Sunday, 9 August 2020

365. आखिरी बाजी- वेदप्रकाश कांबोज

 इंस्पेक्टर सूरज और साथियों का कारनामा

आखिरी बाजी- वेदप्रकाश कांबोज, एक्शन उपन्यास


"कहो बेटा, जयराज अब शादी की पार्टी कब कर रहे हो?"
नाम सुनते ही वह इस तरह बुरी तरह से चौंका जैसे किसी खूनी शेर को अपने शिकार की भनक लग गयी हो। शरीर की समस्त शिराएं आक्रमण के लिए तन गयी। झटके साथ गर्दन घुमाकार शब्दों की तरफ देखा।.......

           यह दृश्य है वेदप्रकाश कांबोज जी के एक्शन -थ्रिलर उपन्यास 'आखिरी बाजी' का।
       अगस्त माह में वेदप्रकाश कांबोज का यह क्रमशः पांचवां उपन्यास पढ रहा हूँ। इससे पूर्व 'कदम- कदम पर धोखा', 'चन्द्रहार के चोर' 'चन्द्रमहल का खजाना' और 'चक्कर पर चक्कर' के बाद 'आखिरी बाजी' उपन्यास पढा। इनमें से 'चक्कर पर चक्कर' को 'विजय' सीरीज का एक सस्पेंश- मर्डर मिस्ट्री उपन्यास, 'आखिरी बाजी' एक्शन- थ्रिलर है और शेष तीन सस्पेंश थ्रिलर उपन्यास है। 
अब बात करते हैं उपन्यास 'आखिरी बाजी' की। उपन्यास एक्शन पर आधारित है जिसमें मुख्य पात्र इंस्पेक्टर सूरज होता है। इंस्पेक्टर सूरज सिंह, जिसका नाम सुनते ही बड़े-बड़े अपराधियों की फूंक सरक जाती थी, हौंसले पस्त हो जाते थे। उसकी जिंदगी का एकमात्र उद्देश्य यही था। अपराध और अपराधियों का सफाया कर देना। इसी तमन्ना के साथ वह पुलिस में भर्ती हुआ और अच्छा नाम भी कमा लिया था उसने।
         सूरज की जिंदगी का एक ही मकसद है अपराधी जयराज को गिरफ्तार करना। सिर्फ जयराज के कारण उसका पूरा पुलिस कैरियर तबाह हो गया।
लेकिन जयराज का कहीं भी कोई पता नहीं। तब सूरज की जिंदगी में प्रवेश होता है एक रहस्यमय व्यक्ति का।
"लेकिन आप हैं कौन?" -पूछा उसने
"दुश्मन का दुश्मन दोस्त ही माना जाता है न? सो आप मुझे अपना दोस्त मान सकते हैं।"
"लेकिन वह दुश्मन कौन है जिसकी वजह से हम दोनों अनजान दोस्त बनने जा रहे हैं?"
"जयराज।"

- यह अज्ञात रहस्यमयी व्यक्ति कौन था?
- उसका जयराज से क्या संबंध था?
- सूरज और जयराज में क्या दुश्मनी थी?
- जयराज कहां गायब हो गया?
- सूरज का कैरियर कैसे तबाह हुआ?
- आखिर क्या अंजाम रहा उस दुश्मनी का?

इन सब प्रश्नों के लिए वेदप्रकाश कांबोज जी का एक्शन- थ्रिलर उपन्यास 'आखिरी बाजी' पढना होगा। 

364. चक्कर पर चक्कर- वेदप्रकाश कांबोज

यहाँ हर कोई चला रहा था अपना-अपना चक्कर
 चक्कर पर चक्कर- वेदप्रकाश कांबोज, सस्पेंश-थ्रिलर

