बच्चे के दुश्मन कौन थे ?
लहू से लिख दो जयहिंद- रीमा भारती
उस युवती का रंग गोरा था।
खूब गोरा-किन्तु हल्की-सी सुर्खी लिए हुए।
ऐसा लगता था जैसे ताजे मक्खन भरे थाल के निकट से कोई होली खेलने के मूड में आया शैतान बच्चा गुलाल उड़ाता हुआ गुजर गया हो।
युवती की उम्र अधिक से अधिक चौबीस साल की थी। किन्तु उसके चेहरे की मासूमियत व बदन की कामनीयता उसे बीस वर्ष की दर्शा रही थी।
युवती की आंखें वीरान थीं इनमें सोचों के साये थे। उसकी आंखें उस चार वर्षीय गोल मटोल बच्चे को घूर रही थीं जो कि एक बड़ी-सी रंगीन बॉल के पीछे यूं दौड़ रहा था जैसे अब गिरा तब गिरा।
वह बॉल के निकट पहुंचता और झुककर बॉल पकड़ना चाहता। किन्तु बॉल उसके पांव की ठोकर पहले ही खा जाती और दूर चली जाती।
मनोहारी डूबी हुई थी। दृश्य था। केवल वही उस मनोहारी दृश्य में नहीं बल्कि रीमा भी एक बेंच पर बैठी दिलचस्पी से उस दृश्य को देख रही थी।
रीमा !
भारत की सर्वश्रेष्ठ किन्तु गुप्त जासूसी संस्था आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेंट जो कि इन दिनों फ्री होने के कारण तफरीह के मूड में थी तथा अपने एक मित्र की प्रतीक्षा कर रही थी।
आज हम बात कर रहे हैं एक्शन उपन्यास लेखिका रीमा भारती जी के उपन्यास 'लहू से लिख दो जय हिंद' । प्रसिद्ध उपन्यासकार दिनेश ठाकुर (प्रदीप कुमार शर्मा) ने एक एक्शन गर्ल पात्र की रचना की थी, जिसना नाम था रीमा भारती। और बाद में इन्हीं दिनेश ठाकुर जी के ग्रुप से रीमा भारती नाम से एक लेखिका का पदार्पण होता है और उसके उपन्यासों की नायिका भी रीमा भारती होती है।
यहां आज हम लेखिका रीमा भारती जी के रवि पॉकेट बुक्स से प्रकाशित उपन्यास 'लहू से लिख दो जय हिंद' की बात कर रहे हैं।
रीमा भारती जो भारत की सर्वश्रेष्ठ किन्तु गुप्त जासूसी संस्था आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेंट एक दिन एक सार्वजनिक पार्क में अपने एक मित्र का इंतजार कर रही थी। वहीं एक छोटे से बच्चे पर जानलेवा हमला होता है। संयोग से बच्चा बच गया और रीमा भारती के हस्तक्षेप से हमलावर मारा जाता है।
शैलजा एक अमीर घराने की विधवा औरत थी और उसके बच्चे का नाम मोहन था । शैलजा अमीर और दयावान स्त्री थी जो की अपनी वृद्धा सास के साथ रहती है। शैलजा का देवर... घर के बटवारे के बाद अलग रहता है।
इसी शैलजा के नन्हें-मुन्ने पुत्र मोहन पर लगातार जानलेवा हमले होते हैं और हर बार हमलावर रीमा भारती और पुलिस के हस्तक्षेप से मारे जाते हैं। लेकिन यह पता नहीं चलता की आखिर कोई क्यों एक छोटे से बच्चे की जान लेना चाहता है।
