Wednesday, 31 December 2025

700. रानी साहिबा- राम पुजारी

प्रेम के विभिन्न रंगों का गुलदस्ता
रानी साहिबा- राम पुजारी

उपन्यास लेखक के बाद राम पुजारी जी ने कहानी लेखन में हाथ आज आजमाया है और इसमें वह सफल होते भी नजर आ रहे हैं। एक उपन्यास लेखक के लिए अपनी बात को कम शब्दों में कहना कुछ मुश्किल अवश्य होता होगा लेकिन एक सफल लेखक वही है जो कथ्य को उसी अनुरूप आकार दे जैसी कथा की मांग है।
रानी साहिबा कथा संग्रह राम पुजारी जी की दस कहानियों को समेटे हुए है और सभी कहानियों की पृष्ठभूमि में प्यार की झलक स्पष्ट नजर आती है। सभी कहानियां लेखक के चरित्र की तरह है जिनमें बनावटीपन जरा भी नजर नहीं आता ।
     'रानी साहिबा' का प्रकाशन जनवरी 2024 में हुआ था और फरवरी में यह कथा संग्रह मेरे हाथ आया । इसकी पहली कहानी पढी जो अच्छी लगी । दूसरी कहानी पढने से पहले में अन्यत्र व्यस्त हो गया और कहानी पढने का समय न मिला जबकि राम पुजारी का निरंतर आग्रह था कि आप इसकी समीक्षा करें। पर कभी-कभी चाहकर भी समय नहीं निकल पाता और फिर 'रानी साहिबा' मेरी नजरों से यूं गायब हुये की ढूढे भी न मिले । इधर-उधर सब जगह तलाश किया पर....हाये री किस्मत...किसकी ?
फरवरी 2025 भी आया दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में राम पुजारी जी से मुलाकात भी हुयी, रानी साहिबा पर चर्चा भी चली और मेरा आश्वासन भी चला की शीघ्र ही रानी साहिबा को पढा जायेगा।

Monday, 29 December 2025

699. उसने खून कर दिया- एच. इकबाल

 बंद कमरे में खून

उसने खून कर दिया- एच. इकबाल

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य का एक समय वह था जब उपन्यास मासिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे ।‌ इनमें लगभग 120 पृष्ठ के उपन्यास होते थे और कहानी अधिकांश में मर्डर मिस्ट्री थी।
  एच. इकबाल अपने समय के प्रसिद्ध उर्दू उपन्यासकार रहे हैं और इनके उपन्यास हिंदी में अनुदित होते रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास एच. इकबाल साहब का मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है।
कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की जिसे एक हीरे के मार दिया जाता है और पुलिस का मानना है यह आत्महत्या है जबकि जासूसी कर्नल विनोद ने कहा- उसने खून कर दिया ।
अब यह खून किसने किया, यह हमें उपन्यास पढकर ही पता चलेगा।


            सड़क पर फर्राटे भरती लिंकन, ट्रैफिक के बीच से किसी नागिन की तरह लहराती चली जा रही थी। आज ट्रैफिक भी कुछ ज्यादा था । कर्नल विनोद की बार-बार घड़ी पर उठती नजर बता रही थी कि वह बड़ी जल्दी में है और शायद इसी कारण लिंकन इतनी गति से दौड़ रही है।
पन्द्रह मिनट बाद लिंकन एक कोठी के शानदार फाटक में प्रविष्ट हुई और पोर्टिको में जाकर रुक गई ।

Sunday, 28 December 2025

698. सफेदपोश गुण्डा- अंजुम अर्शी

मास्टर ब्रेन का कारनामा
सफेदपोश गुण्डा- अंजुम अर्शी

वह मर मर गया था और उसकी अंतिम इच्छा थी इसके हड्डियों के ढांचे को उस द्वारा बनाई गयी संस्था की मीटिंग में  प्रधान की कुर्सी पर रखा जाये और वही उस मिटिंग का प्रधान होगा।
      प्रधान की पुत्री ने अपने पिता के हड्डियों के ढांचे को अखबार पढते देखा था और 'मास्टर ब्रेन' तो उस वक्त बौखला उठा जब उसने हड्डियों के ढांचे को प्रयोगशाला में कार्य करते देखा।

   लोकप्रिय कथा साहित्य में जासूसी और थ्रिलर उपन्यासों की शृंखला में एक से बढकर एक हैरत जनक उपन्यासों की कतार में आज पढें अंजुम अर्शी जी के उपन्यास 'सफेदपोश  गुण्डा' की समीक्षा ।

वह इन्सानी हड्डियों का भयानक ढाँचा ही था जिसके शरीर पर पुरानी किस्म का लिबास था और सिर पर फैल्ट कैप पहना दी गई थी। उसके दोनों हाथ मेज पर फैले हुए थे और हड्डियों की उंगलियाँ बहुत भयानक और खौफनाक लग रही थीं ।

Monday, 22 December 2025

697. The Adventures of Tom Sawyer- Mark Twain

शरारती टाॅम के साहसी कारनामें
The Adventures of Tom Sawyer- Mark Twain

  आज प्रस्तुत है एक प्रसिद्ध बाल उपन्यास की समीक्षा । एक शरारती और बहादुर बच्चे की रोमांच से भरपूर कहानी । 

