Friday, 9 January 2026

702. विज्ञान के व्यापारी - वेदप्रकाश काम्बोज

कौन ले जायेगा भारतीय वैज्ञानिक को ?
विज्ञान के व्यापारी - वेदप्रकाश काम्बोज
#विजय सीरीज

वेदप्रकाश काम्बोज जी जासूसी उपन्यास साहित्य में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी जासूसी रचनाएं मनोरंजन और एक्शन से भरपूर होती हैं।
  प्रस्तुत उपन्यास 'विज्ञान के व्यापारी' एक वैज्ञानिक के अपहरण की रोचक कहानी है, जिसमें भारतीय जासूस विजय का किरदार उसे मनोरंजक भी बनाता है।

विजय ने बड़े आराम से पलंग पर पसरते हुए कहा- 'तो मियां झानझरोखे, जिक्र है उस काली रात का जब आकाश में चांद चमक रहा था किन्तु रोशनी नहीं दे रहा था। जब ठण्डी हवायें आग बरसा रही थीं और सुनसान सन्नाटा बड़ी भयंकरता के साथ चारों ओर फैला हुआ था। तो मियां झानझरोखे उस काली और भयावली रात में जान हथेली पर सिर गुड की भेली पर लिये हुए कुछ जासूस एक खतरनाक अपराधी को पकड़ने के लिये जा रहे थे। तुम्हें याद नहीं होगा लेकिन मैं याद दिलाता हूं उन जासूसों में तुम भी थे, मैं भी था, अपना वो तुलाराशि सुपर रघुनाथ भी था अमरीकी जासूस वह साईकिल चेन भी था और रूसी जासूस बागारोफ भी था ।
    अशरफ ने लापरवाही से एक सिगरेट सुलगाई और उसका धुंआ हवा में उड़ाने लगा। उसके ढंग से ऐसा लग रहा था जैसे वह विजय की बात में कोई दिलचस्पी ही न ले रहा हो।
    किन्तु विजय ने फिर भी आगे कहा- 'सबके हौंसले बुलन्द थे, ताड़ के पेड़ों पर लटके हुए छन्द से बड़े जार थे। शहर की गलियों में से वे गुजर रहे थे और उनके दिल बड़ी खामोशी के साथ यह गाए जा रहे थे 'बस्ती बस्ती द्वारे-द्वारे गाते जायें जासूसा, कहां है अपराधी मूसा ।'
      एक क्षण रुक कर विजय बोला 'तो मियां झानझरोखे हम दुनियां के महान जासूस उस भयंकर अपराधी को पकड़ने के लिये जा रहे थे कि अचानक कुछ कुत्ते हम पर झपट पड़े। अब मियाँ ज्ञानझरोखे तुम जानों हम बड़े आदमी शेर चीतों से तो लड़ सकते हैं अब कुत्तों से क्या लड़ते । इतिहास साक्षी है कि भीष्म पितामह ने शिखंडी पर वार नहीं किया मर गये । सो हम वहां से भाग लिये । उस समय का नक्शा जब कुत्ते हम पर भौंके थे मैंने झकझकी में खींचा है और यह सारी भूमिका मैंने वह झकझकी सुनाने के लिये बांधी है ताकि तुम उसे आराम के साथ समझ लो । यानि सन्दर्भ और प्रसंग दोनों ही तुम्हारे सामने रख दिये हैं अब जरा वह मास्टर पीस झकझकी सुनो जो किसी कट-पीस की दुकान से नहीं मिल सकती। झकझकी इस प्रकार है-
दुनिया के जासूसों पर, कुत्ते भौंकते हैं,
विजय जी ठिठकते हैं, अशरफ जी चौंकते हैं ।
रघुनाथ जी घबराकर, अपनी पेंट सम्हालते हैं,
और बागारोफ की दाल को माईक जी छौंकते हैं ।।

