Saturday, 11 April 2026

विजय दुर्ग का रहस्य- कर्नल रंजीत- 1983

राजमहल के षड्यंत्र की कहानी
विजय दुर्ग का रहस्य- कर्नल रंजीत

  लोकप्रिय कथा साहित्य में प्रतिशोध और रहस्यमयी- विचित्र कथाओं के लिए कर्नल रंजीत का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। उलझे कथानक, ज्यादा पात्र और शृंखलाबद्ध हत्याएं उ‌नके उपन्यासों की विशेषता रही है। 
मैं इन दिनों सतत् कर्नल रंजीत के उपन्यास पढ रहा हूँ और मनोरंजन की एक अलग ही दुनिया में विचरण कर रहा हूँ। मनोरंजन की इस अनोखी दुनिया में आप भी मेरे साथ-साथ घूम लीजिए- विजयदुर्ग का रहस्य उपन्यास में।

सस्पेंस, रोमांच, साहसपूर्ण घटनाओं के जादूगर कर्नल रंजीत का रोंगटे खड़े कर देने वाली अनूठी कहानी से पूर्ण चौंका देने वाला नया विशेषांक
विजयदुर्ग का रहस्य
उपन्यास के मुख्य आकर्षण
- पतंग के आकार के दिल दहलाने वाले जैट विमान।
- कांच की गोली से राजमहल में धमाका ।
- तालों में बंद लाश का गायब हो जाना ।
- मेजर बलवंत और सोनिया के बेजान शरीर हिलाने - डुलाने पर भी न हिले ।
- मंदिर में पूजा करती हुई महिला सहसा लापता ।
- प्रेम में असफलता और राज घराने की पुश्तैनी दुश्मनी कितना भयानक रूप धारण कर गई यह जानने के लिए पढ़िए 'विजयदुर्ग का रहस्य' ।(अंतिम आवरण पृष्ठ से)

  जैसा की आपने ऊपर पढ लिया है कि उपन्यास कितना विचित्र और कितना मनोरंजक है। यहां घटित होने वाली घटनाएं स्वयं में अदभुत ही हैं। उपन्यास जासूस मेजर बलवंत भी इस मर्डर मिस्ट्री के आगे चकित रह जाता है। 
उपन्यास समीक्षा से पूर्व आप उपन्यास के प्रथम पृष्ठ का अवलोकन कर लीजिए और फिर हम आगे बढते हैं उपन्यास की समीक्षा की ओर-
           विचित्र विमान
विजय दुर्ग पर रात के साए धीरे-धीरे उतरने लगे थे । अपने महल की सबसे ऊपरी मंजिल की छत पर खड़ी
रानी राजलक्ष्मी ने पांच सौ वर्ष पूर्व बनी विजय दुर्ग की ऐतिहासिक इमारतों पर एक नजर डाली और फिर उस पहाड़ी की ओर देखने लगीं, जहां भारत सरकार पहाड़ियों से निकलने वाली बेला नदी पर बांध का निर्माण करा रही थी। शाम हो चुकी थी, लेकिन बांध पर अभी तक निर्माण कार्य चल रहा था । दैत्याकार बुलडोजरों और पत्थरों को तोड़ने-पीसने वाले विशालकाय क्रशरों की गड़गड़ाहटें शाम के शांत वातावरण में आस-पास की पहाड़ियों से टकराकर गूंज रही थीं। अंधेरा हो जाने के कारण निर्माण-स्थल के आस-पास दूर-दूर तक लगे मर्करी बल्व और ट्यूब लाइटें जला दी गई थीं। जिनकी तेज रोशनी में काम करते हुए मजदूर स्पष्ट दिखाई दे रहे थे ।
       रानी राजलक्ष्मी कुछ देर तक चुपचाप खड़ी बांध पर काम करने वाले उन मजदूरों को देखती रहीं, जिनमें स्त्रियां भी थीं और पुरुष भी थे। जो अपने पेट की आग बुझाने की खातिर देश के विभिन्न भागों से आकर इस वीरान पहाड़ियों में अपना खून-पसीना बहा रहे थे।
(विजय दुर्ग का रहस्य- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)
    उपन्यास का आरम्भ होता है विजयदुर्ग की रानी राजलक्ष्मी से जो अपने महल की छत पर खड़ी बांध निर्माण के कार्य को रही थी । अचानक उन्हें जेट विमान जैसी भयानक आवाज सुनाई देती है और एक विचित्र विमान उन पर हमला करता है। इस हादसे रानी तो बच जाती है लेकिन पूरे दुर्ग में शहर में इस विचित्र विमान की चर्चा फैल जाती है। क्योंकि वह विचित्र विमान पतंग के आकार का था और उसकी आवाज जेट विमान जितनी भयानक थी। 
"नहीं मांजी, वह हवाई जहाज नहीं था । भगवान ही जाने क्या बला थी । मैंने लगभग सभी तरह के हवाई जहाज देखे हैं। यात्रियों को ले जाने वाले हवाई जहाज भी और लड़ाकू विमान भी । उसकी आवाज जरूर जेट विमान जैसी थी, लेकिन वह विमान नहीं था। विमान जैसी कोई दूसरी ही चीज थी -काली और बहुत ही भयानक—!”
