महानंद समाधि में मौत का रहस्य
मृत्य भक्त- कर्नल रंजीत
इन दिनों सतत् कर्नल रंजीत के उपन्यास पढे जा रहे हैं और 'मृत्यु भक्त' इस क्रम में प्रथम उपन्यास है और इसके पश्चात जो उपन्यास पढा जा रहा है उसका नाम है- लहू और मिट्टी । दोनों एक ही जिल्द में हैं, जो हिंद पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुये थे ।लोकप्रिय कथा साहित्य में कर्नल रंजीत का नाम रहस्यपूर्ण उपन्यास लेखन में अग्रणी है । इनके उपन्यास की एक विशेष शैली है। इस विषय पर हम इन उपन्यासों के आलेख में लगातार चर्चा करते रहेंगे । सर्वप्रथम उपन्यास का प्रथम दृश्य देखें जिसका शीर्षक है- कुल्हाड़ी ।
कुल्हाड़ी
मेजर बलवन्त को पिछले एक महीने से भारी चिन्ता लगी हुई थी। बम्बई में स्त्रियों की दौड़-प्रतियोगिता हुई थी। मालती ने दो सौ मीटर की दौड़ में भाग लिया था। वह फाइनल में पहुंच-कर जीत भी गई थी। वह इतने ज़ोर में थी कि जब उसका सीना टेप से छुआ तो वह प्रथम आने के बाद अपने ही जोर में गिर पड़ी थी और उसके दायें पांब में मोच आ गई थी। वह तीन महीने तक अस्पताल में रही थी। पांव पर प्लास्टर चढ़ा दिया गया था । प्लास्टर उतर जाने के बाद भी उसका पांव सीधा नहीं हुआ था। दायें पांव का मामला था। मालती उसकी बहुत अच्छी असिस्टेण्ट थी । अगर उसका पांव खराब हो गया तो वह अपनी एक उच्चकोटि की सहायिका से वंचित हो जाएगा। मेजर किसी भी दशा में यह सहन नहीं कर सकता था कि मालती उसकी टीम से अलग हो जाए । मेजर बलवन्त ने अपने मित्रों-परिचितों से विचार-विमर्श किया। मेजर को पता चला कि बुलन्दशहर में एक किसान शोभा-राम है, जो अपने स्थान से हिली हुई हड्डियों को ठीक कर देता है। हड्डियों की तपेदिक तक दूर कर देता है। जड़ी-बूटियों से गठिया का इलाज कर देता है। कूल्हा खिसक जाए तो वह कूल्हे पर लात मारकर उसको अपनी असली जगह पर बैठा देता है।
मेजर बलवन्त ने अपने मित्रों-परिचितों से विचार-विमर्श किया। मेजर को पता चला कि बुलन्दशहर में एक किसान शोभा-राम है, जो अपने स्थान से हिली हुई हड्डियों को ठीक कर देता है। हड्डियों की तपेदिक तक दूर कर देता है। जड़ी-बूटियों से गठिया का इलाज कर देता है। कूल्हा खिसक जाए तो वह कूल्हे पर लात मारकर उसको अपनी असली जगह पर बैठा देता है।
मेजर बलवन्त को शोभाराम के बारे में यह भी मालूम हुआ एर कि खिसकी हुई हड्डियों को ठीक करने और टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने का इलाज उसकी पैतृक परम्परा है जो दो सौ वर्ष से चली आ रही है। इस इलाज के लिए वह गरीब देहातियों से कोई पैसा नहीं लेता । शोभाराम की मां ने तो खिसकी हुई हड्डियों को असली स्थान पर लाने की कला को आश्चर्य की सीमा तक पहुंचा दिया था। आरम्भ में उसके परिवार के लोग ढोर-डंगरों की खिसकी हुई हड्डियां 'सेट' किया करते थे। धीरे-धीरे उन्होंने आदमियों की हड्डियां भी ठीक करनी आरम्भ कर दीं। वे इस काम का कोई पारिश्रमिक नहीं लेते थे ।
मेजर ने मालती को बुलन्दशहर ले जाने का निश्चय किया, तो सोनिया ने भी बुलन्दशहर चलने की इच्छा प्रकट की; और वे अगले दिन कार द्वारा बुलन्दशहर की ओर चल पड़े ।
बुलंद शहर में एक प्रसिद्ध जगह है महानंद समाधि । यहां विचित्र हत्याओं का यह सिलसिला आरम्भ हुआ था और जिसे मेजर बलवंत ने अपने सहयोगी सोनिया, मालती, डोरा, सुधीर, क्रोकोडायल (कुत्ता) और पुलिस की मदद से हल किया ।
तो सबसे पहले हम जान ले यह महानंद समाधि आखिर है क्या?
