Tuesday, 29 May 2018

116. करमजली- धरम राकेश

एक मासूस युवक की खतरनाक कहानी।
करमजली- धरम राकेश, सामाजिक उपन्यास, पठनीय।
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     धरम-राकेश अपने समय की चर्चित उपन्यासकारों की जोङी थी। जिन्होंने अपने समय में काफी सामाजिक-थ्रिलर उपन्यास साहित्य को प्रदान किये। यह भी एक कौशल था की दो व्यक्ति मिलकर एक उपन्यास लिखें।
    धरमा-राकेश जी का बहुत समय पूर्व उपन्यास पढा था 'नये जमाने की बहू' जो की एक बैंक डकैती पर आधारित था।
    ‌‌‌    प्रस्तुत उपन्यास 'करमजली' मुझे आबू रोङ (सिरोही, राजस्थान) के लेखक मित्र अमित श्रीवास्तव जी से मिला।
    जब मेरा धरम-राकेश जी की चर्चित जोङी के एक लेखक धरम (धरम बारिया) जी से परिचय हुआ तो मेरी इच्छा हुयी की धरम-राकेश जी के उपन्यास पढने की। तब यह एक उपन्यास सामने आया।

  प्रस्तुत उपन्यास की कहानी-
* एक परिवार पर घिर आये दुख के काले बादलों‌ की करूण कहानी।
* मासूम‌ युवतियों पर जालिमों के अत्याचार की कसक भरी कथा।
* दो भयानक गैंगस्टर्स की खूनी साजिश टकराहट की अद्भुत गाथा।

                मनमोहन कुमार शर्मा एक सीधे-सादे इंसान हैं।‌ ईमानदार और मेहनती मनमोहन शर्मा की का परिवार थोङा बङा है। जिसमें उनके बीवी बच्चों के अतिरिक्त भाई विजय शर्मा और दो जवान बहनें कविता और रेखा भी है।
      अच्छा और खुश परिवार है लेकिन सदा स्थिति कुछ समय बाद बदल जाती है और जब स्थिति बदलती है तो एक के बाद परेशानियां मनमोहन शर्मा के परिवार को घेर लेती हैं।
             विजय शर्मा एक कत्ल के इल्जाम‌ में जेल चले जाते हैं और एक बहन घर से गायब हो जाती है।
    इसी शहर में दो खतरनाक गैंगस्टर हैं। एक है के.के. और दूसरा है मास्टर । जिनकी आपसी गैगंवार से पुलिस भी परेशान है।
              परिस्थितियाँ एक बार फिर बदलती हैं और इन दोनों गैंगस्टर के बीच में फंस जाता है विजय शर्मा।
          और फिर बहुत तेजी से घटनाक्रम बदलते हैं जिसे पाठक बहुत दिलचस्पी से पढता चला जाता है।

- विजय शर्मा ने किसका व क्यों कत्ल किया?
- क्या वास्तव में विजय शर्मा ने कत्ल किया या उसे किसी‌ ने फंसा दिया।
- मनमोहन शर्मा के परिवार का क्या हुआ?
- मनमोहन शर्मा की बहनों पर क्या बीती?
- कौन थी करमजली?
- दो गैंगस्टर कौन थे?
- दोनों गैंगस्टर के बीच में विजय शर्मा कैसे फंस गया?
      ऐसे अनेक प्रश्न है जिनका स्पष्ट उत्तर तो धरम-राकेश जी के उपन्यास 'करमजली' को ही पढकर मिलता है।

के विशेष कथन-
"....पहले जमाने में लोग दिल से दिल, मन से मन मिलाने के लिए गले मिला करते थे, लेकिन‌‌ अब जमाना बदल चुका है। आज पिच्यानवें प्रतिशत दोस्त गले मिलते समय पीठ में वह स्थान ढूंढा करते हैं, जहाँ आसानी से चाकू घोंपा जा सके।"- (पृष्ठ-114)

गलतियाँ-
उपन्यास में एक दो जगह शाब्दिक गलतियाँ हैं।
जैसे। राजीव और अरूण नाम‌ में है।

- और फिर मनमोहन कुमार शर्मा ने रामप्रकाश शर्मा के लङके राजीव से रेखा की शादी तय कर दी। (पृष्ठ-78)

- "तुम...तुम यहाँ रहते हो, अरूण?"- जैसे ही रेखा के पति अरूण ने दस्तक की आवाज सुनकर दरवाज़ा खोला।(पृष्ठ-131)
          अब यहाँ पता नहीं कब, कैसे राजीव का नाम अरूण हो गया।
      

उपन्यास के पात्र-
हालांकि प्रथमदृष्टि उपन्यास के पात्र बहुत ज्यादा नजर आते हैं लेकिन इतने पात्र उपन्यास में निरंतर नजर नहीं आते।
पुलिस विभाग से संबंधित पात्र हैं उनका या तो एक दो बार कहीं‌ नाम आया है या मात्र एक से आधे पृष्ठ तक उनकी भूमिका है।

मनमोहन कुमार शर्मा-    उपन्यास का मुख्य पात्र।
रुक्मणी-         मनमोहन शर्मा की पत्नी
विजय शर्मा-    मनमोहन शर्मा का भाई।
बबलू और नीलू- मनमोहन शर्मा के बच्चे।
रेखा-           मनमोहन शर्मा की बहन। काॅलेज स्टूडेंड।
कविता-        मनमोहन शर्मा की बहन। हाई स्कूल विद्यार्थी।
अशोक-      विजय शर्मा का मित्र।
सुभाष-      कविता का प्रेमी।
संध्या-        विजय की प्रेयसी।
प्रताप कुमार/ PK-       एक बदमाश।
गोगा,  राॅकी, शाकाल-  गुण्डे
नकाबपोश-               शाकाल का बाॅस।
निकल्सन-                 एक बदमाश।
शर्मा, सेवक राम, धूलिया  - पुलिस इंस्पेक्टर।
राणा, खन्ना, जोशी, हजूर सिंह, रोहिल्ला -  एस. आई./ पुलिस विभाग।
आशा- राणा आआभाखङी सिंह, पूरण सिंह,- काॅंस्टेबल
राम प्रसाद कुकरेजा- जेलर
चतुर्वेदी- पुलिस कमिश्नर  
अवस्थी-          डाॅक्टर
श्यामनाथ तिवारी- ब्लू स्टार होटल‌ का मैनेजर।
गिरधारी लाल/ तीर्थ राम - मनमोहन शर्मा का सेठ।
अनूप दत्ता-         वकील।
मिस्टर गुप्ता-       मनमोहन शर्मा के मित्र।
रमा-                  मिस्टर गुप्ता की पत्नी ।
रामप्रकाश शर्मा-  मिस्टर गुप्ता के मित्र।
राजीव-              रामप्रकाश शर्मा का पुत्र। रेखा का पति।
कांता-               राजीव की‌ माँ।

निष्कर्ष-
          उपन्यास रोचक और सरल भाषा -शैली में लिखा गया है। उपन्यास सामाजिक है जो की भावना प्रधान है। जिसे पढकर पाठक की आँखें सहज ही नम हो जाती है।
    उपन्यास पठनीय है।
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उपन्यास- करमजली
लेखक द्वय- धरम-राकेश
प्रकाशन- 1986 (प्रथम संस्करण)
प्रकाशक- अभिनव पॉकेट बुक्स, जी. टी. रोङ, शाहदरा-दिल्ली।

