Monday, 28 April 2025

645. बोलते सिक्के - कर्नल रंजीत

वैज्ञानिकों की हत्या का रहस्य
बोलते सिक्के - कर्नल रंजीत

अप्रैल 2025 में मैंने कर्नल रंजीत के उपन्यास पढें हैं और यह सिलसिला जारी है। कभी-कभी यह कोशिश होती है एक ही लेखक के स्वयं के पास उपलब्ध समस्त उपन्यास पढ लिये जायें हालांकि यह प्रयास कभी कभार ही पूरा होता है।
जैसे इस बार कर्नल रंजीत के उपन्यास पढने आरम्भ किये तो कुछ छुपे हुये उपन्यास और सामने आ गये। अब उनको कब तक पढा जायेगा यह कहा नहीं जा सकता। फिर भी कोशिश जारी है।
कर्नल रंजीत का उपन्यास '11 बजकर 12 मिनट' के साथ एक और उपन्यास संलग्न था जिसका नाम है 'बोलते सिक्के'।
यह उपन्यास उन लोगों की कहानी है जो धन-दौलत के लिए अपना मान-सम्मान सब कुछ बेचने को तैयार हो जाते हैं।
अब चलते हैं 'बोलते सिक्के' उपन्यास के प्रथम दृश्य की ओर, अध्याय का नाम है 'भयंकर तूफान'

भयंकर तूफान
रात आधी से अधिक बीत चुकी थी।
चारों ओर घटाटोप अंधियारा छाया हुआ था, जिसे आकाश के सीने को रौंदकर उमड़ती-घुमड़ती दैत्याकार काली-कजरारी घटाओं ने और अधिक भयावह बना दिया था।
हवा इतनी तेज चल रही थी जैसे आंधी चल रही हो। पहले हल्की-हल्की बौछारें पड़ती रही थीं लेकिन अब वे हल्की-हल्की बौछारें मूसलाधार बारिश में बदल गई थीं।

Friday, 25 April 2025

644. 11 बजकर 12 मिनट - कर्नल रंजीत

प्रोफेसर की हत्या शृंखला
11 बजकर 12 मिनट

- मिस मालिनी के खुले मुंह में जहर किसने डाल दिया?
- प्रो० पालीवाल को तलवार से किसने चीर दिया?
-वाॅलीबाॅल खेलती लड़कियों के साथ किसने बलात्कार किया ?
-क्या इस सबके लिए छात्र उत्तरदायी थे?
देश के जाने-माने वैज्ञानिकों और शिक्षकों की योजनाबद्ध हत्याओंकी अनोखी कहानी। छात्र जब देश की गरीबी के विरोध में आन्दोलन कर रहे थे तो उनके आन्दोलन को एक घिनौनी राजनीति ने जकड़ लिया।
इसी षड्यंत्र का पर्दाफाश किया आपके चहेते जासूस मेजर बलवन्त ने। कर्नल रंजीत की जादूभरी कलम का एक नया कमाल !

छात्र आंदोलन के पीछे काम करने वाले षड्‌यंत्रकारियों का पर्दाफाश करने वाली रोमांचक कहानी

11 बजकर 12 मिनट

गुजरात में लगी हुई आग सवा दो महीने के बाद बुझी। इस बीच क्या कुछ नहीं हुआ! गोदाम, मंडियां और दूकानें लूटी गई। रेलवे स्टेशनों और पुलिस चौकियों पर हमले हुए। अधिकारियों का घेराव किया गया। गाड़ियां रोकी गई। बसें जला दी गई। सरकारी इमारतों को जलाकर खाक कर दिया गया। गोलियां चलीं। आंसू गैस छोड़ी गई। कई शहरों में कर्फ्यू लगा। जीवन-क्रम अस्त-व्यस्त हो गया। पुलिस-फायरिंग से बीसियों व्यक्ति मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। चारों ओर भय, आतंक और निराशा का अंधकार छा गया। और फिर महंगाई और बेरोजगारी के विरुद्ध छात्रों द्वारा छेड़े गए आन्दोलन ने राजनीतिक रूप ले लिया। प्रदेश की विधानसभा भंग करनी पड़ी। तब कहीं जाकर गुजरात में लगी हुई आग ठण्डी हुई।