वहीं दूसरी तरफ शहर में एक बैंक में बीस करोड़ की डकैती होती है और डकैत पुलिस की पहुंच से दूर हैं। पुलिस लगातार डकैतों को खोज रही है, पर पुलिस को सफलता नहीं मिलती ।
इसी समय उपन्यास में दो खतरनाक पात्रों का प्रवेश होता है। गुरु कलिंगा जो एक वहशी हत्यारा है और चेला शांता राम गोखले ।
दोनों हवशी, खतरनाक हत्यारे और दोनों का एक ही उद्देश्य है जैसे भी हो दौलत मिल जाये। जब दोनों को यह खबर मिलती है शहर में बीस करोड़ की डकैती हो गयी तो दोनों 'चोर पर मोर' कहावत को चरितार्थ करने की कोशिश करते हैं। शीघ्र ही कलिंगा और शांता राम को यह पता चल जाता है कि बैंक लूटेरे कोई सामान्य आदमी नहीं हैं, लेकिन फिर भी दोनों दिन-रात बीस करोड को प्राप्त करने की कोशिश में लगे रहते हैं।
वहीं कहानी में अचानक एक और मोड़ आता है और वह है रीमा भारती द्वारा आतंकवादियों का पीछा करना। उपन्यास में यह घटनाक्रम कब और कैसे प्रवेश कर गया, पढते वक्त पता ही नहीं चलता। पाठक तो मोहन के हत्यारे और वहशी गुरु-चेले की कहानी में उलझे हुये थे ।
दरअसल कहानी के पृष्ठ भी बढाने और कहानी में कुछ ट्विस्ट भी देने थे लेकिन पाठक से कोई लेना-देना न था, पाठक जी अपना सिर खपाते रहे ।
और कहानी भी आतंकवादियों की खोज में व्यस्त रीमा भारती पर केन्द्रित हो जाती है।
बैंक लूटेरे और आतंकवादियों को संबंध गुरु-चेले के द्वारा सामने आता है और वहीं रीमा भारती घमासान मचा देती है।
गुरु कलिंगा और चेला शांता राम गोखले लेखिका के विशेष पात्र हैं इसीलिए दोनों को बचा लिया जाता है ताकि अन्य उपन्यासों में उन पात्रों पर लिखा जाये।
अच्छा... कहानी चल रही थी मोहन की । जब पचास प्रतिशत उपन्यास पढने पर रीमा भारती आतंकवादियों के पीछे भागती-दौड़ती है तब शैलजा को एक पत्र मिलता है जिसमें मोहन की हत्या का समय तक कर दिया जाता है। और मोहन को बचाने के लिए पुलिस सक्रिय होती है।
अब कहानी क्लाईमैक्स पर है तब पुलिस स्टेशन में रीमा भारती की धमाकेदार इंट्री होती है और वह हत्यारा को बेनकाब कर देती है।
अच्छा, रीमा भारती ने हत्यारे को कैसे खोजा, कब खोजा आदि उत्तर लेखिका ने दे दिये हैं, आप व्यर्थ परेशान न हो। यह रीमा भारती है कुछ भी कर सकती है।
अब उपन्यास का एक दृश्य भी पढ लीजिए, मनोरंजन के लिए ही सही-
रीमा ने तीक्ष्ण दृष्टि से सामने बैठी मैडम शैलजा को देखा फिर बोली थी - "आपको जरूरी सूचना देनी थी मैडम शैलजा । फोरेंसिक जांच वालों की रिपोर्ट आ गयी हैं।
"अच्छा.......।" शैलजा उत्सुक स्वर में बोली थी- "क्या रहा?"
