Friday, 31 January 2020

265. नौकर की कमीज- विनोद कुमार शुक्ल

परिस्थिति और मनुष्य
नौकर की कमीज- विनोद कुमार शुक्ल

कभी-कभी कुछ अलग पढने की इच्छा होती है तो तब कुछ विशेष और कभी अविशेष पढा जाता है। एक उपन्यास जो काफी चर्चा में रहा वह है विनोद कुमार शुक्ल जी का 'नौकर की कमीज'। यह एक पूर्णतः साहित्यिक रचना है जो अभिधा की बजाय लक्षणा और व्यंजना के माध्यम से बहुत कुछ कहता है।
        मनुष्य कठिन परिस्थितियों के दौरान किस तरह से अपने को व्यवस्थित रखता है, कैसा व्यवहार करता है और शासक (मालिक) का उसके प्रति कैसा व्यवहार होता है आदि घटनाक्रम को इस उपन्यास के माध्यम से स्पष्ट किया गया है।

264. समुद्र में खून- सुरेन्द्र मोहन पाठक

क्यों हुआ समुद्र में खून....
समुद्र में खून- सुरेन्द्र मोहन पाठक, मर्डर मिस्ट्री उपन्यास
सुनील सीरिज-02

      सुरेन्द्र मोहन पाठक जी ने जी अपने उपन्यास लेखक की शुरुआत सुनील चक्रवर्ती सीरीज से की थी। सुनील सीरीज का प्रथम उपन्यास था 'पुराने गुनाह, नये गुनहगार' और द्वितीय उपन्यास है 'समुद्र में खून' दोनों ही मर्डर मिस्ट्री हैं।
वर्तमान में हार्डकाॅपी में ये उपन्यास उपलब्ध नहीं हैं लेकिन Ebook के रूप में विभिन्‍न प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं। मैंने भी ये उपन्यास Kindle पर पढा था। छोटा सा उपन्यास है जिसे आसानी से पढा जा सकता है। 
दीपा नाम की एक विवाहित महिला मुरलीधर को सात हजार का प्रोनोट लिखकर दे आयी है। उसके पास इस समय अपना लिखा कागज वापिस लेने के रुपये नहीं हैं जबकि उसका पति उस कागज को हथियाने के लिए सात हजार से अधिक भी देने के लिए तैयार है।
और इस केस में प्रवेश करता है ब्लास्ट अखबार का पत्रकार सुनील चक्रवर्ती। जो किसी परिस्थिति वश उस प्रोनोट को प्राप्त करना चाहता है- मेरी दिलचस्प यह है कि वह कागज पति के हाथ नहीं पहुंचना चाहिए।


सुनील का इस केस में हस्तक्षेप स्वयं उसके लिए मुसीबत बन जाता है। क्योंकि इस केस दौरान एक खून हो जाता है और उसका इल्जाम सुनील पर आता है।
वहीं पुलिस विभाग भी सुनील को इस खून के इल्जाम में आरोपी मानता है। - "सुनील, इस केस में तुम्हारी नाक न रगड़वाई तो मेरा भी नाम प्रभुदयाल नहीं।"
समाचार पत्रों में यह विशेष खबर बनती है-
एक अखबार वाला जोर-जोर से चिल्ला रहा था।
रिपोर्टर फरार...ब्लास्ट के रिपोर्टर पर हत्या का संदेह..रिपोर्टर फरार....।

उस प्रोनोट में क्या था?
- दीपा का पति उस प्रोनोट को क्यों खरीदना चाहता था?
- सुनील का इस केस से क्या संबंध था?
- समुद्र में किस का खून हुआ?
- आखिर खूनी कौन था?

      

   तो यह है 'समुद्र में खून' उपन्यास का एक छोटा सा कथानक। कथानक चाहे छोटा है पर कथा पठनीय है। उपन्यास का कथानक तीव्र गति से चलता है कहीं नीरसता महसूस नहीं होती। कहीं ज्यादा उलझाव नहीं है। हां, अंत में एक 'घण्टी' बजने की वजह थोड़ी कन्फ्यू अवश्य करती है।

उपन्यास का कथानक एक जहाज से सम्बन्धित है जो समुद्र में अंतर्राष्ट्रीय सीमा में खड़ा है और वहाँ अवैध कार्य होता है। अंतर्राष्ट्रीय सीमा में स्थित होने के कारण पुलिस वहाँ कोई कार्यवाही नहीं कर सकती। लेकिन जब वहाँ एक खून होता है तो पता नहीं कैसे पुलिस कार्यवाही करती नजर आती है। उस पर भी वहाँ स्थित लोग पुलिस का धमकाते भी हैं।
यह जहाज हमारे देश की सीमा से बाहर खड़ा है। यहाँ आप हमें खामख्वाह अपने आॅफिसर होने की धौंस नहीं दे सकते।

- "ऐसी की तैसी तुम्हारी और तुम्हारे आॅर्डर की" दीनानाथ आपे से बाहर होकर बोला, "इस जहाज का मालिक मैं हूँ और यह जहाज अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में खड़ा है समझे।"


