Wednesday, 31 December 2025

700. रानी साहिबा- राम पुजारी

प्रेम के विभिन्न रंगों का गुलदस्ता
रानी साहिबा- राम पुजारी

उपन्यास लेखक के बाद राम पुजारी जी ने कहानी लेखन में हाथ आज आजमाया है और इसमें वह सफल होते भी नजर आ रहे हैं। एक उपन्यास लेखक के लिए अपनी बात को कम शब्दों में कहना कुछ मुश्किल अवश्य होता होगा लेकिन एक सफल लेखक वही है जो कथ्य को उसी अनुरूप आकार दे जैसी कथा की मांग है।
रानी साहिबा कथा संग्रह राम पुजारी जी की दस कहानियों को समेटे हुए है और सभी कहानियों की पृष्ठभूमि में प्यार की झलक स्पष्ट नजर आती है। सभी कहानियां लेखक के चरित्र की तरह है जिनमें बनावटीपन जरा भी नजर नहीं आता ।
     'रानी साहिबा' का प्रकाशन जनवरी 2024 में हुआ था और फरवरी में यह कथा संग्रह मेरे हाथ आया । इसकी पहली कहानी पढी जो अच्छी लगी । दूसरी कहानी पढने से पहले में अन्यत्र व्यस्त हो गया और कहानी पढने का समय न मिला जबकि राम पुजारी का निरंतर आग्रह था कि आप इसकी समीक्षा करें। पर कभी-कभी चाहकर भी समय नहीं निकल पाता और फिर 'रानी साहिबा' मेरी नजरों से यूं गायब हुये की ढूढे भी न मिले । इधर-उधर सब जगह तलाश किया पर....हाये री किस्मत...किसकी ?
फरवरी 2025 भी आया दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में राम पुजारी जी से मुलाकात भी हुयी, रानी साहिबा पर चर्चा भी चली और मेरा आश्वासन भी चला की शीघ्र ही रानी साहिबा को पढा जायेगा।

Monday, 29 December 2025

699. उसने खून कर दिया- एच. इकबाल

 बंद कमरे में खून

उसने खून कर दिया- एच. इकबाल

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य का एक समय वह था जब उपन्यास मासिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे ।‌ इनमें लगभग 120 पृष्ठ के उपन्यास होते थे और कहानी अधिकांश में मर्डर मिस्ट्री थी।
  एच. इकबाल अपने समय के प्रसिद्ध उर्दू उपन्यासकार रहे हैं और इनके उपन्यास हिंदी में अनुदित होते रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास एच. इकबाल साहब का मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है।
कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की जिसे एक हीरे के मार दिया जाता है और पुलिस का मानना है यह आत्महत्या है जबकि जासूसी कर्नल विनोद ने कहा- उसने खून कर दिया ।
अब यह खून किसने किया, यह हमें उपन्यास पढकर ही पता चलेगा।


            सड़क पर फर्राटे भरती लिंकन, ट्रैफिक के बीच से किसी नागिन की तरह लहराती चली जा रही थी। आज ट्रैफिक भी कुछ ज्यादा था । कर्नल विनोद की बार-बार घड़ी पर उठती नजर बता रही थी कि वह बड़ी जल्दी में है और शायद इसी कारण लिंकन इतनी गति से दौड़ रही है।
पन्द्रह मिनट बाद लिंकन एक कोठी के शानदार फाटक में प्रविष्ट हुई और पोर्टिको में जाकर रुक गई ।

Sunday, 28 December 2025

698. सफेदपोश गुण्डा- अंजुम अर्शी

मास्टर ब्रेन का कारनामा
सफेदपोश गुण्डा- अंजुम अर्शी

वह मर मर गया था और उसकी अंतिम इच्छा थी इसके हड्डियों के ढांचे को उस द्वारा बनाई गयी संस्था की मीटिंग में  प्रधान की कुर्सी पर रखा जाये और वही उस मिटिंग का प्रधान होगा।
      प्रधान की पुत्री ने अपने पिता के हड्डियों के ढांचे को अखबार पढते देखा था और 'मास्टर ब्रेन' तो उस वक्त बौखला उठा जब उसने हड्डियों के ढांचे को प्रयोगशाला में कार्य करते देखा।

   लोकप्रिय कथा साहित्य में जासूसी और थ्रिलर उपन्यासों की शृंखला में एक से बढकर एक हैरत जनक उपन्यासों की कतार में आज पढें अंजुम अर्शी जी के उपन्यास 'सफेदपोश  गुण्डा' की समीक्षा ।

वह इन्सानी हड्डियों का भयानक ढाँचा ही था जिसके शरीर पर पुरानी किस्म का लिबास था और सिर पर फैल्ट कैप पहना दी गई थी। उसके दोनों हाथ मेज पर फैले हुए थे और हड्डियों की उंगलियाँ बहुत भयानक और खौफनाक लग रही थीं ।

Monday, 22 December 2025

697. The Adventures of Tom Sawyer- Mark Twain

शरारती टाॅम के साहसी कारनामें
The Adventures of Tom Sawyer- Mark Twain

  आज प्रस्तुत है एक प्रसिद्ध बाल उपन्यास की समीक्षा । एक शरारती और बहादुर बच्चे की रोमांच से भरपूर कहानी । 

"टॉम !"
कोई उत्तर नहीं ।
"ओ टॉम ! आखिय हो क्या गया है इस लड़के को ? ओ टॉम !"
बूढ़ी पाली मौसी ने अपना चश्मा नाक पर नीचे गिराकर, उसके ऊपर से कमरे में चारों ओर नजर दौड़ाई । फिय उन्होंने चश्मे को माथे पर चढ़ाकर चारों ओर देखा । चश्मे के अन्दर से शायद ही कभी उन्होंने देखने की कोशिश की हो। और सच तो यह है कि वह चश्मा आंख की कमजोरी के कारण नहीं, फैशन के लिए लिया गया था। वे थोड़ी देश तक उलझन में पड़ी खड़ी रहीं, फिर ककंश स्वर में तो नहीं, किन्तु स्वर को इतना तेज बनाकर जरूर बोलीं कि कम से कम कमरे में रखे फर्नीचर उनकी बात सुन सकें, "आज अगर मैं तुझे पकड़ पाऊं तो मैं..."
किन्तु वे अपनी बात पूरी नहीं कर सकीं, क्योंकि उन्होंने झुककर बिस्तर के नीचे झाड़ पीटना शुरू कर दिया था। किन्तु झाड़ पीटकर वे बिस्तर के नीचे से एक बिल्ली के अतिरिक्त और कुछ नहीं निकाल सकीं ।
"ओफ्, ऐसा लड़का तो मैंने कहीं देखा ही नहीं !" दरवाजे पर जाकर उन्होंने बाग में फैले टमाटर के पौधों और 'जिम्पसन' के वृक्षों के बीच भी देखा मगर कहीं भी टॉम का पता न था। सो अब स्वर को काफी ऊंचा करके चिल्लाई, "ओ टॉम !"

Sunday, 21 December 2025

696. पिंजरा- कुमार कश्यप

चल उड़ जा रे पंछी...
 पिंजरा- कुमार कश्यप

एक युवा लड़की जो एक पिंजरे में कैद थी । सिर्फ कैद ही नहीं उस पर अमानवीय अत्याचार भी होते थे और अत्याचारी था उसका परिवार । भाई की हरकतें सुन कर तो मानवता भी शरमा जाये।
एक दिन एक अजनबी ने पिंजरे में बंद पक्षी को हिम्मत दी और कहा - चल उड़ जा रे पंछी...

  आज हम यहां चर्चा कर रहे हैं कुमार कश्यप जी के एक सामाजिक उपन्यास 'पिंजरा' की ।

बादलों से घिरी अंधेरी शाम । ठंड और उस पर गरजते हुये बादल । जैसे कोढ़ में खाज । रात होने से पहले ही घटा-टोप अंधकार छा गया था, पूरे आसार थे कि पानी अब बरसा तब बरसा । सड़कों पर एकदम सन्नाटा था। ठिठुरती ठण्ड की वर्षा से कौन नहीं डरता । बार-बार बिजली चमक उठती थी उसकी कार तेज गति से ढलान से उतर कर सामने दिखाई देते नगर में प्रवेश करने को उतावली होती जा रही थी । कार की खिड़कियों के शीशे चढ़े हुये थे तथा कार की पिछली सीट पर एक गम्भीर व्यक्तित्व की गोर्ण स्त्री बैठी थी। उम्र यही चालीस की रही होगी। आंखों पर सुनहरी फ्रेम का चश्मा, जिनसे झांकती हुई पत्थर सी कठोर आंखें । गम्भीर और चुप।

Saturday, 20 December 2025

695. बाल भारती- दिसंबर - 2025

एक बाल पत्रिका
बाल भारती- दिसंबर 2025

GSSS-6LC बाल भारती के बाल पाठक

 

Thursday, 4 December 2025

691. अधूरी प्यास- दत्त भारती

एक व्यक्ति की जीवनगाथा-
अधूरी प्यास- दत्त भारती
मनुष्य जीवन भी बहुत विचित्र है । इस विचित्र जीवन में न जाने कौन कौन से रंग भरे हुये हैं । न जाने कौनसा रंग सुख देगा और कौनसा दुख । सुख- दुख का संगम ही जीवन है । ऐसे ही संगम के साथ जीवन बीता था हमारे कथानायक जनक का । जिनसे जीवन में सभी रंग थे, पर कब कौनसा प्रभावशाली होगा यह कोई नहीं जानता था । न लेखक, न पाठक और न कथानायक ।


