धरती का शैतान- इब्ने सफी
Monday, 31 March 2025
Sunday, 30 March 2025
639. धरती का शैतान- इब्ने शफी
आओ पढें एक नकली उपन्यास
कर्नल विनोद, कैप्टन हमीद और मूर्ख कासिम का उपन्यास
धरती का शैतान- इब्ने सफी
कर्नल विनोद ।
एशिया का माना हुआ जासूस- फादर ऑफ हार्ड स्टोन के नाम से विख्यात कर्नल विनोद इस समय होटल चाचा पाॅल के काउंटर पर खड़ा था । उसने अपनी कुहनी काउन्टर पर टेक रखी थी ओर टेलीफोन रिसीवर कान से लगा रखा था। दूसरे हाथ से उसने अपना दूसरा कान दबा रखा था क्योंकि हॉल में एक क्रिश्चियन डांसर मिस रूबी पूरे जोशो-खरोश से नाच रही थी और वहां बैठे लोग किस्म-किस्म की आवाजें निकालकर अपने दिल की लगी बुझाने की कोशिश कर रहे थे। हॉल का वातावरण पूरी तरह गुण्डागर्दी और अश्लीलता से भरा हुआ था। लोग शराब पी रहे थे। खा रहे थे और सुल्फे को सिगरेटों के कश चल रहे थे।
फोन के दूसरी ओर से बोलने वाला यकायक रुक गया था । विनोद ऊंची आवाज में हैलो हैलो कहे जा रहा था, लेकिन उसने इसके बाद किसी जवाब नहीं दिया। आखिर यह हुआ क्या ? साथ ही दूसरी ओर से बोलने वाले ने क्रैडिल पर फोन अभी रखा भी नहीं था ।
आखिरकार कर्नल विनोद ने डायल पर नम्बर घुमाया और टेलीफोन आपरेटर से पूछा-
'हैलो...आपरेटर !!
'यस सर।' एक जनाना आवाज गूंजी।
'अभी किस नम्बर से बात हो रही थी ?'
'जो किसकी ?' (धरती का शैतान- इब्ने शफी उपन्यास का प्रथम पृष्ठ)
यह उपन्यास मित्र रतन चौधरी ने भेजा था और वह भी Xerox करके । लेकिन पढने का समय मिला भी लम्बे समय पश्चात यानि लगभग तीन-चार वर्षों बाद । और जब इब्ने शफी साहब का उपन्यास 'धरती का शैतान' पढना आरम्भ किया तो पहले तो यह भी समझ में नहीं आया की आखिर चल क्या रहा है ?638. लहू से लिख दो जय हिंद- रीमा भारती
लहू से लिख दो जयहिंद- रीमा भारती
उस युवती का रंग गोरा था।
खूब गोरा-किन्तु हल्की-सी सुर्खी लिए हुए।
ऐसा लगता था जैसे ताजे मक्खन भरे थाल के निकट से कोई होली खेलने के मूड में आया शैतान बच्चा गुलाल उड़ाता हुआ गुजर गया हो।
युवती की उम्र अधिक से अधिक चौबीस साल की थी। किन्तु उसके चेहरे की मासूमियत व बदन की कामनीयता उसे बीस वर्ष की दर्शा रही थी।
युवती की आंखें वीरान थीं इनमें सोचों के साये थे। उसकी आंखें उस चार वर्षीय गोल मटोल बच्चे को घूर रही थीं जो कि एक बड़ी-सी रंगीन बॉल के पीछे यूं दौड़ रहा था जैसे अब गिरा तब गिरा।
वह बॉल के निकट पहुंचता और झुककर बॉल पकड़ना चाहता। किन्तु बॉल उसके पांव की ठोकर पहले ही खा जाती और दूर चली जाती।
मनोहारी डूबी हुई थी। दृश्य था। केवल वही उस मनोहारी दृश्य में नहीं बल्कि रीमा भी एक बेंच पर बैठी दिलचस्पी से उस दृश्य को देख रही थी।
रीमा !