(प्रथम पृष्ठ, विज्ञान के व्यापारी- वेदप्रकाश काम्बोज)
          यह तो रहा उपन्यास का प्रथम पृष्ठ जिसमें जासूस विजय और अशरफ की की नोकझोंक दर्शायी गयी है। और इस वक्त दोनों उपस्थित हैं जापान ने टोक्यो शहर के एक होटल में । वह भी एक मिशन के अंतर्गत यहाँ उपस्थित हैं। और मिशन भारतीय वैज्ञानिक चंद्रकांत के अपहरण से संबंधित है।
पहले लेखक की कलम से पढ कीजिए किस्सा क्या है ?
कुछ अपराधियों ने भारत के एक वैज्ञानिक प्रोफेसर चन्द्रकांत का अपहरण कर लिया था। प्रोफेसर चन्द्रकांत ने अपनी इस वर्ष की अथक मेहनत के साथ अपने एक सहयोगी तजीर के साथ मिलकर आणुविक युद्ध से रक्षा के लिये एक यन्त्र का निर्माण किया। यह यन्त्र ऐसा था जिसमें से कुछ अदृश्य किरणें निकलकर एक दीवार सी बना लेती थीं और किरणों की वह दीवार इतनी मजबूत थी कि कोई शक्ति उसे तोड़ नहीं सकती थी और परमाणु बमों की गर्मी भी उसे पिघला नहीं सकती थी।
      डेनियल नामक एक अपराधी को न जाने कैसे इस रहस्य का पता लग गया और उसने अपनी प्रेमिका सीमा के सहयोग से प्रोफेसर चन्द्रकांत का अपहरण कर लिया ।
   अपराधी डेनियल वैज्ञानिक चनद्रकांत को लेकर जापान आ गया और यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से डेनियल को जापान सरकार की सहायता थी । डेनियल वैज्ञानिक चन्द्रकांत का व्यापार करना चाहता था और इसके लिए उसने चीन रूस और अमेरिका से संपर्क किया था।
  तीनों देशों के श्रेष्ठ जासूस वैज्ञानिक चन्द्रकांत का सौदा करने के लिए जापान पहुंच गये थे। इसके अतिरिक्त भारतीय जासूस विजय और अशरफ भी जापान पहुंच गये थे और उनका एक उद्देश्य था भारतीय वैज्ञानिक चन्द्रकांत को खोजना और उन्हें वापस भारत ले जाना ।
   शेष संघर्ष इसी बात को लेकर होता है और जासूस मण्डली में परस्पर घात- प्रतिघात चलता रहता है। जासूस मण्डली एक दूसरे को मात देते नजर आते हैं और अपराधी डेनियल के नजदीक पहुंचने का प्रयास करते हैं। 
अपराधी डेनियल भी एक खतरनाक व्यक्ति है और उसका खतरनाक अंदाज तक नजर आता है जब चीनी जासूस पीटर से उसका सामना होता है ।
   उपन्यास की कथा सामान्य है और उपन्यास भी लगभग 120 पृष्ठ है । कथा में कुछ भी नया नहीं है।
उपन्यास में विजय और टाइगर का गुफा में बंद होना और फिर विजय का वहां से फरार होना कुछ हद तक पठनीय है।
उपन्यास में अशरफ की भूमिका कोई विशेष नहीं है।
वैज्ञानिक चन्द्रकांत का किरदार कुछ संशय पैदा करता है। क्या उसका वास्तव में अपहरण हुआ था या नहीं ।
वैज्ञानिक के विषय में एक चर्चा विजय- माइक आदि के मध्य भी होती है पर वहां भी कोई उत्तर प्राप्त नहीं होता ।
- माईक ने सिग्रेट सुलगाते हुए कहा - 'लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि प्रोसफेर वहां से भागा क्यों था ?'
'यह तो वही बता सकता है जिसके पास प्रोफेसर पहुंचा है ।' विजय बोला ।

अब जानते हैं कुछ और बातें-
- बिज्जोसान -विजय को जापान में कुछ लोग प्रेम से बिज्जोसान कहते हैं ।
- विजय शराब पीता है । विजय का कहना है परिस्थितियों के अनुसार चलना चाहिए ।
-  चीनी जासूस का नाम पीटर गोल्डस्मिथ है । पीटर जो कि जन्म से अंग्रेज है किन्तु फिर भी लाल चीन के लिये काम कर रहा है ।
- रूसी जासूस का नाम इकनओस्झेनोव  है ।
- अमरीकी जासूस का नाम माइक है।
    विजय के ऊपर पचास लाख डालर का ईनाम । यह पहली बार पढने को मिला है।
काश ! विजय उसके हाथ आ जाये तो उसे चीन सरकार की ओर से पचास लाख डालर मिल जायें पचास लाख डालर, इतनी मोटी रकम शायद ही किसी व्यक्ति के लिये आज तक निश्चित हुई होगी ।
   अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर आधारित और विभिन्न देशों के जासूसॊं के कारनामों को दर्शाता उपन्यास 'विज्ञान के व्यापारी' अपने लघु आकार में होते हुये भी मनोरंजक और रोचकता से परिपूर्ण है। कहानी चाहे छोटी है और विषय मात्र 'कौन ले जायेगा वैज्ञानिक' को इसी को आगे बढाती है, पर अपने प्रस्तुतिकरण के बल पर पठनीय बना है।

उपन्यास- विज्ञान के व्यापारी
लेखक-    वेदप्रकाश काम्बोज
पृष्ठ -   
#विजय सीरीज

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