Monday, 15 May 2017

45. मौत आयेगी सात तालों में- विनय प्रभाकर

कुछ उपन्यास ऐसे होते हैं जो एक बार पढते ही वर्षों तक याद रहते हैं। उपन्यास की कहानी, पात्र और संवाद पाठक कभी नहीं भूलता। एक अच्छे लेखक की भी यही पहचान है की वो अपने पाठकों को एक ऐसी कहानी दे जिस के दम पर पाठक उस उपन्यासकार को याद रख सकें।    लेखक की प्रतिभा की पहचान भी तभी होती है जब उसकी रचना को पाठक वर्षों तक याद रखें।
      ऐसे ही एक प्रतिभावान लेखक हैं विनय प्रभाकर। उनका एक उपन्यास है, नाना पाटेकर सीरीज का - मौत आयेगी सात तालों में। एक ऐसा उपन्यास या कहें की एक ऐसा पात्र जो पाठक को भूलाये नहीं भूलता।
     मैंने इस उपन्यास को प्रथम समय सन् 2002 में पढा था और वह मेरे मस्तिष्क में एक याद बन कर रहा। और अब पुन: may 2017 को इस उपन्यास को पढा तब भी वही आनंद आया जो पहली बार पढने में आया था।
उपन्यास का मुख्य पात्र है मेजर नाना पाटेकर। वक्त का मारा एक सेना का मेजर, सेना का वह जांबाज आॅफिसर, जिसे वक्त की गर्दिश ने मुजरिम बना दिया। मेजर चाहे मुजरिम हो पर देश उसके लिए पहले है, वह ऐसा कोई भी काम नहीं करता जिससे देश को क्षति हो। अब तो वह कानून की नजर में एक अपराधी है। एक ऐसा अपराधी जिस पर कई हत्याओं का आरोप है। आतंकवादी, पुलिस और कुछ अन्य लोगों की हत्याओं के आरोप, जिसमें में से कई सच हैं तो कई झूठ।
प्रस्तुत उपन्यास के कथानक की बात करें तो इसकी कहानी प्रतिशोध और डकैती पर आधारित है। क्या नाना पाटेकर जैसा देशभक्त डकैती करेगा।
कहानी-
नाना पाटेकर के वृद्ध चाचा  प्रताप पाटेकर की हत्या उनकी जवान वीबी ऋचा अपने प्रेमी इंस्पेक्टर युसूफ खान के साथ मिलकर कर देती है और इंस्पेक्टर इस हत्या का आरोप मेजर नाना पाटेकर पर लगा देता है। नाना पाटेकर को सजा सुना दी जाती है। प्रतिशोध की आग में जलता मेजर एक दिन जेल से फरार हो जाता है।
     जाॅन, इकबाल, ऊदल और चंदू चारों ब्रिटिश कंसुलेट की इमारत के एक कर्मचारी के नाखून चुराना चाहते हैं। जी हाँ, नाखून, जिनकी कीमत लाखों में।
   दूसरी तरफ है एक चाण्डाल चौकङी। पण्डया, दामू, ढोलिया और धनू। यह चाण्डाल चौकङी छोटी-मोटी लूट कर अपना जीवन यापन करती है।
किस्मत इन सभी को एक साथ मिला देती है। तब प्लान बनता है अमेरिकन सेंटर नामक इमारत में मौजूद उपस्थित दो टन सोने को लूटने का।
  लेकिन इसके लिए पहले कुछ रुपयों की जरूरत थी। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए एक टीम बनाकर एक बीयर बार लूटने की कोशिश की जाती है। लेकिन वहाँ से भी जान बचाकर भागना पङता है। वह बीयर बार था एक गुण्डॆ असलम का। अब असलम को तलाश है उन लोगों की जिन्होंने उसके बीयर बार को लूटने की कोशिश की।
     युसूफ खान ब ऋचा को जब नाना पाटेकर के फरार होने की सूचना मिलती है तो वह नाना को मारने की सुपारी गैंगस्टर लक्ष्या भाई को दे देते हैं।
  इन सबसे अंजान नाना पाटेकर अपने लक्ष्य दो टन सोने को लूटने के प्लान पर कार्यरत हैं।
किसी तरहं असलम को भी इस लूट की खबर हो जाती है। वह भी चोर पर चोरी की ताक में बैठा है।
- क्या नाना पाटेकर अपने प्रतिशोध को पूरा कर पाया?
- क्या था लाखों रुपये के नाखूनों का रहस्य?
- नाना पाटेकर दो टन सोना लूट पाया?
-क्या हुआ जब असलम लक्ष्या भाई नाना पाटेकर से टकराये?
- भारत सरकार से चोरी-चोरी दो टन सोना अमेरिकन सेंटर में किसने जमा कर रखा था?
इन सब प्रश्नों के उत्तर तो विनय प्रभाकर द्वारा लिखे गये मौत आयेगी सात तालों में उपन्यास पढकर ही प्राप्त किया जा सकता है।
उपन्यास तेज रफ्तार है, कहीं भी बोरियत या उलझाव नहीं है।
प्रतिशोध और डकैती पर लिखा गया शानदार उपन्यास।
नाना पाटेकर सीरीज का यह अविस्मरणीय कारनामा वास्तव में पढने लायक है।
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उपन्यास- मौत आयेगी सात तालों में।
लेखक- विनय प्रभाकर
प्रकाशक- मनोज पॉकेट बुक्स- दिल्ली
पृष्ठ-270