       कभी कभी किस्मत ऐसे चक्कर चलाती है कि मनुष्य कुछ भी समझ नहीं पाता और जो वह समझता है वह हो नहीं पाता और जो होता है वह समझ नहीं पाता। इस होने, न होने, समझने और न समझने का जो ही किस्मत का चक्कर कहते हैं। अगर मनुष्य इसे समझ ले तो फिर किस्मत जा चक्कर ही कहां रह जाता है।
       आदरणीय वेदप्रकाश कांबोज का उपन्यास 'चक्कर पर चक्कर' पढा यह वास्तव में एक चक्करदार और दिमाग को चक्करा देने वाला रोचक उपन्यास है।
       मैं अगस्त 2020 में क्रमशः 'कदम-कदम पर धोखा', 'चन्द्रहार के चोर 'चन्द्रमहल का खजाना' के पश्चात चौथा उपन्यास 'चक्कर पर चक्कर' पढा।
अब चर्चा करते हैं उपन्यास के कथानक पर।
पहली बात यह है कि कहानी में कुछ 'चक्कर' है इसलिए एक तरफ की बात करें तो दूसरी तरफ की चर्चा छूट जाती है। अब बात कहां से आरम्भ करें......सोचने दो...
    वकील दिलीप बनर्जी से चर्चा शुरू करते हैं। उपन्यास 'विजय-रघुनाथ सीरीज' का है। जिसमें रघुनाथ का किरदार बहुत कम है और विजय का किरदार मध्य पश्चात रफ्तार में आता है‌ और उससे पहले विजय का एक शिष्य दिलीप बनर्जी उपन्यास में नायक की तरह नजर आता है। वह नायक की तरह नजर आता है, वास्तव में उपन्यास नायक तो विजय है।
       वकील दिलीप बनर्जी से एक महिला मिलती है- वह अपनी सुरक्षा के लिए वकील से चर्चा करती है। लेकिन दिलीप बनर्जी सत्य का अन्वेषण, महिला की सुरक्षा के लिए कहीं और ही जा उलझता है।
वह बहुत ही खतरनाक आदमी है।" वह अपनी नाक साफ करती हुई बोली - "तुम्हें उसे धमकाना नहीं चाहिये था...धमका कर उसे किसी काम के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता...बल्कि धमकाने से वह और भी ज्यादा जिद्दी और खतरनाक हो जाता है।"
"आखिर तुम मुझे उससे इतना डराने की कोशिश क्यों कर रही हो?"
"मैं तुम्हें डरा नहीं रही...बल्कि असलियत बता रही हूँ।"

        वहीं विजय के पास एक अज्ञात फोन आता है की एक आदमी का कत्ल होने वाला है। लेकिन दिलीप बनर्जी तो एक कत्ल के केस में उलझ ही जाता है।
       यहीं से उपन्यास उलझ जाता है। कहानी घुमावदार हो जाती है। एक एक किरदार संदिग्ध नजर आने लगता है। दिलीप बनर्जी जैसा तीव्र दिमागधारी वकील भी चक्कर में आ जाता है।
          विजय जिस कत्ल का अन्वेषण करता है उस घर में मात्र चार सदस्य हैं। जिनमें से दो संदिग्ध है और और मजे की बात ये है की एक को विजय ज्यादा संदिग्ध मानता है और दूसरे को उस घर के सदस्य संदिग्ध मानते हैं।
दिलीप बनर्जी कुछ अलग ही उलझ जाता है-
"तुम्हें देख रहा हूँ और सोच रहा हूँ कि आखिर तुम यह क्या चक्कर पर चक्कर चलाए जा रही हो और क्यों चला रही हो?"
"क्या मतलब?"

बस यही मतलब समझने के लिए उपन्यास 'चक्कर पर चक्कर' पढना होगा।

Friday, 7 August 2020

363. चन्द्रमहल का खजाना- वेदप्रकाश कांबोज

बांग्लादेश के खजाने की कहानी
चन्द्रमहल का खजाना- वेदप्रकाश कांबोज

भारत 2006 से बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम तक

पिछली शाम बाग में टहलते हुये उसने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की थी-"हे भगवान, तुम कहीं हो तो किसी उपन्यास का नहीं तो कम से कम एक बढिया सी कहानी का प्लाॅट तो इस दिमाग में उतारने की कोशिश करो।"
और लो देखो चमत्कार। प्लाॅट दिमाग में उतरने की बजाय साक्षात उसके सामने उतर आया था।

       रात के अँधेरे में एक लड़की दौड़ी चली आ रही थी। उसके बदन पर कोई कपड़ा नहीं था। दो गुण्ड़े पिस्तौल से उसका पीछा कर रहे थे.........।

         क्या खूब हो जब हम ऐसा सोचे और हमारे सामने एक कहानी आ जाये। हम तो फिर उपन्यासकार बन जाये। क्योंकि हमारे उपन्यास ने नायक ने तो ऐसा ही सोचा और हो गया सत्य। लेकिन यह सत्य उसे बहुत सी कठिनाईयों में भी ले गया। सीधा भारत से बांग्लादेश वाया कोलकाता।
हम बात कर रहे हैं....चलो खुद नायक की ही सुन लेते हैं- मेरा नाम मानव वर्मा है। पेशे से जर्नलिस्ट हूँ और इस जगह पर कुछ दिन से एकांतवास कर रहा हूँ।
     लेकिन यह एकांतवास उसे नसीब न हुआ। उसके जीवन में आयी उस लड़की ने मानव वर्मा को विदेश यात्रा करवा दी। 