Thursday, 24 April 2025

643. हांगकांग के हत्यारे- कर्नल रंजीत

एक रहस्यमयी विमान दुर्घटना
हांगकांग के हत्यारे- कर्नल रंजीत
  • देश के बहुत सारे भागों में अचानक अराजकता और आतंक की काली छाया मंडराने लगी।
  • बेरोजगार नौजवान भटककर उस भयानक गिरोह की जकड़ में आने लगे।
  • तटस्थ लोकतांत्रिक देशों के सर्वनाश के लिए अंतर्राष्ट्रीय गिरोह का फैलता हुआ जाल ।
  • चंगुल में फंसकर छटपटाती हुई जुड़वां बहनों के संघर्ष की दुःख भरी कहानी ।
  • मादक गंध वाले सुंदर केसरिया फूलों की जहरीली कहानी, जिनके सेवन से मनुष्य का शरीर जिंदा लाश बन जाता है।
  • एक ऐसा पिता जो धन-दौलत और विलासिता को संतान से बड़ा समझता है।
  • एक ऐसा डॉक्टर जिसे वासना इंसान से शैतान बना देती है।
  • कदम-कदम पर धड़कनें बढ़ाने और रोंगटे खड़े कर देने की शक्ति से भरा हुआ सनसनीखेज, दिल दहला देने वाला कर्नल रंजीत का एक अनमोल उपन्यास

हांगकांग के हत्यारे

Monday, 7 April 2025

642. लहू और मिट्टी- कर्नल रंजीत

खत्म हो रहे जंगलों की रहस्य गाथा
लहू और मिट्टी- कर्नल रंजीत

"यह कौन हैं ?" डोरा ने लाश की तरफ इशारा करके पूछा ।
"मेरे पिता," मिस नार्मा ने कहा। फिर अपनी भूल को सुधारकर बोली, "यह मेरी मां के पहले पति मिस्टर हार्पर हैं। शादी के कुछ दिनों बाद मेरी मां ने इन्हें छोड़कर मिस्टर जैक्सन से शादी कर ली थी। मेरे जन्म के तीन साल बाद मेरे पिता ने आत्महत्या कर ली थी और फिर कुछ ही वर्ष बाद मेरी मां की मृत्यु हो गई। बाद में मेरी मां के पहले पति मिस्टर हार्पर ने ही मुझे पुत्रीवत् पाला।"
विचित्र आचार-विचार वाले मुट्ठी-भर व्यक्तियों द्वारा शेष सारी मानव-जाति को नष्ट कर डालने वाले भयंकर षड्यंत्र का रोमांचकारी रहस्योद्घाटन ।
मेजर बलवन्त की विलक्षण जासूस-वृद्धि का अद्भुत कौशल ।
सर्वप्रिय लेखक कर्नल रंजीत का लोकहितकारी जासूसी उपन्यास जो न केवल रोंगटे खड़े कर देता है, बल्कि मस्तिष्क की एक-एक नस को झनझना देता है।

 नमस्ते पाठक मित्रो,

Wednesday, 2 April 2025

641. मृत्यु भक्त- कर्नल रंजीत

महानंद समाधि में मौत का रहस्य
मृत्य भक्त- कर्नल रंजीत

इन दिनों सतत् कर्नल रंजीत के उपन्यास पढे जा रहे हैं और  'मृत्यु भक्त' इस क्रम में प्रथम उपन्यास है और इसके पश्चात जो उपन्यास पढा जा रहा है उसका नाम है- लहू और मिट्टी । दोनों एक ही जिल्द में हैं, जो हिंद पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुये थे ।
लोकप्रिय कथा साहित्य में कर्नल रंजीत का नाम रहस्यपूर्ण उपन्यास लेखन में अग्रणी है । इनके उपन्यास की एक विशेष शैली है। इस विषय पर हम इन उपन्यासों के आलेख में लगातार चर्चा करते रहेंगे ।
सर्वप्रथम उपन्यास का प्रथम दृश्य देखें जिसका शीर्षक है- कुल्हाड़ी ।
  कुल्हाड़ी
मेजर बलवन्त को पिछले एक महीने से भारी चिन्ता लगी हुई थी। बम्बई में स्त्रियों की दौड़-प्रतियोगिता हुई थी। मालती ने दो सौ मीटर की दौड़ में भाग लिया था। वह फाइनल में पहुंच-कर जीत भी गई थी। वह इतने ज़ोर में थी कि जब उसका सीना टेप से छुआ तो वह प्रथम आने के बाद अपने ही जोर में गिर पड़ी थी और उसके दायें पांब में मोच आ गई थी। वह तीन महीने तक अस्पताल में रही थी। पांव पर प्लास्टर चढ़ा दिया गया था । प्लास्टर उतर जाने के बाद भी उसका पांव सीधा नहीं हुआ था। दायें पांव का मामला था। मालती उसकी बहुत अच्छी असिस्टेण्ट थी । अगर उसका पांव खराब हो गया तो वह अपनी एक उच्चकोटि की सहायिका से वंचित हो जाएगा। मेजर किसी भी दशा में यह सहन नहीं कर सकता था कि मालती उसकी टीम से अलग हो जाए ।

