Tuesday, 25 June 2019

209. स्वेटर- अशोक जमनानी

मर्मस्पर्शी कहानियों का संग्रह- स्वेटर
स्वेटर- अशोक जमनानी, कहानी संग्रह

साहित्यकार अशोक जमनानी जी का कहानी संग्रह 'स्वेटर' पढने को मिला यह एक रोचक और मर्मस्पर्शी कहानियों का संग्रह है।

      इस संग्रह में वे कहानियाँ हैं, जिन्हें आकाशवाणी भोपाल ने पिछले कुछ वर्षों में प्रसारित किया है। मेरे विचार से इसी कारण इस संग्रह की कहानियों में एक सरलता है।

        अशोक जमनामी का कहानी संग्रह स्वेटर कुछ रोचक और मर्म स्पर्शी कहानियों का संग्रह है। कहानियों की जो खुशबू है वह हल्की सी है जो आपके हृदय को एक शांति प्रदान करती है। कहानियों में कहीं भी जबरदस्त पैदा किया गया यथार्थवाद नहीं है, ओढी गयी गंभीरता नहीं है। जो कुछ भी इन कहानियों में व्यक्त है वह बहुत सहज और सरल है। वहीं लिखा गया है जो सामान्य समाज का एक अंग है।
      इस संग्रह में कुल पन्द्रह कहानियाँ है।
       इस संग्रह की प्रथम कहानी है 'स्वेटर' जो यह दर्शाने में कामयाब रही है की हम किसी घटना की वास्तविक जाने बिना अपने-अपने दृष्टिकोण से उसकी व्याख्या आरम्भ कर देते हैं।
जैसे अमोल ने स्वेटर पहना तो सभी ने अपने -अपने अनुमान लगाने आरम्भ कर दिये। यह कहानी हमारे दृष्टिकोण को एक नया आयाम देती है, हमारी पूर्वधारणाओं को त्यागने का संदेश भी देती है।

Saturday, 15 June 2019

208. असाधारण नायक ओमपुरी- नंदिता सी. पुरी

 असाधारण नायक की जीवन कथा।
ओमपुरी की जीवनी

फिल्म अभिनेता ओम पुरी की जीवनी 'असाधारण नायक ओमपुरी' उनकी द्वितीय पत्नी नंदिता सी. पुरी द्वारा लिखित है। जिसमें ओमपुरी के जीवन के एक-एक भाग को बहुत रोचक और दिलचस्प तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
ओम पुरी के बचपन के कठिन संघर्षों से लेकर उनके सफल जीवन का स्पष्ट और बेबाक चित्रण इस जीवन में उपलब्ध है।
हरियाणा के अंबाला शहर से संबंध रखने वाले ओमपुरी जी का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। जहां गरीबी का साम्राज्य स्थापित था। ओमपुरी का जीवन चाय ढाबे पर, कोयला बीनने और मजदूरी करते बीता है।
ओमपुरी के जीवनी में एक बात स्पष्ट होती है वह है उनका संघर्ष और हार न मानना। वे किसी भी परिस्थिति में घबराये नहीं।
ओम की एक ट्रेजडी यह भी रही की न तो वे नायक की तरह लगते थे और न ही खलनायक की तरह और उस पर भी उनका चेहरा भी दागदार था। जो छोटी उम्र में ही चेचक के कारण हो गया।

Tuesday, 11 June 2019

207. बंदर की करामात- सुरेन्द्र मोहन पाठक

बंदर का खतरनाक मनोरंजक कारनामा
बंदर की करामात- सुरेन्द्र मोहन पाठक, उपन्यास
सुनील और जुगल किशोर सीरिज

