Friday, 31 May 2019

195. नागाओं का रहस्य- अमीश

शिव रचना त्रय का द्वितीय भाग
नागाओं का रहस्य- अमीश त्रिपाठी

'मेलूहा के मृत्युंजय' ने शिव और सूर्यवंशियों की कहानी का सिरा जहाँ छोड़ा है ठीक वहीं से 'नागाओं का रहस्य' की कहानी आगे बढती है।
नागाओं ने शिव के मित्र बृहस्पति की हत्या की और अब उसकी पत्नी सत्ती की जान के पीछे पड़े हुए हैं। क्रूर हत्यारों की जाति नागाओं के इरादों का विफल करना ही शिव का एकमात्र लक्ष्य बन जाता है। प्रतिशोध की राह पर चलते हुए शिव नागवंशियों के क्षेत्र में पहुंचता है। यहाँ उसे मेलूहा के हमलवार को ढूंढना है। इस रोमांचक और खतरों से भरे सफर में दोस्त कब दुश्मन बन जाते हैं पता ही नहीं चलता।

- क्या शिव चन्द्रवंशियों और नागाओं से जुड़े सत्य तक पहुंच पाएगा?
- आखिर नागाओं का रहस्य क्या है?
- क्या शिव अपनी यात्रा में विजयी हो पायेगा?

रहस्य और रोमांच की दुनियां को जानने के लिए पढें -'नागाओं का रहस्य।'

Thursday, 30 May 2019

194. मेलूहा के मृत्युंजय- अमीश

शिव रचना त्रय का प्रथम भाग।
मेलूहा के मृत्जुंजय - अमीश त्रिपाठी

अमिश त्रिपाठी की 'शिव रचना त्रय' काफी चर्चित रही है। इस रचना त्रय के तीन भाग हैं। प्रथम 'मेलूहा के मृत्युंजय', द्वितीय 'वायुपुत्रों की शपथ' और तृतीय भाग है 'नागाओं का रहस्य'।
मेलूहा शब्द 'मोहन जोदड़ो' के निवासियों के लिए प्रयुक्त होता रहा है, हां यह भी संभव है यह शब्द सिंधु घाटी सभ्यता के लिए प्रयुक्त होता रहा हो।

               'मेलूहा के मृत्युंजय' पौराणिक और ऐतिहासिक घटनाओं का एक अजीब सा काल्पनिक मिश्रण है। यह अजीब सा इस दृष्टि से है की लेखन ने जो कल्पनाएँ की वह भारतीय पौराणिक दृष्टिकोण से और समय के अनुसार बहुत तर्कसंगत नहीं हैं।

           यह कहानी आरम्भ होती है मानसरोवर निवासी 'गुण कबीले' के युवक शिव से। शिव जो गुण कबील का प्रमुख है। परिस्थितियाँ गुण कबीले को मेलूहा ले आती हैं। और परिस्थिति ही एक साधारण मानव शिव को पूज्य शिव बनाती है।
             शिव जो अपने क्षेत्र (मानसरोवर) का एक योद्धा है लेकिन मेलूहा में उसे नीलकण्ठ के नाम से विशेष प्रसिद्धि मिलती है। मेलूहावासियों का विश्वास है की प्रभु नीलकण्ठ का वर्णन पौराणिक गाथाओं में है और एक दिन प्रभु नीलकण्ठ उनकी मुसीबतों के निवारण के लिए अवश्य आयेंगे।

Monday, 27 May 2019

193. धर्मयुद्ध- वेदप्रकाश शर्मा

एक युद्ध आधारित रोमांचक उपन्यास
धर्मयुद्ध- वेदप्रकाश शर्मा, जासूसी उपन्यास

वह धर्मयुद्ध था। जो मानवता और सैन्य प्रशासन के मध्य लड़ा गया। वह युद्ध जिसके लिए क्रांतिकारी अपनी जान‌पर खेल गये। सत्य और असत्य का युद्ध ।

वेदप्रकाश शर्मा जी के आरम्भिक उपन्यास पूर्णतः एक्शन उपन्यास होते थे। जिनके नायक 'विजय-विकास होते थे।
धर्मयुद्ध भी एक ऐसा ही एक्शन प्रधान उपन्यास है। यह कहानी है 'मजलिस्तान' नामक देश की, जिस पर कुछ बड़े देश अपना अधिकार जमाना चाहते हैं। कुछ अपने होकर कुछ दुश्मन होकर।

मजलिस्तान एक छोटा सा देश है। वहाँ के राष्ट्रपति है सादात। देश की आंतरिक दशा ठीक न होने पर मजलिस्तान को एक अन्य देश 'सेमिनार' की सैन्य मदद लेनी पड़ती है।
...कोई भी बड़ा मुल्क किसी भी छोटे मुल्क का दोस्त नहीं हो सकता,....—हां, अपना उल्लू सीधा करने के लिए दोस्ती का मुखौटा जरूर चढ़ा सकता है। और सेमिनार ने अपना उल्लू सीधाा किया।
एक दिन मजलिस्तान का सैन्य जनरल इबलीस सेमिनार सेना के साथ मिलकर विद्रोह कर देता और राष्ट्रपति भवन पर आक्रमण कर देता है।
राष्ट्रपति भवन के अन्दर कोहराम-सा मचा हुआ था—बाहर निरन्तर गनों की गर्जना एवं टैंकों की हुंकार गूंज रही थी—इंसानी चीखो-पुकार का बाजार गर्म था।
ऐसा महसूस हो रहा था जैसे राष्ट्रपति भवन के आस-पास का क्षेत्र एकाएक ही किसी युद्धस्थल में बदल गया हो—बाहर आग बरस रही थी—इंसानी चीखें गूंज रही थीं।
प्रलय-सी आ गई थी।
हर तरफ चीखो-पुकार, हाहाकार, कोहराम और मारकाट।
एक ही मुल्क की सेना दो हिस्सों में बंटकर युद्ध करने लगी थी। एक हिस्से का प्रयास राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लेना था और दूसरे का उसकी हिफाजत करना।

