Monday, 27 October 2025

678. मास्टर माइण्ड- अनिल सलूजा

बलराज गोगिया के शांतिमय जीवन में तूफान
मास्टर माइण्ड- अनिल सलूजा

करते है बात आज अनिल सलूजा जी के उपन्यास 'मास्टर माइण्ड' की ।‌ वह मास्टर माइण्ड था और यही गुण उसके जीवन के लिए अब संकट बन चुका था ।
अच्छा भला दुकान चला रहा था बलराज गोगिया । लेकिन वहां के थानेदार की नजर उस पर पड़ गई। थानेदार मजबूर था। उसने उससे मदद मांगी और जब बलराज गोगिया ने हां की तो ऐसा तूफान उठा कि....

सर्वप्रथम हम मास्टर माइण्ड उपन्यास के प्रथम पृष्ठ/ दृश्य को देखते हैं। बाकी चर्चा बाद में...

वह एक साधारण सा पुलिस थाने का ऑफिस था। जिसमें पड़ी साधारण सी टेबल पर रखी फाईलों के करीब रखा लाल रंग का फोन घनघनाया।


"ट्रिन.... ट्रिन.... ट्रिन।"
अधेड़ उम्र के एक सब-इंस्पेक्टर ने जो कि कुर्सी पर बैठा था-बांह लम्बी कर रिसीवर उठाया और कान से लगाते हुए बोला-
"हेलो! रामनगर थाने से सब-इंस्पैक्टर मोहनलाल ।"
"खबरी बोल रहा हूं, सरकार।"
दूसरी तरफ से आई आवाज को सुन मोहनलाल एकदम से सतर्क हो उठा।
"कोई खास खबर?" वह धीरे से फुसफुसाया।
"बहुत ही खास है।"
"बाल।"
"मिडटाऊन के कमरा नम्बर तीस में मीटिंग हो रही है। किसी बड़ी डकैती की योजना बन रही है।"
"कितने डकैत हैं?” चौंकते हुए बोला मोहनलाल ।
"चार हैं-और वे चारों यहां के नहीं हैं।"
"ओ.के. - नजर रखना-मैं वहां पहुंच रहा हूं।"
कह कर उसने रिसीवर रखा और ऊंचे स्वर में आवाज लगाई - "बाबूराम....।"
शीघ्र ही एक कांस्टेबल भीतर प्रविष्ट हुआ- "जी जनाब ।"
"ए.एस.आई. रघुवीर को फौरन आने को बोल ।"
     शीघ्र ही ए.एस.आई. रैंक का पुलिसिया ऑफिस में दाखिल हुआ ।
(मास्टर माइंड- अनिल सलूजा,उपन्यास का प्रथम पृष्ठ)
    नमस्ते पाठक मित्रो,
अगर आप अनिल सलूजा जी के प्रसिद्ध पात्र बलराज गोगिया और उसके साथी राघव के एक्शन उपन्यास पढ चुके हैं तो यह कथानक आप आसानी से समझ सकते हैं। अगर आपने उपन्यास नहीं पढे तो आप कुछ उपन्यासों की समीक्षा यहां पढ सकते हैं।
फंदा ।। बारूद की आंधी ।। मुझे मौत चाहिए ।। नृशंसक ।।
   बलराज गोगिया एक वक्त का मारा और मास्टर माइण्ड व्यक्ति है। मजबूरन डकैती और हत्या जैसे अपराध करने के पश्चात वह शांति की जिंदगी जीना चाहता है लेकिन हर बार कहीं न कहीं कुछ न कुछ ऐसा हो ही जाता है की बलराज गोगिया को अपनी शांतिमय ज़िंदगी से बाहर निकल कर बुरे लोगों से टकराना ही पड़ता है। इस बार भी एक शोषित व्यक्ति की मदद के लिए बलराज गोगिया भी एक्शन के मैदान में उतरा है।
    तो चलो फिर आरम्भ करते हैं उपन्यास की कहानी पर चर्चा।
   अपना एक्शन हीरो बलराज गोगिया एक छोटे शहर 'रामनगर' में अपनी पत्नी सुनीता और साथी राघव के साथ रेडिमेड कपड़े की दुकान चलाता है। छोटा सा परिवार है और खुश परिवार है । 'नृशंसक' वाले कारनामे को अंजाम देने के पश्चात बलराज गोगिया 'रामनगर' आ गया था और यहां एक छोटी सी रेडिमेड कपड़े की उसकी दुकान है और वह राघव के पूर्णतः सही होने के लिए दिन रात उसकी सेवा में लगा है।
अभी बीस बाईस दिन पहले ही राघव का प्लास्टर उतरा था और वह पूरी तरह से ठीक हो गया था। फिर भी बलराज गोगिया ने उसे उछल-कूद करने से सख्त मना कर रखा था। (पृष्ठ-41)
    वहीं परिवार में एक और सदस्य के आने की भी उन्हें खुशी है।
सुनीता को दिन चढ़ गये थे। तीसरा महीना लगा हुआ था उसे। और एक नये मेहमान के आने की जो खुशी होती है, वो उन तीनों को हो रही थी।(पृष्ठ- 41)