भारत की सर्वश्रेष्ठ किन्तु गुप्त जासूसी संस्था आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेंट जो कि इन दिनों फ्री होने के कारण तफरीह के मूड में थी तथा अपने एक मित्र की प्रतीक्षा कर रही थी।
आज हम बात कर रहे हैं एक्शन उपन्यास लेखिका रीमा भारती जी के उपन्यास 'लहू से लिख दो जय हिंद' । प्रसिद्ध उपन्यासकार दिनेश ठाकुर (प्रदीप कुमार शर्मा) ने एक एक्शन गर्ल पात्र की रचना की थी, जिसना नाम था रीमा भारती। और बाद में इन्हीं दिनेश ठाकुर जी के ग्रुप से रीमा भारती नाम से एक लेखिका का पदार्पण होता है और उसके उपन्यासों की नायिका भी रीमा भारती होती है।
यहां आज हम लेखिका रीमा भारती जी के रवि पॉकेट बुक्स से प्रकाशित उपन्यास 'लहू से लिख दो जय हिंद' की बात कर रहे हैं।
Wednesday, 19 March 2025
637. शिलाओं पर लिखे शब्द- सुरेन्द्र मनन
एक फ़िल्मकार के संस्मरण
शिलाओं पर लिखे शब्द- सुरेन्द्र मनन
सुरेन्द्र मनन जी का नाम सब से पहले मैंने सारिका पत्रिका 'दिसम्बर 1985' पढा था । उनकी प्रसिद्ध कहानी थी नंगे लोग । इस एक कहानी के बाद मैंने कभी सुरेन्द्र मनन जी को नहीं पढा । इस कहानी के लगभग बीस साल बाद सुरेन्द्र मनन जी की रचना 'शिलाओं पर लिखे शब्द'(एक फ़िल्मकार के संस्मरण) पढने को मिला । संस्मरण में जो ताजगी है, जो प्रवाह है जो तारतम्यता है वह इस रचना को पठने को प्रेरित करती है।
'शिलाओं पर लिखे शब्द' बोधि प्रकाशन जयपुर के एक विशेष आयोजन 'बोधि पुस्तक पर्व' के पांचवें बंध के अंतर्गत प्रकाशित है। जो सन् 2020 में प्रकाशित हुआ और मैंने इस पांच साल बाद 2025 में पढा । यहीं से पता चला की सुरेन्द्र मनन जी एक अच्छे कहानीकार के साथ डाक्यूमेंट्री फिल्मकार भी हैं और प्रस्तुत रचना उनके इस संदर्भ में की गयी यात्राओं के अनुभवों का संकलन है।
Monday, 3 March 2025
636. गोल आँखें- दत्त भारती
एक प्रेम कहानी
गोल आँखें- दत्त भारती
रेस्टोरों की भीड़ घंटती जा रही थी। सिनेमा का शो शुरू होने वाला था-इसलिए लोग धीरे-धीरे रेस्टोरां खाली कर रहे थे। कोने की एक मेज पर एक पुरुष और एक लड़की बैठे बातचीत में मग्न थे ।'ज्योति !' पुरुष की भारी आबाज उभरी- 'तुम चाहो तो अपने फैसले पर एक बार फिर विचार कर सकती हो ।'
'यादो ! मैं खूब समझती हूँ। मैं तुम्हारी भावनाओं का सम्मान करती हूँ।'
'फिर वही शब्द... सम्मान।' यादो ने जोर का ठहाका लगाया, 'यदि तुम इश्क शब्द का प्रयोग नहीं करतीं तो प्रेम या प्यार कह सकती हो ।'
'मैं जानती हूँ- मैं जानती हूँ- मैं तुम्हें बहुत पसन्द करती हूँ।' ज्योति ने कहा ।
'फिर वही धोखा-पसन्द - पसन्द- आदर- क्या मैं शो-केस में पड़ा हुआ सूट का कपड़ा हूं जो तुम्हें पसन्द आ गया है ?' यादो ने गुर्रा कर कहा ।
'क्या तुम्हें ये शब्द भी पसन्द नहीं ?'
