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Thursday, 30 January 2025

630. दस बाल पुस्तकें

बाल साहित्य और हम 
बाल साहित्य की दस किताबों पर समीक्षा

मेरे विद्यालय 'राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय- 6LC' मॆं पुस्तकालय अभी शिशु अवस्था में है । यहां लगभग एक हजार किताबें हैं। उनमें से अशिकतर किताबें बाल साहित्य या कम पृष्ठ की लघु रचनाएं हैं। 
इनमें से कुछ रचनाएं जो मुझे अच्छी लगी उनके विषय में हम यहां चर्चा करेंगे । इस माह मैंने बाल साहित्य पर ध्यान केन्द्रित किया है । और इस पोस्ट में मैंने बाल साहित्य की दस लघु रचनाओं को एक साथ समाहित किया है।

01. महाराजा रणजीत सिंह - प्रीतम‌ सिंह
   

पंजाब के इतिहास में महाराजा रणजीत का नाम बहुत ही मान- सम्मान से लिया जाता है। कहां जाता है उनका शासन एक आदर्श शासन रहा है और महाराजा रणजीत सिंह एक जनप्रिय शासक रहे हैं।
  प्रस्तुत रचना में एक नानी अपने बच्चों को बहुत ही रोचक ढंग से महाराजा रणजीत की कहानी सुनाती है। 
इस लघु रचना की बड़ी विशेषता है इसका प्रस्तुतीकरण, कहानी कहने की कला । रचनाकार ने पुस्तक को कहीं भी ज्यादा तथ्यात्मक, आंकड़े युक्त बनाने का प्रयास नहीं किया है। इसे एक कहानी के रूप में दर्शाया गया है और वह भी छोटे बच्चों के स्तर अनुसार ।
   ऐसे प्रयास बच्चों में महापुरुषों के विषय में जानकारी प्रदान करने में सफल भी होते हैं। और कुछ वाक्य बच्चों में प्रेरणा प्रदान करने वाले भी नजर आते हैं।
पुस्तक- महाराजा रणजीत सिंह
पृष्ठ-     32
अनुवाद- रमेश बक्षी
चित्रांकन- नीता गंगोपाध्याय
मूल्य- 35₹
प्रस्तुत संस्करण- 2022

 

2. धरती से सागर तक- विनीता सिंघल
बाल साहित्य के अंतर्गत पढें एक रोचक और ज्ञानवर्धक पुस्तक ।

इतवार का दिन था और हर इतवार की तरह आज भी अंशु अपने दादा जी के साथ समुद्र के किनारे सैर करने आया था। उसे दूर-दूर तक फैला नीला सागर और उसमें उठती ऊंची लहरें आकर्षित करती थीं। समुद्र की लहरें जब किनारे को छूकर वापस लौटतीं तो पीछे छोड़ जाती थीं ढेर सारे शंख और सीपियां, जिन्हें इकट्ठा करना अंशु को बहुत अच्छा लगता था। उसने शंख और सीपियों का ढेर-सा खजाना इकट्ठा कर लिया था ।
  नमस्ते पाठक मित्रो,
आज प्रस्तुत है बाल साहित्य के अंतर्गत NBT द्वारा प्रकाशित एक छोटी सी पुस्तिका । यह छोटी सी रचना छोटे बच्चों पर आधारित है और छोटे बच्चों के लिए ही है ।
इसमें  हम जानेंगे धरती से लेकर सागर तक और सागर से लेकर धरती की अथाह गहराइयों तक ।
कहानी है अंशु नामक एक छोटे बच्चे की जो अपने दादा के साथ समुद्र किनारे शंख और सिपियां एकत्र कर रहा है । अंशु एक जिज्ञासु बालक है औ उसके दादा उसकी हर बात को ध्यान से सुनते हैं और उसके प्रश्नों का ज्ञानवर्धक उत्तर भी देते हैं।
  