    उपन्यास के प्रथम पृष्ठ से आरम्भ करते हैं इस उपन्यास की समीक्षा ।
फलों की दुकान और मछली की दुकान साथ-साथ थीं । मुझे बालकोनी में खड़े एक घण्टे से अधिक हो गया था। दोनों ग्राहकों के इन्तज़ार में बैठे थे और ग्राहक नज़र न आ रहा था ।

ग्राहक आता भी कहां से ? अभी सिर्फ सवा आठ बजे थे । शाम अभी भीगी भी नहीं थी। अभी तो चिराग़ जले थे और मयखाने आबाद होने शुरू हुए थे। इसी लिए वह सिर्फ दुकान सजा कर ही बैठ सके थे। फल बेचने वाला और मछली बेचने वाला दोनों ही भारी भरकम थे और उन्होंने तोंद छोड़ रखी थी ।
मैंने तो सुना था कि तोंद सिर्फ बनिए ही छोड़ते हैं। लेकिन यह फल बेचने वाला और मछली बेचने वाला किस तरह के पूंजीपति थे जिन्होंने तोंद छोड़ दी थी।
दोनों दुकानें पटड़ी पर थीं। यानी बात यह थी कि कमेटी और पुलिस से मिलकर 'दुकानें' जमाए बैठे थे । बाज़ारे हुस्न की तवायफों की तरह सजधज कर दुकान सजाकर बैठे थे ।

Saturday, 29 November 2025

690. खेल खत्म- अर्जुन राठौर

स्मैकिये लोगों की एक्शन कहानी
खेल खत्म- अर्जुन राठौर

वह एक फरार अपराधी था। शक्ल सूरत से सांवला, मासूम, निर्दोष लगने वाला अनिल गोस्वामी बेहद रहस्यमय, शातिर और श्याना था। बम्बई आकर स्मैकचियों की संगत में पड़कर डोप पैडलर बन गया और आखिरी बार वो ड्रग्स की बड़ी खेप लाया और माल का पता भी वह तरीके से नहीं बता पाया था कि कोई उसका बैंड बजा गया। और उस माल के पीछे कई जने पड़े हुए थे।

कभी-कभी इंसान के जीवन के ऐसा भी वक्त आता है जब वह अपने विचार, अपनी भावनाओं से परे होकर ऐसा खेल खेल जाता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । प्रस्तुत उपन्यास 'खेल खत्म' भी एक Ghost writer नाम जैसे असली लेखक की कलम से निकला एक्शन उपन्यास है।
  यह कहानी है जिस इंसान की है उसके विषय में आप उपन्यास के प्रथम पृष्ठ से पढ सकते हैं।

वह लोकल ट्रेन से अंधेरी स्टेशन पर उतरा। वह थके, निढाल कदमों से चलता हुआ स्टेशन से बाहर निकला।
वह एक लम्बा, कसरती बदन का मालिक, गोरा-चिट्टा खूबसूरत शख्स था। उसकी शक्ल देखकर विनोद खन्ना की याद ताजा हो आती थी।
वह अपने हालात से निराश, तकदीर से खफा, दुनिया की भीड़ में अपने आपको तन्हा महसूस करता हुआ शख्स था। अपनी हर्राफा बीवी के कलह-क्लेश, उसकी नफरत और जफा से हैरान, बेहद आन्दोलित, सकून तलाशता हुआ वह बम्बई भाग आया था।

Thursday, 27 November 2025

689. अंधेरे का आदमी - विक्की आनंद

कथा अनोखे प्रतिशोध की
अंधेरे का आदमी - विक्की आनंद

वह शहर के कथित इज्जतदार व्यक्ति थे। जो समाज के महत्वपूर्ण पदों पर विराजित थे। लेकिन वासना के उन दरिंदों ने मासूम लोगों पर जो कहर बरसाया उसका परिणाम एक न एक दिन सामने आना ही था। और एक दिन 'अंधेरे के आदमी' ने उनके पापों की सजा फलस्वरूप उनकी उनकी जिंदगी से रोशनी छीन ली।
   डायमण्ड पॉकेट बुक्स ने बाजार में कई Ghost writer उतारे थे जिनमें से एक थे विक्की आनंद। विक्की आनंद जो डैडमैन सीरीज के कारण कुछ चर्चा में रहे थे। इन्हीं विक्की आनंद का उपन्यास 'अंधेरे का आदमी' पढने को मिला जो एक रोमांच से परिपूर्ण उपन्यास है।
    कहानी के मुख्य पात्र हैं फिल्म अभिनेता विनोद पाण्डे, कुंवर जमशेद राणा जिसके पिता कभी एक बड़ी रियासते के राजा थे, कई मिलों का मालिक सेठ शहनवाज खान, भूतपूर्व राजा शमशेर सिंह, राजनेता रंजीत वर्मा जो समाज के सामने तो सफेदपोश लोग हैं लेकिन ये सफेदपोश लोग वास्‍तव में वासना के मरीज हैं। समाज में अपने प्रभुत्व और धन के बल पर असंख्य औरतों की इज्जत से खिलवाड़ किया है।

688. खूनी प्रेमिकाएं - आरिफ मारहर्वी

जासूस कैसर और इंस्पेक्टर इरफान का कारनामा
खूनी प्रेमिकाएं - आरिफ मारहर्वी- 1972


कुसुम ने कार एडवर्ड पार्क के फाटक से कुछ आगे बढ़ाकर से फुटपाथ के समीप रोक दी और फरीदा ने इधर-उधर देखकर अचरज से पूछा -
'हायें यहाँ क्यों रोक दी गाड़ी ?'
कुसुम ने इंजन बन्द करके पिछली सीट से किताबें उठाई और गेट खोलकर उतरती हुई बोली-
'उठा किताबें...नीचे उतर आ और वह थर्मस भी उठाती ला ।'
'क्या मतलब ?' फरीदा ने चौंककर पूछा । 
'मतलब अन्दर आकर पूछना ।'
कुसुम किताबें लेकर पार्क में प्रविष्ट हो गई। फरीदा विस्मय से उसे देखती रही। फिर उसने भी अपनी किताबें उठाई और कार से उतरकर कुसुम के पीछे अन्दर आ गई। वह थर्मस भी उठाती लाई थी ।(खूनी प्रेमिकाएं- आरिफ मारहर्वी, उपन्यास के प्रथम पृष्ठ से)

   आप पढ रहे हैं आरिफ मारहर्वी साहब के जासूसी उपन्यास 'खूनी प्रेमिकाएं' की समीक्षा । यह एक थ्रिलर उपन्यास है। कहानी का मुख्य नायक कैसर नामक एक जासूस है और शेष उसके इर्दगिर्द घटती होती घटनाएं हैं।

687. विषैला कत्ल- आरिफ मारहर्वी -

वह कब्र में जिंदा हो उठा
विषैला कत्ल- आरिफ मारहर्वी - दिसम्बर- 1972

इन दिनों आरिफ मारहर्वी साहब के जो जासूसी उपन्यास पढे हैं उनमें से मुझे यह सबसे ज्यादा रोचक लगा है।  आरिफ साहब के उपन्यास लगभग 120-30 पृष्ठ के होते थे, और कहानी जासूसी थी। 
   विषैला कत्ल भी एक जासूसी उपन्यास है जो जासूस कैसर पर आधारित है। कहानी तब रोचक हो उठती है जब एक शख्स एक महीने बाद कब्र में जीवित हो उठता है, और उसके बाद जो हंगामा होता....

  
अंधेरी रात की निस्तब्धता में कुत्ते के रुदन की आवाज दूर-दूर तक लहराती चली गई थी और वे दोनों इस प्रकार उछल पड़े जैसे कोई प्रेतात्मा उनके आस-पास ही मंडरा रही हो। उन दोनों के शरीर थर-थर काँपने लगे थे तथा कड़ाके की सर्दी होन्हें पर भी दोनों के माथों पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं।
कब्रिस्तान में गहन नीरवता फिर व्याप्त हो गई थी। दूर तक बनी हुई छोटी-बड़ी सफेद-सफेद एवं मटियाली कब्र उन्हें ऐसी दिखाई दे रही थीं जैसे कब्रों में सोने वाले मुर्दे स्वयं निकलकर कब्रों के ऊपर लेट गए हों। किसी ओर पत्ता भी खड़कता तो वे दोनों भयभीत होकर उछल पड़ते ।
उनमें से एक लम्बे कद का दुबला-पतला आदमी था । उसने सस्ते से खाकी कपड़े की पेंट और मोटे गर्म कपड़े की जैकट पहिन रखी थी और दूसरा छोटे कद का तनिक मोटा था। उसके शरीर पर काले रंग की पेंट और कसा हुआा गर्म कोट था। दोनों वे अपने चेहरों पर स्कार्फ इस प्रकार बाँध रखे थे जैसे ढाटे बाँधे हों, और वे दोनों कब्रिस्तान की भीतरी दीवार से लगे एक ऐसे कोने में बैठे थे जहाँ गहन अन्धकार का राज्य था ।( विषैला कत्ल- आरिफ मारहर्वी, प्रथम पृष्ठ)
         अगसर और सफदर दो बदमाश थे। छोटी-मोटी चोरी से अपना जीवन यापन करते थे लेकिन एक बार उन्हें एक अनोखा काम मिला और वह काम था-
'एक विशेष कब्र में से एक विशेष समय पर एक विशेष मुर्दे की खोपड़ी निकालकर बेगम सरफराज के पास पहुंचा देना ।'

