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Tuesday, 16 June 2026

727. पूनम का चाँद- सुरेश साहिल

प्रेम और वासना के बीच का कड़वा सच
पूनम का चांद- सुरेश साहिल

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के सितारे सुरेश साहिल जी द्वारा लिखा गया 'पूनम का चांद' उपन्यास समाज से खत्म होते रिश्ते, बढती लालसा, मजबूर जनता के साथ अच्छे लोगों की कथा कहता यह उपन्यास तात्कालिक समय का एक बोल्ड कथा‌नक है। 
  पूनम का चांद उपन्यास की समीक्षा से पूर्व हम इसके प्रथम दृश्य को देखते हैं।

पूनम का चांद- सुरेश साहिल

"अमरपुर आ गया बाबू...।" पास बैठे वृद्ध की आवाज उसके कानों में पड़ी थी। चौंककर ही उसने आंखें खोली थीं।
प्लेटफार्म पर ट्रेन रुक चुकी थी। इधर-उधर नजर डाली। डिब्बा खाली हो चुका था...। वह उठा था। उठकर जूते निकाले थे सीट के नीचे से...। बालों में हाथों की उंगलियों से कंघी करते हुए ही प्लेटफार्म पर उतरा था।
प्लेटफार्म पर नजर दौड़ाई, तो इक्का-दुक्का ही लोग घूमते दिखाई दिये थे उसे ।
"क्या टाइम हुआ है?" उसने पूछा था बराबर से गुजरते हुए व्यक्ति से। रेलवे का ही कोई कर्मचारी लगा था।
"चार बजे हैं।" समय बताकर वह व्यक्ति आगे बढ़ गया था।
"प्लेटफार्म पर ही सुबह होने का इन्तजार करना पड़ेगा...।" वह बड़बड़ाया था।

Tuesday, 18 February 2025

632. मुरझाये फूल फिर खिले- ओमप्रकाश शर्मा

अंधविश्वास से टकराते एक युवक की कहानी
मुरझाये फूल फिर खिले- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला- 2025 और यहाँ से खरीदी गयी किताबों में से दो किताबें जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी की हैं। एक 'पी कहां' और दूसरी 'मुरझाये फूल फिर खिले' । दोनों ही सामाजिक उपन्यास हैं, भावना प्रधान ।
'पी कहां' पढने के बाद 'मुरझाये फूल फिर खिले' पढना आरम्भ किया । यह उपन्यास अपने नाम को सार्थक करता हुआ एक भाव प्रधान उपन्यास है, जिसे पढते-पढते आँखें नम हो ही जाती हैं । समाज फैले अंधविश्वास को बहुत अच्छे से रेखांकित किया गया और उसका सामना भी जिस ढंग से किया गया है वह प्रशंसनीय है।

Monday, 17 February 2025

631. पी कहां- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय

एक प्रेम कथा
पी कहां- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा 

पुस्तक प्रेमियों के महाकुंभ 'नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला- 2025' में दो दिवस का भ्रमण हम चार साथियों ने किया और काफी संख्या में पुस्तकें भी लेकर आये । जहाँ मेरा यह तृतीय पुस्तक मेला था वहीं अन्य तीन साथी पहली बार ही आये थे, हालांकि इनमे से एक पुस्तक प्रेमी भी न था ।
गुरप्रीत सिंह, अंकित , सुनील भादू, राजेन्द्र कुमार, ओम सिहाग

पुस्तक समीक्षा से पहले थोड़ी सी बात पुस्तक मेले की । मैं गुरप्रीत सिंह अपने साथी ओम सिहाग (अध्यापक) अंकित (बैंककर्मी) और राजेन्द्र सहारण के साथ दो दिवस तक मेले में रहा । ओम सिहाग को साहित्य पढने में काफी रूचि है, वहीं अंकित को अंग्रेजी प्रेरणादायी पुस्तकें अच्छी लगती हैं और राजेन्द्र को बस साथ घूमना था, और घूमा भी । जहाँ राजेन्द्र और ओम मेरे ही गांव से हैं वहीं अंकित हरियाणा (ऐलनाबाद ) से है। हम चार साथियों के अतिरिक्त मेले में सुनील भादू (हरियाणा) और संदीप जुयाल (दिल्ली) का भी अच्छा साथ रहा ।