कहते-कहते राजलक्ष्मी के बदन में एक बार फिर भय की लहरें दौड़ने लगीं ।
(पृष्ठ-12)
    राजमहल अभी इस घटना से बाहर भी नहीं निकल पाया था की महल के दीवान यशवंत मेहता जी के पास एक रहस्यमयी फोन आता है। दीवान साहब का परिवार कई पीढ़ियों से राजमहल में दीवान का सर्वोच्च पद संभाले हुये है। महल के प्रति वफादार और ईमानदार दीवान साहब को धमकी दी जाती है-
".... विजय दुर्ग पर विनाश की भयंकर घटा बड़ी तेजी से घुमड़ती चली आ रही हैं।.... विनाश और विध्वंस के शोले । जो केवल विजय दुर्ग को ही नहीं विजय दुर्ग के समूचे राज परिवार को जलाकर  खाक कर देंगे.... ऐतिहासिक विजय दुर्ग मलवे का ढेर बनकर रह जायेगा और मलबे का वह ढेर समूचे राज परिवार और विजय दुर्ग में रहने वालों को अपने खूनी दामन में छिपा लेगा । अब भी समय है मेहता-विजय दुर्ग से भाग जाओ । वरना तुम भी राख रह जाओगे ।"(16)
    दीवान यशवंत मेहता हैरान थे की आखिर विजय दुर्ग का ऐसा कौनसा दुश्मन पैदा हो गया जो पूरे राजपरिवार को ही खत्म करना चाहता है। वहीं राजा दिग्विजय सिंह मुम्बई में थे और दीवान साहब नहीं चाहते थे की उन्हें डिस्टर्ब किया जाये लेकिन राजपरिवार पर होने वाले हमलों की यह शुरुआत ही थी‌ और एक दिन राजमहल के अंदर ही किसी ने हमला कर दिया।
धमाका इतना जोरदार था कि कई खिड़कियों के शीशे टूट गए ।
राजलक्ष्मी और रत्ना दौड़कर कमरे से बाहर निकल आईं।
राजमहल के आंगन के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा गड्ढा बन गया था। आंगन के फर्श में जड़ी सुर्ख पत्थर की चौकोर वर्गाकार सिलें टूटकर दूर-दूर तक बिखर गई थीं।
उस गड्ढे के पास ही एक नौकरानी लहू-लुहान पड़ी थी ।
शायद पत्थरों के उड़ने से वह घायल होकर बेहोश हो गई थी।
(पृष्ठ-29)
    'दीवान यशवंत मेहता की हत्या' उपन्यास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है और यही अध्याय उपन्यास को एक नया मोड़ देता है। जहां अब तक घटनाएं मात्र हमले की नजर आती थी और किसी का जान नहीं गयी थी लेकिन इस घटना ने सारे परिदृश्य को बदल दिया और इसी घटना के पश्चात राजा कुमार दिग्विजय सिंह ने भारत के प्रसिद्ध जासूस मेजर बलवंत को याद किया ।
       उन्होंने आगे बढ़कर मेजर बलवंत और उसके साथियों का स्वागत करते हुए कहा, “मेजर साहब, मैंने कई बार सोचा था कि आपको विजय दुर्ग आने का निमन्त्रण दूं ताकि आप विजय दुर्ग के चारों ओर दूर-दूर तक बिखरी पहाड़ियों के अनुपम सौन्दर्य का आनन्द ले सकें। मैं तो इसे भाग्य की बिडम्बना ही कहूंगा जो आपको इस दुखद परिस्थिति में बुलाना पड़ा।"