Wednesday, 26 November 2025

686. आग का खेल- आरिफ मारहर्वी

 एक हत्या - दो संदिग्ध
आग का खेल- आरिफ मारहर्वी

हिंदी जासूसी कथा साहित्य में आरिफ मारहर्वी का नाम काफी चर्चित रहा है। राजवंश नाम से भी इन्होंने उपन्यास और फिल्म लेखन भी किया है। 
    आरिफ मारहर्वी साहब का एक छोटा सा उपन्यास 'आग का खेल' इन दिनों पढा । प्रस्तुत उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री है और इसकी सबसे बड़ी विशेषता है इस उपन्यास में पात्रों की संख्या का कम होना, एक मृतक और दो संदिग्ध । 
   हम उपन्यास के विषय में चर्चा करने से पहले उपन्यास का प्रथम पृष्ठ पढ लेते हैं ताकि कहानी को अच्छे से समझ सकें।

    सहसा 'सेवा कुंज' की पूरी बिल्डिग गहरे अन्धेरे में डूब गयी ।
बिल्डिग के पूर्वी भाग में नौकरों के क्वार्टर थे। उन क्वार्टरों में भी गहरा अन्धेरा छा गया था। ऐसा प्रतीत होता था जैसे इस पूरी बिल्डिंग में मानव नाम की कोई वस्तु रहती ही न हो।
    श्यामू कुछ देर तक आँखें फाड़-फाड़कर अन्धेरे में देखने का यत्न करता रहा। उसके कान भी किसी तरह की आहट पर लगे हुए थे। किन्तु जब काफी देर तक श्यामू को न कोई आहट सुनाई दी और न बिजली ही लौट आई तब श्यामू के दिल की धड़कनें तेज हो गईं।

685. भयानक भिखारी - आरिफ मारहर्वी

विमान अपहरण काण्ड
भयानक भिखारी - आरिफ मारहर्वी
जासूसी उपन्यास - अगस्त -1971

एकाएक माइक पर स्वर गूंजने लगा-
'पेसेंजर्स प्लीज..! राखनपुर जाने वाला जहाज अपनी उड़ान के लिए तैयार है। आप लोग कृपया अपनी-अपनी सीटें ले लीजिये । पेलेंजर्स प्लीज राखनपुर जाने वाला प्लेन अपनी उड़ान के लिए तैयार है। कृपया आप लोग अपनी-अपनी सीटें ले लीजिये ।'

सोजी ने काफी का अन्तिम घूंट भरा तथा कप काउंटर पर रखकर केन्टीन के द्वार की ओर बढ़ी। सहसा पीछे से किसी ने उसके कन्धे पर हाथ रख दिया ।
सोजी भिन्नाकर घूमी उसके कन्धे पर हाथ रखकर सम्बोधित करने वालों से अत्यन्त तीव्र घृणा थी, परन्तु अपने सम्मुख एक बूढ़े को देखकर वह केवल होंठ हिलाकर रह गई। यदि उसके स्थान पर कोई दूसरा होता तो वह कंदाचित कोई घोर अपमान से भरी बात कह बैठती किन्तु उस बूढ़ की अवस्था बड़ी दयनीय थी। 
सोजी ने कोमल स्वर में कहा-'आज्ञा करें!'
बूढ़ा कुछेक क्षणों तक इस मुद्रा में हांफता रहा जैसे उसे दमे का रोग हो । उसके कंधे आगे को ढलके हुए थे और गर्दन इतनी झुकी हुई थी कि पोठ पर कूबड़-सा उभर आया था। गालों का माँस लटका हुआ था तथा घनी पलकें सफेद हो रही थीं।
उसके शरीर पर एक अति बहुमूल्य कपड़े का किन्तु अत्यन्त बेढंगा एवं ढीला-ढाला सिला हुआ सूट था। उसने बड़ी कठिनाई से अपनी गर्दन सोजी की ओर उठाई तथा हांफता हुआा बोला--
'आप' आप राखनपुर... राखनपुर के प्लेन में सवार होने जा रही हैं ?'
'जी हाँ!' सोजी ने ऊबे हुए स्वर में उत्तर दिया ।
'देखिये... देखिये म..म... मुझे भी उसी प्लेन में
यात्रा करनी है, मैं...मैं तेज नहीं चल सकता मुझे....मुझे सहारे की भी आवश्यकता है । मैं... मैं आपका बहुत बहुत आभारी होंगा अगर....अगर आप मेरा हाथ थाम लें ?'
सोजी का मन तो चाहा कि स्पष्ट रूप से नकार कर दे परन्तु बूढ़े के मुख पर बरसती हुई विवशता ने उसे ऐसा करने से रोका तथा अनिच्छापूर्वक हाथ बढ़ाकर बोली-
"आइये... ।"
"धन्यवाद...धन्यवाद।"

(भयानक भिखारी- आरिफ मारहर्वी, प्रथम पृष्ठ)
   नमस्ते पाठक मित्रो,

Tuesday, 25 November 2025

684. भेड़िये की तस्वीर- आरिफ मारहर्वी

कैसर निखट्टू फंसा अपराधियों के जाल में
भेड़िये की तस्वीर- आरिफ मारहर्वी 

Hindipulpfiction

जब तक इस देश की भूमि पर कैसर जीवित है, तुम लोगों का कोई भी मानवघाती षड्यन्त्र सफल नहीं हो सकता ।
    आरिफ मारहर्वी साहब का प्रसिद्ध पात्र कैसर देश के दुश्मनों का ललकारता और उनके खतरनाक इरादों को ध्वस्त करता है। जासूस कैसर निखट्टू का एक एक्शन उपन्यास 'भेड़िये की तस्वीर'।
नमस्कार पाठक मित्रो,
आप #Svnlibrary पर पढ रहे हैं जासूसी उपन्यासकार आरिफ मारहर्वी साहब के एक्शन उपन्यास 'भेड़िये की तस्वीर' की समीक्षा ।
जैसे ही जीप होटल के सामने आकर रुकी, दरबान ने अटेनशन होकर कैसर को सलाम मारा और कैसर बौखलाहट में जीप से उतरते-उतरते ठोकर खाकर गिरते-गिरते बचा। और फिर इस प्रकार फुर्ती से आगे बढ़कर उसने दरबान से हाथ मिलाया जैसे उसकी दरबान से वर्षों पुरानी जान-पहचान रही हो । तथा अब सहसा बहुत दिनों पश्चात भेंट हुई हो दरबान के बत्तीसों दाँत निकल पड़े ।
कैंसर दरबान से उसके बच्चों के कुशल समाचार पूछकर वेग पूर्वक होटल की ओर बढ़ा ही था कि उसे पीछे से झल्लाया हुआ स्वर सुनाई दिया ।
'अरे अरे!'

Tuesday, 18 November 2025

683. आग का समंदर- कर्नल रंजीत

इस शहर में लोग आत्मदाह कर रहे थे 
आग का समंदर - कर्नल रंजीत

उस शहर में हर कोई जल रहा था । सरे आम लोग स्वयं पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा रहे थे और प्रशासन चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। मौत का यह खेल तब तक जारी था तब मेजर बलवंत ने इसकी तह में जाकर रहस्य को उजागर नहीं कर दिया।

कर्नल रंजीत की कलम से निकला मेजर बलवंत सीरीज का एक ज्वलंत उपन्यास 'आग का समंदर' ।

आकाश पर छाई घटाओं ने उस अंधेरी रात के अधकार को और अधिक बढ़ा दिया था। हल्की-हल्की बूंदाबांदी शुरू हो चुकी बी। मौसम हर पल और अधिक खराब होता चला जा रहा था।
       इण्टरनेशनल एयरपोर्ट पर मौसम खराब होने के कारण कई उडाने स्थगित कर दी गई थी। और जो विमान एयरपोर्ट पर लेड कर रहे थे वे भी बहुत ही सावधानी से उतर रहे थे।
एयरपोर्ट के लांज में एक टेबल के गिर्द बैटे पांचों नौजवानों की नजरें थोड़ी-थोड़ी देर के बाद अपनी कलाई पर बंधी घड़ियों की ओर उठ जाती थीं, और फिर वे एक लम्बी सांस छोड़कर नई सिगरेट सुलगाने लगते थे।

Sunday, 16 November 2025

682. रात के अंधेरे में - कर्नल रंजीत

कहानी एक गर्वीली हत्यारिन की 
रात के अंधेरे में - कर्नल रंजीत

" बताओ अप्सरा की बेटी कौन है ?" मेजर ने पूछा।
"मैं यह कभी नहीं बताऊंगी।" मिसेज निगाम्बो ने कहा।
मेजर कुछ और कहना ही चाहता था कि कानों के पर्दे फाड़ डालने वाली चीख सुनाई दी।
और अभिनेता वेद प्रकाश की बांहों में आ गिरी।
"बे सिर पैर की औरत ?"
"हां, बेसिर-पैर की। वह खुली आस्तीनों वाला सुर्ख गाउन पहने थी। दोनों हाथों पर दस्ताने। दस्तानों पर खून। गाउन के कॉलर खड़े हुए, लेकिन खड़े कॉलरों -के बीच न गर्दन, न चेहरा, न सिर।"

एक से एक बढ़कर अविश्वसनीय किन्तु सत्य घटनाओं से भरपूर जासूसी उपन्यास ।

कर्नल रंजीत की अद्भुत रहस्यमयी लेखनी का नवीनतम चमत्कार - रात के अंधेरे में ।

लोकप्रिय कथा साहित्य में कर्नल रंजीत का नाम अदभुत कथा‌नक के लिए याद किया जाता है। इनके उपन्यासों के कथानक और पात्र दोनों ही विचित्र होते हैं। ऐसा ही विचित्रता से भरा हुआ एक उपन्यास है 'रात के अंधेरे में' । यह श्री लंका की पृष्ठभूमि पर आधारित रहस्य और रोमांचक से भरपूर उपन्यास पठनीय है।