      अब मजलिस्तान पर अन्य देश की सेना का कब्जा है और जनता पर अत्याचार होते हैं। लेकिन देश की जनता इसके खिलाफ मोर्चा लेती है। और एक संस्था 'रक्त तिलक' का जन्म होता है।
   

"सच्चाई ये है किसी मजलिस्तान की जनता की आवाज और आरजुओं का गला घोंटा जा रहा है। उन पर मनमाने जुल्म किए जा रहे हैं। सच्चाई ये है कि इस मुल्क को गुलाम बना लिया गया है—मुल्क पर हुकूमत करने वाला इबलीस, कर्नल तोम्बो और गार्जियन की कठपुतली है—सेमिनार नाम के बड़े मुल्क ने मजलिस्तान पर अपना कब्जा कर लिया है—इबलीस ने सेमिनार की शर्तें स्वीकार की थीं, उनके मुताबिक मजलिस्तान में सेमिनार के लड़ाकू हवाई अड्डे—नौसैनिक अड्डे और छावनियों की स्थापना की जा रही है—सच्चाई वही है—यह कि एक बार फिर वही हुआ है जैसा इतिहास के मुताबिक हमेशा ही सम्पन्न देश अपने छोटे मित्र देश के साथ करते रहे हैं।


         'रक्त तिलक' मजलिस्तान के देशभक युवाओं की एक संस्था जो अपने देश से विदेशी शासन से मुक्त देखना चाहती है।
           रक्त तिलक भारतीय डाक्टर भसीन का अपहरण कर लेती है। ताकी प्रशासन पर दवाब बनाया जा सके। डाक्टर भसीन को रक्त तिलक से मुक्त करवाने भारत से जासूस डबल एक्स फाईव यानि के विकास मेमिनार आता है।
पहली टक्कर में ही रक्त तिलक भी स्वीकार कर लेता है की विकास में दम है। "लोग इसे शेर का बच्चा कहते हैं, ....और आज के टकराव के बाद मैंने जाना कि डबल एक्स फाइव वाकई शेर के बच्चे का नाम है।"

              मजलिस्तान के सैन्य प्रशासन को सीधी धमकी मिलती है।- दुनिया के लिए मेरा सन्देश खत्म—और अब वे सुनें जिन्होंने इस मुल्क को गुलाम बना रखा है—हां—मैं तुम्हीं से कह रहा हूं गद्दार इबलीस—कर्नल तोम्बो—गार्जियन और यदि सेमिनार सुन रहा है तो वह भी कान खोलकर सुन ले—..... इस मुल्क की जनता पर हुए एक-एक जुल्म का हिसाब लेगा—इस मुल्क के आवाम को गुलाम बनाने के तुम्हारे जुर्म की सजा देने के लिए आया हूं मैं।

लेकिन परिस्थितियों जल्द ही बदल जाती हैं। विजय और अलफांसे भी मैदान में आ जाते हैं। एक तरफ मजलिस्तान के विद्रोही हैं एक तरफ मजलिस्तान के शासक हैं। विजय और विकास की टक्कर है तो वहीं अंतरराष्ट्रीय अपराधी अलफांसे भी अपने गुल खिला रहा है।
क्या रहस्य है इनके पीछे, क्यों टकरा जाते हैं सभी आपस में।
- क्या मजलिस्तान स्वतंत्र हो पाया?
- रक्त तिलक से विकास डाक्टर को आजाद करवा सका?
- रक्त तिलक और विकास की जंग का परिणाम क्या निकला?
- इन सबके बीच अलफांसे का क्या काम था?
- आखिर क्यों विजय और विकास एक दूसरे से टकरा बैठे?
- करनल इबलीस, तोम्बो और गार्जियन का क्या हुआ?


इन प्रश्नों के उत्तर तो वेदप्रकाश शर्मा जी के उपन्यास 'धर्मयुद्ध' में ही मिलेंगे।


उपन्यास में विकास का रौद्र रुप वर्णित है। 'रक्त तिलक' के सदस्य इशाक के साथ उसका वीभत्स व्यवहार बहुत बुरा लगता है।
             विजय की भूमिका एक हास्य के रूप में आरम्भ होती है। बहुत से उपन्यासों में देखा गया है की विजय की 'बकवास' वास्तव में अपठनीय होती है लेकिन इस उपन्यास में विजय का इबलीस, तोम्बो आदि के साथ वार्तालाप पाठक के चेहरे पर मुस्कान ला देता है।
                 राष्ट्रपति सादात की पुत्री मुमताज का करैक्टर बहुत अच्छा और मन को छू लेने वाला है। यह पठनीय है की एक राष्ट्रपति की बेटी अपने दुश्मनों से कैसे टकराती है।
               अलफांसे, बस नाम ही काफी है। लूमड़- यह एक ऐसी चिड़िया का नाम है, जो जिस खेत में चाहें दाना चुग लेती है।
उपन्यास में अलफांसे उर्फ लूमड की उपस्थित उपन्यास को और भी रोचक बना देती है।
     उपन्यास में वर्णित 'बख्तरबंद वैन' का वर्णन अविस्मरणीय है। एक ऐसी वैन जो काल का दूसरा नाम है। किस वैन की उपन्यास में जबरदस्त भूमिका है।

