Monday, 12 March 2018

102. दस बजकर दस मिनट- अरुण सागर

कत्ल की अनोखी साजिश
दस बजकर दस मिनट- अरुण सागर, जासूसी उपन्यास, मर्डर मिस्ट्री, पठनीय।
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विनोद कपूर राजधानी दिल्ली का नंबर वन गार्डन डिजायनर था। (पृष्ठ-07) और उसकी‌ पत्नी किरण कपूर एक प्रसिद्ध जासूसी उपन्यासकार। किरण के पास कोई अज्ञात एस. एस. नामक आदमी प्रेम पत्र भेजता है और कभी उसे जान से मारने की धमकी देता।
          विनोद कपूर इस समस्या का हल  ढूंढने के लिए क्राइम एक्सपर्ट सूरज खन्ना की मदद लेता है। जासूस- क्राइम एक्सपर्ट सूरज खन्ना जब विनोद कपूर की कोठी पहुंचता तब दस बजकर दस मिनट पर किरण कपूर की हत्या हो जाती है।
                                  सूरज खन्ना अभी इस मर्डर मिस्ट्री का हल नहीं ढूंढ पाता उधर सिरफिरा कातिल और भी कत्ल कर देता है।
          यह मर्डर मिस्ट्री बहुत उलझी हुयी है। जासूस सूरज खन्ना के लिए एक चुनौती है की कातिल उसकी उपस्थिति में कत्ल कर गया और उसे पता तक न चला और कत्ल भी इस अंदाज से की‌ पाठक चौंक जाये।
लेखक अपने लेखकिय में लिखता है - अपने प्रथम उपन्यास दस बजकर दस मिनट में मैं‌ मर्डर का एक ऐसा तरीका दिखा रहा हूं जो आपने तो किसी से सुना होगा और कहीं पढा होगा। इस उपन्यास में किरण कपूर का कत्ल तो गोली से, जहर से और किसी अन्य तरीके से हुआ। (लेखकीय पृष्ठ से) और वास्तव में लेखक ने यहाँ एक नया प्रयोग किया है। यह प्रयोग क्या है यह तो बस उपन्यास पढकर ही जाना जा सकता है।
 
    उपन्यास का आरम्भ बहुत ही रोचक ढंग से होता है। उपन्यास के आरम्भिक पृष्ठ ही पाठक को स्वयं में कैद करने में इतने सक्षम हैं की पाठक पूरा उपन्यास पढता चला जाता है।
कुछ रोचकता देखिएगा।
- किरण कपूर अपने विशेष मित्र सुरेश साहनी से अक्सर मिलती है।
- विनोद कपूर को किरण कपूर और सुरेश साहनी पर संदेश है।
- विनोद कपूर अपनी पर्सनल सक्रेटरी ज्योति पाठक को पसंद करता है।
- ज्योति पाठक एक अन्य युवक को पसंद करती है।
- वह अन्य युवक किरण कपूर को इमोशल ब्लैकमेल करता है।
- एक है डबल एस. (एस.एस.) जो किरण कपूर को एक तरफा प्यार करता है।
- एक है स्वीटी जो किरण को बचपन से ही प्यार करता है।
- सुरेश साहनी भी किरण को चाहता है और विनोद कपूर तो सुरेश साहनी से नफरत करता है।
          
 
उपन्यास में ऐसे कई रोचक प्रसंग हैं जो उपन्यास को रोचक बनाने में पूर्णतः सक्षम है।
            उपन्यास में रोचक प्रसंग ही नहीं बल्कि रोचक पात्र भी है। एक पात्र है स्वीटी और दूसरा पात्र है प्राणनाथ कपूर।
                        स्वीटी का उपन्यास में जब भी आगमन होता है वह हर बार एक नया रहस्य पैदा कर जाता है। कभी वह पागल लगता है, कभी प्रेमी, कभी हत्यारा और कभी सनकी। और एक बात और बात भी ये की वो बात भी बहुत करता है।
उपन्यास में प्राणनाथ का नाम खूब चर्चा में रहता है लेकिन वह स्वयं उपन्यास के अंतिम चरण में पाठक के समक्ष आता है। और जब वह सामने आता है तो स्वयं सूरज खन्ना के मुँह से एक ही बात निकलती है-  बाहर आकर उसने पांच मिनट तक गहरी- गहरी साँस ली और फिर बुदबुदा उठा- "क्या कैरेक्टर था यार।" (पृष्ठ209)
      उपन्यास के पात्र दमदार हैं तो कुछ संवाद भी पठनीय है।
" ....फिर भी औरत, औरत होती है और वो हमेशा पूजा के काबिल होती है।"(पृष्ठ-200)
" बुजदिल बार-बार मरते हैं। मौत से डरने वाला भला जिंदगी का आनंद क्या जाने।"(पृष्ठ-222)
गलतियाँ-
              किसी भी रचना में लेखक या मुद्रण के दौरान कुछ गलतियाँ रह जाना स्वाभाविक है। प्रस्तुत उपन्यास में एक दो जगह शाब्दिक गलतियाँ है। लेकिन ये गलतियाँ उपन्यास के प्रवाह को बाधित नहीं करती।
- जैसा हर फिल्म में शाहरुख खान का कैरेक्टर दिखाया गया था। (पृष्ठ-39)
   यहाँ हर की जगह डर शब्द आना था।
- "क्या नाम है उसका?"
  "किरण कौल"
  "ओह! तो किरण कपूर आपकी वाइफ है..।"(पृष्ठ-40)
यहाँ पहले किरण कौल लिखा और फिर किरण कपूर जबकि सही नाम किरण कपूर ही है‌।
- "विनोद भैया के डैडी। प्राणनाथ ....." कौल।..."(पृष्ठ-123)
यहाँ प्राणनाथ कपूर नाम आना था।
     उपन्यास के कुछ पृष्ठ इतने धुंधले हैं की पढने में भी परेशानी का सामना करना पङा।
   निष्कर्ष-     
                अरुण सागर का प्रस्तुत उपन्यास 'दस बजकर दस मिनट' एक जबरदस्त मर्डर मिस्ट्री है। जो की आरम्भ से अंत तक पाठक का भरपूर मनोरंजन करेगी, कातिल भी पाठक की आँखों के सामने होगा पर पाठक वहाँ तक पहुंच नहीं पायेगा और जब क्राइम एक्सपर्ट कातिल तक पहुंचता है तो पाठक भी चौंके बिना नहीं रह पाता।
        दस बजकर दस मिनट एक पठनीय उपन्यास है जो पाठक को किसी भी स्तर पर निराश नहीं करेगा।
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उपन्यास - दस बजकर दस मिनट
लेखक -   अरुण सागर
प्रकाशक-  शिवा पॉकेट बुक्स- मेरठ
वर्ष-       -
पृष्ठ        - 239
मूल्य      -
लेखक का पता-
   - अरुण आनंद
      540, G.H.-13
       पश्चिम विहार, नई दिल्ली- 110087
         

