यहां इंसाफ होता है।
धर्मराज - अनिल सलूजा
#बलराज गोगिया- राघव सीरीज
मरने के बाद इंसान धर्मराज के दरबार में पहुंचता है, जहां उसके कर्मों के अनुसार उसे दण्डित किया जाता है । मगर क्या धरती पर भी कोई धर्मराज है जो पापी को उसके पापों का फल यहीं दे सके ।
धर्मराज - अनिल सलूजा
अनिल सलूजा जी की इन दिनों पढी जा रही उपन्यासों की समीक्षा में 'धर्मराज' एक रोचक उपन्यास है। यह पात्र बलराज गोगिया की शांतिपूर्ण जिंदगी में उठे तूफान का वर्णन है।
उपन्यास समीक्षा से पूर्व हम पढते हैं 'धर्मराज' उपन्यास का प्रथम पृष्ठ ।
"बचाओ...बचा...ओ... हैल्प...।"
नमस्ते पाठक मित्रो,
अनिल सलूजा जी के उपन्यासों की निरंतर समीक्षा के क्रम में आज प्रस्तुत है उपन्यास 'धर्मराज' की समीक्षा ।
पिछले छह महीने से वह राघव के साथ दुकान कर रहा था और वह अपनी इस जिन्दगी से बहुत खुश था।
रायपुर एक छोटा-सा शहर था-जहां उसने राघव और सुनीता के साथ शरण ली थी।
पैसा था उसके पास । सो उसने पहले तो एक मकान किराये पर लिया, फिर यह दुकान की।
यहां आने के एक महीने बाद ही सुनीता ने एक गुड़िया को जन्म दिया। जिसका नाम तीनों की सहमति से दिव्या रखा गया।
दिव्या अब पांच महीने से ऊपर की हो गई थी और लुढ़कने लगी थी।(पृष्ठ-20)
सब कुछ शांति से चल रहा था और शांति से ही चल रही धर्म सिंह (बलराज गोगिया) और राजकुमार (राघव) की किरयाना दुकान । छोटा सा शहर था रायनगर और छोटा सा परिवार एक किराये के मकान में अपनी जिंदगी जी रहा था ।
अच्छा भला जुर्म की दुनिया को छोड़ कर बलराज गोगिया अपने जोड़ीदार राघव और पत्नी सुनीता के साथ मेहनतकश इंसान की तरह बहुत बढ़िया जिन्दगी जी रहा था। अब तो उसकी एक नन्हीं सी बेटी भी थी।
मगर ऊपर वाले को शायद उसका यूं एक जगह पर टिक कर आम आदमी की जिंदगी गुजारना ठीक नहीं लगा। सो उसने शिवचरन के जरिये उसे फिर से जुर्म की दुनिया में धकेल दिया और वह अपनी दुकान और मकान को छोड़ फिर से वहां पहुंच गया जहां हर तरफ खून की खून बह रहा था... रेप हो रहे थे... लाशें गिर रही थीं।
उन्हीं लाशों के बीच से रास्ता बनाते हुए वह जब अपनी मंजिल पर पहुंचा... तो पूरे विस्तार से जानने के लिये तो आपको पन्ने पलट कर पूरा उपन्यास पढ़ना होगा-और मेरा दावा है कि आप उपन्यास को पूरा पढ़े बिना छोड़ेंगे नहीं। (अनिल सलूजा )
अनिल सलूजा जी के विशेष पात्र बलराज गोगिया और उसके साथी राघव के विषय में आप उनके प्रथम उपन्यास 'फंदा' से लेकर 'बारूद की आंधी' 'शूटर' जैसे एक्शन और मजबूरी के चलते किये गये अपराधों के अतिरिक्त 'मुझे मौत चाहिए' जैसा जासूसी थ्रिलर उपन्यास की समीक्षा पढी तो वहीं 'साठ लाख /लंगड़ा यार' सीरीज में 'हारा हुआ जुआरी' 'नृशंसक' जैसे उपन्यास पढे । कठिन परिस्थितियों से गुजरे बलराज गोगिया की शांतिपूर्ण जिंदगी में उठे तूफान में 'मास्टर माइण्ड' पढा और उसी शृंखला का उपन्यास है- धर्मराज।
मरने के बाद इंसान धर्मराज के दरबार में पहुंचता है, जहां उसके कर्मों के अनुसार उसे दण्डित किया जाता है । मगर क्या धरती पर भी कोई धर्मराज है जो पापी को उसके पापों का फल यहीं दे सके ।
बलराज गोगिया और राघव की दुकान का नाम है -धर्मराज किरयाना स्टोर।
……………
उपन्यास में तीन कहानियाँ एक साथ घटित होती हैं।
एक है...की रेप और हत्या की । दूसरी ....जबरन जमीन हथियाने की और तीसरी है इंस्पेक्टर बलदेवराज की नेता सदाशिव द्वारा बेइज्जत करने की ।
1. नेहा नामक युवती रोनी की प्रेमिका थी और रोनी का किरायेदार बलराज गोगिया था । एक दिन नेहा की रेप कर हत्या कर दी जाती है।
