Saturday, 4 April 2026

मेजर बलवंत बांगलादेश में- कर्नल रंजीत

मेजर की बांग्ला यात्रा और मुक्तिवाहिनी का संघर्ष
मेजर बलवंत बांगलादेश में‌- कर्नल रंजीत

बंगला देश में, मानवता को लज्जित करने वाले पाकिस्तानी तानाशाहों के घोर अत्याचारों तथा भीषण गोला-बारी के बीच, भारतीय जासूस मेजर बलवंत के अत्यन्त साहसिक कार्यों और हैरत में डाल देने वाले जासूसी के चमत्कारों से भरपूर उपन्यास
नमस्ते पाठक मित्रो,
   कर्नल रंजीत के उपन्यासों की समीक्षा में हम संगरिया (राजस्थान) निवासी मित्र रतन चौधरी जी से पढने के लिए प्राप्त हुये 15 उपन्यासों की समीक्षा के क्रम में आज हम पढ रहे हैं 'मेजर बलवंत बांगलादेश में' उपन्यास की समीक्षा ।
     पूर्व में हम 'पीले बिच्छू' नामक उपन्यास पढ चुके हैं जिसमें मेजर बलवंत बांगला देश जाते हैं  और प्रस्तुत उपन्यास में भी वह बांगलादेश जाते हैं पर दोनों उपन्यासों की यात्रा में एक बड़ा अंतर है जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। 
पहले हम 'मेजर बलवंत बांगलादेश में' उपन्यास के प्रथम पृष्ठ का अवलोकन करते हैं। प्रथम अध्याय का नाम है- मनुष्य का भाग्य ।
मनुष्य का भाग्य
भौगोलिक दृष्टि से वह बहुत ही विचित्र इलाका था । समूचा क्षेत्र कंटीले पेड़ों से भरी छोटी-छोटी पहाड़ियों और घाटियों, तूफानी नदी-नालों तथा पथरीले मैदानों से घिरा हुआ था। छोटे-बड़े गांव चारों ओर बिखरे हुए थे और उनके बीच काफी दूरी थी ।
       पंद्रह व्यक्तियों का एक दल करीमगंज के सामने वाली सीमा को पार करके बंगला देश की मुक्तिवाहिनी के सीमान्त हेडक्वार्टर की ओर बढ़ रहा था। भोर का मलगज़ी धुंधलका अभी सफेदी में परिवर्तित नहीं हुआ था । उस दल के आगे-आगे चार स्काउट विभिन्न दिशाओं में चल रहे थे। उस दल में चार स्त्रियां और ग्यारह पुरुष थे। किसी भी स्त्री की आयु पच्चीस-छब्बीस वर्ष से अधिक नहीं थी और किसी भी पुरुष की आयु तीस वर्ष से ऊपर नहीं थी। चारों स्काउट तो अभी किशोर ही थे। अभी उनकी मसें भीग रही थीं। चारों स्त्रियों ने मोटे और खुरदरे कपड़े के कमर तक लम्बे कुर्ते और पाजामानुमा पतलूनें पहन रखी थीं, जिनके पांयचों को उन्होंने अपनी पिंडलियों तक चढ़ा रखा था। उनके पैरों में रबड़ और कपड़े के फुल बूट थे । नौ पुरुषों ने लुंगियां पहन रखी थीं जो कमर में चमड़े के बैल्ट से कसी हुई थीं। दो पुरुष और चार
स्काउट कमीज़ और नेकर पहने हुए थे। स्त्रियों की कमर से स्टेनगनें लटकी हुई थीं और कमर में कारतूसों की पेटियां थीं । पुरुषों ने हल्की मशीनगनें थाम रखी थीं। वह ऐसा इलाका था जिसमें बड़ी गाड़ियां तो दूर, जीपें तक नहीं चल सकती थीं । यात्रा पैदल ही की जा सकती थी ।
(मेजर बलवंत बांगलादेश में- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)