महानन्द-समाधि आचार्य महानन्द की समाधि थी, जो सम्राट अशोक के जमाने में पाटलिपुत्र के प्रधान मंदिर के पुजारी और साथ ही राजवैद्य भी थे । सम्राट अशोक का राज्य पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में तक्षशिला तक फैला हुआ था । पाटलिपुत्र से तक्ष-शिला जाने वाले राजमार्ग पर अनेक बड़े-बड़े नगर आबाद थे, जहां राजमार्ग की सुरक्षा के लिए कुछ सैनिक रहा करते थे । बुलन्दशहर भी राजमार्ग पर एक महत्त्वपूर्ण नगर था। यहां एक किला भी बना हुआ था। उस किले के खण्डहरों पर ही आज का शहर आबाद है।
आचार्य महानन्द के एक शिष्य सूर्यानन्द को इस समाधि की देखभाल करने के लिए नियुक्त किया ।
थोड़े से दिनों में ही आचार्य महानन्द की समाधि दूर-दूर तक विख्यात हो गई। सूर्यानन्द ने उसे अपनी पैतृक जागीर बना लिया । उसके बाद उसकी आने वाली पीढ़ियां समाधि की देखभाल करती रहीं और धन इकट्ठा करती रहीं। वर्तमान आचार्य जगतानन्द आचार्य सूर्यानन्द की वंश-परम्परा में से ही हैं। इस जागीर का अभी तक राष्ट्रीयकरण नहीं हुआ है। पहले इस जागीर में केवल खेती होती थी, लेकिन अब इसमें फार्म हैं। फलों के बाग हैं। पशु-पालन केन्द्र हैं। मत्स्य उत्पादन के लिए तालाब है।
आचार्य सूर्यानन्द के उत्तराधिकारी वैभवपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं। परिवार की परम्परा है कि बड़ा बेटा प्रधान पुजारी बनता है और आडम्बरहीन जीवन व्यतीत करता है, लेकिन परि-बार के अन्य सदस्य आधुनिक जीवन व्यतीत करते हैं। पुजारी की मृत्यु के बाद उसका बड़ा बेटा पुजारी बना दिया जाता है। मृत पुजारी की समाधि बना दी जाती है। जागीर में लगभग 32 समाधि हैं। प्रधान पुजारी के आदेश से पुजारियों के अतिरिक्त अन्य व्यक्ति की समाधि भी वहां बनाई जा सकती है। (उपन्यास अंश)
वर्तमान में आचार्य जगतानंद इस समाधि के मुख्य पुजारी हैं और उनका शेष परिवार यहीं रहता है। जगतानंद के छोटे भाई मंगलानंद इस क्षेत्र की देखभाल करते हैं। महानंद समाधि की जागीर पांच सौ एकड़ क्षेत्र में फैली है।
आचार्य जगतानंद के के तीन पुत्र हैं । सबसे बड़े अजयानंद उनकी पत्नी का नाम है अलका, द्वितीय हैं वेदानंद और उनकी पत्नी का नाम है... , तृतीय पुत्र का नाम है रूपानंद और उनकी पत्नी का नाम है...। आचार्य जगतानंद की माता का नाम है नर्मदा देवी। और भी बहुत से पात्र हैं।
एक दिन आचार्य जगतानंद के छोटे भाई मंगलानंद असम से एक कमसीन और कम उम्र की युवती सुशासिनी को लेकर जागीर लौटते हैं। जिसे परिवार के लोग पसंद नहीं करते । एक दिन मंगलानंद की अनुपस्थिति में सुशासिनी की मृत्यु हो जाती है । अभी सुशासिनी की मृत्यु का कारण सामने भी नहीं आता, किसी अज्ञात व्यक्ति ने मंगलानंद की कुल्हाड़ी से हत्या कर दी ।
महानंद समाधि के लोग मृत्यु के भक्त माने जाते हैं, कभी मौत से नहीं डरते क्योंकि उनके अनुसार मृत्यु (महानंद समाधि) से ही उनका परिचय का पालन पोषण होता और फिर मृत्यु का एक दिन आना तय ही है। लेकिन अकस्मात हुयी दो मौतों से परिवार स्तब्ध रह जाता है।
इन्हीं दिनों मेजर बलवंत अपनी सहयोगी मालती के पैर के इलाज के लिए बुलंदशहर आया हुआ था और फिर एक निवेदन से मेजर बलवंत महानंद समाधि में हुयी हत्याओं की खोजबीन में व्यस्त हो जाता है।