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Saturday, 13 May 2017

44. ट्रेजडी गर्ल- एम. इकराम फरीदी


एक लङकी थी जो अंधकार से निकल कर प्रकाश को लालायित थी- एक शुभचिंतक के माध्यम से उसे प्रकाश प्राप्त हुआ मगर अंधकार के अनाकोण्डा को ये गंवारा नहीं था.......
      यौवन, दुर्भाग्य, शोषण और अपराध के गर्भ में परिवेश पाकर परिपक्व हुयी एक लङकी।
        उपर्युक्त पंक्तियां नव लेखक एम. इजराम फरीदी के द्वितीय उपन्यास ट्रेजडी गर्ल के अंतिम कवर पृष्ठ से हैं।
        एक थी गुल- जी हां, ये कहानी एक गुल की है और उस गुल का नाम था -सुरभि। नाम उसका सुरभि था लेकिन अतीत उसका काला था। वही काला अतीत उसका वर्तमान बन कर जब सामने खङा हो गया। तब मुसीबतों के पहाङ उस पर टूट पङे।
  प्रस्तुत उपन्यास जहाँ एक और हमें सामाजिक लगता है वहीं दूसरी तरफ जासूसी भी दिखाई देता है। जहाँ एक तरफ प्यार है तो वहीं दूसरी तरफ इसमें नफरत भी है। दोस्त हैं, दुश्मन भी हैं और दोस्त-दुश्मन भी है।