   सन् 1947 के विभाजन से भारत के दो भाग हो गये। एक भारत और दूसरा पाकिस्तान । जहां यह विभाजन भारत के हृदय पर गहरा घाव था वहीं पाकिस्तान का भौगोलिक भाग भी विचित्र था । जहां भारत के पश्चिम में पाकिस्तान नामक देश अस्तित्व में आया वहीं भारत के पूर्व में भी पाकिस्तान का एक भाग बना दिया गया। अब स्वयं पाकिस्तान भी दो भागों विभक्त था और उसके मध्य लम्बी दूरी थी और बीच में था भारत देश । पूर्वी पाकिस्तान का इस्तेमाल पश्चिमी पाकिस्तान शासन और शोषण के लिए ही करता था।  पूर्वी पाकिस्तान के लोग पश्चिमी पाकिस्तान को 'पंजाबीस्तान' कहते थे और उनके अनुसार पाकिस्तान पर पंजाबी और बलोच ही शासन करते हैं। (वर्तमान में तो बलोच भी अलग देश 'बलोचिस्तान' की मांग कर रहे हैं।) 
      पाकिस्तानी शासक याहया खान के समय पूर्वी पाकिस्तान पर अत्याचार बढ गये और ऐसे समय में पूर्वी पाकिस्तान (बांगलादेश) में बंगबंधु शेख मुजीबुररहमान के नेतृत्व में बांग्लादेशा का स्वाधीनता आंदोलन शुरु हुआ। बांगलादेश के स्वत्रंताप्रेमियों मे 'मुक्तिवाहिनी' सेना का निर्माण किया और भारतीय सेना के साथ मिलकर बांगलादेश को आजाद करवाया।
  इसी संघर्ष के मध्य की कहानी है 'मेजर बलवंत बांगलादेश में' । 