Tuesday, 6 March 2018

101. चालीसा का रहस्य- डाॅ. रुनझुन सक्सेना

हनुमान चालीसा और मर्डर मिस्ट्री का अनोखा संयोग।
चालीसा का रहस्य- रुनझुन सक्सेना, जासूसी उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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  लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में जहां परम्परागत आधार पर उपन्यास लेखन की अंधानुकरण परम्परा रही है, वहीं कुछ लेखकों ने नये प्रयोग भी किये हैं। हालांकि ऐसे प्रयोग बहुत कम देखने को मिलते हैं । ऐसा ही एक प्रयोग किया है डाॅ. रुनझुन सक्सेना शुभानंद ने अपने प्रथम उपन्यास 'चालीसा का रहस्य' में। 
      उपन्यास में हनुमान चालीसा को आधार बना कर कैसे एक रहस्य को सुलझाया जाता है यह वास्तव में पठनीय है। लेखिका का यह प्रयोग कामयाब भी रहा है। हनुमान चालीसा के छंदों को एक नये रूप में प्रस्तुत करना प्रशंसनीय कार्य है।
               डाॅ. अंजना एक मशहूर शोधकर्ता होने ले साथ -साथ एक सुशिक्षित प्रोफेसर एवं अत्यंत प्रतिभाशाली गाइड भी थी। (पृष्ठ-5) और एक दिन दिल का दौरा पङा और उसके कुछ दिन उनकी मृत्यु हो गयी। सभी को डाॅ. अंजना की मृत्यु संदिग्ध लगी।
      डाॅ. अंजना का एक सुयोग्य शिष्य संजीव जो की डाॅ. अंजना के सानिध्य में P.HD. कर रहा होता है। जब संजीव डाॅ. अंजना की मृत्यु के पश्चात अपने थीसिस के पेपर लेने अंजना के घर जाता है वहाँ से उसे एक रहस्यम बक्सा मिलता है और उस बक्से के साथ एक हनुमान चालीसा की छोटी सी पत्रिका।
       लेकिन न तो वह बक्सा कोई सामान्य था और न वह हनुमान चालीसा। वह कोई साधारण बक्सा न था। वह एक विशेष पद्धति से खुलने वाला एक बक्सा था। 
और जब वह बक्सा खुला तो कई रहस्य सामने आये।

- क्या डाॅ. अंजना की मृत्यु स्वाभाविक थी या अस्वाभाविक?
- क्या था उस बक्से में?
- वह बक्सा कैसे खुला? (उपन्यास का यह एक सस्पेंश भाग है)
- संजीव की थीसिस का क्या हुआ?
- डाॅ. अंजना के कातिल कौन थे?
- डाॅ. अंजना की हत्या क्यों हुयी, कैसे हुयी?
- हत्यारा कैसे पकङा गया?
- क्या रहस्य था हनुमान चालीसा में?
    ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों के उत्तर डाॅ. रुनझुन सक्सेना शुभानंद द्वारा लिखे गये उपन्यास 'हनुमान चालीसा' को पढकर ही‌ मिलेंगे।
         
          उपन्यास कई दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। जहाँ एक तरफ यह उपन्यास मर्डर मिस्ट्री है और उस मर्डर मिस्ट्री को हल करने वाले युवा हैं, वहीं उपन्यास में मेडिकल क्षेत्र की बहुत सी जानकारी भी उपन्यास में उपलब्ध है। इनके साथ-साथ हनुमान चालीसा की व्याख्या भी बहुत सुंदर ढंग से दी गयी।
           अगर बात सिर्फ हनुमान चालीसा की व्याख्या की करें तो यह व्याख्या मात्र धार्मिक दृष्टिकोण से न देकर आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दी गयी है। इसमें राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, रावण आदि को प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
उदाहरण देखें- "...नायक भगवान राम हैं। वह शरीर है, जो कि तुम हो।.....माँ सीता ' आत्मा' है जो तुम्हारे सुक्ष्म शरीर (Astral body) का प्राण है.........इसी तरह लक्ष्मण तुम्हारी 'चेतना' या यूँ कहो कि 'विवेक' और 'इच्छा शक्ति' का रूप है।..।" (पृष्ठ-45)
          इसी प्रकार हनुमान चालीसा भी एक सामान्य पत्रिका न होकर हमारे मन को जानने का एक रास्ता है।
- हनुमान चालीसा तुम्हे तुम्हारे अंतस को जानने का रास्ता दिखाती है और हमारे सभी प्रश्नों के उत्तर भी वहीं छिपे होते हैं। बस जरूरत  सिर्फ यह जानने की है कि कैसे कोई अपने अंतस को पहचानकर उसके भीतर गहरे में छिपे गूढ ज्ञान को जानकर सारे उत्तर ढूँढने में सफल हो सकता है।"-(पृष्ठ-42)

गलती-

Friday, 2 March 2018

100. आग का खेल- आरिफ मारहर्वी

एक छोटी सी मर्डर मिस्ट्री
आग का खेल- आरिफ मारहर्वी, मर्डर मिस्ट्री, औसत
उपन्यास
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      आरिफ माहरवी अपने समय के चर्चित उपन्यासकार रहे हैं। मैंने इस उप‌न्यास से पहले उ‌नका लिखा गया कोई भी उपन्यासोमनाथपढा।
  आग का खेल उनका लिखा गया एक छोटा सा परंतु रोचक उपन्यास है।
        
  सेठ सोमनाथ जो की शहर के एक प्रसिद्ध व्यवसायी है। एक रात उनके कमरे में आग लग जाती है और सेठ जी उस आग में जल कर मर जाते हैं।
                   CID के अफसर को यह मामला दिया जाता है और वे अपने विवेक से इस मर्डर मिस्ट्री को हल करते हैं। और अनंतः असली अपराधी को पकङ लेते हैं।
     उपन्यास की यही एक छोटी सी कहानी है और शेष उपन्यास इस पर केन्द्रित है। 
- सेठ सोमनाथ का हत्यारा कौन है?
- सेठ सोमनाथ की हत्या क्यों की गयी?
- हत्यारा कैसे पकङा गया।
                          उपन्यास में बार-बार कई पात्रों पर शक होता है की ये पात्र हत्यारा हो सकता है। और कभी ये अभी लगता है कहीं कोई गहरी साजिश तो नहीं।
          
     किसी भी मर्डर मिस्ट्री में तीन प्रश्न महत्वपूर्ण होते हैं (मृतक और हत्यारा, हत्या का कारण, हत्यारा कैसे पकङा गया) और कहानी इन्हीं पर ही आधारित होती है। आग का खेल उपन्यास में यही तीनों बाते संतुलन बना कर चलती हैं।
  
      हत्या होने के पश्चात पाठक के मन में सर्वप्रथम यही प्रश्न उठता है की हत्यारा कौन है। यहाँ भी सेठ सोमनाथ की हत्या के पश्चात् यही प्रश्न पूरे उपन्यास में घूमता है।
        और CID के होनहार सदस्य इरफान(उपन्यास में इर्फान लिखा है) और कैसर इस रहस्य को सुलझाते हैं।
  
  उपन्यास में दृश्य भी ज्यादा नहीं है। चार-पांच जगह से ज्यादा के दृश्य नहीं है।
सेठ सोमनाथ का घर, सोहन लाल का घर , होटल, CID का ऑफिस इत्यादि।
           उपन्यास के में एक लेखक दादर साहब के दृश्य को छोङकर कहीं भी ऐसा नहीं लगता के उपन्यास में कोई अनावश्यक विस्तार हो।  और उपन्यास का यही दृश्य हास्य उत्पन्न करने वाला है।
  "रोमांस तो लेखकों का भाग्य होता है बेगम...वह वास्तविक जीवन में नहीं तो उपन्यास के पन्नों में रोमांस लङाते हैं। बाल सफदे भी हो जायें तो भी ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे उपन्यास के हीरो हम ही हैं।" (पृष्ठ-24)
   
  निष्कर्ष में कह सकते हैं की आरिफ मारहर्वी का उपन्यास आग का खेल एक औसत स्तर का उपन्यास है। उपन्यास छोटा सा है लेकिन किसी भी स्तर पर पाठक को निराश भी नहीं करता। कहानी एक बार तो पढने योग्य है। 
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उपन्यास- आग का खेल
लेखक - आरिफ माहरवी
प्रकाशक- स्टार पॉकेट बुक्स, 4/5 B, आसफ रोङ, नई दिल्ली-01
वर्ष- नवंबर, 1971
पृष्ठ- 128
मूल्य-

Saturday, 17 February 2018

99. इंसाफ का सूरज- वेदप्रकाश शर्मा

 रहस्य के आवरण में लिपटी एक रोचक कहानी।
इंसाफ का सूरज- वेदप्रकाश शर्मा, जासूसी उपन्यास, रहस्य-रोमांच, उत्तम।