2. शिवचरण एक किसान था और उसके पास अच्छी जमीन थी और खुशहाल परिवार था। उसकी जमीन पर नजर लग गयी भ्रष्ट नेता सदाशिव की ।
'जमीनों पर अवैध कब्जे करना सदाशिव का सबसे पसंदीदा काम था ।'(पृष्ठ-16)
3. बलदेव राज एक ईमानदार पुलिसकर्मी था । नेहा की हत्या और रेप का केस देख रहा था। इस केस में वह भ्र्ट नेता सदाशिव के पुत्र और उसके दोस्तों पर हाथ डाल बैठा था । यही कार्य उसके लिए मुसीबत बन गया ।
हालांकि बलदेव राज के तेवर तीखे थे। उदाहरण देखें-
"बलदेव है मेरा नाम ।" एकदम से गुर्रा उठा इंस्पेक्टर - "मैं सवाल कम करता हूं, घसीटता ज्यादा हूं। अब कोई अगर-मगर नहीं करना, वर्ना मेरा हाथ चलना शुरू हो जायेगा। कल कहां थे तुम ?"(28)
उक्त इन दिनों केस भ्रष्ट नेता सदाशिव राव से संबंध रखते हैं। लेकिन किसी की इतनी हिम्मत नहीं की वह सदाशिव राव को कुछ कह सके। इंस्पेक्टर बलदेव राज ने एक कोशिश की थी और उसका परिणाम दुखदायी रहा। नेता सदाशिव का चरित्र देखें-
सदाशिव राव काले रंग का छोटे कद का घुंघराले बालों वाला ठोस जिस्म का मालिक था।
उसके चेहरे पर तो सौम्यता थी, लेकिन आंखों में क्रूरता साफ नजर आ रही थी।
था। राजा नगर में वह सबसे बड़े बाहुबली के रूप में जाना जाता
राजा नगर की जनता में उसके प्रति इज्जत तो बिल्कुल भी नहीं थी, हां, खौफ जरूर था।
क्या मजाल जो कोई उसके खिलाफ एक शब्द भी बोल दे ।
सरकार नाम की वहां कोई चीज थी ही नहीं। क्या पुलिस, क्या प्रशासन-सब पर सदाशिव राव का ही हुक्म चलता था।
अपनी धौंस, अपनी ताकत और पैसे के बल पर ही सदाशिव लगातार तीन चुनाव जीत चुका था और अब चौथा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा था।
कानून की किताब में आई.पी.सी. की शायद ही कोई ऐसी धारा हो, जो उसने न तोड़ी हो।(34)
तो ऐसा था इस उपन्यास का खलनायक सदाशिव काले ।जितना हरामी और भ्रष्ट वह स्वयं था उस से भी आगे उसका पुत्र और उसके दो दोस्त थे। नेता का पुत्र और उसके दोस्त अक्सर लड़कियों को अपनी वासना का शिकार बनाते थे।
भ्रष्ट नेता और उसके परिवार , पुत्र और उसके दोस्तों से खार खाये हर व्यक्ति की एक इच्छा थी की सदाशिव को उसके गलत कामों की उसे सजा मिले, पर सजा दे कौन ?
"उसके लिये तो किसी सुपर हीरो को ढूंढना पड़ेगा। जो हमारी बात मानकर सदाशिव को खत्म कर सके या फिर उसके किसी ऐसे दुश्मन का पता लगाना होगा, जो उससे खुन्नस खाये हुए हो।"(55)
वहीं एक संयोग के चलते शिवचरण भी बलराज गोगिया तक जा पहुंचता है। और बलराज गोगिया से मदद की गुहार लगाता है।
- शिवचरन उसके सामने फर्श पर ऐसे बैठा, जैसे बराबर बैठने की उसकी औकात ही न हो।
"मैं कभी भी तुम्हारी हकीकत जाहिर न होने देता बलराज गोगिया।" वह बोला- "लेकिन मैं मजबूर हो गया हूं। मुझे सिर्फ तुमसे ही उम्मीद है...कि तुम मेरी बेटी को सकुशल वापिस ला सकते हो। उसके बाद तुम अपनी दुकान चलाते रहना...।"
एक फीकी मुस्कान लाते हुए बलराज गोगिया ने एक गहरी सांस छोड़ी।(69)
इंस्पेक्टर बलदेव राज भी नेता सदाशिव से एक थप्पड़ खाने मे बाद उसका कट्टर विरोधी था और वह भी ताक में था कब मौका मिले और वह अपना हिसाब बराबर करे।
"मगर यह मेरा वादा है कि जब भी मेरी आंखें खुलेंगी, तेरा विनाश शुरू हो जायेगा। तूने थप्पड़ मेरे गाल पर नहीं-कानून के गाल पर मारा है। इसकी सजा तो तेरे को मिलकर ही रहेगी।
अब तो बस मौके का इंतजार रहेगा मेरे को। जैसे ही मेरे को कोई बढ़िया-सा मौका मिला, मैं तेरी ऐसी तैसी कर दूंगा।"(51)
और वह मौका मिला उसे बलराज गोगिया के माध्यम से-
