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Tuesday, 15 December 2020

404. जंक्शन बिलारा- अकरम इलाहाबादी

 मौत की गाड़ी...
जंक्शन बलारा- अकरम इलाहाबादी

बलारा जंक्शन
बलारा ढाई-तीन सौ छोटे बड़े मकानों का एक औसत दर्जे का कस्बा था। यहाँ कि आबादी किसानो, जमींदारों और मजदूरों और देहाती महाजनों पर निर्भर थी। 
    लेकिन इस छोटे से कस्बे की शांति को भंग करती थी एक ट्रेन। - बलारा जंक्शन से आधी रात के सन्नाटे में एक भयंकर मौत की रेल गुजरती थी। बिलकुल काली और भयानक जो कहां से आती और कहां जाती है किसी को नहीं मालूम स्टेशन मास्टर और स्टेशन का स्टाफ भी इस रात आठ बजे ही स्टेशन छोड़कर भाग जाते और स्टेशन से दूर दूर तक की सीमा में आदमी तो क्या जानवर तक दिखाई नहीं पड़ते। इस विचित्र रेल के बारे में यहाँ प्रसिद्ध था कि जो कोई उसे देख लेता है तुरंत मर जाता है। जब वह आने लगती है तो वातावरण में एक भयानक सी सीटी गूंजती है। सिग्नल अपने आप गिर जाता है, प्लेटफार्म की घण्टी अपने आप बजने लग जाती है। ...बलारा स्टेशन का मास्टर कहता है कि उसमे केवल एक बार इस गाड़ी को बंद कमरे की खिड़की से देखा था। पच्चीस वर्ष पहले की दुर्घटना में मरे हुये मुर्दे चलाते हैं। वह मुर्दा की रेल है। जिसके इंजन के सिर पर हैडलाइट की जगह मुर्दे की खोपड़ी दिखाई पड़ती है।

Sunday, 26 July 2020

356. आखरी गोली- अकरम इलाहाबादी

खान-बाले सीरीज का रोचक कारनामा
आखरी गोली- अकरम इलाहाबादी

अकरम इलाहाबादी अपने समय के प्रसिद्ध उपन्यासकार रहे हैं। ये मूलतः उर्दू के लेखक थे, हालांकि इनकी प्रसिद्धि हिन्दी में अनुवादित उपन्यासों के कारण ज्यादा रही है।
यह कहानी है सार्जेंट बाले के दोस्त शौकत की। शौकत एक हास्य किस्म का व्यक्ति है। एक यात्रा के दौरान उसके साथ बहुत अजीब घटित होता है।
        हालांकि मस्तमिजाज का शौकत इन बातों को गंभीरता से न लेने वाला शख्स है। लेकिन जब एक कत्ल का इल्जाम उसके सिर पर आया तो वह स्वयं हैरान रह गया की आखिर कौन उसका दुश्मन है जो उसके साथ खेल खेल रहा है।

शौकत के बुलावे पर सार्जेंट बाले इस केस को हल करता है।
- शौकत के रूपये कहां गायब हुये?
- किसके कत्ल का आरोप शौकत पर लगा?
- शौकत के पीछे कौन लोग थे?
- खान-बाले ने केस कैसे हल किया?

इन सब प्रश्नों के उत्तर तो अकरम इलाहाबादी के उपन्यास ' आखरी गोली पढने पर ही मिलेंगे।