मेजर बलवंत अभी कुछ समझ भी नहीं पाते और फिर एक के बाद हत्याएं होनी आरम्भ हो जाती है। कभी परिवार का कोई सदस्य, कभी कोई नौकर एक -एक कर मौत के मेहमान बनते जाते हैं। महानंद समाधि के लोगों का मानना है कि सुशासिनी की आत्मा बदला ले रही है और कुछ लोगों ने यह दावा किया है कि उन्होंने सुशासिनी की आत्मा को देखा है। वहीं मेजर बलवंत का दावा था कि इस एटामिक युग में ऐसा कुछ नहीं होता ।
मेजर बलवंत की अन्वेषणा जारी थी और वहीं कत्ल भी निरंतर हो रहे रहे थे ।
सुशासिनी, मंगलानंद, नौकर रत्तू, दादी माँ, आचार्य जगतानंद के पुत्र और पुत्रवधू और इस तरह अपराधी नौ हत्याएं करता है।
कहते हैं पाप का घड़ा एक दिन भरता ही है और यहाँ भी एक दिन अपराधी के पाप का घड़ा भर गया और वह मेजर बलवंत ने अपनी चतुराई से आखिर अपराधी को पकड़ ही लिया ।
कथानक के पश्चात हम बात करते हैं कर्नल रंजीत के उपन्यासों की कुछ विशेषताओं की जो उनके उपन्यासों में विशेषकर दिखाई देती है।
जैसे- मेजर बलवंत को कोई महत्वपूर्ण बात पता चलती है वह होंठ गोल कर सीटी बजाते हैं।
कर्नल रंजीत जी के उपन्यासों में 'विचित्र' शब्द बहुत आता है।
इनकी एक और विशेषता है वह इस उपन्यास में भी दिखाई दी- तभी एक स्त्री की चीख सुनाई दी, और फिर एक मिनट के बाद ही किसी दूसरी स्त्री की चीख सुनाई दी। एक मिनट के अन्तराल के बाद दो चीखें । (पृष्ठ-115)
इसे लगातार दो -तीने आवाजें इनके उपन्यासों में सुनाई देती हैं।
एक समय था जब उपन्यासों में झकझकी चला करती थी । मुख्य नायक बेपैर सिर की तुकबंदी सुनाया करता था, तो अपने मेजर बलवंत साहब भी क्यों पीछे रहे । उनके पास तो 'वाह..वाह..' कहने वाली एक टीम भी है।
तो आप भी मेजर बलवंत के एक शे'र का मजा लीजिए
तेल के, घी के, डबलरोटी के क्यू लगने लगे,
दो ही बच्चे पैदा करके हम तो घाटे में रहे।"
सबने गम्भीरता से मेजर के शे'र की सराहना की ।
"मैं चाहता हूं कि आप मुझे मेरे शे'र के लिए दाद न दें, दाद की जगह सिगार दें। आज से मैं सिगार पीना शुरू करना चाहता हूं।"(पृष्ठ-86)
मेजर बलवंत ने इसी उपन्यास से सिगार पीना आरम्भ किया था ।
- आज से मैं सिगार पीना शुरू करना चाहता हूं।"(पृष्ठ-86)
सोनिया और डोरा मेजर को प्रशंसाभरी नजरों से देख रही थी, क्योंकि सिगार पीते हुए मेजर का व्यक्तित्व और अधिक आकर्षक तथा प्रभावशाली बन जाता था। वह बहुत बड़ा चिन्तक और विचारक दिखाई देने लगता था ।
प्रस्तुत उपन्यास एक जागीर विशेष में हो रहे अपराधों पर आधारित है, जहां एक के बाद एक कत्ल हो रहे हैं और अपराधी का कोई सुराग भी सामने नहीं है । अंत में मेजर बलवंत अपनी टीम और चातुर्य से अपराधी को बेनकाब करता है।
कहानी का आधार मनुष्य की प्रवृत्ति पर आधारित है। मानव अपनी प्रवृत्ति के चलते जब गलत राह पर निकल जाता है तो वह अपराध की गहरी दलदल में बैठ जाता है।
रोचक। कर्नल रंजीत का कोई उपन्यास आज तक मैंने नहीं पढ़ा है। एक दो मिले थे नेट में लेकिन अब वैसे पढ़ा नहीं जाता है। हिंद पॉकेट बुक्स के कई उपन्यास पेंगुइन ने निकाले थे। उम्मीद है कर्नल रंजीत के कुछ उपन्यास वो निकालेंगे।
ReplyDeleteनिकालते हैं तो तब पढ़ने की कोशिश होगी।
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