सुनील सीरिज का 17 वां उपन्यास
समाचार पत्र ब्लास्ट के रिपोर्टर सुनील के मित्र जुगल किशोर उर्फ बन्दर ने रोमांच अनुभव प्राप्त करने के लिये एक ऐसे बखेड़े में टांग फंसा डाली थी जो कि ऊपर से देखने में तो साधारण सा लगता था। लेकिन बन्दर की इस करामात के चक्कर में पड़ कर ऐसी स्थिति पैदा हो गई कि सुनील को लगा जैसे उसके और बंदर के गले में फांसी का फंदा पड़ने वाला है। ( उपन्यास के आवरण पृष्ठ से)
बंदर की करामात- सुरेन्द्र मोहन पाठकनी
सुनील चक्रवर्ती 'ब्लास्ट' नामक समाचार पत्र का रिपोर्टर है। और बंदर उसका दोस्त। भला बंदर भी कोई नाम हुआ? बंदर का वास्तविक नाम जुगल किशोर था...लेकिन हर कोई उसे बंदर ही कहता था। 

206. हाँगकाँग के लूटेरे- सुरेन्द्र मोहन पाठक

हाँगकाँग की धरती पर ड्रग्स माफिया से टक्कर।
हाँगकाँग के लूटेरे- सुरेन्द्र मोहन पाठक
सुनील सीरिज-15

      रमेश कपूर हाँगकाँग के ड्रग्स धंधे में शामिल था। उसने वहाँ 'तिन-हा' से शादी कर ली। एक कार एक्सीडेंट में रमेश कपूर की मृत्यु हो जाती है। रमेश की अंतिम‌ इच्छा के अनुसार 'तिन-हा' उसके शव को भारत लाना चाहती है। इसके लिए सी. आई. बी. (सेन्ट्रल इंटलीजेंस ब्यूरो) की एक विशेष शाखा 'स्पेशल इन्टलीजेंस' के डायरेक्टर कर्नल मुखर्जी उसकी मदद करते हैं।
तिन-हा एक अमेरिकन मददगार मैक्सन के साथ मुखर्जी की कोठी पहुंचती है और वहाँ उसकी हत्या कर दी जाती है।
स्पेशल इन्टलीजेंस के डायरेक्टर की कोठी पर हत्या।
- क्या रहस्य था रमेश कपूर का?
- कर्नल मुखर्जी जी उसकी मदद क्यों कर रहे थे?
- कर्नल मुखर्जी की कोठी पर आखिर हत्या कैसे हो गयी?
- कौन थे हत्यारे?
- आखिर रहस्य  क्या था? 

Monday, 10 June 2019

205. मरी हुई औरत- सजल कुशवाहा

एक सनसनीखेज मर्डर मिस्ट्री
एक मरी हुई औरत- सजल कुशवाहा
 कुशवाहा कांत के भ्राता जयंत कुशवाहा के ज्येष्ठ पुत्र का उपन्यास।

बहत्तर घण्टों में तीन हत्याएं, एक आत्महत्या, यह रहस्योद्घाटन कि पांच बरस पहले कपिल कुमार की मौत का वास्तविक कारण आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या थी। वह घटनाएँ सामने आ चुकी थी और समस्त हत्याओं के लिए जिम्मेदारी व्यक्ति.... अभी तक पुलिस की पकड़ में नहीं आ सका। (पृष्ठ-123)
      तो ये बात है उपन्यास 'मरी हुई औरत' की। जिसके मरने की खबर ने ऐसा हंगामा बरपाया की शहर हादसों का शहर हो गया। शहर में हत्याओं का दौर शुरु हो गया।
    तो आखिर ऐसा क्या था एक मरी हुई औरत में? इस प्रश्न का उत्तर तो खैर उपन्यास पढने पर ही मिलेगा।

Thursday, 6 June 2019

204. रेड अलर्ट- प्रभात रंजन

विज्ञान के विकास की विनाश की कहानी
रेड अलर्ट- प्रभात रंजन, उपन्यास

प्रभात रंजन का उपन्यास 'रेड अलर्ट' मानव विकास कि उस स्थित का वर्णन करता है जिस पर मनुष्य को गर्व है, लेकिन वह विकास उसके लिए घातक है। प्रकृति को क्षति पहुंचा कर किया गया विकास तो विनाश है।


विश्व इतिहास में 06, 09 अगस्त 1945 का दिन अविस्मरणीय दिन है, यह एक काला दिन है जिसने मानवता को नष्ट करने का प्रयास किया है।
06.8.1945 को हिरोशिमा पर व 09 अगस्त को नागासाकी पर अमेरिका ने एटम बम गिरा कर अपनी हैवानियत का परिचय दिया था। इस विध्वंस से उपजी त्रासदी आज भी अमिट है।

