Thursday, 20 August 2026

738. मौत आई दबे पांव- सुरेन्द्र मोहन पाठक

एक थ्रिलर मर्डर मिस्ट्री
मौत आई दबे पांव- सुरेन्द्र मोहन पाठक

सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित उपन्यास 'मौत आई दबे पांव' एक बेहतरीन और रोमांचक हिंदी थ्रिलर उपन्यास है। यह एक मर्डर मिस्ट्री कथानक है जो आदि से अंत तक रोचक है।

मौत आई दबे पांव- सुरेन्द्र मोहन पाठक

दिल के उम्रदराज मरीज वी० एम० अधिकारी की मौत निश्चित थी, महज वक्त की बात थी और ऐन वैसे ही दबे पांव आयी थी, जैसे कि उस का आना अपेक्षित था। फिर भी वो खामोश मौत एक भीषण हाहाकार की बुनियाद बनी।(आवरण पृष्ठ से)
नमस्ते पाठक‌ मित्रो,
अगस्त 2026 में सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के पांच उपन्यास पढने के लिए उपलब्ध हैं, जिन्हें पढाऔर पढना जारी है। इन पांच उपन्यासों की समीक्षा ब्लॉग पर प्रकाशित हो रही है।
इसी क्रम में आज हम पढेंगे थ्रिलर उपन्यास 'मौत आई दबे पांव' की समीक्षा । पर समीक्षा से पूर्व हम उपन्यास के प्रथम पृष्ठ को देखते हैं।

हमेशा की तरह सुबह ठीक साढ़े आठ बजे मीरा अधिकारी अपने पति विष्णु मोहन अधिकारी की ब्रेकफास्ट की ट्रे के साथ उसके दरवाजे पर मौजूद थी। उसने दरवाजे को हौले से दस्तक दी, उसे धक्का देकर खोला और फिर भीतर कदम रखा।
घर में उसके पति का भतीजा अभिषेक और भतीजी निधि भी उन दिनों मौजूद थे लेकिन लोनावला की सर्द सुबहों में वे दस बजे से पहले शायद ही कभी सोकर उठते थे और उसके बाद भी बिस्तर को त्यागना उन के मूड पर निर्भर करता था।
        उसके पति का कथित बैडरूम वास्तव में एक ढाई मंजिली कोठी के ग्राउन्ड फ्लोर पर स्थित स्टडी थी जिस में कि एक पलंग इसलिए उसके लिए लगाया गया था क्योंकि बावन साल की उम्र पार कर चुका उस का पति बीमार रहता था और सीढ़ियां उतरने-चढ़ने में स्वयं को सक्षम नहीं पाता था।
       लगभग दो साल पहले, पहला दिल का दौरा पड़ने के बाद, उसके पति ने मुम्बई से लोनावला आकर वो कोठी इस उम्मीद में खरीदी थी कि उस प्रसिद्ध हिल स्टेशन का हवा-पानी और रमणीयता उसे माफिक आयेगा। कोठी एक विशाल लान के बीच में बनी हुई थी। दायीं ओर पिछवाड़े में, कोठी की मेन इमारत से काफी हटकर बना, एक विशाल गैराज था जिस में कि अगल-बगल तीन कारें खड़ीं की जा सकती थीं। गैराज के ऊपर एक सर्वेन्ट क्वार्टर था लेकिन कोठी में कोई स्थायी सर्वेट न होने की वजह से इस काम के लिए कभी इस्तेमाल नहीं हुआ था। वहां शिफ्ट करने के बाद उसके पति ने पहले उसे आफिस की शक्ल दी थी लेकिन शुरुआती कुछ दिनों के बाद बतौर आफिस उसके इस्तेमाल की नौबत नहीं आयी थी। (मौत आई दबें पांव- सुरेन्द्र मोहन पाठक, प्रथम पृष्ठ)
    यह कहानी है विष्णु मोहन अधिकारी की । जो बीमार है, उन्हें दो हार्ट अटैक के दौरे आ चुके हैं और तीसरा दौरा कभी भी आ सकता है ।
एक सुबह जब उनकी पत्नी मीरा अधिकारी अपने पति के लिए सुबह की चाय लेकर उनके कक्ष में पहुंची तो विष्णु मोहन अधिकारी अपने बिस्तर पर मृत्यु पाये गये। प्रथम दृश्य वह दिल के दौरे से मरे हुये नजर आते थे लेकिन मीरा अधिकारी को जो नजर आया उसके अनुसार विष्णु मोहन अधिकारी ने आत्महत्या की थी और उसके लिए मीरा अधिकारी को जिम्मेदार ठहराया था । लेकिन मीरा अधिकारी नहीं चाहती थी की कोई उस पर शक करे।
मीरा अधिकारी ने विष्णु मोहन अधिकारी के भतीजे अभिषेक और भतीजी निधि को भी सूचित किया।  और मौके पर पहुंचे वकील और डाक्टर के बाद एक नयी घोषण ने सारा परिदृश्य ही बदल दिया।
"हकीकत ये है कि मिस्टर अधिकारी हार्ट फेल हो जाने से नहीं मरे।"
"तो कैसे मरे ?"
"अभी नहीं मालूम।" (पृष्ठ- 26)
    और शीघ्र ही यह बात सार्वजनिक हो गयी की विष्णु मोहन अधिकारी की हत्या की गयी है। घर में विष्णु मोहन अधिकारी की जवान पत्नी मीरा अधिकारी के अतिरिक्त भतीजा और भतीजी हैं। अब शक किस पर किया जाये।
"....जब किसी नौजवान औरत का उम्रदराज, बीमार, उसका मोहताज पति जहर से मरता है तो कत्ल का शक सबसे पहले उसी पर किया जाता है। तुम्हें ये समझाने की जरूरत नहीं कि अपने पति के मर्डर केस में तुम सस्पैक्ट नम्बर वन हो ...।''(पृष्ठ...)
    अब पहला शक मीरा अधिकारी पर जाता है और उसके बाद उसके भतीजे और भतीजी पर और उसके बाद शक के क्षेत्रफल में अन्य लोग शामिल किये जाते हैं।
    एक प्राइवेट डिटेक्टिव (सुदेश भोजानी) की एंट्री, वकील शेखर साबले के पास मौजूद दूसरी चिट्ठी और मृतक के भतीजे अभिषेक की पैसों की तंगी कहानी को एक नया मोड़ देती है। पुलिस जांच शुरू होती है और हर किरदार के राज खुलने लगते हैं।
   अब देखना यह है कि विष्णु मोहन अधिकारी की हत्या किसने और क्यों की ? हर संभावित व्यक्ति के पास हत्या का कारण है और हर संभावित व्यक्ति के पास स्वयं को निर्दोष साबित होने के तथ्य भी हैं।
         कहानी सिर्फ इतनी ही नहीं कि विष्णु मोहन अधिकारी की हत्या किसने की और क्यों की , कहानी तो इस से भी आगे है और जैसे जैसे पात्र बढते हैं, कहानी आगे बढती है तो रोचकता तो बढती ही है कत्लों की संख्या भी बढती है और दो मवाली टाइप के लोगों की इंट्री से उपन्यास और पठनीय बन जाता है।
       विष्णु मोहन अधिकारी को एक तरफ जहां बीमारी ने कमजोर कर दिया वहीं उसे चिड़चिड़ा और शकी स्वभाव का भी बना दिया। वह अपनी जवान पत्नी पर अपने फैमिली डाक्टर के साथ अफेयर का शक करता है और उस शक की आग में घी का काम प्राइवेट डिटेक्टिव सुदेश भोजानी करता है।
       वहीं अधिकारी के परिवार की बात करें तो उसकी मौत का दुख किसी को भी नहीं है। एक अव्यवस्थित और असामाजिक परिवार है । उसके भतीजे और भतीजे उसकी मृत्यु पर जरा भी दुख नहीं दर्शाते वह तो मृत्यु पर भी व्यंग्य करते नजर आते हैं।
"ऐसा ही है आजकल । आधुनिक जमाना है न ! इसलिये उसका कारोबार भी आधुनिक हो गया है। दुनिया इतनी मसरूफ हो गयी है कि मरे जिये में फर्क नहीं महसूस करती ।" - उसने एक गहरी सांस ली - "बहरहाल दुनिया पहले भी चल रही थी, अब भी चल रही है, आगे भी चलती रहेगी।"(159)
     सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित 'मौत आई दबे पांव' एक थ्रिलर मर्डर मिस्ट्री है। पारिवारिक कलह और बीमारी से सनकी हुये एक ऐसे इंसान की कहानी है जो स्वयं तो मर गया लेकिन उसकी मृत्यु के बाद जो घटित हुआ वह अविस्मरणीय है। उसकी मृत्यु को दुख किसी को नहीं है लेकिन उसकी दौलत को हर कोई चाहता है।
          उपन्यास समाज की एक कठोर सच्चाई का चित्रण तो करता ही है साथ में वह यह भी दर्शाता है कभी-कभी आदमी अंतिम समय में भी कितना गलत निर्णय ले लेता है।
उपन्यास की कहानी अच्छी है जो पाठक का अच्छा मनोरंजन करती है । कहानी सिर्फ मर्डर मिस्ट्री तक सीमित न रहकर आगे भी बढती है और कई घटनाओं को जोड़ती चली जाती है। पाठक जहां एक एक पात्र पर शक करता है वहीं उन पात्रों के पास स्वयं को निर्दोष साबित करने के आधार भी हैं।
   