Sunday, 30 March 2025

639. धरती का शैतान- इब्ने शफी

आओ पढें एक नकली उपन्यास
कर्नल विनोद, कैप्टन हमीद और मूर्ख कासिम का  उपन्यास
धरती का शैतान- इब्ने सफी

कर्नल विनोद ।
एशिया का माना हुआ जासूस-  फादर ऑफ हार्ड स्टोन के नाम से विख्यात कर्नल विनोद इस समय होटल चाचा पाॅल के काउंटर पर खड़ा था । उसने अपनी कुहनी काउन्टर पर टेक रखी थी ओर टेलीफोन रिसीवर कान से लगा रखा था। दूसरे हाथ से उसने अपना दूसरा कान दबा रखा था क्योंकि हॉल में एक क्रिश्चियन डांसर मिस रूबी पूरे जोशो-खरोश से नाच रही थी और वहां बैठे लोग किस्म-किस्म की आवाजें निकालकर अपने दिल की लगी बुझाने की कोशिश कर रहे थे। हॉल का वातावरण पूरी तरह गुण्डागर्दी और अश्लीलता से भरा हुआ था। लोग शराब पी रहे थे। खा रहे थे और सुल्फे को सिगरेटों के कश चल रहे थे।
       फोन के दूसरी ओर से बोलने वाला यकायक रुक गया था । विनोद ऊंची आवाज में हैलो हैलो कहे जा रहा था, लेकिन उसने इसके बाद किसी  जवाब नहीं दिया। आखिर यह हुआ क्या ? साथ ही दूसरी ओर से बोलने वाले ने क्रैडिल पर फोन अभी रखा भी नहीं था ।
   आखिरकार कर्नल विनोद ने डायल पर नम्बर घुमाया और टेलीफोन आपरेटर से पूछा-
'हैलो...आपरेटर !!
'यस सर।' एक जनाना आवाज गूंजी।
'अभी किस नम्बर से बात हो रही थी ?'
'जो किसकी ?' (धरती का शैतान- इब्ने शफी  उपन्यास का प्रथम पृष्ठ)



  यह उपन्यास मित्र रतन चौधरी ने भेजा था और वह भी Xerox करके । लेकिन पढने का समय मिला भी लम्बे समय पश्चात यानि लगभग तीन-चार वर्षों बाद । और जब इब्ने शफी साहब का उपन्यास 'धरती का शैतान' पढना आरम्भ किया तो पहले तो यह भी समझ में नहीं आया की आखिर चल क्या रहा है ?

638. लहू से लिख दो जय हिंद- रीमा भारती

बच्चे के दुश्मन कौन थे ?
लहू से लिख दो जयहिंद- रीमा भारती

उस युवती का रंग गोरा था।
खूब गोरा-किन्तु हल्की-सी सुर्खी लिए हुए।
ऐसा लगता था जैसे ताजे मक्खन भरे थाल के निकट से कोई होली खेलने के मूड में आया शैतान बच्चा गुलाल उड़ाता हुआ गुजर गया हो।
युवती की उम्र अधिक से अधिक चौबीस साल की थी। किन्तु उसके चेहरे की मासूमियत व बदन की कामनीयता उसे बीस वर्ष की दर्शा रही थी।
युवती की आंखें वीरान थीं इनमें सोचों के साये थे। उसकी आंखें उस चार वर्षीय गोल मटोल बच्चे को घूर रही थीं जो कि एक बड़ी-सी रंगीन बॉल के पीछे यूं दौड़ रहा था जैसे अब गिरा तब गिरा।
वह बॉल के निकट पहुंचता और झुककर बॉल पकड़ना चाहता। किन्तु बॉल उसके पांव की ठोकर पहले ही खा जाती और दूर चली जाती।
मनोहारी डूबी हुई थी। दृश्य था। केवल वही उस मनोहारी दृश्य में नहीं बल्कि रीमा भी एक बेंच पर बैठी दिलचस्पी से उस दृश्य को देख रही थी।