 वेदप्रकाश शर्मा को सस्पेंश का बादशाह कहा जाता है। उनके उपन्यास में सस्पेंश इस हद तक होता है की पाठक भी आश्चर्यचकित सा रह जाता है की आखिर ये हो क्या गया।  पृष्ठ दर पृष्ठ जिस प्रकार इनके उपन्यासों की कहानी बदलती है पाठक सोच भी नहीं सकता।  इन्हीं विशेषताओं के कारण वेदप्रकाश शर्मा को सस्पेंश का बादशाह कहा जाता है।
       वेदप्रकाश शर्मा का उपन्यास इंसाफ का सूरज भी इसी प्रकार का उपन्यास है जिसमें‌ प्रत्येक पृष्ठ पर रहस्य/सस्पेंश का जाल बिछा हुआ है। पाठक एक रहस्य से बाहर निकलता है तो दूसरा रहस्य उसका इंतजार करता है। 
विवेकानंद उद्यान- माउंट आबू


    उपन्यास की कहानी है एक ठाकुर परिवार की हवेली की। ठाकुर परिवार में मुखिया है ठकुराईन सुलोचना देवी और उसके पुत्र श्रीकांत, उसकी पत्नी और एक छोटा बेटा विक्की,  ठकुराईन का दूसरा पुत्र है शूरवीर सिंह । उपन्यास की कहानी आरम्भ होती है शूरवीर सिंह की शादी से...   "उस अभिशप्त हवेली की दुल्हन बनने वाली हर लङकी को शादी के कुछ दिन बाद कत्ल कर दिया जाता है..शूरवीर की दो पत्नियों को कत्ल किया जा चुका है- पहले माधवी और फिर निशा, एङी-चोटी का जोर लगाने के बावजूद पुलिस आज तक पता नहीं लगा पाई कि हवेली की दुल्हन की हत्याएं कौन करता है?" (पृष्ठ-06) 

Thursday, 1 February 2018

98. डार्क हाॅर्स- नीलोत्पल

  IAS की तैयारी करते युवाओं की संघर्ष दास्तान।
डार्क हाॅर्स -नीलोत्पल, उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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  नीलोत्पल मृणाल का उपन्यास डार्क हाॅर्स कहानी है दिल्ली के मुखर्जी नगर में IAS की तैयारी करने वाले उन युवाओं की जो एक स्वर्णिम भविष्य के निर्माण के लिए संघर्षपूर्ण जिंदगी जी रहें हैं।
       यह उपन्यास मात्र कल्पनाओं की उपज नहीं है वरन लेखक के जीवन का यथार्थ अनुभव है। लेखक ने इस विषय पर लेखकीय में लिखा है- संभवतः जिस उम्र में आदमी के पास  सबसे अधिक ऊर्जा रहती है, कुछ करने का पुरजोर  उत्साह होता है और दुनिया को देखने -समझने की सबसे ज्यादा जिज्ञासा होती है, मैंने अपने जीवन का वह सबसे चमकदार दौर आईएएस की तैयारी के लिए मुखर्जीनगर में गुजार दिया।
     