अगर आप वेदप्रकाश शर्मा के विजय- विकास सीरिज के पाठक हैं तो यह उपन्यास आपका भरपूर मनोरंजन करेगा।

निष्कर्ष-
अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर लिखा तेज -रफ्तार एक थ्रिलर उपन्यास है। उपन्यास में जहाँ एक तरफ विकास का खतरनाक रूप सामने है वहीं विजय की बुद्धि।
गुरु-शिष्य की टक्कर और अलफांसे की चालाकी से भरा यह उपन्यास पठनीय है।
उपन्यास- धर्मयुद्ध
लेखक-  वेदप्रकाश  
शर्मा
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स-मेरठ

192. रोबोटोपिया- संदीप अग्रवाल

मनुष्य और रोबोट की अदभुत कहानियाँ
रोबोटोपिया- संदीप अग्रवाल

नये प्रकाशक fly Dreams के अंतर्गत लेखक संदीप अग्रवाल जी का कहानी संग्रह 'रोबोटोपिया' एक टैग लाइन 'निकट भविष्य की कहानियाँ' के शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ। कहानी संग्रह पढते वक्त आप स्वयं महसूस करेंगे की ये सब कहानियां भविष्य में सत्य साबित हो सकती हैं। 

     "सवाल यह नहीं है कि रोजिना के साथ बलात्कार किया जा सकता है या नहीं? सवाल यह है कि विक्रम ने जो किया वह बलात्कार था या नहीं? उसने रोजिना के साथ जो किया, वह उसकी मर्जी के खिलाफ था।.........और इसे बह सजा मिलनी चाहिए जो कानून ने एक रेपिस्ट के लिए मुकर्रर की है।" (किताब अंश)
ध्यान दें, रोजिना एक रोबोट है।
क्या एक रोबोट से बलात्कार संभव है?
क्या उसके लिए सजा दी जा सकती है?
मनुष्य और रोबोट के ऐसे संबधों को उजागर करती है 'रोबोटोपिया'। 


विकसित होती प्रौद्योगिकी एक दिन इस स्तर पर आ जायेगी की‌ मनुष्य और रोबोट में अंतर खत्म हो जायेगा। मनुष्य और रोबोट का यह मिलन भविष्य में सही होगा या गलत यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन‌ दोनों के मिलन को लेकर जो कहानियाँ रची गयी है वह आप वर्तमान में भी पढ सकते हैं।
यहाँ कुछ कहानियों की चर्चा करेंगे बाकी कहानियाँ आप 'रोबोटोपिया' कहानी संग्रह में‌ पढे यकीनन ये कहानियाँ आपको पसंद आयेगी।
इस संग्रह में कुल नौ कहानियाँ है। हम कुछ कहानियों पर यथासंभव चर्चा करते हैं।
 

Sunday, 26 May 2019

191. कुआं- ब्रजेश कुमार

एक दहशत की घटना- कुआं
       वह कुआं एक श्राप था, ऐसी मान्यता थी कि एक राजा ने वो कुआं तब बनवाया था, जब वो ये फैसला लेने को तैयार हुआ कि सजाए मौत से बढकर किसी को कोई सजा दी जा सकती है।
कुआं...जो एक रहस्य था....कहते हैं वो कुआं क्रूरता का एक सूचक था। एक ऐसा कुआं, जहाँ मौत भी दुहाई मांगती थी। शायद वो एक प्रतीक था हैवानियत का। जहाँ कैदियों सजा के नाम पर मौत से भी बढकर सजा दी जाती थी। ऐसा भी माना जाता था है कि आजतक वहाँ से कोई बचकर कभी नहीं निकला। समय के साथ-साथ उसके आसपास बना बीहड़ और वो कुआं रहस्यमयी और हैवानियत का घर बनता गया। कहा जाता है, ये उन कैदियों की आत्माएं हैं, जिन्हें उस कुएं में फेंका गया था और जिन्हें मौत तो मिली मुक्ति नहीं।


दो दोस्त अजय और सतीश अपने गाँव जाते हैं। रास्ते में एक कुआं है। अजय उस कुएं पर चला जाता है और वहीं से कुछ खौफनाक घटनाओं का आरम्भ हो जाता है।
एक दोस्त के शरीर में प्रविष्ट शैतानी आत्मा अपना प्रतिशोध लेना चाहती है।
- कुएं का राज क्या था?
- आत्मा किससे प्रतिशोध लेना चाहती थी?
- कौन था असली गुनहगार?
- अजय और सतीश का क्या हुआ?

आदि प्रश्नों के लिए 'कुआं' नामक किताब पढनी होगी। जो की हाॅरर श्रेणी की कथा है।



देखा जाये तो 'कुआं' कोई कहानी नहीं है, यह मात्र एक घटना का विवरण मात्र है। जैसे अखबार/ मौखिक किसी से कोई हम घटना पढते/ सुनते हैं। कुआं उसी तरह की एक घटना प्रधान कथा मात्र है। इस कथा का आरम्भ अवश्य होता है लेकिन कोई अंत नहीं कहा जा सकता।

    कथा का आरम्भ बहुत रोचक तरीके से होता है लेकिन अंत नहीं। एक अधूरापन सा छोड़ कर कहानी 'अतार्किक' रूप से खत्म हो जाती है और पाठक ठगा सा रह जाता है।
लेखक/प्रकाशक चाहते तो इस कहानी को एक क्लाईमैक्स तक ले जा सकते थे।