Saturday, 15 November 2025

681. रानियां रोती नहीं- लक्ष्मी शर्मा

मार्मिक कथा संग्रह 
 रानियां रोती नहीं- लक्ष्मी शर्मा 

बोधि प्रकाशन जयपुर द्वारा समय-समय पर पाठकों के लिए अल्प मूल्य में किताबों का संग्रह जारी किया जाता है । यह पुस्तक संस्कृति को बढावा देने में सराहनीय प्रयास है और ऐसे प्रयास होने भी चाहिए।
बोधि प्रकाशन द्वारा सन् 2010 में पहला सैट जारी किया गया था । प्रस्तुत पांचवां सैट सन् 2020 में आया था जिसमें कुल दस किताबें थी जिनका मूल्य मात्र सौ रुपये था। यह क्रम आगे भी जारी है।

पांचवें सैट की एक पुस्तक है 'रानियां नहीं रोती' और रचनाकार है लक्ष्मी शर्मा। इस संग्रह में कुल नौ कहानियाँ हैं।
इस संग्रह की प्रथम कहानी है 'रानियां नहीं रोती' । यह शीर्षक प्रभावित करने में सक्षम है। पाठक के मन में सहज ही यह प्रश्न उठता है रानियां क्यों नहीं रोती ? 
रानियों की कहानियों को वर्तमान के साथ जोड़कर लेखिका महोदया ने स्त्री के दर्द को बहुत अच्छे से अभिव्यक्त किया है।

Thursday, 30 October 2025

680. अनिल सलूजा

 अनिल सलूजा का एक जबरदस्त उपन्यास

बलराज गोगिया सीरीज

Tuesday, 28 October 2025

679. धर्मराज- अनिल सलूजा

यहां इंसाफ होता है। 
धर्मराज - अनिल सलूजा
#बलराज गोगिया- राघव सीरीज

मरने के बाद इंसान धर्मराज के दरबार में पहुंचता है, जहां उसके कर्मों के अनुसार उसे दण्डित किया जाता है । मगर क्या धरती पर भी कोई धर्मराज है जो पापी को उसके पापों का फल यहीं दे सके ।

धर्मराज - अनिल सलूजा

   अनिल सलूजा जी की इन दिनों पढी जा रही उपन्यासों की समीक्षा में 'धर्मराज' एक रोचक उपन्यास है। यह पात्र बलराज गोगिया की शांतिपूर्ण जिंदगी में उठे तूफान का वर्णन है।

उपन्यास समीक्षा से पूर्व हम पढते हैं 'धर्मराज' उपन्यास का प्रथम पृष्ठ ।

"बचाओ...बचा...ओ... हैल्प...।"
"अबे मुंह बन्द कर इसका। साली की चीखें छह मील दूर तक जा रही हैं। बन्द कर इसका मुंह।"
तुरंत एक हाथ जमीन पर पड़ी लड़की के मुंह पर कुकर के ढक्कन की तरह फिट हो गया।

Monday, 27 October 2025

678. मास्टर माइण्ड- अनिल सलूजा

बलराज गोगिया के शांतिमय जीवन में तूफान
मास्टर माइण्ड- अनिल सलूजा

करते है बात आज अनिल सलूजा जी के उपन्यास 'मास्टर माइण्ड' की ।‌ वह मास्टर माइण्ड था और यही गुण उसके जीवन के लिए अब संकट बन चुका था ।
अच्छा भला दुकान चला रहा था बलराज गोगिया । लेकिन वहां के थानेदार की नजर उस पर पड़ गई। थानेदार मजबूर था। उसने उससे मदद मांगी और जब बलराज गोगिया ने हां की तो ऐसा तूफान उठा कि....

सर्वप्रथम हम मास्टर माइण्ड उपन्यास के प्रथम पृष्ठ/ दृश्य को देखते हैं। बाकी चर्चा बाद में...

वह एक साधारण सा पुलिस थाने का ऑफिस था। जिसमें पड़ी साधारण सी टेबल पर रखी फाईलों के करीब रखा लाल रंग का फोन घनघनाया।

Sunday, 26 October 2025

677. नृशंसक - अनिल सलूजा

मुम्बई की किन्नर से बलराज गोगिया की टक्कर
 नृशंसक - अनिल सलूजा
बलराज गोगिया सीरीज

अपने यार की टांग लगवाने के लिए बलराज गोगिया साठ लाख रुपये और सुनीता- राघव के साथ जा पहुंचा मुम्बई । मगर यहाँ हंगामा पहले से ही उसका इंतजार कर रहा था ।

"डिंग...यं...ग.....।" कालबैल बजी।
एक ईजी चेयर पर बैठे हुकूमत शाह ने किचन की तरफ देखते हुए आवाज लगाई-
"ओ वेखीं ओये (ओ देखना ओये) गुड्डू-कौन आया वे।"
कहते हुए उसने अपने बगल में रखी बैसाखी उठाकर अपनी कटी हुई और साबुत टांग के मध्य रख ली।
तभी किचन में से गुड्डू निकला।

Friday, 24 October 2025

676. राघव की वापसी - अनिल सलूजा

जम्मू के डाॅन से बलराज गोगिया की टक्कर
राघव की वापसी - अनिल सलूजा
बलराज गोगिया सीरीज-
#साठ लाख सीरीज + 

नमस्ते पाठक मित्रो,
   आज प्रस्तुत है एक्शन लेखक अनिल सलूजा जी के पात्र 'बलराज गोगिया' शृंखला के उपन्यास 'राघव की वापसी' की समीक्षा । यह एक एक्शन प्रधान और 'लंगड़ा यार / साठ लाख' शृंखला का उपन्यास है। जिसमें बलराज गोगिया, राघव और सुनीता जम्मू के एक गैंगस्टर से टकराते नजर आये हैं।
सर्वप्रथम हम  राघव की वापसी उपन्यास का प्रथम पृष्ठ पढते हैं।
                     खुली अलमारी के सामने खड़ी सुनीता ने बांये हाथ मे पकड़ी पांच-पांच सौ के नोटों की गड्डी में से बारह नोट गिन कर बाकी नोट अलमारी के लॉकर में रखे और अलमारी बन्द कर वापिस मुड़ी तो नजर सामने कुर्सी पर बैठे राघव पर पड़ी जो हाथ में पकड़े रिमोट के सामने टी.वी. का चैनल बदल रहा था।
उसकी इकलौती लटक रही टांग आगे-पीछे झूल रही थी और घुटने के पास कटी हुई दूसरी टांग कुर्सी से थोड़ी आगे निकली हुई थी।
कमरे में जहां राघव बैठा था-वहां तीन कुर्सियां और पड़ी थीं और दो कुर्सियां सामने थीं और एक उसके बाईं तरफ थी।
बीच में साधारण-सी सेंटर टेबल रखी थी।
कोने में रखा टी.वी. भी साधारण था और वो एक ऊंची टेबल पर रखा हुआ था।

Tuesday, 21 October 2025

675. मुझे मौत चाहिए - अनिल सलूजा

दिल्ली के डाॅन से बलराज गोगिया की टक्कर
मुझे मौत चाहिए - अनिल सलूजा
# साठ लाख शृंखला +
- बलराज गोगिया सीरीज- 14

  एक कातिल को ढूंढकर उस मौत के घाट उतारने का काम मिला था बलराज गोगिया को। तफ्तीश करते हुये वह आगे बढा तो उल्टा अपनी ही जान के लाले पड़ गये उसे और....
और किसने कहा था- मुझे मौत चाहिए

"नहीं... नहीं... भगवान के लिये मेरे बेटे को कुछ मत कहना... मुझ गरीब का बस एक ही बेटा है...। अगर उसे कुछ हो गया तो मेरी पत्नी रो-रो कर अपनी जान दे देगी...। त... तुम मेरी पत्नी की हालत जा कर देखो... बेटे की जुदाई में वह मरने को हो रही है।" अपने कमरे की तरफ बढ़ते बलराज गोगिया के कदम वहीं ठिठक गये।
मोहन गेस्ट हाउस के बारह नम्बर कमरे में ठहरा हुआ था वह... ।

Friday, 10 October 2025

674. शूटर- अनिल सलूजा

एक मंत्री की हत्या का मामला
शूटर- अनिल सलूजा
- बलराज गोगिया- राघव सीरीज - 05

   आज हम चर्चा कर रहे हैं अनिल सलूजा जी और बलराज गोगिया सीरीज के पांचवें उपन्यास शूटर की। यह एक एक्शन-थ्रिलर उपन्यास है। बलराज गोगिया एक महिला की सहायता के लिए मंत्री की हत्या करने मैदान में उतरता है और एक गहरी साजिश में फंस जाता है।
     आपने पिछले दो भागों में विभक्त उपन्यास 'बारूद की आंधी' और 'खूंखार' में पढा होगा की बलराज गोगिया और राघव का पासपोर्ट और वीजा तैयार है और दोनों शांति का जीवन जीने के लिए देश छोड़ने के लिए एयरपोर्ट पहुंचते हैं लेकिन वहां की विक्टर बनर्जी के धोखे के चलते पुलिस पहुँच जाती है और दोनों जान बचाकर दिल्ली छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
एक लम्बे समय पश्चात दोनों आगरा से दिल्ली पहुंचते हैं और वह भी सीधे विक्टर बनर्जी के दरवाजे पर दस्तक देते हैं।

"खट... खट... खट।"
दरवाजे पर दस्तक पड़ी।
विक्टर बनर्जी फोल्डिंग पलंग से नीचे उतरा... चप्पल पहनी और चश्मा उतारकर उसे अपनी मैली शर्ट के पल्लू से साफ करते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ा।
"कौन...?"