         अपने जीवन के इसी सत्य को लेखक नीलोत्पल मृणाल ने उपन्यास रूप में प्रस्तुत किया है।
     उपन्यास का मुख्य पात्र है संतोष कुमार। लेकिन यह मात्र एक संतोष की कहानी नहीं है। संतोष तो एक माध्यम मात्र है, संतोष के साथ-साथ न जाने अन्य कितने और अभ्यर्थियों की कहानी है जो  दिल्ली के मुखर्जी नगर में आईएएस की तैयारी करते हैं और इस दौरान वह कितनी बार जीते- मरते हैं। उनके और उनके माँ-बाप के क्या सपने हैं। इस इस उपन्यास में दर्ज हैं।
   यह उपन्यास अपने साथ अनेक कहानियाँ और घटनाएं समेटे हुए है। जहाँ कुछ कहानियाँ और घटनाएं हँसती है वहीं कुछ पाठक को रुलाती भी हैं। कुछ घटनाएं आईएएस की तैयारी के नाम पर मौज मस्ती करने वाले युवाओं की वहीं कुछ अपने स्वप्न साकार करने वाले संघर्षशील युवाओं के लिए प्रेरणा भी है।
    बत्रा- मुखर्जी नगर की वह जगह जहाँ चाय के नाम पर सिविल सर्विस की तैयारी करने वालों की महफिल  जमा होती है।  जिसने जितने अधिक मेंस लिखे हों वह महफिल का सबसे खास व्यक्ति होता  था। जिसने इंटरव्यू दे दिया वह अति-विशिष्ट की श्रेणी में आता था। (पृष्ठ -54) और बत्रा पर ऐसे -ऐसे धुरंधर जमा होते हैं जो सिगरेट के धुएँ से विश्व का नक्शा बना देते हैं।
कुछ नव युवा तैयारी के नाम पर मौजमस्ती करते हैं और इसे प्रगतिशीलता का नाम देते हैं। ऐसे युवाओं को गुरु विमलेंदू ने खूब फटकारा है।
- ये दारू पीना और सिगरेट उङाना कब से प्रगतिशीलता का पैमाना बन गया.....दारू और सिगरेट का खुलेआम पीना है ये कोई साहस नहीं बल्कि इसे उन्माद कहते हैं। (पृष्ठ-92)
और साहस क्या है- गुरु के शब्दों में
"हम में साहस है बालश्रम के विरुद्ध बोलने का । हम में साहस है दहेज प्रथा का विरोध करने का।.....हम में साहस...नारी मुक्ति...बाल विवाह...धर्म पर सवाल पूछने का। हम में साहस है सरकार की गलत नीतियों के विरुद्ध सङक पर उतर जाने का। हाँ, हममें ये साहस है। साहस इसे कहते हैं।" (पृष्ठ-92)
      मुखर्जी नगर में फैले कोचिंग सेंटर की वास्तविकता से भी परिचित करवाती है। ये कहानी मात्र मुखर्जी नगर की या आईएएस की तैयारी करने वाले युवाओं की नहीं, सभी जगह कुकरमुत्तो की तरह उगे कोचिंग सेंटर अभ्यर्थीयों के साथ मनमानी लूट करते हैं।
- पर ये तो मानना होगा कि यहाँ कुकरमुत्तों‌ की तरह उगे कोचिंग में क्वालिटी नहीं है। कुछ को छोङकर बाकी खाली मायाजाल फैलाए हुए हैं गुरु।"- विमलेन्दू ने कहा। (पृष्ठ-65)
   " हाँ, साला 2-3 साल तो ये समझने के लिए कोचिंग लेना होता है कि अब कौन सी कोचिंग में एडमिशन लेना अच्छा होगा।"- विमलेंदू ने कहा (पृष्ठ-65)
    कोचिंग सेंटर की बदतमीजी भी उपन्यास में उजागर हुयी है। एडमिशन लेते वक्त उनका व्यवहार अलग होता है और शुल्क जमा करवा देने के बाद अलग
" देखिए हमारा काम होता है हर स्टूडेंट का बेवजह उत्साह बढाना समझे आप? वर्ना हम भी जानते हैं कि सौ में दस ही सलेक्ट होते हैं बाकी गधे ही होते हैं पर हमें सबको घोङा कहना पङता है...। (पृष्ठ-100)
इन कोचिंग सेंटर की वास्तविक तो प्रफुल्ल बटोहिया, दुखमोचन और खगेंदर तूफानी जैसे सर से पता चलती है।  ये सर ऐसे है कि वे बैल को भी यह आशा बँधवा देते थे कि 'तुम एक दिन दूध दोगे, बस अच्छे से चारा-बेसन खाओ'। (पृष्ठ- 106) और ऐसे ही हैं  खगेंदर तूफानी।
खगेंदर तूफानी- खुद सात साल यहीं मुखर्जी नगर में आईएएस, पीपीएस सबकी तैयारी की थी पर न वहाँ सफल हुए न ही किसी विषय में कोई विशेषज्ञता ही हासिल कर पाए। हारकर 'लोकसेवक मेकर' नाम की कोचिंग खोली और उसके निदेशक बने। (पृष्ठ-104)
कोचिंग के दौरान पनपने वाले अनेक किस्से पाठक को खूब रोमांचित करते हैं। जहाँ अच्छे यारों के यार मिलते हैं वहीं कुछ दिलफरेब भी। जहाँ दोस्ती है, प्यार है और बेवफाई भी है। यहाँ अक्सर कोचिंग में अपने बगल में बैठी लङकी में लङका पहले अपनी प्रेमिका देखता है, फिर दुल्हन देखता है, फिर एक अच्छा दोस्त देखता है और अंत में बहन पर आकर समझौता कर लेता है। (पृष्ठ-134) और ऐसा समझौता उपन्यास का एक पात्र भी करता है।
  लेकिन कुछ अभ्यर्थी तो इससे भी दो कदम बढकर निकले-  गोरे लाल के कमरे पर जैसे ही उसकी कुक आती, एक गाना तभी हमेशा मोबाइल पर बजता था, 'हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब, एक दिन।'
संवाद-
किसी भी कहानी के संवाद उसके उद्देश्य को  स्थापित करने में महती भूमिका अदा करते हैं। इस उपन्यास के संवाद एक और जहाँ पात्र का चरित्र-चित्रण करने में सक्षम हैं वहीं कहानी को आगे बढाने में उपयोगी हैं।
अंग्रेजी जानने वाला वहाँ सियारों के बीच लकङबग्घे की तरह होता है। (पृष्ठ-61)
बुढापा आदमी का अंतिम बचपन है। (पृष्ठ-115)
लङको का मन वैसे ही साफ होता है जैसे नवंबर की दोपहर में आसमान होता है। (पृष्ठ- 134)
सिविल सेवा की तैयारी करने वालों से ज्यादा भयंकर आशावादी मानव संसार में और कहीं मिलना मुश्किल था। (पृष्ठ-147)
- अंग्रेजी व्यापार की भाषा है, उर्दू प्यार की भाषा है और हिंदी व्यवहार की भाषा है। (पृष्ठ-95)
  शीर्षक-
   किसी भी वस्तु का शीर्षक ही उसके प्रथम विशेषता होता है।
  उपन्यास का शीर्षक डार्क हाॅर्स क्यों है? हिंदी उपन्यास और अंग्रेजी शीर्षक। उपन्यास का शीर्षक चाहे जो भी हो पर इसका औचित्य उपन्यास के अंत में पता चलता है।
  लेखक ने भी इस विषय पर लिखा है- एक बात उपन्यास के शीर्षक पर भी कहूँगा।........डार्क हाॅर्स के नाम के कथानक से संबंध की तो भूमिका में नहीं बताऊँगा इसके लिए तो आपको यह उपन्यास पढना होगा।  
        सच मानिए जैसे ही आप इस शीर्षक की सत्यता तक पहुंचेंगे आपको भी यह शीर्षक रोचक लगेगा।
कमियां-
        - उपन्यास में कई जगह अश्लील शब्दों का प्रयोग किया गया है। जो कि मेरी दृष्टि में उचित नहीं है। पाठक अच्छी कहानी के कारण पढता है न कि गाली पढने के लिए। इस उपन्यास पर लेखक को साहित्य अकादमी का पुरस्कार सिर्फ अच्छे कथानक के लिए मिला है अगर इसमें से कुछ अश्लील शब्दों को हटा दिया जाये तो उपन्यास पारिवारिक रूप से भी पठनीय है।
   उम्मीद है इसका नया संस्करण जब भी आये तो उसमें से अश्लील शब्द न हों।
- मनोहर के चाचा का दिल्ली आगमन व उनका दिल्ली दर्शन विषय थोङा ज्यादा व अनावश्यक सा लगता है। हालांकि यह वर्णन भी रोचक है। क्योंकि स्वयं चाचा भी रोचक इंसान हैं।
एक उदाहरण देख लिजिएगा- लाल किले में जब चाचा को मनोहर ने खैनी खाने से मना किया तो चाचा ने भी गजब उत्तर दिया- "चलो जरा यहाँ खैनी खा लें, यादे रहेगा कि लाल किला में बैठ के खैनी खाए थे कबो।"- चाचा ने चहुँकते हुए कहा। (पृष्ठ-77)
    निष्कर्ष-
             मेरी दृष्टि में यह एक ऐसा उपन्यास है जिसे सभी उम्र वर्ग को पढना चाहिए। यह उपन्यास मात्र मनोरंजन नहीं है बल्कि संघर्षरत जीवन जीने वाले लोगों की जीवंत दास्तान है। एक ऐसी दास्तान जो कहीं आपको रुलाती है तो कभी हँसाती है।
         मैं जब इस उपन्यास को पढ रहा था तो स्वयं पात्रों के साथ जी रहा था। स्वयं को मुखर्जी नगर में पाया। कभी-कभी तो संतोष, गुरु, रायसाहब, विमलेंदू मनोहर, विदिशा और पायल के बारे में सोचने लगा था।
      उपन्यास बहुत ही रोचक है अवश्य पढें।
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बेहद दिलचस्प उपन्यास। अपने पहले ही उपन्यास में निलोत्पलने बड़ा साहस दिखाते हुए बेबाकी से यथार्थ की तलछट को कुरेदते हुए एक ऐसी दुनिया का सच लिखा है, जिस पर पहले कभी इतना नहीं लिखा गया. ये भोगे गए यथार्थ का दस्तावेज है. एक ऐसी रोचक और बौद्धिक दुनिया की गर्म भट्टी का सच लिखा है, जिसमें कई लोग तप के सोना हो जाते हैं तो कई जल कर खाक. 'डार्क हॉर्स' अंधेरे रास्ते से होकर उजाले तक का सफर है. नीलोत्पल की भाषा में रवानगी है, व्यंग में धार है, संवादों में संवेदना के गहरे उतार-चढ़ाव हैं. किस्सागोई का अपना अलग अंदाज है, जो पाठक को पढ़ने के लिए मजबूर करता है. 'डार्क हॉर्स' के रूप में शानदार शुरुआत के साथ भविष्य के एक बड़े लेखक के रूप में देख रहीं हूं. नीलोत्पल को बहुत सारी शुभकामनाएं।
- सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती चित्रा मृद्गुल
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उपन्यास- हार्क हाॅर्स
ISBN-
लेखक- नीलोत्पल मृणाल
प्रकाशक- हिंद युग्म
www.hindyugam.com
पृष्ठ- 174
मूल्य-175₹
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उपन्यास निम्न लिंक से मंगवा सकते हैं।
एमेजन- डार्क हाॅर्स