“महाराज कुमार, आप यह बात क्यों भूल रहे हैं कि हर रात के भयावह अंधेरे के पीछे उल्लास भरी उषा छिपी होती है। हो सकता है वृद्ध दीवानजी की यह रहस्यपूर्ण मृत्यु आपके और राज परिवार के लिए हितकर सिद्ध हो जाए ।” मेजर बलवंत ने मुसकराते हुए कहा, “चलिए, मैं पहले दीवानजी की लाश देखना चाहता हूं।"
(पृष्ठ-75)
    मेजर बलवंत अपनी टीम के साथ इस हत्याकांड और रहस्यमयी घटनाओं को सुलझाने का प्रयास करता है। लेकिन यह घटनाएं देखने में जितनी भयंकर थी उस से भी ज्यादा यह उलझी हुई थी। दिनरात के परिश्रम के पश्चात भी वह यह नहीं समझ पाता की यह घटनाएं आखिर घटित क्यों हो रही है‌ । न तो कारण पता था और न हीं कर्ता ।
          मेजर बलवंत अपने गेस्ट हाउस वाले कमरे में पहुंचा तो उसे लग रहा था जैसे उसका दिमाग फट जाएगा। उसके दिमाग में एक के बाद एक प्रश्न आंधी-तूफान की तरह मचल रहे थे। वह उन प्रश्नों का उत्तर खोजने का जितना अधिक प्रयत्न कर रहा था उसकी दिमागी बेचैनी उतनी ही अधिक बढ़ती चली जा रही थी ।(123)
   जहां एक तरफ कर्नल रंजीत की बेचैनी बढ रही है वहीं दूसरी ओर हत्या और रहस्यमयी घटनाएं भी तेजी से घटित हो रही हैं। और घटनाएं भी ऐसी-ऐसी की मेजर बलवंत भी दंग रह जाता है। उसके लिए आगे बढना का कोई रास्ता नहीं था हालांकि वह दुर्ग था, अपने समय का गौरव था और आज ऐतिहासिक इमारत भी और उसके अंदर इतने रहस्य और गुप्त रास्ते थे की मेजर बलवंत चकित था लेकिन फिर भी कोई भी रास्ता उसे अपनी‌ मंजिल(अपराधी) तक नहीं पहुंचा पा रहा था।
  यही कारण था की मेजर बलवंत को भी कहना पड़ा- मेजर बलवंत बोला, "आज तक के इस लम्बे जासूसी जीवन में यह पहला ही ऐसा विलक्षण केस है जिनके सिर-पैर में पिछली रात तक नहीं समझ पाया था । लेकिन सावित्री और उसके पति के साथ होने वाली घटना ने इस केस को काफी हद तक स्पष्ट कर दिया है । मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी ऊबड़-खाबड़ और अस्पष्ट पगडंडी पर भटकते-भटकते किसी सीधी सपाट सड़क पर पहुंच गया हूं। जिस पर आसानी से बढ़ते हुए मैं किसी भी पल अपनी मंजिल पहुंच जाऊंगा।"(230)
अपराधी चाहे कितना भी चालाक क्यों न हो कहीं न कहीं कोई न कोई गलती आखिरी कर ही जाता है वह जरूरत है एक तेज दिमाग की , तीक्ष्ण दृष्टि की जो उस गलती को पजड़ सके। जिसने अपराधी की उस गलती को पकड़ा लिया वह अपराधी की कलाई भी थाम सकता है। पुलिस विभाग चाहे अपराधी का पतान लगा सका पर मेजर बलवंत ने अनुमान लगा लिया था की अपराधी कौन है-“इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है इंस्पेक्टर । हर चालाक अपराधी अपने रहस्य को छिपाने के लिए उन सभी लोगों को मौत के घाट उतारने