किताब में शाब्दिक गलतियाँ बहुत है। मेरे पास fly dreams publication की पांच किताबे हैं और सभी में शाब्दिक गलतियाँ देखने को मिलती हैं। इस तरफ ध्यान देना आवश्यक है। कुछ उदाहरण देखें
थुक (पृष्ठ-12), दुसरे(पृष्ठ-16), "...तो ये साच है।" (पृष्ठ-42)
"तब पण्डित जी, कहां है लड़का?" (पृष्ठ-23)
(अब पण्डित... होना था।)
"रुको अभी आरती होने तक नहीं करना है कुछ।" (पृष्ठ-23)
"कमरे में पंखे के आवाज..." (पृष्ठ-26)

मेरे विचार से 49 पृष्ठ की किताब पर 75₹ खर्च करना उचित नहीं है।

लघु उपन्यास- कुआं
लेखक- ब्रजेश कुमार
संस्करण- ‌‌ सितंबर- 2018
पृष्ठ- 49
मूल्य- ‌‌‌‌ 75₹
प्रकाशक- FlyDream Publication, Patna
Email- teamflydreams@gmail.com

190. छोटू- अरुण गौड़

कुछ संवेदनशील कहानियाँ
छोटू- अरुण गौड़

फ्लाईड्रिम्स पब्लिकेशन पटना द्वारा प्रकाशित 'छोटू' अरुण गौड़ जी का एक 'छोटा' सा कहानी संग्रह है। कहानी संग्रह चाहे छोटा है लेकिन कहानियों की संवेदना का फलक विस्तृत है।

इस संग्रह में कुल चार कहानियाँ है और चारों कहानियाँ ही बच्चों से संबंधित है। कहानियों के पात्र चाहे बच्चे हैं लेकिन कहानियों में व्याप्त भाव सभी सहृदय को प्रभावित करने में सक्षम है।

1. गुलामी का पट्टा
              इस संग्रह की प्रथम कहानी, एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण मजदूरी करने को विवश हो जाता है।
        कथा का मुख्य पात्र किशन बिहार के एक गाँव में एक चौधरी के खेत पर काम करता है। चौधरी मजदूरों का शोषण करता है और उन्हें बंधुआ मजदूर की तरह रखता है।
ज्वर पीडित किशन के मन में इस बंधन से मुक्त होने की इच्छा है।
    किशन अपनी मुक्ति के लिए क्या प्रयास करता है, वह जैसे आजाद होता है। यह सब रोचक है। एक छोटे से बच्चा का शोषण और उसकी कोमल भावनाओं को खत्म करने वाला चौधरी। फिर भी किशन के मन में स्वतंत्रता की उमंग है। 

189. तिलिस्मी खजाना- नृपेन्द्र शर्मा

अर्जुन -पण्डित का रोमांचक सफर
तिलिस्मी खजाना- नृपेन्द्र शर्मा
Fly Dream Publication
द्वारा कुछ अत्यंत रोचक किताबों की श्रृंखला जारी की गयी है। मैंने इन दिनों प्रकाशन की पांच किताबे सतत पढी, और सभी मेरे को अच्छी लगी।
रोबोटोपिया - संदीप अग्रवाल
तिलस्मी खजाना- नृपेन्द्र शर्मा
कुआं- ब्रजेश गौड
छोटू - अरुण गोड़
भूतिया हवेली- मनमोहन भाटिया

          पांचों किताबों हाॅरर, फैंटेसी, इलैक्टोनिक युग और मानवीय संवदेना जैसे विषयों पर आधारित हैं।
अब बात करते हैं नृपेन्द्र शर्मा के उपन्यास 'तिलस्मी खजाना' की। सबसे पहले उपन्यास के अंतिम आवरण पृष्ठ पर उपन्यास के बारे में जो जानकारी दी गयी है वह पढ लेते हैं।

बंद खण्डहर के दरवाजों में, तिलस्मी खजाना कर रहा है, सदियों से इंतजार।
आखिर क्या है रहस्य, खण्डहर में बिखरे नर कंकालों का?
और किसको बुला रही हैं खण्डहर से आती आवाजें?
दो वीर युवक 'अर्जुन- पण्डित' निकल पड़े हैं तिलस्मी खजाने की तलाश में।
क्या परियों का नृत्य देखने के बाद, वो उनके मायाजाल से बच पायेंगे?
और क्या राह में आने वाली मुसीबतों से लड़ पायेंगे?
और क्या भेद पायेंगे अपने बल और बुद्धि से खजाने का तिलिस्म का रहस्य....?
जानने के लिए पढें 'अर्जुन-पण्डित' की तिलिस्म, युद्ध और मोहब्बत की दास्ताँ -'तिलिस्मी खजाना'। 

Tuesday, 21 May 2019

188. हर मोड़ पर हत्या- जोरावर सिंह वर्मा

एक वहशी अपराधी की कथा।
हर मोड़ पर हत्या- जोरावर सिंह वर्मा, जासूसी उपन्यास

पत्रकार मनीष शहर के अमीर सेठ चेतन की पुत्री मोना से प्यार करता था। दोनों अक्सर स्विमिंग पूल पर मिलते थे। एक दिन स्विमिंग पूल से मोना गायब हो गयी।
जब इंस्पेक्टर सुधीर और जासूस 'ओ हिन्द' इस रहस्यपूर्ण केस को सुलझाने निकले तो उन्हें हर मोड़ पर लाश नजर आने लगी।
        जोरावर सिंह वर्मा का मेरे द्वारा पढे जाने वाला यह प्रथम उपन्यास है। उपन्यास आकार में चाहे लघु है लेकिन कथा रोचक और दिलचस्प है। कहानी प्रथम पृष्ठ से ही रोचक बन जाती है और सतत् रोचक बरकरार रहती है।
           उपन्यास की कथा सेठ चेतन की पुत्री मोना के अपहरण/गायब होने से आरम्भ होती है। सेठ का अनुमान है की उसकी पुत्री को खूंखार अपराधी चीतल उठा कर ले गया। मुझे लगता है यह काम भयानक अपराधी चीतल का है। (पृष्ठ-16)
           होटल 'स्काई लार्क' एक तरह से अपराधीवर्ग का ठिकाना है। एक पार्टी के दौरान होटल मालकिन कमला की हत्या हो जाती है वहीं एक सेठ आत्महत्या कर लेता है।
इंस्पेक्टर सुधीर और जासूस 'ओ हिन्द' अभी मोना के केस का रहस्य भी न खोल पाये थे और ये दो हत्यायें केस को और उलझा देती हैं।