इस कहानी के पात्र चाहे भारतीय हैं लेकिन इस कहानी का मूल वैश्विक है। मनुष्य जो घातक हथियार निर्माण कर रहा है उसके परिणाम संपूर्ण सृष्टि को भुगतना होगा।

          कहानी भारत से आरम्भ होकर जापान-अमेरिका से गुजरते हुए द्वितीय विश्व युद्ध की वीभित्सा का चित्रण करती है। मानव ने आज जो विज्ञान के दम पर विकास किया है, जिस विकास पर उसे गर्व है वह वास्तव में मनुष्य को विनाश की तरफ ले जा रहा है।
            विश्व के राष्ट्रों में हथियार, विकास और भौतिकता की जो अंधी दौड़ है वह सृष्टि को विनाश की तरफ ले जा रही है।
मनुष्य में प्रेम, सहयोग और संवेदनाएं खत्म हो रही है। नफरत, प्रतिस्पर्धा और अति महत्वाकांक्षा बढ रही है। इस दौड़ का कहीं कोई अंत नहीं है।
उपन्यास पात्र देवर्षि भी यही कहते हैं।- ‘‘.. सच्चाई ये है कि परमाणु बम से भी खतरनाक है-मनुष्य की आत्मघाती सोच।"
लेकिन इसके बीच में कहीं न कहीं मानवता के दर्शन हो जाते हैं। उसी मानवता की कहानी है 'रेड अलर्ट'।
रेड अलर्ट- प्रभात रंजन

203. विधवा का पति- वेदप्रकाश शर्मा

क्या कोई विधवा का पति हो सकता है?
विधवा का पति- वेदप्रकाश शर्मा, उपन्यास

'विधवा का पति' उपन्यास का शीर्षक जितना आश्चर्यचकित करने वाला है उतना ही आश्चर्यजनक उपन्यास की कहानी है। एक ऐसी कहानी जहाँ पाठक बार-बार चौंकता हैं, जहाँ पाठक का मस्तिष्क रुक सा जाता है की आखिर यह क्या हो रहा है। और जो हो रहा उसे पढकर तो पाठक वेद जी की लेखनी का मुरीद बन जाता है।

  यह कहानी एक सिकंदर की,...अरे...अरे...नहीं... नहीं ...यह कहानी तो जाॅनी की है....अरे यार फिर गलती हो गयी....यह कहानी तो सर्वेश की है...क्या....क्या कहा...यह कहानी उसकी भी नहीं, तो फिर यह कहानी किसकी है....कुछ भी पता नहीं। हां, यह बात ठीक है... जैसे उपन्यास नायक को भी कुछ पता नहीं की वह 'कौन' है। ठीक वैसे ही यह कहानी है।

एक युवक है, जो की 'विधवा का पति' उपन्यास का नायक। उससे खुद की पहचान गायब हो जाती है और कुछ लोग उस पर अपना हक जताते हैं।
एक पिता उसे अपना बेटा कहता है।
एक लड़की उसे अपना पति कहती है।
एक बच्चा उसे अपना पिता कहता है।
पुलिस उसे 'विधवा का पति' कहती है।
और स्वयं वह असमंजस में है की आखिर वह कौन है?
युवक स्वयं के बारे में यही सोचता है।


यह सच्चाई है कि मैं खुद को नहीं जानता—मेरा नाम क्या है, मैं कौन हूं…क्या हूं—ऐसे किसी भी सवाल का जवाब खुद मुझे नहीं मालूम है—दुनिया का कोई भी दूसरा आदमी शायद मेरी उलझन, कसमसाहट और विवशता को नहीं समझ सकेगा—स्वयं आपने किसी ऐसे आदमी की मानसिकता की कल्पना की है, जो खुद ही अपने लिए एक पहेली हो—जो खुद ही इनवेस्टिगेशन करके यह पता लगाने की कोशिश कर रहा हो कि वह कौन है? शायद मेरी कसमसाहट को कोई नहीं समझ सकेगा जी, क्योंकि मैं खुद ही वह आदमी हूं।"


