एक फ़िल्मकार के संस्मरण
शिलाओं पर लिखे शब्द- सुरेन्द्र मनन
सुरेन्द्र मनन जी का नाम सब से पहले मैंने सारिका पत्रिका 'दिसम्बर 1985' पढा था । उनकी प्रसिद्ध कहानी थी नंगे लोग । इस एक कहानी के बाद मैंने कभी सुरेन्द्र मनन जी को नहीं पढा । इस कहानी के लगभग बीस साल बाद सुरेन्द्र मनन जी की रचना 'शिलाओं पर लिखे शब्द'(एक फ़िल्मकार के संस्मरण) पढने को मिला । संस्मरण में जो ताजगी है, जो प्रवाह है जो तारतम्यता है वह इस रचना को पठने को प्रेरित करती है।
'शिलाओं पर लिखे शब्द' बोधि प्रकाशन जयपुर के एक विशेष आयोजन 'बोधि पुस्तक पर्व' के पांचवें बंध के अंतर्गत प्रकाशित है। जो सन् 2020 में प्रकाशित हुआ और मैंने इस पांच साल बाद 2025 में पढा । यहीं से पता चला की सुरेन्द्र मनन जी एक अच्छे कहानीकार के साथ डाक्यूमेंट्री फिल्मकार भी हैं और प्रस्तुत रचना उनके इस संदर्भ में की गयी यात्राओं के अनुभवों का संकलन है।
प्रस्तुत संग्रह में चार संस्मरण और एक साक्षात्कार शामिल है ।
पहला संस्मरण है -शिलाओं पर लिखे शब्द जो हमें आर्मिनिया की यात्रा करवाता है। आर्मिनिया के 'सनचाइल्ड फिल्म समारोह' के आयोजन में आमंत्रित लेखन ने वहां की राजधानी की यात्रा की और आर्मिनिया के इतिहास को देखा । आर्मिनिया का इतिहास मेरे लिए आज तक अज्ञात ही था ।
औपनिवेशिक दौर में हर देश ने जख्म सहे हैं। सत्ता, धर्म और जातिगत और भी न जाने कितने दर्दों का दास्ता इतिहास में छुपी हुयी है। ऐसा ही कुछ आर्मिनिया के साथ हुआ था ।
इतिहास में हिटलर द्वारा यहूदी जाति पर किये गये अत्याचार तो पढे थे । पर आर्मिनिया के इतिहास में भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ था वह था जातिसंहार ।
शुरु हो चुका था। रूबेन और लेवोन मेरे अंग-संग थे।
जातिसंहार ! हां, यही था वह शब्द, जिसका सृजन मानव जाति के इस हिस्से ने अपनी बलि देकर किया था। नरमेध या नरसंहार शब्द को तो इतिहास पहले ही जन्म दे चुका था। इसकी कई मिसालें मौजूद थीं। अनेकों देशों और अनेक सरहदों पर, लेकिन जातिसंहार शब्द तब अस्तित्व में आया, जब ऑटोमन साम्राज्य में तुर्की शासन द्वारा आर्मीनी जाति के लोगों को अपने देश से न सिर्फ हटा देने, बल्कि मिटा देने के लिए ऐसे-ऐसे बेमिसाल तरीके अपनाये गये, जो पहले विश्व युद्ध तक मौजूद न थे। आर्मीनी अल्पसंख्यक थे, ईसाई थे और ऑटोमन साम्राज्य में उनके साथ हमेशा से दूसरे दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार होता रहा था, लेकिन वे आंख की किरकिरी तब बन गये जब इस्लामी कट्टरपंथियों ने तख्तापलट के बाद सत्ता पर कब्जा कर लिया ।
कट्टरपंथी ऑटोमन साम्राज्य को नये, विशुद्ध इस्लामी राष्ट्र का रूप देना चाहते थे और ईसाई आर्मीनी उनकी नजर में अधर्मी, नास्तिक और घृणित थे, इसलिए देश से इस जाति के उन्मूलन के लिए आर्मीनी लोगों का जिस तरह से कत्लेआम किया गया, उसे व्याख्यायित करने के लिए नरसंहार की जगह एक नया, उपयुक्त और सुनिश्चित शब्द ईजाद किया गया। इस कत्लेआम को बीसवीं सदी के पहले जातिसंहार के तौर पर इतिहास में दर्ज किया गया।
जलप्रलय के पश्चात मात्र अपने मनु ही नहीं बचे बल्कि आर्मिनिया के इतिहास के अनुसार नूह भी बच गये । जलप्रलय के विषय में भी रोचक तथ्य पढें-
बाइबल की कथा के अनुसार जल-प्रलय में जब सारी सृष्टि डूब गयी तो नूह की नाव इसी पर्वत पर जा अटकी थी। धीरे-धीरे जब पानी का स्तर नीचे उतरा तो पर्वत पर खड़े नूह को, चारों तरफ हरहराते जल के बीच धरती का एक टुकड़ा दिखायी दिया। उसे देखकर नूह ने कहा था- येरवस्त ! यानी वह है ! पृथ्वी है !