"रिपोर्ट हंगामाखेज है......आप सुन न सकेंगी। फिर भी मैं आपको बताती हूं।"
"जरूर! मैंने दिल कड़ा कर लिया है।"
"मोहन पर जो तीर छोड़े गये वे महज नन्हें तीर न होकर मौत का फरमान थे। उनकी नोकें अगर मोहन को छू भी जाती तो मोहन के बचने के कोई चांस न थे।"
"न.... नहीं......।" शैलजा के कंठ से घुटी घुटी सी चीख निकली थी। आंखें फैल चली थी।
"बलवंत मांजरेकर नामक सुपारी किलर के चलाये गये तीर की नोक साइनाइड में बुझी थी।" रीमा आगे बोली थी... "इसलिये उनका खून की एक बूंद में मिलने का सीधा सा अर्थ मौत था। बलवंत मांजरेकर के हाथों मोहन भले ही बच निकला हो किन्तु बलवंत मांजरेकर मारा गया। उसकी उपस्थिति दर्शाती है कि उसे हॉयर किया गया था। क्योंकि ये सुपारी किलर हजारों में नहीं लाखों में बिकने वाला सुपारी किलर था और उसे ऊँचे रेटों पर कोई हायर कर सकता था। अब प्रश्न ये उठता है कि. ।" कहते-कहते रीमा ने दृष्टि उठाई ही थी कि चौंक गई। मैडम शैलजा के चेहरे का रंग बदल रहा था।
□□□
लहू से लिख दो जय हिन्द
देश की आन पर मर मिटने वाली रीमा भारती का नया हाहाकारी कारनामा ।
उपन्यास शीर्षक:- किसी भी रचना का शीर्षक महत्वपूर्ण होता है और शीर्षक से पाठक अनुमान लगा सकता है कि कथानक क्या होगा ।
प्रस्तुत उपन्यास की बात करें तो यहां उपन्यास कथा और शीर्षक का आपस में किसी तरह का कोई भी संबंध नहीं है।
प्रस्तुत उपन्यास का कथानक अत्यंत सामान्य है। कोई उल्लेखनीय बात उपन्यास में नहीं है। दो समान्तर कथाएं चलती हैं, जो अंत में एक नहीं होती । हां, कुछ व्यक्तियों द्वारा मोहन और आतंकवादियों की कहानी को एक करने की कोशिश की गयी है जो व्यर्थ नजर आती है।
उपन्यास पढना समय की बर्बादी है।
उपन्यास- लहू से लिख दो जय हिंद
लेखक- रीमा भारती
पृष्ठ- 300
लहू से लिख दो जयहिंद- रीमा भारती
उस युवती का रंग गोरा था।
खूब गोरा-किन्तु हल्की-सी सुर्खी लिए हुए।
ऐसा लगता था जैसे ताजे मक्खन भरे थाल के निकट से कोई होली खेलने के मूड में आया शैतान बच्चा गुलाल उड़ाता हुआ गुजर गया हो।
युवती की उम्र अधिक से अधिक चौबीस साल की थी। किन्तु उसके चेहरे की मासूमियत व बदन की कामनीयता उसे बीस वर्ष की दर्शा रही थी।
युवती की आंखें वीरान थीं इनमें सोचों के साये थे। उसकी आंखें उस चार वर्षीय गोल मटोल बच्चे को घूर रही थीं जो कि एक बड़ी-सी रंगीन बॉल के पीछे यूं दौड़ रहा था जैसे अब गिरा तब गिरा।
वह बॉल के निकट पहुंचता और झुककर बॉल पकड़ना चाहता। किन्तु बॉल उसके पांव की ठोकर पहले ही खा जाती और दूर चली जाती।
मनोहारी डूबी हुई थी। दृश्य था। केवल वही उस मनोहारी दृश्य में नहीं बल्कि रीमा भी एक बेंच पर बैठी दिलचस्पी से उस दृश्य को देख रही थी।
रीमा !