        उपन्यास कथानक चाहे सन् 2006 भारत से आरम्भ होता है लेकिन इसकी नीव तो सन् 1971 बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम के समय ही रखी गयी थी।
सन् 1971
उस समय पूर्वी पाकिस्तान में जबरदस्त उथल पुथल मची हुयी थी। बरसों बाद पाकिस्तान के सैनिक शासकों ने देश की जनता को अपने प्रतिनिधित्व चुनने का मौका दिया था।

         लेकिन यह मौका पाकिस्तान को पसंद 
हीं आया और शीघ्र ही पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष आरम्भ हो गया।

        पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश से धन लूट कर पाकिस्तान अपने यहाँ जमा कर रहा था। लेकिन वह धन अचानक ऐसे गायब हुआ की किसी को भी न मिला। धन लूटने वाले, उसे छुपाने वाले सब खत्म हो गये। 

Monday, 3 August 2020

362. चन्द्रहार के चोर- वेदप्रकाश कांबोज

एक चोर की कहानी
चन्द्रहार के चोर- वेदप्रकाश कांबोज

आदरणीय वेदप्रकाश कांबोज जी लोकप्रिय जासूसी साहित्य के एक दैदीप्यमान सितारे हैं। विजय-रघुनाथ जैसी चर्चित शृंखला लिखने वाले कांबोज जी ने थ्रिलर और मर्डर मिस्ट्री युक्त उपन्यास भी लिखे हैं।
       अगस्त माह में 'कदम-कदम पर धोखा' के पश्चात इसी माह मेरे द्वारा पढा गया उनका द्वितीय उपन्यास है 'चन्द्रहार के चोर'।
     एक चोर के जीवन पर लिखा गया एक रोचक उपन्यास है। चोरी के उद्देश्य से एक रात घर से निकला एक नौजवान, चोरी में तो असफल रहा लेकिन उसके सामने कुछ और ही हैरतजनक घटना घटित हो गयी।  
      आगामी दिवस जब वह अपने कौतुहल का निवारण करने के लिए उस जगह गया तो......
उसे एक अपराधी के रूप में गिरफ्तार किया गया।
उस चोर का उस घटना से कोई संबंध न था।
वह उस शहर/ गांव का निवासी भी न था।
वह अपने उद्देश्य चोरी में भी असफल रहा था।
फिर पुलिस ने उसे क्यों गिरफ्तार कर लिया ।
और वह भी उस जुर्म में जो उसने किया ही न था।

है ना एक दिलचस्पी कथानक।
इस दिलचस्पी कथानक के रचनाकार हैं वेदप्रकाश कांबोज और उपन्यास है चन्द्रहार के चोर।

Saturday, 1 August 2020

361. कदम कदम पर धोखा- वेदप्रकाश कांबोज

धोखे और फरेब से भरा एक रोचक उपन्यास
कदम कदम पर धोखा- वेदप्रकाश कांबोज

     सन् 2020 में जून माह तक मैंने 100 किताबें पढ ली। यह मेरे लिए एक कीर्तिमान है और कम समय में 100 किताबें पढने का कारण Lockdown रहा है।
      विद्यालय बंद था, और में स्वयं भी एक तरह से कमरे में और फिर घर में बंद था। तब किताबें ही सहारा थी। और हां, इस दौरान माह जून में पन्द्रह उपन्यास कुशवाहा कांत जी के पढे लिये थे। साल में एक-दो बार मैं किसी एक लेखक विशेष पर ही ध्यान देता हूँ। इससे पूर्व टाइगर और जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी के सतत उपन्यास पढ चुका हूँ। मेरे पास जिस लेखक के उपन्यास उपलब्ध हैं, एक बार उनके सभी उपलब्ध उपन्यास पढ कर अलग रख देता हूँ ताकि इस लेखक को फिर लंबे समय तक नहीं पढना। इसी क्रम में अब अपने समय के चर्चित उपन्यासकार वेदप्रकाश कांबोज जी को पढने जा रहा हूँ। उनके लगगभ मेरे पास तीस उपन्यास उपलब्ध हैं। इसी क्रम में उनका अगस्त माह में प्रथम उपन्यास पढा है- कदम कदम पर धोखा
     कभी-कभी मनुष्य कुछ ऐसी परिस्थितियों में उलझ जाता है की उसे हर जगह धोखा ही मिलता है। इन परिस्थितियों में तो विवेक भी काम नहीं करता। वह जिस भी व्यक्ति पर विश्वास करता है, वही उसे धोखा दे जाता है। यही होता है 'कदम-कदम पर धोखा' उपन्यास में।
   यह कहानी है धनजय और अजय नामक दो भाईयों की। जिसमें मुख्य पात्र छोटा भाई अजय है। धनजय को एक समाचार पत्र में प्रकाशित किसी कार्यक्रम की तस्वीर प्राप्त होती है। वह तस्वीर में एक शख्स की पहचान के लिए एक हद तक पागल हो उठता है।
आखिर उस तस्वीर में ऐसा क्या था? यही रहस्य जानने के लिए धनजय का छोटा भाई अजय आगे बढता है। लेकिन उसकी खोज को रोकने के लिए पहले से ही लोग जाल बिछाकर बैठे थे।
- आखिर उस तस्वीर में ऐसा क्या रहस्य था?
- धनजय और अजय उस तस्वीर से/ में क्या खोज रहे थे?
- कौन लोग उस तस्वीर के रहस्य को सामने नहीं आने देना चाहते थे?
- आखिर वह तस्वीर थी तो एक समाचार पत्र में, जिसे सबने देखा था।