"अच्छा मान लीजिए दादा जी, अगर सब जगह समुद्र ही समुद्र होते तो...?"
"तो न हम होते, न तुम होते...।"
"वह क्यों ?"
"जीवन के लिए पांच तत्व जरूरी होते हैं वायु, अग्नि, जल, प्रकाश और पृथ्वी । अगर इनमें से एक भी तत्व का अभाव हो तो जीवन संभव नहीं।"

   अंशु अपने मम्मी- पापा और बहन गीतू के साथ अण्डमान निकोबार घूमने जाता है जहां उनकी मुलाकात डाक्टर मित्रा से होती है जो बच्चों को वहां के भूगोल की अच्छी जानकारी देते हैं।
दोनों बच्चे जिज्ञासु हैं और डाक्टर मित्रा उनके प्रश्नों के उत्तर देते हैं। यहां ज्वालामुखी, पृथ्वी निर्माण आदि पर रोचक जानकारी मिलती है।
  वहीं नाव की यात्रा के मध्य भी समुद्र, जलीय जीव आदि पर दोनों प्रश्नों के माध्यम से उत्तर प्राप्त करते हैं।
दोनों बच्चों का जिज्ञासु मन न सिर्फ पाठक को उत्तर देता है बल्कि उत्तर के साथ रोचक भी प्रदान करता है।
  यह रचना जहाँ छोटे बच्चों के लिए ज्ञानवर्धक है वहीं वयस्कों को भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
   अगर आप अपने बच्चों को अच्छा साहित्य देना चाहते हैं, उनके ज्ञानवर्धक में सार्थक वृद्धि करना चाहते हैं तो यह रचना अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती है।
पुस्तक में रंगीन चित्र, उच्च गुणवता के पृष्ठ इसको और अच्छा बनाते हैं।

  National Book Trust की किताबों में शाब्दिक गलतियाँ होती नहीं पर इसमें तीन जगह शाब्दिक त्रृटियां नजर आयी ।
किताब- धरती से सागर तक
पृष्ठ-      36+2
मूल्य-    70₹
चित्राकंन- बिनय सिन्हा

Wednesday, 17 November 2021

473. ब्लू स्टार- प्रवीण कुमार झा

पंजाब और 1984 का आतंकवाद
ब्लू स्टार- प्रवीण झा

   
धर्म और योद्धाओं के राज्य पंजाब की भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट पहचान है। सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि साधन सम्पन्नता और व्यापारिक दृष्टि से भी पंजाब अग्रणी राज्य है।
   लेकिन एक ऐसा भी समय आया जब हँसते-खेलते पंजाब को मानों किसी की नजर लग गयी हो। जिंदा पंजाबी लोग आतंक के साये में सहमें-सहमें से रह‌ने लगे। सूर्य अस्त और पंजाबी मस्त वाली कहावत का अर्थ ही बदल गया। अब तो सूर्य अस्त होते ही लोग अपने घरों में सहमें से दुबक जाते थे।
     इस का सिर्फ एक ही कारण था - कथित संत जरनैल सिंह भिण्डरावाला।
- संत भिंडरावाले को कांग्रेस का बनाया भस्मासुर कहा जाता रहा है।
- कांग्रेस की मीडिया टीम ने भिंडरावाले को सिखों का नायक बना दिया।
   प्रवीण झा तथ्यों के साथ लेखन के लिए जाने जाते हैं। इनकी रचनाएँ चाहे आकार में छोटी होती हैं पर जानकारी से परिपूर्ण होती है। ऐसी ही रचना है 'ब्लू स्टार' जो 1984 में पंजाब फैले आतंकवाद - राजनीति को अनावरण करती है। लेकिन किसी एक पक्ष का आंकलन न कर मात्र तथ्यों को सामने रखता है।
    अब बात करते हैं पुस्तक 'ब्लू स्टार' की। यह रचना तात्कालिक घटनाक्रम‌ को तथ्यों के साथ प्रस्तुत करती है।
   सन् 70 के दशक में केन्द्र में कांग्रेस का शासन था।श्रीमती इन्द्रा गाँधी प्रधानमंत्री थी। वहीं पंजाब में अकाली दल का प्रभाव था।  
      अकाली दल पर तीन लोगों का वर्चस्व था— मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, संत हरचंद सिंह लोंगोवाल और गुरचरण सिंह तोहरा। लेकिन, इन्हें तोड़ना कठिन था। ज्ञानी जैल सिंह और संजय गांधी ने योजना बनायी कि एक नया सिख नेता खड़ा करना होगा, जो इन तीनों पर भारी पड़े।

