तनवीर सुलेमानी और आदिल का जासूसी कारनामा
अंधेरे का हंगामा- अनीस मिर्जा- अक्टूबर 1965
नमस्ते पाठक मित्रो,आज हम लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के उस समय में चलते हैं जब उपन्यास पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे । छोटे जासूसी उपन्यासों का वह समय बहुत अच्छा था । कहानियाँ चाहे छोटी थी पर सामान्य थी और पाठकों का समय व्यतीत अच्छा होता था ।
जी. के. पब्लिकेशन (11-F/75 लाजपत नगर) नई दिल्ली- 14 से प्रकाशित होने वाली 'इंस्पेक्टर जासूस' एक मासिक पत्रिका थी । इसके संपादक 'आ. नंद' थे ।
इसी पत्रिका में लेखक अनीस मिर्जा जी का एक उपन्यास 'अंधेरे का हंगामा' अक्टूबर 1965 में प्रकाशित हुआ था, यह पत्रिका का अंक -7 था ।
उपन्यास समीक्षा से पूर्व हम इस उपन्यास का प्रथम पृष्ठ देखते हैं।
अंधेरे का हंगामा - अनीस मिर्जा
पौली ने बनाव सिंगार में काफी समय बर्बाद कर दिया। और जब वह ड्रेसिंग टेबुल से हटी तो शाम के साढ़े छ बज चुके थे ।वह जल्दी से अपने कमरे से बाहर निकल आई। और तेज-तेज कदम उठाती हुई उस जगह पहुँची जहाँ एक अधेड़ व्यत्रित शानदार सूट पहने, मुँह में सिगार दबाए शाम का अखबार देख रहा था।
पौली ने जाते ही उसे सम्बोधित करके कहा-
"पापा! मैं जा रही हूँ।"
उसकी आवाज सुनते ही अधेड़ उम्र व्यक्ति ने अपने चेहरे से अखबार हटाया और पौली की ओर देखकर जल्दी से बोला-
"ओह, क्या तुम अब तैयार हो पाई हो ?"
"सॉरी पापा!"