Saturday, 18 May 2019

187. काली आँखों वाली बिल्ली- चन्द्रेश

एक खतरनाक बिल्ली का कारनामा
जासूसी उपन्यास

        जासूसी उपन्यासकार चन्द्रेश का नाम मेरे लिए नया ही है, इस से पहले उनका कभी नाम नहीं सुना। इनका एक उपन्यास 'काली आँखों वाली बिल्ली' उपलब्ध हुआ। उपन्यास का शीर्षक भी स्वयं में रोचक है तो सहज ही पढने की इच्छा बलवती हो उठती है।
                कुछ माह पूर्व कैप्टन देवेश नामक लेखक का एक उपन्यास 'काली बिल्ली वाला' पढा था वह काफी रोचक और दिलचस्प था। उतना ही रोचक यह उपन्यास भी है।
बात करें प्रस्तुत उपन्यास की तो यह एक जासूसी उपन्यास है जिसका नायक मोहन है, मेजर मोहन। मेजर मोहन भारतीय खूफिया विभाग में कार्यरत एक जासूस है। हालांकि यहाँ भी एक मिशन पर कार्यरत है लेकिन उपन्यास में उसका साधारण व्यक्तित्व ज्यादा दर्शाया गया है। मोहन...गरीबों का हमदर्द।
मोहन को विभाग की तरफ से एक सूचना मिलती है की उसके पास कभी भी कविता नामक एक स्त्री का फोन आ सकता है और उसे कविता की मदद करनी है। एक दिन यह सच हो जाता है। मोहन के पास फोन आता है।
"हल्लो''- उसने रिसीवर उठा लिया।
''मिस्टर मोहन हैं?''- दूसरी और से बेहद दिलकश नारी अंदाज में पूछा गया।
मोहन चौंका, फिर संभलकर बोला- "मैं मोहन बोल रहा हूँ । कहिए...."
............
"काम फोन पर नहीं बताया जा सकता है। लेकिन यह समझ लीजिए कि मामला बहुत गंभीर है।"
"आप कहां से बोल रही हैं?"
"मैजिस्टिक होटल से।"- नारी स्वर में इस बार व्यग्रता थी।
(पृष्ठ-15)

Sunday, 21 April 2019

186. अगिया बेताल- परशुराम शर्मा

 प्रतिशोध की भयानक कथा

       अगिया बेताल एक हाॅरर श्रेणी का उपन्यास है। यह एक ऐसे युवक की कहानी है जो अपने बाप की मौत का बदला लेने के लिए स्वयं निकृष्ट कोटि का इंसान बन जाता है और वह भी उस बाप का बदला जिससे वह युवक जरा सा भी प्रेम नहीं करता था। लेकिन प्रतिशोध मनुष्य को मनुष्य भी नहीं रहने देता।
           परशुराम शर्मा हिन्दी लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के एक वह स्तंभ हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से उपन्यास साहित्य पर अपना गहरा प्रभाव कायम रहा है। जासूसी उपन्यासों के अतिरिक्त परशुराम शर्मा जी ने 'हारर' श्रेणी के भी उपन्यास लिखे हैं।
अगिया बेतान परशुराम शर्मा जी का एक हाॅरर उपन्यास है, जो अगिया बेताल नामक एक प्रेत पर आधारित है। शर्मा जी ने अपने एक साक्षात्कार में बताया था की उन्होंने एक अगिया बेताल जैसी घटना स्वयं देखी थी।

          उपन्यास का नायक रोहताश एक डाॅक्टर है। वह बचपन से ही अपने चाचा के पास रहता है, क्योंकि उसे अपने पिता के कार्य से घृणा है। रोहताश का पिता 'साधु नाथ' एक तांत्रिक है। साधु नाथ तंत्र-मंत्र द्वारा सिद्धियाँ प्राप्त करना चाहता है। अपने पिता की मृत्यु पर वह कहता है- एक बुराई का अंत हो चुका था। सवेरे मेरे पिता की चिता शमशान घाट पर लग गई।
           रोहताश को जब अपने पिता के मरने की खबर मिलती है तो वह अपने पिता का अंतिम संस्कार करने गाँव जाता है। रास्ते में उसे अगिया बेताल जैसी घटना के दर्शन होते हैं। गाँव में रोहताश से भी कम उम्र की उसकी सौतेली माँ होती है। लेकिन गाँव में उसके कुछ दुश्मन पहले से ही तैयार बैठे हैं। वहीं रोहतास को पता चलता है की उसकी पिता की मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी।- मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पिता की मृत्यु स्वाभाविक मौत नहीं है, उसके पीछे कोई न कोई भेद अवश्य है। न जाने कौन सी बात मस्तिष्क में खटक रही थी।

- रोहताश अपने पिता से इतनी दूरी क्यों बना कर रखता है?
- साधु नाथ की हत्या किसने की?
- क्या था अगिया बेताल?
- रोहताश की सौतेली माँ कौन थी?
- आखिर कैसे डाक्टर रोहताश इन शैतानी ताकतों से टकरा पाया?