           उस युवक की परिस्थितियाँ कुछ और ही रंग लेती हैं। जैसे किसी खूबसूरत युवती को देखकर उसके मन में बस एक ही ख्याल आता है।
       बड़े ही विस्फोटक ढंग से युवक के दिमाग में विचार टकराया कि—'अगर वह .... की गर्दन दबा दे तो क्या होगा।'
वह मर जाएगी।
युवक पर जुनून सवार होने लगा।
एकाएक ही वह सोचने लगा कि यदि .... के जिस्म से सारे कपड़े उतार दिए जाएं तो यह बहुत खूबसूरत लगेगी।
उसके दिलो-दिमाग में बैठा कोई चीखा—उतार दे—'इसके जिस्म से कपड़े का एक-एक रेशा नोंचकर फेंक दे—गर्दन दबा दे इसकी—मार डाल—फर्श पर पड़ी इसकी निर्वस्त्र लाश बहुत सुन्दर लगेगी।'

- कौन था वह युवक?
- क्या था उसका रहस्य?
- क्या था उसका असली नाम?
- कैसे उसने अपनी पहचान खो दी?
- क्यों उसे हर कोई अपना कहता था?
- क्यों उस युवक के मन में युवतियों को मारने के विचार आते थे?
- आखिर वह 'एक विधवा का पति' कैसे था?


'विधवा का पति' एक ऐसे युवक की कहानी है जो स्वयं की पहचान खो चुका है और लोग जो उसे पहचान दे रहे हैं वह स्वयं उससे संतुष्ट नहीं। क्योंकि अलग-अलग लोग उसे अलग-अलग पहचान दे रहे हैं। और एक दिन वह स्वयं अपनी पहचान की तलाआ में निकल पड़ता। इस तलाश में उसके साथ ऐसे ऐसे हादसे पेश आते हैं की वह स्वयं अचंभित हो उठता है। हर कोई उस पर अपना हक जताता है।
         कहानी मकड़ी के जाले सी उलझी हुयी है। हर किरदार एक नयी कहानी के साथ पेआ होता है और उस युवक पर अपना हक जताता। दूसरी तरफ युवक स्वयं नयी-नयी पहचान से परेशान है।
            तीन इंस्पेक्टर हैं जो युवक की तीन अलग-अलग पहचान के कारण एकत्र होते हैं, उन्हें कहानी कुछ और ही नजर आती है। इनमें एक इंस्पेक्टर है चटर्जी जी।‌ जिसे उलझे हुए मामले सुलझाने में बहुत आनंद आता है। वह स्वयं के बारे में कहता है।- ये पुलिस की आंखें हैं—एक बार जिसे देख लेती हैं, वह दोबारा इंसान के स्थान पर अगर जानवर बनकर भी सामने आए तो तुरन्त पहचान लेती हैं।"
            उपन्यास की कहानी बहुत रोचक है। पाठक को पृष्ठ दर पृष्ठ एक नया रोमांच मिलता है।‌ सोचा भी नहीं जा सकता ऐसे स्तर पर जाकर कहानी कुछ नया रंग ले लेती है।

उपन्यास के कुछ कथन जो मुझे रोचक लगे। एक उदाहरण देखें-
सच ही कहा है किसी ने—अपने प्राण हर व्यक्ति को हर कीमत से कहीं ज्यादा प्यारे होते हैं…अगर किसी को यह पता लग जाए कि सारी दुनिया में आग लगाने से उसके अपने प्राण बच सकते हैं तो वह सारी दुनिया को जलाकर राख करने में एक पल के लिए भी नहीं हिचकेगा।


         उपन्यास में एक युवक का की हत्या होती है लेकिन पता नहीं क्यों पुलिस उसका पोस्टमार्टम नहीं करती।
"....जहर देकर मारा गया था, क्या पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से यह बात छुपी रह सकी होगी?"
“उनका पोस्टमार्टम ही नहीं हुआ था।"