येरवस्त से ही जगह का नाम येरवन पड़ा। अपनी प्रकृति में यह ऐसा ही राष्ट्र था। सब-कुछ नष्ट हो जाने के बाद भी बचा हुआ। जीवित ! (शिलाओं पर लिखे शब्द संस्मरण के अंश)
आर्मिनिया संस्मरण पढना एक देश के अतीत में डूबना है, वहां के इतिहास को समझना है उस जाति के दर्द को महसूस करना है।
स्मृति में सफर मॉरिशस:- आज भले ही माॅरिशस पर्यटन की दृष्टि से एक समृद्ध देश है लेकिन इस देश का इतिहास भी बहुत जख्मों से भरा हुआ है। और इस अफ्रीकी देश के साथ भारत का संबंध भी अत्यंत घनिष्ठ रहा है।
मॉरिशस का इतिहास गिरमिटिया शब्द के बिना अधूरा है। एक डाक्यूमेंट्री के दौरान जब लेखक यहां एक व्यक्ति सीताराम से मिलता है पिर उसी व्यक्ति के माध्यम से धीरे-धीरे लेखक आगे बढता है और मॉरिशस के इतिहास को स्पष्ट करता है।
भारत तब ब्रिटेश का उपनिवेश था और यहां से भारतीय मजदूरों को एग्रीमेंट (यही शब्द बाद में गिरमिट बना) कर के मॉरिशस ले जाया गया, तब मॉरिशस एक देश न होकर एक टापू था।
लम्बी समुद्री यात्रा के दौरान असंख्य लोग समुद्र की भेंट हो गये। और हो किस्मत वाले मॉरिशस पहुंच गये वह कभी भारत वापस न आ पाये।
दर्द दोनों तरफ ही था, आगे पीढ़ियों को भी । और मॉरिशस में सिर्फ भारत ही नहीं मेडागास्कर के मजदूर भी थे। बाद भारतीय मूल के व्यक्ति श्री...मॉरिशस के प्रथम प्रधानमंत्री बने ।
और आज वही मॉरिशस भारत और मेडागास्कर के अफ्रीकी वंश के लोगों के साथ सांझी संस्कृति का निर्माण करता है। मॉरिशस की संतानों में भारत और अफ्रीकी मूल का संयुक्त खून बहता है।
बुद्धम् शरणम्...पत्थयागामी ! :- सफेद हाथियों के देश थाइलैंड का बहुत ही खुबसूरत वर्णन लेखन ने किया है। आज की चमक दमक भरी जिंदगी से लेकर इस के बौद्ध धर्म तक का चित्रण मनमोहक है।
मुझे लगा, थाईलैंड, जो कभी सियाम था, कभी सुखोथाई और अयुथ्या था, आज पत्थया में तब्दील होकर अंग्रेज की गोद में बैठा खिलखिला रहा है!