ऐसी ही एक और कमी है जो मुझे लगी। उपन्यास के अनुसार सन् 1964 में (1964 उपन्यास का प्रकाशन वर्ष है) बैंक में कोई भी छद्म नाम से खाता खुलवा सकता था। मुझे नहीं लगता यह संभव होगा।
सुनील अपने मित्र रमाकांत को कहता है- तुम किसी भी बैंक में जाकर रवीन्द्र कुमार के नाम से एक हजार रुपये का नया एकाउंट खुलवा लो। बैंक के रिकार्ड में अपने साइन के स्थान पर रवीन्द्र कुमार लिख दो।
रमाकांत के विरोध करने पर सुनील उसे समझाता है है की कोई भी व्यक्ति अपना नाम बैंक खाते में बदल सकता है- किसी भी व्यक्ति को कोई भी नाम धारण कर लेने का पूरा अधिकार होता है।

उपन्यास का कथानक एक मर्डर मिस्ट्री पर आधारित है। समुद्र में खड़े एक जहाज में खून होता है और फिर हत्यारे की तलाश।
उपन्यास में कुछ कमियों को छोड़ दिया जाये तो उपन्यास अच्छा है, छोटा है और रोचक है।

उपन्यास- समुद्र में खून
लेखक- सुरेन्द्र मोहन पाठक


सुनील सीरीज का द्वितीय उपन्यास
पाठक जी का द्वितीय

263. मोहब्बत का जाल- बसंत कश्यप

प्यार, दोस्ती और दौलत
मोहब्बत का जाल- बसंत कश्यप, उपन्यास

बसंत कश्यप मेरे पसंदीदा उपन्यासकार है। इनका 'हिमालय सीरीज' मेरा पसंदीदा उपन्यास है। मुझे बसंत कश्यप जी के उपन्यासों की खोज रहती है। इसी खोज के दौरान इनका एक उपन्यास 'मोहब्बत का जाल' उपलब्ध हुआ।
यह बसंत कश्यप का आरम्भिक उपन्यास है। जो इनके बाद के उपन्यास की तुलना में निम्नतर है।
अब चर्चा करते है बसंत कश्यप जी के उपन्यास 'मोहब्बत का जाल' की।
 दिल, दौलत और दोस्ती, 


यूं तो हजार दर्दों से लिथड़ी होती है,
इंसा की जिंदगी।
मगर, दौलत वो नासूर है,
जिसका मुदावा कोई नहीं होता।

बसंत कश्यप जी द्वारा रचित उक्त पंक्तियों से और उपन्यास शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है की उपन्यास की कथावस्तु दोस्ती, प्यार और दौलत पर आधारित है। अब यह कहां की दौलत है, कौन लूटता है, कहां धोखा होता है, कौन धोखा करता है, किसको दौलत मिलती है।
ये सब तो उपन्यास पढने पर ही पता चलेगा। अब कुछ बात उपन्यास की कथावस्तु पर कर ली जाये।
           यह कहानी है पश्चिम बंगाल की। विजय और पाटिल दोनों मुंबई से पश्चिम बंगाल अपने मित्र जयपाल के बुलावे पर आते हैं। काम था बैंक डकैती। एक सफल डकैती के पश्चात वे एक ऐसी जगह फंस जाते है जहाँ मौत के अलावा और कुछ भी नहीं।- जहाँ मौत के अन्धेरे के अलावा जिन्दगी की एक भी किरण दिखाई नहीं दे रही थी। (पृष्ठ-51) एक ऐसी जगह जहाँ आना तो आसान है लेकिन वहाँ से‌ निकलना असंभव सा है।-वे चारों जैसे समझ चुके थे कि इन घाटियों से अब उनकी रूह भी नहीं निकल सकती। (पृष्ठ-51)


Sunday, 26 January 2020

262. माई लास्ट अफेयर- सुधीर मौर्य

अंतिम प्यार से जिंदगी की शुरुआत...
माई लास्ट Affair- सुधीर मौर्य, 
प्रेम कथा

खाली वक्त निकालने से अच्छा है की कुछ पढ लिया जाये। बहुत सी किताबों में से कुछ अलग पढना चाहता था। तब नजर आयी सुधीर मौर्य की किताब 'मेरा लास्ट affair'।
वैसे मुझे प्रेमकथाएं पढना कम‌ पसंद है, लेकिन प्रयोग के स्तर पर इस उपन्यास को पढा।
प्रस्तुत उपन्यास पूर्णतः एक प्रेम कथा है जिसमें बीच-बीच में वासना का 'तड़का' लगाया गया है। हालांकि यह पाठक पर निर्भर है वह किस उपन्यास को किस दृष्टि से पढता है। मैं जिस कहानी को पढना हूँ तो मेरी इच्छा होती है कहानी ऐसी हो जिसे बड़ों से लेकर छोटे बच्चे तक पढ सकें, परिवार के सदस्य पढ सकें। इस दृष्टि से यह उपन्यास मुझे अच्छा नहीं लगा।
उपन्यास का मुख्य पात्र कुणाल है। यह कथा कुणाल और उसकी जिंदगी में आने वाली लड़कियों पर केन्द्रित है। कुणाल की जिंदगी में एक के बाद एक लड़कियां ऐसे गिरती हैं जैसे न्यूटन के सामने सेव गिरा था। जैसे रूही, सुम्बुल, नाज और अस्मिता आदि।
 
