Saturday, 11 July 2026

732. अंधेरे का हंगामा- अनीस मिर्जा

तनवीर सुलेमानी और आदिल का जासूसी कारनामा
अंधेरे का हंगामा- अनीस मिर्जा- अक्टूबर 1965

नमस्ते पाठक मित्रो,
आज हम लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के उस समय में चलते हैं जब उपन्यास पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे । छोटे जासूसी उपन्यासों का वह समय बहुत अच्छा था । कहानियाँ चाहे छोटी थी पर सामान्य थी और पाठकों का समय व्यतीत अच्छा होता था ।
जी. के. पब्लिकेशन (11-F/75 लाजपत नगर) नई दिल्ली- 14 से प्रकाशित होने वाली 'इंस्पेक्टर जासूस' एक मासिक पत्रिका थी । इसके संपादक 'आ. नंद' थे । 
इसी पत्रिका में लेखक अनीस मिर्जा जी का एक उपन्यास 'अंधेरे का हंगामा' अक्टूबर 1965 में प्रकाशित हुआ था, यह पत्रिका का अंक -7 था ।

उपन्यास समीक्षा से पूर्व हम इस उपन्यास का प्रथम पृष्ठ देखते हैं।

अंधेरे का हंगामा - अनीस मिर्जा 

पौली ने बनाव सिंगार में काफी समय बर्बाद कर दिया। और जब वह ड्रेसिंग टेबुल से हटी तो शाम के साढ़े छ बज चुके थे ।
वह जल्दी से अपने कमरे से बाहर निकल आई। और तेज-तेज कदम उठाती हुई उस जगह पहुँची जहाँ एक अधेड़ व्यत्रित शानदार सूट पहने, मुँह में सिगार दबाए शाम का अखबार देख रहा था।
पौली ने जाते ही उसे सम्बोधित करके कहा-
"पापा! मैं जा रही हूँ।"
उसकी आवाज सुनते ही अधेड़ उम्र व्यक्ति ने अपने चेहरे से अखबार हटाया और पौली की ओर देखकर जल्दी से बोला-
"ओह, क्या तुम अब तैयार हो पाई हो ?"
"सॉरी पापा!"
"देखो साढ़े छ: बज चुके हैं। और तुम्हें लगभग पाँच-छै मील दूर जाना है। आजकल वैसे ही हालात खराब चल रहे हैं। तुम्हें जल्दी करनी चाहिए थी ।"
अधेड़ व्यक्ति ने अपनी कुर्सी से उठते हुए कहा। वह एक ऊँचे सरकारी पद पर था और उसका नाम राणा रामसिंह था। उसकी
इकलौती बेटी इस समय अपनी चाची कमला देवी से मिलने जा रही थी ।
( अंधेरे का हंगामा- अनीस मिर्जा, प्रथम पृष्ठ से)
पाठक मित्रो, यह था उपन्यास का प्रथम पृष्ठ, इस पृष्ठ पर हमें तीन पात्रों का परिचय मिलता है। एक है पौली, दूसरे हैं पौली के पिता राणा रामसिंह और तीसरे हैं चाची कमला । अब उपन्यास इन्हीं पात्रों से आरम्भ होकर आगे बढती है ।
   राणा रामसिंह अपनी पुत्री पौली को एक सूटकेस देते हैं जिसे चाची कमला तक पहुंचाना था । लेकिन पौली अपनी चाची के पास जाने की बजाय अपने मित्र शेखर साथ घूमने का कार्यक्रम बनाती है।
"सबसे पहले हम होटल ब्राडवे में खाना खाएँगे । फिर कोई अच्छी सी फिल्म देखेंगे । फिर न्याग्रा क्लब में स्पेशल शो देखेंगे। सुना है वहाँ एक स्पेनी डाँसर आई हुई है।"(पौली ने शेखर से कहा, पृष्ठ-09)
   इन दिनों शहर में एक 'आजाद पार्टी' कार्यरत है।‌ जो अपना काम छुपकर करती है और पार्टी के अनुसार वह देश की सुरक्षा और विकास के लिए अमीर लोगों से, बैंक डकैती से धन एकत्र करती है।
"आजाद पार्टी जिन्दाबाद - आजाद पार्टी के सदस्यों को मालूम होना चाहिए कि वे देश की सुरक्षा और विकास के लिए हर समय तैयार रहें। देश के पूंजीपतियों और मिल मालिकों को आजाद पार्टी के लिए अपनी तिजोरियों के मुँह खोल देने चाहिएं, क्योंकि आजाद पार्टी के पास धन की बहुत कमी है। आजाद पार्टी की सहायता करना सत्य की सहायता करना है, हम देश की जनता की हिफाजत के लिए उसकी स्वतंत्रता को स्थायी बनाए रखने के लिए दुश्मनों से टक्कर लेने के लिए हर समय तैयार रहते हैं। बहुत से लोग आजाद पार्टी का विरोध करते हैं। वे यथार्थ में सच्चाई का विरोध करते हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि वे आजाद पार्टी का विरोध करके दुश्मनों के हौसले न बढ़ाएं, वरना उनके साथ भी दुश्मनों जैसा सलूक किया जाएगा। क्योंकि आजाद पार्टी को धन की बहुत ही आवश्यकता है, धन इकट्ठा करने के लिए वह हर उचित और अनुचित उपाय से धन इकट्ठा करेगी, क्योंकि यह धन देश हित के लिए इकट्ठा किया जा रहा है। 