   मेजर बलवंत को मुक्तिवाहिनी ने याद किया और मेजर बलवंत अपनी टीम सोनिया, डोरा, मालती और सुधीर के साथ जा पहुंचा बांगलादेश देश। ऊपर आप जो उपन्यास का प्रथम दृश्य पढ चुके हैं वह मेजर बलवंत का बांगलादेश में प्रवेश का दृश्य है।
मुक्तिवाहिनी ने मेजर बलवंत को तीन काम सौंपे थे 
  वह तीन काम आप मेजर बलवंत के शब्दों में ही देख लीजिए- 
"बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान के मित्र और अवामी लीग के संरक्षक सेठ इकराम अहमद के हत्यारे का पता लगाऊं और उस हत्यारे को मुक्ति-वाहिनी के हवाले कर दूं । दो देशभक्त छात्राओं, शालिनी मुकर्जी और फहमीदा अख्तर को खोजूं और उनको चंगेज खान द्वितीय याहिया खां के जल्लादों के चंगुल से छुटकारा दिलाकर ले आऊं । और उन कैम्पों का सुराग लगाऊं जहां अवामी लीग के कार्यकर्ताओं को नाजियों के अत्याचारों को भी मात करने वाले दंड दिए जा रहे हैं।"(पृष्ठ- 11)
मेजर बलवंत अपनी टीम के साथ जैसोर मण्डी पहुंचता है। जैसोर मण्डी में सेठ इकराम अहमद का घर । जहां उसकी पत्नी एक मकबरे में मिश्र देश की ममी की तरह विराजमान है और अब उसके घर एकमात्र पुत्र ....जीवित है। हालांकि घर में नौकर समंदरू, हर्राफा फिरोजा जैसे पात्र उपस्थित हैं। इसके अतिरिक्त पाकिस्तानी सरकार ने सेठ इकराम अहमद के घर पर तीन पुलिसकर्मी भी तैनात कर रखे थे। और अब छद्मवेश के साथ मेजर बलवंत को इस घर में प्रवेश करना था और सेठ इकराम अहमद के हत्यारे को तलाश करना हैं। 
     उपन्यास का पूरा घटनाक्रम इसी हत्याकाण्ड के इर्दगिर्द ही घूमता है और मेजर बलवंत अपनी सूझबूझ और सहयोगियों के साथ मिलकर सेठ इकराम अहमद के हत्यारे को खोजने का काम करते हैं। और इस दौरान उन्हें बहुत कयुछ रोचक और विचित्र सुनने को भी मिलता है हालांकि कर्नल रंजीत के उपन्यासों में ऐसे घटनाक्रम सामन्य बात हैं। यहां भी सेठ इकराम की हत्या पर जो तर्क सामने आते हैं वह अत्यंत विचित्र हैं।
"नहीं, कोई नहीं था । इसलिए यह पता नहीं चल सका कि उनकी हत्या कैसे की गई। किसी के पैरों के निशान तक नहीं मिले । लोगों में यह अफवाह फैला दी गई कि सूर्य की पहली किरण ने उनकी हत्या की है।"
“सूर्य की पहली किरण ने ? यह कैसे हो सकता है ? अगर यह बात है तो यह केस बहुत ही पेचीदा प्रमाणित होगा ।
(पृष्ठ-27)
  अब उपन्यास का यह रहस्य पाठक के दिमाग में घूमता रहता है की सूर्य की पहली किरण से हत्या कैसे हो सकती है। और प्रश्न एक मात्र यही नहीं था और भी बहुत से प्रश्न थे जो मेजर बलवंत को तंग कर रहे थे ।
सेठ इकराम को सूर्य की पहली किरण से क्यों प्यार था ? 
सूर्य की पहली किरण का उनकी पत्नी की ममी से क्या सम्बन्ध था और सूर्य की पहली किरण में क्या रहस्य था ? मेजर इन सभी रहस्यों को जानना चाहता था ।
(पृष्ठ- 29)
   और इन रहस्यों को जानने के लिए मेजर बलवंत को घर के एक -एक सदस्य से मिलना था, उनके बयान लेने थे और हत्याकांड वाले दिन के घटनाक्रम को भी समझना था ।
     यहां‌ मेजर को एक और रहस्यमयी बात पता चलती है और वह है कोयल की कूक । यह कोयल की कूक ही असली रहस्य से पर्दा हटाती है। ऐसे रोचक घटनाक्रम कर्नल रंजीत साहब ही लिख सकते हैं।
आप भी कोयल की आवाज का आनंद लिजिए क्योंकि यह आवाज ही वह तथ्य है जिसने हत्यारे का पता मेजर बलवंत को बताया।
- कोयल की आवाज का रहस्य-
"मैंने अपने पिता की हत्या से पच्चीस मिनट पहले कोयल की आवाज़ सुनी थी । और उस दिन कोयल ने अपना गीत पूरा नहीं गाया था ।"
"क्या मतलब ?" मेजर चौंक उठा ।
"मेरी मां की मृत्यु के चार दिन बाद जब काहिरा से ममी तैयार करने वाले दो मिस्त्री कारीगर यहां आ गए और उन्होंने दो दिन में ममी तैयार कर दी तो, उसी दिन से कोयल ने नियमित रूप से दिन में चार बार कूंकना शुरू कर दिया ।"
"कोयल दिन में चार बार कब-कब कूकती है ?"
"सुबह पांच बजे, दोपहर को डेढ़ बजे, तीसरे पहर को साढ़े चार बजे और रात को नौ-दस बजे ।"
(पृष्ठ-99) 
 अभी तो रूका, 
बात सिर्फ कोयल के कूकने की या समय की होती तो भी मान लेते ‌। मेजर बलवंत तो यहां कोयल के कूकने के पैटर्न को समझना चाहते हैं कि कोयल कब और कैसे कैसे कूकती है।
कू कू... कू कू कू...कू..कू...
नामकरण
अक्सर अपने उपन्यासों में कर्नल रंजीत कुछ पात्रों को अलग तरह से संबोधित करते नजर आते हैं‌
हर्राफा फीरोजा, बंगाली लड़की प्रोमिला आदि। 
संवाद

धन संपत्ति का लालच ही मनुष्य को नीच काम करने  पर विवश कर‌ देता है।    
(पृष्ठ-112)

शे'र-
कर्नल रंजीत  साहब स्वयं मखमूर जलंधरी नाम से स्वयं अच्छी शायर करते रहे हैं । उनके जासूसी उपन्यासों‌में भी जासूस पात्र मेजर बलवंत के माध्यम से कुछ शे'र पढने को मिलते हैं हालांकि यह शे'र अत्यंत सामान्य श्रेणी के भी नहीं होते ।
- मुर्गे जो खा रहा है सो है वह भी आदमी, 
दलिया पका रहा है सो है वह भी आदमी ।"
- एक ही बीवी से जीना अपना दूभर हो गया, 
कैसे वो जीते हैं जो रखते हैं दो दो बीवियां ?

