175 साल पुरानी प्रतिशोध कथा
नकली चेहरे - कर्नल रंजीत- 1974
मनुष्य जीवन बहुत ही अनोखा है। उसका जीवन किस पद्धति से संचालित होता है यह कहना कभी-कभी बहुत मुश्किल हो जाता है । मनुष्य कभी तो अपना सर्वस्व अपर्ण तक कर देता है और कभी कभी अपने प्रतिशोध में इतना डूब जाता है कि वह सदियों तक प्रतिशोध की अग्नि में जलता रहता है। कर्नल रंजीत के उपन्यासों में प्रतिशोध जैसे विषय पर बहुत कुछ लिखा गया है। इनके पात्र वर्षों- सदियों बाद तक प्रतिशोध की अग्नि में जलते रहते हैं और अवसर मिलते ही अपना प्रतिशोध पूरा करते नजर आते हैं। प्रस्तुत उपन्यास भी कुछ ऐसा है जहां एक व्यक्ति लगभग 175 वर्ष पश्चात अपना प्रतिशोध लेता है।
क्या यह संभव था ?
अगर संभव था तो कैसे ?
इसी संभव को जानने का प्रयास है कर्नल रंजीत का उपन्यास 'नकली चेहरे' जो सन् 1974 में प्रकाशित हुआ था । यह मूलतः एक मर्डर मिस्ट्री कहानी है।


