Friday, 19 June 2026

728. निर्मला- प्रेमचंद

दहेज, अनमेल विवाह और स्त्री-त्रासदी का मार्मिक कहानी
निर्मला -  प्रेमचंद

हिंदी साहित्य में यदि सामाजिक यथार्थ को सबसे प्रभावशाली ढंग से चित्रित करने वाले उपन्यासों की चर्चा की जाए तो प्रेमचंद का ‘निर्मला’ अग्रणी कृतियों में गिना जाएगा। यह उपन्यास केवल एक युवती की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि उस समाज का दर्पण है जहाँ दहेज, अनमेल विवाह, संदेह और रूढ़ सामाजिक मान्यताएँ एक स्त्री का जीवन नष्ट कर देती हैं। प्रेमचंद ने इस कृति के माध्यम से तत्कालीन भारतीय समाज की उन कुरीतियों पर तीखा प्रहार किया है, जिनकी पीड़ा आज भी कहीं न कहीं दिखाई देती है।

निर्मला- प्रेमचंद 

नमस्ते पाठक मित्रो,

Tuesday, 16 June 2026

727. पूनम का चाँद- सुरेश साहिल

प्रेम और वासना के बीच का कड़वा सच
पूनम का चांद- सुरेश साहिल

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के सितारे सुरेश साहिल जी द्वारा लिखा गया 'पूनम का चांद' उपन्यास समाज से खत्म होते रिश्ते, बढती लालसा, मजबूर जनता के साथ अच्छे लोगों की कथा कहता यह उपन्यास तात्कालिक समय का एक बोल्ड कथा‌नक है। 
  पूनम का चांद उपन्यास की समीक्षा से पूर्व हम इसके प्रथम दृश्य को देखते हैं।

पूनम का चांद- सुरेश साहिल

"अमरपुर आ गया बाबू...।" पास बैठे वृद्ध की आवाज उसके कानों में पड़ी थी। चौंककर ही उसने आंखें खोली थीं।
प्लेटफार्म पर ट्रेन रुक चुकी थी। इधर-उधर नजर डाली। डिब्बा खाली हो चुका था...। वह उठा था। उठकर जूते निकाले थे सीट के नीचे से...। बालों में हाथों की उंगलियों से कंघी करते हुए ही प्लेटफार्म पर उतरा था।
प्लेटफार्म पर नजर दौड़ाई, तो इक्का-दुक्का ही लोग घूमते दिखाई दिये थे उसे ।
"क्या टाइम हुआ है?" उसने पूछा था बराबर से गुजरते हुए व्यक्ति से। रेलवे का ही कोई कर्मचारी लगा था।
"चार बजे हैं।" समय बताकर वह व्यक्ति आगे बढ़ गया था।
"प्लेटफार्म पर ही सुबह होने का इन्तजार करना पड़ेगा...।" वह बड़बड़ाया था।

Wednesday, 10 June 2026

726. अछूत - दया पवार

‘अछूत’ : दलित जीवन की पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान का दस्तावेज़
अछूत - दया पवार, दलित आत्मकथा

मराठी दलित साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर दया पवार की आत्मकथात्मक कृति ‘अछूत’ भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, गरीबी, अपमान और संघर्ष की ऐसी मार्मिक कथा है, जो केवल एक व्यक्ति की जीवन-गाथा नहीं रह जाती, बल्कि पूरे दलित समाज के सामूहिक अनुभव का दस्तावेज़ बन जाती है। यह रचना पाठक को भावुक ही नहीं करती, बल्कि उसे सामाजिक यथार्थ से सीधा सामना करने के लिए विवश भी करती है।

अछूत - दया पवार- दलित आत्मकथा

   ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की आत्मकथा 'जूठन' बहुत समय पहले पढी थी और उसके बाद दलित साहित्य में दया पवार जी की आत्मकथा 'अछूत' पढने का अकसर मिला है।
        जब कभी भी वह अकेला होता है, उससे अक्सर मेरी मुलाक़ात हो जाती है। जब से मैंने होश सँभाला है, तब से मैं उसे अच्छी तरह पहचानता हूँ। जितना अपनी परछाईं से परिचय हो, उतना परिचित है वह। पर कभी-कभी अँधेरा छा जाने पर या बदली छा जाने पर जैसे स्वयं की परछाई लुप्त हो जाती है, वैसे ही वह भी लुप्त हो जाता है। पिछले कई वर्षों से उसे भीड़ से बड़ा लगाव रहा है। हमेशा किसी के साथ या सभा-सम्मेलनों में दिखाई देता है।(प्रथम पृष्ठ से चंद पंक्तियां)