कुछ दृश्य उपन्यास में बहुत रोचक हैं। वैसे वेद जी जहां सस्पेंश क्रियेट करते हैं वहाँ का दृश्य वास्तव में प्रशंसनीय बन जाता है। इस उपन्यास में भी एक ऐसा दृश्य है जहाँ पाठक स्तम्भित सा रह जाता है।
वह दृश्य एक बिल्ली के माध्यम से दर्शाया गया है। वैसे वेद जी सस्पेंश के मामले में बादशाह हैं। यह दृश्य तो पाठक के रोंगटे खड़े करने वाला वै।
वेद जी की लेखनी से निकला एक जबरदस्त उपन्यास ।

निष्कर्ष-
‌‌‌‌ रहस्य की पर्तों में लिपटा यह उपन्यास हर पृष्ठ पर एक नया सस्पेंश लिये है। अपनी पहचान ढूंढने निकले युवक की रहस्य से भरी जीवनगाथा।
रहस्य और रोमांच से भरा यह उपन्यास पाठक का भरपूर मनोरंजन करने में सक्षम है। उपन्यास पठनीय है। अवश्य पढें।

उपन्यास- विधवा का पति
लेखक -  वेदप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स

Wednesday, 5 June 2019

202. आदमखोर- अनिल सलूजा

अंडरवर्ल्ड गैंगवार की कहानी
आदमखोर- अनिल सलूजा, उपन्यास
भेड़िया सीरिज

अनिल सलूजा जी का एक खतरनाक पात्र है 'भेड़िया'। धर्मराज से शाप प्राप्त, हवस का भूखा, दौलत का दीवाना और खून का प्यासा।
आदमखोर उपन्यास इसी भेड़िया सीरिज की है। उस उपन्यास को पढने का कारण यही था की 'भेड़िया सीरिज' का कोई उपन्यास पढना था।

      यह उपन्यास अंडरवर्ल्ड की गैंगवार पर आधारित है। कालिया पठान अंडरवर्ल्ड का बादशाह है। काली दुनियां पर उसका राज है। पिछले बीस वर्ष से वह दिल्ली अंडरवर्ल्ड
का बेताज बादशाह बना हुआ था। (पृष्ठ -17)
        मकबूल हुसैन और काली सिंह भी अंडरवर्ल्ड के उभरते हुए बदमाश हैं। अब एक शहर में तीन बदमाश तो रह नहीं सकते। काली सिंह और मकबूल हुसैन दोनों एक समझौते के तहत एक साथ हो जाते हैं और कालिया पठान के काले सम्राज्य पर कब्जा करना चाहते हैं। दोनों में गैंगवार चालू है।

201. काली रोशनी- निरंजन चौधरी

काली रोशनी के खतरनाक पुजारी।
काली रोशनी- निरंजन चौधरी, जासूसी उपन्यास

जासूसी उपन्यास जगत में निरंजन चौधरी का विशिष्ट नाम है। उनके लिखे उपन्यास आज भी पाठकों में महत्व रखते हैं। मुझे निरंजन चौधरी के तीन उपन्यास 'काली रोशनी, अंधेरे का तीर और तलाश हत्यारे की' मिले।
अब बात करते हैं उपन्यास 'काली रोशनी' की। यह एक जासूसी उपन्यास है जो बहुत ही रोचक है।

उपन्यास की कहानी कुछ ऐसे लोगों पर आधारित है जो काली रोशनी के पुजारी हैं। उनकी वारदातें शहर में भय का वातावरण बना देती हैं। शहर से बच्चों का अपहरण और उनका का वीभत्स तरीके से कत्ल होना।

एस.पी.होमीसाइड निरंजन ठाकुर के पास यह केस आता है की शहर से कुछ बच्चे गायब हो रहे हैं।
शहर में बच्चों के अपहरण की घटनाएं बढ रही थी। पुलिस की तमाम सरगर्मियों के बावजूद अपहरण की घटनाएं जारी थी और पुलिस विभाग की बौखलाहट बढती जा रही थी।
        ठाकुर साहब जासूस सम्राट नागपाल की मदद लेते हैं और नागपाल अपने साथी कैप्टन दिलीप और सिगार उसमानी के साथ इस अभियान पर निकल पड़ते हैं।