Monday, 31 August 2020

372. बिजली के खंभों जैसे लोग- सूर्यनाथ सिंह

एक रोचक बाल रचना
बिजली के खंभों जैसे लोग - सूर्यनाथ सिंह

वह जून का महिना था। अमेरिका में वसंत का मौसम था। शनिवार का दिन। शाम के सात बजे थे।...
अमेरिका के केनेडी स्पेस सेंटर के वैज्ञानिक लगातार सुपर कम्प्यूटर के परदे पर नजरें गडा़ए हुये थे। इक्कीस दिन तक चक्कर काटने के बाद डिस्कवरी अंतरिक्ष यान धरती पर उतरने वाला था..... 

     यह कहानी गुरु नामक एक छोटे से बच्चे की। जिनका नाम है एस. सुंदरस्वामी। डिस्कवरी के चालक दल की अगुआई भारतीय मूल के वैज्ञानिक एस. सुंदरस्वामी ने की थी।
       यह कहानी अंतरिक्ष विज्ञान पर आधारित है। अंतरिक्ष यान डिस्कवरी तो सकुशल लौट आया पर वह अपने साथ कुछ ऐसा लेकर लौटा जिसका किसी भी पता नहीं था। और उसी का परिणाम यह निकला की सुंदरस्वामी का बच्चा गुरू एक अतिआधुनिक तकनीक 'फ्लक्स' माध्यम से गायब हो गया।
         गुरु की आँखें खुली तो उसने खुद को चार-पांच लंबे चौडे़ए लोगों से घिरा पाया। उसने गर्दन उठाकर देखा। इतने लंबे आदमी उसने कभी नहीं देखे थे। कहीं किसी किताब में भी नहीं पढा। उनकी लंबाई बिजली के खंभों जितनी रही होगी। (पृष्ठ-16)
- गुरु गायब कैसे हुआ?
- 'फ्लक्स' तकनीक क्या है?
- गुरु को कैसे खोजा गया?
- अन्य ग्रह का पृथ्वी से क्या संबंध है?
- अन्य ग्रह के लोग पृथ्वी ग्रह के संपर्क में जैसे आये?
उक्त प्रश्नों को जानने के लिए यह बाल रचना पढनी होगी।

Saturday, 25 July 2020

355. यादावरी- डाॅ. जितेन्द्र सोनी

यादों का सफर
यादावरी- डाॅ. जितेन्द्र कुमार सोनी (IAS)
साहित्य अकादेमी के युवा पुरस्कार से सम्मानित लेखक की कृति आम दिनों से अलग कुछ बातें जो अपनी यादावरी के लिए
दर्ज की डायरी के पन्नों पर, 
समर्पित
उन तारीखों के नाम
जो नये कैलेंडर के साथ
मिटी नहीं। 

मित्र श्यामसुंदर जी को यादावरी भेंट-08.11.2019

यादावरी डाॅ. जितेन्द्र कुमार सोनी जी की डायरी के कु़छ पृष्ठ है। वे पृष्ठ जो उनके जीवन की अनुभवी है, यह अनुभूति डायरी के माध्यम से व्यक्तिगत से सर्वजन की हो गयी है। 

Wednesday, 22 July 2020

352. हिमालयवासी गुरु के साये में- श्री एम

साधारण मनुष्य से असाधारण होने तक की आध्यात्मिक यात्रा
हिमालयवासी गुरु के साये में- श्री एम
    एक नवयुवक की भारत के दक्षिणी तट से हिमालय की रहस्यमयी ऊँचाईयों तक की रोमांचक यात्रा जहाँ से उसे अपने महान गुरु मिलते हैं- ज्ञानी, शक्तिवान् और स्नेहमय।