       इस रहस्यमयी कहानी जो को एक तस्वीर से संबंध रखती है को जानने के लिए आपको वेदप्रकाश कांबोज जी का उपन्यास 'कदम-कदम पर धोखा' पढना होगा। 

Thursday, 30 July 2020

360. साईकिल- बाल पत्रिका

बच्चों का संसार
साईकिल- बाल पत्रिका

साईकल बच्चों की द्वि मासिक बाल पत्रिका है। यह बच्चों के लिए काफी उपयोगी है। मुझे साईकिल पत्रिका का 'जून-जुलाई 2020' अंक पढने‌ को मिला।
       इस पत्रिका में बच्चों के लिए कहानियाँ, कविताएं और अन्य बाल उपयोगी सामग्री उपलब्ध है।
      इस अंक की मुझे विशेष कहानी लगी वह है प्रभात जी द्वारा लिखित कहानी 'घर' यह मनुष्य के मानवेतर संबंधों पर आधारित बहुत ही मार्मिक रचना है। इसके अतिरिक्त मुझे कहानी 'समानता' रोचक लगी, यह एक सनकी राजा की हास्य कथा है।
         मिनाक्षी नटराजन का यात्रा वृतांत 'भारत का सफर' ज्ञानवर्धक आलेख है। वहीं सुभद्रा सेनगुप्त का 'कांचीपुरम के पल्लव' छठी शताब्दी के पल्लव वंश की अच्छी जानकारी प्रदान करता है।
        इस अंक में कहानियों के अतिरिक्त कविताएँ, आलेख, बाल पहेलियाँ जैसे विविध सामग्री भी उपलब्ध है।
साईकिल पत्रिका एक अच्छा प्रयास है लेकिन प्रस्तुत अंक शामिल रचनाएँ बाल साहित्य की श्रेणी की होती हुए भी मुझे बच्चों के लिए उपयोगी नहीं लगी। अधिकांश रचनाएँ (कहानी, कविता) रोचक नहीं है, इनमें बाल रस होने की जगह बौद्धिकता हावी है।
        अगर पत्रिका बच्चों के लिए है रचनाएँ भी उन्हीं के मानसिक स्तर की होनी चाहिए।
        अधिकांश रचनाएँ बहुत छोटी हैं लेकिन पृष्ठ पर चित्र बड़े और शब्द छोटे हैं। अधिकांश पृष्ठ तो मात्र चित्रों से भरे गये हैं। हालांकि यह चित्र वाला प्रयोग भी अच्छा है।
इस पत्रिका को हम अगर कागज के स्तर पर देखे तो यह वास्तव में बहुत अच्छे कागज मुद्रित है, लेकिन कहानी के स्तर पर अभी प्रकाशक/संपादक महोदय को बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। बच्चों को रोचक और हास्यप्रद कहानियाँ अच्छी लगती हैं लेकिन ये कहानियाँ कुछ अलग श्रेणी की हैं।
पत्रिका- साईकिल
आवृत्ति- द्वि मासिक
प्रकाशक-
पृष्ठ- 68
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Wednesday, 29 July 2020

359. शिविरा- पत्रिका

शिक्षा विभाग राजस्थान की मासिक पत्रिका
  शिवरा- जुलाई-2020

'शिविरा पत्रिका' हमारे विद्यालय में आने वाली एक नियमित मासिक पत्रिका है। इसमें शैक्षिक समाचारों के अतिरिक्त आलेख, पुस्तक समीक्षा के साथ-साथ कुछ स्थायी सतम्भ भी प्रकाशित होते हैं।
शिविरा का जुलाई 2020 अंक पढने को मिला। जिसके प्रधान सम्पादक हैं सौरभ स्वामी जी, जो बीकानेर शिक्षा निदेशालय के निदेशक भी हैं‌।  