डायलॉग-
"मैडम मेरी नाक के नीचे एक छेद है जिस में से कभी तो बड़े मीठे बोल फूटते हैं-जैसे कि इस घड़ी फूट रहे हैं-लेकिन कभी ऐसी वाही तवाही निकलती है कि मैं खुद हैरान होने लगता हूं कि एक ही सोर्स से कभी आग तो कभी ओस कैसे फूटने लगती है।"

शब्दों का दोहराव-
पाठक जी के उपन्यासों में अक्सर शब्दों को दोहराव ऐसा मिलता है जैसे पाठक उस बात को समझ नहीं रहा या फिर पात्र एक ही बात को हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में कह कहता है या बार- बार शब्द को दोहराता है।

"... बशर्ते कि वो फर्जी न हों, नुमायशी न हों, वक्त की नजाकत के मुताबिक फरमायशी न हों।"(पृष्ठ- 71)
एक और उदाहरण देखें-

"वाइफ इज चीपर दैन मेड। इसीलिए शादी कर के भी तुम उन की सैक्रेट्री ही रहीं, बीवी न बन सकीं, भार्या न बन सकीं, शरीकेहयात न बन सकीं।"
निष्कर्ष :-

कुल मिलाकर, 'मौत आई दबे पांव' थ्रिलर प्रेमियों के लिए एक पठनीय और दिलचस्प उपन्यास है। यह उपन्यास यह सिखाता है कि कैसे इंसान के मन का शक और ईर्ष्या न केवल खुद को बल्कि उसके आस-पास के लोगों की जिंदगी को भी नरक बना सकता है। अंत तक यह तय करना मुश्किल रहता है कि हत्या हुई है या आत्महत्या, जो इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी है।

उपन्यास - मौत आई दबे पांव
लेखक-    सुरेन्द्र मोहन पाठक
पृष्ठ-        239
प्रकाशक- शिवा पॉकेट बुक्स, मेरठ

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