"मैं खुद भी नहीं चाहता कि तुम्हारा अहित हो। मैं तो यह चाहता हूं जिस काम का बीड़ा तुमने उठाया है, वह पूरा हो। नेताजी का नाम भी मैं इस शहर से मिटा हुआ देखना चाहता हूं।"(125- इंस्पेक्टर बलदेव राज)
सभी के मन में विद्रोह था और वह विद्रोह तब फूटा जब उनको बलराज गोगिया जैसा मास्टर माइण्ड और ताकतवर इंसान से मिला।
बलराज गोगिया और नेता सदाशिव काले के मध्य खूनी संघर्ष आरम्भ होता है। लेकिन आरम्भ में तो सदाशिव यह भी नहीं समझ पाता की उसके खिलाफ यह विद्रोह किसने कर दिया,किसमें इतनी हिम्मत आ गयी की वह रायनगर/ राजा नगर में उसके खिलाफ बगावत कर दे।
लेकिन यह तो बलराज गोगिया और उसके सहयोगियों का कारनामा था की सदाशिव का एक एक ठिकाना तबाह हो रहा था और वह कलपने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकता था ।
जबकि बलराज गोगिया ने सदाशिव के पुत्र का अपहरण कर नेता पुत्र को धमकाया और समझाया-
"तेरे बाप के पापों का घड़ा भर चुका है, अब उसके फूटने का वक्त आ गया है। बुरा किया तेरे बाप ने, बहुत ही बुरा किया। लोगों की बहू-बेटियों को उठाया। उनकी इज्जत से खेला, उन्हें बेचा। लोगों की जमीनों पर कब्जे किये। ऐसे ही और भी कई काम किये। अब कभी न कभी तो उसको अपने गुनाहों की सजा मिलनी ही थी... और वो उसे अब मिलनी शुरू होगी। तेरे बाप ने शिवचरन की लड़की का किडनेप किया, सिर्फ इसलिये कि शिवचरन उसे अपनी जमीन नहीं बेचना चाहता था। मैं जानता हूं कि अब अगर शिवचरन तेरे कमीने बाप को जमीन बेच भी दे तो भी उसे उसकी बेटी नहीं मिलेगी, इसलिये हमने शिवचरन की बेटी को सही-सलामत वापिस लेने के लिये यह रास्ता अपनाया है। अपने बेटे की खातिर वो शिवचरन की बेटी को वापिस करने को मजबूर हो जायेगा। मगर तब भी उसे अपना बेटा वापिस नहीं मिलेगा।"(81)
बलराज गोगिया का नेता पुत्र और उसके दोस्तों को सजा देना का अंदाज प्रभावित करता है। सोचा भी नहीं जा सकता की कोई नेता पुत्र का अपहरण कर उसे गायब कर देगा ।
बलराज गोगिया की विशेषता भी यह है की वह एक-एक सीढी चढता है। वह सीधा मुख्य अपराधी से न टकराकर उसके गुर्गों/ सहयोगियों को पहले खत्म करता है और फिर असली अपराधी को। यहां भी बलराज गोगिया नेता जी के गुर्गों को खत्म कर सदाशिव काले को धमकाता है।
"अब तू अपने कुत्तों की लाशों की गिनती शुरू कर दे। अब यह गिनती रुकेगी तो तेरी मौत पर रुकेगी।"
"हा-हा-हा...।" सदाशिव के मुंह से शैतानी ठहाका उबल पड़ा- "मैं समझ गया कि तू बलराज गोगिया बोल रहा है। रही मेरे को मारने की बात तो यह बात अपने दिल से निकाल दे। आग हूं मैं आग, धधकती आग! अगर तू मेरे करीब भी फटका तो जलकर राख हो जायेगा।"(153)
अब कौन राख होगा और कैसे राख होगा यह तो इस एक्शन उपन्यास को पढकर ही जाना जा सकता है। मेरे विचार से यह एक रोचक और एक्शन से परिपूर्ण उपन्यास है। उपन्यास की कहानी पाठक को बांधने में सक्षम है और कहानी तेज रफ्तार भी है। एक एक घटित होती घटनाएं उपन्यास को तेज बनाती हैं और पाठक को अपने साथ जोड़े रखती हैं।
पात्र चरित्र चित्रण-
इंस्पेक्टर बलदेव राज:-
यह एक ईमानदार ऑफिसर है लेकिन वक्त उसे ऐसी स्थिति में ले आता है की वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता। वह वर्दी को समर्पित इंसान है और सदाशिव द्वारा सजा दिये जाने पर भी इसके चेहरे पर भय नहीं बल्कि निडरता है।
चेहरे पर पीड़ा के बावजूद हंस पड़ा बलदेव राज ।
"मेरी वर्दी देख रहा है न तू! यह वर्दी नहीं कफन है मेरा।
हर पुलिस वाले को वर्दी नहीं...उसको कफन मिलता है... और सच्चा पुलिसवाला हमेशा यही चाहता है कि वो जब मरे तो उसके बदन पर उसका कफन हो । यानि वो अपना फर्ज पूरा करते हुए मरे। मैं भी अपना फर्ज पूरा करते हुए मर रहा हूं। भला इससे बड़ी गर्व की बात क्या होगी मेरे लिए । मैं तो तभी से मरने के लिए तैयार हो गया था जब मैंने वर्दी पहनी थी ।"(274)