राजस्थान शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह टोडासरा जी ने शिक्षा के क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण कार्य किये हैं और बहुत से तत्काल लिये गये निर्णय शिक्षा जगत में हमेशा याद किये जायेंगे। इस अंक में गोविन्द सिंह टोडासरा जी का साक्षात्कार पढनीय है।।
     शिक्षा मंत्री जी याद किया  स्वतंत्र भारत के प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालचारी राजाजी का कथन मुझे बहुत अपील करता है। उन्होंने कहा कि बालक वे चमकते हुए सितारे हैं जो भगवान के हाथ से छूटकर धरती पर गिर पड़े।
        कुछ हैरानीजनक भी है- इस साक्षात्कार में बताया गया है की गत सत्र 2019-20 में 1,31,19,38,156.
हैरानी की बात एक अरब से ज्यादा पाठ्यपुस्तकों पर खर्च करने के पश्चात आगामी सत्र 2020-21 में सारा पाठयक्रम (कक्षा10,12 के अतिरिक्त) बदल दिया गया।
राजीव अरोड़ा जी का आलेख 'गुरु पूर्णिमा' एक महत्वपूर्ण आलेख है जो गुरु की महिमा का बखान करता है।
अगर गुरु की महिमा हो और कबीर का जिक्र न आये यह तो असंभव है। आगामी आलेख डाॅ. कृष्णा आचार्य जी का 'कबीर' शीर्षक से ही है।
'गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।'

      डाॅ. रमेश 'मयंक' जी का आलेख 'प्रभावी शिक्षण' प्रत्येक अध्यापक के लिए उपयोगी आलेख है। उन्होंने क ई बिन्दुओं के माध्यम से शिक्षण को प्रभावी बनाने के उपाय बताये हैं।

       वैश्विक महामारी कोरोना पर एक आलेख है-'कोरोना-19 के बाद का शैक्षिक परिदृश्य' यह जयनारायण द्विवेदी जी का आलेख कोरोना के बाद. शैक्षिक स्थिति का आंकलन करता है‌।
        शिक्षा विमर्श में चैनाराम सीरवी का आलेख 'गिजुभाई बधेका का दर्शन' बहुत रोचक आलेख है जो हमें बताना है की बच्चों को शारीरिक दण्ड नहीं देना चाहिये बल्कि उनकी बौद्धिकता के अनुसार शिक्षण कार्य की व्यवस्था होनी चाहिए।
         पर्यावरण संरक्षण पर दो आलेख हैं एक कुलदीप सिंह का 'पारिवारिक उत्सवों का हिस्सा बनें वृक्षारोपण' और दूसरा आलेख है स्नेहलता शर्मा का 'पर्यावरण एवं जल संरक्षण'।
       स्तम्भ बाल शिविरा में बच्चों की रचनाओं को शामिल करना वास्तव में प्रशंसनीय और बच्चों के उत्साह को बढाने में उपयोगी है।
इसके अतिरिक्त अन्य आलेख, स्तंभ, सूचनाएं और रचनाएँ पठनीय है।
पत्रिका- शिविरा
अंक- जुलाई-2020
पृष्ठ- 50
संपर्क- वरिष्ठ संपादक, शिविरा पत्रिका
माध्यमिक शिक्षा राजस्थान, बीकानेर-334011

Tuesday, 28 July 2020

358. वरुणपुत्री- नरेन्द्र कोहली

पौराणिक, इतिहास, कल्पना और फैटेंसी का रोचक संसार
वरुणपुत्री- नरेन्द्र कोहली, उपन्यास

भारत कभी विश्व गुरु कहलाता था, लेकिन अब वह अपनी सभ्यता और संस्कृति से इतना विमुख हो गया है की उसे अपनी सभ्यता और संस्कृति की पहचान तक नहीं रही।
दूसरी तरफ मनुष्य विज्ञान के इतना समीप हो गया है की उसे विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी सत्ता पर विश्वास नहीं रहा। इस ब्रह्माण्ड में बहुत कुछ ऐसा है जो मनुष्य और विज्ञान से परे है। हमारे लिए हमारा संसार बस इतना ही है जितना हमने पढा और विज्ञान ने हमें बताया है।
        यह कहानी है विक्रम नामक एक युवक की। जो वरुणपुत्री के साथ समुद्र और द्वारका (श्री कृष्ण जी की जलमग्न नगरी) का भ्रमण करता है।  वहाँ वरुणपुत्री उसे इतिहास और पौराणिक तथ्यों से अवगत करवाती है।    कहानी का द्वितीय भाग विक्रम के परिवार से संबंधित है। उनके आचरण और परिणाम को चित्रित किया गया है।
इस उपन्यास ने मुझे विशेष कर प्रभावित किया है। इसका कारण है एक तो जलमग्न द्वारका का इतिहास, चित्रण और सरकारीवर्ग की उपेक्षा का विश्लेषण करना। एक मिट्टी का विस्तार होना- क्योंकि मैं जानती हूँ कि यह रेत कहाँ की है और यह भी जानती हूँ। कि यह स्थानीय रेत से युद्ध कर रही है। यदि यह क्रम चलता रहा तो स्थानीय रेत समाप्त हो जायेगी और यह रेत सारे सागर-तट पर फैल जायेगी।...”
“अपने आप रेत कैसे फैल जायेगी?" विक्रम चकित था।