              एक तरफ डाॅक्टर रोहताश है जो भूत-प्रेत पर विश्वास नहीं करता तो दूसरी तरफ उसका पिता इन तांत्रिक सिद्धियों के कारण ही जाना जाता था।
एक तरफ डॉक्टर रोहताश है तो दूसरी तरफ गढी (एक जगह, गढ या किला) के लोग है जो तांत्रिक सिद्धियों से गढी की रक्षा करने में यकीन रखते हैं। लेकिन बदली परिस्थितियों में स्वयं रोहताश भी तांत्रिक सिद्धियों का ज्ञाता बन जाता है और वह प्रतिशोध के रास्ते पर निकल पड़ता है। उसकी मददगार बनती है उसकी सौतेली माँ।
रोहताश का एक ही दुश्मन है- ठाकुर प्रताप जिसकी मैंने शक्ल भी नहीं देखी, क्या वह इतनी बड़ी ताकत है कि जिसकी चाहे जिंदगी उजाड़ दे।
मेरे सीने में बगावत थी।
मैं इसका बदला लूंगा।
बदला...।


यही से रोहताश का प्रतिशोध आरम्भ होता है। स्वयं रोहताश भी कहता है।
मेरा प्रतिशोध शुरू हो गया था। अब मैं कातिल था... क़ानून की निगाह में मुजरिम... पर समय कभी लौट कर नहीं आता। मेरे भीतर का मनुष्य तो कभी का मिट चुका था, अब मैं सिर्फ दरिंदा था, जिसके दिल में दया नाम की कोई वस्तु नहीं होती।

              यह उपन्यास प्रथम‌ पुरुष में है। कथानायक रोहताश स्वयं अपनी कहानी बताता है। इसलिए यह सहज ही पता चल जाता है की कथानायक को कुछ नहीं होगा।
प्रथम पुरुष में कथा होने के कारण कुछ प्रसंग जो की रोचक हो सकते थे लेकिन बन नहीं पाये क्योंकि स्वयं नायक चंद शब्दों में बात को समाप्त कर देता है।

           मूलतः देखे तो यह उपन्यास रोहताश पर आधारित है न की अगिया बेताल पर। अगिया बेताल तो रोहताश का सहायक मात्र है और कई कगह पर तो वह स्वयं भी निष्क्रिय है।
उपन्यास की कहानी चाहे बदला प्रधान है लेकिन बदला पूर्ण होने पर भी कथा आगे जारी रहती है। अगर उपन्यास रोहताश के प्रतिशोध तक रहती तो ज्यादा अच्छा रहता क्योंकि बाद में उपन्यास का अंदाज बदल जाता है और वह मात्र रोहताश के जीवन पर आधारित हो जाती है।

उपन्यास के कुछ अंश उपन्यास को वीभत्स बना देते हैं। जैसे रोहताश का अपनी सौतेली माँ के प्रति व्यवहार।

निष्कर्ष-
परशुराम शर्मा जी द्वारा लिखा गया 'अगिया बेताल' नामक उपन्यास एक डरावनी कथा है। यह एक बदला प्रधान कहानी है, कैसे एक युवक तांत्रिक विधियों का जानकार होकर अपने दुश्मनों से प्रतिशोध लेता है।
यह दिलचस्प और पठनीय रचना है जो कहीं भी पाठक को निराश नहीं करेगी।

उपन्यास-  अगिया बेताल
लेखक-     परशुराम शर्मा
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स- मुंबई
मूल्य-
अमेजन लिंक-    अगिया बेताल
परशुराम शर्मा जी का साक्षात्कार-   youtube link interview
परशुराम जी के अन्य उपन्यास - चिनगारियों का नाच
अगिया बेताल- परशुराम शर्मा

।“जब आदमी का उद्देश्य एक ही रह जाता है और उसका जिन्दगी से कोई मोह नहीं रह जाता तो वह खुली किताब की तरह पढ़ा जा सकता
---

185. हारा हुआ जुआरी- अनिल सलूजा

यार राघव को बचाने निकला बलराज गोगिया...

          अपने साठ लाख लेकर वह जम्मू जा रहा था। जहां उसका यार राघव था। उसकी प्रेमिका सुनीता थी। (पृष्ठ-08)
         जम्मू तवी एक्सप्रेस ट्रेन में सफर करते वक्त बलराज गोगिया के सामने कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनी की उसे साठ लाख रूपये किसी को देने पड़ गये लेकिन साथ ही उसे दस करोड़ रूपये लूट का आॅफर भी मिल गया।

          अनिल सलूजा जी का एक पात्र है बलराज गोगिया। बलराज गोगिया एक डकैत है,‌ लेकिन ईमानदार भी। बस कुछ परिस्थितियाँ उसे गलत राह पर ले गयी। इस बार भी उसके साथ कुछ ऐसे हालात बने की उसे एक डकैती में शामिल होना पड़ा।