         कुणाल को हर एक लड़की के प्यार का नशा होता है लेकिन यह नशा किसी न किसी वजह से उतर भी जाता है। वह चाहे मजबूरी हो, बेवफाई हो या कुछ और कारण। - बेवफाई तो अजल से जमाने का दस्तूर रहा है। अगर जमाने में प्यार है तो बेवफाई भी रहेगी; प्यार और बेवफाई का तो चोली दामन का साथ है, दोनों सहेलियाँ हैं। और यह साथ चलता रहता है। कभी प्यार जीत जाता है तो कभी प्रेमी जिंदगी से भी हार जाता है।

         प्यार और प्यार नें जुदाई से तंग आकर कुणाल शहर ही बदल लेता है लेकिन उसकी किस्मत यहाँ भी उसकी झोली में, संयोग से एक प्यार आ टपकता है। यहीं से उपन्यास का आरम्भ होता है। बस में सफर के दौरान कुणाल को रूही मिलती है, रास्ते में प्यार हो जाता है और मंजिल पर पहुंचने से पहले-पहले यह प्यार 'प्यार की हद' भी पार कर जाता है। और कुणाल को प्यार का नशा भी हो जाता है।
         हाँ मैं नशा करने लगा था; रुही से मुहब्बत का नशा, उसकी आवारा जुल्फों की छाँव का नशा; उसकी चमकती मरमरी बाहें, जो न जाने कितनी बार मेरे गले का हार बन चुकी थीं, न जाने कितनी बार मेरी कमर के गिर्द लिपट चुकी थीं, उनका नशा। सच पूछो तो सिर्फ इस एहसास से ही कि रूही मेरी महबूबा है, मेरा विश्वास कई गुना बढ़ जाता था, और जब वो मेरे कदमों से कदम मिलाकर साथ देती तो मैं खुद को दुनिया का सबसे ज्यादा खुशनसीब व्यक्ति समझने लगता था।
        रूही के साथ आरम्भ हुआ यह उपन्यास धीरे-धीरे कुणाल के भूतकाल की घटनाओं से पाठक का परिचय करवाता है और उस परिचय में पाठक नाज, सुम्बुल, अस्मिता, संजोत आदि से मिलता है। ये सब पात्र एक पुन: चुपके से कुणाल के जीवन में प्रवेश कर जाते हैं।
         कुणाल के लिए किसी को भी भूला देना आसान नहीं है। - मेरी कच्ची उम्र की मुहब्बत, मेरी नाज, जिसके एक बार बिछड़ा तो फिर उससे दुबारा मिल ही न सका। अस्मिता और संजोत; सबके साथ एक दर्द भरी कहानी थी मेरी। एक ऐसा रिश्ता जिसके दर्द की टीस दिल के जख्मों को कभी सूखने नहीं देती, हर वक्त हर घड़ी उन्हें ताजा रखती है।
         एक तरफ नया प्यार है, एक तरफ बचपन का प्यार है तो कहीं दोस्ती वाला प्यार है और इन सब के बीच है कुणाल।
आखिर कुणाल किसे अपना लास्ट अफेयर बना पाया यह उपन्यास का मूल बिंदु है।
‘‘क्या?’’ उसने मेरे गले में बाँहें डाल दीं।
‘‘माई लास्ट अफेयर।’’ मैं उसे कमर से पकड़कर अपने करीब खींचते हुए बोला।
‘‘मतलब?’’ उसने अपने सीने पे मेरे हाथ के दबाव को महसूस करके चिहुँकते हुए पूछा।
‘‘मतलब.... ज़िन्दगी की शुरूआत!’’ कहकर मैंने लाइट ऑफ कर दी।

         आखिर कौन था कुणाल का लास्ट Affair?