97. बनारस टाॅकिज- सत्य व्यास

        तीनों‌ मित्रों की हाॅस्टल गाथा।
बनारस टाॅकिज- सत्य व्यास, उपन्यास, रोचक, पठनीय।

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   सत्य व्यास का उपन्यास बनारस टाॅकिज कहानी है B.D. की। अच्छा तो आप B.D. का अर्थ नहीं जानते। चलो कोई बात नहीं, अक्सर ऐसा होता है। आप ने B.H.U. का नाम सुना है। अरे! क्या बात करते हो...ये भी नहीं सुना। इसीलिए कहते हैं बाउ साहब कि जरा इधर-उधर भी देखा कीजिएगा। (पृष्ठ-09)
         B.H.U. के B.D. में B.D. जीवी रहते हैं। अब आप पूछेंगे कि ये बी. डी. जीवी क्या बला है? रूम नंबर-73 में जाइए और जाकर पूछिए कि भगवान दास कौन थे? जवाब मिलेगा- घण्टा। (पृष्ठ-09)
   तो अब तो आप समझ गये होंगे किसकी चर्चा चल रही है।  ये भगवान दास है बाउ साहब। 'भगवानदास हाॅस्टल'। समय की मार और अंग्रेजी के भार से, जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय सिमट कर B.H.U. हुआ; ठीक उसी समय 'भगवानदास हाॅस्टल' सिमट कर B.D. होस्टल हो गया। (पृष्ठ-09)
               तो यह उपन्यास कहानी कहता है भगवान दास होस्टल में रहने वाले मित्रों की।  जो व्यक्ति विद्यार्थी जीवन में हाॅस्टल जिंदगी जी चुका है उसे इस उपन्यास में अपने जीवन की झलक नजर आयेगी। हाॅस्टल की जिंदगी में जो प्यार-मोहब्बत, मित्रों का स्नेह, आपसी झगङे वे सब इस उपन्यास में लेखक ने बुने हैं। लेकिन यह उपन्यास मात्र हाॅस्टल जीवन की कथा ही बयान नहीं करती इसके अलावा भी और बहुत कुछ कहती है, लेकिन वह सब कहा गया है भगवान दास हाॅस्टल के विद्यार्थी वर्ग के माध्यम से।
                वह क्या है उसका पता तो उपन्यास के अंत में जाकर ही पता चलता है। तब पाठक भी यही सोचता है की अच्छा कहानी यह थी। लेखक ने उपन्यास ने आरम्भ में स्पष्ट लिखा है।  हर घटना के पीछे कोई कारण होता है। संभव है कि यह घटित होते वक्त आपको दिखे; लेकिन अंततः जब यह सामने आएगा, आप सन्न रह जायेंगे।
          वह कौनसी घटना है यह तो उपन्यास पढकर ही जाना जा सकता है, लेकिन यह सत्य है की उस घटना को पढकर पाठक सन्न रह जाता है।
         192 पृष्ठ के उपन्यास में 168 पृष्ठ तक पाठक को पता तक नहीं चलता की आखिर लेखक इस उपन्यास में कहना क्या चाहता है, लेकिन पृष्ठ संख्या 168 से उपन्यास का वह भाग आरम्भ होता है जिस पर यह उपन्यास आधारित है।
         
उपन्यास में विभिन्न रंग पाठको को देखने को मिलेंगे। प्यार, गुस्सा, हास्य, व्यंग्य  आदि।
   उपन्यास में हास्यरंग भी जगह-जगह बिखरें हैं। ऐसा ही एक उदाहरण देखिए-
  दरअसल, परीक्षा में बैठने वाले अधिकतर लोगों को यह भी पता नहीं होता कि सवाल पूछा क्या गया है और जवाब लिखना क्या है? वो तो वही लिखते हैं जो उन्हें आता है। (पृष्ठ-129)
            यह तो मेरा भी व्यक्तिगत अनुभव है की विद्यार्थी वही लिखता है जो उसके दिमाग में है वह चाहे प्रश्न का उत्तर हो या न हो। ऐसा ही इस उपन्यास के पात्र करते हैं।
    .....पाण्डे सर ने हमसे कहा और आगे पढने लगे- "दूसरा केस है- Tyre vs.Tube......जी! आपने बिलकुल ठीक सुना। पार्टीज हैं, B. Tyre vs. C. Tube.....अब इस केस के फैक्ट पढ रहा हूँ- फ्लेंटिक अर्थात् वादी, टायर कंपनी में काम करता था। उसका काम टायर में हवा भरने का था। एक दिन अचानक टायर में हवा भरते वक्त ट्यूब फट गया। जिससे   सुनने  शक्ति  चली गयी। वादी ने अपनी टायर कंपनी से compensation  मांग की, जो कंपनी ने ठुकरा दी। इस पर वादी ने वाद दायर किया।" (पृष्ठ-131)

उपन्यास को विभिन्न खण्डों में  विभक्त किया गया है और प्रत्येक खण्ड का अलग से नाम है, जैसे- हम हैं कमाल के, ओये लकी लकी ओये, लगान, कोहराम, एक दिन अचानक

भाषाशैली-
     उपन्यास की भाषाशैली की बात करें तो यह परम्परागत कथा साहित्य से अलग हटकर है। उपन्यास में हालांकि सामान्य भाषा प्रयुक्त हुयी है लेकिन अंग्रेजी शब्दावली का जिस तरह से इस उपन्यास में प्रयोग हुआ है वह चिंतनीय है। आखिर लेखक इस तरह की भाषा को प्रयुक्त कर रहा है। क्या भारत में एक नयी भाषा शैली विकसित हो रही है। सामान्य बोलचाल के शब्दों तक तो सब ठीक था लेकि‌न लेखक ने पूरे के पूरे वाक्य ही अंग्रेजी भाषा और लिपि में लिख दिये।

           उपन्यास में कुछ जगह कुछ कमियां भी खटकी-

  उपन्यास प्रथम पुरुष में है लेकिन पृष्ठ संख्या ...में यह अन्य पुरुष में चला जाता है।

- उपन्यास में अंग्रेजी शब्दावली की भरमार तो है ही है, साथ में रोमन लिपि की की भी।
- अंग्रेजी में एक कहावत है- Birds of same feather flock to gether.(पृष्ठ-15)
- राजीव भी satellite love case का शिकार था। (पृष्ठ-50)
- हम कल रात को नंबर try किये थे। call detail में वही पहला नंबर था। (पृष्ठ-72)
- शिखा! Please don't mind - अगर मैं एक बात कहूँ?"- मैंने शिखा से कहा। (पृष्ठ-192)
    अब पता नहीं लेखक ने जगह-जगह इतनी अंग्रेजी शब्दावली/लिपि क्यों प्रयुक्त की है।
   शायद ही कोई ऐसा पृष्ठ हो जिसमें अंग्रेजी शब्दावली/लिपि न प्रयुक्त हो।

- उपन्यास में गालियों की संख्या ने स्वाद खराब कर दिया।  उपन्यास में गालियों का काफी प्रयोग हुआ है। अगर ये गालिया न भी होता तो भी चलता। पाठक गालियों के लिए नहीं, अच्छी कहानी के लिए पढते हैं।

निष्कर्ष-
     सत्य व्यास  का उपन्यास बनारस टाॅकिज  एक हाॅस्टल में रहने वाले कानून की पढाई करने वाले दोस्तों की कहानी कहता है।
       हालांकि उपन्यास में नयापन कुछ भी नहीं है, लेकिन उपन्यास का प्रस्तुतीकरण बहुत अच्छा है और उसी वजह से उपन्यास चर्चित भी रहा है।
        उपन्यास पूर्णतः मनोरंजक है पाठक को किसी भी स्तर पर निराश नहीं करेगा।
  पठनीय और रोचक उपन्यास है।

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उपन्यास- बनारस टाॅकिज।
ISBN-978-93-81394-99-1
लेखक- सत्य व्यास
प्रकाशक- हिंद युग्म
पृष्ठ- 192
मूल्य-140₹

प्रथम संस्करण- जनवरी 2015
नौवी आवृति- सितंबर 2017


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अगर आपने यह उपन्यास पढा हैऔर आपको कैसा लगा, अपने विचार अवश्य बतायें।