कहानी-
उपन्यास की कहानी की बात करे तो यह सुरभि नामक एक ऐसी युवती की कहानी है जिसका अतीत कभी दागदार रह चुका है। अब सुरभि एक अच्छा जीवन जी रही है, अपने अतीत को भूला कर। लेकिन एक दिन सुरभि के अतीत का मित्र ही उसके सुनहरे वर्तमान पर काला बादल बन कर छा जाता है। अब सुरभि कहां जाये।
      इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की नियति है की वह हर जगह छली जाती। इन परिस्थितियों से उसे  हर बार बचाता है सुरभि का दोस्त अजय।
अपने अतीत के ब्लैकमेलर से बचने के लिए अपने मित्र अजय का सहारा लेती है। लेकिन ब्लैकमेलर उसके पति विशाल से पास जाने की धमकी देता है।
      लेकिन जब सुरभि के पति विशाल का ब्लैकमेलर से वास्ता पङता है तब वह सुभाष कौशिक नामक जासूस को  सत्यता का पता लगाने के लिए बुलाता है।
सुरभि का दोस्त अजय जब भारी मुसीबत में‌ फंस जाता है तब सुरभि चाह कर भी उसकी मदद नहीं कर पाती और सुरभि का पति विशाल भी इस मित्रता को पसंद नहीं करता।
यहीं से कहानी में एक जबरदस्त मोङ आता है और कहानी अपने-पराये, दोस्त-दुश्मनों के चेहरों से नकाब उतारती हुयी जासूस सुभाष कौशिक के संवाद के साथ एक विषाद पूर्ण स्थिति में खत्म हो जाती है।
पल-पल बदलते पात्र-
कहानी की एक विशेषता यह है की समस्त पात्र स्वतंत्र है और एक अच्छा कहानीकार भी वही माना जाता है जो अपने पात्रों को अपनी कठपुतली न बनाकर उन्हें स्वतंत्र आचरण करने दे। इसी विशेषता के कारण ट्रेजडी गर्ल उपन्यास सत्यता के ज्यादा नजदीक नजर आता है।
     पाठक उपन्यास के किसी भी पात्र पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं कर सकता है की यह पात्र कहां तक ईमानदार है या कहां तक अपने नियमों पर बद्ध।
  कब सुरभी बदल जाती है, कब विशाल पल-पल बदलता है और कब अजय के विचारों में परिवर्तन आ जाये कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
एक जबरदस्त दृश्य-
उपन्यास का एक बहुत ही हास्य व रोचक दृश्य है। जब ब्लैकमेलर सुरभि के पति को सुरभि के काले अतीत के दम पर ब्लैकमेल करने की कोशिश करता है
आप भी देख लीजिएगा।
ब्लैकमेलर ने फोन किया- " आदमी बङे खतरनाक बोल रहे हैं हम...।"
"क...कौन?"
"नाम को जाने दो...।"
"ओह समझा- संदीप दूबे बोल रहे हो तुम।"
ब्लैकमेलर उछला- "अबे..तुझे मेरा नाम कैसे मालूम?"
"...असली संदीप दूबे जी ने....।"
"असली संदीप दूबे ? ये कौन हुआ बे?"
पाठक महोदय वास्तविकता तो ये है की ये ब्लैकमेलर ही असली संदीप दूबे और जिसे स्वयं यहाँ पहचान का संकट पैदा हो गया।
चलो अब थोङा आगे के दृश्य का रसास्वादन करते हैं-
"प्यारे, ज्यादा मेरे दिमाग को मत झुलसा- मैं पहले से परेशान  हूँ- बस मुझसे ब्लैकमेल हो जा- तू जानता है कि तेरी पत्नी के खिलाफ मेरे पास क्या-क्या है?"
"उसकी कोई जरूरत नहीं वो मैने देख रखी है"
"क..कहां- तूने क्या देख ली भई?"
"अपनी बीवी के पास - उसके मोबाइल में है।"
संदीप के आगे पूरी दुनिया घूमने लगी। उसे चक्कर आने लगा।
"कैसा पति है यार तू?"- संदीप रो देने वाले स्वर  में बोला-" अपनी बीवी की रंगरलियां देख कर खुश होता है।"
देखा पाठक मित्रो ऐसा दृश्य कहीं। जहाँ स्वयं ब्लैकमेलर पनाह मांगता नजर आता है। क्या कोई पति अपनी पत्नी के अश्लील विडियो पर खुश हो सकता है। कभी भी नहीं, तो फिर यहाँ क्या चक्कर है?

संवाद-
उपन्यास में बहुत से ऐसे संवाद है जो पात्र का चरित्र-चित्रण करने के साथ-साथ उपन्यास को गति भी देते हैं। कई संवाद तो जीवन को सही दिशा देने वाले दर्शन सूत्र की तरह भी हैं।
- 'वफा, प्यार, मोहब्बत- ये सब फैंटेसी शब्द हैं, जो दिखने में तो खूबसूरत हैं लेकिन इनकी हकीकत कुछ भी नहीं है।"-(पृष्ठ-92)
- "नियति हमारे हाथ में नहीं है, बल्कि हम उसकी कठपुतलियां हैं - गिले शिकवे अपनी जगह और यथार्थ के कङवे घूंट अपनी जगह।"-(92-93)
- " मायके का तो कुत्ता भी प्यारा होता है।" (93)
- "जमाना कहीं नहीं पहुंचा- जमाना वहीं है, आज भी रोटी चावल खा रहा है- बस अय्याशी पर पहले प्रतिबंध था, अब वह ओपन हो गयी है। बीवी अपने पति की न होकर बाकी  सबकी है, बस यही चेंजिंग आई है जमाने में।"-(125)
- "दुनिया का कोई भी ऐसा मर्द नहीं है जो अपनी पत्नी के रूप में ईमानदार सीधी-सादी, नेक और चरित्रवान लङकी को न चाहता हो जबकि प्रेमिका के रूप में वह कैसी भी लङकी को पसंद कर लेगा।"-(143)
-" आशिक का मुकद्दर ऐसा होता है की वह करवटें बदलते-बदलते एक दिन गहरी नींद सो जाता है।"-(167)
-" जब दुश्मन के साथ दोस्त मिल जाये तब तबाही को रोक पाना मुश्किल है।"-(180)
-"एक औरत की क्या नियति है? जहां जायेगी छली जायेगी।"-(226)