200. हम फरिश्ते नहीं- धरम राकेश

अंतर्द्वंद की कहानी
हम फरिश्ते नहीं- धरम राकेश, उपन्यास

अपने समय के चर्चित लेखक द्वय 'धरम-राकेश' का उपन्यास 'हम फरिश्ते नहीं', इन दिनों पढा।
किशोरावस्था में 'धरम-राकेश जी' का उपन्यास 'नये जमाने की बहू' पढा था। उस उपन्यास के बाद इस जोड़ी को पढने की इच्छा जागृत हुयी थी। उस उपन्यास का एक पात्र 'नानक चंद सिक्का' अविस्मरणीय है। किसी महिला द्वारा डकैती को अंजाम देना, मेरे विचार से पहला प्रयोग धरम राकेश जी का ही रहा है।
दीर्घकाल पश्चात आबिद रिजवी जी के माध्यम से राकेश जी से संपर्क हुआ। उन्होंने कुछ उपन्यास पुन:प्रकाशन का आश्वासन भी दिया।
अब बात करते हैं उपन्यास 'हम फरिश्ते नहीं' की। यह एक पारिवारिक उपन्यास है। जो भावनाओं, संवेदनाओं की चादर में लिपटा मार्मिक उपन्यास है।

Sunday, 2 June 2019

199. बाबुल की गलियां- कुमार प्रिय

बाबुल की गलियों में पले मेरा प्यार...
बाबुल की गलियां- कुमार प्रिय, उपन्यास

   कुमार प्रिय का नाम तो बहुत बार सुना है लेकिन उनका उपन्यास पहली बार पढने को मिला है। कुमार प्रिय के उपन्यास रोमांटिक होते थे इसी कारण से इन्हें 'दूसरा गुलशन नंदा' भी कहा जाता था।
प्रस्तुत उपन्यास भी प्रेम के संयोग और वियोग को आधार बना कर लिखा गया एक भावुक उपन्यास है।

चंदर डाक्टर की डिग्री लेकर घर लौटता है तो घर पर उसकी शादी की चर्चा होती है। चंदर को यह पसंद नहीं की बचपन में गाँव की जिस लड़की से उसकी जो सगाई हुयी थी वह उससे शादी करे।
"....क्या तुम अपने डाॅक्टर बेटे का ब्याह उस देहाती और गंवार घराने की अनपढ लड़की से करोगी?"
(पृष्ठ-16)
चंदर घर छोड़ कर एक दोस्त के साथ राजापुर गांव चला जाता है। वहाँ उसे कांता से प्यार हो जाता है। कांता भी एक देहाती लड़की है।
         परिस्थितियाँ कांता के पक्ष में ना थी। कांता के जीवन में तो दुख ही था। इसलिए कांता अपने दर्द को गा लेती थी।
'बाबुल की गलियों में पले मेरा प्यार....
बाबुल की गलियों में बसे मेरा मी.....त' (पृष्ठ-129)

यह उपन्यास का मूल है सारी कहानी इस विषय पर आधारित है लेकिन कहानी में छोटे-छोटे घुमाव हैं जो कहानी को रोचक और पठनीय बनाते हैं।
- क्या चंदर कांता से शादी कर पाया?
- चंदर के माता-पिता ने जब देहाती लड़की से रिश्ता तय किया तो चंदर क्यों नहीं माना?
- क्या कांता का पिता इस शादी के लिए राजी हो पाया?
- आखिर कांता और चंदर की जिंदगी में प्रेम था वियोग?

     यह सब तो इस उपन्यास को पढकर ही जाना जा सकता है। लेकिन यह तय है की यह उपन्यास पाठक को निराश नहीं करेगी।
उपन्यास में स्वयं लेखक कुमार प्रिय भी उपस्थित हैं। यह भी काफी रोचक है।
मुझे प्रेम कथाएँ पसंद नहीं है, लेकिन एक तो कुमार प्रिय को पढना था दूसरा कहानी छोटी थी मात्र 131 पृष्ठों की। उपन्यास पढना आरम्भ किया तो एक बैठक में ही पढ दिया क्योंकि इसकी कथा वास्तव में रोचक है, मन को छू लेने वाली है।