भारत की सर्वश्रेष्ठ किन्तु गुप्त जासूसी संस्था आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेंट जो कि इन दिनों फ्री होने के कारण तफरीह के मूड में थी तथा अपने एक मित्र की प्रतीक्षा कर रही थी।
आज हम बात कर रहे हैं एक्शन उपन्यास लेखिका रीमा भारती जी के उपन्यास 'लहू से लिख दो जय हिंद' । प्रसिद्ध उपन्यासकार दिनेश ठाकुर (प्रदीप कुमार शर्मा) ने एक एक्शन गर्ल पात्र की रचना की थी, जिसना नाम था रीमा भारती। और बाद में इन्हीं दिनेश ठाकुर जी के ग्रुप से रीमा भारती नाम से एक लेखिका का पदार्पण होता है और उसके उपन्यासों की नायिका भी रीमा भारती होती है।
यहां आज हम लेखिका रीमा भारती जी के रवि पॉकेट बुक्स से प्रकाशित उपन्यास 'लहू से लिख दो जय हिंद' की बात कर रहे हैं।
रीमा भारती जो भारत की सर्वश्रेष्ठ किन्तु गुप्त जासूसी संस्था आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेंट एक दिन एक सार्वजनिक पार्क में अपने एक मित्र का इंतजार कर रही थी। वहीं एक छोटे से बच्चे पर जानलेवा हमला होता है। संयोग से बच्चा बच गया और रीमा भारती के हस्तक्षेप से हमलावर मारा जाता है।
शैलजा एक अमीर घराने की विधवा औरत थी और उसके बच्चे का नाम मोहन था । शैलजा अमीर और दयावान स्त्री थी जो की अपनी वृद्धा सास के साथ रहती है। शैलजा का देवर... घर के बटवारे के बाद अलग रहता है।
इसी शैलजा के नन्हें-मुन्ने पुत्र मोहन पर लगातार जानलेवा हमले होते हैं और हर बार हमलावर रीमा भारती और पुलिस के हस्तक्षेप से मारे जाते हैं। लेकिन यह पता नहीं चलता की आखिर कोई क्यों एक छोटे से बच्चे की जान लेना चाहता है।
वहीं दूसरी तरफ शहर में एक बैंक में बीस करोड़ की डकैती होती है और डकैत पुलिस की पहुंच से दूर हैं। पुलिस लगातार डकैतों को खोज रही है, पर पुलिस को सफलता नहीं मिलती ।
इसी समय उपन्यास में दो खतरनाक पात्रों का प्रवेश होता है। गुरु कलिंगा जो एक वहशी हत्यारा है और चेला शांता राम गोखले ।
दोनों हवशी, खतरनाक हत्यारे और दोनों का एक ही उद्देश्य है जैसे भी हो दौलत मिल जाये। जब दोनों को यह खबर मिलती है शहर में बीस करोड़ की डकैती हो गयी तो दोनों 'चोर पर मोर' कहावत को चरितार्थ करने की कोशिश करते हैं। शीघ्र ही कलिंगा और शांता राम को यह पता चल जाता है कि बैंक लूटेरे कोई सामान्य आदमी नहीं हैं, लेकिन फिर भी दोनों दिन-रात बीस करोड को प्राप्त करने की कोशिश में लगे रहते हैं।
वहीं कहानी में अचानक एक और मोड़ आता है और वह है रीमा भारती द्वारा आतंकवादियों का पीछा करना। उपन्यास में यह घटनाक्रम कब और कैसे प्रवेश कर गया, पढते वक्त पता ही नहीं चलता। पाठक तो मोहन के हत्यारे और वहशी गुरु-चेले की कहानी में उलझे हुये थे ।
दरअसल कहानी के पृष्ठ भी बढाने और कहानी में कुछ ट्विस्ट भी देने थे लेकिन पाठक से कोई लेना-देना न था, पाठक जी अपना सिर खपाते रहे ।
और कहानी भी आतंकवादियों की खोज में व्यस्त रीमा भारती पर केन्द्रित हो जाती है।
