Saturday, 23 March 2024

599 आश्रिता- संजय

कहानी वही है।
आश्रिता- संजय

श्यामा केमिकल्स की दस मंजिली इमारत समुद्र के किनारे अपनी अनोखी शान में खड़ी इठला रही थी। दोपहरी ढल चुकी थी और सूरज की परछाईं पश्चिम आकाश से सागर के गम्भीर सीने में उतरने लगी थी। ढलते सूरज की पीली किरणें लहरों से आँख-मिचौनी खेलती हुई देखने वालों की आँखें चकाचौंध कर रही थीं, मानो सागर में लहरें नहीं सोने के चमकते टुकड़े तैर रहे हों। (उपन्यास अंश)

  लोकसभा चुनाव -2024 में मेरी नियुक्ति विद्यालय से चुनाव शाखा में 'स्वीप कार्यक्रम' अंतर्गत लगायी गयी है। पहला दिन था, कोई विशेष कार्य नहीं था और दूसरा दिन भी वैसा ही रहा। इन दो दिनों में मैंने लेखक 'संजय' का उपन्यास 'आश्रिता' पढा। यह एक परम्परागत चली आ रही कहानी है।
लेखक ने बहुत ही सरल शब्दों में अच्छे प्रस्तुतीकरण के साथ उपन्यास को पठनीय बना दिया है।

Tuesday, 12 March 2024

598. सिकंदर की वापसी- कुमार कश्यप

सिकंदर फिर भारत में
सिकंदर की वापसी- कुमार कश्यप

केन्द्रीय गुप्तचर विभाग नई दिल्ली ।
शशांक चक्रवर्ती का मस्तिष्क ऑफिस में घुसते ही ठनका। मेज पर रखा प्रार्थना-पत्र हाथ बढाकर उठाते हुये दूसरे हाथ से घन्टी बजाई ।
चपरासी ने आकर सलाम बजाया ।
'बटलर को सूचना दो हमने तुरन्त बुलाया है ।'
'लेकिन श्रीमान!'
'क्या अभी तक ऑफिस में नहीं आये।' घड़ी देखते हुये चीफ शशांक चक्रवर्ती ने पूछा और पत्र खोलने लगे ।
'ऐसा नहीं। आये थे बटलर साहब। आपके हाथ में जो अर्जी है मेज पर पटक कर बोले- इस घुड़साल का गन्जा मालिक आ जाये तो बोल देना-महान बटलर युद्ध जीतने के लिये पलायन कर चुके हैं। छुट्टी की एप्लीकेशन में नौकरी छोड़ने का अल्टीमेटम भी रखा है... इस्तीफा । कह देना-दोनों में जो चीज पसन्द आये घसीट मारे । इतना कहा और आँधी तूफान की तरह फूट गये ।'
 यह प्रथम दृश्य है कुमार कश्यप जी द्वारा रचित उपन्यास 'सिकंदर की वापसी' का।

Sunday, 21 January 2024

597. महाबली चीका- रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश'

 महाबली चीका- रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश'

उस व्यक्ति ने गर्दन उठा कर उस इमारत की ओर देखा । दस मंजिली वह इमारत अपनी भव्यता के कारण राह चलते व्यक्तियों के लिए पर्याप्त आकर्षण रखती थी । इमारत के दाहिने कोने पर एकदम ऊपर नियोन साइन में एक नाम चमक रहा था ।
संगीता !
राजधानी की ऐश्वर्यपूर्ण महानगरी में संगीता नया खुला होटल था। डेढ़ सौ वाले कमरों को लेकर खोले गये इस होटल में एक स्वीमिंग पूल भी था और तमाम प्रकार की वे सुख-सुविधायें जिन्हें पैसों के बल पर आसानी से प्राप्त किया जा सकता है ।
उस व्यक्ति के हाथ में एक खूबसूरत सूटकेस था । लम्बे कद और चौड़े कधों वाले उस आदमी ने आँखों पर रंगीन चश्मा और सिर पर नाइट कैप लगा रखी थी । कैप कुछ इस प्रकार चेहरे पर झुकी थी किउसका मस्तक एक प्रकार से उसमें छिप सा गया था । चेहरे पर घनी मूंछें थी जो उसके व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने के से साथ-साथ रहस्यमय भी दिख रही थीं ।
उसका शरीर सूट से ढका होने पर भी काफी उभरा-उभरा और शक्तिशाली दीख रहा था । बाँहों की मछलियों की उठान स्पष्ट झलका रही थी ।
(उपन्यास प्रथम पृष्ठ से)