Friday, 17 January 2020

261. अक्टूबर जंक्शन- दिव्य प्रकाश दूबे

इस प्यार को क्या नाम दूं?
अक्टूबर जंक्शन- दिव्य प्रकाश दूबे
नये लेखकों में दिव्य प्रकाश दुबे जी ने कम समय में अपनी अच्छा पहचान स्थापित की है। नयी उम्र के पाठकों में इनकी रचनाएँ काफी चर्चित रही हैं।
           दिव्य प्रकाश दुबे का उपन्यास 'अक्टूबर जंक्शन' लगभग एक साल से मेरे पास पड़ा था पर इस उपन्यास को कभी पढने का अवसर ही नहीं मिला। सन् 2020 में मेरे द्वारा पढे जाने वाली यह प्रथम रचना है।
        'अक्टूबर जंक्शन' एक प्रेम कथा है, हालांकि इसे पूर्णतः प्रेम कथा भी नहीं कहा जा सकता। यह दोस्ती और प्रेम के समानांतर चलती वाली एक 'ठहरी सी कथा' है। ऐसी कथा जिसके लिए बस यही कहा जा सकता है- 'इस प्यार को क्या नाम दूं।'
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        यह किस संदर्भ में ठहरी है यह भी स्पष्ट कर लेते हैं।। उपन्यास का नायक सुदीप यादव और चित्रा पाठक संयोग से दोस्त हैं। यह दोस्ती भी संयोग से होती है और अजीब भी है, क्योंकि दोनों साल में एक तय समय पर ही मिलते हैं,वह भी साल में एक बार और यह सिलसिला अनवरत दस साल तक चलता है। इस तय समय के अलावा दोनों में कोई संपर्क भी नहीं होता। दोनों की एक-दूसरे की जिंदगी में साल में एक दिन ही सही लेकिन पक्की जगह है। (पृष्ठ-84)
इसी वजह से कहानी मुझे ठहरी सी लगती है। हालांकि यह दस साल पठन दौरान दस दिन की तरह गुजर जाते हैं।
       अब बात करे 'अक्टूबर जंक्शन' के कथानक की। सुदीप यादव कम समय में भारत का श्रेष्ठ स्टार्टर बन कर उभरता है। उसकी कम्पनी बहुत कम समय में नयी उंचाइयों को छूती लेती है।‌ लेकिन सुदीप यादव के मन में एक विरक्ति है जो उसे कभी-कभी अपने काम से दूर एकांत में ले जाती है। वही चित्रा पाठक परिस्थितियों की मार से बचने के लिए और अपने रोजगार के लिए कुछ नया करना चाहती है।- औरतों को नजारा बदलने के लिए आदमी से ज्यादा चलना पड़ता है। चित्रा का रास्ता लम्बा भी था और अलग भी इसलिए मुश्किल ज्यादा न भी हो लेकिन नयी थी। (पृष्ठ-83)
       चित्रा का यह सफर वास्तव के में सुदीप के सफर से अलग और कठिन है। चित्रा जहाँ से सफर आरम्भ करती है और अंत में वहीं आकर ठहर जाती है।
       संयोग दोनों को बनारस में मिला देता है। प्रथम परिचय एक नाम मात्र की दोस्ती में परिवर्तित होता है। और फिर यह दोस्ती एक किताब के माध्यम से आगे बढती है।
लेकिन कुछ परिस्थितियों दोनों की जिंदगी में एक ऐसा परिवर्तन ले आती हैं जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की।
      असल में प्यार को हमने जिंदगी में जरूरत से ज्‍यादा जगह दे रखी है। हमें प्यार से जगह बचाकर कभी-कभी कभार ऐसे ही शहर से दूर चले जाना चाहिए, जहां रिश्ते में प्यार तो हो लेकिन प्यार का नाम न हो। (पृष्ठ-60)
सुदीप और चित्रा के रिश्ते को परिभाषित करती उक्त पंक्तियाँ उपन्यास का सार भी है।
        उपन्यास अच्छा और दिलचस्प है। बस उपन्यास को दस साल तक लंबा खींचना कुछ अजीब सा लगता है। वह भी तक की वो 365 दिन में से 364 दिन तक किसी भी प्रकार का परस्पर संपर्क तक नहीं रखते।

उपन्यास में कुछ रोमानी और नीतिगत संवाद/पंक्तियाँ है जो लेखक के साथ-साथ पात्रों की भावनाओं को उजागर करने में सक्षम है।
- हम शाम होने तक अपनी पीछे एक पूरी दुनिया खोकर घर लौटते हैं। दिन ऐसे ही खाली होकर साल हो जाते हैं। (पृष्ठ-85)

- कुछ रिश्तों को ऐसे ही छूना चाहिए जैसे ठण्ड में घास पर जमी ओस की बूँद को नंगे पाँव छूते हैं। (पृष्ठ-106)

- जिंदगी एक हद तक ही परेशान करती है। उसके बाद वो खुद ही हाथ थाम लेती है। (पृष्ठ-109)

- आसमान हमें उन सारी ख्वाहिशों को देख‌ने की आँखें देता है जो जमीन पर बेकाम की बातों में उलझी रहती हैं।
(पृष्ठ-131)
'अक्टूबर जंक्शन' प्रेम और दोस्ती पर आधारित आधुनिक जीवन शैली का उपन्यास है। अगर आपको प्रेम परक रचनाएँ अच्छी लगती हैं तो यह उपन्यास आपको पसंद आयेगा। हां, उपन्यास का समापन पाठक को भावुक करने में सक्षम है।
My new laptop with Book
उपन्यास- अक्टूबर जंक्शन 

लेखक-    दिव्य प्रकाश दुबे
प्रकाशक- हिन्द युग्म
पृष्ठ-        150
अमेजन लिंक-  अक्टूबर जंक्शन

