिस और सी. आई. डी. के लिए सिर दर्द बन गयी। (पृष्ठ- 63)

         इस कहानी संग्रह की अंतिम दो कहानियाँ राजवर्ग से संबंधित है। 'किस्सा एक राजा की प्रेमिका का' कहानी पटियाला के राजा भूपेन्द्र सिंह के जीवन से संबंधित है। 

राजा भूपेन्द्र सिंह को अपने एक कार्मिक लाल सिंह की पत्नी दलीप कौर पसंद आ गयी। अब राजा तो राजा ठहरा, अब राजा के सामने किसकी चले, लाल सिंह की भी ना चली और दलीप कौर एक दिन रानी दलीप कौर हो गयी।
दूसरी तरफ  लाल सिंह ने धमनियां देनी शुरु की कि वह दौलते -इंग्लिशिया की सहायता से अपनी पत्नी को वापस लेकर रहेगा।  इस बदमानी से बचने के लिए भूपेन्द्र सिंह ने एक युक्ति सोची  महाराजाओं को युक्तियां भी चुटकी बजाते सूझ जाती है।(पृष्ठ-82)
       इधर चुटकी बजी और उधर लाल सिंह की चुटकी बजनी हमेशा के लिए बंद हो गयी।
                   यह मामला भी उच्च स्तर पर पहुंचा लेकिन सामने भी राजा था, वह भी अंग्रेज सरकार का खास। मामला जब ज्यादा उछला तो स्वयं राजा भूपेन्द्र सिंह की इच्छा अनुसार रियासती एजेण्ट पेट्रिक ने इस मामले की सुनवायी की। निर्णय आया वे बिलकुल निर्दोष हैं।(पृष्ठ-65)
लेकिन इस केस में एक आदमी और भी था वह था सुपरिण्टेण्डेण्ट पुलिस नानक सिंह। जिसने राजा की इच्छा और आज्ञा अनुसार इस कार्य को अंजाम दिया। नानक सिंह जेल में बैठा था, कहीं न कहीं उसे लगा की उसने गलत किया है। नानक सिंह चाहता तो राजा का दोबारा पक्षधर बन कर आजाद हो सकता था लेकिन उसकी आत्मा ने यह स्वीकार नहीं किया।
               

                        राजा तो आखिर राजा ही होता है वह चाहे भूपेन्द्र सिंह हो या इंदौर का तुकाजी राव होल्कर‌। जब प्रेम रंग चढता है तो वह सब कुछ भूल जाता है। किस्सा एक और राजा की प्रेमिका का की यही कथा है। राव होल्कर को अमृतसर की वेश्या बाजार की गुलबदन मुम्ताज पसंद आ गयी। एक दिन मुम्ताज राव होल्कर घर भी आ गयी।
                  बगुलबदन के प्रेम रंग में भीगे राव होल्कर ने गुलबदन का धर्म बदल दिया। वस यहीं से गुलबदन और उसकी माँ का मन बदल गया। या यूं कहें राव होल्कर से मन भर गया।
कुछ समय बाद मुम्ताज और उसकी माँ ने मुंबई में एक नया शिकार ढूंढ लिया, और राजा होल्कर मुम्ताज को ढूंढ रहा था।
एक दिन यह प्रेम प्रकरण इस मोड़ तक आ गया की एक व्यक्ति की जान और राव होल्कर की गद्दी चली गयी।

          इस कहानी संग्रह की सभी कहानियाँ रोचक हैं। जहाँ इनमें एक रोचकता है वहीं एक अधूरापन भी है, यही अधूरापन पाठक को अंदर तक सालता है। यही अधूरापन इस संग्रह की विशेषता है।  हमारे सविधान की कमी का वर्णन यहाँ है, जहां चालाक हत्यारा हत्या करके भी सुरक्षित बच जाता है, और एक निर्दोष बेवजह फंस जाता है। 

           इस कहानी संग्रह की कहानियाँ सत्य है या काल्पनिक यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन इस कहानी संग्रह में जो तथ्य दिये गये हैं वे इन घटनाओं के सत्य होने की पुष्टि अवश्य करते हैं। जैसे पटियाला महाराज भूपेन्द्र सिंह, वकील तेज बहादुर स्प्रु,तुकाजी राव होल्कार आदि।

        इस पुस्तक/ कहानी संग्रह के विषय में (लेखक, प्रकाशक, वर्ष) में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

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पुस्तक-
लेखक-
पृष्ठ- 110
प्रकाशक-
इस किताब के विषय में कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं। किताबें आदि-अंत के आवरण पृष्ठ गायब है।