"टॉम !"
कोई उत्तर नहीं ।
"ओ टॉम ! आखिय हो क्या गया है इस लड़के को ? ओ टॉम !"
बूढ़ी पाली मौसी ने अपना चश्मा नाक पर नीचे गिराकर, उसके ऊपर से कमरे में चारों ओर नजर दौड़ाई । फिय उन्होंने चश्मे को माथे पर चढ़ाकर चारों ओर देखा । चश्मे के अन्दर से शायद ही कभी उन्होंने देखने की कोशिश की हो। और सच तो यह है कि वह चश्मा आंख की कमजोरी के कारण नहीं, फैशन के लिए लिया गया था। वे थोड़ी देश तक उलझन में पड़ी खड़ी रहीं, फिर ककंश स्वर में तो नहीं, किन्तु स्वर को इतना तेज बनाकर जरूर बोलीं कि कम से कम कमरे में रखे फर्नीचर उनकी बात सुन सकें, "आज अगर मैं तुझे पकड़ पाऊं तो मैं..."
किन्तु वे अपनी बात पूरी नहीं कर सकीं, क्योंकि उन्होंने झुककर बिस्तर के नीचे झाड़ पीटना शुरू कर दिया था। किन्तु झाड़ पीटकर वे बिस्तर के नीचे से एक बिल्ली के अतिरिक्त और कुछ नहीं निकाल सकीं ।
"ओफ्, ऐसा लड़का तो मैंने कहीं देखा ही नहीं !" दरवाजे पर जाकर उन्होंने बाग में फैले टमाटर के पौधों और 'जिम्पसन' के वृक्षों के बीच भी देखा मगर कहीं भी टॉम का पता न था। सो अब स्वर को काफी ऊंचा करके चिल्लाई, "ओ टॉम !"

Sunday, 21 December 2025

696. पिंजरा- कुमार कश्यप

चल उड़ जा रे पंछी...
 पिंजरा- कुमार कश्यप

एक युवा लड़की जो एक पिंजरे में कैद थी । सिर्फ कैद ही नहीं उस पर अमानवीय अत्याचार भी होते थे और अत्याचारी था उसका परिवार । भाई की हरकतें सुन कर तो मानवता भी शरमा जाये।
एक दिन एक अजनबी ने बंद में पक्षी को हिम्मत दी और कहा - चल उड़ जा रे पंछी...

  आज हम यहां चर्चा कर रहे हैं कुमार कश्यप जी के एक सामाजिक उपन्यास 'पिंजरा' की ।

बादलों से घिरी अंधेरी शाम । ठंड और उस पर गरजते हुये बादल । जैसे कोढ़ में खाज । रात होने से पहले ही घटा-टोप अंधकार छा गया था, पूरे आसार थे कि पानी अब बरसा तब बरसा । सड़कों पर एकदम सन्नाटा था। ठिठुरती ठण्ड की वर्षा से कौन नहीं डरता । बार-बार बिजली चमक उठती थी उसकी कार तेज गति से ढलान से उतर कर सामने दिखाई देते नगर में प्रवेश करने को उतावली होती जा रही थी । कार की खिड़कियों के शीशे चढ़े हुये थे तथा कार की पिछली सीट पर एक गम्भीर व्यक्तित्व की गोर्ण स्त्री बैठी थी। उम्र यही चालीस की रही होगी। आंखों पर सुनहरी फ्रेम का चश्मा, जिनसे झांकती हुई पत्थर सी कठोर आंखें । गम्भीर और चुप।

Saturday, 20 December 2025

695. बाल भारती- दिसंबर - 2025

एक बाल पत्रिका
बाल भारती- दिसंबर 2025

GSSS-6LC बाल भारती के बाल पाठक

 

Thursday, 4 December 2025

691. अधूरी प्यास- दत्त भारती

एक व्यक्ति की जीवनगाथा-
अधूरी प्यास- दत्त भारती
मनुष्य जीवन भी बहुत विचित्र है । इस विचित्र जीवन में न जाने कौन कौन से रंग भरे हुये हैं । न जाने कौनसा रंग सुख देगा और कौनसा दुख । सुख- दुख का संगम ही जीवन है । ऐसे ही संगम के साथ जीवन बीता था हमारे कथानायक जनक का । जिनसे जीवन में सभी रंग थे, पर कब कौनसा प्रभावशाली होगा यह कोई नहीं जानता था । न लेखक, न पाठक और न कथानायक ।


    उपन्यास के प्रथम पृष्ठ से आरम्भ करते हैं इस उपन्यास की समीक्षा ।
फलों की दुकान और मछली की दुकान साथ-साथ थीं । मुझे बालकोनी में खड़े एक घण्टे से अधिक हो गया था। दोनों ग्राहकों के इन्तज़ार में बैठे थे और ग्राहक नज़र न आ रहा था ।

ग्राहक आता भी कहां से ? अभी सिर्फ सवा आठ बजे थे । शाम अभी भीगी भी नहीं थी। अभी तो चिराग़ जले थे और मयखाने आबाद होने शुरू हुए थे। इसी लिए वह सिर्फ दुकान सजा कर ही बैठ सके थे। फल बेचने वाला और मछली बेचने वाला दोनों ही भारी भरकम थे और उन्होंने तोंद छोड़ रखी थी ।
मैंने तो सुना था कि तोंद सिर्फ बनिए ही छोड़ते हैं। लेकिन यह फल बेचने वाला और मछली बेचने वाला किस तरह के पूंजीपति थे जिन्होंने तोंद छोड़ दी थी।
दोनों दुकानें पटड़ी पर थीं। यानी बात यह थी कि कमेटी और पुलिस से मिलकर 'दुकानें' जमाए बैठे थे । बाज़ारे हुस्न की तवायफों की तरह सजधज कर दुकान सजाकर बैठे थे ।