बलराज गोगिया -
उपन्यास का मुख्य पात्र है । इनका परिचय हम पिछले उपन्यासों में पढ चुके हैं। फिर भी विशेषकर प्रस्तुत उपन्यास और 'मास्टर माइण्ड' में यह अपने परिवार के साथ उपस्थित शांति की जिंदगी जी रहा है। प्रस्तुत उपन्यास में तो बलराज गोगिया के तीन माह की बच्ची भी है फिर भी वह शिवरचरण की मदद के लिए आगे आता है।
इंस्पेक्टर बलदेवराज के शब्दों में देखें-
"तुम्हारे बारे में मैं काफी कुछ जानता हूं बलराज गोगिया। तुम एक आम इंसान की जिन्दगी जीना चाहते हो, लेकिन हर बार तुम्हें किसी न किसी तरह से जुर्म की दलदल में घुसने को मजबूर किया गया। इस बार भी तुम मजबूर ही हुए हो । एक नेक शहरी शिवचरन ने तुम्हारे सामने मदद की गुहार लगाई और तुमने अपनी दुकानदारी, अपना घर तक दांव पर लगा दिया...।"
उसने एक गहरी सांस छोड़ी और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला-(142- बलदेव राज)
राघव और जिन्न -
राघव एक खतरनाक व्यक्तित्व है। प्रस्तुत उपन्यास भी उसका कार्य भी गजब है और उसके जिन्न का भी। हालांकि जिन्न यहां अपनी करामाता कम ही दिखाता है। फिर भी वह रॉनी के बहन के साथ नजत आता है।
मंजुनाथ-
उपन्यास का एक विशेष पात्र जिसके चलते बलराज को काफी मदद मिलती है।
सदाशिव काले-
एक नेता जो भ्रष्ट है, हरामी और खतरनाक भी है। नेता का पुत्र और उसके दोस्त भी हरामी हैं।
सकारात्मक पक्ष-
- बलदेव राज एक ईमानदार पुलिसकर्मी है । अनिल सलूजा जी के उपन्यासों में पुलिस के दोनों पक्ष, सकारात्मक व नकारात्मक का चित्रण मिलता है।
- बलराज गोगिया एक मददगार पात्र है । यहां भी वह शिवचरण की मदद के लिए तब आगे आता है जब बलराज गोगिया का परिवार भी कहता है- 'दुनिया में हर रोज रेप होते हैं। कई कत्ल होते हैं। हमने सबका ठेका तो नहीं ले रहा है । ऐसे गुनहगारों से निपटने के लिए पुलिस है।'(पृष्ठ- 46, पात्र- सुनीता)
उपन्यास का नकारात्मक पक्ष-
उपन्यास के आरम्भ में बलराज गोगिया की पुत्री नाम दिव्या बाद में नाम तान्या हो गया। (अब सही नाम क्या है, यह तय करना मुश्किल है)
- शहर का नाम कहीं राय नगर है तो कहीं राजा नगर ।
प्रस्तुत उपन्यास एक एक्शन उपन्यास है। इसकी कहानी एक भ्रष्ट और अहम के मारे नेता की है जो अपने धन और सत्ता के बल पर अपने आवारा पुत्र और उसके दोस्तों की हैवानियत को शह देता और स्वयं भी सत्ता के अहम में लोगों पर अत्याचार करता है।
इस स्वयं नेता और उसके पुत्र के अत्यचारों से तंग लोग बलराज गोगिया की शरण में जाते हैं। और फिर संघर्ष आरम्भ बलराज गोगिया और भ्रष्ट नेता सदाशिव के मध्य ।
एक्शन घटनाओं से भरपूर यह उपन्यास आदि से अंत तक रोचक है। पाठक को सम्मोहित करता है । उपन्यास में ज्यादा थ्रिलर या रहस्य ( सस्पेंश) नहीं है पर पाठक पर पकड़ अच्छी है।
एक्शन पसंद, बलराज गोगिया-राघव या अनिल सलूजा को पढने वालों के लिए यह एक अच्छा उपन्यास है।
उपन्यास- धर्मराज
लेखक- अनिल सलूजा
अनिल सलूजा के अन्य उपन्यासों की समीक्षा
फंदा ।। कृष्ण बना कंस ।। बारूद की आंधी ।। हारा हुआ जुआरी ।। राघव की वापसी ।। नृशंसक ।। मास्टर माइण्ड ।।
उपन्यास समीक्षा से पूर्व हम पढते हैं 'धर्मराज' उपन्यास का प्रथम पृष्ठ ।
"बचाओ...बचा...ओ... हैल्प...।"
"अबे मुंह बन्द कर इसका। साली की चीखें छह मील दूर तक जा रही हैं। बन्द कर इसका मुंह।"
तुरंत एक हाथ जमीन पर पड़ी लड़की के मुंह पर कुकर के ढक्कन की तरह फिट हो गया।