115. देजा वू- कंवल शर्मा

जब तीन अजनबी एक तूफानी रात में‌ मिले...
देजा वू- कंवल शर्मा, थ्रिलर उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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कंवल शर्मा वर्तमान उपन्यास जगत के वह सितारे हैंं जिन्होंने अल्प समय में अपनी एक अलग पहचान स्थापित कर ली। अपने पहले उपन्यास 'वन शाॅट' से चर्चा में आये कंवल शर्मा लगातार चर्चा बने रहे।
उनका प्रस्तुत उपन्यास 'देवा वू' भी अपनी एक अलग प्रकार की कहानी के लिए काफी चर्चित रहा। इसके चर्चित होने के भी दो कारण है एक तो उपन्यास का कथानक कुछ अलग होना दूसरा कहानी का अधिकांश पाठकों की समझ से बाहर होना। हालांकि लेखक का यह एक नया प्रयोग था लेकिन लेखक इसे फिल्म के स्तर पर ले गये। जहाँ फिल्म का प्रत्येक दृश्य दर्शक के समक्ष होता है वहीं उपन्यास में लेखक की जिम्मेदारी होती है की वह कुछ बातें पाठक के सामने स्पष्ट करें।

Saturday, 19 May 2018

114. मेरी मदहोशी के दुश्मन- आबिद रिजवी

मस्ती से भरा एक का रोमांटिक उपन्यास।
मेरी मदहोशी के दुश्मन- आबिद रिजवी, रोमांटिक-थ्रिलर उपन्यास।
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  जासूसी उपन्यास जगत का जब से सुनहरी दौर बिता उसी के साथ बहुत से लेखक गुमनामी के अंधेरे में‌ खो गये।
इन्हीं लेखकों में से एक लेखक है आबिद रिजवी साहब जिन्होंने वक्त के साथ स्वयं को बदला और लेखन क्षेत्र में सतत सक्रिय रहे।
लेकिन उपन्यास के क्षेत्र में इन्होंने लगभग बीस साल बाद पुन: पदार्पण किया। इनके इस आगमन का आगाज होता है रवि पाकेट बुक्स से प्रकाशित इनके उपन्यास 'मेरी‌ मदहोशी के दुश्मन' उपन्यास से।
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    नीलू कक्षा दस की एक विद्यार्थी है। कुछ असामाजिक तत्व नीलू का अपहरण करना चाहते हैं। तब जासूस कामिनी बट उनसे जा टकराती है और दुश्मनों को मात देती है।
   हालांकि उपन्यास की कहानी मात्र इतनी है पर लेखक ने अपनी‌ कल्पना शक्ति से इसमें विविध रंग भरे हैं। ये रंग एक्शन और रोमांस के हैं। 
         उपन्यास रोचक और हल्का-हल्का प्रेम रस लिए हुये है। इस प्रेम रस में वह ताजगी है जो पाठक को आनंदित करती है और इस आनंद सागर में बहता हुआ पाठक उपन्यास के पृष्ठ दर पृष्ठ पढता चला जाता है। 
        वर्तमान में जहां अधिकांश उपन्यास मर्डर मिस्ट्री और दिमागी उलझन वाले हैं वहीं आबिद रिजवी साहब का यह उपन्यास सावन की हल्की सी बरसात की उस फुहार की तरह हैं जो तन के साथ मन को भी भीगों देती हैं।
            




भाषा शैली
इस उपन्यास की सबसे बङी विशेषता है इसकी भाषा शैली। आबिद रिजवी साहब एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं, साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न विषयों पर लिख चुके हैं। अत: स्वाभाविक ही है कि इनकी भाषा शैली बहुआयामी होगी।
एक एक्शन उपन्यास में इन्होंने कोमलकांत शब्दावली का प्रयोग किया है। ऐसी शब्दावली जो पाठक को सहज की आकर्षित कर लेती है।
उस दिन मौसम बहुत रोमांटिक था। सुरम ई बादलों‌के नन्हें -मुन्ने टुकङे, धुनी हुयी रूई की तरह आसमान पर बिखरे हुए थे।
ठण्डी हवा थी, लेकिन चुपके-चुपके धीमे-धीमे इस तरह चल रही थी, जैसे महबूब के बेडरूम में‌ पहुँचकर अचानक चौंका देना चाहती हो। (पृष्ठ- 07)

उपन्यास में लेखक महोदय ने कहानी पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया इसलिए कहानी अपने मूल‌ विषय से भटक जाती है।
उपन्यास में मुख्य खलनायक का किरदार हावी रहता है लेकिन खलनायक संपूर्ण उपन्यास में‌ एक बार दृष्टिगोचर होता है और वह भी पीठ किये हुए।
 उपन्यास

निष्कर्ष- 
            
     उपन्यास के विषय में उपन्यास के अंतिम‌ कवर पृष्ठ पर लिखी हुयी इबारत प्रकाश डालती है।
शहद की चाशनी की‌मधुरिमा में डूबा एक ऐसा थ्रिलर उपन्यास, जिसमें हुस्न की चाहत के साथ देश प्रेम की भावना से लबरेज एहसासात भी हैं।
        अगर पाठक वर्तमान एक्शन, मर्डर मिस्ट्री से अलग हटकर कुछ रोमांटिक पढना पसंद करते हैं तो यह उपन्यास आपका मनोरंजन करेगा। हालांकि कहानी के स्तर पर उपन्यास काफी पीछे रह गया।
  फिर भी रोमांस और एक्शन पसंद पाठकों को उपन्यास पसंद आयेगा।
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उपन्यास- मेरी मदहोशी के दुश्मन
लेखक- आबिद रिजवी
पृष्ठ- 269
मूल्य- 80₹
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
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अन्य लिंक
1. आबिद रिजवी जी का परिचय
2. आबिद रिजवी जी से साक्षात्कार

Monday, 14 May 2018

113. कौओं‌ का हमला- अजय सिंह

जब कौवों ने किया हमला...
कौओं का हमला- अजय सिंह, बाल उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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'आहट, क्राइम‌ पट्रोल, CID, अगले जन्म मोहे बिटिया ही किजो' जैसे चर्चित धारावाहिक लेखन से अपने पहचान स्थापित कर चुके लेखक अजय सिंह का एक बाल उपन्यास भी इन दिनों खूब चर्चा में हैं।
जहाँ एक तरफ टीवी सीरियल लेखन गंभीर किस्म‌ का है तो वहीं बाल उपन्यास उतना ही सरल और सहज है। लेखन में‌ कहीं भी अतिरिक्त बौद्धिकता नहीं झलकती । एक अच्छे लेखक की यही पहचान होती है की वह कहानी के साथ-साथ सरल भाषा शैली का प्रयोग करे। 'कौओं का हमला' तो है ही बाल उपन्यास तो इसकी भाषा शैली भी बच्चों के अनुकूल है।
लेखक ने विषय बहुत ही रोचक चुना है जो सहज ही पुस्तक पढने को प्रेरित करता है। पाठक के अंदर एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है की आखिर कौओं‌ ने‌ किस पर और क्यों हमला किया।
उपन्यास की कहानी बहुत रोचक और धारा प्रवाह है। पाठक के हृदय में‌ निरंतर उत्कण्ठा बनी रहती है की आगे क्या होगा।

Sunday, 13 May 2018

112. रिवेंज- एम. इकराम फरीदी

रहस्य से भरी एक बदले की कथा।
रिवेंज- एम. इकराम फरीदी, सस्पेंश-थ्रिलर, रोचक, पठनीय।
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उत्तर प्रदेश के युवा लेखक एम. इकराम ‌फरीदी ने जो कम समय में पाठकवर्ग में जो अपनी पहचान स्थापित की है वह वास्तव में प्रशंसनीय है।‌ इनकी पहचान स्थापित होने की एक वजह तो यह है की लेखक लंबे समय से गुमनामी में संघर्ष करता रहा और जब पाठकवर्ग के सामने आया तो एक से बढकर एक रचनाएँ दी और सभी रचनाएँ समाज को संदेश देने के साथ-साथ विषय वस्तु में नवीनता लिए हुए हैं।
                    द ओल्ड फोर्ट, ट्रेजङी गर्ल, गुलाबी अपराध, ए टेरेरिस्ट और अब प्रस्तुत उपन्यास रिवेंज सभी की कहानी एक दूसरे से पूर्णतः अलग है। इसी विशेषता के चलते फरीदी साहब के पाठकों में‌ वृद्धि हुयी।


