Friday, 20 February 2026

710. नकली चेहरे - कर्नल रंजीत

175 साल पुरानी प्रतिशोध कथा
नकली चेहरे - कर्नल रंजीत- 1974

मनुष्य जीवन बहुत ही अनोखा है। उसका जीवन किस पद्धति से संचालित होता है यह कहना कभी-कभी बहुत मुश्किल हो जाता है । मनुष्य कभी तो अपना सर्वस्व अपर्ण तक कर देता है और कभी कभी अपने प्रतिशोध में इतना डूब जाता है कि वह सदियों तक प्रतिशोध की अग्नि में जलता रहता है। 

कर्नल रंजीत के उपन्यासों में प्रतिशोध जैसे विषय पर बहुत कुछ लिखा गया है। इ‌नके पात्र वर्षों- सदियों बाद तक प्रतिशोध की अग्नि में जलते रहते हैं और अवसर मिलते ही अपना प्रतिशोध पूरा करते नजर आते हैं। प्रस्तुत उपन्यास भी कुछ ऐसा है जहां एक व्यक्ति लगभग 175 वर्ष पश्चात अपना प्रतिशोध लेता है।
क्या यह संभव था ? 
अगर संभव था तो कैसे ? 
इसी संभव को जानने का प्रयास है कर्नल रंजीत का उपन्यास 'नकली चेहरे' जो सन् 1974 में प्रकाशित हुआ था । यह मूलतः एक मर्डर मिस्ट्री कहानी है।

Saturday, 14 February 2026

709. उलटी लाशें- कर्नल रंजीत- 1984

प्रतिशोध कथा
उलटी लाशें- कर्नल रंजीत- 1984

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में कर्नल रंजीत अद्भुत रहस्यमयी कथाओं के लेखक के रूप में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हैं। इनकी कहानी और पात्र दोनों ही गहरे होते हैं। अत्यंत उलझाव और ज्यादा पात्रों को एकत्र करना और फिर उन्हीं के मध्य रोचक संघर्ष दिखाने में कर्नल रंजीत अपना एक अलग कौशल रखते हैं। इनकी अधिकांश कहानियों में प्रतिशोध मुख्य बिंदु उभरकर सामने आता है । 
प्रस्तुत उपन्यास 'उलटी लाशें' भी एक प्रतिशोध से संबंधित के मर्डर मिस्ट्री रचना है। जहां हत्यारा कत्ल करने के पश्चात लाश को उलटा लटका देता है। 
वह ऐसा क्यों करता है ? 
National Highway-911

जहरीला धुआं
रात का अन्तिम पहर बीत रहा था।
अभी सूर्योदय होने में लगभग एक घंटा था। सारा बंगला खामोशी की चादर में लिपटा शान्त सोया पड़ा था। अचानक टेलीफोन की घंटी की आवाज बंगले में छाये सन्नाटे चीरकर गूंज उठी ।
सोनिया की नींद उचट गई। उसने लेटे-लेटे ही टेलीफोन पर एक नजर डाली। टेलीफोन की घंटी निरन्तर बजे चली जा रही थी।
उसने उटकर एक लम्बी अंगड़ाई ली और फिर हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठा लिया।

708.प्रेतात्मा की डायरी - कर्नल रंजीत

अलौकिक शक्तियां और मर्डर मिस्ट्री
प्रेतात्मा की डायरी - कर्नल रंजीत

मनुष्य के जीवन में बहुत कुछ ऐसा घटित होता है जो उसकी कल्पनाओं से बाहर का होता है। भारत प्रसिद्ध जासूस मेजर बलवंत के जीवन में भी एक ऐसा केस आया था जिसकी कल्पना मेजर बलवंत ने कभी नहीं की थी। वैसे तो मेजर भूत-प्रेत पर यकीन नहीं करता लेकिन 'प्रेतात्मा की डायरी' में उसे कुछ अलग कल ताकतों का आभास होता है। मेरे विचार से कर्नल रंजीत का यह एकमात्र उपन्यास ही ऐसा होना चाहिए जिसमें अलौकिक शक्ति का वर्णन है अन्यथा कर्नल रंजीत भूत-प्रेत जैसी बातों का खण्डन करते नजर आते हैं।
  