   लोकप्रिय जासूसी उपन्यास साहित्य में रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश' एक विशिष्ट नाम रहे हैं। उन्होंने थ्रिलर और शृंखलाबद्ध जासूसी उपन्यासों की रचना की है।  जो कथास्तर पर काफी प्रभावशाली उपन्यास हैं।

Sunday, 14 January 2024

596. सुलगती आग- रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश'

भारत -चाइना संबंधों की जासूसी कथा
सुलगती आग- रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश'

हिंदी रोमांच कथा साहित्य में रमेशचन्द्र गुप्त चन्द्रेश का नाम श्रेष्ठ उपन्यासकारों में शामिल किया जा सकता है। जनवरी 2024 में मैंने इनके चार उपन्यास पढें जो कथा और प्रस्तुतीकरण की दृष्टि में जासूसी साहित्य में श्रेष्ठ तो कहे जा सकते हैं।
  'सुलगती आग' रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश' जी का अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर आधारित एक जासूसी उपन्यास है। जिसका कथानक भारत- चीन से संबंध रखता है।
कभी 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के नारे लगते थे और फिर चीन ने अपना वास्तविक रंग दिया दिया। चीन ने भाई कहकर भारत की पीठ पर वह छुरा मारा जिसका दर्द आज भी है। सन् 1962 में भारत-चीन युद्ध हुआ और इस युद्ध का परिणाम हम सभी जानते हैं। तात्कालिक साहित्य में भी भारत-चीन की पृष्ठभूमि पर अनेक उपन्यास लिखे गये।
रोमांच/ जासूसी साहित्य में भी इस पृष्ठभूमि पर काफी उपन्यास लिखे गये हैं। जिनमें से एक है रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश' द्वारा लिखित उपन्यास 'सुलगती आग'। 
प्रभाकर समाप्त कर दिया गया था । उसकी संस्था का एक योग्य एजेण्ट मार दिया गया था। वह एक अभियान पर हांगकांग गया था । अभियान सफलतापूर्वक सम्पन्न करके वह वापस हुआ ही था कि चीनी एजेन्ट उसके पीछे लग गये थे । प्रभाकर किसी तरह बचता हुआ कलकत्ता तक आ गया था। मौत की रफ्तार समय की रफ्तार से बहुत तेज होती है । प्रभाकर ने समय को धोखा दे दिया था लेकिन मौत को नहीं दे सका था। फलस्वरूप मौत ने उसे कलकत्ते में दबोच लिया था लेकिन प्रभाकर मरते-मरते भी न केवल मौत को दाँव दे गया था बल्कि अपने मारने वालों को भी ! और मरते समय प्रभाकर किसी प्रकार चीफ तक यह सूचना देने में सफल हो गया था कि जो वस्तु वह लाया है वह कहाँ है ! चूंकि उसे अपने बच पाने की तनिक भी उम्मीद नहीं है इसलिए यह सूचना दे रहा है। उसने यह भी सूचना दी कि उसकी डायरी स्थानीय एजेण्ट के पास है उससे प्राप्त कर ली जाए। मूल वस्तु वह स्थानीय एजेण्ट को इसलिए नही दे पा रहा है क्योंकि उसके पास समय नहीं है ।
और फिर प्रभाकर मारा गया था।
आदेश मिला कलकत्ता जाओ, और प्रभाकर द्वारा लाई गई चीज वापस लेकर लौटो।
(पृष्ठ-10,11)