वह लड़की सिर से पांव तक रेतीली जमीन पर निर्वस्त्र पड़ी थी ।
एक व्यक्ति उस पर सवार हो उसकी इज्जत को तार-तार कर रहा था। दूसरा उसकी टांगों को फैलाकर पकड़े हुए था और तीसरा-जिसका नाम रोनी था-लड़की के दोनों हाथों को पीछे कर उसे एक हाथ से पकड़े, अपने दूसरे हाथ से लड़की का मुंह दबोचे हुए था।
लड़की का नाम नेहा था।
नेहा के चेहरे पर पीड़ा के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।
मन ही मन वह उस वक्त को कोस रही थी, जब उसने रोनी का बुलावा स्वीकार किया था और यहां आ गई थी।
पिछले चार महीने से उसका और रोनी का प्यार चल रहा था। इन चार महीनों में वह रोनी को टूटकर चाहने लगी थी। रोनी के एक इशारे पर वह समुद्र में कूदने को तैयार थी। पहाड़ से छलांग मारने को तैयार थी। दसवें माले से कूदने को तैयार थी।(धर्मराज प्रथम पृष्ठ)
नमस्ते पाठक मित्रो,अनिल सलूजा जी के उपन्यासों की निरंतर समीक्षा के क्रम में आज प्रस्तुत है उपन्यास 'धर्मराज' की समीक्षा ।
पिछले छह महीने से वह राघव के साथ दुकान कर रहा था और वह अपनी इस जिन्दगी से बहुत खुश था।
रायपुर एक छोटा-सा शहर था-जहां उसने राघव और सुनीता के साथ शरण ली थी।
पैसा था उसके पास । सो उसने पहले तो एक मकान किराये पर लिया, फिर यह दुकान की।
यहां आने के एक महीने बाद ही सुनीता ने एक गुड़िया को जन्म दिया। जिसका नाम तीनों की सहमति से दिव्या रखा गया।
दिव्या अब पांच महीने से ऊपर की हो गई थी और लुढ़कने लगी थी।(पृष्ठ-20)
सब कुछ शांति से चल रहा था और शांति से ही चल रही धर्म सिंह (बलराज गोगिया) और राजकुमार (राघव) की किरयाना दुकान । छोटा सा शहर था रायनगर और छोटा सा परिवार एक किराये के मकान में अपनी जिंदगी जी रहा था ।
अच्छा भला जुर्म की दुनिया को छोड़ कर बलराज गोगिया अपने जोड़ीदार राघव और पत्नी सुनीता के साथ मेहनतकश इंसान की तरह बहुत बढ़िया जिन्दगी जी रहा था। अब तो उसकी एक नन्हीं सी बेटी भी थी।
मगर ऊपर वाले को शायद उसका यूं एक जगह पर टिक कर आम आदमी की जिंदगी गुजारना ठीक नहीं लगा। सो उसने शिवचरन के जरिये उसे फिर से जुर्म की दुनिया में धकेल दिया और वह अपनी दुकान और मकान को छोड़ फिर से वहां पहुंच गया जहां हर तरफ खून की खून बह रहा था... रेप हो रहे थे... लाशें गिर रही थीं।
उन्हीं लाशों के बीच से रास्ता बनाते हुए वह जब अपनी मंजिल पर पहुंचा... तो पूरे विस्तार से जानने के लिये तो आपको पन्ने पलट कर पूरा उपन्यास पढ़ना होगा-और मेरा दावा है कि आप उपन्यास को पूरा पढ़े बिना छोड़ेंगे नहीं। (अनिल सलूजा )
अनिल सलूजा जी के विशेष पात्र बलराज गोगिया और उसके साथी राघव के विषय में आप उनके प्रथम उपन्यास 'फंदा' से लेकर 'बारूद की आंधी' 'शूटर' जैसे एक्शन और मजबूरी के चलते किये गये अपराधों के अतिरिक्त 'मुझे मौत चाहिए' जैसा जासूसी थ्रिलर उपन्यास की समीक्षा पढी तो वहीं 'साठ लाख /लंगड़ा यार' सीरीज में 'हारा हुआ जुआरी' 'नृशंसक' जैसे उपन्यास पढे । कठिन परिस्थितियों से गुजरे बलराज गोगिया की शांतिपूर्ण जिंदगी में उठे तूफान में 'मास्टर माइण्ड' पढा और उसी शृंखला का उपन्यास है- धर्मराज।
मरने के बाद इंसान धर्मराज के दरबार में पहुंचता है, जहां उसके कर्मों के अनुसार उसे दण्डित किया जाता है । मगर क्या धरती पर भी कोई धर्मराज है जो पापी को उसके पापों का फल यहीं दे सके ।
बलराज गोगिया और राघव की दुकान का नाम है -धर्मराज किरयाना स्टोर।
……………
उपन्यास में तीन कहानियाँ एक साथ घटित होती हैं।
एक है...की रेप और हत्या की । दूसरी ....जबरन जमीन हथियाने की और तीसरी है इंस्पेक्टर बलदेवराज की नेता सदाशिव द्वारा बेइज्जत करने की ।