       आध्यात्मिक जीवन चरित पढने का यह मेरा प्रथम अवसर है। किसी के व्यक्तिगत जीवन‌ को पढना हमें तभी रूचिकर प्रतीत होता है, जब हम उस व्यक्ति के विषय में कुछ जानकारी रखते हैं या उस व्यक्ति से हमारा संबंध हो। इस दृष्टि से देखे तो उक्त जीवन चरित किसी भी दृष्टि से मेरे साथ संबंध नहीं रखता। मैंने तो 'श्री एम' का प्रथम बार नाम इस किताब से ही जाना है। 
       यह पुस्तक केरल के एक युवक की आध्यात्मिक 'रंक से राजा' होने की कहानी है कि कैसे वह अपने पूर्ण समर्पण, सच्ची लगन और एकनिष्ठा के आधार पर एक ओजस्वी योगी 'श्री एम' के रूप में विकसित हुआ। सरल भाषा में श्री एम अपनी मनमोहक हिमालयी यात्राओं और उनसे वापसी के वृतांत, औपनिषदिक दर्शन के गहरे ज्ञान और व्यक्तिगत अनुभवजन्य गहन आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि को मधुरता से पाठकों के साथ बांटते हैं- उन्हें एक अनूठी और विचारोत्तेजक यात्रा का अवसर प्रदान करते हैं। (फ्लैप कवर से) 

Thursday, 30 April 2020

304. COVID19@2020 - अमित नेहरा

Corona वायरस पर लिखी गयी किताब
COVID-19@2020- अमित नेहरा

अमित नेहरा जी पेशे से चिकित्सक हैं। उन्होंने covid-19 (कोरोना वायरस) को लेकर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आर्टिकल लिखे हैं, यह पुस्तक उन्हें आलेखों का संग्रह है।
यह आर्टिकल जहाँ एक तरफ Covid-19 के विषय में हमें जानकारी उपलब्ध करवाते हैं, वहीं covid-19 को लेकर फैली भ्रांतियों का तथ्यों सहित निवारण भी करते हैं।
 

       चाहे कोविड-19 का पता विश्व को वर्ष 2019 के अंतिम दिन ही चला हो मगर इसने अपना रौद्र रूप वर्ष 2020 की पहली तिमाही में ही दिखा दिया। इसी के चलते इस किताब का शीर्षक कोविड-19@2020 रखा गया।
केवल 20 से 60 नैनोमीटर तक के आकार वाले इस बेहद सूक्ष्म जीव की इस पुस्तक के लिखे जाने तक सारे संसार के किसी भी देश, कंपनी या वैज्ञानिक के पास कोई दवाई, इलाज या वैक्सीन नहीं थी। दुनिया के पास इस शैतान से बचने के लिए था तो वह था सिर्फ कोविड-19 से सम्बंधित डेटा (आंकड़े), केवल इसी डेटा के आधार पर इससे शुरुआती लड़ाई लड़ी गई। सम्पूर्ण मानवता को बचाने के लिए लड़ी गई इस लड़ाई में कहाँ-कहाँ, क्या-क्या तरीके अपनाए गए, उनमें से कितने सफल हुए, कितने धराशायी हुए, विश्व में कोविड-19 ने कहाँ-कहाँ विनाश किया, कहाँ-कहाँ के लोग इससे अपना बचाव करने में सफल रहे और इस पूरे प्रकरण के क्या परिणाम रहे इन सभी तथ्यों का आपको प्रामाणिक लेखा-जोखा इस पुस्तक कोविड-19@2020 में मिलेगा। 

Tuesday, 25 February 2020

270. शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द जी के शिक्षा के प्रति विचार