96. बसेरा- कुशवाहा कांत

एक प्रेम कहानी, एक दर्द कहानी।
बसेरा- कुशवाहा कांत, सामाजिक उपन्यास, पठनीय।
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कुशवाहा कांत का उपन्यास बसेरा दो युवा दिलों की प्रेम कहानी है। जो अपना प्रेम 'बसेरा' बसाना चाहते हैं। प्रेम और उसमें आयी परेशानियां, गलतफहमियां और संघर्ष की कहानी है 'बसेरा'।
        एक थी शमीम। जी हाँ! उसका नाम था शमीम, फूल सी कोमल, चन्द्रमा सी उज्ज्वल, मधु सी मिठास भरी एवं मदिरा सी मादक थी वह। यौवन मद से परिपूर्ण उसका ललितांग शरीर देखने वाले पर गजब ढाता था। (पृष्ठ-03) 

Monday, 15 January 2018

95. लवंग- कुशवाहा कांत

एक प्रेम कहानी दर्द भरी।
लवंग- कुशवाहा कांत, उपन्यास, सामाजिक, रोचक, पठनीय।
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   लवंग कहानी एक अमीर बाप के शराबी और वेश्यागामी पुत्र की कहानी है। लेकिन शराब और शबाब उसे खत्म करने की कगार पर है पर वह उन्हें छोङ नहीं पाता। लेकिन तब उसे मिलती है एक सच्चे प्यार वाली लेकिन क्या वह सच्चे प्यार के सामने अपने को बदल पाया।
      कुशवाहा कांत की लेखनी से निकला एक जबरदस्त कथानक है लवंग।
        अमीर बाप के एकमात्र पुत्र जयराज का संपर्क एक वेश्या गुलशन से होता है।  यह जो गुलशन है- वह आँधी है। आँधी के प्रबल वेग की तरह उसके पास यौवन का उन्मादकारी आकर्षण है। (पृष्ठ-141)  और उसके आकर्षण में फंस है जयराज।  भी एक ऐसी वेश्या-
   सूरत पर मिठास-
   और दिल में जहर
यही है एक वेश्या की परिभाषा।(पृष्ठ-26)
        लेकिन जयराज को एक अमवा गांव की, कंजर जाति की, तमाशा दिखाने वाली लङकी लवंग पसंद आ जाती है। - एक अमीर और एक गरीब- दोनों के हृदयों पर प्रेम के मादक करों ने अपनी छाया कर रखी थी और वे दोनों प्राणी उस प्रेम सरोवर में गोते खाते हुए अपनी अमीरी और गरीबी का अस्तित्व तक भुल गये थे।
यह था प्रेम।
जिसके आगे संसार के समस्‍त भेदभाव तुच्छ एवं हेय हैं। (पृष्ठ-176)
और वह लवंग  के लिए गुलशन का अपमान कर देता है। नारी सब कुछ सहन कर सकती है, परंतु अपना अपमान वह कभी नहीं सह सकती- सो भी एक वेश्या।( पृष्ठ-24)

Sunday, 14 January 2018

94. भंवरा- कुशवाहा कांत

एक प्रेम कहानी, एक दर्द कहानी।
भंवरा- कुशवाहा कांत, उपन्यास, सामाजिक, पठनीय।

कुशवाहा कांत के उपन्यास स्वयं में एक अलग दुनिया होते हैं। इनकी शैली रोचक व मन को छू लेने वाली होती है।
इनका उपन्यास भंवरा एक साथ कई कहानियाँ कह जाता है। एक तरफ जहाँ प्रेम कथा है, वहीं दूसरी तरफ देश-प्रेम और मानवता की चर्चा भी है। धर्म भी है और मनुष्य का मनुष्य के प्रति दायित्व भी है।
         उपन्यास एक साथ कई आदर्श प्रस्तुत करता है लेकिन कहीं से बोझिल प्रतीत नहीं होता। पाठक को स्वयं में बांधे रखने में उपन्यास सक्षम है और यही एक सफल उपन्यास की विशेषता होती है।
                 भंवरा कहानी है करमपुर गांव के बङे ठाकुर/ बङे राजा चन्द्र किशोर नारायण सिंह के पुत्र कमल किशोर नारायण सिंह के प्रेम की कहानी सिर्फ प्रेम कथा ही नहीं है इसके अलावा करमपुर गांव में आयी बेरोजगारी और धार्मिक उन्माद की कहानी और उनके पीछे शैतानी सोच की भी है।
           कमल को प्रेम है अपने ही गांव के एक ग्वाले की पुत्री मेहंदी से लेकिन यह प्रेम बङे राजा को पसंद नहीं।
अमिलहा के ठाकुर जगदीश सिंह एक दिन बङे राजा के यहाँ कमल हेतु अपनी पुत्री राजमणि का रिश्ता लेकर आते हैं लेकिन यह रिश्ता ठकुराइन को पसंद नहीं है।

Friday, 12 January 2018

93. आहुति- कुशवाहा कांत

सम्राट अशोक के जीवन का दूसरा पक्ष.
अशोक पुत्र कुणाल के अंधे होने की कथा।
आहुति- कुशवाहा कांत, उपन्यास, रोचक, पठनीय, उत्तम।
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कुशवाहा कांत का मेरे द्वारा पढा जाने वाला यह प्रथम उपन्यास है। मैं हमेशा सोचता था की इनके उपन्यास वही पारम्परिक सामाजिक कथानक वाले होंगे। लेकिन कुछ तात्कालिक पाठकों से सुना की कुशवाहा कांत के उपन्यास बहुत अच्छे होते हैं। तब मैंने कुशवाहा कांत के बारे में जानकारी एकत्र करनी आरम्भ की।
  कुशवाहा कांत ने कुल 35 उपन्यास लिखे हैं, जो की क्रांतिकारी, ऐतिहासिक, सामाजिक व श्रृंगारिक श्रेणी के हैं।
  मेरे विद्यालय ( राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय-माउंट आबू, सिरोही, राजस्थान) के पुस्तकालय में से कुशवाहा कांत के पांच उपन्यास उपलब्ध हुये और पांच-सात उपन्यास में कुछ विक्रेताओं से खरीदे।
    प्रस्तुत उपन्यास 'आहुति' सम्राट अशोक के जीवन का एक काल्पनिक रूप प्रस्तुत करता है जो पाठक को आरम्भ से अंत तक आबद्ध रखता है।
सम्राट अशोक के पुत्र के अंधे होने की कथा काफी प्रचलित है, अब सत्यता क्या है, कुछ कहा नहीं जा सकता।  कुछ ग्रंथों में इस कहानी को पूर्णतः काल्पनिक बताया गया है।
  
         सम्राट अशोक के पुत्र कुणाल को लेकर इस कहानी का एक काल्पनिक विस्तार किया गया है जो काफी रोचक है।
       एक थी तिष्यरक्षिता।
पाटलिपुत्र राज्यप्रसाद की प्रधान परिचारिका। उसके मादक सौन्दर्य ने, मगधपति, प्रियदर्शी सम्राट अशोकवर्धन के हृदय पर अमिट छाप अंकित कर दी थी और सम्राट अशोक, पचास वर्ष की ढलती उम्र में भी, उस सुंदरी परिचारिका पर आशक्त हो गये थे। (पृष्ठ-03(प्रथम)
            सम्राट उसे परिचारिका नहीं मानते थे। वे तो कहते थे- "तुम परिचारिका नहीं हो तिष्ये...तुम मेरे हृदय की उन्मादकारिणी ज्वाला हो।" (पृष्ठ-05)