1. नेहा नामक युवती रोनी की प्रेमिका थी और रोनी का किरायेदार बलराज गोगिया था । एक दिन नेहा की रेप कर हत्या कर दी जाती है।
2. शिवचरण एक किसान था और उसके पास अच्छी जमीन थी और खुशहाल परिवार था। उसकी जमीन पर नजर लग गयी भ्रष्ट नेता सदाशिव की ।
'जमीनों पर अवैध कब्जे करना सदाशिव का सबसे पसंदीदा काम था ।'(पृष्ठ-16)
3. बलदेव राज एक ईमानदार पुलिसकर्मी था । नेहा की हत्या और रेप का केस देख रहा था। इस केस में वह भ्र्ट नेता सदाशिव के पुत्र और उसके दोस्तों पर हाथ डाल बैठा था । यही कार्य उसके लिए मुसीबत बन गया ।
हालांकि बलदेव राज के तेवर तीखे थे। उदाहरण देखें-
"बलदेव है मेरा नाम ।" एकदम से गुर्रा उठा इंस्पेक्टर - "मैं सवाल कम करता हूं, घसीटता ज्यादा हूं। अब कोई अगर-मगर नहीं करना, वर्ना मेरा हाथ चलना शुरू हो जायेगा। कल कहां थे तुम ?"(28)
उक्त इन दिनों केस भ्रष्ट नेता सदाशिव राव से संबंध रखते हैं। लेकिन किसी की इतनी हिम्मत नहीं की वह सदाशिव राव को कुछ कह सके। इंस्पेक्टर बलदेव राज ने एक कोशिश की थी और उसका परिणाम दुखदायी रहा। नेता सदाशिव का चरित्र देखें-
सदाशिव राव काले रंग का छोटे कद का घुंघराले बालों वाला ठोस जिस्म का मालिक था।
उसके चेहरे पर तो सौम्यता थी, लेकिन आंखों में क्रूरता साफ नजर आ रही थी।
था। राजा नगर में वह सबसे बड़े बाहुबली के रूप में जाना जाता
राजा नगर की जनता में उसके प्रति इज्जत तो बिल्कुल भी नहीं थी, हां, खौफ जरूर था।
क्या मजाल जो कोई उसके खिलाफ एक शब्द भी बोल दे ।
सरकार नाम की वहां कोई चीज थी ही नहीं। क्या पुलिस, क्या प्रशासन-सब पर सदाशिव राव का ही हुक्म चलता था।
अपनी धौंस, अपनी ताकत और पैसे के बल पर ही सदाशिव लगातार तीन चुनाव जीत चुका था और अब चौथा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा था।
कानून की किताब में आई.पी.सी. की शायद ही कोई ऐसी धारा हो, जो उसने न तोड़ी हो।(34)
तो ऐसा था इस उपन्यास का खलनायक सदाशिव काले ।जितना हरामी और भ्रष्ट वह स्वयं था उस से भी आगे उसका पुत्र और उसके दो दोस्त थे। नेता का पुत्र और उसके दोस्त अक्सर लड़कियों को अपनी वासना का शिकार बनाते थे।
भ्रष्ट नेता और उसके परिवार , पुत्र और उसके दोस्तों से खार खाये हर व्यक्ति की एक इच्छा थी की सदाशिव को उसके गलत कामों की उसे सजा मिले, पर सजा दे कौन ?
"उसके लिये तो किसी सुपर हीरो को ढूंढना पड़ेगा। जो हमारी बात मानकर सदाशिव को खत्म कर सके या फिर उसके किसी ऐसे दुश्मन का पता लगाना होगा, जो उससे खुन्नस खाये हुए हो।"(55)
वहीं एक संयोग के चलते शिवचरण भी बलराज गोगिया तक जा पहुंचता है। और बलराज गोगिया से मदद की गुहार लगाता है।
- शिवचरन उसके सामने फर्श पर ऐसे बैठा, जैसे बराबर बैठने की उसकी औकात ही न हो।
"मैं कभी भी तुम्हारी हकीकत जाहिर न होने देता बलराज गोगिया।" वह बोला- "लेकिन मैं मजबूर हो गया हूं। मुझे सिर्फ तुमसे ही उम्मीद है...कि तुम मेरी बेटी को सकुशल वापिस ला सकते हो। उसके बाद तुम अपनी दुकान चलाते रहना...।"
एक फीकी मुस्कान लाते हुए बलराज गोगिया ने एक गहरी सांस छोड़ी।(69)
इंस्पेक्टर बलदेव राज भी नेता सदाशिव से एक थप्पड़ खाने मे बाद उसका कट्टर विरोधी था और वह भी ताक में था कब मौका मिले और वह अपना हिसाब बराबर करे।
"मगर यह मेरा वादा है कि जब भी मेरी आंखें खुलेंगी, तेरा विनाश शुरू हो जायेगा। तूने थप्पड़ मेरे गाल पर नहीं-कानून के गाल पर मारा है। इसकी सजा तो तेरे को मिलकर ही रहेगी।