'नहीं ।'
'ओह!' ज्योति ने गहरा साँस खींचा ।
यह अंश दत्त भारती जी द्वारा लिखित उपन्यास 'गोल आँखें' के प्रथम पृष्ठ से हैं । दत्त भारती जी का मेरे द्वारा पढा जाने वाला यह द्वितीय उपन्यास है।
Thursday, 27 February 2025
635. भयंकर जाल- ओमप्रकाश शर्मा
भयंकर जाल - ओमप्रकाश शर्मा
केन्द्रीय खुफिया विभाग के कार्यालय में आज भीषण एवं भयपूर्ण खामोशी छाई हुई थी।
चीफ आफ स्टाफ श्री नायडू आज कार्यालय में आये हुये थे।
पूरे खुफिया विभाग के कर्मचारियों में श्री नायडू एक सख्त और हृदयहीन अफसर के रूप में विख्यात हैं। नये और पुराने... सभी कर्मचारी इस श्यामवर्ण बूढ़े, पतले-दुबले आदमी के कारण आज भयभीत-से अपने काम में लगे हुए थे।
- 'मिस्टर राजेश, साहब ने आपको बुलाया है।' चपरासी ने आकर कहा।
राजेश चैंक पड़ा... इर्द-गिर्द बैठे कर्मचारी अज्ञात भय से व्हिवल हो सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से राजेश को निहारने लगे।
नवयुवक राजेश की नियुक्ति अभी डेढ़ महीने पूर्व ही केन्द्रीय खुफिया विभाग में हुई थी। पढ़ाई समाप्त करके तीन साल उसने इस काम की ट्रेनिंग ली थी, ये सही है कि ट्रेनिंग के बाद की परीक्षा में उसने प्रथम श्रेणी प्राप्त की थी, किन्तु केन्द्रीय खुफिया विभाग में उसे स्थान मिल जायेगा इसकी तो कल्पना भी उसने न की थी।
Wednesday, 26 February 2025
634. बेगम का खजाना- ओमप्रकाश शर्मा- जनप्रिय
आओ जाने खजाने के रहस्य को...
बेगम का खजाना- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा
सदियों पुराना खजाना जब सामने आता है तो उसे हथियाने के लिए लोग किस कदर एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं और कैसे प्रसिद्ध जासूस 'बेगम के खजाने' का रहस्य खोजते हैं और अपराधी को बेनकाब करते है यह पठनीय और रोचक है।
आज प्रस्तुत है एक रोचक उपन्यास की समीक्षा । इस समीक्षा का आरम्भ हम उपन्यास के प्रथम पृष्ठ के दृश्य से करते हैं।
केन्द्रीय खुफिया विभाग के चीफ आफ स्टाफ मिस्टर चक्रवर्ती तेजी से सीनियर जासूस राजेश के कमरे में दाखिल हुए।
- 'राजेश?'
-'हूँ।'
इस समय राजेश लाखों गुना बड़ा दिखाने वाले यंत्र से एक खून में काम आई पिस्तौल का निरीक्षण कर रहे थे। आमतौर से मिस्टर चक्रवर्ती इस प्रकार से किसी व्यक्ति के पास नहीं आया करते हैं... फलस्वरूप अपने काम में लगे राजेश यही समझे कि कोई विभाग का साधारण कर्मचारी होगा। केवल 'हूँ' कह कर वह आँख यंत्र से लगाए रहे।
- 'भई राजेश, मुझे तुमसे कुछ बातें करनी हैं?'