Monday, 30 December 2019

260. कादम्बिनी पत्रिका

सन् 2019 के साहित्य जगत का विवरण
कादम्बिनी- दिसंबर,2019

कादम्बिनी दिसंबर 2019 अंक पढने को मिला।
'शब्दों की दुनिया' आवरण कथा है। यह अंक सन् 2019 में साहित्य की विभिन्न विधाओं में आयी हुयी किताबों पर आधारित है। विभिन्न विषयों की किताबें हिन्दी में आयी और नये-नये लेखक भी उपस्थित हुये हैं।
स्थायी स्तंभ के अतिरिक्त कहानियाँ, आलेख, रोचक जानकारी जैसे अन्य काॅलम भी आकर्षक हैं।

      अनामिका जी का आलेख 'खुल रही हैं अलग-अलग राहें' में से 'किताबों की दुनिया इस साल काफी समृद्ध रही, लगभग सभी विधाओं में। अच्छी बात यह रही कि अब बड़े और छोटे प्रकाशकों का भेद मिट रहा है और साहित्येतर विधाओं में, खासकर ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी प्रकाशकों की रूचि बढी है। यह हिन्दी की अपनी जनतांत्रिक परम्परा है, जो निरंतर विकसित हो रही है।'
      ‌‌इस आलेख में सन् 2019 में प्रकाशित विभिन्न किताबों की चर्चा की गयी है। यह आलेख बहुत सी किताबों से परिचय करवाता है। मुझे कुछ और पठनीय किताबों की जानकारी उपलब्ध हुयी।
        सबसे अच्छी चर्चा लगी चित्रा मुद्गल जी की। वे 'हाशिये पर नहीं रहे हाशिये के लोग' शीर्षक से साहित्य में फैले भ्रष्ट वातावरण का खुल कर चित्रण करती नजर आती हैं। इस आलेख में चित्रा जी ने कुछ पठनीय रचनाओं का जिक्र किया है तो साथ ही उन रचनाओं की चर्चा भी की है जो साहित्य के नाम पर कचरा फैला रहे हैं। इस क्रम को आगे बढाते हुए सविता सिंह जी 'जगर-मगर बाजार लेकिन...'' शीर्षक आलेख में लिखती हैं की "...साहित्य को कतई सिर्फ कलात्मक मनोरंजन के लिए नहीं, अपितु परिवर्तन के औजार के रूप में लिया गया है। ऐसे कवि जब मिलते हैं, तो देश दुनिया के बारे में चिंता करते हैं।"
       अगर देखा जाये तो वर्तमान अधिकांश साहित्य मात्र पठन-पाठन तक सीमित होकर रह गया, लेखक को सिर्फ 'वाह-वाही' चाहिए उसे समाज से कोई सरोकार नहीं रहा। आजकल तो अश्लिलता भी साहित्य होकर बिक रही है और ऐसे लोग, अश्लील लिखने वाले स्वयं को साहित्यकार भी कहलवाने लग गये। इस बात को आधार बना कर कभी प्रेमचंद ने लिखा है- 'कला संयम और संकेत में है।' जब यह संयम और संकेत तोड़ दिये जाते हैं तो कला भी विकृत हो जाती है।
'साहित्य की नई प्रवृत्ति' आलेख में प्रेमचंद जी लिखते है की 'नंगे चित्र और मूर्तियाँ बनाना कला का चमत्कार समझा जाता है। वह भूल जाता है कि वह काजल जो आंखों को शोभा प्रदान करता है, अगर मुँह पर पोत दिया जाए, तो रूप को विकृत कर देता है। (पृष्ठ-46)

इस अंक में कुल तीन कहानियाँ है। यू. आर. अनंतमूर्ति की 'घटश्राद्ध', कृष्णा अग्निहोत्री की 'मुखोटे' और राजेन्द्र राव की 'वत्सल'। तू तो तीनों कहानियाँ अच्छी हैं लेकिन 'घटश्राद्ध' बहुत ही मार्मिक रचना है। इस कहानी को पढने वक्त मेरे मानस में जैनेन्द्र का उपन्यास 'त्यागपत्र' घूमता रहा। 'वत्सल' कहानी आधुनिक दौर की कहानी है जहां एक दादा-पोते के प्रेम को पोते की माँ से सहन नहीं होता। कहानी 'मुखौटे' भाव स्तर पर अच्छी रचना है पर उसमें ज्यादा पात्र और नकारात्मक विचारों के कार मुझे अच्छी नहीं लगी।

गीतकार शैलेन्द्र जी के पुत्र 'दिनेश शैलेन्द्र' का अपने पिता की पुण्यतिथि 14 दिसंबर पर आलेख 'राजकपूर की आत्मा थे शैलेन्द्र' बहुत ही दिलचस्प है। इस आलेख में राजकपूर और शैलेन्द्र जी के कुछ रोचक किस्से वर्णित है।