  राजस्थान से एक बुर्जग पाठक हैं, उनकी इच्छा पर जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा जी के दो उपन्यास 'पी कहां' और ' मुरझाये फूल फिर खिले' तथा एक उपन्यास कमलेश्वर का 'काली आंधी' लिया था। हालांकि बुजुर्ग महोदय दत्त भारती के अच्छे प्रशंसक हैं लेकिन दत्त भारती जी के इच्छित उपन्यास मेले में नहीं मिले ।

अब बात करते हैं प्रस्तुत उपन्यास 'पी कहां' की ।
कौन जाने पावस ऋतु में 'पी कहां' पुकारने वाले पपीहे की व्यथा क्या होती है।
कौन जाने... और कैसे जाने !
सागर वह जो अपनी गहराई सदा छुपाये रखे। दीपक वह जो जले... तिल तिल जलने पर भी जिसके उर अन्तर में अंधेरा रहे।
अपना अपना भाग्य ही तो है।
पपीहा वह जो पावस में, तब जबकि सूर्य के प्रकाश को दल बादल उमड़-घुमड़ कर अंधकार में बदल दे... पुकारे... 'पी कहां'।

Saturday, 23 March 2024

599 आश्रिता- संजय

कहानी वही है।
आश्रिता- संजय

श्यामा केमिकल्स की दस मंजिली इमारत समुद्र के किनारे अपनी अनोखी शान में खड़ी इठला रही थी। दोपहरी ढल चुकी थी और सूरज की परछाईं पश्चिम आकाश से सागर के गम्भीर सीने में उतरने लगी थी। ढलते सूरज की पीली किरणें लहरों से आँख-मिचौनी खेलती हुई देखने वालों की आँखें चकाचौंध कर रही थीं, मानो सागर में लहरें नहीं सोने के चमकते टुकड़े तैर रहे हों। (उपन्यास अंश)

  लोकसभा चुनाव -2024 में मेरी नियुक्ति विद्यालय से चुनाव शाखा में 'स्वीप कार्यक्रम' अंतर्गत लगायी गयी है। पहला दिन था, कोई विशेष कार्य नहीं था और दूसरा दिन भी वैसा ही रहा। इन दो दिनों में मैंने लेखक 'संजय' का उपन्यास 'आश्रिता' पढा। यह एक परम्परागत चली आ रही कहानी है।
लेखक ने बहुत ही सरल शब्दों में अच्छे प्रस्तुतीकरण के साथ उपन्यास को पठनीय बना दिया है।

Monday, 29 May 2023

564. खाली आंचल- सुरेश चौधरी

एक मार्मिक रचना 'खाली आंचल'
लेखक- सुरेश चौधरी

वर्तमान रोमांटिक उपन्यासों के समय में एक सामाजिक उपन्यास का आना एक आश्चर्य की तरह है। अगर आपने लोकप्रिय साहित्य में 'राजहंस, राजवंश,मनोज' जैसे लेखकों को पढा है तो सुरेश चौधरी जी का प्रस्तुत उपन्यास आपको उस दौर की याद दिला देगा।

शाम का धुंधलका धीरे-धीरे गहरे अन्धेरे में तब्दील हो गया। परन्तु सेठ मुरारीलाल की कोठी इस गहरे अन्धेरे में भी इस तरह से जगमग कर रही थी, जैसे कोई दुल्हन अपने असीम रूप की छटा बिखेरती हो। (खाली आंचल उपन्यास के प्रथम पृष्ठ से)

जीवन परिवर्तन और संघर्षशील है। ऐसा ही जीवन जीता है प्रस्तुत उपन्यास का नायक आकाश। एक अमीर घराने युवक आकाश जब एक रात अपने घर लौटता है तो एक घटना ने उसका जीवन ही बदल दिया था। आकाश चाहकर भी उस घटना की पुष्टि नहीं कर पाता। लेकिन उसका हृदय इतना परिवर्तित हो चुका था की उसे घर का हर सदस्य अब बेगाना नजर आने लगा था।