रीमा !
भारत की सर्वश्रेष्ठ किन्तु गुप्त जासूसी संस्था आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेंट जो कि इन दिनों फ्री होने के कारण तफरीह के मूड में थी तथा अपने एक मित्र की प्रतीक्षा कर रही थी।


आज हम बात कर रहे हैं एक्शन उपन्यास लेखिका रीमा भारती जी के उपन्यास 'लहू से लिख दो जय हिंद' । प्रसिद्ध उपन्यासकार दिनेश ठाकुर (प्रदीप कुमार शर्मा) ने एक एक्शन गर्ल पात्र की रचना की थी, जिसना नाम था रीमा भारती। और बाद में इन्हीं दिनेश ठाकुर जी के ग्रुप से रीमा भारती नाम से एक लेखिका का पदार्पण होता है और उसके उपन्यासों की नायिका भी रीमा भारती होती है।
यहां आज हम लेखिका रीमा भारती जी के रवि पॉकेट बुक्स से प्रकाशित उपन्यास 'लहू से लिख दो जय हिंद' की बात कर रहे हैं।

Wednesday, 19 March 2025

637. शिलाओं पर लिखे शब्द- सुरेन्द्र मनन

एक फ़िल्मकार के संस्मरण
शिलाओं पर लिखे शब्द- सुरेन्द्र मनन

सुरेन्द्र मनन जी का नाम सब से पहले मैंने सारिका पत्रिका 'दिसम्बर 1985'  पढा था । उनकी प्रसिद्ध कहानी थी नंगे लोग । इस एक कहानी के बाद मैंने कभी सुरेन्द्र मनन जी को नहीं पढा । इस कहानी के लगभग बीस साल बाद सुरेन्द्र मनन जी की रचना 'शिलाओं पर लिखे शब्द'(एक फ़िल्मकार के संस्मरण) पढने को मिला । संस्मरण में जो ताजगी है, जो प्रवाह है जो तारतम्यता है वह इस रचना को पठने को प्रेरित करती है।


  'शिलाओं पर लिखे शब्द' बोधि प्रकाशन जयपुर के एक विशेष आयोजन 'बोधि पुस्तक पर्व' के पांचवें बंध के अंतर्गत प्रकाशित है। जो सन् 2020 में प्रकाशित हुआ और मैंने इस पांच साल बाद 2025 में पढा । यहीं से पता चला की सुरेन्द्र मनन जी एक अच्छे कहानीकार के साथ डाक्यूमेंट्री फिल्मकार भी हैं और प्रस्तुत रचना उनके इस संदर्भ में की गयी यात्राओं के अनुभवों का संकलन है।

Monday, 3 March 2025

636. गोल आँखें- दत्त भारती

एक प्रेम कहानी
गोल आँखें- दत्त भारती

रेस्टोरों की भीड़ घंटती जा रही थी। सिनेमा का शो शुरू होने वाला था-इसलिए लोग धीरे-धीरे रेस्टोरां खाली कर रहे थे। कोने की एक मेज पर एक पुरुष और एक लड़की बैठे बातचीत में मग्न थे ।
'ज्योति !' पुरुष की भारी आबाज उभरी- 'तुम चाहो तो अपने फैसले पर एक बार फिर विचार कर सकती हो ।'
'यादो ! मैं खूब समझती हूँ। मैं तुम्हारी भावनाओं का सम्मान करती हूँ।'
'फिर वही शब्द... सम्मान।' यादो ने जोर का ठहाका लगाया, 'यदि तुम इश्क शब्द का प्रयोग नहीं करतीं तो प्रेम या प्यार कह सकती हो ।'
'मैं जानती हूँ- मैं जानती हूँ- मैं तुम्हें बहुत पसन्द करती हूँ।' ज्योति ने कहा ।
'फिर वही धोखा-पसन्द - पसन्द- आदर- क्या मैं शो-केस में पड़ा हुआ सूट का कपड़ा हूं जो तुम्हें पसन्द आ गया है ?' यादो ने गुर्रा कर कहा ।
'क्या तुम्हें ये शब्द भी पसन्द नहीं ?'
'नहीं ।'
'ओह!' ज्योति ने गहरा साँस खींचा ।

यह अंश दत्त भारती जी द्वारा लिखित उपन्यास 'गोल आँखें' के प्रथम पृष्ठ से हैं । दत्त भारती जी का मेरे द्वारा पढा जाने वाला यह द्वितीय उपन्यास है।