    विद्यालय के पुस्तकालय में एक छोटी सी किताब मिली। जिसका शीर्षक था 'शिक्षा'। यह स्वामी विवेकानन्द जी के शिक्षा के प्रति विचारों का एक छोटा सा संग्रह है। इससे पूर्व (एक दिन पहले) राम पुजारी जी द्वारा लिखित एक बाल साहित्य की किताब 'अन्नु और स्वामी विवेकानन्द' पढी थी जो विवेकानन्द जी की जीवनी थी और यह पुस्तक (शिक्षा) उनके विचारों का संग्रह है।
मैंने विवेकानन्द जी से संबंधित अब तक जो साहित्य पढा है उनमें से यह लघु रचना मुझे श्रेष्ठ लगी।

       शिक्षा कैसी होनी चाहिए इस विषय पर विभिन्न संदर्भों के माध्यम से विचार किया गया है। शिक्षा की मनुष्य  को क्या आवश्यकता है, शिक्षा के तत्व, धार्मिक शिक्षा या स्त्री-शिक्षा सभी पर विवेकानन्द जी ने बहुत सारगर्भित बाते कही हैं।
स्वामी जी कहते हैं की वर्तमान हमारी शिक्षा हमें बौद्धिक दृष्टि से सक्षम बना रही है लेकिन हृदय के स्तर पर हम शून्य होते जा रहे हैं। 
हमें तो ऐसी शिक्षा चाहिये कि जिससे चरित्रगठन हो, मानसिक वीर्य बढे, बुद्धि का विकास हो और उससे मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके। (पृष्ठ-04)

         धर्म के विषय पर स्वामी जी के विचार मुझे बहुत प्रभावित करते हैं। आज हम धर्म को किस दृष्टि से देखते हैं और स्वामी जी किस दृष्टि से देखते हैं यह इस किताब से पता चलता है।
- हमें मनुष्य का निर्माण करने वाला धर्म चाहिए। हमें आवश्यकता है 'मनुष्य बनाने वाले सिद्धांतों की। हमें चाहिए ऐसी शिक्षा, जो हर तरह से हमें मनुष्य बना सके। (पृष्ठ-05)
धार्मिक शिक्षा अध्याय में लिखते है की 'नये धर्म का कहना है कि जो अपने में विश्वास नहीं रखता वह नास्तिक है।'(पृष्ठ-35)

स्री शिक्षा अध्याय में औरतों की दशा पर विचार करते हुए कहते हैं की "यह समझना बहुत कठिन है कि इस देश में पुरुषों और स्त्रियों के बीच इतना भेद क्यों रखा गया है जब कि वेदांत की यह घोषणा है कि सभी प्राणियों में वही एक आत्मा विराजमान है।" (पृष्ठ-43)

कुछ और विशेष विचार जो मुझे अच्छे लगे।
-ज्ञान प्राप्ति के लिए केवल एक ही मार्ग है और वह है एकाग्रता। (पृष्ठ-13)
- जिस अभ्यास के द्वारा मनुष्य की इच्छाशक्ति का प्रवाह और आविष्कार संयमित होकर फलदायी बन सके, उसी का नाम है शिक्षा। (पृष्ठ-05)
- मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है।


प्रस्तुत किताब 'शिक्षा' एक पठनीय और विचारणीय रचना है। अगर स्वामी विवेकानन्द जी को समझना है तो यह किताब अवश्य पढें और पढायें। यह किताब हमारे विचारों को परिपक्व करती है और एक नयी दृष्टि देती है। 
किताब-   शिक्षा     
विचारक- स्वामी विवेकानन्द
पृष्ठ-      50
प्रकाशन- 