अबकी बार राजेश ने दृष्टि उठा कर चीफ आफ स्टाफ को देखा।
Thursday, 20 February 2025
633. सुनहरे बाल नीली आँखें- ओमप्रकाश शर्मा
कहानी एक गायब हुये बच्चे की
सुनहरे बाल नीली आँखें- ओमप्रकाश शर्मा
इनका प्रसिद्ध पात्र राजेश अपने मानवीय मूल्यों के कारण ही अन्य जासूसी कथा पात्रिं से एक अलग पहचान स्थापित कर पाया है । प्रस्तुत उपन्यास उन्हीं राजेश महोदय का है ।
यह कहानी एक एक ऐसी युवती की जो अत्यंत सुंदर थी । जिसके बाल सुनहरे और आँखें नीली थी । जिसे देखकर हर कोई उस पर मोहित हो जाता था और यही खूबसूरती उसके जीवन के लिए अभिशाप सिद्ध हुयी और उस पर आरोप था एक बच्चे को चुराने का।
Tuesday, 18 February 2025
632. मुरझाये फूल फिर खिले- ओमप्रकाश शर्मा
अंधविश्वास से टकराते एक युवक की कहानी
मुरझाये फूल फिर खिले- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा
नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला- 2025 और यहाँ से खरीदी गयी किताबों में से दो किताबें जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी की हैं। एक 'पी कहां' और दूसरी 'मुरझाये फूल फिर खिले' । दोनों ही सामाजिक उपन्यास हैं, भावना प्रधान ।'पी कहां' पढने के बाद 'मुरझाये फूल फिर खिले' पढना आरम्भ किया । यह उपन्यास अपने नाम को सार्थक करता हुआ एक भाव प्रधान उपन्यास है, जिसे पढते-पढते आँखें नम हो ही जाती हैं । समाज फैले अंधविश्वास को बहुत अच्छे से रेखांकित किया गया और उसका सामना भी जिस ढंग से किया गया है वह प्रशंसनीय है।
Monday, 17 February 2025
631. पी कहां- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय
एक प्रेम कथा
पी कहां- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा
पुस्तक प्रेमियों के महाकुंभ 'नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला- 2025' में दो दिवस का भ्रमण हम चार साथियों ने किया और काफी संख्या में पुस्तकें भी लेकर आये । जहाँ मेरा यह तृतीय पुस्तक मेला था वहीं अन्य तीन साथी पहली बार ही आये थे, हालांकि इनमे से एक पुस्तक प्रेमी भी न था ।
गुरप्रीत सिंह, अंकित , सुनील भादू, राजेन्द्र कुमार, ओम सिहाग

पुस्तक समीक्षा से पहले थोड़ी सी बात पुस्तक मेले की । मैं गुरप्रीत सिंह अपने साथी ओम सिहाग (अध्यापक) अंकित (बैंककर्मी) और राजेन्द्र सहारण के साथ दो दिवस तक मेले में रहा । ओम सिहाग को साहित्य पढने में काफी रूचि है, वहीं अंकित को अंग्रेजी प्रेरणादायी पुस्तकें अच्छी लगती हैं और राजेन्द्र को बस साथ घूमना था, और घूमा भी । जहाँ राजेन्द्र और ओम मेरे ही गांव से हैं वहीं अंकित हरियाणा (ऐलनाबाद ) से है। हम चार साथियों के अतिरिक्त मेले में सुनील भादू (हरियाणा) और संदीप जुयाल (दिल्ली) का भी अच्छा साथ रहा ।
राजस्थान से एक बुर्जग पाठक हैं, उनकी इच्छा पर जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा जी के दो उपन्यास 'पी कहां' और ' मुरझाये फूल फिर खिले' तथा एक उपन्यास कमलेश्वर का 'काली आंधी' लिया था। हालांकि बुजुर्ग महोदय दत्त भारती के अच्छे प्रशंसक हैं लेकिन दत्त भारती जी के इच्छित उपन्यास मेले में नहीं मिले ।
कौन जाने पावस ऋतु में 'पी कहां' पुकारने वाले पपीहे की व्यथा क्या होती है।
कौन जाने... और कैसे जाने !