तथ्यात्मक:-
मेजर बलवंत के साथियों के विषय में भिन्न- भिन्न उपन्यासों में‌ जानकारी मिलती है। 'पीले बिच्छ'  उपन्यास से हमें मालती का परिचय मिलता है।
प्रस्तुत उपन्यास में  डोरा का कथन देखें- "आप जानते हैं, मैं तो जंगलों में रही हूँ । आप देखिएगा, किस सफाई से कोयल बनती हूँ। ।"- डोरा बोली ।
कोई पाठक डोरा के विषय में जानता हो तो बतायें ? 
 हमने इस आलेख के आरम्भ में चर्चा की थी की मेजर बलवंत 'पीले बिच्छू' उपन्यास में भी बांगलादेश की यात्रा करता है। जहां पीले बिच्छू में मेजर भारत की एक संस्था की तरफ से बांगलादेश जाता है वहीं इस प्रस्तुत उपन्यास में वह बंगलादेश की मुक्तिवाहिनी के बुलावे पर बांगलादेश जाता है।
- 'पीले बिच्छू' मेजर बलवंत को तीन काम दिये जाते हैं, प्रस्तुत उपन्यास में भी तीन काम हैं।
- पीले बिच्छू में मेजर बलवंत 'एम. कलदानी' की हत्या का रहस्य खोलता हैं वहीं प्रस्तुत उपन्यास में वह सेठ इकराम अहमद के हत्यारे को खोजता है।
- पीले बिच्छू में बागी स्मरना को बचाना है वहीं यहाँ दप लड़कियां शालिनी मुकर्जी और फहमीदा अख्तर को तलाश करना है। 
   मूलतः दोनों उपन्यास बांगलादेश की धरती पर मर्डर की रहस्य को सुलझाने का प्रयास हैं । दोनों उपन्यास एक‌ जैसे नजर आते हुये भी अलग-अलग हैं।
उपन्यास मर्डर मिस्ट्री कथानक है। जहाँ आरम्भ में यह उपन्यास बांगलादेश की स्वतंत्रता की बात करता नजर आता है वहीं यह शीघ्र ही मर्डर मिस्ट्री मदं बदल जाता है और मेजर बलवंत सेठ इकराम के हत्यारे को खोजने में व्यस्त हो जाते हैं।
          उपन्यास के आरम्भ में मेजर बलवंत को तीन काम सौंपे जाते हैं। एक सेठ इकराम के हत्यारे को खोजना, दूसरा दो देशभक्त छात्राओं को तलाश करना और तीसरा बांगलादेश के गायब बुद्धिजीवियों का पता लगाना। कहने को यह तीन काम हैं लेकिन लेखक का मूल उद्देश्य मर्डर मिस्ट्री उपन्यास रचना ही था। उपन्यास का मुख्य कथानक भी हत्यारे की खोज करना ही है और उपन्यास के अंतिम छह पृष्ठों में आकर मेजर बलवंत दोनों छात्राओं खो खोजता है और अंतिम पृष्ठ में आकर यह बताता है की बांग्लादेश के बुद्धिजीवी कहा हैं। इस दृष्टि से मुख्य कथा के अतिरिक्त अन्य घटनाक्रम गौण ही हैं।
    उपन्यास के आरम्भ में लगा था की हमें बांगलादेश के स्वतत्रता संघर्ष के विषय में कुछ पढने को मिलेगा लेकिन ऐसा कुछ विशेष नहीं मिला। हां उपन्यास के अंत में मुक्तिवाहिनी, भारतीय सेना का संघर्ष और  बांगलादेश के स्वतंत्र होने का चित्रण अवश्य है।
  मर्डर मिस्ट्री पाठकों के लिए उपन्यास अच्छा है। यह उन्हें बांगलादेश की कथित यात्रा करवाता है। उपन्यास में कर्नल रंजीत स्तर के रहस्य मनोरंजन करते हैं।

उपन्यास-  मेजर बलवंत बांगलादेश में
लेखक-     कर्नल रंजीत
पृष्ठ-
संस्करण- 
प्रकाशक-  हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली

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