प्रस्तुत उपन्यास की कहानी बहुत रोचक है, हालांकि इनका पूर्व उपन्यास 'गुलाबी अपराध' भी मर्डर मिस्ट्री था लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि बहुत अलग है।

"सर.....।"- सुधीर ने भूमिका तैयार की और चेतना का मोबाइल दिखाता हुआ बोला-" यह मेरी बेटी का फोन है, अभी थोङी देर पहले इस पर धमकी मिली है कि मेरे पूरे परिवार को मार दिया जाएगा- मेरे बेटे मोनू को इस वीक के लास्ट तक‌ मर्डर कर दिया जायेगा।"
................
इंस्पेक्टर ने नंबर देखा। काॅल हिस्ट्री देखी।
................
"कौन है यह?"
"बकौल इसके मेरा भतीजा अंशु है, जो चार महीने पहले एक सङक दुर्घटना में मर चुका है।"
"मतलब?"- इंस्पेक्टर तो चौंक उठा- " जो मर चुका है, वह कैसे फोन कर सकता है?"
"कल रात ग्यारह बजे वह मेरे बेटे सोनू से मिलने भी उसके कमरे में आया था।"
"कौन आया था?"
"मेरा भतीजा अंशु।"
"जो मर चुका है?"
"जी हां, सर।"
"तुम पागल तो नहीं हो- तुम लोग कहीं पागलखाने से तो नहीं छूटे हो?"
"सच्चाई वही है सर जो मैं बता रहा हूँ ।"-सुधीर रो‌ देने वाले स्वर में बोला।
(पृष्ठ-31-32)
.....और अनंतः इंस्पेक्टर भी इस बात को मानने को मजबूर हो जाता है।
"अजीब बात है।"- इंस्पेक्टर बेंत को ठकठकाते हुए इधर-उधर चहलकदमी करता हुआ बोला- " जो धमका रहा है कत्ल करने को, वह मर चुका है- वैरी इंस्ट्रेस्टिंग -लेकिन अब उसको ढूंढा कहां जाये- क्या श्मशान घाट में?" (पृष्ठ-39)
कत्ल हुआ बाकायदा धमकी देकर हुआ लेकिन कोई कातिल साबित न हुआ, कोई सबूत न‌ मिला और सबसे सामने कत्ल हुआ।
और दूसरी तरफ एक मैना थी। जिसने चैलेंज किया था।
मैना चलकर थोङा करीब आई। मात्र थोङा सा गैप देकर खङी हुयी और आँखों में आँखें डालकर फुसफुसाई -"फ्राइङे को मोनू का कत्ल हो जाएगा- रोक सको तो रोक लेना।"(पृष्ठ-47)

Saturday, 12 May 2018

111. सौ करोङ डाॅलर के हीरे- विश्व मोहन विराग

सौ करोङ डाॅलर के हीरों के लिए हुयी जंग
सौ करोङ डाॅलर के हीरे- विश्व मोहन विराग, थ्रिलर उपन्यास, औसत।
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            अमेरिका के एक व्यापारी त्रिलोचन सिंह की भारत के राजा के साथ सौ करोङ डॉलर के हीरों‌ की एक डील थी। उस डील का भारत से अमेरिका लाने की जिम्मेदारी अमेरिका के एक प्राइवेट जासूस विलियम डफी पर थी।
           लेकिन उन हीरों पर नजर भारत और अमेरिका के माफिया की भी थी। सौ करोङ डॉलर के हीरों को लेकर एक ऐसा तूफान उठा जिसमे कई माफिया अपनी जान से हाथ धो बैठे।
           एक तरफ का अमेरिका का बिग बाॅस लाकोसा दि नोस्ट्रा और भारत में‌ थे महादेव और उसके साथ कैलाश कावस काकङे (ट्रिपल K) और उनका विरोधी  बाबू खान। क्या इनसे बचकर विलियम डफी हीरों को अमेरिका ले जा सका।
          उपन्यास की शुरुआत बहुत जबरदस्त तरीके से होती है। अमेरिका की धरती से और वहाँ के खतरनाक अपराधियों से लेकिन कुछ समय पश्चात ही कहानी अपनी लय से उतर जाती है। भारत में आने के पश्चात कहानी बहुत ही धीमी हो जाती है और अपने मुख्य कथानक से इतर भटकती‌ महसूस होती है।
            जासूस विलियम डफी को बहुत मजबूत बताया गया है लेकिन पूरे उपन्यास में वह कहीं‌ भी अपनी मजबूत छाप छोङता नजर नहीं आता। लेखक महोदय ने आरम्भ में विलियम की प्रशंसा की खूब की है लेकिन बाद में उसे कहीं भी स्थापित न कर पाये।
                    मार्था जो की विलियम की सहयोगी होती है, वह बहुत सी परिस्थितियों में‌ फंसती है, जिसका हल्का सा आभास विलियम डफी को अवश्य होता है लेकिन‌ सत्य का उसे पता नहीं चलता और इसी वजह से वह मात पर मात खाता है।
                  लेखक ने उपन्यास की जतनी अच्छी शुरुआत की थी उतना अच्छा कथानक आगे प्रस्तुत न कर सके।
  उपन्यास की कहानी अमेरिका, भारत से होते हुए नेपाल तक फैली हुयी है। उपन्यास का अंत जो नेपाल में दर्शाया गया है वह कुछ हद तक उपन्यास को संभाल‌ लेता है लेकिन मार्था का अंत पाठक को निराश कर सकता है।
   शुरु से अंत तक परेशानियां सहन करती मार्था अंत में इन परेशानियां से मुक्त हो जाती है।‌     जिस प्रकार का विलियम डफी का चित्रण आरम्भ में दर्शाया गया था उसके अनुसार लगता नहीं था की मार्था का अंत इतना भयानक होगा।
      निष्कर्ष-
   उपन्यास की कहानी है भारत से अमेरिका को हीरों‌ की डिलीवर की जिसमें क ई खलनायक इन हीरों‌ को लूटना चाहते हैं। इनकी रक्षा का दायित्व अमेरिकी जासूस विलियम डफी पर होता है।
       विलियम डफी अपने उद्देश्य में‌ कैसे कामयाब होता है बस यही पठनीय है।
  लेखक कुछ मेहनत से उपन्यास को‌ कसावट दे सकता था‌ लेकि‌न ऐसा कर न पाया।
         उपन्यास एक बार पढा जा सकता है लेकिन स्मरणीय नहीं होगा।

        विश्व मोहन विराग जी का एक और उपन्यास 'मरघट' मेरे पास उपस्थित है। समय मिलने पर उसे भी पढकर देखा जायेगा की लेखन ने कैसा लिखा है।
  
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उपन्यास- सौ करोङ डॉलर के हीरे
लेखक- विश्व मोहन विराग
प्रकाशक- रजत पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ-223
मूल्य-20₹