               बलराज गोगिया का मित्र है राघव। राघव की टांग में जहर फैल जाने से डाॅक्टरों ने राघव की टांग काट दी। उस टांग को पुन: जुड़वाने के लिए बलराज गोगिया को रुपयों की आवश्यकता थी।
जैसा की उपन्यास के उपर लिखा है यार की जिंदगी बचाने के अभियान पर निकले बलराज गोगिया का एक और कारनामा.... इससे यह तो स्पष्ट होता है की अपने मित्र राघव के लिए बलराज ने कुछ डकैतियां अवश्य की है। 'हारा हुआ जुआरी' के बाद जो अनिल सलूजा का उपन्यास है उसका शीर्षक है 'राघव की वापसी' अर्थात राघव का इलाज सफल रहा।
             अपने बात कर रहे थे प्रस्तुत उपन्यास 'हारा हुआ जुआरी' की। साठ लाख रुपयों के साथ जम्मूतवी ट्रेन में सफर करते हुए कुछ परिस्थितियों के चलते बलराज गोगिया को वह रुपये करनाल (हरियाणा) में किसी को देने पड़ गये।
                  मनोज, रहीम, संजय और राकेश साहू चार ऐसे पात्र हैं जो एक बैंक की वैन को लूटना चाहते हैं लेकिन यह लूट उनके लिए संभव नहीं। एक योजना के तहत वे चारों बलराज गोगिया को इस लूट में शामिल करते हैं। बलराज गोगिया भी स्वयं के बारे में यही कहता है- मैं‌ तो जमाने का का ठुकराया हुआ एक ऐसा इंसान हूँ- जिसकी जिंदगी उस कुत्ते की तरह है- जिसका कोई वली वारिस नहीं। सुकून की तलाश में भटकता हुआ मैं जब भी किसी जगह आराम करता हूँ तो कोई न कोई मेरी पीठ पर लात मारकर मेरे को किसी न किसी के पीछे लगने को मजबूर कर देता है।(पृष्ठ-264)

- बलराज गोगिया ने साठ लाख रुपये किसे व क्यों दे दिये?
- ट्रेन दुर्घटना क्या थी?
- चारों मित्रों ने बलराज गोगिया को लूट में कैसे शामिल किया?
- क्या बलराज गोगिया बैं‌क की वैन लूट पाया?
-आखिर लूट में कौन सफल रहा?
- क्या हुआ राघव का?


यह उपन्यास पूर्णतः डकैती पर आधारित है। आखिर कैसे एक सुरक्षाबद्ध वैन को बिना किसी हंगामें के लूट लिया जाता है।

उपन्यास के जैसे जैसे आगे बढती है तो कुछ नये किरदार जुड़ते चले जाये हैं। और हर किसी की नजर होती है दस करोड़ की दौलत पर। यह वह दौलत ही क्या जो इतनी आसानी से मिल जाये। 
यही से आरम्भ होता है घात और विश्वासघात का सिलसिला। दस करोड़ जैसी बड़ी रकम पर बहुत से लूटेरे नजर टिकाये बैठ हैं।
अब देखना यह है की इस करोड़ों के खेल में किसे रुपये मिले और किसे मौत।


          बलराज गोगिया चाहे एक डकैत हो लेकिन वह साफ हृदय का इंसान है।‌ उसके विचार ही उसके व्यक्तित्व को परिभाषित करते हैं। राखी को भी वह कहता है- औरत के लिए मेरे दिल में उतनी ही इज्जत है जितनी एक इज्जतदार आदमी के दिल में होनी चाहिए। (पृष्ठ-81)

वहीं माला भी बलराज गोगिया के चरित्र की प्रशंसा करती हुयी कहती है।- जिसने मेरे से कोई रिश्ता न होने के बावजूद साठ लाख सिर्फ इसलिए मुझे दे दिये कि मेरी गोद सूनी न हो....जबकि वो साठ लाख वो अपने भाई के इलाज के लिए ले जा रहा था। (पृष्ठ-252)

पूरे हिन्दुस्तान के अंडरवर्ल्ड का सबसे बड़ा ऐसा डाॅन....जो सबसे शरीफ डाॅन माना जाता है और सबसे खतरनाक भी माना जाता है।

                      उपन्यास के आरम्भ में यह दिखाया गया है की जम्मूतवी एक्सप्रेस ट्रेन की पटरियों को कुछ बदमाश खोल देते हैं। वहीं बाद में यह पता चलता है की आतंकवादी ट्रेन में विस्फोट कर देते हैं।
उपन्यास में यह कहीं क्लियर ही नहीं होता की ट्रेन की पटरियों को खोलने वाले कौन थे। हालांकि उक्त दोनों दृश्यों का उपन्यास के बाकी अंश से कोई संबंध नहीं है।

- ट्रेन के बाहर से, खिड़की से कोई बलराज गोगिया का साठ लाख रुपयों से भरा बैग उठाने की कोशिश करता है।
- बलराज गोगिया भी ट्रेन की खिड़की से बाहर सिर निकाल कर उसे देखता है।
यह ट्रेन में संभव नहीं है, जब तक की आप आपातकालीन खिड़की के पास नहीं बैठ हों और खिड़की खुली न हो।
बलराज गोगिया जैसा शातिर खिड़की खुली छोड़ दे ये संभव नहीं।

निष्कर्ष-
‌         अनिल सलूजा द्वारा रचित 'हारा हुआ जुआरी' बलराज गोगिया सीरिज का एक डकैती पर आधारित उपन्यास है। यह एक सामान्य कहानी है कहीं कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ती। हां, यह भी है की कहानी कहीं से आपको निराश नहीं होने देगी।
उपन्यास एक बार पढा जा सकता है।


उपन्यास- हारा हुआ जुआरी
लेखक-   अनिल सलूजा
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- ‌‌‌‌‌        317