अब तो बस मौके का इंतजार रहेगा मेरे को। जैसे ही मेरे को कोई बढ़िया-सा मौका मिला, मैं तेरी ऐसी तैसी कर दूंगा।"(51)
और वह मौका मिला उसे बलराज गोगिया के माध्यम से-
"मैं खुद भी नहीं चाहता कि तुम्हारा अहित हो। मैं तो यह चाहता हूं जिस काम का बीड़ा तुमने उठाया है, वह पूरा हो। नेताजी का नाम भी मैं इस शहर से मिटा हुआ देखना चाहता हूं।"(125- इंस्पेक्टर बलदेव राज)
सभी के मन में विद्रोह था और वह विद्रोह तब फूटा जब उनको बलराज गोगिया जैसा मास्टर माइण्ड और ताकतवर इंसान से मिला।
बलराज गोगिया और नेता सदाशिव काले के मध्य खूनी संघर्ष आरम्भ होता है। लेकिन आरम्भ में तो सदाशिव यह भी नहीं समझ पाता की उसके खिलाफ यह विद्रोह किसने कर दिया,किसमें इतनी हिम्मत आ गयी की वह रायनगर/ राजा नगर में उसके खिलाफ बगावत कर दे।
लेकिन यह तो बलराज गोगिया और उसके सहयोगियों का कारनामा था की सदाशिव का एक एक ठिकाना तबाह हो रहा था और वह कलपने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकता था ।
जबकि बलराज गोगिया ने सदाशिव के पुत्र का अपहरण कर नेता पुत्र को धमकाया और समझाया-
"तेरे बाप के पापों का घड़ा भर चुका है, अब उसके फूटने का वक्त आ गया है। बुरा किया तेरे बाप ने, बहुत ही बुरा किया। लोगों की बहू-बेटियों को उठाया। उनकी इज्जत से खेला, उन्हें बेचा। लोगों की जमीनों पर कब्जे किये। ऐसे ही और भी कई काम किये। अब कभी न कभी तो उसको अपने गुनाहों की सजा मिलनी ही थी... और वो उसे अब मिलनी शुरू होगी। तेरे बाप ने शिवचरन की लड़की का किडनेप किया, सिर्फ इसलिये कि शिवचरन उसे अपनी जमीन नहीं बेचना चाहता था। मैं जानता हूं कि अब अगर शिवचरन तेरे कमीने बाप को जमीन बेच भी दे तो भी उसे उसकी बेटी नहीं मिलेगी, इसलिये हमने शिवचरन की बेटी को सही-सलामत वापिस लेने के लिये यह रास्ता अपनाया है। अपने बेटे की खातिर वो शिवचरन की बेटी को वापिस करने को मजबूर हो जायेगा। मगर तब भी उसे अपना बेटा वापिस नहीं मिलेगा।"(81)
बलराज गोगिया का नेता पुत्र और उसके दोस्तों को सजा देना का अंदाज प्रभावित करता है। सोचा भी नहीं जा सकता की कोई नेता पुत्र का अपहरण कर उसे गायब कर देगा ।
बलराज गोगिया की विशेषता भी यह है की वह एक-एक सीढी चढता है। वह सीधा मुख्य अपराधी से न टकराकर उसके गुर्गों/ सहयोगियों को पहले खत्म करता है और फिर असली अपराधी को। यहां भी बलराज गोगिया नेता जी के गुर्गों को खत्म कर सदाशिव काले को धमकाता है।
"अब तू अपने कुत्तों की लाशों की गिनती शुरू कर दे। अब यह गिनती रुकेगी तो तेरी मौत पर रुकेगी।"
"हा-हा-हा...।" सदाशिव के मुंह से शैतानी ठहाका उबल पड़ा- "मैं समझ गया कि तू बलराज गोगिया बोल रहा है। रही मेरे को मारने की बात तो यह बात अपने दिल से निकाल दे। आग हूं मैं आग, धधकती आग! अगर तू मेरे करीब भी फटका तो जलकर राख हो जायेगा।"(153)
अब कौन राख होगा और कैसे राख होगा यह तो इस एक्शन उपन्यास को पढकर ही जाना जा सकता है। मेरे विचार से यह एक रोचक और एक्शन से परिपूर्ण उपन्यास है। उपन्यास की कहानी पाठक को बांधने में सक्षम है और कहानी तेज रफ्तार भी है। एक एक घटित होती घटनाएं उपन्यास को तेज बनाती हैं और पाठक को अपने साथ जोड़े रखती हैं।
पात्र चरित्र चित्रण-
इंस्पेक्टर बलदेव राज:-
यह एक ईमानदार ऑफिसर है लेकिन वक्त उसे ऐसी स्थिति में ले आता है की वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता। वह वर्दी को समर्पित इंसान है और सदाशिव द्वारा सजा दिये जाने पर भी इसके चेहरे पर भय नहीं बल्कि निडरता है।
चेहरे पर पीड़ा के बावजूद हंस पड़ा बलदेव राज ।
"मेरी वर्दी देख रहा है न तू! यह वर्दी नहीं कफन है मेरा।