Sunday, 5 October 2025

672. बारूद की आंधी- अनिल सलूजा

बलराज गोगिया का तीसरा कारनामा
बारूद की आंधी- अनिल सलूजा

बलराज गोगिया सीरीज- 03

"अब क्या ख्याल है ?*
"कैसा ख्याल?"
"भई विदेश जाने का।
"वो तो जाना ही है, यहां रहा तो कभी न कभी पुलिस के हत्थे चढ़ जाऊंगा और अगर में एक बार पकड़ा गया तो इस बार कोई अवतार सिंह या इकबाल बचाने के लिए नहीं आने वाला और अदालत भी जल्द से जल्द फांसी पर चढ़ाने का हुक्मनामा जारी कर देगी।"
"एक जरिया था। एक वही दोस्त था लेकिन यह भी हरामजदगी दिखा गया।" एक लंबी सांस छोड़ते हुए राघव बोला।
"इसमें तेरा क्या कसूर था और फिर तूने उसे उसकी गद्दारी की सजा खुद अपने हाथों से दे दी थी।" बलराज गोगिया रुमाल निकालकर मुंह पौंछते हुए बोला।
     गंगानगर पुलिस के हाथों आते-आते बचे थे बलराज गोगिया और राघव अगर ऐन वक्त पर वे इन्दिरा गांधी नहर में छलांग न मार गए होते तो दोनों की लाशें, वहीं पुल पर हो बिछी नजर आती।

Friday, 3 October 2025

Monday, 29 September 2025

670. भयानक बौने- कर्नल रंजीत

विश्व पर छाया बौनों का आतंक
भयानक बौने- कर्नल रंजीत

चार और खूंख्वार जीव उस गढ़े में से निकले । उनकी शक्लें बौनों जैसी थीं । उनकी आंखें क्रोध से अंगारा बन गईं । चारों तेज़ी से उछले और दो बलदेव के सीने से और दो उसकी गर्दन से चिपट गए-जोंकों की तरह ! देखते ही देखते उसके सारे कपड़े खून से तर हो गए। वह आकाश की ओर देखने लगा । उसकी आंखें खुली की खुली रह गई थीं । उसपर अचानक विषैले खूंख्वार बौनों ने आक्रमण कर दिया था । एक सनसनीभरा उपन्यास, जिसमें मानवता के शत्रुओं का भयानक षड्यंत्र विफल हो जाता है ।

       कर्नल रंजीत अपने अनोखे कथानक और रहस्यमयी पात्रों के लिए विशेष तौर पर जाने जाते हैं। उनके उपन्यासों के कथानक मर्डर मिस्ट्री होते हुये भी बहुत अलग होते हैं और पात्र भी बहुत अजीब ।
   एक ऐसे ही अलग कथा पर आधारित उनका उपन्यास मिला है- भयानक बौने। प्रस्तुत उपन्यास ऐसे भयानक और जानलेवा चूहों पर आधारित है जो एक तरफ जहां लोगों की जान ले रहे हैं वहीं वह खाद्यान्न भी खत्म कर रहे हैं ।
ऐसे खतरनाक और जानलेवा चूहे कहां से आये ?

669. काली आंधी- कर्नल रंजीत

 मौत की आंधी और खतरनाक लूटेरे

668. देख लिया तेरा कानून- कर्नल रंजीत

ग्यारह हत्याओं की मिस्ट्री
देख लिया तेरा कानून- कर्नल रंजीत

ऐसे सफेदपोश लोगों की अजब-जब कहानी, जो शराफत, इन्सानियत, समाज सेवा का खूबसूरत चोला पहने हुए थे; लेकिन थे वे सिर तक अपराध में डूबे हुए, ढोंगी, मक्कार और घिनौने चेहरे ।
मुखौटेघारी ऐसे लोग, जो कहने को तो कानून के रखवाले थे; लेकिन वास्तव में थे कानून के भयानक दुश्मन ।
एक नौजवान जिसे अगले दिन फांसी दी जाने वाली थी जेल से फरार !
कड़ी सुरक्षा के बीच हथियारों और गोला-बारूद की चोरी, फांसी के फंदों में लटकाकर हत्याएं करने का अनोखा सनसनीखेज तरीका !
चीखते-पुकारते-कराहते बेगुनाह लोगों पर भी अत्याचार, और भी ढेरों रहस्य छिपे पड़े हैं कर्नल रंजीत के इस नये दमदार धमाके में

  देख लिया तेरा कानून

भयानक सपना
"नहीं -ऽ ऽ ऽ ई ऽऽ ई..!"
एक हृदयवेधी चीख रात के सन्नाटे को चीरती हुई नैनी सेण्ट्रल जेल के वार्ड नम्बर तीन की छत और दीवारों से टकराकर गूंज उठी ।

Friday, 26 September 2025

667. टेढा मकान- कर्नल रंजीत

शिलखण्डी से सावधान
टेढा मकान - कर्नल रंजीत
मेजर बलवंत सीरीज

नमस्ते पाठक मित्रो,
आज 'SVNLIBRARY' ब्लॉग पर हम लेकर उपस्थित हैं प्रसिद्ध उपन्यासकार कर्नल रंजीत के एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास 'टेढा मकान' की समीक्षा।
इस उपन्यास का घटनाक्रम उत्तर प्रदेश के शहर गाजियाबाद से संबंध रखता है।
तो चलो हम पहले उस मकान के विषय में ही पढ लेते हैं ।
गाजियाबाद के मुकुन्दनगर मुहल्ले की आठवीं गली में एक मकान था, जो एक मंजिल का होते हुए भी बहुत ऊंचा था। अधिक पुराना नहीं था, लेकिन टेढ़ा जरूर था। यह मकान एक बहुत ही कंजूस बूढ़े का था। उस कंजूस बूढ़े के बारे में यह प्रसिद्ध था कि उसके पास सोने-चांदी और हीरे-जवाहरात का विशाल भंडार है जिसकी वह रात-दिन चौकीदारी करता रहता है और जानबूझकर फटे हाल रहता है। बूढ़े की इस बनी हुई साख ने कि उसके पास सोने-चांदी और हीरे-जवाहरात का विशाल भंडार है, उसे परेशान कर रखा था । कई बार उसके घर में सेंध लगाई गई। उसके हाथ-पांव और मुंह बांधकर मकान के फर्श की खुदाई की गई। दीवारें जगह-जगह से खोद डाली गई । छतों के शहतीर टटोले गए; लेकिन हीरे-जवाहरात का भंडार किसी को नहीं मिला। चोरों के हाथ बल आठ-दस रुपये या थोड़ी-सी रेजगारी लगी। कंजूस बूढ़ा एक समय में अपने आठ-दस रुपये से अधिक नहीं रखता था। उसके संदूक में पुराने घिसे पिटे और पैबन्द लगे कपड़े भरे रहते थे, जिन्हें चोर भी चुराना अपना अपमान समझते थे । 
    उस कंजूस बूढे का नाम था देवकीनन्दन पराशर । वह स्वयं जैसा था उसे ठीक वैसा ही एक नौकर मिल गया था। उस कंजूस पराशर के नौकर को लोग विद्वान रतनू कहते थे।
एक प्रसिद्ध कंजूस और एक कथित विद्वान । दोनों का इस दुनिया में नितांत अकेले थे और यह अकेलापन उन दोनों ने मालिक नौकर बनकर दूर किया।
और एक दिन बूढा पराशर उस मकान के सबसे गंदे कमरे में एक पुरानी और टूटी हुयी कुर्सी पर मृत्यु पाया गया ।(पृष्ठ-11)
बूढा और कंजूस पराशर तो मर गया लेकिन उसके साथ ही कुछ कहानियाँ प्रचलित हो गयी।
बूढे नौकर रतनू का बयान था कि सागरचंद के भूत ने उसके मालिक को डराकर उसकी जान ली है ।(पृष्ठ-11)
अब यह सागरचंद कौन है और वह भूत कैसे बना यह भी जान लीजिए-

Friday, 5 September 2025

666. हत्यारा पुल- कर्नल रंजीत

कहानी मस्तिष्क चोर की
हत्यारा पुल- कर्नल रंजीत

एक्सीडेण्ट या हत्या
भादों की काली-अंधियारी रात में लखनऊ से आठ मील दूर बरसाती काली रात के अंधकार में लिपटे नाहर फार्म में गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। कभी-कभी बिजली कड़ककर उस सन्नाटे को भंग कर देती थी।
नाहर फार्म की मालकिन गोमती देवी अपने बेडरूम में चुपचाप लेटी हुई थीं। वह न जाने अतीत की किन यादों में खोई हुई थीं कि उन्हें पद्मा के आने तक का पता न चला।
        पद्मा गोमती देवी की पालिता पुत्री मोलिना की गवर्नेस थी, सुशिक्षित, सभ्य, शिष्ट और सुन्दर। पद्मा को रूप और गुण प्रदान करते समय तो विधाता ने कंजूसी नहीं की थी। लेकिन वह पद्मा को सुहाग देने में कृपणता कर गया। रूप और गुणों से भरपूर पद्मा विवाह के तीन वर्ष बाद ही विधवा हो गई थी। उस समय पद्मा की उम्र चौबीस साल थी। अचानक उन्हीं दिनों गोमती देवी के भाई अजयसिंह का देहान्त हो गया। अजयसिंह की पत्नी एक बच्ची को जन्म देने के एक वर्ष बाद ही स्वर्ग सिधार चुकी थीं। गोमती देवी अपने भाई की अंतिम और एकमात्र निशानी मोलिना को ले आई। क्योंकि उनका अपना कोई बच्चा न था।