Sunday, 31 December 2023

595. चंपक 2023, दिसम्बर -द्वितीय

बाल पत्रिका चंपक
चंपक 2023, दिसम्बर -द्वितीय
लो जी, एक साल और खत्म हो गया। जिस वर्ष )2023) का उत्साह के साथ स्वागत किया था, वह साल अपने साथ बहुत सी यादें लेकर चला गया।
जब नया आयेगा तो तय है पुराना तो जायेगा ही। सन् 2023 चला गया और हम नववर्ष 2024 का स्वागत करते हैं।
       जब से मैंने यह ब्लॉग आरम्भ किया है तो उसमें सन् 2023 पहला वर्ष है जिसमें सब से कम किताबें पढी हैं और उस से भी कम किताबों पर अपने विचार लिखे हैं। इस साल कुल 40 किताबों पर अपनी समीक्षाएं लिखी हैं और लगभग पचास किताबें पढी हैं।
इस वर्ष (2024) में यह संख्या कैसी रहेगी,यह तो पता नहीं, फिर भी अच्छी किताबें पढने की कोशिश रहेगी।
       वर्ष 2023 का समापन बाल पत्रिका चंपक के साथ किया है। चंपक वह पत्रिका है जिसमें मेरी सब से पहले रचना 'जंगल में प्रजातंत्र' प्रकाशित हुयी थी।
अब बात करते हैं पत्रिका चंपक की। समय के साथ चंपक में बहुत परिवर्तन आये हैं। अब इसका आकार भी बदल गया है। प्रस्तुत अंक (दिसंबर- द्वितीय, 2023) क्रिसमिस पर आधारित है। इस अंक में कुल सात कहानियाँ है, जिसमें से तीन कहानियाँ क्रिसमस से संबंधित हैं। कुछ चित्रकथाएं और नियमित स्तम्भ भी है।

Tuesday, 26 December 2023

593. मनोहर कहानियां- नवम्बर 1998

रहस्य-रोमांच विशेषांक
मनोहर कहानियां- नवम्बर 1998

हिंदी रोमांच साहित्य में मनोहर कहानियाँ पत्रिका का कभी अतिविशिष्ट नाम रहा है। इलाहाबाद के मित्र प्रकाशन से सन् 1944 में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका में काल्पनिक रोमांचक कहानियों के साथ-साथ सत्य पर आधारित कहानियाँ भी प्रकाशित होती थी। इन कहानियाँ में  अपराध पर आधारित कहानियाँ ही होती थी। इसके अतिरिक्त छोटी-छोटी रोचक जानकारियाँ भी समाहित थी।
   लम्बे समय पश्चात मनोहर कहानियाँ पत्रिका का एक पुराना अंक 'नवम्बर 1998' पढने को मिला। यह अंक 'रहस्य- रोमांच' विशेषांक है।

        जिसमें कुछ सत्य, कुछ काल्पनिक और कुछ मिश्रित कहानियाँ शामिल हैं। समस्त कहानियाँ रोचक हैं।
इस अंक की प्रथम रचना है 'सलमान खान-मुल्जिम बने शिकार के'