की कोशिश करता है जिन पर उसे यह सन्देह हो हो जाता है' है कि वे उसके रहस्य को जान गए हैं। मैं इसे सावित्री का दुर्भाग्य नहीं सौभाग्य मानता हूं कि उसके पति के धोखें में आक्रमणकारी उस पर गोली चला बैठा ।” मेजर बलवंत ने कहा, “मैं उस अपराधी को जान गया हूं लेकिन अभी उस पर हाथ नहीं डाल सकता। क्योंकि उसके पकड़े जाते ही इस केस का मुख्य अपराधी सावधान हो जाएगा और छिपकर बैठ जाएगा।"(230
   राजमहल पर हुये आक्रमण और फिर बांध निर्माण के मजदूरों की हत्या से लेकर रहस्यमयी घटनाओं के मध्य चलती यह अपराध कथा मेजर बलवंत हल करता है तो हर कोई उसकी प्रशंसा करता है। 
"इस तरह के विलक्षण और अभूतपूर्व केसों को आप ही सुलझा सकते हैं मेजर साहब, इंस्पेक्टर रणधीर सिंह ने प्रशंसा भरे स्वर में कहा...(231)
शे'र-
मेजर बलवंत अक्सर कोई न कोई शे'र कहते जजर आते हैं‌ ।
एक मुद्दत हो गई उस शोख को देखे हुए, 
शोखियां बढ़ ही गई होंगी उमर के साथ-साथ
।"(124)
संवाद-
उपन्यास में रहस्य ज्यादा है और स्मरणीय संवाद नाम मात्र हैं‌ । एक संवाद अच्छा लगा जो यहाँ प्रस्तुत है।
- इंसान की जिन्दगी अपने आप में एक ऐसी जटिल पहेली है जिसे हलकर पाना कभी-कभी कटिन ही नहीं असम्भव हो जाता है।
- क्रोध और प्रतिशोध की भावना इंसान को अंधा और बहरा बना देती है।
नकारात्मक पक्ष- 
   उपन्यास की कहानी चाहे रहस्यमयी घटनाओं से आरम्भ होती है लेकिन शीघ्र ही यह मर्डर मिस्ट्री में बदल जाती है। उपन्यास में कुछ अच्छी बातों के साथ कुछ बातें/ घटनाएं उपन्यास को कमजोर करती हैं।
दीवान साहब अपनी मृत्यु से पूर्व राजा कुमार दिग्विजय सिंह को एक डायरी देते हैं। लेकिन बाद में उस डायरी का कहीं कोई वर्णन नहीं है।
एक और दृश्य देखें‌-
-"यह अंगूठी किसकी है और इस बक्स में कैसे आई ?” मेजर बलवंत ने सोच में डूबे स्वर में कहा ।
“मेरा खयाल है यह अंगूठी उसी आदमी की है जिसने आपकी जाकेट चुराई है। शायद यह अंगूठी उसकी उंगली में ढीली थी। जाकेट को निकालते समय अंगूली से उतरकर गिर गई होगी।” सोनिया बोली ।
(187)
   मैंने बहुत से उपन्यासों में देखा है अपराधी या अन्य कोई व्यक्ति घटनास्थल पर ऐसे -ऐसे सबूत छोड़ जाता है तो पूर्णतः अविश्वसनीय होते हैं। अब पता नहीं एक बहुमूल्य अंगूठी वहां कैसे रह गयी‌। अंगूठी जो यहीं गिरना था।
इसके अतिरिक्त कुछ छोटे- छोटे अन्य बिंदु भी कहानी‌ को‌ कमजोर बनाते हैं।
तथ्यात्मक:-
कर्नल रंजीत के उपन्यासों में प्रयुक्त इमारतें अक्सर रहस्यमयी होती हैं। जिनमें गुप्त दरवाजे, सीढिया और तहखाने होते हैं। प्रस्तुत उपन्यास तो एक दुर्ग पर आधारित है जहां इस प्रकार के रहस्य होना सामान्य बात है।