       और जब मोलिना की देखभाल के लिए गवर्नेस की जरूरत पड़ी तो गोमती देवी ने इंटरव्यू के लिए आई हुई लगभग दो दर्जन महिलाओं में से पद्मा को चुन लिया।
          तब से यानी पिछले दस वर्ष से पद्मा गोमती देवी के साथ ही रह रही थी। गोमती देवी प‌द्मा के गुणों के कारण, जहां उसका सम्मान करती थीं, वहां उसके सौम्य स्वभाव के कारण उससे स्नेह भी करती थीं। प‌द्मा उनके परिवार की एक सदस्या बन गई थी। (हत्यारा पुल- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ)

Monday, 25 August 2025

665. रेत की दीवार - कर्नल रंजीत

समुद्रगुप्त की प्रेयसी मालिनी की रक्तरंजित गाथा
रेत की दीवार- कर्नल रंजीत

जासूसी उपन्यासकार कर्नल रंजीत की कलम से निकली एक रहस्य-रोमांच से परिपूर्ण कहानी जिसका संबंध सदियों  पूर्व की एक ऐसी औरत से है जो वर्तमान में रक्त से कहानी लिख रही है। जिसका प्रेम और प्रतिशोध वासना और हत्याओं में बदल जाता है।
इस रोचक उपन्यास 'रेत की दीवार' का हम आरम्भ करते हैं उपन्यास के प्रथम अध्याय 'चार लाख' से । यह अध्याय एक ऐसे युवक का जिसके पास जैसे ही धन आता है उसी के साथ बिन बुलाये, घर बैठे मुसीबतें आनी आरम्भ हो जाती हैं। जैसे ऊंट चढे को कुत्ता खा गया, जैसे होम करते वक्त हाथ जल गये।

   चार लाख रुपये
रांची के निकट पहुंचकर ट्रेन की गति धीमी हो गई थी। रेल-पटरी की मरम्मत हो रही थी।
पहले दर्जे के कम्पार्टमेण्ट में छब्बीस वर्ष का एक नवयुवक बाई सीट पर बैठा हुआ था। एक पुस्तक उसके घुटनों पर रखी हुई थी। वह पढ़ते-पढ़ते उकता गया था। अब वह सामने की सीट पर बैठे अधेड़ आयु के युगल को देख रहा था। वे सेव काटकर खा रहे थे।

Saturday, 23 August 2025

664. जानी दुश्मन- कर्नल रंजीत

एक फिल्म अभिनेत्री की हत्या
जानी दुश्मन- कर्नल रंजीत

नमस्ते पाठक मित्रो,
कर्नल रंजीत के उपन्यास पठन क्रम में एक रोचक उपन्यास मुझे मिला जिसका नाम है 'जानी दुश्मन' । यह एक रोचक उपन्यास है जो सिलसिलेवार हत्याओं पर आधारित है।

जानी दुश्मन
अभिनेत्री की हत्या
प्रियम्बदा ने अपने बाल संवारते हुए एक नजर आदम-कद नाइने पर पड़ते अपने अक्स पर डाली तो उसे लगा, वह आइने में जिस अक्स को देख रहीं है, वह अक्स उसका अपना नहीं किसी और का है। हर समय उदास और गम में डूबी-डूबी-सी आंखों में एक नई चमक थी, एक नया उल्लास था और चेहरे पर ऐसी ताजगी जैसी सुबह-सुबह खिले गुलाब के फूल की पंखुड़ियों पर दिखाई देती है। तराचे हुए सन्तरे की फांक जैसे भरे-भरे होंठों पर एक अन-चाही मुस्कान थिरक रही थी ।
और फिर अनचाहे, अनजाने वह हेमन्त के नए गीत के मुखड़े को गुनगुनाने लगी-
छलका दो मदिरा के प्याले, तन-मन की सुध-बुध खो जाए।
होंठों से यदि तुम छू दो तो । यह विष भी अमृत बन जाए।
गीत के बोल गुनगुनाते-गुनगुनाते अनायास ही उसके पांव बेडरूम के फर्श पर थिरक उठे। पैरों में पड़ी पायल के घुंघरू तालबद्ध लय में बज उठे ।
और फर्श पर थिरकते-गुनगुनाते उसने मेज पर रखा श्री-इन-वन ऑन कर दिया।

Sunday, 17 August 2025

663. चीखती चट्टानें- कर्नल रंजीत

क्या था तूफानी रात में हत्याओं का रहस्य ?
चीखती चट्टानें- कर्नल रंजीत

तूफानी रात
अमावस की काली बरसाती रात । चारों और घटाटोप अंधकार छाया हुआ था।
      बम्बई के मुख्य सागर-तट से लगभग आठ मील दूर, जहां समुद्र के किनारे किनारे दूर तक किसी मराठा दुर्ग के ध्वंसावशेष फैले हुए थे, अमावस की काली बरसाती रात का अंधेरा और सन्नाटा और भी गहरा तथा भयानक लग रहा था। कभी-कभी बारिश की तेज बौछारें, बिजली की बादलों की गरज और सागर की लहरों की गर्जन बरसाती अंधियारी रात के उस सन्नाटे को भंग कर देते थे।
         अचानक सन्नाटे को चीरती हुई किसी राइफल की गोली की आवाज समुद्र तट पर दूर तक बिखरी चट्टानों और प्राचीन मराठा दुर्ग के ध्वंसावशेषों से टकराकर गूंजती चली गई। गोली की आवाज के साथ ही किसी व्यक्ति की हृदयबेधी चीख उभरी; लेकिन वह चीख बिजली की कड़क और घटाओं की गरज में दबकर रह गई।

      राइफल की गोली की आवाज और उसके साथ ही उभरने वाली मानवीय चीख को सुनकर चैकपोस्ट पर तैनात सब-इंस्पेक्टर यशवंत खांडेकर और उसके साथी गुमटी में से निकलकर दौड़ते हुए बाहर आ गए। उन्होंने आंखें फाड़-फाड़कर इधर-उधर नजरें दौड़ाई; लेकिन उन्हें कहीं कुछ न दिखाई दिया। और न किसी प्रकार की आहट ही सुनाई दी। कोई यह तक अनुमान न लगा सका कि गोली और चीख की आवाज किस ओर से आई थीं। घटाटोप अंधियारे और मूसलाधार वर्षा की बूंदों की तनी हुई चादर को चीरकर यह देख पाना असंभव था कि गोली किसने चलाई और किस पर चलाई?

Sunday, 10 August 2025

662. गहरी चाल- कर्नल रंजीत

कौन था पारसी समुदाय का दुश्मन
गहरी चाल- कर्नल रंजीत

उपहार
सोनिया ने एक बहुत ही सुंदर फूलदार मोमी कागज और चार रंगों के रिबन में लिपटे हुए उस चौड़े बक्स को खोलने के लिए हाथ बढ़ाया तो मेजर बलवंत ने उसका हाथ पकड़ लिया "इस सुंदर बक्स को देखकर पागल क्यों हुई जाती हो ? यह बक्स खतरनाक भी हो सकता है। हो सकता है कि हमारे किसी शत्रु ने भेजा हो। इसमें कोई बम, कोई सांप या कोई खतरनाक यंत्र हो यह बक्स मैं खोलूंगा।"
सोनिया ने भयभीत होकर तुरंत अपना हाथ पीछे हटा लिया।
मेजर ने उस सुंदर बक्स को ध्यान से देखा। उसे उस बक्स में. कोई असाधारण बात नजर न आई। उसने कागज काटने वाली छुरी उठाकर उस बक्स के रिबन काट दिए । उसने फूलदार मोमी कागज उतारकर बक्स खोला। बक्स के भीतर टिशू पेपर की तह थी। उसके ऊपर एक खूबसूरत कार्ड था, जिस पर लिखा था- 'मेजर साहब की सोनिया के लिए।'
सोनिया भी वह कार्ड पढ़ चुकी थी और मुस्करा रही थी। मेजर ने टिशू पेपर हटा दिया। उसने सबसे पहली चीज उठाई। वह एक नये डिजाइन की अंगिया थी, जो बढ़िया किस्म के दोहरे कपड़े से बनी थी। मेजर ने वह अंगिया सोनिया की ओर फेंकते हुए कहा, "तुम्हारे जोबन का गिलाफ।"
सोनिया खिलखिलाकर हंस पड़ी। उसे वह अंगिया बहुत अच्छी लगी। बक्स में अंगिया के नीचे से क्रोशिए की कढ़ी हुई जालीदार शिफ्ट अर्थात बनियान के स्थान पर पहनने वाली छोटी कमीज निकली। मेजर ने उसे भी सोनिया की ओर फेंकते हुए कहा, "तुम्हारी केंचुली।" सोनिया को मेजर की यह बात पसंद न आई तो मेजर हंसा। उसने कहा, "सोनिया। सुंदरता को उजागर करने की बजाय उसे ढांपने वाली हर चीज से मुझे नफरत है। इसीलिए मैंने शिफ्ट को केंचुली कहा है।" यह कहकर मेजर ने एक जांघिया सोनिया की ओर उछाल दिया और बोला, "यह है..." लेकिन सोनिया ने मेजर के मुंह पर हाथ रख दिया । अब मेजर ने बक्स में से दूसरा कार्ड निकाला और पढ़ना शुरू कर दिया 'मेजर बलवंत! ब्यूटीफुल गारमेंट्स की ओर से सोनिया के लिए यह उपहार स्वीकार कीजिए और आज रात को साढ़े सात बजे सोनिया और अपने अन्य मित्रों के साथ 18, लैम्पशेड बिल्डिंग हार्नबी रोड पर पधारिए। हम अपनी एक नई शाखा खोल रहे हैं। हम आपकी प्रतीक्षा करेंगे।'
"क्या आप चलेंगे?" सोनिया ने पूछा।
"तुम जाना चाहती हो तो जरूर चलेंगे।"
"मेरा ख्याल है कि हमें चलना चाहिए।" सोनिया ने परामर्श दिया ।