लिंक- शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द

Wednesday, 21 August 2019

216. महाभारत के बाद- भुवनेश्वर उपाध्याय

महाभारत के पात्रों का चिंतन
महाभारत के बाद- भुवनेश्वर उपाध्याय
  
महाभारत के बाद भुवनेश्वर उपाध्याय की एक वैचारिक रचना है। यह मंथन है महाभारत के बाद जीवित बचे पात्रों का। उनका दृष्टिकोण है जो हुआ (महाभारत युद्ध) क्या वह उचित है, क्या वह आवश्यक था, क्या उसे टाला नहीं जा सकता था?
भारतवर्ष के इतिहास में सबसे बड़ा नरसंहार 'कौरव- पाण्डव युद्ध' रहा है।
        क्या यह युद्ध उचित था, क्या यह मात्र अपनी विजयार्थ लड़ा गया एक संग्राम मात्र था या इसके कोई और कारण भी रहे हैं। यह कोई सामान्य युद्ध न था यह तो महायुद्ध था यह तो धर्मयुद्ध था। जैसा की लेखक महोदय लिखते हैं- धर्मयुद्ध, धन-सम्पत्ति और सत्तात्मक अधिकारों‌ के‌ लिए नहीं होते, बल्कि दो मानसिकताओं के मध्य होते हैं; मानवीय मूल्यों और महत्वाकाक्षाओं के मध्य होते हैं।
वास्तव में यह दो मानिकताओं दो मूल्यों का द्वंद्व था। 


Sunday, 2 June 2019

197. मैं नास्तिक क्यों हूँ- भगत सिंह

भगत सिंह के कुछ विचार
मैं नास्तिक क्यों हूँ- भगत सिंह

           भगत सिंह न केवल भारत के महानतम देशभक्त तथा क्रांतिकारी समाजवादियों में से एक थे, बल्कि भारत के प्रारंभिक मार्क्सवादी विचारकों में भी उनका प्रमुख स्थान था।

        प्रस्तुत पुस्तक 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम भाग में भगत सिंह द्वारा जेल में लिख गये 'नास्तिकता' पर विचार है। द्वितीय भाग में उ‌नके क्रांतिकारी मित्र लाला रामसरनदास जी की पुस्तक 'द ड्रिमलैण्ड' की भूमिका है। जो भगत सिंह ने लिखी थी।

          ये दोनों आलेख भगत सिंह की तीक्ष्ण बुद्धि, गहन अध्ययन, जटिल विषयों पर उनकी समझ व उन्हें आम लोगों की समझ के अनुरूप भाषा में व्यक्त करने की क्षमता को दर्शाते हैं।


भगत सिंह एक क्रांतिकारी ही नहीं बल्कि उच्च कोटि के विचारक भी रहे हैं। 'मैं नास्तिक क्यों हूँ।' में उनके ईश्वर के प्रति विचार व्यक्त हैं। भगत सिंह का पारिवारिक वातावरण धार्मिक था लेकिन भगत सिंह की चिंतन शक्ति ने उन्हें एक नया रास्ता दिखाया।
            प्रस्तुत पुस्तक में वे विभिन्न उदाहरणों द्वारा अपने नास्तिक होने के विचार को सिद्ध करते हैं। उनके तर्क अकाट्य हैं।
भगत सिंह कहते है की जब ईश्वर ने इस सृष्टि का निर्माण किया है तो इस पर सृष्टि में इतना दुख क्यों है।
- मेरा सवाल है उसने यह दुनिया बनाई ही क्यों है, जो साक्षात नर्क है।
         स्वयं भगत सिंह इस प्रश्न का उत्तर देते हैं, की यह सृष्टि ईश्वर द्वारा निर्मित नहीं है। वे कहते हैं- सृष्टि का निर्माण को ईश्वरीय कृपा नहीं है यह तो स्वयं निर्मित है, यह तो प्राकृतिक घटना है।

         वर्तमान में लोग भगत सिंह के 'FAN' कहलाने में गर्व महसूस करते हैं लेकिन वे भी भगत सिंह के विचारों को पढना नहीं चाहते। भगत सिंह कहते है- अध्ययन करो। स्वयं को विरोधियों के तर्कों का सामना करने लायक बनाने के लिए अध्ययन करो।

     ‌वहीं क्रांति के प्रति विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं की- क्रांति की तलवार विचारों के सान पर ही पैनी होती है।
वही एक क्रांतिकारी की की विशेषता का वर्णन करते हुए लिखते हैं-
आलोचना और स्वतंत्र चिंतन एक क्रांतिकारी की दो अनिवार्य विशेषताएँ हैं।