रहस्यपूर्ण हत्याएं
सुबह से ही आकाश पर बादल छाए हुए थे। और शाम होते-होते मटियाले और भूरे बादलों ने काली घटाओं का रूप ले लिया था। शाम के सूरज के डूबते ही हवा में तेजी आ गई थी जिसके कारण हिमाचल प्रदेश के उस पर्वतीय भाग में सदियों के बीत जाने पर भी सर्दी बढ़ गई थी।
ऐसा लग रहा था जैसे सर्दी का मौसम फिर लौटकर आ गया हो।
रामनगर शहर से लगभग पांच मील दूर छोटा-सा गांव राजनगर रात की बांहों में लिपटा शान्त सोया पड़ा था। अचानक सर्दी बढ़ जाने के कारण लोग शाम से ही अपने-अपने घर में जा घुसे थे। जो धन सम्पन्न थे वे गर्म बिस्तरों में पड़े सर्दी मिटाने की कोशिश कर रहे थे। और जो निर्धन थे वे अलाव के पास बैठे सर्दी भगाने का असफल प्रयास कर रहे थे ।
हवा के तेज झोंकों से जब कमरा बर्फ की तरह ठंडा हो गया तो राजेश ने हाथ बढ़ाकर खिड़की बन्द कर दी और पर्दा गिरा दिया।
(प्रेतात्मा की डायरी- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)

Saturday, 7 February 2026

707. पीले बिच्छू- कर्नल रंजीत

मेजर बलवंत बांग्लादेश में
पीले बिच्छू- कर्नल रंजीत

राजस्थान के हनुमानगढ जिले के उपखंड संगरिया के मित्र हैं श्री रतन लाल चौधरी । दिसम्बर 2025 में रतन भाई के यहाँ जाना हुआ और उनसे मैं 15 उपन्यास कर्नल रंजीत के लेकर आया । फरवरी 2026 से उन्हीं उपन्यासों को पढा जा रहा है। और समयानुसार उनकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। 
इन 15 उपन्यासों में से एक उपन्यास है पीले बिच्छू ।
हम समीक्षा की शुरुआत उपन्यास के प्रथम पृष्ठ के दृश्य से करते हैं।

आदेश भी, निवेदन भी
मेजर बलवन्त एक खूबसूरत और खुशबूदार फूल सोनिया के बालों में लगा रहा था। तभी उसने बंगले के अहाते में एक मोटर साइकल की आवाज सुनी । मेजर बलवन्त ने वह फूल जल्दी से सोनिया के बालों में लगा दिया और एक ओर हट गया। मोटर साइकल बरामदे में आकर रुक गई। आफिस के सदर दरवाजे के बाहर फर्श पर भारी बूटों की आवाज पैदा हुई और कुछ पल के बाद एक लम्बे कद का नौजवान, जिसने सुर्ख और खाकी पगड़ी बांध रखी थी, दरवाजे में दिखाई दिया ।
वह दोनों एड़ियां जोड़कर खड़ा हो गया, जिसका अर्थ था कि वह अन्दर आने की अनुमति मांग रहा था ।
मेजर बलवन्त ने उसके विशेष अभिवादन का उत्तर उसीके विशेष अंदाज़ में दिया और सिर के इशारे से अन्दर आने का इशारा किया । वह नौजवान मेजर की मेज़ तक आया। उसने सोनिया को देखकर उसका अभिवादन किया। मेजर यह देखकर बहुत प्रसन्न हुआ कि वह एक शिष्ट नौजवान था। नौजवान ने अपने कंधे पर लटके हुए थैले में से एक लम्बा लिफाफा निकालकर मेज पर रख दिया। उस लिफाफे पर सील-मुहर लगी हुई थी ।
मेजर बलवन्त ने उस लिफाफे पर नजर डाली। उस पर उभरे हुए काले अक्षरों में लिखा था- 'देश-सेवा के लिए' । एक कोने में लाल रोशनाई से तीन शब्द लिखे हुए थे- 'गुप्त तथा गोपनीय' । 
लिफाफे की बाईं ओर एक छपा हुआ पता था :
'देश सेवक मंडल, बम्बई शाखा
शिवाजी पार्क, बम्बई'