लेकिन एक संयोग / दुर्योग  के चलते वह रामनगर के इंस्पेक्टर मोहन लाल से टकराता है।
    रामनगर के ईमानदार इंस्पेक्टर मोहन लाल के पास जब शहर में डकैती की पूर्व सूचना आती है तो वह उस जगह पहुंच जाता जहां कथित डकैत प्लान बना रहे थे।
डकैतों को पकड़ने के चक्कर में मोहन लाल के जीवन में ऐसा तूफान उठता है की वह मोहन लाल के शांतिमय और ईमानदार जीवन को तबाह कर देता है।
परिवार और नौकरी खो चुका मोहन लाल जीवन से हताश हो कर बलराज गोगिया की शरण में जाता है और उससे मदद मांगी तो बलराज गोगिया को 'हां' करनी पड़ी ।
मोहन लाल को तलाश थी उन कथित डकैतों की जिनके कारण उसका परिवार, नौकरी और वर्तमान तबाह हो गया ।
"तुम एक तजुर्बेकार पुलिसिये हो मोहनलाल। यह काम तुम मुझसे भी बेहतर कर सकते हो।"
"नहीं। मुझसे कहीं बेहतर तुम उन तीनों को ढूंढ सकते हो।
तुम्हारे बारे में मैंने जितना जाना है-उस हिसाब से तुम एक मास्टरमाइंड आदमी हो। और फिर लोहे को सिर्फ चुम्बक ही पकड़ सकती है-जो कि तुम हो ।”
(पृष्ठ- 50)
     
   मोहन लाल की मदद के लिए बलराज गोगिया और राघव दोनों ही सहमत हो जाते लेकिन वह अभी तक उन कथित डकैतों को खोज भी नहीं पाते की स्वयं एक गहरी परेशानी में फंस जाते हैं। और वह परेशानी है सुनीता का अपहरण । जी हां, बलराज गोगिया की पत्नी सुनीता का अपहरण भी हो जाता है। और सुनीता के बदले बलराज गोगिया को उस 'अज्ञात' का काम करना था जो पर्दे के पीछे था, जो इस गेम का मास्टर माइण्ड था।
कहानी रामनगर से पहुंच जाती है विराट नगर जहां 'अज्ञात बाॅस' के कर्मचारी सावन, मीना, रामकुमार बजाज, अहमद अली और नरेश जुनेजा कार्यरत हैं और बलराज गोगिया को हीरे चुराने के लिए विवश करते हैं।
"एक जगह पर कुछ हीरे पड़े हैं-उन्हें चुराना है। बस तुम्हारा काम खत्म ।”
"कहां पड़े हैं हीरे?"
"उनकी कीमत क्या है?" तभी राघव बोल पड़ा।
सावन ने उसकी तरफ देखा और उंगली से हवा में लिखते हुए आंखों को चौड़ा करते हुए बोला-
"अस्सी करोड़ ।"
(96)
       विराटनगर में  अस्सी करोड़ के हीरे और वह भी कस्टम विभाग के अधीन हैं और जहां है सख्त सिक्योरिटी और जहां है मौत का खतरा ।  और अस्सी करोड़ के हीरों पर जब एक 'अज्ञात' की नजर है तो कोई दूसरा भी तो उस पर नजर रख सकता है। जब बात दूसरे की आती है तो तब नाम सामने आता है फन्नू का ।
   फन्नू अपने इलाके का खतरनाक नाम है। अब फन्नू को भी वह हीरे चाहिए जिसे बलराज गोगिया चाहता है। (यह कहानी का रहस्य नहीं है, धैर्य रखें हम कहानी का रहस्य नहीं खोल रहे। रहस्य तो रहस्य ही रहेगा, यह तो एक छोटा सा ट्विस्ट था।)
    अब बलराज गोगिया को 'अज्ञात' के लिए अस्सी करोड़ के हीरे चुराने हैं। अपनी पत्नी सुनीता को सुरक्षित वापिस लाना है। बलराज गोगिया को इंस्पेक्टर मोहन लाल के परिवार के हत्यारों को भी खोजना है। और खोजना तो उस 'अज्ञात बाॅस' को भी है जो पर्दे के पीछे बैठा मास्टर माइण्ड बन कर खेल रहा है -मौत का खेल।।
   अनिल सलूजा जी द्वारा लिखित उपन्यास 'मास्टर माइण्ड' बलराज गोगिया के शांतिमय जीवन में आये तूफान का एक  भाग है। ऐसा ही तूफान इनके शांतिमय जीवन में 'धर्मराज' उपन्यास में भी उठता है और उसी के साथ उस शहर में से इनका दाना-पानी भी उठ जाता है।
   रामनगर मॆं भी अपने परिवार के साथ अच्छा जीवन बीता रहे थे पर ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था । इंस्पेक्टर मोहन लाल भी मजबूर था, उसकी मजबूरी ही उसे बलराज तक ले आती है।
  बलराज गोगिया दर्द देखें-
बलराज गोगिया ने गहरी सांस छोड़ी और बोला- "हम वो करमा मारे हैं जो गुनाह करने से बचना चाहते हैं। लेकिन काली दुनिया के साये हमें जबरदस्ती जुर्म की दलदल में खींच लेते हैं। बलराज गोगिया है मेरा नाम।"(पृष्ठ- 164)
    उपन्यास में राघव का अंदाज हमेशा की तरह जिन्न के साथ खतरनाक है। हमने पिछले उपन्यास 'नृशंसक' में पढा था कि राघव की टांग का सफल आप्रेशन हो गया और प्रस्तुत उपन्यास में हमने पढा कि 'बीस-बाईस' दिन हो गये राघव की टांग का आप्रेशन हुये। और राघव के एक्शन दृश्यों के हिसाब से यह उचित नहीं लगता ।
  इंस्पेक्टर मोहन लाल का किरदार एक संघर्षशील व्यक्ति का है। जिसके जीवन में सत्य, कर्तव्य और दुख हैं लेकिन मोहन लाल अंतिम समय तक दुश्मनों से लोहा लेता है और उनको मात देता है।
   'अज्ञात बाॅस' उपन्यास का एक महत्वपूर्ण पात्र है, प्रभावशाली, क्रूर और लालची प्रवृति का है। मोहन लाल से बहुत सी सख्त और खतरनाक रूप से बात करता है-
तू मारेगा मुझे तू....? तू जानता नहीं मुझे मोहनलाल.... मैं वो नाग हूं जो पत्थर पर भी डस दे तो पत्थर नीला हो कर टुकड़े-टुकड़े हो जाये। मुझे मारना तो दूर....तू मेरे को छू भी नहीं सकेगा।" (पृष्ठ- 225)