Saturday, 5 May 2018

110. बैंक राॅबरी- एन. सफी

एक चालाक अपराधी की कहानी।
बैंक राॅबरी- एन. सफी, जासूसी उपन्यास, मध्यम स्तर।

एन सफी का प्रस्तुत उपन्यास एक छोटी सी बैंक राॅबरी से आरम्भ होता है और कई घटनाओं से गुजरता हुआ अंततः अपने अंजाम तक जा पहुंचता है।
    उपन्यास हालांकि लघु कलेवर का ही है लेकिन रोचक है। तात्कालिक समय की दृष्टि से देखें तो यह उपन्यास पाठक को स्वयं में बांधने में सक्षम है।
                 कहानी में कई‌ मोङ आते हैं, जो पाठक को प्रभावित करने में कुछ हद तक सक्षम है। 
          उपन्यास की कहानी की बात करें तो यह आरम्भ होती है एक डैनी नामक व्यक्ति द्वारा एक बैंक की राॅबरी से। बैंक राॅबरी की रकम के साथ डैनी एक नये चेहरे के साथ शहर में एक नयी जिंदगी आरम्भ करता है।
        उसी शहर में एक डांसर सैफाली के साथ शराफत की नयी जिंदगी जीता है। लेकिन चोर चोरी से जाये हेराफेरी से न जाये वाली कहावत डैनी पर लागू होती है। और एक दिन डैनी को अपने कर्मों की सजा मिलती है।
              उपन्यास की कहानी छोटी सी है। कहानी आरम्भ चाहे बैंक राॅबरी से होता है लेकिन कुछ पृष्ठों के पश्चात कहानी पूर्णतः बदल जाती है। 
कहानी को तीन चरणों में विभक्त कर सकते हैं।
1. डैनी द्वारा बैंक राॅबरी
2. डैनी और शैफाली की मुलाकात
3. डैनी के कर्मों की सजा
उपन्यास का आरम्भ जहां कुछ रोचक है वहीं शैफाली और डैनी की मुलाकात वाली कहानी उपन्यास में थोङा धीमापन लाती है। उपन्यास का समापन उपन्यास में पुनः रोचकता व प्रवाह पैदा करता है

     उपन्यास में कई गलतियाँ है जो उपन्यास को बहुत ज्यादा प्रभावित करती हैं।
- वह सुबह से भूखा था। कोई चारा न देखकर उसने माँस को कच्चा ही चबाने की कोशिश की। उसने अपनी तलवार से राजेन्द्र के चेहरे का कच्चा माँस छीलने की कोशिश की। (पृष्ठ-23)
- डैनी ने राजेन्द्र के उस चेहरे की सर्जरी बना कर अपने चेहरे पर फिट कर ली। (पृष्ठ-29)
- यह कैसे संभव है की कोई आदमी किसी के चेहरे से अपने चेहरे पर सर्जरी कर लेगा। यह तो बिलकुल असंभव।
- डैनी जब शहर में राजेन्द्र सिंह बेदी का चेहरा(मास्क) लगाकर घूमता है  उसे राजेन्द्र बेदी के परिचित कहीं क्यों नहीं मिलते और स्वयं डैनी को भी डर होना चाहिए इस बात का।
- राजेन्द्र सिंह बेदी की हत्या हो जाती। लेकिन पुलिस उसकी कहीं कोई जांच नहीं करती।
- राजेन्द्र सिंह बेदी के परिवार वाले भी राजेन्द्र सिंह बेदी की कोई खोजबीन नहीं करते।

- निष्कर्ष
उपन्यास मध्यम स्तर का है। जिसकी कहानी का आरम्भ रोचक तरीके से होता है लेकिन मध्य भाग उपन्यास को कमजोर बना देता है। लेखक ने भी कई जगह अति कल्पना का सहारा लिया है जो की सही नहीं लगता। लेखक की कुछ अतिरिक्त मेहनत से उपन्यास अच्छा बन सकता था।
उपन्यास छोटा सा है एक बार मनोरंजन की दृष्टि से पढा जा सकता है।

उपन्यास के पात्र
डैनी- बैंक राॅबरी कर्ता
राजेन्द्र बेदी- शहर का व्यापारी
इंस्पेक्टर रमेश देव
इंस्पेक्टर अशोक
हवलदार चेतराम
पुलिस कर्मी- साधुराम, छज्जू राम
शैफाली- एक डांसर, डैनी की प्रेमिका
महावीर प्रसाद- उपन्यास का एक पात्र
जगन- एक चोर
कर्नल विनोद- जासूस
हमीद- कर्नल विनोद का साथी
कासिम- कर्नल विनोद-हमीद का साथी, एक हास्य पात्र।

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उपन्यास- बैंक राॅबरी
लेखक- एन. सफी
प्रकाशक- नीलिमा पाॅकेट बुक्स (2238, किनारी बाजार, दिल्ली-6)
पृष्ठ- 12
अनुवादक- वीरेन्द्र लोहचन

109. बाल एकांकी- रवीन्द्रनाथ टैगोर

चार रोचक बाल एकांकी


नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बाल साहित्य भी खूब लिखा है। इन्होंने जो भी लिखा है वास्तव में मन को छू लेने वाला साहित्य है।

मेरा शीश नवा दो अपनी, चरण धूल के तल में।

देव! डूबो दो अहंकार सब, मेरे आँसू जल में। - गीतांजलि

           टैगोर जी द्वारा लिखित बाल एंकाकी संग्रह विद्यालय के पुस्तकालय से पढने को मिला। इस संग्रह में कुल चार बाल एकांकी है। चारों एंकाकी दिलचस्प और रोचक है।

1. परीक्षा

              यह एकांकी हमारी वर्तमान शिक्षा में व्याप्त कमियों को हास्य रूप में उजागर करती है। प्रस्तुत एकांकी में शिक्षक प्रेम की बजाय छात्र को दण्ड के द्वारा सुधारना चाहता है, छात्र भी कम नहीं है वह भी एक अनोखे तरीके से शिक्षक को सबक सीखा देता है।

                यह एकांकी हमारी शिक्षा व्यवस्था पर गहरी चोट करती है।

2. ख्याति का नाटक

                         यह एकांकी बहुत ही रोचक है।  इस एकांकी में एक संस्था 'गानोन्नति विधायिनि'  के लिए सेठ कंगालीचरण एक वकील दुकौड़ी दत्त के पास चंदा लेने आता है। वकील चंदे के लिए मना कर देता है। तब कंगालीचरण प्रण लेता है। आया चंदा मांगने और मिला गरदन पर प्रहार। महाशय तुम्हें भी सबक सीखा कर रहूंगा। (पृष्ठ-14)

        और कंगालीचरण एक बहुत ही अलग तरीके से वकील को चंदा न देने पर सबक सीखाता है।

        यह एकांकी पूर्णतः हास्य रस से सरोबर है।

3. बिरछा बाबा

                         यह एकांकी एक ऐसे वृक्ष देवता की कथा है जो मनोकामना पूर्ण करता है। एक दिन पांचू और ऊधो नामक दो व्यक्ति उसी वृक्ष देवता की खोज में निकलते हैं। 

                         "चलो भाई, चलो।  बिरछा बाबा की तलाश की जाये। लेकिन उन्हें खोजेगे कहां?"

                        - तो क्या पांचू और माधो को वृक्ष देवता मिले?

                        - क्या उनकी मनोकामना पूर्ण हुयी?

                        - क्या था रहस्य वृक्ष बाबा का?