जो मुझे अच्छा नहीं लगा-
पृष्ठ संख्या 89 पर सुरभि अजय को अपने पति विशाल के बारे में कहती है।
- "....मेरी जुल्फों की जंजीरों में जकङा गुलाम भला मेरे खिलाफ सोच सकता है"
वर्तमान में सुरभि एक पतिव्रता व अपने पति को सच्चा प्यार करने वाली स्त्री है। तब वह अपने पति संदर्भ में गुलाम या जुल्फों में जकङा आदि शब्द प्रयोग नहीं करेगी। इन शब्दों का अर्थ की वह अपने पति से सच्चा प्यार नहीं करती।
- पूरे उपन्यास में मात्र दो पंक्तियाँ है जो बस मुझे अच्छी नहीं लगी। क्योंकि उनकी वहाँ आवश्यकता नहीं थी।
पृष्ठ संख्या 151 की प्रथम दो पंक्तियाँ ।
- महाभारत की पात्र द्रोपदी को पांचाल क्षेत्र की होने के कारण पांचाली कहा जाता है। इस उपन्यास में लेखक सुरभि को किसी संदर्भ विशेष में पांचाली कहा है इसका कारण समझ में नहीं आता।
  उपन्यास पढें-
उपन्यास की भाषा शैली बहुत ही सरल है जो पाठक को तुरंत समझ में आती है। कहानी हमारे परिवेश की होने के कारण व संस्पैंश के कारण पाठक के मर्म को छू जाती है।
      युवावस्था में भटक कर की गयी गलतियाँ भविष्य में हमारे लिए किस प्रकार मुसीबतें खङी कर सकती हैं यह तो इस उपन्यास को पढ कर ही जाना जा सकता है।
  वर्तमान उपन्यास जगत के मार-काट, जासूसी और हिंसा प्रधान या फिर सामाजिक उपन्यासों के दौर में प्रस्तुत उपन्यास बिलकुल अलग है। क्योंकि उपन्यासकार ने जासूस को तो दिखाया है पर उसे कहीं भी हावी नहीं होने दिया यही स्थिति ब्लैकमेलर की है।
लेखक एम. इकराम फरीदी की कलम को नमन जिन्होने एक संग्रहनीय उपन्यास लिखा।

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उपन्यास- ट्रेजडी गर्ल
लेखक- एम. इकराम फरीदी
प्रकाशक- धीरज पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 240
मूल्य-80₹
सन्- may-2017
(उपन्यास प्राप्त करने के लिए लेखक से भी संपर्क किया जा सकता है)
एम.इकराम फरीदी
-Call/paytm- 9911341862
    - 8006756415
- moi mean fare edit gmail.com

Thursday, 11 May 2017

43. साजिश- सुरेन्द्र मोहन पाठक

अनिल पंवार जब उस बरसाती और तूफानी रात को अपने घर पहुंचा तो उसकी बीवी घर से गायब थी। कब, कहां, किसके साथ चली गयी किसी को भी पता नहीं।
सब कहते रहे की वह अनिल पंवार को छोङ कर चली गयी, पर अनिल पंवार का मानना था की उसके साथ कोई हादसा हो गया, कोई साजिश हो गयी।
- तो कहां चली गयी अनिल पंवार की पत्नी?
-क्या वो एक साजिश थी? 

साजिश सुरेन्द्र मोहन पाठक का एक अति तेज रफ्तार उपन्यास है। विमान की रफ्तार की तरह चलने वाला एक ऐसा कथानक है जिसे पाठक एक ही बैठक में पढना चाहेगा। उपन्यास में कसावट भी इतनी है के पाठक कहीं भी क्षणभर के लिए बोरियत महसूस नहीं करता। 