    'नई हिन्दी' के नाम से आजकल चर्चित साहित्य पर दिव्य प्रकाश दूबे ने अच्छी सामग्री दी है। अज्ञेय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के आलेख भी काफी रोचक और ज्ञानवर्धक हैं।
प्रस्तुत अंक में स्थायी स्तंभ के अतिरिक्त और बहुत कुछ पठनीय सामग्री उपलब्ध है। साहित्य प्रेमियों के लिए यह अंक अच्छी जानकारी प्रदान करता है।

पत्रिका- कादम्बिनी
अंक- दिसंबर-2019
मूल्य- 30₹

259. विज्ञान प्रगति- पत्रिका

एक महत्वपूर्ण पठनीय पत्रिका- विज्ञान प्रगति

विज्ञान प्रगति का मैं बचपन से ही पाठक रहा हूँ। विज्ञान प्रगति घर पर आती थी। तब इसके रंगीन चित्र अच्छे लगते थे, फिर कल्प कथा अच्छी लगने लगी और समय के अनुसार विज्ञान प्रगति के आलेख और भी रूचिकर लगने लगे।
विद्यालय में पुस्तकालय (रा. उ.मा. वि.- माउंट आबू, सिरोही) का प्रभार मेरे पास है। पुस्तकालय में पुस्तकें तो हजारों की संख्या में है लेकिन पत्रिकाएं नहीं आती तब हमने विज्ञान प्रगति की द्विवर्षीय सदस्यता ग्रहण की ताकी विद्यालय के बच्चे इसे पढ सकें।
बच्चों का पुस्तकालय के प्रति बढता रूझान हार्दिक आनंद प्रदान करता है।
       विज्ञान प्रगति का दिसंबर-2019 अंक उपलब्ध है। इसकी कवर स्टोरी 'नोबेल पुरस्कार' से संबंधित है।
यह आलेख सन् 2019 में विभिन्न विधाओं में‌ मिले नोबेल पुरस्कार विजेताओं की अच्छी जानकारी प्रदान करता है।

       इस अंक के कुछ आलेख मुझे बहुत अच्छे लगे।
टेपवर्म फैलाते हैं खतरनाक वायरस- यह आलेख हमारे रहन सहन के सुधार पर जोर देता है। यह एक पठनीय आलेख है। जो हमें टेपवर्म जैसी बिमारी और उसके बचाव के उपाय बताता है।
दूसरा आकर्षण है विज्ञान गल्प 'वसुधैव कुटुंबकम'। हर बार की तरह यह गल्प भी रोचक और दिलचस्प है।

विशेष आकर्षण है
- भारतीय गणित- इतिहास के झरोखे से
- विमानन प्रौद्योगिकी: जमीन से आसमान छूने की चाह
- टेपवर्म फैलाते हैं खतरनाक वायरस
- प्रकृति के बेहतरीन जलीय हवाई विमान: ड्रेगनफ्लाई व डैमजलफ्लाई।


विज्ञान प्रगति हर वर्ग के पाठक के लिए एक आवश्यक पत्रिका की तरह है। यह बच्चों में जहाँ ज्ञान की वृद्धि करती है, उन्हें कुछ नया सीखाती है वही बड़े वर्ग के लिए बहुत से आवश्यक बिंदुओं पर चर्चा करती है

पत्रिका- विज्ञान प्रगति
अंक- दिसंबर-2019, अंक-12, पूर्णांक-787
मूल्य- 30₹

258. कथादेश- पत्रिका

               साहित्य का देश कथादेश

साहित्यिक पत्रिका कथादेश का दिसंबर-2019 अंक मिला। जयपुर आवागमन के दौरान दिसंबर माह की चार पत्रिकाएं खरीदी थी। कथादेश, हंस, कादम्बिनी और विज्ञान प्रगति। पत्रिकाएं समसामयिक साहित्यिक और समाज से अच्छा परिचय करवा देती हैं। मैं पहले पत्रिकाएं खूब पढता था लेकिन अब समयाभाव के कारण कभी-कभार पढी जाती हैं, कई बार तो पत्रिकाएं/किताबें खरीद के रख ली जाती हैं और कभी पढी भी नहीं जाती। लेकिन मेरा मानना है की पत्रिकाओं को समय पर पढना ज्यादा प्रासंगिक होता है। 