    इन प्रश्नों का उत्तर तो यह बाल एकांकी ही दे सकती है। इस एकांकी में कुछ रोचक प्रसंग भी हैं।

     

4. मुकुट

              इस संग्रह की अंतिम और सबसे लंबी एकांकी है मुकुट। यह अन्य एकांकियों से कुछ अलग है।‌ बाकी एकांकी जहाँ हास्य रस से परिपूर्ण है वहीं मुकुट एकांकी वीर रस की रचना है।

              युद्ध में विजय के पश्चात विजय मुकुट कौन धारण करे इस विषय पर तीनों राजकुमार एकमत नहीं हैं। सभी एक दूसरे को विजय का कारण मानते हैं।

              यह एकांकी एक शिक्षाप्रद रचना है।

निष्कर्ष-   इस संग्रह में शामिल चारों रचनाएँ बहुत ही रोचक और पठनीय है।

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  पुस्तक- बाल एकांकी

  लेखक- रवीन्द्रनाथ टैगोर

  प्रकाशक- यूनिक ट्रेडर्स, जयपुर

  संस्करण-1994

  पृष्ठ- 72             

Monday, 23 April 2018

108. डाकघर- रवीन्द्रनाथ टैगोर

एक बच्चे की करणामयी कथा।
डाकघर- रवीन्द्रनाथ टैगोर, लघु नटक, संवेदनशील रचना, पठनीय।
रवीन्द्रनाथ टैगोर को पढने का अर्थ है भावना के समुद्र में बह जाना, मानवीय संवेदना को छू जाना।  
प्रकाशक लिखता है- रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियाँ एवं नाटक विशेष रूप से कला, शिल्प, शब्द- सौन्दर्य, सभी दृष्टियों से अनुपम एवं महत्वपूर्ण हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियाँ एवं‌ नाटक वास्तव में जिसने नहीं पढे उसने कुछ नहीं पढा। 
            रवीन्द्रनाथ टैगौर द्वारा रचित 'डाकघर' एक लघु नाटक है। डाकघर एक नन्हें बच्चे की कहानी है। एक‌ नन्हा बच्चा 'अमल' जो किसी रोग से ग्रस्त है। वैद्य जी ने उसे कमरे से भी बाहर निकले को मना किया है। उसकी रक्षा का एकमात्र उपाय है उसे किसी तरह शरत्ऋतु की धूप और हवा से बचाकर घर में बंद रखना। (पृष्ठ-10)
          अमल घर में, कमरे में कैद है। खिड़की से वह आते-जाते लोगों को देखता है, उनसे बातें करता है।‌ कितनी विवशता है। बच्चा सबको देखता है, उसका मन भी खेलने को होता है, घूमने को होता है लेकिन वह मजबूर है। बस अपना दर्द समेटे बैठा है। कमरा ही उसकी दुनियां है। लेकिन कमरे से बाहर एक और दुनियां है अमल उसी दुनियां को जीना चाहता है।    
           बच्चों का मन बहुत कल्पनाशील होता है। अमल भी बाहर की दुनियां की बाते सुन- सुन कर अपनी एक काल्पनिक दुनियां बना लेता है।
          एक ऐसे दुनियां जिसमें शास्त्र पढे पण्डित नहीं होंगे, उसमें तो दही बेचने वाला होगा, घूमने वाले होंगे, डाकिया होगा, भिखारी होगा, पहाड़ पर जाने वाले होंगे। अमल कभी डाकिया बनना चाहता है, कभी दहीवाला, कभी भिखारी तो कभी कुछ-कभी कुछ।
            नाटक में रोचक प्रसंग और मोड़ तब आता है जब अमल के घर के सामने  राजा का डाकघर खुलता है। अमल स्वयं को उसी डाकघर से जोड़ लेता है। उसकी काल्पनिक दुनियां में डाकघर एक नया पात्र है। अमल को लगता है एक दिन उसको राजा का पत्र आयेगा और डाकिया उसे देकर जायेगा। मेरे नाम‌ की चिट्ठी आयेगी तो वे मुझे पहचान कर दे जायेँगे।(पृष्ठ-29)
            गांव में एक तथाकथित चौधरी है जो एक बीमार बच्चे के दर्द को न महसूस कर राजा को बच्चे की शिकायत कर देता है।
- क्या अमल का रोग सही हुआ?
-  क्या अमल को राजा की चिट्ठी आयी?
-  गाँव के चौधरी ने क्या किया?
नाटक का आरम्भ बहुत रोचक ढंग से होता है। माधवदत्त जी अमल के अभिभावक हैं और एक है वैद्य जी। दोनों के संवाद बहुत रोचक हैं।
माधवदत्त- बड़ी मुसीबत में पड़ गया। जब वह नहीं था, तब नहीं ही था, किसी बात की चिंता ही न थी। अब न जाने कहाँ से आकर उसने मेरा घर घेर लिया है; उसके चले जाने से मेरा घर फिर घर ही नहीं रह जाएगा। वैद्यजी, आप क्या समझते हैं उसे? (पृष्ठ-07)
      वैद्य जी प्रत्येक बात पर शास्त्रों की चर्चा करते हैं जो माधव की समझ से बाहर है।
शास्त्रों में लिखा है, 
- 'पैत्तिकान् सन्निपातजान कफवातसमुद्भवात'। (पृष्ठ-07)
- 'अपस्मारे ज्वरे काशे कामलाया हलीमके'(पृष्ठ-08)
- 'पवने तपने चैव'(पृष्ठ-08)
एक और मार्मिक संवाद देखें।
तुम्हें क्या हुआ है बाबू?
मुझे नहीं मालूम। मैं पढा लिखा नहीं हूँ न।(पृष्ठ-15)
         नाटक के सभी पात्र, चाहे उनका किरदार कम ही क्यों न हो, पर सभी प्रभावी हैं। 
         नाटक शुरू से अंत तक बहुत ही रोचक है और इसका समापन सहृदय की आँखों में आँसू ले आयेगा।
निष्कर्ष:-
          सहृदय पाठक के लिए यह लघु नाटक मन के अंदर तक उतरने की क्षमता रखता है।‌ नाटक का कलेरव चाहे छोटा हो लेकिन उसकी संवेदना बहुत गहरी है। 
               यह लघु नाटक कम पृष्ठों में बहुत कुछ कह जाता है। पठनीय रचना है, अवश्य पढें।
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किताब- डाकघर (लघु नाटक)
लेखक- रवीन्द्रनाथ टैगोर
प्रकाशक- रमन बुक सेंटर, मथुरा(UP)
पृष्ठ- 50
मूल्य- 75₹

Friday, 6 April 2018

107. काजर की कोठरी- देवकीनंदन खत्री

जब शादी के दिन गायब हो गयी पत्नी...
काजर की कोठरी- देवकीनंदन खत्री, थ्रिलर, औसत।
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संध्या होने में अभी दो घण्टे की देर है मगर सूर्य भगवान के दर्शन नहीं हो रहे, क्योंकि काली-काली घटाओं ने आसमान को चारों तरफ से घेर लिया है। जिधर निगाह दौङाइए मजेदार समा नजर आता है और इसका तो विश्वास भी नहीं होता कि संध्या होने में अभी कुछ कसर है।
                यह पंक्तियां देवकीनंदन खत्री जी के प्रसिद्ध उपन्यास 'काजर की कोठरी' की हैं।
अय्यारी, तिलस्मी जैसे उपन्यासों में महारथ हासिल खत्री का यह उपन्यास उनके अन्य उपन्यासों से थोङा सा अलग है क्योंकि इसमें तिलिस्म या अय्यारी नहीं बल्कि धोखेबाजी मुख्य है। पाठक को प्रथम पृष्ठ से ही सब कुछ पता चल जाता है की उपन्यास का अंत क्या होगा।
    