पुस्तक के द्वितीय खण्ड में क्रांतिकारी मित्र लाला रामसरन दास जी की पुस्तक 'द ड्रिमलैण्ड' की भूमिका भगत सिंह ने लिखी है।
क्रांति के संदर्भ में लिखते हैं- क्रांति में, मौजूदा हालात (यानी सत्ता) को पूरी तरह से ध्वस्त करने के बाद, एक नये और बेहतर स्वीकृति आधार पर समाज के सुव्यवस्थित पुनर्निर्माण का कार्यक्रम अनिवार्य रूप से अंतर्निहित रहता है।
वहीं लाला रामसरन दास यह भी अपने काव्य द्वारा यह भी स्पष्ट करते हैं की क्रांतिकारी विनाश में सुख अनुभव करने वाले राक्षस नहीं होते।
वे लिखते हैं।
अगर जरूरत हो, ऊपर से उग्र बनो
लेकिन रहो हमेशा नरम अपने दिल में
अगर जरूरत हो, तो फुफकारो पर डसो मत
दिल में प्यार को जिंदा रखो और लड़ते रहो ऊपरी तौर पर।।


        इस पुस्तक की प्रस्तावना और भूमिका NBT के अध्यक्ष विपिन चन्द्र जी ने लिखी है। जो की कम शब्दों में भगत सिंह के विचारों को व्यक्त करने में सक्षम है।

अगर आप भगत सिंह को समझना चाहते हैं, उनके ईश्वर के प्रति विचारों को पढना चाहते हैं तो यह छोटी पुस्तक आपके लिए उपयोगी होगी।

पुस्तक-   मैं नास्तिक क्यों हूँ
लेखक -   भगत सिंह
पृष्ठ-       29
मूल्य-     40₹
प्रकाशक- राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत (NBT)
एमेजन लिंक- मैं नास्तिक क्यों हूँ






Wednesday, 8 February 2017

19. औरत एक अंतहीन व्यथा

औरत एक अंतहीन व्यथा- जैसी कही और सुनी गयी।
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एक स्त्री संगठन पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ गाँवों में औरतों की चेतना विकसित करने और संगठन बनाने के लिए प्रयासरत है।
        इस संगठन के निमंत्रण पर जो लङकियां यहा काम करने आयी उन्हीं तीन लङकियों के वहाँ देखे व महसूस किये गये कठोर यथार्थ का जीवंत वर्णन है यह लघु पुस्तक।
        शुरुआती दौर में इन छात्रा कर्मियों को दुविधा, भय, संशय, लोगों के प्रति अविश्वास और फिर भरोसा और प्यार; अपने आप अविश्वास और फिर बढता भरोसा- ऐसी ही ढेर सारी मन:स्थितियों से गुजरना पङा। जैसी कही और सुनी गयी, जैसा महसूस किया गया, उसी का एक सहज, अनपढ, अनगढ विवरण इस संकलन में मौजूद है।
शिक्षा के अभाव में इन गावों की क्या स्थिति है, विशेषकर महिलाओं की तो इस नन्हीं पुस्तक को पढकर जाना जा सकता है।
  बच्चे, औरतें बीमारी के कारण, डाक्टरी सुविधा न होने के कारण मर जाते हैं। अस्पताल है भी तो गाँव से दूर कस्बे में है।
  महिलाएं अपना पूर्ण जीवन घर की चारदीवारी के अंदर घुट-घुट कर खत्म कर लेती हैं, उनको किसी प्रकार की कोई आजादी नहीं
       गाँव की एक बहू्, जब वह ससुराल आयी तो 5-6 दिन टाॅयलेट नहीं गयी और इसीलिये वह खाना नहीं खाती थी कि दिन में टाॅयलेट लग जाएगा तो वह कहां जायेगी?
यह किसी एक महिला की स्थिति नहीं है, ऐसी न जाने कितनी महिलाएं और भी हैं जो इस प्रकार की समस्याओं से गुजर रही हैं। वे घर के अंदर एक तरह से कैद हैं।
  अब कौन पूरी उम्र घर के अंदर कैद होकर रह सकता है। अगर घर बाहर निकलना है तो......
यहाँ कि महिलाओं की मजबूरी है की वो मात्र बाहर का वातावरण देखने के लिए इस प्रकार के निर्णय लेती हैं।
-एक लङकी ने यहाँ तक कह दिया कि हम लोग बच्चा इदलिए जल्दी पैदा करते हैं कि उसी के बहाने हमको बाहर निकलने को मिलेगा।
इस घुटन से परेशान एक लङकी कहती है-
"मन करता है आत्महत्या कर लूँ, लेकिन इसलिए नहीं करती कि गाँव वाले समझेंगे कि कोई गलत काम किया है।"