निष्कर्ष-

कुमार प्रिय द्वारा रचित 'बाबुल की गलियां' एक प्रेमपरक उपन्यास है। प्रेम के संयोग और वियोग का चित्रण पाठक को भावुक करने में सक्षम है।
लघु कलेवर का यह उपन्यास पठनीय है।

उपन्यास- बाबुल की गलियाँ
लेखक-   कुमार प्रिय
प्रकाशक- रंगभूमि कार्यालय
प्रकाशन वर्ष- जनवरी,1973
पृष्ठ- 132
मूल्य- 02 ₹ (तात्कालिक)

198. रात गवाह है- किश्वर देसाई

तेरह लोगों के सामूहिक हत्याकाण्ड की कहानी।
रात गवाह है- किश्वर देसाई, उपन्यास

         इस अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त रचना के शीर्षक ने ही मुझे आकृष्ट कर लिया था। और वहीं पढने की इच्छा ने उपन्यास को मेरे पुस्तकालय में वृद्धि कर दी‌। समयाभाव के चलते उपन्यास पठन में देरी हो गयी।
यह उपन्यास भारतीय समाज में पुत्र मोह और पुत्री को बोझ समझने जैसी विचारधारा को एक नाबालिग के दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।
उपन्यास के आवरण पृष्ठ पर लिखित कुछ अंश पढें।
       यह उपन्यास एक चौदह साल की लड़की दुर्गा के जीवन का सजीव चित्रण है। दुर्गा पंजाब के एक बड़े- से घर में अकेली पाई गयी। खामोश, डरी हुई और परिवार के तेरह सदस्यों के सामूहिक हत्याकांड की एकमात्र संदिग्ध आरोपी। हर कोई मानता है कि सामूहिक हत्याकाण्ड जो अंजाम तक दुर्गा ने ही पहुंचाया, लेकिन सिमरन को इस पर विश्वास नहीं। सिमरन जो शराब की लत में डूबी और लगातार सिगरेट फूंकने वाली दिल्ली की समाजसेविका है, जिसका मानना है कि दुर्गा संदिग्ध से ज्यादा पीड़ित है।

सिमरन रहस्य से पर्दा उठाने की कोशिश करती है कि सामूहिक हत्याकाण्ड की उस रात को वाक ई क्या हुआ था? वह दुर्गा के पास जाती है तथा जालंधर और यहाँ के लोगों के बीच वह बेचैन महसूस करती है। उनमें दुर्गा के रहस्यमय टयूटर हरप्रीत सर, उसकी कुरूप पत्नी, उच्चवर्गीय अमरिंदर कौर, तथा उसका पति रामनाथ शामिल हैं।
जिस अन्याय और विभिन्न रहस्यों से उसका वास्ता पड़ता है, वह उसे भीतर तक झकझोर कर रख देता है और सिमरन ठान लेती है कि जब तक पूरा सच नहीं जान लेगी, चैन से नहीं बैठेगी।
डर से कंपा देने वाला यह पहला उपन्यास है जो परम्पराओं में बंधे भारत की विसंगत और दारूण परिस्थितियों को उद्घाटित करता है।


- क्या एक चौदह साल की लड़की एक कुकृत्य कर सकती है?
- क्या वजह रही होगी इस काण्ड के पीछे?
- दुर्गा क्यों खामोश थी?
- कौन थे असली हत्यारे?


197. मैं नास्तिक क्यों हूँ- भगत सिंह

भगत सिंह के कुछ विचार
मैं नास्तिक क्यों हूँ- भगत सिंह

           भगत सिंह न केवल भारत के महानतम देशभक्त तथा क्रांतिकारी समाजवादियों में से एक थे, बल्कि भारत के प्रारंभिक मार्क्सवादी विचारकों में भी उनका प्रमुख स्थान था।

        प्रस्तुत पुस्तक 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम भाग में भगत सिंह द्वारा जेल में लिख गये 'नास्तिकता' पर विचार है। द्वितीय भाग में उ‌नके क्रांतिकारी मित्र लाला रामसरनदास जी की पुस्तक 'द ड्रिमलैण्ड' की भूमिका है। जो भगत सिंह ने लिखी थी।