42. हवेली के दुश्मन- संजय गुप्ता

हवेली के लोगों का दुश्मन।
हवेली के दुश्मन- संजय गुप्ता, जासूसी उपन्यास, मध्यम।


'सांय।'
एक तीर बङी तेजी से हवा में लहराता हुआ आया।
'खच्च!'
वह तीर एक कारिंदे के सीने में जा धंसा।
कारिंदे के मुख से एक तेज चीख निकली। दर्द और पीङा से भरी हुई चीख।
और फिर वह ..............
वह मर चुका था। जीवित इंसान से लाश में तब्दील हो चुका था।
यह भयानक दृश्य देखकर बङे ठाकुर और उनके तीनों पुत्र अवाक रह गये। स्तब्ध रह गये।
किसी पत्थर की मूर्ति के समान वे अपने स्थान पर खङे रहे...............
फिर सबसे पहले बङे ठाकुर संभले।
और अगले ही क्षण उनकी दहाङ दूर-दूर तक गूँज उठी।
"किसने यह तीर फेंका? किसने चलाया यह तीर! अपनी मौत को दावत देने जैसी हिम्मत किसमें पैदा हो गयी? अगर मर्द का बच्चा है तो सामने आए। अगर सचमुच हमसे टकराने का हौसला है तो सामने आए।"
तीर चलाने वाला सामने नहीं आया।
उपर्युक्त दृश्य है संजय गुप्ता के उपन्यास ' हवेली के दुश्मन' का।
          रूपनगर के ठाकुर चन्द्रदेव सिंह और उनके तीनों पुत्रों को मारने की किसी अंजान शख्स की धमकी दी और फिर एक-एक कर वह हवेली के मालिकों को मारने लगा।