       जिमींदार कल्याण सिंह के पुत्र हरनंदन की शादी लाल सिंह की पुत्री सरला से होने वाली है। शादी के दिन सरला घर से गायब पायी जाती है। उसके कमरे में खून के छींटे मिलते हैं।
                दूसरी तरफ कल्याण सिंह के कमरे में एक पिटारा मिलता है जिसमें खून से सने वे कपङे होते हैं जो कल्याण सिंह के परिवार की तरफ से सरला को रस्म अनुसार दिये गये थे।
                     दोनों परिवार हैरान-परेशान और दुखी हैं कि आखिर सरला कहां गायब हो गयी।
आखिर हरनंदन सिंह सरला के गायब होने ले रहस्य को सुलझाने का निर्णय लेता है।
- सरला आखिर कहां गायब हुयी?
- क्या सरला जिंदा/ मुर्दा थी?
- कौन थे अपराधी?
- क्या हरनंदन सिंह अपने कार्य में सफल हुआ?
- खून से सने कपङों‌ का क्या रहस्य था?
    ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों का उत्तर तो देवकीनंदन खत्री के उपन्यास काजर की कोठरी को पढकर ही मिल सकते हैं।
      
    उपन्यास सामान्य है। पाठक को उपन्यास के आरम्भ में ही मूल कथा और खलनायक का पता चल जाता है।  शेष उपन्यास में मात्र यही रहस्य बाकी रह जाता है की हरनंदन सिंह कैसे सरला का पता लगता है।
संपादक महोदय ने उपन्यास के आरम्भ में ही इतना कुछ लिख दिया की उपन्यास बिना पढे भी काम चल सकता है। आप भी पढ लीजिएगा।
   काजर की कोठरी सन् 1900 के आसपास लिखा गया उपन्यास है जिसमें वेश्या सरीखी, दुष्चरित्र, धोखेबाज और कुटिल समझी जाने वाली स्त्री के चरित्र का औदात्य दिखाया गया है। जमींदार और वेश्या के आत्मीय, सरल और सहज संबंधों को इस उपन्यास में वाणी दी गयी है।
            यह उपन्यास मूलतः वेश्या जीवन पर लिखा गया है। जमींदार हरनंदन सिंह का विवाह सरला के साथ होने वाला है। किंतु वह विवाह पूर्व ही गायब कर दी जाती है- गायब होने के स्थान पर खून से सनी एक पोटली मिलती है। हरनंदन सिंह शादी में आयी वेश्या से संबंध स्थापित कर लेते है और गायब हुयी सरला का पता लगाते हैं। सरला का चचेरा भाई उसका विवाह हरनंदन सिंह के साथ नहीं करना चाहता- बल्कि चाचा की वसीयत के अनुसार उसका विवाह कहीं अन्यत्र करा, वह आधे धन का मालिक बनना चाहता है। हरनंदन सिंह वेश्या को अपने विश्वास में लेकर अंत में सरला का पता लगा लेते हैं और अपराधी दण्डित होते हैं।
 
    उपन्यास में विशेष तौर से वेश्या जीवन के दोहरे चरित्र का खूब वर्णन किया है।
 
उपन्यास कोई विशेष नहीं है। मात्र देवकीनंदन खत्री का उपन्यास होने के नाते या वेश्या जीवन के दोहरे चरित्र को देखने की दृष्टि से पढा जा सकता है।
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उपन्यास- काजर की कोठरी
लेखक-    देवकीनंदन खत्री (18.06.1861- 04..8.1913)
वर्ष- 1900 (लगभग)
प्रकाशक- साहित्यागार, SMS हाइवे -जयपुर
पृष्ठ- 83

Thursday, 5 April 2018

106. सूरज का सातवाँ घोङा- धर्मवीर भारती

टुकङो में विभक्त एक दर्द भरी प्रेम कहानी।
सूरज का सातवाँ घोङा- धर्मवीर भारती, साहित्यिक उपन्यास, रोचक, पठनीय, उत्तम।
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    धर्मवीर भारती द्वारा लिखा गया उपन्यास सूरज का सातवाँ घोङा एक प्रयोगात्मक उपन्यास है। कथा और शिल्प दोनों स्तरों पर इसमें अपने समय में प्रयोग किये गये थे। यह प्रयोग सफल भी रहा। क्योंकि सन् ..में प्रकाशित इस उपन्यास को आज भी पाठक उतने ही चाव से पढता है जितना इसके प्रकाशन के वक्त पढा गया था।
      निर्देशन श्याम बेनेगल द्वारा इस उपन्यास पर इसी शीर्षक से निर्मित फिल्म सफल भी रही और उसे राष्ट्रीय...पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
     
       सूरज का सातवाँ घोङा एक प्रेम कथा है। यह एक कहानी है या उपन्यास ऐसा पाठक को लग सकता है । मूलतः यह उपन्यास है लेकिन इसके प्रस्तुतीकरण का तरीका कहानी जैसा ही है। यह स्वयं में एक प्रयोग है।
     पूरा घटनाक्रम माणिक मुल्ला के कथित है।
गर्मि का समय है, दोपहर का। कुछ बच्चे माणिक मुल्ला के कमरें में हर रोज एकत्र होते हैं और माणिक मुल्तान उन्हें हर रोज एक प्रेम कहानी सुनाता है। ये कहानियाँ प्रथम दृष्टया अलग -अलग नजर आती है लेकिन अंत में जाकर एक हो जाती हैं। लेकिन किसी भी कहानी में कॊई बिखराव नहीं है। सभी एक दूसरे से आबद्ध है। इन सभी कहानियाँ को आपस में आबद्ध करने का कार्य स्वयं माणिक मुल्ला ही करता है क्योंकि वह प्रत्येक कहानी से स्वयं भी जुङा हुआ है।
         
    कहानी चाहे जमुना की हो, चाहे लिली या सती की। सभी से माणिक मुल्ला का संबंध रहा है और सभी कहानियाँ में एक टीस भी है। एक ऐसी टीस जो पाठक के हृदय को चीर जाती है। 
        
      उपन्यास में माणिक मुल्ला के माध्यम से क ई कहानियों व्यक्त हुयी हैं लेकिन कोई भी प्रेम कहानी अपने लक्ष्य तक न पहुंची। यही जीवन की विडंबना है और इसी विडंबना को विभिन्न पात्रों के माध्यम से व्यक्त किया गया है।
            जमुना को तन्ना बहुत पसंद है, वह उससे शादी की इच्छुक है। लेकिन समाज की मर्यादा इस प्रेम में बाधक है। तन्ना का बाप महेसर भी इस प्रेम को स्वीकृति नहीं दे पाता। जमुना माणिक मुल्ला के प्रति भी बहुत लगाव रखती है लेकिन इसका प्रेम कहीं भी सफलता प्राप्त नहीं कर पाता।
        एक है लिली उर्फ लीला जो माणिक मुल्ला से स्नेह रखती है। लेकिन आधुनिक विचारों की समर्थक है। लीला का विवाह तन्ना से हो जाता है। लेकिन एक बच्चे के पश्चात भी दोनों में दाम्पत्य प्रेम की कमी दिखाई देती है।
         सती जो की एक आत्मनिर्भर महिला की भूमिका में है लेकिन उसकी पारिवारिक स्थिति उसे इस स्थिति में‌ ले आती है जहाँ वह न जी सकती है न‌ मर सकती है। सती और माणिक मुल्ला में स्नेह की डोर है। लेकिन परिस्थितिया इस डोर को तोङ देती हैं।  दूसरी तरफ तन्ना का बाप महेसर सती की आर्थिक व पारिवारिक परिस्थितियों का भरपूर फायदा उठाने की सोचता है।
     
एक तरह से सभी कहानियाँ माणिक मुल्ला से संबंध रखती हैं और अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी।
इस उपन्यास में मात्र प्रेम कहानियाँ ही नहीं है, इनके साथ-साथ भारत के मध्यवर्गीय समाज का चित्रण, प्रेम की पीर, मार्क्सवाद और आधुनिक कहानी के संबंध में भी बहुत कुछ पढने को मिलता है।
  