Wednesday, 10 January 2018

92. शाॅक ट्रीटमेंट- जेम्स हेडली चेइज

इश्क में पागल एक आशिक की खूनी कथा
शाॅक ट्रीटमेंट, उपन्यास, मर्डर मिस्ट्री, उत्तम।
बद् दिमाग अपाहिज खाविंद की कमसीन, जवान और बेइंतहा खूबसूरत बीवी के नामुराद इश्क में अंधा मूढमति आशिक हो तो फिर कत्ल भला कैसे न हो?
        कुछ उपन्यास ऐसे होते हैं जिन्हें आप पढना आरम्भ करते हो तो अंतिम पृष्ठ पढे बिना छोङने का मन ही नहीं करता। ऐसा ही प्रस्तुत उपन्यास है जेम्स हेडली चेइज का शाॅक ट्रीटमेंट।
    आदि से अंत तक रोचक से भरपूर। हर कदम पर नया और नया रहस्य लिए।
गर आप आज तक अपनी जिंदगी में किसी औरत की फर्जी मुहब्बत के फेर में नहीं पङे हैं तो आपको अपने तजुर्बे के दम पर मैं यही राय दूंगा कि- किसी औरत और उसकी फर्जी मुहब्बत के चक्कर में ना ही पङें तो बेहतर है- वर्ना आपकी भी वही हालत मुमकिन है जो कि मेरी हुयी थी।
   आज जब मैं आपको यह अपनी कहानी बता रहा हूँ तो अब उन दिनों की यादें भी मुझमें कोफ्त पैदा करती हैं।
   यह कहानी है कैलिफोर्निया की पहाडियों में बसे एक छोटे से कस्बे के एक व्यक्ति टेरी रीगन की।
   टेरी रीगन के कस्बे में एक विकलांग व्यक्ति मिस्टर डेगाले  अपनी पत्नी गिल्डा के साथ रहने आता है।
विकलांग होने के कारण मिस्टर डेगाले कुछ शकी, क्रोधी और सनकी स्वभाव का हो जाता है। और उसका गुस्सा अपनी बेहद खूबसूरत और जवान पत्नी गिल्डा पर उतरता है।
   मिस्टर टेरी रीगन भी गिल्डा की खूबसूरती पर फिदा हो जाता है। गिल्डा और टेरी रीगन की मोहब्बत भी परवान चढने लगती है।
   अमीर डेगाले, खूबसूरत गिल्डा और गरीब टेरी रीगन। अजीब पात्र है तीनों।
   डेगाले की सनक से गिल्डा भी परेशान है और टेरी रीगन भी।
तब टेरी रीगन गिल्डा को पाने के लिए एक साजिश रचता है और साजिश के तहत डेगाले का कत्ल कर देता है।
अब पुलिस उस कत्ल को आत्महत्या मान कर केस को बंद कर देती है।
  पर पाठक मित्र उपन्यास अभी बाकी है। कहानी में टविस्ट तो अभी शुरु ही हुआ है। और इस घटनाक्रम के पश्चात तो कहानी में टविस्ट पर टविस्ट आते हैं।
- कभी डेगाले की मौत हत्या लगती है और कभी आत्महत्या।
- कभी डेगाले अमीर लगता है और कभी गरीब।
- कभी कातिल टेरी रीगन लगता है और कभी गिल्डा।
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- क्या डिल्डा कभी टेरी रीगन की हो पायी?
- असली कातिल कौन है?
- क्या रहस्य है इस मौत के पीछे।
ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों के उत्तर इस दिलचस्प उपन्यास में ही मिलेंगे।
  उपन्यास है भी इतना रोचक की पाठक एक बार आरम्भ करेगा तो इस उपन्यास को पूरा पढकर ही खत्म करेगा।
       हालांकि इस प्रकार के चौंकाने वाले घटनाक्रम वाले उपन्यास वेदप्रकाश शर्मा जी ने भी खूब ‌लिखे हैं। पर वेदप्रकाश शर्मा जी के उपन्यास में अनावश्यक विस्तार और परस्पर वार्तालाप ज्यादा होता है। इस उपन्यास में कहीं भी अनावश्यक विस्तार नहीं है। इस उपन्यास में अभी भी इतना स्पेश बाकी है की कोई भी प्रतिभाशाली लेखक इस कहानी को एक नया रूप दे सकता है। और ऐसा एक छोटा सा प्रयास इस उपन्यास के पीछे कँवल शर्मा जी ने ' एक ही अंजाम' नामक कहानी में किया भी है।
इस उपन्यास के पीछे कँवल शर्मा की इसी उपन्यास पर आधारित एक कहानी है 'एक ही अंजाम' पर उपन्यास और कहानी का क्लाइमैक्स अलग-अलग है।
    यह उपन्यास नये लेखकों के लिए भी प्रेरणा के समान है।
   जेम्स हेडली चेइज का प्रस्तुत उपन्यास ' शाॅट ट्रीटमेंट' बहुत ही रोचक व पठनीय उपन्यास है। मेरी व्यक्तिगत राय से इस उपन्यास को अवश्य पढें।
धन्यवाद।
  इन्हीं दिनों सूरज पॉकेट बुक्स से प्रकाशित जेम्स हेडली चेइज का उपन्यास 'आखिरी दांव' (One Bright Summer Morning ) पढा जो की सबा खान जी द्वारा अनूदित था। वह भी बहुत रोचक था।
  
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उपन्यास - शाॅक ट्रीटमेंट (Shock Treatment)
लेखक- जेम्स हेडली चेइज
अनुवादक- कँवल शर्मा
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ-
मूल्य- 60₹

Friday, 5 January 2018

91. तुरुप का इक्का- गजाला

इजराइल - फिलिस्तीन में उलझी स्पाई गर्ल गजाला प्रियदर्शी का कारनामा

तुरुप का इक्का, उपन्यास, गजाला, थ्रिलर, एक्शन, औसत।
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    हिंदी लोकप्रिय उपन्यास जगत में गजाला एक चर्चित नाम है, जिसने कम उम्र व कम समय में अपनी लेखकीय प्रतिभा का परिचय अपने प्रथम उपन्यास 'तुरुप का इक्का' से दिया।
     प्रस्तुत उपन्यास जासूस गजाला प्रियदर्शी शृंखला का है जो की प्रथम पुरुष में लिखा गया है।
   उपन्यास की कहानी की बात करें तो यह कहानी इजराइल और फिलिस्तीन के मध्य चल रहे संघर्ष पर आधारित है। जहाँ दोनों देश एक- दूसरे पर अपनी विजय दर्शाने के लिए संघर्ष करते हैं तो वहीं कुछ निर्दोष इस संघर्ष की बलि चढ जाते हैं।
   ऐसे ही एक निर्दोष को बचाने के लिए गजाला प्रियदर्शी पहुंच जाती है इजराइल। लेकिन वहाँ फंस जाती है सत्य और असत्य के बीच।

उपन्यास के पात्र
गजाला प्रियवंशी - उपन्यास नायिका, भारतीय जासूस।
राॅबन्सन- इजराइल का एक नेता।
ग्रेसी विल्सन- राॅबन्सन का साथी।
रोज-
साइम-
शैंकी - राॅबन्सन का सहयोगी
अदिया- फिलिस्तीन की पन्द्रह वर्षीय बालिका
मुस्तजाब- फिलिस्तीन के हमास संगठन का नेता

पूरे उपन्यास में एक्शन दृश्यों की भरमार है, कई- कई जगह तो मारधाङ तीन- चार पृष्ठ तक लगातार चलती है। तीन सौ पृष्ठों के उपन्यास में से लगभग सौ पृष्ठ तो एक्शन से भरे हुये हैं।

   लेखिका के प्रथन उपन्यास को पढकर जहां उनकी प्रतिभा का पता चलता है वहीं कहानी के स्तर पर उपन्यास मध्यम स्तर तक भी बहुत कठिनता से पहुंचता है। उपन्यास को आवश्यकता से अधिक विस्तार देकर कहानी को और भी कमजोर कर दिया।
    हर पांच- दस पृष्ठ कर पश्चात पाठक को वही मारपीट वाले दृश्य पढने को मिलते हैं।
यह लेखिका की प्रतिभा ही मानी जायेगी जो उन्होंने किशोरावस्था में एक लोकप्रिय उपन्यास की रचना की।
 
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उपन्यास- तुरुप का इक्का
लेखिका- गजाला
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 300
मूल्य- 30₹