नमस्ते पाठक मित्रो,
कर्नल रंजीत के उपन्यास 'पीले बिच्छू' की समीक्षा में आपका हार्दिक स्वागत है। 

Friday, 6 February 2026

706. दुल्हन की चीख- कर्नल रंजीत - 1973

 प्रतिशोध की कथा
दुल्हन की चीख- कर्नल रंजीत 1973

विचित्र प्रतिशोध का रहस्योद्घाटन करने वाला एक सशक्त जासूसी उपन्यास...
मेजर बलवन्त सुबह सवेरे फोन पर किसीसे बात कर रहा था। थोड़ी देर पहले टेलीफोन की घंटी बजी थी। मेजर बाथरूम में था। वह तौलिया लपेटकर शयनकक्ष में फोन सुनने आया था । दूसरी ओर से उसने जो आवाज सुनी, वह बड़ी विचित्र थी। कोई अपने होंठों पर टिशू पेपर अर्थात् बारीक कागज लगाकर उससे बात कर रहा था ताकि उसकी आवाज पहचानी न जा सके। मेजर ने इस बात का अनुमान दूसरी ओर से बोलने वाले की पहली बात से ही लगा लिया था। मेजर के कान में जो आवाज पड़ रही थी उसमें थरथरी थी, लेकिन शब्द स्पष्ट थे ।
"मेजर साहब, आप बहुत बड़े जासूस माने जाते हैं। हम आपको एक चैलेंज दे रहे हैं।" थरथराती हुई आवाज आई, "आज शाम को शहर का कोई न कोई बैंक लूट लिया जाएगा - ठीक उस समय जब लोग बैंक में आ-जा रहे होंगे। आप तो जानते ही हैं कि बम्बई के कुछ बैंक शाम के चार बजे से शाम के सात बजे तक पुनः अपना कारोबार करने लगते हैं। आपमें हिम्मत हो तो आज शाम को यह डाका रोककर दिखाइए !"
"क्या मैं पूछ सकता हूं कि मुझे यह चैलेंज क्यों दिया जा रहा है ? बैंक पर डाके की सूचना पुलिस को देनी चाहिए थी, मुझे नहीं। मैं ऐसे चैलेंज स्वीकार नहीं करता। अभी कोई घटना हुई नहीं । किसी ने मुझे उस घटना की खोजबीन करने के लिए कुछ कहा नहीं
।(दुल्हन‌ की चीख- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)
नमस्ते पाठक मित्रो,
    एक बार हम फिर उपस्थिति हैं कर्नल रंजीत के रोचक उपन्यासों की एक शृंखला के साथ और इस शृंखला में हमारे पास हैं कर्नल रंजीत के 15 उपन्यास । हम गत वर्ष 2025 में कर्नल रंजीत के लगभग 20 उपन्यासों की समीक्षा प्रस्तुत की थी और इस बार 2026 में हम फरवरी माह से एक बार फिर उसी शृंखला को आरम्भ कर रहे हैं। इस में हमारे पास हनुमानगढ़ के संगरिया तहसील के निवासी रतन चौधरी साहब से हमें पन्द्रह उपन्यास प्राप्त हुये हैं। इन पन्द्रह की समीक्षा आपको लगातार प्राप्त होती रहेगी। कोशिश रहेगी एक माह में पांच उपन्यासों की समीक्षा की और इसके अतिरिक्त मेरे पास जो कर्नल रंजीत के शेष उपलब्ध उपन्यास हैं उनकी समीक्षा का प्रयास रहेगा। 
भाई रतन चौधरी से प्राप्त उपन्यास हैं - दुल्हन की चीख, पीले बिच्छू, प्रेतात्मा की डायरी, उलटी लाशे, नकली चेहरे, ट्रेन एक्सीडेंट, हत्यारे की पत्नी, खूनी बदला,चण्डी मंदिर का रहस्य, उलटी खोपड़ी, जापानी पंखा, कातिल मेरा नाम, मौत की परछाई, मेजर बलवंत बंगलादेश में, विजय दुर्ग का रहस्य, खूनी रिश्ते  इत्यादि ।
  चलो अब आरम्भ करते हैं उपन्यास 'दुल्हन की चीख' की समीक्षा । सर्वप्रथम तो हम बता दें यह एक प्रतिरोधात्मक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है।