  क्या हम कह सकते हैं स्त्री आज आजाद है। पुरुषवादी सोच के चलते आज भी, विज्ञान के युग में स्त्री की यह दयनीय स्थिति है। इसका एक मात्र कारण गरीबी या अशिक्षा नहीं है। इसका कारण है पुरुष की मानसिकता भी है, जो औरत को कभी इंसान नहीं समझता-
गरीबी के कारण यहाँ बहुत सी समस्याएं हैं लेकिन औरतों को तो उसके साथ-साथ औरत होने से भी बहुत समस्याएं है।
एक कार्यकर्ता सई ने तो बहुत ही स्टिक शब्दों में अपनी बात कही है।
" औरत को तो समाज में इंसान ही नहीं समझा जाता उसकी लङाई एक इंसान बनने की है"-  30 जनवरी,2003
और ऐसा नहीं है के औरत पुरुष की इस मानसिकता से संघर्ष नहीं कर रही, वह लङाई लङ रही है-
- आज औरत की लङाई जो हम कह रहे हैं,.......दिमागी गुलामी को तोङने की लङाई हम लङना चाहते हैं।
और इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब नारी एक हो, उनका अपना नारीवादी संगठन हो-
- जब देश की आधी आबादी औरतें अपना संगठन बनाएंगी तो बहुत बङी ताकत औरतों को अपनी लङाई में मिल जाएगी या तभी सही अर्थों में समाज परिवर्तन होगा।
एक अभियान में शामिल एक कार्यकर्ता वसुधा तो इन गाँववासियों से आंतरिक लगाव महसूस करने लग जाती है-
"मेरे लिए हर नया गाँव जाते समय ससुराल और छोङते समय मायके की तरह रहा"-
यहाँ मात्र गरीबी या स्वास्थ्य ही समस्या नहीं, यहाँ जातिवाद भी लोगों के अंदर तक बैठा है। वक्त बदल गया लेकिन लोगों की मानसिकता आज भी वही है।
  आज भी ब्राह्मण या ऊपरी जाति के लोग दलितों को अछूत मानते हैं।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ गावों की महिलाओं की स्थिति जानने पहुँच एक संगठन की तीन लङकियां वसुधा, स ई और वंदना ने जो वहाँ देखा उसका उन्होंने जीवंत वर्णन किया है। वहाँ की औरतों की जो दयनीय स्थिति है उसका प्रभाव पाठक के हृदय को अंदर तक कचोटता है।
इन गाँवों की आर्थिक, स्वास्थ्य, जातिवाद, अशिक्षा के साथ-साथ वहाँ की सामाजिक स्थिति का वर्णन भी मिलता है।
अगर आप महिलाओं की स्थिति को जानना चाहते हैं तो यह किताब अवश्य पढें-
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पुस्तक- औरत एक अंतहीन व्यथा- जैसी कही और सुनी गयी।
संपादन- उज्ज्वला म्हात्रे
प्रकाशक- गार्गी प्रकाशन-दिल्ली
ISBN- 81-87772-16-6
प्रथम संस्करण- 2003
पृष्ठ-60.
मूल्य-10₹