सागर वह जो अपनी गहराई सदा छुपाये रखे। दीपक वह जो जले... तिल तिल जलने पर भी जिसके उर अन्तर में अंधेरा रहे।
अपना अपना भाग्य ही तो है।
पपीहा वह जो पावस में, तब जबकि सूर्य के प्रकाश को दल बादल उमड़-घुमड़ कर अंधकार में बदल दे... पुकारे... 'पी कहां'।
Thursday, 30 January 2025
630. दस बाल पुस्तकें
बाल साहित्य की दस किताबों पर समीक्षा
इनमें से कुछ रचनाएं जो मुझे अच्छी लगी उनके विषय में हम यहां चर्चा करेंगे । इस माह मैंने बाल साहित्य पर ध्यान केन्द्रित किया है । और इस पोस्ट में मैंने बाल साहित्य की दस लघु रचनाओं को एक साथ समाहित किया है।
पंजाब के इतिहास में महाराजा रणजीत का नाम बहुत ही मान- सम्मान से लिया जाता है। कहां जाता है उनका शासन एक आदर्श शासन रहा है और महाराजा रणजीत सिंह एक जनप्रिय शासक रहे हैं।
प्रस्तुत रचना में एक नानी अपने बच्चों को बहुत ही रोचक ढंग से महाराजा रणजीत की कहानी सुनाती है।
इस लघु रचना की बड़ी विशेषता है इसका प्रस्तुतीकरण, कहानी कहने की कला । रचनाकार ने पुस्तक को कहीं भी ज्यादा तथ्यात्मक, आंकड़े युक्त बनाने का प्रयास नहीं किया है। इसे एक कहानी के रूप में दर्शाया गया है और वह भी छोटे बच्चों के स्तर अनुसार ।
ऐसे प्रयास बच्चों में महापुरुषों के विषय में जानकारी प्रदान करने में सफल भी होते हैं। और कुछ वाक्य बच्चों में प्रेरणा प्रदान करने वाले भी नजर आते हैं।
पुस्तक- महाराजा रणजीत सिंह
पृष्ठ- 32
अनुवाद- रमेश बक्षी
चित्रांकन- नीता गंगोपाध्याय
मूल्य- 35₹
प्रस्तुत संस्करण- 2022
2. धरती से सागर तक- विनीता सिंघल
बाल साहित्य के अंतर्गत पढें एक रोचक और ज्ञानवर्धक पुस्तक ।
इतवार का दिन था और हर इतवार की तरह आज भी अंशु अपने दादा जी के साथ समुद्र के किनारे सैर करने आया था। उसे दूर-दूर तक फैला नीला सागर और उसमें उठती ऊंची लहरें आकर्षित करती थीं। समुद्र की लहरें जब किनारे को छूकर वापस लौटतीं तो पीछे छोड़ जाती थीं ढेर सारे शंख और सीपियां, जिन्हें इकट्ठा करना अंशु को बहुत अच्छा लगता था। उसने शंख और सीपियों का ढेर-सा खजाना इकट्ठा कर लिया था ।
नमस्ते पाठक मित्रो,
आज प्रस्तुत है बाल साहित्य के अंतर्गत NBT द्वारा प्रकाशित एक छोटी सी पुस्तिका । यह छोटी सी रचना छोटे बच्चों पर आधारित है और छोटे बच्चों के लिए ही है ।
इसमें हम जानेंगे धरती से लेकर सागर तक और सागर से लेकर धरती की अथाह गहराइयों तक ।
कहानी है अंशु नामक एक छोटे बच्चे की जो अपने दादा के साथ समुद्र किनारे शंख और सिपियां एकत्र कर रहा है । अंशु एक जिज्ञासु बालक है औ उसके दादा उसकी हर बात को ध्यान से सुनते हैं और उसके प्रश्नों का ज्ञानवर्धक उत्तर भी देते हैं।
"अच्छा मान लीजिए दादा जी, अगर सब जगह समुद्र ही समुद्र होते तो...?"
"तो न हम होते, न तुम होते...।"
"वह क्यों ?"