      यह विस्तार मात्र मिट्टी का ही नहीं सभ्यता, संस्कृति, भाषा- बोली, देश आदि किसी भी रूप में हो सकता है।

        समय के अनुसार बहुत से शब्दों के और घटनाओं के अर्थ बदल जाते हैं। नरेन्द्र कोहली जी की यह विशेषता है की वे तथ्यों को कसौटी पर परख कर प्रस्तुत करते हैं। महाभारत और रामायण के संबंधित बहुत सी भ्रांतिया समाज में प्रचलित हैं। 'वरुणपुत्री' में महाभारत कालिन कुछ भ्रांतियों का निवारण किया गया है। जैसे‌ एक भ्रांति है की अर्जुन ने एक नाग कन्या से शादी की थी। क्या यह संभव है कोई मनुष्य नागिन से शादी कर ले।
     "आप कौरव्य के विषय में कुछ कह रही थीं।”
     "वह नागों की एक जाति का राजा था। उसकी एक पुत्री थी उलूपी, जिसने अर्जुन से विवाह किया था।
    “तो वह सर्प रूपी नागिन तो नहीं रही होगी, नहीं तो अर्जुन उससे विवाह कैसे कर लेता ? कोई मनुष्य किसी नागिन के साथ अपनी गृहस्थी कैसे बसा सकता है।”
     “इतना ही नहीं। उनका एक पुत्र भी था।”
      “तो वह नाग कहलाने वाली किसी जाति की स्त्री रही होगी; किन्तु होगी वह स्त्री ही।”
      “सम्भव है।” वरुणपुत्री बोलीं,

वरुणपुत्री एक काल्पनिक उपन्यास है पर वह हमें बहुत कुछ सोचने के लिए विवश करती है, एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है, हमारी समझ को विकसित करती है, अपनी सभ्यता और संस्कृति पर गर्व करने के बहुत से तथ्य हमें प्रदान करती है।
       नरेन्द्र कोहली जी की मुझे विशेषकर इसीलिए पसंद है की वे हमारी सभ्यता और संस्कृति को परिष्कृत कर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। वर्तमान में बहुत से लेखक रामायण और महाभारत समय के पात्रों को इनता विकृत रूप दे रहे हैं जैसे उन्होंने कभी इन महाकाव्यों को पढा ही नहीं, वहीं नरेन्द्र कोहली जी इनके विपरीत महाकाव्यों को और भी परिष्कृत करते नजर आते हैं।
       अगर इन महाकाव्यों के समय को समझना है आगामी पीढी को कुछ सार्थक प्रदान करना है तो नरेन्द्र कोहली जी को अवश्य पढें।
       मुझे कुछ विशेष लगा वह यहाँ प्रस्तुत है-द्वारका के ही समान संसार के और भी अनेक ऐतिहासिक नगर सागर में डूबे हुए हैं। दक्षिणी यूनान में सागर-तट पर एक ग्राम है पावलोपेत्री। उसके निकट ही समुद्र में पाँच मीटर नीचे पांच सहस्र वर्ष पुराना नगर पावलोपेत्री दिखाई पड़ता है। वह आज के नगरों के समान सुनियोजित ढंग से बना हुआ है। कई भवन दोमंज़िले भी हैं और उनमें बारह कमरों तक का निर्माण हुआ है।...जमाइका का पोर्ट रॉयल,...जापान के दि पिरामिड ऑफ़ युनागुनी।...चीन की लॉयन सिटी...पीरु में दि टेंपल अंडर लेक टिटिकाका...अर्जनटाइना का विला एपिक्यूटइन...मिश्र में क्लियोपैट्रा का महल।”
“नहीं। मैं नहीं जानता। हमें भूगोल में यह सब नहीं पढ़ाया जाता।”
“स्कूल में सब कुछ नहीं पढ़ाया जाता। वह तो पहली सीढ़ी है। उसके पश्चात् तो अपनी रुचि से अध्ययन किया जाता है। उसे ही स्वाध्याय कहते हैं। तुम्हारी रुचि हो तो तुम अब स्मरण कर लो।" वरुणपुत्री ने कहा, “जिन जलमग्न नगरों का अब तक पता लगा है, संसार में द्वारका समेत ऐसे नौ नगर हैं।...”