पानी से पनिका भया...:- इस पुस्तक का चौथा संस्मरण है जो मध्यप्रदेश की पनिका जाति से संबंधित है। लेखन इस जाति पर जब डाक्यूमेंट्री बनाने गया और वहां जो देखा समझा और महसूस किया उसे शब्दों द्वारा लेखन ने जन-जन तक पहुंचाया है। इस जाति पर डाक्यूमेंट्री निर्माण एक ऐतिहासिक कार्य है, लेकिन जिन लोगों ने डाक्यूमेंट्री नहीं देखी वह इस संस्मरण के द्वारा पनिका जाति को बखूबी समझ सकते हैं।
पानी से पनिका भया, बुंदन भया सरीर,
आगे-आगे पनिका चले, पाछे दास कबीर
मैं पनिका, पनिका मोरी जाति...
मध्यप्रदेश के अतिरिक्त वर्तमान में अन्य राज्यों में भी पनिका जाति के लोग पाये जाये हैं और सभी जगह इनके नाम भी अलग - अलग हैं ।
अपनी दुनिया में मस्त यह जाति यह भी नहीं जानती सरकार ने इनके नाम पर कितनी योजनाओं बनाई हैं और कितने लूट मचाई है। ऐसा ही एक प्रसंग है जब डाक्यूमेंट्री के निर्माण के समय एक सरकारी व्यक्ति पनिका जाति के उत्थान के कार्यों का वर्णन करता है और एक महिला उस व्यक्ति को ललकात देती है कि जो योजनाएं और पैसा आप बता रहे हो वह हमें कभी मिला ही नहीं ।
कौन खा जाता है, जाति उत्थान के नाम पर सरकारी धन को ?
क्या यह समय मात्र यहीं तक सीमित है ? नहीं, हर जगह भ्रष्टाचार इतना व्याप्त है किसका वर्णन भी असंभव प्रतीत होने लगा है।
वहीं पनिका जाति के रीति रिवाज, संस्कृति को भी समेटन का प्रयास किया गया है।
सिनेमा, समाज और भूमंडलीकरण:- एक पुस्तक का एक मात्त साक्षात्कार है और अंतिम रचना भी । सुरेन्द्र मनन जी का यह साक्षात्कार संज्ञा उपाध्याय जी की बातचीत पर आधारित है जिसका मुख्य विषय सिनेमा और भूमंडलीकरण है।
इस साक्षात्कार में सिनेमा के बदलते स्वरुप और सिनेमा का विश्व परिदृश्य पर सार्थक चर्चा की गयी है।
पाठको आपको याद होगा सन् 2000 का वह समय जब बड़े-बड़े शहरों से सिनेमा घर बंद हो रहे थे, दर्शक कम हो रहे थे और बड़े-बड़े स्टारों की फिल्म भी फ्लाॅप हो रही थी। इन दिनों सिनेमा घर में मिथुन चक्रवर्ती, गोविंदा के अतिरिक्त कोई और चर्चा में था तो वह था कांति शाह और उसकी सी ग्रेड फिल्में ।
सिनेमा आज बदल गया, चाहे वह सिंगल स्क्रीन से मल्टीप्लेक्स में ही क्यों न हो। इस विषय पर बहुत अच्छी चर्चा मिलती है।
यह साक्षात्कार सिनेमा प्रेमियों को पढना चाहिए।
यह पुस्तक अच्छे पाठकों को अवश्य पढनी चाहिए। जो कुछ देशों के इतिहास, भारत की जाति विशेष और सिनेमा के अतिरिक्त भी आपको बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करती है और बहुत सी अच्छी, नयी और रोचक जानकारियाँ प्रदान करती है।
पुस्तक- शिलाओं पर लिखे शब्द
लेखक- सुरेन्द्र मनन
प्रकाशक- बोधि प्रकाशन- जयपुर
पृष्ठ- 96
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किताब रोचक लग रही है। पढ़ी जाने वाली किताबों की सूची में जोड़ दी गई है। उम्मीद है अब आपके आलेख लगातार आया करेंगे।
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