बैंक लूटेरे और आतंकवादियों को संबंध गुरु-चेले के द्वारा सामने आता है और वहीं रीमा भारती घमासान मचा देती है।
गुरु कलिंगा और चेला शांता राम गोखले लेखिका के विशेष पात्र हैं इसीलिए दोनों को बचा लिया जाता है ताकि अन्य उपन्यासों में उन पात्रों पर लिखा जाये।
अच्छा... कहानी चल रही थी मोहन की । जब पचास प्रतिशत उपन्यास पढने पर रीमा भारती आतंकवादियों के पीछे भागती-दौड़ती है तब शैलजा को एक पत्र मिलता है जिसमें मोहन की हत्या का समय तक कर दिया जाता है। और मोहन को बचाने के लिए पुलिस सक्रिय होती है।
अब कहानी क्लाईमैक्स पर है तब पुलिस स्टेशन में रीमा भारती की धमाकेदार इंट्री होती है और वह हत्यारा को बेनकाब कर देती है।
अच्छा, रीमा भारती ने हत्यारे को कैसे खोजा, कब खोजा आदि उत्तर लेखिका ने दे दिये हैं, आप व्यर्थ परेशान न हो। यह रीमा भारती है कुछ भी कर सकती है।
अब उपन्यास का एक दृश्य भी पढ लीजिए, मनोरंजन के लिए ही सही-
रीमा ने तीक्ष्ण दृष्टि से सामने बैठी मैडम शैलजा को देखा फिर बोली थी - "आपको जरूरी सूचना देनी थी मैडम शैलजा । फोरेंसिक जांच वालों की रिपोर्ट आ गयी हैं।
"अच्छा.......।" शैलजा उत्सुक स्वर में बोली थी- "क्या रहा?"
"रिपोर्ट हंगामाखेज है......आप सुन न सकेंगी। फिर भी मैं आपको बताती हूं।"
"जरूर! मैंने दिल कड़ा कर लिया है।"
"मोहन पर जो तीर छोड़े गये वे महज नन्हें तीर न होकर मौत का फरमान थे। उनकी नोकें अगर मोहन को छू भी जाती तो मोहन के बचने के कोई चांस न थे।"
"न.... नहीं......।" शैलजा के कंठ से घुटी घुटी सी चीख निकली थी। आंखें फैल चली थी।
"बलवंत मांजरेकर नामक सुपारी किलर के चलाये गये तीर की नोक साइनाइड में बुझी थी।" रीमा आगे बोली थी... "इसलिये उनका खून की एक बूंद में मिलने का सीधा सा अर्थ मौत था। बलवंत मांजरेकर के हाथों मोहन भले ही बच निकला हो किन्तु बलवंत मांजरेकर मारा गया। उसकी उपस्थिति दर्शाती है कि उसे हॉयर किया गया था। क्योंकि ये सुपारी किलर हजारों में नहीं लाखों में बिकने वाला सुपारी किलर था और उसे ऊँचे रेटों पर कोई हायर कर सकता था। अब प्रश्न ये उठता है कि. ।" कहते-कहते रीमा ने दृष्टि उठाई ही थी कि चौंक गई। मैडम शैलजा के चेहरे का रंग बदल रहा था।
□□□
लहू से लिख दो जय हिन्द
देश की आन पर मर मिटने वाली रीमा भारती का नया हाहाकारी कारनामा ।
उपन्यास शीर्षक:- किसी भी रचना का शीर्षक महत्वपूर्ण होता है और शीर्षक से पाठक अनुमान लगा सकता है कि कथानक क्या होगा ।
प्रस्तुत उपन्यास की बात करें तो यहां उपन्यास कथा और शीर्षक का आपस में किसी तरह का कोई भी संबंध नहीं है।
प्रस्तुत उपन्यास का कथानक अत्यंत सामान्य है। कोई उल्लेखनीय बात उपन्यास में नहीं है। दो समान्तर कथाएं चलती हैं, जो अंत में एक नहीं होती । हां, कुछ व्यक्तियों द्वारा मोहन और आतंकवादियों की कहानी को एक करने की कोशिश की गयी है जो व्यर्थ नजर आती है।
उपन्यास पढना समय की बर्बादी है।
उपन्यास- लहू से लिख दो जय हिंद
लेखक- रीमा भारती
पृष्ठ- 300
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