Friday, 5 May 2017

41. मौत का साया-सुनील प्रभाकर

जासूसी उपन्यासकार सुनील प्रभाकर का एक उपन्यास 'मौत का साया' पढने को मिला। तेज रफ़्तार उपन्यास है। ठीक सुपर फास्ट ट्रेन की तरह। पाठक ने उपन्यास एक बार आरम्भ कर दिया तो वह उसके अंतिम पृष्ठ पर जाकर ही ठहरेगा।  उपन्यास अपने प्रथम पृष्ठ से ही तेज रफ्तार पकङ लेता है और अंत तक उसी रफ्तार से चलता है।
       मुझे सुनील प्रभाकर का ये पहला उपन्यास पढने को मिला और वह भी गजब, जबरदस्त, पठनीय।
उपन्यास का नायक-  जेम्स, जेम्स विलियम नायक है उपन्यास का। हिंदुस्तानी पिता व अंग्रेज माँ की संतान जेम्स स्वयं पूरा हिंदुस्तान है। वह एक प्राइवेट जासूस है लेकिन जरूरत पङने पर भारत सरकार के लिए भी काम करता है।
कहानी-  भारत के गृह मंत्रालय के स्ट्राॅग रूम' से एक महत्वपूर्ण फाइल गायब हो जाती है।  वह 'रेड फाइल' गायब की थी गृह मंत्री के निजी सचिव एच. सी. कामत ने। कामत वह शख्स था जिसकी ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता।  वहाँ लगे CC TV से पता चलता है की जिस समय कामत ने फाइल गायब की उस वक्त वह अपने होश में नहीं थे अर्थात् वे किसी नशे के प्रभाव में लग रहे थे और उनका स्वयं पर कोई नियंत्रण नहीं था।
      गोवा में सचिव एच. सी. कामत के पिता की मौत हो जाती है जब कामत वहाँ पहुंचते हैं तो उनकी हत्या कर दी जाती है। स्थानीय जासूस गणेशन प्रभाकर को हत्यास्थल से मात्र एक लङकी का बाल मिलता है।
      इस पूरे प्रकरण की जांच की जिम्मेदार दी जाती है प्राइवेट डिटेक्टिव जेम्स विलियम को।
     जब जेम्स गोवा पहुंचता है तो उस पर कातिलाना हमला होता है। जेम्स जैसे बचकर अपने होटल पहुंचता है तो वहाँ भी उसका स्वागत करने को कातिल तैयार मिलते हैं। जेम्स उनसे बच जाता है और उन्हीं के माध्यम से जा पहुंचता है रेशमा तक।
     लेकिन जेम्स यहाँ कैद हो जाता है। लेकिन अर्द्धरात्रि को वहां से एक मददगार जेम्स को लेकर निकल जाता है। अभी वे ज्यादा दूर नहीं निकल पाते उनको चारों तरफ से घेर लिया जाता है।
एक बार फिर नाटकीय अंदाज से जेम्स को बचाने पहुंच जाते हैं कर्नल लूथरा।
कर्नल लूथरा भी एक लङकी के शिकार हैं।
कहानी इतनी तीव्र रफ्तार से आगे बढती हैं की पाठक को सोचने का समय नहीं मिलता। कहानी में पृष्ठ दर पृष्ठ नये -नये मोङ आते जाते हैं। रोमांच अपनी चरम सीमा पर रहता है।
स्वयं जेम्स हैरान है की घटनाएं इतनी तेजी से क्यों घट रही है। पर इन घटनाओं का उत्तर तो सुनील प्रभाकर के उपन्यास 'मौत का साया' को पढकर ही मिलेगा।
- एच. सी. कामत ने वह फाइल क्यों गायब की?
- कामत की हत्या किसने की?
- जेम्स पर लगातार हमला कौन करवाता है?
- जेम्स को रेशमा की कैद से कौन आजाद करवाता है?
- जेम्स पर हमले के दौरान कर्नल लूथरा वहा कैसे पहुंचते हैं?
- लूथरा और लङकी का क्या रहस्य था?
- लङकी के बाल का क्या रहस्य था?
  ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्न है जिनके उत्तर उपन्यास में ही मिलते हैं।
संवाद- उपन्यास के कुछ संवाद वास्तव में बहुत अच्छे हैं। संवाद ही लेखक की प्रतिभा के अच्छे उदाहरण हो सकते हैं, जिस पर सुनील प्रभाकर खरे उतरते हैं।
-रेशमा- "तुमने सुना होगा नागिन की पूँछ पर पांव रखने वाला कभी जीवित नहीं बच सकता। तुमने तो सीधे नागिन के फन पर हाथ डाला है।'' (पृष्ठ-61)
-" कहते हैं की जीवन और मौत हमेशा ईश्वर के ही हाथ में होती है।"-(58)
-  "हालांकि मैं पण्डित हूं- शराब मुझे नहीं पीनी चाहिये- किंतु यह विदेशी विस्की है- विदेशी डिस्टिल वाटर है, इसलिए इसे पीने से गुरेज नहीं करना चाहिये।'' (93)
- "इंसान के जीवन और मौत में मात्र पल भर का फासला हुआ करता है- और जब मौत इंसान पर झपटती है तो जीवन के सारे अर्थ खो जाया करते हैं" (136)
- पङौसी के घर चुल्हा न जला हो- तो एक पङौसी का फर्ज बनता है कि  तब तक वह खाना न खाये जब तक कि पङौसी को न खिला दे।" (162)
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उपन्यास में कमी- उपन्यास में क ई बाते खटकती हैं। अगर लेखक चंद शब्द न लिखता तो ज्यादा ठीक था।
जैसे पृष्ठ 27 पर जेम्स पर हमला होता है और वह हमलावर के पीछे भागता है।
'लिफ्ट की ओर भागते समय वह पहले अपने कमरे में आया था और ओवरकोट में बाहें डाल- हैट सिर पर लगाता हुआ ही दरवाजे की ओर भागा था।'
   अब एक समझदार जासूस अपने हैट -कोट पहनेगा या हमलावर के पीछे भागेगा। पाठक स्वयं सोच लें।
- उसने रिवॉल्वर निकाल लिया। (158)
यहाँ कर्नल का जिक्र हो रहा है जो की पूर्णतः नग्न है। जेम्स ने उस पर चादर डाल दी।
"आप चिंता मत कीजिए.....आपके शरीर पर बेडशीट मैं पहले डलवा चुका हूँ ।" (156)
अब कर्नल रिवॉल्वर कहां से निकालेगा।
विशेष- उपन्यास के पृष्ठ 43 का एक संवाद।
- उसने अपने शब्दों के शब्दकोश के सारे फुर्तीले शब्द उसकी ओर उछाल दिये।"
शब्दकोश शब्दों का ही होता है इसलिए यहाँ 'अपने शब्दों के' शब्द अनावश्यक रूप से लिख दिये गये।
सही वाक्य था - " उसने शब्दकोश के सारे फुर्तीले शब्द उसकी ओर उछाल दिये।" (176)
इस प्रकार की गलतियाँ कोई बङी बात नहीं है और न ही यह कोई साहित्यक उपन्यास है।
उपन्यास बहुत अच्छा है, पढने योग्य है।

विशेण-
जेम्स को एक पुस्तक विक्रेता कहता है-
" ये लीजिये- अजय ठकराल का नया उपन्यास 'दबे पांव' कमाल का उपन्यास है....।"
अजय ठकराल भी कोई उपन्यासकार थे यह विषय www.sahityadesh.blogspot.in के लिए उपयोगी होगा।
- जो उपन्यास मेरे पास उपलब्ध है उसमें पृष्ठ संख्या 193-208 तक पृष्ठ गायब हैं।
          सुनील प्रभाकर का यह उपन्यास बहुत अच्छा है। सबसे बङी बात है इसका तेज कथानक जो पाठक को अपने में बांधे रखनें में सफल हुआ है। पाठक को पढने के दौरान पूरा आनंद आयेगा।
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उपन्यास- मौत का 
लेखक- सुनील प्रभाकर
प्रकाशक - गौरी पॉकेट बुक्स-मेरठ
मूल्य- 25₹
पृष्ठ- 365.