   'अज्ञात बाॅस' को अपने पर घमण्ड है तभी तो वह मोहन लाल को कहता है 'तू मेरे को छू भी नहीं सकेगा।' और वह बलराज गोगिया को भी धमकी देता है- अब खेलने की बारी मेरी है। और जब.... खेल खेलता है तो हर तरफ खून ही खून नजर आता है-और वह खून उसके दुश्मन का होता है।"(पृष्ठ- 314)
  लेकिन जब कहानी क्लाईमैक्स की ओर बढती है तब 'अज्ञात बाॅस' और बलराज गोगिया का संघर्ष पठनीय बन जाता है। रोंगटे खड़े करने वाले दृश्य और हाहाकारी एक्शन उपन्यास को रोमांच कर ले जाते हैं।

उपन्यास में पठनीय संवाद तो कम हैं लेकिन एक संवाद मानवीय स्वार्थ को प्रकट करता पठनीय है।
"आदमी को अपनी गलतियों का अहसास तभी होता है हरामजादे ! जब मौत उस पर सवार होती है। मगर जब मौत हटती है तो वो फिर से उन्हीं गलतियों को दोहराने लगता है।" (पृष्ठ- 186)
       कहानी रामनगर से चाहे आरम्भ होती हो लेकिन सारा कार्य क्षेत्र विराट नगर ही है। तो फिर रामनगर और इंस्पेक्टर मोहन लाल और उसके परिवार की क्या भूमिका है )
राघव उसे घूरते हुए बोला- "मैंने पूछा है कि हीरो की चोरी में रामनगर का क्या रोल है? क्योंकि तूने ही कहा था कि रामनगर का रोल है...(99)
   आप इस प्रश्न का उत्तर राघव की तरह तलाशते रह जायेंगे पर आपको उत्तर नहीं मिलेगा। और मोहन लाल और उसके परिवार का क्या?...क्या मतलब..? कुछ भी नहीं । कहानी खत्म, प्रश्न खत्म ।।
   प्रस्तुत उपन्यास की समीक्षा अपनी तरफ से खत्म है। यह उपन्यास एक एक्शन उपन्यास है। कहानी एक्शन उपन्यासों की दृष्टि से रोचक है। बलराज गोगिया और राघव के जीवन का एक रोचक अध्याय है।
उपन्यास में मोहन लाल का किरदार और रामनगर की घटनाएं मूल कथा से संबंध नहीं बना पाती।
उपन्यास एक बार पढा जा सकता है, कहीं भी नीरस नहीं लगेगा।

उपन्यास- मास्टर माइण्ड
लेखक-  अनिल सलूजा
पृष्ठ-       320
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स मेरठ

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