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Thursday, 30 January 2025

629. जादुई जंगल - मिथिलेश गुप्ता

कहां से आये अश्वमानव
जादुई जंगल- मिथिलेश गुप्ता 

ये कहानी कई बरस पुरानी है।
जब शायद तुम्हारे परदादा के परदादा, तुम्हारी उम्र के रहे होंगे।
ये कहानी है उस जंगल की जो न सिर्फ जादुई था बल्कि कुछ अजीबोगरीब रहस्यों से भरा हुआ था।
कहते हैं उस जंगल की कहानी किसी परियों की कहानी से कम नहीं थी।
ये कहानी उन अश्वमानवों की हैं जिनपर कभी इस जंगल का भविष्य निर्भर था।
ये कहानी उन जादुई मेंढकों की भी है जिन की हुकूमत उस जंगल के कोने-कोने तक फैली हुई थी।
कहते हैं ये कहानी आज भी सिर्फ एक कहानी की तरह ही सुनाई जाती है, कुछ लोग इसे सत्य मानते हैं तो कुछ लोग एक कोरी कल्पना।
सच क्या है, ये मैं नहीं जानती, पर कहते हैं आज भी वो जादुई जंगल उसी स्थान पर बसा हुआ है जहाँ वो सालों से था।
कुछ चमत्कारी शक्तियाँ उस जंगल को इंसानी नज़रों से बचाये हुए हैं।
आइए, चलते है जादुई जंगल के इस सफर पर...

अश्वमानवों की वापसी - मिथिलेश गुप्ता
नमस्ते पाठक मित्रो,

Saturday, 18 April 2020

295. 11:59- मिथिलेश गुप्ता

 जंगल, जहाँ से लोग गायब हो जाते थे...
11:59, मिथिलेश गुप्ता, हाॅरर उपन्यास

मिथिलेश गुप्ता जी का द्वितीय हाॅरर उपन्यास किंडल पर पढा यह एक रोमांचक उपन्यास है।
इस उपन्यास 
की कहानी  शुरू होती है पांच दोस्तों से - रुद्र और टीना, मेरे क्लासमेट रोनित, संजना और मैं यानि अभिमन्यु सिंह। (पृष्ठ संख्या..)
अभिमन्यु की जन्मदिन की पार्टी थी, और पांचों दोस्त पार्टी के लिए अपने अंकल के फार्म हाउस जा रहे थे। समय था रात के 10:30, और उन्हें फार्म हाउस जाने के लिए एक खतरनाक जंगल पार करना था। - वह अमावस की एक मनहूस काली रात थी। चारों तरफ घुप्प अंधेरा फैला हुआ था। घुप्प अंधेरों के बीच हमारी कार एक वीरान सड़क पर तेज़ी से दौड़ रही थी। जहाँ दूर-दूर तक सिवाए हमारे अलावा और कोई नज़र नहीं आ रहा था।
          फिर इसी जंगल से आरम्भ होती हैं कुछ दिल दहला देने वाली खतरनाक घटनाएं। एक के बाद एक घटती उन घटनाओं को समझना ही मुश्किल हो जाता है की आखिर क्या सत्य है और क्या असत्य, क्या वो सब वास्तविक है या फिर कोई भ्रम। लेकिन.......कई बार कुछ घटनाएँ इस तरह से घटती है कि उस से बच पाना मुश्किल होता है। आज की घटना भी कुछ ऐसी ही कहावत को हकीक़त में बदलने जा रही थी।
आखिर वह हकीकत क्या थी?
आखिर जंगल में ऐसा क्या था?
क्या वो दोस्त जंगल के मायाजाल से बाहर निकल पाये?

यह एक ऐसा रहस्य है जो आप उपन्यास पढकर ही जान सकते हैं। 




Tuesday, 21 August 2018

135. वो भयानक रात- मिथिलेश गुप्ता

एक भयानक रात जंगल में...
वो भयानक रात- मिथिलेश गुप्ता, हाॅरर लघु उपन्यास, रोचक-पठनीय।
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वह एक भयानक रात थी, अमावश की भयानक रात और ऐसी भयानक रात में एक परिवार जंगल में फंस गया।  उस परिवार कर साथ एक हादसा हुआ एक ऐसा हादसा जिसने पूरे परिवार को दहला दिया।
       उस हादसे बाद समय रुक गया....जी हां, समय वहीं ठहर गया।
क्या यह हादसा था या परिवार का वहम।
   
            लोकप्रिय उपन्यास जगत में सूरज पॉकेट बुक्स ने बहुत कम समय में अपनी पहचान स्थापित की है। परम्परागत जासूसी उपन्यासों के कागज के स्तर से मुक्त होकर अच्छे स्तरीय कागज पर उपन्यासों का प्रकाशन आरम्भ किया।
               सूरज पॉकेट बुक्स ने सभी श्रेणी के उपन्यासों का प्रकाशन किया है और इसी क्रम में मिथिलेश गुप्ता का उपन्यास है 'वो भयानक रात'। यह एक हाॅरर उपन्यास है।
                