'गहरी चाल' कर्नल रंजीत का नई पृष्ठभूमि पर लिखा गया अत्यंत रोचक जासूसी उपन्यास है। इसमें अपने हित के लिए देश-हित को भेंट चढ़ाने वाले एक खूंखार गिरोह की दिल दहला देने वाली काली करतूतों की बड़ी ही रोमांचक कहानी है। इस षड्यंत्र का भंडाफोड़ करने में मेजर बलवंत जैसे कुशल जासूस को भी अपनी जान की बाजी लगा देनी पड़ी; और अंत में जब रहस्योद्घाटन हुआ तो सभी आश्चर्यचकित रह गये।

नमस्ते पाठक मित्रो,
एक बार फिर आपके लिए प्रस्तुत है कर्नल रंजीत के उपन्यास 'गहरी चाल' की समीक्षा । और कर्नल रंजीत के उपन्यास पर लिख गयी मेरी सोोलहवीं समीक्षा है। इस से पूर्व में पन्द्रह समीक्षाएं लिख चुका हूँ।

Friday, 1 August 2025

661. खून के छींटे- कर्नल रंजीत

खत्म होते रिश्तों की हत्या
खून के छींटे- कर्नल रंजीत

नमस्ते पाठक मित्रो,
उपन्यास समीक्षा लेखन के इस सफर में आप इन दिनों पढ रहे हैं कर्नल रंजीत द्वारा लिखित मेजर बलवंत सीरीज के अदभुत उपन्यास ।
 यह उपन्यास अदभुत कैसे हैं, यह आप समीक्षाएं पढकर जान चुके होंगे, अगर नहीं जान पाये तो आप इंतजार करें हमारे कर्नल रंजीत के उपन्यासों पर आधारित आलेख 'कर्नल रंजीत के उपन्यासों की रहस्यमयी दुनिया' का । इस आलेख में आपको कर्नल रंजीत के उपन्यासों के विषय मे अदभुत और रोचक जानकारी मिलेगी।
कर्नल रंजीत के अब तक पढे गये उपन्यास 'हत्या का रहस्य, सफेद खून, चांद की मछली, वह कौन था, सांप की बेटी, काला चश्मा, बोलते सिक्के, लहू और मिट्टी, खामोश ! मौत आती है , मृत्यु भक्तअधूरी औरत, हांगकांग के हत्यारे, 11 बजकर 12 मिनट, और अब प्रस्तुत है आपके लिए कर्नल रंजीत के उपन्यास 'खून के छींटे' की समीक्षा ।

Monday, 21 July 2025

658. THE डेड MAN'S प्लान - समीर सागर

जो मरकर भी लोगों को मार रहा था
THE डेड MAN'S प्लान - समीर सागर

मेरा नाम अजय शास्त्री है! एक सीधी साधी और प्यारी सी बेटी का बाप। वीणा, मेरी बच्ची ! मेरी मासूम चिड़िया। जिसके बिना में एक पल भी नहीं रह सकता। पर मुझे अपनी उस लाड़ली से हमेशा के लिए दूर जाना होगा। इतनी दूर जहां से वो मुझे कभी बुला नहीं पाएगी। मुझे जाना ही होगा। क्योंकि जो खेल मैंने रचा है, वो मेरी मौत के बिना शुरू नहीं हो सकता और मेरी मौत ही इस खेल की पहली आहुति है। जी हाँ, पहली। क्योंकि मेरी मौत के बाद इस शहर में मौत का एक ऐसा खेल शुरू होगा, जो इस दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा। जिन लोगों की मौत मैंने तय कर दी है, मैं उन्हें मरने के बाद भी मारता रहूँगा। कानून अपनी पूरी ताकढत लगा ले उन्हें बचाने के लिए, पर मैं उन्हें मारता रहूँगा। अब क़ानून का मुकाबला एक ऐसे खिलाड़ी के साथ है, जो अपनी हर एक चाल, हर मोहरा अपनी मौत से पहले ही चल चुका है। और ये मरा हुआ आदमी, तुम्हें जीतने नहीं देगा।
अगर तुम ये जान लो कि मौत का ये खेल मैंने क्यूँ रचा, तो शायद मुझे रोक लो, पर मेरे इस खेल का मजा ही ये है कि, मुझे जितना हराओगे, मैं अपनी जीत के उतने करीब पहुँचता जाऊँगा। अब मेरे दोस्त, अगर आपको लगता है कि शायद आप मुझे रोक सकते थे,
तो खुद को आजमा कर देख लो !

      THE डेड MAN'S प्लान- समीर सागर 

Saturday, 5 July 2025

657. अदल बदल - आचार्य चतुरसेन शास्त्री

 स्त्री स्वतंत्रता या उच्छृंखल
अदल-बदल - आचार्य चतुरसेन शास्त्री

भारतीय समाज में नारी को धार्मिक दृष्टि से चाहे उच्च श्रेणी दी गयी हो पर समाज में उसका स्थान बहुत पीछे है। वह गर की चारदीवारी तक सीमित थी, शिक्षा से दूर रही लेकिन बदलते वक्त के साथ औरत को स्वतंत्रता मिली, वह घर की चारदीवारी से बाहर निकली, यहाँ तक तो सब उचित था लेकिन इस से आगे जो घटित हुआ वह अनुचित था।
हम पहले चतुरसेन शास्त्री जी के उपन्यास 'अदल-बदल' का एक पृष्ठ देखें-
डाक्टर कृष्णगोपाल आज बहुत खुश थे। वे उमंग में भरे थे, जल्दी-जल्दी हाथ में डाक्टरी औजारों का बैग लिए घर में घुसे, टेबल पर बैग पटका, कपड़े उतारे और बाथरूम में घुस गए । बाथरूम से सीटी की तानें आने लगीं और सुगन्धित साबुन की महक घर-भर में फैल गई। बाथरूम ही से उन्होंने विमलादेवी पर हुक्म चलाया कि झटपट चाइना सिल्क का सूट निकाल दें।
विमलादेवी ने सूट निकाल दिया, कोट की पाकेट में रूमाल रख दिया और पतलून में गेलिस चढ़ा दी, परन्तु डाक्टर कृष्णगोपाल जब जल्दी-जल्दी सूट पहन, मांग-पट्टी से लैस होकर बाहर जाने को तैयार हो गए तो विमलादेवी ने उनके पास आकर धीरे से कहा, "और खाना ?"

Tuesday, 1 July 2025

656. नीलमणि- आचार्य चतुरसेन शास्त्री

परिवार और आधुनिक में घिरी औरत की कहानी
नीलमणि- आचार्य चतुरसेन शास्त्री

हिंदी कथा साहित्य में आचार्य चतुरेसन शास्त्री जी का नाम उनके उपन्यासों के कारण ज्यादा जाना जाता है । उनके लिखे सामाजिक, ऐतिहासिक और प्रेमपरक उपन्यास पाठकों में प्रिय रहे हैं।
श्री चतुरसेन शास्त्री जी का उपन्यास पढने का यह पहला अवसर है। इनके एक जिल्द में दो उपन्यास मिले थे, एक था 'नीलमणि' और दूसरा था 'अदल- बदल' । दोनों सामाजिक उपन्यास बदलते परिवेश को आधार बनाकर लिखे गये हैं।
पहले उपन्यास 'नीलमणि' का प्रथम पृष्ठ पढे-
मालकिन रसोईघर में बैठी बड़ी तत्परता से पकवान बना रही थीं। महाराजिन सामने बैठी उनकी मदद कर रही थी। रसोई के द्वार के पास मही बैठी दरांत से तरकारी काट रही थी। बहुत-से मीठे और नमकीन पकवान बन चुके थे और उनकी सोंधी सुगन्ध घर में भर रही थी। दिन काफी चढ़ चुका था; हवा में अधिक उष्णता न थी । सूरज की धूप खिल गई थी। परिश्रम और चूल्हे की गर्मी के कारण मालकिन के उज्ज्वल ललाट पर पसीने की बूंदें मोती की लड़ी के समान सोह रही थीं। उन्होंने फुर्ती से हाथ चलाते हुए महरी से कहा - "देख तो री रधिया, यह लड़की अभी सोकर उठी या नहीं। इस लड़की से तो भई नाक में दम है, दिन बांस-भर चढ़ आया और महारानी अभी सो रही हैं। लड़की क्या है, कुम्भकरण की दादी !"