"विजय दुर्ग और विशेष रूप से यह इमारत तो ऐसी भूल-भुलैयों से भरी इमारत है जिसके हर पत्थर के नीचे रहस्यों की वीरान बस्ती है।" मेजर बलवंत ने दबी जबान में कहा ।(270)
- कर्नल रंजीत के उपन्यासों की एक और विशेषता है और वह है इनमें प्रयुक्त हथियार कभी सामान्य नहीं होते वह किसी न किसी रूप से विशेष होते हैं।
यहां भी हाथी दांत की मूंठ वाले चाकू का प्रयोग होता है।
पात्र-
कुमार दिग्विजय सिंह- राजा
राजलक्ष्मी- रानी
निशा- राजलक्ष्मी की बहन और सहली
डाक्टर अरूण- निशा का पति
अविनाश वर्मा- डाक्टर
यशवंत मेहता- दीवान साहब
उमेश - महेश- दीवान साहब के पुत्र
पार्वती बाई- दीवान साहब की पत्नी
आशुतोष सान्याल- इंजीनियर
अरविन्द गुर्टू- बांध पार्टी इंजार्ज
कर्नल संग्राम सिंह- कुमार के चाचा
शमशेर सिंह- दुर्ग का रक्षाप्रहरी
दिवाकर- क्लर्क
रणधीर सिंह- पुलिस इंस्पेक्टर
मेजर बलवंत- कथानायक, जासूस
सुधीर, सुनील, डोरा, सोनिया,  मालती- मेजर के सहायक 
चंपा, श्यामा, राजो- दासियां
देवेश सिंह- बड़े कुंवर
राज सिंह- साधु, मामा
भगत राम-  बांध का कार्मिक
हमीद- बूढा चिड़ीमार
अनोखा नहीं अभूतपूर्व।” 
भारत देश स्वतंत्र हुआ और उसी के राजशाही खत्म हो गयी । समय बदला और राजतंत्र की जगह लोकतंत्र ने ले ली। बड़े-बड़े राजा- महाराजा भी अब नाममात्र ले राजा रह गये उनकी जागीरें अब सरकार के अधीन आ गयी लेकिन फिर भी उनके पास इतना धन और मान -सम्मान था की वह आराम से अपना और आने वाली पीढ़ियों का जीवन यापन कर सकते थे। 
  विजयदुर्ग के दूरदर्शी और जनसेवक राजा ने भी ऐसा ही अपनी पुश्तैनी जागीर को कारखानों में बदला और धन का अम्बार कम न होने दिया। उनके अन्य जागीरदार साथी और परिवारिक बांधव जहां समय की‌ मार के आगे बेबस हो गये वहीं विजय दुर्ग हमेशा विजय और जनप्रिय रहा और उनका मान- सम्मान बना रहा।
  विजय दुर्ग के तात्कालिक शासक राजा कुमार दिग्विजय सिंह का मुम्बई में अच्छा खासा व्यापार था। लेकिन कुछ तत्व ऐसे भी जाग्रत हुये की उनके खुशी उनसे देखी नहीं गयी और वह विजय दुर्ग को खत्म करने पर आ गये।
    प्रेम की असफलता और प्रतिशोध पर आधारित यह उपन्यास अपने अंदर बहुत सारी रोचक और रहस्यमयी घटनाओं को समेटे हुये है।‌ कुछ कमियों के चलते हुये भी यह राजमहल के षड्यंत्र वाला यह उपन्यास पाठकों का भरपूर मनोरंजन करने वाला उपन्यास है।

उपन्यास-  विजय दुर्ग का रहस्य
लेखक -    कर्नल रंजीत
संस्करण-  1983
पृष्ठ-          328
प्रकाशक-  हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली

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