अब चर्चा करते हैं कथादेश पत्रिका के दिसंबर 2019 अंक की।


      इस अंक में जो कहानियाँ है वे सब अलग-अलग परिवेश को व्यक्त करती हैं। पहली कहानी 'राजा सुनता है!' शीर्षक से है यह एक लंबी कहानी है जो इटली के लेखक 'इटालो काल्विनो की रचना है।
        कलाकारों के शोषण को रेखांकित करती पंकज स्वामी की कहानी 'पानी में फड़फड़ता कौआ' वर्तमान भौतिक वादी समाज का आइना दिखाती है। आज स्मार्ट सीटी तो बना रहे हैं लेकिन इन स्मार्ट सीटी के लोग कितने शोषण वाले हैं इस कहानी को पढकर जाना जा सकता है।
        एक पंजाबी कहानी का अनुवाद प्रस्तुत है। केसरा राम नामक लेखक की कहानी 'रामकिशन बनाम स्टेट हाजिर हो!' शीर्षक की कहानी का अनुवाद किया है 'भरत ओळा' ने।
इस अंक की यह कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी। किसान वर्ग का शोषण अधिकारीवर्ग किस तरह सड करता है इस विषय को लेखक ने बहुत अच्छे तरीके से परिभाषित किया है। किसान को मिलने वाले लाभ का (वह भी नाममात्र) अन्य लोग हड़प जाते हैं और गरीब किसान अपनी किस्मत पर रोता रह जाता है।
      दो और कहानी है राजगोपाल सिंह वर्मा की 'जिसे बयाँ न किया जा सके....' और प्रकाश कांत की 'रामधुन' दोनों कहानी पत्रिका के पृष्ठों पर फैली स्याही के कारण पढी न जा सकी ऐसा अन्य रचनाओं के साथ भी हुआ है।
ऋचा शर्मा की कहानी 'शोक' और रेणु मिश्रा की कहानी 'दो दूनी पांच' भी अच्छी है। 'दो दूनी पांच' कहानी महिला वर्ग पर आधारित एक प्रेरणादायक कहानी है।

     पत्रिका का विशेष आकर्षण है नामवर सिंह जी पर आधारित देवेन्द्र का संस्मरण 'फलक पर नामवर'। नामवर सच में नामवर ही थे। स्वयं में एक संस्था थे। उनकी छत्रछाया में अनेक पौधे पलवित हुए। इस संस्मरण में बहुत सी खट्टी-मिट्टी याद शामिल हैं।
     'विजयदेव नारायण शाही का एक पत्र इलाचन्द्र जोशी के नाम' भी साहित्य की अमूल्य धरोहर पठनीय है। इसके अतिरिक्त रश्मि रावत का आलेख 'क्या घर एक यूटोपिया है।' शीर्षक से है जो ममता कालिया के लेखन पात्रों पर आधारित है।
प्रस्तुत अंक में अन्य स्थायी स्तम्भ, कविताएं और भी बहुत सी पठनीय सामग्री है।


पत्रिका- कथादेश
अंक-    दिसंबर-2019
पृष्ठ-     98
मूल्य-  40₹

257. हंस - पत्रिका

हंस 

Tuesday, 17 December 2019

256. नीले परिन्दे- इब्ने सफी

दहशत के परिन्दे
नीले परिन्दे- इब्ने सफी

इमरान सीरिज-06

सन् 2019 का दिसंबर माह महान लेखक इब्ने सफी जी को समर्पित रहा। इस माह मैंने इब्ने सफी साहब के ग्यारह उपन्यास पढे जिसमें से आठ उपन्यास 'फरीदी-हमीद' सीरिज के और तीन उपन्यास 'इमरान' सीरिज के। निम्न लिंक पर आप अन्य उपन्यासों की समीक्षा भी पढ सकते हैं।
चट्टानों में आग
खौफनाक इमारत
नकली नाक
चालबाज बुढा
कुएं का राज
फरीदी और लियोनार्ड
तिजोरी का रहस्य
औरतफरोश का हत्यारा
जंगल में लाश
दिलेर मुजरिम
इब्ने सफी उपन्यास समीक्षा

अब चर्चा करते हैं‌ इब्ने सफी साहब के इमरान सीरिज के उपन्यास 'नीले परिन्दे' की।
सरदारगढ़ पहाड़ी इलाक़ा था। अब से पचास साल पहले यहाँ ख़ाक उड़ती रहती थी, लेकिन मिट्टी के तेल का भण्डार मिलने के बाद यहाँ अच्छा-ख़ासा शहर बस गया था।
       यह कहानी सरदारगढ की है। वहाँ के नवाबजादे जमील पर एक नीले परिन्दे ने आक्रमण किया यह घटना 'पेरिसियन नाइट क्लब' की है और अगले दिन जमील के चेहरे पर सफेद दाग उभर आये।

Monday, 16 December 2019

255. चट्टानों में आग- इब्ने सफी

कर्नल, ली यूका और इमरान की कथा
चट्टानों में आग- इब्ने सफी
इमरान सीरिज-02
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दिसंबर में इब्ने सफी उर्फ इसरार अहमद साहब के उपन्यास पढने का क्रम चल रहा है। उनके आरम्भ के 'जासूसी दुनिया' के 'फरीदी-हमीद' सीरिज के उपन्यास पढे और अब इमरान सीरिज के कुछ उपन्यास इसी क्रम में पढे जा रहे हैं।
'चट्टानों में आग' इमरान सीरिज का उपन्यास पढा जो मुझे इब्ने सफी के अब तक पढे गये उपन्यासों में से सबसे अच्छा लगा। इब्ने सफी के फरीदी सीरिज के उपन्यासों में घटनाक्रम जहां ज्यादा उलझन वाला और खल पात्र के अजीबो गरीब हरकते होती हैं वैसा इस उपन्यास में कुछ भी नहीं था।