Thursday, 27 February 2025

635. भयंकर जाल- ओमप्रकाश शर्मा

 राजेश सीरीज का प्रथम उपन्यास
भयंकर जाल - ओमप्रकाश शर्मा 

केन्द्रीय खुफिया विभाग के कार्यालय में आज भीषण एवं भयपूर्ण खामोशी छाई हुई थी।
चीफ आफ स्टाफ श्री नायडू आज कार्यालय में आये हुये थे।
पूरे खुफिया विभाग के कर्मचारियों में श्री नायडू एक सख्त और हृदयहीन अफसर के रूप में विख्यात हैं। नये और पुराने... सभी कर्मचारी इस श्यामवर्ण बूढ़े, पतले-दुबले आदमी के कारण आज भयभीत-से अपने काम में लगे हुए थे।
- 'मिस्टर राजेश, साहब ने आपको बुलाया है।' चपरासी ने आकर कहा।
राजेश चैंक पड़ा... इर्द-गिर्द बैठे कर्मचारी अज्ञात भय से व्हिवल हो सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से राजेश को निहारने लगे।
नवयुवक राजेश की नियुक्ति अभी डेढ़ महीने पूर्व ही केन्द्रीय खुफिया विभाग में हुई थी। पढ़ाई समाप्त करके तीन साल उसने इस काम की ट्रेनिंग ली थी, ये सही है कि ट्रेनिंग के बाद की परीक्षा में उसने प्रथम श्रेणी प्राप्त की थी, किन्तु केन्द्रीय खुफिया विभाग में उसे स्थान मिल जायेगा इसकी तो कल्पना भी उसने न की थी।

Wednesday, 26 February 2025

634. बेगम का खजाना- ओमप्रकाश शर्मा- जनप्रिय

आओ जाने खजाने के रहस्य को...
बेगम का खजाना- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

सदियों पुराना खजाना जब सामने आता है तो उसे हथियाने के लिए लोग किस कदर एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं और कैसे प्रसिद्ध जासूस 'बेगम के खजाने' का रहस्य खोजते हैं और अपराधी को बेनकाब करते है यह पठनीय और रोचक है।
आज प्रस्तुत है एक रोचक उपन्यास की समीक्षा । इस समीक्षा का आरम्भ हम उपन्यास के प्रथम पृष्ठ के दृश्य से करते हैं।

केन्द्रीय खुफिया विभाग के चीफ आफ स्टाफ मिस्टर चक्रवर्ती तेजी से सीनियर जासूस राजेश के कमरे में दाखिल हुए।
- 'राजेश?'
-'हूँ।'
इस समय राजेश लाखों गुना बड़ा दिखाने वाले यंत्र से एक खून में काम आई पिस्तौल का निरीक्षण कर रहे थे। आमतौर से मिस्टर चक्रवर्ती इस प्रकार से किसी व्यक्ति के पास नहीं आया करते हैं... फलस्वरूप अपने काम में लगे राजेश यही समझे कि कोई विभाग का साधारण कर्मचारी होगा। केवल 'हूँ' कह कर वह आँख यंत्र से लगाए रहे।
- 'भई राजेश, मुझे तुमसे कुछ बातें करनी हैं?'
अबकी बार राजेश ने दृष्टि उठा कर चीफ आफ स्टाफ को देखा।

Thursday, 20 February 2025

633. सुनहरे बाल नीली आँखें- ओमप्रकाश शर्मा

कहानी एक गायब हुये बच्चे की
 सुनहरे बाल नीली आँखें- ओमप्रकाश शर्मा


लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के सितारे ओमप्रकाश शर्मा जी के उपन्यास का पुनः प्रकाशन होना एक सराहनीय कार्य है । उनके पाठक के लिए एक अनमोल उपहार है । जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी जासूसी उपन्यास होते हुये भी अपनी जासूसी कहानियों में मानवीय मूल्यों को महत्व देते थे । 
इनका प्रसिद्ध पात्र राजेश अपने मानवीय मूल्यों के कारण ही अन्य जासूसी कथा पात्रिं से एक अलग पहचान स्थापित कर पाया है । प्रस्तुत उपन्यास उन्हीं राजेश महोदय का है ।
यह कहानी एक एक ऐसी युवती की जो अत्यंत सुंदर थी । जिसके बाल सुनहरे और आँखें नीली थी । जिसे देखकर हर कोई उस पर मोहित हो जाता था और यही खूबसूरती उसके जीवन के लिए अभिशाप सिद्ध हुयी और उस पर आरोप था एक बच्चे को चुराने का।