आजाद पार्टी जिन्दाबाद, आजाद रेडियो जिन्दाबाद ।
"(पृष्ठ-14,15)
    वहीं जब चाची कमला को यह सूचना मिलती है की पौली अपने मित्र के साथ न्याग्रा क्लब में चली और सूटकेस उसकी कार में ही है तो चाची कमला अपनी कार से पौली की तलाश में निकलती है । 
अब थोड़ी सी बात उपन्यास नायक की कर लेते हैं और वह भी कथानक के शब्दों में ही- "मेरा नाम तनवीर सुलेमानी है और ये हैं मिस्टर आदिल परवेज़ । हम दोनों का सम्बन्ध 'क्राइम अखबार' से है ।"
जैसा की जासूसी उपन्यास में होता है नायक वीर होता है और उसका साथी थोड़ा अनाड़ी और भीरू होता है। तो अनाड़ी की भूमिका यहा आदिल परवेज साहब निभा रहे हैं। 
        वहीं न्याग्रा क्लब में आजाद पार्टी के लोग वहां के दर्शकों को लूटते हैं और इसी दौरान वहां पहुंचे तनवीर सुलेमानी और आदिल को जब अपने साथ लेकर भागते हैं तो इस भगदड़ में वह पौली की उस कार को भी साथ ले जाते हैं जिसमें वह सूटकेस था जो राणा रामसिंह ने कमला देवी तक पहुंचाना था ।
     आजाद पार्टी के प्रधान का यह मानना था कि तनवीर और आदिल वहां संयोग से नहीं पहुंचे बल्कि उन्हें पहले से ही खबर थी । तनवीर को टाॅर्चर करते वक्त आजाद पार्टी का प्रधान तनवीर का नाक पकड़ लेता है। और यहीं एक छोटी सी घटना 'प्रधान' का रहस्य खोलने का आधार बनती है।
हां, जासूस तनवीर का नाक पकड़ना ही 'प्रधान' का रहस्य स्पष्ट करती है की आजाद पार्टी का यह गुप्त प्रमुख कौन है।
  कहानी और भी बहुत से घुमावदार रास्तों से होती हुयी आगे बढती है। क्योकि अभी उस प्रधान पर हाथ डालना भी मुश्किल था और प्रधान कोई सामान्य व्यक्ति था नहीं । वह भी तनवीर और आदिल को रास्ते हटाने का प्रयास करता है। और यही प्रयास कहानी को आगे बढाते हैं और जासूस- अपराधी के मध्य संघर्ष को रोचक बनाते हैं।
  उपन्यास में तनवीर सुलेमानी और आदिल को 'क्राइम अखबार' का पत्रकार दिखाया गया है जो अपराधियों से संघर्ष भी करते हैं और पुलिस विभाग ने उन्हें अपने विभाग में अच्छा पद देने का प्रयास किया है पर हर बार तनवीर मना कर देता है।
"सम्भव है फिर उसे सी. आई. डी. विभाग में वही आफर मिले जिसे वह कई बार ठुकरा चुका है। क्योंकि वह स्वतन्त्र रहकर ही काम करना चाहता था ।''
वहीं एक और पात्र है कमला देवी। उसका एक खास डायलॉग है जो यहाँ भी प्रस्तुत है।
"शायद तुम लोग मुझे जानते नहीं, मैं कमला देवी हूँ।" 
इंस्पेक्टर रहमान की भूमिका भी अच्छी और सराहनीय है। 
मुख्य अपराधी के विषय में पाठक थोड़ा सा निराश होता है। लेखक महोदय ने पता नहीं ऐसा क्यों किया है या फिर उस समय ऐसा होता था कि अपराधी को अंतरराष्ट्रीय दिखाया जाता था और वह कई उपन्यासों में नजर आता था। शायद ऐसा ही यहां भी हुआ है।
  अनीस मिर्जा जी का मैं इस से पूर्व एक उपन्यास 'पानी के धमाके' पढ चुका हूँ और यह उनका मेरे द्वारा पढा गया द्वितीय उपन्यास है। 
उपन्यास रोचक है, कहानी अच्छी है। पात्रों को और विस्तार दिया जा सकता था, कहानी और मजबूत हो सकती थी । फिर भी कहानी पाठक को नीरस नहीं लगेगी।

उपन्यास- अंधेरे का हंगामा
लेखक-    अनीस मिर्जा
पृष्ठ-        105
सन्-       अक्टूबर 2965
पत्रिका-  इंस्पेक्टर जासूस
प्रकाशक- जी. के. पब्लिकेशन 
(11-F/75 लाजपत नगर) नई दिल्ली- 14
अनीस मिर्जा के अन्य उपन्यास

पानी के धमाके ।। 

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