                  वो भयानक रात की घटना है 11 जनवरी 2004 की जब रिटायर्ड आर्मी मेजर संग्राम सिंह अपनी पत्नी अर्चना, पुत्र राहुल और पुत्रवधु गीता के साथ एक पार्टी से घर लौट रहे थे।  रास्ते में एक भयानक जंगल था और रात का समय था।
  अमावश की एक मनहूस काली रात
   चारों तरफ घनघोर अंधेरा।
एक सुनसान सड़क और सड़क के दोनों तरफ फैला हुआ एक घना जंगल।
सड़क पर तेजी से दौड़ती हुयी एक कार। (पृष्ठ-09)
   उस भयानक जंगल में कार का एक्सीडेंट हो गया।  यह भी एक रहस्य था की आखिर एक्सीडेंट किस के साथ हुआ।
"....सड़क पर तो कोई भी नहीं दिखाई दे रहा है, न ही आसपास कोई परछाई। फिर तुम टकराए किस चीज से....मतलब कार किस चीज से टकराई थी?"- संग्राम सिंह ने राहुल को अजीब तरह से घूरते हुए कहा।
" पता नहीं पापा ऐसा लगा कोई था सड़क पर....लेकिन‌ मुझे कोई दिखाई नहीं दिया लगता है ऐसा लगा जैसे कोई अचानक से कार के सामने आया हो....।"(पृष्ठ-13)
- आखिर इस परिवार के साथ जंगल‌ में क्या हादसा पेश आया?
- आखिर कार का एक्सीडेंट किस के साथ हुआ?
- क्या यह परिवार जंगल से सुरक्षित लौट पाया?
- क्या रहस्य था इस अमावस्य की काली रात का?
            मिथिलेश गुप्ता का यह उपन्यास आकार में चाहे छोटा हो लेकिन कथ्य में बहुत शानदार है। कहानी आरम्भ से अंत रहस्य के आवरण में‌ लिपटी रहती है। उपन्यास में हर पल यह रहस्य बना रहता है की इस परिवार के साथ आगे क्या होगा।
    
                 संग्राम सिंह का परिवार जब जब जंगल में कार एक्सीडेंट के पश्चात एक अदृश्य जाल में फंस जाता है। यहीं से उपन्यास में जबरदस्त मोड आरम्भ हो जाता है। राहुल जब एक्सीडेंट वाली जगह से लौट कर आता है तो वह गुमसुम सा रहता है।
       संग्राम सिंह जब राहुल को ढूंढकर लाता है तो कार के पास से अर्चना और गीता को गायब पाता है। उपन्यास में इस प्रकार के घटनाक्रम उपन्यास को बहुत रोचक बनाते हैं।
       उपन्यास में शाब्दिक/मुद्रण गलतियाँ हैं, हालांकि यह कोई ज्यादा नहीं है।
    उपन्यास का अंतिम दृश्य जो की लेखक ने मेरे विचार से फिल्मी रूप से लिख दिया, क्योंकि वहाँ कुछ स्पष्ट नहीं किया। मिल में दृश्य पाठक ले समक्ष होता है तो वहाँ दृश्य को समझाने की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन उपन्यास में दृश्य को शब्दों से जीवित करना पड़ता है।
"पापा"
"आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे?"
अचानक संग्राम सिंह राहुल की तरफ एकदम से पलटा।
उसका चेहरा देख कर राहुल सकते में गया। (पृष्ठ-47)
       अब राहुल क्यों चौंका?
        बाकी परिवार केे सदस्य क्यों नहीं चौंके?
अगर लेखक यहाँ कुछ कोशिश करता तो यह दृश्य और भी अच्छा बनता व सार्थक बनता।
    
       उपन्यास की कहानी अच्छी व रोचक है। लेखक का प्रयास वास्तव में सराहनीय है।
          
निष्कर्ष-
           हाॅरर उपन्यास बहुत अच्छा व दिलचस्प है। कहानी में पृष्ठ दर पृष्ठ रहस्य पढता चला जाता है। पाठक प्रतिपल यही सोचता है की आगे क्या होगा।  यह रहस्य अंत तक यथावत रहता है।
उपन्यास जबरदस्त, रोचक और पठनीय है।
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उपन्यास- वो भयानक रात
लेखक- मिथिलेश गुप्ता
ISBN- 978-1-944820-21-3
प्रथम संस्करण- Set. 2015
द्वितीय संस्करण- Feb. 2017
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स
पृष्ठ- 52
मूल्य-80₹
लेखक ब्लॉग
www.mihileshgupta152.blogspot.in