        भारतीय सभ्यता और संस्कृति का रोचक और तथ्यात्मक ढंग से प्रस्तुत करती यह पुस्तक महत्वपूर्ण और पठनीय रचना है। इतिहास, पौराणिक, कल्पन और फैटेंसी का अद्भुत संगम इस रचना में प्रशंसनीय है।
       इसमें जितना रोचक और सरल तरीके से हमारे गौरवशाली अतीत का वर्णन किया गया है ऐसा अन्यत्र दुर्लभ है।
उपन्यास- वरुणपुत्री
लेखक- नरेन्द्र कोहली
प्रकाशक-
फॉर्मेट- ebook
पृष्ठ- 100

एमेजन   लिंक-  
वरुणपुत्री- नरेन्द्र कोहली

Monday, 27 July 2020

357. दस बजकर दस मिनट- अनिल गर्ग

जासूस अनुज का कारनामा
दस बजकर दस मिनट- अनिल गर्ग

दिल्ली निवासी अनिल गर्ग जी मर्डर मिस्ट्री लिखने में सिद्धहस्त नजर आते हैं। उनकी अभी तक की रचनाएं किंडल पर eBook के रूप में ही उपलब्ध हैं। मेरे द्वारा पढे जाने वाला यह इनका द्वितीय उपन्यास है इससे पूर्व इनका उपन्यास 'मुर्दे की जान खतरे में' में पढा था। दोनों उपन्यास ही मुझे रूचिकर लगे।
       अब चर्चा करते हैं 'दस बजकर दस मिनट' उपन्यास की। इस उपन्यास का आरम्भ एक मर्डर से होता है और यह भी संयोग था की जहाँ यह कत्ल होता है वहीं पर अपना उपन्यास नायक जासूस अनुज भी उपस्थित था। लेकिन अनुज ने कभी कल्पना भी न की थी अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर इस कत्ल का संबंध उसके शहर से होगा और उसकी इंवेस्टीगेशन भी उसे करनी होगी। 

        दिल्ली का घनी आबादी वाला कृष्णानगर का इलाका। इसी इलाके में भल्ला ग्रुप के मालिक सुदर्शन भल्ला अपने भरे पूरे परिवार के साथ रहते थे। परिवार में सुदर्शन भल्ला की धर्म पत्नी विमला देवी, उनके तीन सुपुत्र और दो पुत्रियाँ और उनके दो बड़े लड़कों की पत्नियां उस कृष्णा नगर की कोठी में रहते हैं। सुदर्शन भल्ला का व्यापार देश ही नहीं विदेश तक फैला था। .........भल्ला साहब के बड़े लड़के का नाम था गुलशन भल्ला और उसकी पत्नी का नाम था वैशाली। उनके दूसरे लड़के का नाम था अखिल भल्ला और उसकी पत्नी का नाम था कंचन और तीसरा लड़का था मानव।
मानव की लाश दिल्ली से लगभग 1100 किलोमीटर दूर भरूच नाम के उस छोटे से शहर की रेल पटरियों पर पड़ी थी।

Sunday, 26 July 2020

356. आखरी गोली- अकरम इलाहाबादी

खान-बाले सीरीज का रोचक कारनामा
आखरी गोली- अकरम इलाहाबादी

अकरम इलाहाबादी अपने समय के प्रसिद्ध उपन्यासकार रहे हैं। ये मूलतः उर्दू के लेखक थे, हालांकि इनकी प्रसिद्धि हिन्दी में अनुवादित उपन्यासों के कारण ज्यादा रही है।
यह कहानी है सार्जेंट बाले के दोस्त शौकत की। शौकत एक हास्य किस्म का व्यक्ति है। एक यात्रा के दौरान उसके साथ बहुत अजीब घटित होता है।
        हालांकि मस्तमिजाज का शौकत इन बातों को गंभीरता से न लेने वाला शख्स है। लेकिन जब एक कत्ल का इल्जाम उसके सिर पर आया तो वह स्वयं हैरान रह गया की आखिर कौन उसका दुश्मन है जो उसके साथ खेल खेल रहा है।

शौकत के बुलावे पर सार्जेंट बाले इस केस को हल करता है।
- शौकत के रूपये कहां गायब हुये?
- किसके कत्ल का आरोप शौकत पर लगा?
- शौकत के पीछे कौन लोग थे?
- खान-बाले ने केस कैसे हल किया?