       अब कहानी पर चर्चा करते हैं। यह कहानी है रिटायर्ड कर्नल जरग़ाम की।- वह अधेड़ उम्र का, मज़बूत शरीर वाला रोबदार आदमी था। मूँछें घनी और नीचे की तरफ़ को थीं। बार-बार अपने कन्धों को इस तरह हिलाता था जैसे उसे डर हो कि उसका कोट कन्धों से लुढ़क कर नीचे आ जायेगा। यह उसकी बहुत पुरानी आदत थी। वह कम-से-कम हर दो मिनट के बाद अपने कन्धों को ज़रूर हिलाता था।

254. खौफनाक इमारत- इब्ने सफी

किस्सा खूनी इमारत का
खौफनाक इमारत- इब्ने सफी
इमरान सीरीज-01

इब्ने सफी साहब द्वारा लिखित 'खौफनाक इमारत' इमरान सीरीज का पहला उपन्यास है।
        इमरान सूरत से ख़ब्ती नहीं लगता था। ख़ूबसूरत और दिलकश नौजवान था। उम्र सत्ताईस के लगभग रही होगी! सुघड़ और सफ़ाई-पसन्द था। तन्दुरुस्ती अच्छी और जिस्म कसरती था। अपने शहर की यूनिर्विसटी से एम.एस.सी. की डिग्री ले कर इंग्लैण्ड चला गया था और वहाँ से साइन्स में डॉक्टरेट ले कर वापस आया था। उसका बाप रहमान गुप्तचर विभाग में डायरेक्टर जनरल था। इंग्लैण्ड से वापसी पर उसके बाप ने कोशिश की थी कि उसे कोई अच्छा-सा ओहदा दिला दे, लेकिन इमरान ने परवा न की।
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        इमरान भी गुप्तचर विभाग में आ गया।
यह कहानी है एक खौफनाक इमारत की। एक ऐसी इमारत जो बंद है, जिसके विषय में बहुत सी अफवाहे फैली हुयी हैं।
इस इमारत की बनावट पुराने ढंग की थी। चारों तरफ़ सुर्ख़ रंग की लखौरी ईंटों की ऊँची-ऊँची दीवारें थीं और सामने एक बहुत बड़ा फाटक था जो ग़ालिबन सदर दरवाज़े के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा होगा।
                  और एक समय आता है उस इमारत में एक के बाद एक कत्ल होने आरम्भ हो जाते हैं। इमारत और भी ज्यादा कुख्यात हो जाती है।- ‘यह इमारत पिछले पाँच बरसों से बन्द रही है। क्या ऐसी हालत में यहाँ एक लाश की मौजूदगी हैरत-अंगेज़ नहीं है।’

Saturday, 14 December 2019

253. नकली नाक- इब्ने सफी

अंतरराष्ट्रीय अपराधी जाबिर से फरीदी का मुकाबला।
नकली नाक- इब्ने सफी
एक उपन्यास दो शीर्षक से- 'नकली नाक' और 'नंगी लाश'

कल्पना और जानकारी के घोल से इब्ने सफ़ी ने अपने यादगार जासूसी उपन्यासों का लिबास तैयार किया। कई क़िस्से और किरदार तो चुनौती की तरह आये, मसलन जाबिर जो ‘चालबाज़ बूढ़ा’ के अन्त में फ़रीदी के हाथ से फिसल कर निकल भागा था। इसी जाबिर से ‘नक़ली नाक’ में हम दोबारा रू-ब-रू होते हैं। ‘नक़ली नाक’ बिला शक इब्ने सफ़ी के उन उपन्यासों में शामिल है जिसकी लोकप्रियता कभी कम नहीं होगी और वह आज भी आपको लुभायेगा। आज़मा कर देखिए। इन्स्पेक्टर फ़रीदी के पसन्दीदा मुहावरे में कहें तो न घोड़ा दूर, न मैदान। (ईबुक से)
'नकली नाक' इब्ने सफी साहब का जासूसी दुनिया सीरिज का आठवां उपन्यास है। यह उपन्यास एक कुख्यात अंतरराष्ट्रीय अपराधी जाबिर के कुकारनामों पर आधारित है। फरीदी को एक जाबिर के रामगढ में होने की सूचना मिलती है और वह हमीद के साथ रामगढ को निकल पड़ता है।
‘‘आख़िर आपको अचानक रामगढ़ की क्यों याद आ गयी?’’ हमीद बोला।
‘‘जाबिर...!’’
‘‘ओह... तो आप उसका पीछा नहीं छोड़ेंगे?’’
‘‘मैं क़सम खा चुका हूँ।’’
‘‘क्या आपको उसकी मौजूदगी की कोई पक्की ख़बर है?’’
‘‘नहीं...!’’
‘‘यानी...!’’
‘‘यहाँ कुछ क़िस्से ऐसे हुए हैं जिनकी बिना पर मैं सोचने पर मजबूर हुआ हूँ।’’