        आजकल के लेखक जिस प्रकार कहानी के शीर्षक को अति आकर्षक बनाने में लगे रहतॆ हैं उस पर माणिक मुल्ला के माध्यम से व्यंग्य किया गया है- "...तुम लोग कहानी सुनने आये हो या शीर्षक सुनने? या मैं उन कहानी लेखकों में से हूँ जो आकर्षक विषयवस्तु के अभाव में आकर्षक शीर्षक देकर पत्रों के संपादकों और पाठकों का ध्यान खींचा करते हैं।" (पृष्ठ-43)
"टेकनीक पर ज्यादा जोर वही देता है जो कहीं न कहीं अपरिपक्व है...फिर भी टेकनीक पर ध्यान देना बहुत स्वस्थ प्रवृत्ति है बशर्ते वह अनुपात से अधिक न हो।" (पृष्ठ-84)
     
मध्यमवर्गीय समाज के संबंध में लिखा है- " हम‌ सभी निम्न मध्य श्रेणी के लोगों की जिंदगी में हवा का ताजा झोंका नहीं है...।"(पृष्ठ-42)
कुछ विशेष कथन-
- प्यार आत्मा की गहराइयों में सोये हुए सौन्दर्य के संगीत को जगा देता है। (पृष्ठ-69)
उपन्यास खण्ड और शीर्षक-
उपन्यास को सात खण्डों में विभक्त किया गया है।  प्रत्येक खण्ड का नाम‌ दोपहर दिया गया है, क्योंकि यह कहानियाँ गर्मी की दोपहर में सुनायी गयी हैं। हिंदी साहित्य में विभिन्न ग्रंथों में खण्डों के नाम अलग-अलग मिलते हैं, जैसे समय( पद्मावत में), अंक, भाग, इत्यादि।
    प्रत्येक खण्ड से पूर्व एक छोटा सा अध्याय भी अनध्याय नाम से मिलता है।
निष्कर्ष-
  धर्मवीर भारती द्वारा लिखा गया उपन्यास सूरज का सातवाँ घोङा एक प्रयोगशील उपन्यास है।
कथा स्तर पर यह उपन्यास मानव के अंतर का चित्रण करता है। यह उस मध्यमवर्गीय समाज का चित्रण करता है जो करना कुछ और चाहता है लेकिन उसकी परिस्थितियां उसे करने नहीं देती। ऐसी ही विषम परिस्थितियों में घिरे माणिक मुल्ला, जमुना, लिली, सती और तन्ना का चित्रण इस उपन्यास में मिलता है।
       कहानी रोचक और मन को छू लेने वाली है। उपन्यास का कलेवर लघु है और कहानी में तीव्रता भी है जो पाठक को स्वयं में समेटे रखती है।
      अगर आप यथार्थवादी प्रेम कहानी पढना पसंद करते हो तो यह उपन्यास अवश्य पढें ।
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उपन्यास- सूरज का सातवाँ घोङा
लेखक- धर्मवीर भारती
प्रकाशक-
वर्ष-
पृष्ठ- 114
मूल्य-
 इस उपन्यास को इस लिंक पर निशुल्क पढा जा सकता है।-  सूरज का सातवाँ घोङा

105. तीन इक्के- गुलशन नंदा

सुनहरे सपनों से दर्द तक तक सामाजिक कथा।
तीन इक्के- गुलशन नंदा, सामाजिक उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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     साधना अभी काॅलेज से अपनी शिक्षा समाप्त करके निकली है। अन्य लङकियों की तरह उसके मन में भी नये सपने, नयी उमंग है। समाज को कुछ नया कर दिखाने की। अपनी प्रतिभा के दम पर एक नयी इबारत निकले की।
               लेकिन अभी साधना के सपनों ने उडान भी नहीं भरी थी की उसका सामना पडोसी आंटी ‌के घर दिल्ली से आये प्रकाश से हो जाता है। शायद मैं एक भेंट में प्रकाश पर छा जाना चाहती थी। ब्याह का संबंध हो या हो, मैं उसके मस्तिष्क पट पर एक ऐसा चित्र अंकित करना चाहती थी जो उसे सदा मेरी याद दिलाता रहे। (पृष्ठ-31)
मुलाकात से प्यार और प्यार से यह रिश्ता शादी तक पहुंच जाता है।
      
     दोनों परिवार आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से संपन्न हैं। साधना को एक नयी प्यार की दुनिया मिलती है। लेकिन यह स्वप्न कुछ समय पश्चात ही खण्डित हो जाते हैं जब उसके समक्ष प्रकाश का एक नया रूप आता है।
       साधना के दिव्यस्वप्न टूट जाते हैं। लेकिन साधना जैसी शिक्षित लङकी हार नहीं मानती वह परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने की हर संभव कोशिश करती है।
  
         उपन्यास में मूलतः इस बात पर ध्यान केन्द्रित है की कैसे एक लङकी अपने संसार को बचाने की कोशिश करती है।
   
  उपन्यास समाज के कई पक्षों का सहज ही चित्रण कर डालता है। पाठक जैसे जैसे कहानी में आगे बढता है उसे समाज/ व्यक्ति के कई रूप नजर आते हैं।  यह हमारे समाज की वास्तविकता को भी रेखांकित नरता है।
- साधना  और उसकी सहेलियों का शिक्षा पश्चात अपने पैरों पर खङा होने की चर्चा लेकिन साधना के माध्यम से यह भी दर्शाया गया है कई बार शिक्षण के पश्चात सपने पूर्ण नहीं होते।
- लङकी की जल्द शादी की कोशिश करना।
- प्रकाश जैसे व्यक्ति जो किसी भी लङकी को बहला सकते हैं।
- साधना की आंटी जैसे औरत जो साधना को भी सत्यता नहीं बताती।
- मिस्टर कपूर जैसे दोहरे चरित्र के आदमी ।
लेकिन समाज में बुराई है तो अच्छाई भी है। इसका चित्रण कई व्यक्तियों के द्वारा किया गया है।
साधना- जो प्रत्येक परिस्थिति का सामान मजबूती से करती है।
जाॅनी ड्राइवर- सरल हृदय के व्यक्ति ।
प्रकाश के पिता- जो अपनी बहू को बेटी के समान मानते हैं।
      उपन्यास में समाज की कई  बुराईयों का भी चित्रण है।     आजकल सोशल पार्टी के नाम पर लोग असामाजिक कार्य करते हैं। इनका विरोध साधना के माध्यम से दर्शाया गया है।
"तुम इतना पढ-लिखकर भी इन सोशल पार्टियों को बुरा कहती हो।"
"वह पार्टी या सभा, जहाँ मानव अपना चरित्र खो दे, सोशल(Social) नहीं कहलाती।" (पृष्ठ-43)
 