इन सब प्रश्नों के उत्तर तो अकरम इलाहाबादी के उपन्यास ' आखरी गोली पढने पर ही मिलेंगे।

Saturday, 25 July 2020

355. यादावरी- डाॅ. जितेन्द्र सोनी

यादों का सफर
यादावरी- डाॅ. जितेन्द्र कुमार सोनी (IAS)
साहित्य अकादेमी के युवा पुरस्कार से सम्मानित लेखक की कृति आम दिनों से अलग कुछ बातें जो अपनी यादावरी के लिए
दर्ज की डायरी के पन्नों पर, 
समर्पित
उन तारीखों के नाम
जो नये कैलेंडर के साथ
मिटी नहीं। 

मित्र श्यामसुंदर जी को यादावरी भेंट-08.11.2019

यादावरी डाॅ. जितेन्द्र कुमार सोनी जी की डायरी के कु़छ पृष्ठ है। वे पृष्ठ जो उनके जीवन की अनुभवी है, यह अनुभूति डायरी के माध्यम से व्यक्तिगत से सर्वजन की हो गयी है। 

Friday, 24 July 2020

354. मास्टरमाईन्ड- हरचरण सिंह बावा

एक पुत्र की प्रतिशोध कहानी
मास्टर माइण्ड- हरचरण सिंह बावा

      लड़ाई के मुख्यतः तीन कार माने जाते हैं- जर, जोरू और जमीन। अगर लोकप्रिय जासूसी साहित्य में देखे तो अशिकांश घटनाएं इन तीन विषयों पर ही आधारित हैं। प्रस्तुत उपन्यास 'मास्टरमाइण्ड' भी जर अर्थात् धन पर आधारित है।
      जैसा की लेखक महोदय ने उपन्यास के अंतिम आवरण पृष्ठ पर लिखा है- सनसनी खेज, हैरत अंगेज कारनामों से भरपूर, रोंगटे खड़े़ कर देने वाली वाली डकैती जो इजिप्ट देश में एक पिरामिड में डाली गी।
       लेकिन पाठक मित्रो कहानी बस इतनी सी नहीं है, यह तो उपन्यास की भूमिका है वास्तविक कहानी तो कुछ और ही है।
उत्तरप्रदेश से मित्र प्रेम मौर्य जी ने उपन्यास 'मास्टरमाइण्ड' मुझे सप्रेम भेजा है, मैं उनका धन्यवाद करता हूँ। 
      अब चर्चा करते हैं, उपन्यास के विषय वस्तु पर। सर्वप्रथम स्पष्ट कर दूं यह एक लघु उपन्यास है जिसके लेखक हरचरण सिंह बावा हैं। मेरे द्वारा पढा गया इनका यह प्रथम उपन्यास है।
यह कहानी आरम्भ होती है चार दोस्तों से। जो बदमाश प्रवृत्ति के हैं। 
माउंट आबू, सिरोही
       होटल के एक कमरे में चार बचपन के यार, जिनका काम चोरी चकारी करना है, आज इकट्ठे हुए हैं। इन सब में जो मास्टर माइंड कहलाता है, उस का नाम आनंद है। उसी के कहने पर यह मिटिंग रखी है। 

Thursday, 23 July 2020

353. लाश का रहस्य - गुप्तदूत

किसकी थी वह लाश
लाश का रहस्य- गुप्तदूत

सब इन्सपेक्टर फिर लाश को ध्यानपूर्वक देखने लगा। लाश इतनी फूल चुकी थी कि न तो उसकी रंगत का अनुमान लगाया जा सकता था और न ही राष्ट्रीयता का। कपड़ों से कुछ अनुमान सम्भव था, लेकिन उसके शरीर पर तो बनियान और अंडर वियर ही थे, जो अब काफ़ी फट चुके थे और उनकी अब धज्जियां ही रह गई थीं। चेहरा तो पहचान योग्य था ही नहीं, बल्कि इतना भयानक हो गया था कि सिपाही तो उस पर नज़रें भी नहीं टिका सकते थे। - इसी उपन्यास में से
           लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में Ghost writing का एक विशेष दौर रहा है, और यह दौर काफी लम्बा चला है। इसी समय 'स्टार पब्लिकेशन' ने अपना एक छद्म लेखक 'गुप्तदूत' प्रस्तुत किया। गुप्तदूत के उपन्यास जासूसी और मनोरंजन से परिपूर्ण होते थे। गुप्तदूत नाम से किन-किन लेखकों ने लेखन किया है यह तो नहीं पता चला, लेकिन जो भी लिखा है वह पठनीय है।
   'गुप्तदूत' रचित उपन्यास 'लाश का रहस्य' पढने को मिला। यह एक मर्डर मिस्ट्री आधारित रचना है।