40. स्लीपिंग पिल्स- प्रकाश भारती

प्रकाश भारती का अजय सीरीज उपन्यास 'स्लीपिंग पिल्स' अर्थात् 'नींद की गोलियाँ' अपने शुरुआत के पांच-सात पृष्ठ के पश्चात पाठक पर भारी पङता चला जाता है। उपन्यास के मध्यांतर में तो उपन्यास इस कदर हो जाता है जैसे आगे सरक ही नहीं रहा। पृष्ठ दर पृष्ठ एक जैसी वार्ता दिखाई देती है जिससे पाठक ऊब जाता है।
अपने क्लाइमैक्स में उपन्यास अच्छा है और क्लाइमैक्स (समापन) पाठक की सोच से भी बहुत दूर जा निकलता है। लेकिन इतनी बोरियत के पश्चात पाठक का उपन्यास से मोह भंग हो जाता है की वह मात्र उपन्यास का समापन चाहता है।
उपन्यास की कहानी- उपन्यास की कहानी नायक अजय से प्रारंभ होती है। उसे समुद्र के तट पर एक असहाय सी लङकी मिलती है। अजय उसे अपने घर ले आता है। लङकी उसके घर से स्लीपिंग पिल्स चुरा के निकल जाती। जब अजय को इस बात का पता चलता है तो वह लङकी तलाश में घर से निकल पङता है।
      अजय को लङकी तो नहीं मिलती लेकिन लङकी के परिचय लोगों से नयी-नयी जानकारी अवश्य मिलती है। इस दौरान एक एक कर तीन हत्याएं हो जाती है तथा दूसरी तरफ लङकी के अपहरणकर्ता फिरौती की रकम मांगते हैं।
- लङकी सीमा का किस्सा क्या था?
- उसका अपहरण किसने किया?
- हत्या का क्या रहस्य था?.
- हत्यारा कौन था?
ये सब रहस्य तो इस उपन्यास को पढ कर ही पता चलेंगे।
लेकिन उपन्यास में इतनी गलतियाँ है और तर्कहीन बातें है की उपन्यास का स्वाद ही खत्म हो जाता है।
- अजय अपने बाथरूम में स्लीपिंग पिल्स (नींद की गोलियाँ) क्यों रखता था?
- क्या एक तीन साल की बच्ची, लगभग तीस साल बाद किसी को पहचान लेगी?
- सीमा क्या अपहरण किसने किया या सीमा गायब कहां रही?
- अंत में अमन का कहीं जिक्र तक नहीं?
ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्न है जो पाठक को ढूंढने पर भी नहीं मिलते और उस पर उपन्यास की अनावश्यक लंबाई भी पाठक को परेशान कर देती है।
उपन्यास में सबसे अनोखी बात ये है की इस में जितने भी परिवार दिखाये गयें है सब के सब परिवारों में बिखराव है। पति- पत्नी अलग रहते हैं अगर कोई साथ है तो उनमें कोई प्यार नहीं ।
थोङा अजीब सा लगता है वह भी तब जब उपन्यास में एक नहीं कई परिवारों का जिक्र हो।
मेरे विचार से इस उपन्यास को पढना पाठक द्वारा अपना समय खराब करने जैसा है। उपन्यास में कोई भी संवाद या दृश्य याद रखने लायक नहीं है।
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उपन्यास- स्लीपिंग पिल्स
लेखक- प्रकाश भारती
प्रकाशक- गौरी पाॅकेट बुक्स
मूल्य- 25₹ (सन् 2004)
पृष्ठ- 276.
प्रकाश भारती के उपन्यासों की लिस्ट देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।
www.sahityadesh.blogspot.in