उन लोगों का भी चित्रण उपन्यास में है जो पहले जो लाङ- प्यार में अपनी संतान का व्यवहार खराब कर लेते हैं और फिर पश्चात करते हैं।
मुझे आज भली प्रकार उनकी विवशता का ध्यान हया। लाङ और प्यार से वह अपने बेटे को बिगाङ तो चुके थे ही, अब उसे सुधारने के लिए वह उसे कोई कठोर शब्द भी न कह सकते थे। (पृष्ठ-64)
संवाद और भाषा शैली -
                                 उपन्यास एक सामान्य कथा है इसमें कोई विशेष प्रभावी संवाद का प्रयोग नहीं है। और न ही ऐसी कोई कथा की मांग दृष्टिगत होती है। फिर भी यह एक अच्छा उपन्यास है और इसकी भाषा शैली सहज और सरल है।
फिर भी दो उदाहरण उपन्यास के संपूर्ण वातावरण को चित्रित करने में सक्षम है।
"कभी-कभी अनजान राही ठोकर लगने पर  अपने मार्ग से विचलित हो जाते हैं।" (पृष्ठ-66)
"हर वह स्थान जहाँ आप मेरे संग हैं, मेरे लिए हनीमून का स्थान है, हर वह मार्ग धरती का टुकङा जहाँ क्षण भर भी आप रुककर बात करते हैं, मेरी ओर देखकर मुस्कुराते हैं, मेरे लिए पवित्र स्थान बन जाता है...और आपका हर श्वास जिसमें मेरी याद रची है, मेरे लिए मधुर गीत है....यही मेरा ऐश्वर्य है।"-(पृष्ठ- 68)
उपन्यास शीर्षक-     
                       उपन्यास का शीर्षक तीन इक्के क्यों है। यह मुझे समझ में नहीं आया। साधना और प्रकाश के अतिरिक्त अन्य कोई भी प्रभावी पात्र नहीं है। जिसके आधार पर उपन्यास का नाम ती‌न इक्के रखा जाये।
     हालांकि उपन्यास में दो जगह ताश के खेल में तीन इक्के अवश्य आते हैं। जहाँ हार जीत में समर्पण अवश्य होता है।
शायद यही आधार उपन्यास के नामकरण में होगा।
निष्कर्ष-
    ‌‌‌       गुलशन नंदा का उपन्यास तीन इक्के एक पारिवारिक रचना है जो पाठक को सहज ही आकृष्ट करती है। भारतीय समाज में जो सामान्य परिस्थितियाँ होती है उन्हीं पर यह उपन्यास आधारित है।
      उपन्यास पाठक को आरम्भ से अंत तक अपने में बांधे रखता है। रचना छोटी सी है, प्रवाह तीव्र है इसलिए पाठक कहीं भी मानसिक थकान महसूस नहीं करता।
      उपन्यास पठनीय और रोचक है। सामाजिक उपन्यासों के पाठकों के अलावा अन्य पाठकों को भी उपन्यास पसंद आयेगा।
धन्यवाद।
- गुरप्रीत सिंह
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उपन्यास- तीन इक्के
लेखक- गुलशन नंदा
प्रकाशक- अशोक पॉकेट बुक्स- दिल्ली
वर्ष- 
पृष्ठ-
मूल्य

Tuesday, 3 April 2018

104. गुनाह के फूल- गुलशन नंदा

जब गुनाह के फूल खिले.....
गुनाह के फूल- गुलशन‌ नंदा, मर्डर मिस्ट्री, रोचक, पठनीय।
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     गुलशन मूलतः एक सामाजिक उपन्यासकार हैं और अपने समय के सर्वाधिक चर्चित उपन्यास लेखक भी रहें हैं। इनके सामाजिक उपन्यासों पर बहुत सी चर्चित फिल्में भी बन चुकी हैं। 
            गुलशन नंदा का प्रस्तुत उपन्यास गुनाह के फूल एक‌ मर्डर मिस्ट्री है। मेरे विचार से ऐसा इनका यह एकमात्र उपन्यास ही होना चाहिए। घटना चाहे कोई भी हो वह समाज से विलग नहीं हो सकती, ठीक उसी तरह यह मर्डर मिस्ट्री भी समाज की ही एक घटना पर आधारित है। लेकिन लेखन ने इस पर समाजिकता हावी नहीं होने दी और इसी कारण से गुलशन नंदा का यह उपन्यास उनके अन्य सामाजिक उपन्यासों से अलग हटकर मर्डर मिस्ट्री की श्रेणी में आ जाता है।
        उपन्यास की कथा कोई ज्यादा बङी नहीं है और न ही पात्र ज्यादा हैं और ठीक उसी अनुपात में उपन्यास के पृष्ठ हैं। उपन्यास की कहानी, पात्र और पृष्ठ के अनुपात में उपन्यास रोचक और पठनीय बना है।
 
    क्रिसमस की छुट्टियों के दौरान सुशील अपने छोटे भाई नवीन के साथ मुंबई एक्सप्रेस से अपनी‌ जीजी से मिलने भोपाल जा रही थी । वह अकेली न थी, बल्कि उसका छोटा भाई नवीन भी उसके सामने वाली सीट पर बैठा था। नवीन का अकेले बहन के संग रेल में यात्रा करने का पहला अवसर था। सुशील काॅलेज में पढती थी और नवीन तीसरी कक्षा का विद्यार्थी था। दोनों क्रिस्मस की छुट्टियां काटने अपनी बङी बहन के पास भोपाल जा रहे थे। (पृष्ठ-03)  लेेकिन रास्ते में, ट्रेन में, रात के अंधेरे में किसी शैतान ने सुशील से दुराचार कर उसकी हत्या कर दी और उसके छोटे भाई को हाथ बांध कर टाॅयलेट में बंद कर दिया।
        सुशील का जीजा हरदयाल जो की भोपाल रेल्वे पुलिस का इंचार्ज था। वह इस केस की छानबीन करता है और एक मोङ पर जाकर वह स्वयं आश्चर्यचकित रह जाता है।  तस्वीर को ध्यान से देखते ही उसके मस्तिष्क पर एक अँधेरा सा छाने लगा। उसके हृदय की धङकने तेज हो गयी। टाँगें क्षण भर के लिए लङखङा सी गयी। पाँव तले की धरती खिसकती हुयी दिखाई देने लगी। उसे विश्वास न आ रहा था कि यह तस्वीर उस अपराधी की है...कहीं बहुत बङी भूल तो नहीं हो गयी.....कठिनता से अपने आपको सँभालते हुए वह पास के बिछे हुए बैंच पर बेसुध सा बैठ गया। (पृष्ठ-75) लेकिन अंतत: वह अपराधी को पकङने में कामयाब होता है।
            उपन्यास की‌ कहानी हालांकि छोटी सी है। एक हत्या और फिर मुजरिम को पकङना लेकिन उपन्यास में विशेष है इस दौरान की छोटी-छोटी घटनाएं । छोटे-छोटे तथ्यों और सबूतों के आधार पर कैसे एक पुलिसकर्मी अपराधी तक पहुंच पाता है। उपन्यास में कुछ ट्विस्ट भी हैं जो स्वयं हरदयाल को भी विचलित कर देते हैं। लेकिन एक कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार हरदयाल अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होता।
     
                 गुलशन नंदा का उपन्यास पढना स्वयं में एक रोचकता है, और वह भी जब मर्डर मिस्ट्री हो तो क्या कहना। उपन्यास में कहीं भी अनावश्यक वार्तालाप, दृश्य नहीं है। उपन्यास बहुत ही हल्का-फुल्का है। अन्य जासूसी या मर्डर मिस्ट्री उपन्यासों की तरह उलझा हुआ नहीं है। यही उपन्यास की विशेषता है।
         उपन्यास पूर्णतः पठनीय है। अगर आप कम समय के लिए कोई रोचक उपन्यास पढना चाहो तो यह उपन्यास अवश्य पढें इसमें पाठक को कहीं भी अनावश्यक दिमाग लगाने की आवश्यकता नहीं है। उपन्यास का धीमा प्रवाह पाठक को अपने साथ धीरे-धीरे बहा ले चलता है।
       एक सामाजिक उपन्यासकार का मर्डर मिस्ट्री उपन्यास पढना स्वयं में रोचक है।
उपन्यास पठनीय है।
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उपन्यास -    गुनाह के फूल
लेखक-       गुलशन नंदा
प्रकाशक-    अशोक पॉकेट बुक्स- 4/36, रूपनगर, दिल्ली
पृष्ठ-          109