Monday, 30 June 2025

655. सिरकटी लाशें- कर्नल रंजीत

विचित्र हत्याएं और विश्वासघात
सिरकटी लाशें- कर्नल रंजीत

अपराधों की बाढ़
इंस्पेक्टर शेखर प्रधान ने अपने सामने खुली पडी फाइल पर सूखे पेंसिल से जगह-जगह निशान लगाए और फिर जहां-जहां उसने सुखं निशान लगाए थे उन्हें अपनी डायरी में नोट करने लगा।
रात के ग्यारह बज चुके थे लेकिन वह अभी तक अपने ऑफिस में बैठा अपने काम में जुटा हुआ था। लक्ष्मी इस बीच उसे तीन बार फोन कर चुकी थी और हर बार उसने यही कह दिया था कि वह दस-पन्द्रह मिनट में काम खत्म करके आ रहा है। लेकिन नौ बजे से बैठे-के ग्यारह बज चुके थे उसका काम खत्म नहीं हुआ था।

इंस्पेक्टर शेखर प्रधान ज्यों-ज्यों उस फाइल को पढ़ता चला जा रहा था उसकी चिन्ता और परेशानी में बद्धि होती चली जा रही थी। उसे इस पुलिस स्टेशन का चार्ज लिए बभी एक सप्ताह ही हुआ था। पुलिस कमिश्नर मिस्टर देश-पांडे ने उसकी नियुक्ति इस पुलिस स्टेशन पर करते समय उससे कहा था- "इंस्पेक्टर प्रधान, मैं बहुत कुछ सोच-समझ कर ही आपका ट्रांसफर इस पुलिस स्टेशन पर कर रहा हूं। पिछले कुछ महीनों से ऐसा महसूस होने लगा है कि बांदरा एरिया में रहने वाले सभी शरीफ आदमी इलाके को छोड़कर किसी दूसरे इलाके में चले गए हैं और उनके स्थान पर बड़े-बड़े स्मगलर, और घंटे हुए जरायम पेशा लोग आ बसे है या फिर इस इलाके में रहने वाले शरीफ आदमियों ने गैर-कानूनी कामों को अपना लिया है। पिछले छः महीनों में शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरा हो जब इस इलाके में कोई लाश न मिली हो, फौजदारी की वारदात न हुई हो। चोरी, डकैती, मार-पीट ता बहुत ही मामूली बात है। मैं आपकी सूझ-बूझ, साहस और कर्तव्यपरायणता से भली-भांति परि-चित हूं। मुझे पूरा-पूरा विश्वास है कि आप इस इलाके में बढ़ते हुए अपराधों की बाढ़ को रोकेंगे ही नहीं बल्कि उस स्रोत को ही समाप्त कर देंगे जहां से इन अपराधों की धारा निकलती है।"
 (सिरकटी लाशें- कर्नल रंजीत, प्रथम दृश्य)

Thursday, 26 June 2025

654. अधूरी औरत- कर्नल रंजीत

सात हत्याओं की अनोखी कहानी
अधूरी औरत- कर्नल रंजीत

नकाबपोश ने अपनी बाईं बांह मिसेज जैसवाल की पीठ पर लपेट ली और दायां हाथ अपने चौगे से निकालकर नकाब उठाया। मिसेज जैसवाल ने तड़पकर नकाबपोश से अलग होने की कोशिश की। नकाबपोश के हाथों में काले दस्ते का चाकू था।
"आखिरी का !" यह कहकर नकाबपोश ने वह चाकू पूरे जोर से मिसेज जैसवाल की पीठ में घोंप दिया और फिर एक बार उन्हें अपने सीने से सटाकर अलग कर दिया।

प्रेम और हत्या की अनेक उत्तेजक तथा रोमांचपूर्ण घटनाओं से ओतप्रोत एक जासूसी उपन्यास- 

अधूरी औरत

Sunday, 22 June 2025

653. सफेद खून- कर्नल रंजीत

कर्नल रंजीत मार्का असली उपन्यास
सफेद खून- कर्नल रंजीत

इन दिनों कर्नल रंजीत के  उपन्यास पढे जा रहे हैं। जो लाफी रोचक और रहस्यमयी होते हैं। वैसे कर्नल रंजीत का लेखन सबसे अलग तरह का होता था, कहानी में अत्यधिक घुमाव और अत्यधिक ही रहस्य होता था।
मैंने अप्रेल माह में कर्नल रंजीत के पांच उपन्यास पढे थे- मृत्यु भक्त, लहू और मिट्टी, हांगकांग के हत्यारे, 11 बजकर 12 मिनट और एक उपन्यास था बोलते सिक्के
फिर मई माह में कर्नल के उपन्यास नहीं पढे लेकिन जून में एक बार फिर कर्नल रंजीत पढना आरम्भ किया है। जून माह में 'काला चश्मा, सफेद खून, चांदी की मछली, रात के अंधेरे में और एक उपन्यास आग का समंदर आदि पढे और पढे जायेंगे।
अब हम चर्चा कर रहे हैं, उस उपन्यास का नाम है -सफेद खून।
और सफेद खून के बाद 'चांदी की मछली' उपन्यास की समीक्षा प्रकाशित की जायेगी जो 'सफेद खून' के साथ ही संलग्न है।
पहले हम प्रस्तुत उपन्यास का प्रथम दृश्य पढते हैं जिसका शीर्षक है बनफ्शई आंखें
            बनफ्शई आंखें
वह शहर का सबसे महंगा होटल था। उसका नाम भी बहुत प्यारा था-'महबूबा', 'होटल महबूबा', जैसे वह होटल न हो, मेहमानों की महबूबा हो। उसका हर कमरा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात प्रेम-कथाओं के हीरो और हीरोइनों के मोहक चित्रों से सजा हुआ था, जैसे सेम्सन और डिलायला, अन्तोनी और क्लियोपेट्रा, रोमियो और जूलियट, हीर-रांझा, सोहनी महिवाल आदि। होटल महबूबा की दूसरी मंजिल के 29 नम्बर फ्लैट में दो स्त्रियां कामकाजी बातें कर रही थीं। उनमें एक स्त्री की आयु कुछ अधिक थी और दूसरी भरपूर जवान थी। लेकिन अधिक आयु वाली स्त्री भी अत्यधिक सुन्दर और आकर्षक थी। अधिक आयु की स्त्री युवा स्त्री का इंटरव्यू लें रहीं थी।

Tuesday, 17 June 2025

652. चांदी की मछली - कर्नल रंजीत

मेजर बलवंत की एक मर्डर मिस्ट्री कहानी
चांदी की मछली- कर्नल रंजीत

SVNLIBRARY में आप इन दिनों लगातार पढ रहे हैं कर्नल रंजीत द्वारा लिखित रोचक उपन्यास । यह उपन्यास जहाँ मनोरंजन करने में सक्षम है वहीं आपको तात्कालिक जटिल कहानियों से भी परिचित करवाते हैं। 
तो अब आप पढें कर्नल रंजीत के उपन्यास 'चांदी की मछली' की समीक्षा-
गरीबी और बेकारी
रमणीक देसाई के लिए जीवन अचानक एक कटु यथार्थ बन गया था। ऐसा विषैला घूंट जिसे हलक से उत्तारना कठिन था। वह रेलवे - हड़ताल का शिकार हो गया था। उसने किसी प्रकार की तोड़-फोड़ में भाग नहीं लिया था, लेकिन उस पर तोड़-फोड़ करने के आरोप में मुकदमा चल रहा था। उसे आशा थी कि उसके साथ न्याय किया जाएगा। वह तीन महीने से बेकार था। बेकारी के भूत ने उसका स्वास्थ्य चौपट कर दिया था। चिन्ता और परेशानी से उसका रंग पीला पड़ गया था। उसकी जेब में आज केवल अट्ठाईस रुपये बाकी रह गए थे। उसकी आंखों में उसका भविष्य अंधकारमय हुआ जा रहा था और उसको यह भी दिखाई दे रहा था कि राधिका और उसके प्रेम की धज्जियां उड़ जाएंगी और उसका प्यार आत्महत्या कर लेगा।

Sunday, 1 June 2025

651. काला चश्मा- कर्नल रंजीत

चित्रों की चोरी और अंधेरे का रहस्य
काला चश्मा- कर्नल रंजीत

इन दिनों मेरे द्वारा कर्नल रंजीत के उपन्यास पढे जा रहे हैं। इस क्रम में एक और उपन्यास शामिल होता है जिसका नाम है 'काला चश्मा'।
वह काला चश्मा जिसे लोग काली रात में भी पहनते हैं, क्यों?

इसके लिए उपन्यास पढना होगा। पर अब हम बात करते हैं उपन्यास के प्रथम दृश्य की को एक बैंक डकैती से संबंधित हैं और अध्याय का नाम भी 'बैंक डकैती' है।

      सुबह के ठीक नौ बजे थे। प्रिन्सेज स्ट्रीट के दोनों ओर बड़ी बहुमंजिला इमारतों में स्थित शोरूम, विभिन्न कम्पनियों के कार्यालय, बैंक और दुकानें खुलने लगी थीं। बाजार में भीड़-भाड़ बढ़ने लगी थी।
नेशनल ग्रांड बैंक का आगे की ओर का दरवाजा अभी तक बन्द था लेकिन बैंक के कर्मचारी पिछले दरवाजे से अन्दर आ चुके थे। उन्होंने अपनी-अपनी सीटें संभाल ली थीं और अब साढ़े नौ बजने की प्रतीक्षा कर रहे थे ।
ठीक साढ़े नौ बजे दरबान शक्तिसिंह ने ब्रांच मैनेजर रविराय से सामने वाले दरवाजे की चाबियां लीं और बाले खोलकर शटर ऊपर उठा दिया ।
बाहर खड़े चार-पांच व्यक्ति अन्दर आ गए । बैंक के काम की दैनिक प्रक्रिया आरम्भ हो गई। लेकिन बैंक का काम आरम्भ हुए अभी पन्द्रह मिनट भी नहीं हुए थे कि अचानक हॉल में हल्का-हल्का-सा अंधेरा छाने चगा।