हर पुलिस वाले को वर्दी नहीं...उसको कफन मिलता है... और सच्चा पुलिसवाला हमेशा यही चाहता है कि वो जब मरे तो उसके बदन पर उसका कफन हो । यानि वो अपना फर्ज पूरा करते हुए मरे। मैं भी अपना फर्ज पूरा करते हुए मर रहा हूं। भला इससे बड़ी गर्व की बात क्या होगी मेरे लिए । मैं तो तभी से मरने के लिए तैयार हो गया था जब मैंने वर्दी पहनी थी ।"(274)
बलराज गोगिया -
उपन्यास का मुख्य पात्र है । इनका परिचय हम पिछले उपन्यासों में पढ चुके हैं। फिर भी विशेषकर प्रस्तुत उपन्यास और 'मास्टर माइण्ड' में यह अपने परिवार के साथ उपस्थित शांति की जिंदगी जी रहा है। प्रस्तुत उपन्यास में तो बलराज गोगिया के तीन माह की बच्ची भी है फिर भी वह शिवरचरण की मदद के लिए आगे आता है।
इंस्पेक्टर बलदेवराज के शब्दों में देखें-
"तुम्हारे बारे में मैं काफी कुछ जानता हूं बलराज गोगिया। तुम एक आम इंसान की जिन्दगी जीना चाहते हो, लेकिन हर बार तुम्हें किसी न किसी तरह से जुर्म की दलदल में घुसने को मजबूर किया गया। इस बार भी तुम मजबूर ही हुए हो । एक नेक शहरी शिवचरन ने तुम्हारे सामने मदद की गुहार लगाई और तुमने अपनी दुकानदारी, अपना घर तक दांव पर लगा दिया...।"
उसने एक गहरी सांस छोड़ी और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला-(142- बलदेव राज)
राघव और जिन्न -
राघव एक खतरनाक व्यक्तित्व है। प्रस्तुत उपन्यास भी उसका कार्य भी गजब है और उसके जिन्न का भी। हालांकि जिन्न यहां अपनी करामाता कम ही दिखाता है। फिर भी वह रॉनी के बहन के साथ नजत आता है।
मंजुनाथ-
उपन्यास का एक विशेष पात्र जिसके चलते बलराज को काफी मदद मिलती है।
सदाशिव काले-
एक नेता जो भ्रष्ट है, हरामी और खतरनाक भी है। नेता का पुत्र और उसके दोस्त भी हरामी हैं।
सकारात्मक पक्ष-
- बलदेव राज एक ईमानदार पुलिसकर्मी है । अनिल सलूजा जी के उपन्यासों में पुलिस के दोनों पक्ष, सकारात्मक व नकारात्मक का चित्रण मिलता है।
- बलराज गोगिया एक मददगार पात्र है । यहां भी वह शिवचरण की मदद के लिए तब आगे आता है जब बलराज गोगिया का परिवार भी कहता है- 'दुनिया में हर रोज रेप होते हैं। कई कत्ल होते हैं। हमने सबका ठेका तो नहीं ले रहा है । ऐसे गुनहगारों से निपटने के लिए पुलिस है।'(पृष्ठ- 46, पात्र- सुनीता)
उपन्यास का नकारात्मक पक्ष-
उपन्यास के आरम्भ में बलराज गोगिया की पुत्री नाम दिव्या बाद में नाम तान्या हो गया। (अब सही नाम क्या है, यह तय करना मुश्किल है)
- शहर का नाम कहीं राय नगर है तो कहीं राजा नगर ।
प्रस्तुत उपन्यास एक एक्शन उपन्यास है। इसकी कहानी एक भ्रष्ट और अहम के मारे नेता की है जो अपने धन और सत्ता के बल पर अपने आवारा पुत्र और उसके दोस्तों की हैवानियत को शह देता और स्वयं भी सत्ता के अहम में लोगों पर अत्याचार करता है।
इस स्वयं नेता और उसके पुत्र के अत्यचारों से तंग लोग बलराज गोगिया की शरण में जाते हैं। और फिर संघर्ष आरम्भ बलराज गोगिया और भ्रष्ट नेता सदाशिव के मध्य ।
एक्शन घटनाओं से भरपूर यह उपन्यास आदि से अंत तक रोचक है। पाठक को सम्मोहित करता है । उपन्यास में ज्यादा थ्रिलर या रहस्य ( सस्पेंश) नहीं है पर पाठक पर पकड़ अच्छी है।
एक्शन पसंद, बलराज गोगिया-राघव या अनिल सलूजा को पढने वालों के लिए यह एक अच्छा उपन्यास है।
उपन्यास- धर्मराज
लेखक- अनिल सलूजा
अनिल सलूजा के अन्य उपन्यासों की समीक्षा
फंदा ।। कृष्ण बना कंस ।। बारूद की आंधी ।। हारा हुआ जुआरी ।। राघव की वापसी ।। नृशंसक ।। मास्टर माइण्ड ।।

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