#बलराज गोगिया सीरिज
अनिल सलूजा के अन्य उपन्यास
कृष्ण बना कंस- अनिल सलूजा

Wednesday, 17 April 2019

184. कवि बौड़म डकैतों के चंगुल में- अरविन्द कुमार साहू

कवि फंस गये डकैतों के चंगुल में...
बाल उपन्यास, अरविन्द कुमार साहू


अरविन्द कुमार साहू द्वारा लिखित 'कवि बौड़म डकैतों के चंगुल में' एक बाल उपन्यास है। यह एक ऐसे कवि की कथा है जो अपनी बेतुकी कविताओं से सभी को परेशान करता है।


उन दिनों डकैतों के मामले में चम्बल घाटी अपने चरम पर थी और बकैतों के मामले में कवि बौड़म अपने चरम पर था
। (पृष्ठ-13)
             एक तरफ कवि की कविताओं से जनता परेशान है और दूसरी तरफ डकैत से। कवि जहाँ सिर्फ रुपये लेना जनाता है तो डाकू सिर्फ रुपये लूटना जानते हैं। एक बार डकैतों से कवि बौडम का अपहरण कर लिया। कवि सिर्फ रुपया लेना जानता था और डकैत कवि से रुपया लूटना चाहते थे।
अब कवि सफल हुआ या डकैत यही उपन्यास का मूल है। यहीं से उपन्यास में रोचकता पैदा होती है। जैसे -जैसे कथा आगे बढती है वैसे -वैसे हास्य रस पैदा होता जाता है और डकैत तथा कवि की हास्य वार्ता भी।

अब देखना यह है की क्या डाकू खूंखार सिंह कवि बौड़म से फिरौती की रकम‌ वसूल पाया और कवि बौडम ने अपनी बेतुकी कविताएँ सुना-सुना कर डाकुओं का क्या हाल किया।

कवि बौड़म की एक कविता भी देख लीजिएगा ।
वह बकैत है, लेकिन चतुर व होशियार है
किसी भी परिस्थिति से निपटने से निपटने को तैयार है।
उसकी कविता ही उसकी उसका हथियार है
जो भी उससे पंगा लेगा, उसका बंटाधार है।

              उपन्यास एक हास्य कथा है लेकिन पढते समय ऐसा कम ही अहसास होता है की यह एक हास्य कथा है। कवि बौड़म की जो हास्य व अटपटी कविताएँ हैं वह भी कोई विशेष प्रभाव नहीं जमा पाती।
उपन्यास पढते वक्त मुझे 'बालहंस' पत्रिका के 'कवि आहत' बहुत याद आये। कवि आहत की कविताओं से लोग इतना परेशान होते थे की वे अपना सिर धुनने लगते थे, पर कवि आहत की तीन-चार पंक्तियों की कविताएँ वास्तव में रोचक होती थी। हालांकि कवि आहत और कवि बौड़म की तुलना मेरा उद्देश्य नहीं है। पर उपन्यास की नीरसता ने कवि आहत की याद दिला दी।
                आरम्भिक पृष्ठों से तो ऐसा लगता है जैसे उपन्यास को अनावश्यक विस्तार दिया गया हो। उपन्यास आरम्भ में सामान्य सी बातों को ज्यादा विस्तार देकर उपन्यास के पृष्ठ बढाने जैसी कोशिश लगती है।
यह एक बाल उपन्यास है तो हो सकता है बाल पाठकों को रूचिकर लगे। लेकिन अनावश्यक विस्तार वहाँ भी खटकेगा।

उपन्यास पात्र-
कवि बौड़म- उपन्यास नायक, एक कवि।
खूंखार सिंह- एक खतरनाक डाकू
जोहार सिंह- खूंखार सिंह का मुख्य साथी
सेंघमरवा- एक डाकू
चोरवा - एक डाकू

निष्कर्ष-
           यह एक बाल उपन्यास है। एक हास्य कवि कैसे डकैतों के चंगुल से स्वयं को आजाद करवाता है। दोनों के मध्य उत्पन्न हास्य पाठक को कुछ हद तक प्रभावित करता है।
बच्चों के लिए एक बार पठनीय रचना है।

उपन्यास- कवि बौड़म डकैतों के चंगुल में
लेखक-  अरविन्द कुमार साहू
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स
पृष्ठ-
मूल्य- 80₹


183. एक करोड़ का जूता- सुरेन्द्र मोहन पाठक

किस्सा एक करोड़ के जूते का।
एक करोड़ का जूता- सुरेन्द्र मोहन पाठक

        सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के थ्रिलर उपन्यास मेरी विशेष पसंद हैं। यह उपन्यास तो अपने नाम से ही बहुत रोचक है।
एक बार उपन्यास के बारे में चर्चा कर लेते हैं। प्रस्तुत कथन इतना प्रभावशाली है की पाठक उपन्यास पढे बिना नहीं रह सकता।
"सत्तरह साल से, हर साल, बिना नागा आपको जन्म दिन पर दो हजार रूपये का मनीआॅर्डर हासिल हो रहा है?"
"जी हाँ"
"अपने पिता की तरफ से?"
"जी हाँ"
"अपने उस पिता की तरफ से जो की सत्तरह साल से गायब है?"
"जी हां।"
"ऐसा पहला मनी आॅर्डर आपको कब हासिल हुआ?"
"दस नवम्बर 1967 को। मेरी ग्यारहवीं वर्षगांठ पर। मेरे डैडी के गायब होने के बाद वह मेरी पहली वर्षगांठ थी।" (पृष्ठ-06-07)

       उक्त संवाद सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के उपन्यास 'एक करोड़ का जूता' से हैं। उपन्यास की कहानी एक ऐसे शख्स की है जो सत्तरह साल से गायब है लेकिन उसके एकमात्र वारिस उसके पुत्र के जन्मदिन गायब बाप की तरफ से एक मनीआॅर्डर अवश्य आता है।