39. लास्ट हिट- प्रकाश भारत

उपन्यास जगत में प्रकाश भारती की अपनी एक विशेष जगह है। इनके उपन्यासों की कहानियाँ प्रचलित उपन्यासों से थोङी हटकर हुआ करती थी।  लोकप्रिय/ असाहित्यिक उपन्यासों का अपना एक विशेष पाठकवर्ग है जो इन उपन्यासों में सस्पेंश, हिंसा, रोमांच आदि का मिश्रण चाहता है, इसलिए इस उपन्यास जगत के लेखक एक तय फार्मूले से आगे बढ कर नहीं लिख सके। इन्होंने वही लिखा जो सामान्य पाठक समझ सके और उसका आनंद ले सके। इस दृष्टि से देखा जाये तो प्रकाश भारती के उपन्यास भी इस फार्मूले पर आधारित  हैं। मैंने प्रकाश भारती के ज्यादा उपन्यास नहीं पढ पर जो पढे हैं वे कथा के तौर पर अलग थे।
जैसे ' आठवाँ अजूबा' एक लङके की मानसिक विशेषता पर आधारित है, हार-जीत नकली पेंटिंग विषय पर है तो प्रस्तुत उपन्यास 'लास्ट हिट' नशा विरोधी संस्था के दो एजेंटों की प्रतिशोध गाधा है।
   प्रस्तुत लास्ट हिट उपन्यास इनके हिटमैन उपन्यास का द्वितीय व अंतिम भाग है।
डी. ई. ए. के दो एजेंट है अमर राणा और सरफराज खान। यह संस्था भारत देश में नशे के खिलाफ कार्यवाही करने वाली संस्था। लेकिन इस संस्था का सदस्य सरफराज खान अपने कर्तव्य से गद्दारी कर जाता है और अपने कई साथियों को मौत के घाट उतार देता है।
- अब सरफराज गद्दार क्यों हो जाता है?
- इसके पीछे क्या कारण थे?
- वह अपने साथियों को क्यों मारता है?
ये सब तो प्रकाश भारती के उपन्यास हिट मैन को पढकर ही जाना जा सकता है।
अब बात करें हिट मैन उपन्यास के आगामी भाग लास्ट हिट की तो इसमें अमर राणा व उसके साथी और राॅ संस्था के एजेंट मिलकर सरफराज के विरुद्ध मोर्चा खोलते हैं और अपने लक्ष्य में सफल होते हैं।
  सरफराज खान उपन्यास का एक सनकी किस्म का खलनायक है, यहाँ तक की जब राॅ के एजेंट सरफराज की माँ के माध्यम से सरफराज तक पहुंचने की कोशिश करते हैं तो वह अपनी माँ को भी खत्म करवा देता है‌। पर पूरी उपन्यास में सरफराज खान का जो चरित्र बताया गया है उतना उसे स्थान नहीं दिया गया।
जहां तक की प्रारंभ के सौ पृष्ठों में मात्र सरफराज का नाम ही आता है वह स्वयं नहीं। जो पाठक इस उपन्यास के प्रथम भाग को पढ चुके हैं उनके लिए शायद इस पात्र को समझना आसान होगा।
  उपन्यास के द्वितीय पार्ट अर्थात लास्ट हिट को अनावश्यक विस्तार दिया गया है। अधिकतर कहानी अमर राणा के पारिवारिक संबंधों के आस-पास घूमती रहती है तो कभी उनके कुत्ते लियो पर।
उपन्यास के क्लाइमेक्स में समुद्र का अच्छा चित्रण है साथ ही सामुद्रिक बाॅट टाइगर, रेसर, ब्लू शार्क को  दिखाया गया है।
क्या है लास्ट हिट-  सरफराज खान अपनी पत्नी, बच्चा व माँ को खो चुका है और वह इसका कारण अमर राणा को मानता है। अमर राणा के परिवार को खत्म करना ही उसका अंतिम उद्देश्य है, यही उसका लास्ट हिट है।
उपन्यास का पूरा आनंद दोनों भाग पढकर ही लिया जा सकता है। मात्र अंतिम एक भाग पढकर उपन्यास की उचित समीक्षा नहीं की जा सकती।
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उपन्यास - लास्ट हिट
लेखक- प्रकाश भारती
प्रकाशक- गौरी पाॅकेट बुक्स
मूल्य- 25₹
पृष्ठ- 236.
संपर्क-
प्रकाश भारती
पोस्ट बाॅक्स नंबर- 354
नई दिल्ली-110001
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