उपन्यास का नायक बींझा एक लोक गायक है। वह अपनी कला का मूल्य तो चाहता है लेकिन किसी की दया नहीं। इसी कसमकस से गुरजते और सफलता- असफलता के बीच झूलते बींझा को प्रस्तुत किया है लेखक अशोक जमनानी ने।
कहानी- कहानी का मुख्य नायक बीझा है। वह मांगणियार जाति से संबंधित है, जो की धनिकवर्ग के उत्सवों में गायन कर अपना जीवन यापन करती है। बींझा का बाप एक बार बींझा को एक धनिक परिवार के कार्यक्रम में गायन हेतु ले जाता है, पर वहाँ इस बाप-बेटे के गायन की कोई महता नहीं। वहाँ पर बींझा व उसके बाप का अपमान तक कर दिया जाता है। यही बात बींझा के मन मस्तिष्क में बैठ जाती है और वह प्रण ले लेता है की वह कभी धनिकवर्ग के यहाँ कभी नहीं जायेगा।
दूसरी तरफ राज परिवार का पुत्र सूरज, बींझा का घनिष्ठ मित्र है। वह बींझा के गायन से प्रभावित होकर उसको आर्थिक मदद देता है। लेकिन एक बार जब सूरज बिना गीत सुने बींझा को रुपये देता है तो बींझा इसे अपना अपमान मानता है और उसकी धनिकवर्ग के प्रति पूर्वधारणा और मजबूत हो जाती है।
यहीं से बींझा एक अनजान सफर पर निकल जाता है। उस सफर पर जहां उसकी कला का मूल्य तो हो पर दया नहीं । इसी सफर में में उसे कई अन्य महत्वपूर्ण पात्र मिलते हैं, जो अपनी जिंदगी में कई रंग देख चुके हैं। प्यार और नफरत के इन रंगों से गुजरता हुआ बींझा उन लोगों से भी मिलता है जो कला और शारीरिक वासना को एक खेल समझते हैं। दिल से टूटा बींझा एक बार फिर खण्डित हो जाता है, लेकिन उपन्यास के अंत में अपने मित्र सूरज के सहयोग से वह एक नयी कहानी लिखने में सफल हो जाता है।
आदमी अगर सही रस्ते पर चलता है तो अनंतः उसे सफलता मिलती है।
पात्र- कहानी का मुख्य पात्र बींझा है और अन्य पात्र उपन्यास में आते-जाते रहते हैं, पर प्रत्येक पात्र अपनी जगह सशक्त रूप से उभर कर सामने आया है।
सूरज- बींझा का मित्र। राजघराने का पुत्र और उपन्यास का एक विशेष पात्र।
सोरठ- बींझा की पत्नी।
सुरंगी- वक्त की मार खायी यह पात्र, अपना सब कुछ त्यागकर एक नृत्यक का जीवन जीती है।
झांझर- सुरंगी व झांझर एक जैसी कथा है। दोनों के दिल में दर्द है।
क्रिस्टीन- कला की दलाल।
ब्रजेन- कला का पारखी। पर वक्त ने कला छीन कर दलाल बना दिया। अंत में यही ब्रजेन बींझा को रास्ता दिखाता है।
इनके अलावा भी उपन्यास में कई महत्वपूर्ण पात्र हैं, जो उपन्यास के कथानक को आगे बढाने में सहायक व आवश्यक हैं।
कहीं- कहीं तो संवाद विशेष सुक्तियां बन गये जो लेखक की संवाद शैली की विशेषता है। अगर बात करें भाषा की तो यह उपन्यास राजस्थान की पृष्ठभूमि पर रचा गया है, इसलिए यह तो यह है की इसमें राजस्थानी भाषा के शब्द तो अवश्य होंगे।
उपन्यास की भाषा सरल व कोमलकांत है, कहीं पर भी क्लिष्ट शब्द नहीं हैं। प्रत्येक पात्र के संवाद भी पात्रानुकूल हैं।
जब बींझा गलत रास्ते से वापस आकर सोरठ से माफी मांगता है, तब सोरठ उसे जो उत्तर देती है वह स्त्रीवर्ग की पीङा को व्यक्त करने वाले शब्द हैं।
" आपने इन दिनों मुझे मारा नहीं पर घाव देते रहे…अब मेरी रूह सूख गयीहै…आप कुछ भी कहो लेकिन मैं आपको माफ़ नहीं कर पा रही हूँ…क्यों माफ़ करूँ आपको?'
बीझा के स्वाभिमान को प्रकट करने वाले संवाद देखिएगा। बींझा हक तो चाहता है पर किसी की दया नहीं ।
“ तू शायद यह बात समझेगी नहीं, लेकिन मैं जानता हूँ कि बिना मेहनत के उनसे उनकी दया दिखाने वाले रूपये अगर मैंने अपने पास रख लिए तोवे मेरे दोस्त नहीं रहेंगे, वो हुकुम हो जाएंगे...... सुना सोरठ, वो हुकुम हो जाएंगे ।” (पृ.39)
"ऐसा कहीं हो सकता है। औरत जिंदगी में आगे तो बढती है लेकिन पीछे छूटे का मोह नहीं छोङ पाती।" (66)
"बङे लोगों का क्या है, घोङे से आप गिरे साईस की नौकरी गयी" (09)
लोकगीत- उपन्यास में राजस्थानी लोकगीतों का रंग भी खूब बिखरा है। जब उपन्यास लोक गायक को प्रस्तुत करती है तो लोक गीत तो अवश्य आयेंगे।
गांधी जी ने भी कहा है,-"लोकगीत संस्कृति के पहरेदार हैं।"
लोकरंग देखिए-
"सोना री धरती जथे
चांदी रो असमान
रंग-रंगीलो रस भरो
म्हारो प्यारो राजस्थान जी"
" काली रे काली काजलिये रे रेख जी
कोई भूरोङा बुरजाँ में चमके बीजली"
कथाक्षेत्र- उपन्यास का कथाक्षेत्र राजस्थान का जैसलमेर है।
लेकिन इसके साथ-साथ जोधपुर व रामदेवरा के पर्यटन स्थलों का वर्णन भी है।
कहानी का अंतिम भाग मुंबई का है।
प्रस्तुत उपन्यास की कहानी बहुत ही मार्मिक है। वर्तमान लोक कलाकारों के जीवन की वास्तविकता का चित्रण करती यह कहानी पाठक को अंदर तक छू जाती है। पृष्ठ दर पृष्ठ पाठक की आँखों से आँसू बहते हैं।
---
उपन्यास- खम्मा
लेखक- अशोक जमनानी
प्रकाशक- श्री रंग प्रकाशन, होशंगाबाद, म.प्र.
पृष्ठ-157
मूल्य-₹250.
लेखक की अन्य रचनाएँ
1. को अहम
2. बूढी डायरी
3. व्यास गादी
4. छपाक-छपाक