Sunday, 31 December 2017

90. प्राइम मिनिस्टर का मर्डर- अमित खान

भारत के प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश।
प्राइम मिनिस्टर का मर्डर- अमित खान, उपन्यास, थ्रिलर, औसत।
    अमित खान जी द्वारा लिखित प्राइम मिनिस्टर का मर्डर उपन्यास मेरे द्वारा पढे जाने वाला इनका प्रथम उपन्यास है।
               उपन्यास की कहानी तो इसके शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाती है। कुछ लोग भारत के प्राइम मिनिस्टर की हत्या करना चाहते हैं।
कौन लोग?
   भारत के प्रधानमंत्री जब रूस दौरे पर जाते हैं तो वहाँ उनकी हत्या की साजिश रची जाती है। एक तीर से दो शिकार।
     भारत के प्रधानमंत्री की हत्या और भारत- रूस के संबंधों को बिगाङना भी। लेकिन जैसे ही इस बात की खबर कमाण्डर करन सक्सेना को होती है तो वह इस षडयंत्र को नाकाम करने के लिए मैदान में उतर जाता है।
      "यह कैसी आवाजें हैं?"- करण सक्सेना बुरी तरह चौंका।
" लगता है...नीचे कोई हंगामा बरपा हो गया है जनाबेमन।"- मुल्तानी भाई जबरदस्त आतंकित मुद्रा में बोला - " जरूर प्रधानमंत्री की हत्या हो गयी है। ऐसा मालुम होता है...कर्नल नासिर ने किसी और आदमी का भी इंतजाम किया हुआ था, जिसने गोली चलायी।"
इस बात ने ही करण सक्सेना के होश उङा दिये। (पृष्ठ-187-188)
- भारत के प्रधानमंत्री की हत्या कौन करना चाहता है?
- कौन लोग थे जो भारत- रूस के संबंधों को बिगाङना चाहते थे?
- क्या वे अपने मक़सद में कामयाब हो पाये?
- क्या कमाण्डर करन सक्सेना दुश्मनों के षडयंत्र को असफल कर पाया?
   ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर अमित खान द्वारा लिखित उपन्यास प्राइम मिनिस्टर का मर्डर में ही मिल सकते हैं।
इस प्रकार के मैंने जितने भी उपन्यास पढे हैं कोई भी, कभी भी रोचक नहीं लगा। और यह उपन्यास भी उसी श्रेणी का ही है। यह उपन्यास उस दौर का लगता है जब उपन्यासों के पाठक बहुत ज्यादा थे लेखक कुछ भी लिख देता था और पाठक पढ लेता था। इसलिए इस उपन्यास से ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती।
उपन्यास में काॅन्ट्रेक्ट किलर ऐलेक्स का मानसिक परीक्षण वाला दृश्य बहुत ही रोचक है। यह लेखक द्वारा किया गया एक बेहतरीन प्रयोग है जो इस उपन्यास की जान भी है।
 
उपन्यास में अगर कुछ गलतियों/ कमी की बात की जाये तो वह 'कुछ' से आगे ही है-
  
1. उपन्यास के शुरूआत होती है राॅ की एजेंट रजिया से जो दुश्मनों की कैद में है और इसके बाद अन्य एजेंट भी दुश्मन की कैद में ही नजर आते हैं।
- रजिया (पृष्ठ- 01)
- रजनी (पृष्ठ- 50)
- रहमान (पृष्ठ -70)
इस प्रकार पृष्ठ संख्या 70 तक पहुंचते-पहुंचते जासूस महोदय दुश्मन की कैद में पहुंच जाते हैं।
2. उपन्यास में कमाण्डर करन सक्सेना भी इतना दम नहीं दिखा पाया जितना की उपन्यास का खलनायक कर्नल नासिर
    कभी-कभी और कहीं-कहीं तो लगता है की कमाण्डर सक्सेना में कोई जासूस वाली बुद्धि ही नहीं है। अजीब से निर्णय लेता है और फिर उन पर पश्चात् भी होता है।
3. आतंकवादी अब्दुल करीम की तलाश सब को होती है पर पृष्ठ संख्या 33-54 तक उनकी निगरानी तो होती है लेकिन गिरफ्तार नहीं किया जाता और फिर पृष्ठ संख्या पर लिखा - आई. एस. आई. के दोनों खूंखार एजेंट जफर सुल्तान और अब्दुल करीम गायब हो गये।
4. पृष्ठ संख्या 128- 137 तक मिस्टर अलेक्से से आतंकवादी कर्नल नासिर से संबंधित पूछताछ होती है। कर्नल नासिर की जानकारी लेने के पश्चात ऐलेक्स को तुरंत रिहा कर दिया जाता और ऐलेक्स कर्नल नासिर को तुरंत संपर्क कर सब स्थिति बता देता है।
" परंतु इस पूरे प्रकरण में हमसे एक बहुत भयंकर गलती हो चुकी है।"- रूसी अधिकारी ने कहा।
"क्या?"
" हमें अलेक्से को यहाँ से जाने नहीं देना चाहिए था।"
"क्यों?"
" क्योंकि अलेक्से यहाँ से जाते ही सबसे पहले कर्नल नासिर को सचेत करेगा।"
"चिंता मत करो।" - गंगाधर महंत बोले-" उसका सारा इंतजाम भी हमने किया हुआ है।" (138)
     
लेकिन सारे इंतजाम धरे के धरे रह जाते हैं। फिर भी यहाँ कहानी कुछ हद तक संभल जाती है।
5. "जी हां! मान लीजिए...कर्नल नासिर को हमारी गतिविधियों के बारे में शुरु से ही सब कुछ मालूम था।"- मुल्तानी भाई बोला- " वो जानता था कि उसे और अलेक्से को वाॅच किया जा रहा है। परंतु फिर भी उसने यह सारा खेल जानबूझकर इसिलिए खेला....ताकि आपके सामने चारा डाला जा सके और आप कूदकर इस गलत नतीजे पर पहुंच जायें की प्रधानमंत्री पर गोली जिन्ना हाउस से चलाई जाने वाली थी..…..।" (पृष्ठ-180)
    यह बात मुल्तानी भाई के दिमाग में आती है और पाठक के भी। बस इस बात को कमाण्डर करण सक्सेना नहीं सोच पाता और वास्तव में गलत निर्णय भी ले लेता है।
6. एक दो जगह अलेक्से और तानिया के रति प्रसंग है जो उपन्यास/ कहानी में जबरदस्ती के से दृश्य नजर आते हैं।
                  आतंकवाद पर लिखे गये अधिकांश उपन्यास एक जैसे ही कहानी लिए होते हैं। आतंकवादी भारत में आये और भारत के जासूसों ने उन्हें खत्म कर दिया। इस उपन्यास में फर्क बस यहि है की सारी कहानी रूस में घटित होती है।
       
    उपन्यास में कमियां बहुत है जो कहानी पर भारी पङती हैं। कहीं कुछ भी चौंकाने वाला नहीं है जो पाठक को उपन्यास से बांधे रखे।
     यह एक औसत श्रेणी का उपन्यास है।
किसी एक उपन्यास से लेखक की प्रतिभा का आंकलन नहीं किया जा सकता। यह मात्र एक छोटी सी रचना है, जो लेखक की समग्र प्रतिभा को प्रतिबिंबित नहीं करती।
          अमित खान के कुछ और उपन्यास भी मेरे पास उपलब्ध हैं, समय मिलते उनको पढा जायेगा।
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उपन्यास- प्राइम मिनिस्टर का मर्डर
लेखक- अमित खान
प्रकाशक- धीरज पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 271
मूल्य- 50₹
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अमित खान
डी- 603, स्काई पार्क
अजीत ग्लास गार्डन के नजदीक,
आॅफ एस. वी. रोङ, गोरेगाँव (वेस्ट)
मुंबई- 400404
Mob- 9821163955 ( सिर्फ रविवार)
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फेसबुक- Author Amit Khan