          ये दोनों आलेख भगत सिंह की तीक्ष्ण बुद्धि, गहन अध्ययन, जटिल विषयों पर उनकी समझ व उन्हें आम लोगों की समझ के अनुरूप भाषा में व्यक्त करने की क्षमता को दर्शाते हैं।


भगत सिंह एक क्रांतिकारी ही नहीं बल्कि उच्च कोटि के विचारक भी रहे हैं। 'मैं नास्तिक क्यों हूँ।' में उनके ईश्वर के प्रति विचार व्यक्त हैं। भगत सिंह का पारिवारिक वातावरण धार्मिक था लेकिन भगत सिंह की चिंतन शक्ति ने उन्हें एक नया रास्ता दिखाया।
            प्रस्तुत पुस्तक में वे विभिन्न उदाहरणों द्वारा अपने नास्तिक होने के विचार को सिद्ध करते हैं। उनके तर्क अकाट्य हैं।
भगत सिंह कहते है की जब ईश्वर ने इस सृष्टि का निर्माण किया है तो इस पर सृष्टि में इतना दुख क्यों है।
- मेरा सवाल है उसने यह दुनिया बनाई ही क्यों है, जो साक्षात नर्क है।
         स्वयं भगत सिंह इस प्रश्न का उत्तर देते हैं, की यह सृष्टि ईश्वर द्वारा निर्मित नहीं है। वे कहते हैं- सृष्टि का निर्माण को ईश्वरीय कृपा नहीं है यह तो स्वयं निर्मित है, यह तो प्राकृतिक घटना है।

         वर्तमान में लोग भगत सिंह के 'FAN' कहलाने में गर्व महसूस करते हैं लेकिन वे भी भगत सिंह के विचारों को पढना नहीं चाहते। भगत सिंह कहते है- अध्ययन करो। स्वयं को विरोधियों के तर्कों का सामना करने लायक बनाने के लिए अध्ययन करो।

     ‌वहीं क्रांति के प्रति विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं की- क्रांति की तलवार विचारों के सान पर ही पैनी होती है।
वही एक क्रांतिकारी की की विशेषता का वर्णन करते हुए लिखते हैं-
आलोचना और स्वतंत्र चिंतन एक क्रांतिकारी की दो अनिवार्य विशेषताएँ हैं।


पुस्तक के द्वितीय खण्ड में क्रांतिकारी मित्र लाला रामसरन दास जी की पुस्तक 'द ड्रिमलैण्ड' की भूमिका भगत सिंह ने लिखी है।
क्रांति के संदर्भ में लिखते हैं- क्रांति में, मौजूदा हालात (यानी सत्ता) को पूरी तरह से ध्वस्त करने के बाद, एक नये और बेहतर स्वीकृति आधार पर समाज के सुव्यवस्थित पुनर्निर्माण का कार्यक्रम अनिवार्य रूप से अंतर्निहित रहता है।
वहीं लाला रामसरन दास यह भी अपने काव्य द्वारा यह भी स्पष्ट करते हैं की क्रांतिकारी विनाश में सुख अनुभव करने वाले राक्षस नहीं होते।
वे लिखते हैं।
अगर जरूरत हो, ऊपर से उग्र बनो
लेकिन रहो हमेशा नरम अपने दिल में
अगर जरूरत हो, तो फुफकारो पर डसो मत
दिल में प्यार को जिंदा रखो और लड़ते रहो ऊपरी तौर पर।।


        इस पुस्तक की प्रस्तावना और भूमिका NBT के अध्यक्ष विपिन चन्द्र जी ने लिखी है। जो की कम शब्दों में भगत सिंह के विचारों को व्यक्त करने में सक्षम है।

अगर आप भगत सिंह को समझना चाहते हैं, उनके ईश्वर के प्रति विचारों को पढना चाहते हैं तो यह छोटी पुस्तक आपके लिए उपयोगी होगी।

पुस्तक-   मैं नास्तिक क्यों हूँ
लेखक -   भगत सिंह
पृष्ठ-       29
मूल्य-     40₹
प्रकाशक- राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत (NBT)
एमेजन लिंक- मैं नास्तिक क्यों हूँ