"जीवन के लिए पांच तत्व जरूरी होते हैं वायु, अग्नि, जल, प्रकाश और पृथ्वी । अगर इनमें से एक भी तत्व का अभाव हो तो जीवन संभव नहीं।"
अंशु अपने मम्मी- पापा और बहन गीतू के साथ अण्डमान निकोबार घूमने जाता है जहां उनकी मुलाकात डाक्टर मित्रा से होती है जो बच्चों को वहां के भूगोल की अच्छी जानकारी देते हैं।
दोनों बच्चे जिज्ञासु हैं और डाक्टर मित्रा उनके प्रश्नों के उत्तर देते हैं। यहां ज्वालामुखी, पृथ्वी निर्माण आदि पर रोचक जानकारी मिलती है।
वहीं नाव की यात्रा के मध्य भी समुद्र, जलीय जीव आदि पर दोनों प्रश्नों के माध्यम से उत्तर प्राप्त करते हैं।
दोनों बच्चों का जिज्ञासु मन न सिर्फ पाठक को उत्तर देता है बल्कि उत्तर के साथ रोचक भी प्रदान करता है।
यह रचना जहाँ छोटे बच्चों के लिए ज्ञानवर्धक है वहीं वयस्कों को भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
अगर आप अपने बच्चों को अच्छा साहित्य देना चाहते हैं, उनके ज्ञानवर्धक में सार्थक वृद्धि करना चाहते हैं तो यह रचना अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती है।
पुस्तक में रंगीन चित्र, उच्च गुणवता के पृष्ठ इसको और अच्छा बनाते हैं।
किताब- धरती से सागर तक
पृष्ठ- 36+2
मूल्य- 70₹
चित्राकंन- बिनय सिन्हा
629. जादुई जंगल - मिथिलेश गुप्ता
कहां से आये अश्वमानव
जादुई जंगल- मिथिलेश गुप्ता
ये कहानी कई बरस पुरानी है।
जब शायद तुम्हारे परदादा के परदादा, तुम्हारी उम्र के रहे होंगे।
ये कहानी है उस जंगल की जो न सिर्फ जादुई था बल्कि कुछ अजीबोगरीब रहस्यों से भरा हुआ था।
कहते हैं उस जंगल की कहानी किसी परियों की कहानी से कम नहीं थी।
ये कहानी उन अश्वमानवों की हैं जिनपर कभी इस जंगल का भविष्य निर्भर था।
ये कहानी उन जादुई मेंढकों की भी है जिन की हुकूमत उस जंगल के कोने-कोने तक फैली हुई थी।
कहते हैं ये कहानी आज भी सिर्फ एक कहानी की तरह ही सुनाई जाती है, कुछ लोग इसे सत्य मानते हैं तो कुछ लोग एक कोरी कल्पना।
सच क्या है, ये मैं नहीं जानती, पर कहते हैं आज भी वो जादुई जंगल उसी स्थान पर बसा हुआ है जहाँ वो सालों से था।
कुछ चमत्कारी शक्तियाँ उस जंगल को इंसानी नज़रों से बचाये हुए हैं।
आइए, चलते है जादुई जंगल के इस सफर पर...
अश्वमानवों की वापसी - मिथिलेश गुप्ता
नमस्ते पाठक मित्रो,
Wednesday, 29 January 2025
628. जगिया की वापसी - अन्नाराम 'सुदामा'
बाल शोषण की मार्मिक कहानी
जगिया की वापसी- अन्ना राम सुदामा
बाल मजदूरी पर एक छोटे से बच्चे की एक मार्मिक कहानी है 'जगिया की वापसी' । कहानी पढते वक्त आप स्वयं को जगिया के दर्द के साथ जोड़ लेंगे। एक बच्चा किन कठिन परिस्थितियों में अपने परिवार के लिए काम करता है और कैसे लोग उसकी मासूमियत और परिश्रम का लाभ उठाते है ।'जगिया की वापसी'राजस्थान के एक क्षेत्र की है। जगिया एक गरीब परिवार का बालक है। बाप शराबी है, बड़ा भाई बकरियाँ चराता है और मां किसी तरह घर को चलाती है। बीमार माँ के लिए दो वक्त की रोटी की व्यवस्था करना बहुत मुश्किल कार्य है लेकिन फिर भी वह घर परिवार को संभालती है । जब ज्यादा काम होता है तो वह जगिया को भी काम पर साथ लगा लेती है और जगिया का स्कूल जाना बंद हो जाता है। और कभी कभी जगिया महीना भर स्कूल नहीं जा पाता ।












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