जिंदगी की तलाश में...
सुकून- विक्रांत शुक्ला, हाॅरर उपन्यास
तेज हवा के झोंके से दीवार पर टँगा कलैण्डर फड़फडा़या और उसने अपनी नजर आसमान से हटाकर आज की तारीख पर डाली, 13 अगस्त 1978, उसने तारीख पढी और एक झूठी हँसी हँसा। (पृष्ठ-03)
'सुकून' उपन्यास की कहानी है सन् 1978 ई. की। दो दोस्त और दोनों की बैचेन जिंदगी। दोनों को तलाश है सुकून की।
मुझे हाॅरर कहानियाँ पसंद नहीं है। वह चाहे फिल्म हो या किताब। मुझे बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती। लेकिन मेरा स्वभाव विक्रांत शुक्ला जी के उपन्यास 'सुकून' ने कुछ बदला है।
श्री विकास नैनवाल जी के ब्लॉग पर सुकून उपन्यास की समीक्षा पढी थी। तभी से इस उपन्यास को पढने की इच्छा बलवती हुयी। और जब इस उपन्यास को पढने बैठा तो एक बैठक में ही पढ दिया। हाॅरर उपन्यास होकर भी मुझे बहुत अच्छी लगी।
देव स्थानीय प्रादेशिक फिल्मों का सफल अभिनेता है। लेकिन कुछ समय से उसके जीवन से 'सुकून' गायब है। उसके घर में अजीबोगरीब घटनाएं घटित होती हैं। उन घटनाओं ने देव को परेशान कर रखा है।