Saturday, 2 December 2023

591. महाबली टुम्बकटू- वेदप्रकाश शर्मा

चीन में टुम्बकटू और विकास का हंगामा
महाबली टुम्बकटू- वेदप्रकाश शर्मा

लम्बे, तगड़े और शक्तिशाली इन्सान ने सिगरेट में अंतिम कश लगाया और फिर ध्यान से उस सात-मंजिली इमारत को देखा। इस समय वह उस इमारत से लगभग पचास गज दूर झाड़ियों में खड़ा हुआ था। उसके जिस्म पर एक स्याह पतलून और गर्म लम्बा ओवरकोट था। सिर पर एक अजीब-सी गोल कैप थी। हाथों पर सफेद दस्ताने चढ़े हुए थे। समय रात्रि के दो बजे का था और सरदी नलों में जल को जमा देने वाली थी। आसपास गहरी निस्तब्धता का साम्राज्य था। यह सात-मंजिली इमारत राजनगर से थोड़ा अलग एकान्त में थी। अतः यहां यह केवल एक ही इमारत थी। (महाबली टुम्बकटू के प्रथम पृष्ठ से)
  वेदप्रकाश शर्मा उपन्यास साहित्य में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके द्वारा रचित पात्र आज भी अमर हैं, उनके पात्रों को आधार बना कर बहुत से उपन्यासकारों ने उपन्यास लिखे हैं और आज भी लिखे जा रहे हैं। हालांकि यह पात्र स्वयं वेदप्रकाश शर्मा जी ने आदरणीय वेदप्रकाश काम्बोज जी के उपन्यासों से लिये हैं और उनमें कुछ अपने पात्र भी शामिल किये हैं।
  वेदप्रकाश शर्मा जी के आरम्भिक उपन्यास स्थापित पात्रों कर क्रियाकलाप ही वर्णित होते रहे हैं, ज्यादातर कथानक अंतरराष्ट्रीय अपराधी वर्ग, विदेशी जासूसों से टकराव आदि।
   प्रस्तुत उपन्यास की कहानी भारत और चीन के  जासूसों के बीच संघर्ष की कहानी है।

Thursday, 30 November 2023

590. चंदर

589. भयानक शिकंजा- चंदर

 अदृश्य मानव सीरीज का चौथा उपन्यास

588. भयानक त्रिकोण- चंदर

 अदृश्य मानव शृंखला

587. बोलने वाली खोपड़ी- चंदर (आनंदप्रकाश जैन)

अदृश्य मानव का द्वितीय भाग
बोलने वाली खोपड़ी- चंदर (आनंदप्रकाश जैन)

चंदर द्वारा लिखित उपन्यास 'बोलने वाली खोपड़ी' एक शृंखला का भाग है जो 'अदृश्य मानव' सीरीज से जानी जाती है। 'अदृश्य मानव' सीरीज भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित एक रोचक और क्रांतिकारी सीरीज है।
पाठक मित्रो, हमने 'अदृश्य मानव' उपन्यास के विषय में बात की थी, जहाँ कोटद्वार रियासत ध्वस्त कर दी जाती है। वहाँ के राजा और रानी सुरक्षित बच सके या नहीं कुछ पता नहीं चलता,  अदृश्य मानव के साथी प्रमोद का क्या हुआ, गोपालशंकर को एक ब्रिटिश सहयोगी जूली मिलती है, जैसे कुछ तथ्य अदृश्य मानव में अधूरे रह गये थे। प्रस्तुत उपन्यास 'बोलने वाली खोपड़ी' में हमें उन अधूरे प्रश्नों के उत्तर भी मिलेंगे और प्रस्तुत उपन्यास में रोचक कहानी भी।
  अदृश्य मानव उपन्यास में कोटद्वार रियासत ध्वस्त होने का बाद अंग्रेज सरकार और पण्डित गोपालशंकर को यह लगता है कि उन्होंने ने अदृश्य मानव को खत्म कर दिया परंतु उस घटना के चार वर्ष पश्चात अदृश्य मानव फिर जबरदस्त वापसी करता है।
उपन्यास का आरम्भ एक ज्वैलर्स के यहां डकैती से होता है और फिर पता चलता है की शहर में चार बड़ी डकैतियां हुयी है, जिनके पीछे अदृश्य मानव का हाथ। और अदृश्य मानव क्रांति के लिए अंग्रेजों के सहायक, धनपति लोगों को लूटना है।
'बड़ा बुरा समाचार है। आज से चार साल पहले मरा हुआ दानव आज फिर जी उठा है।' जॉन निकल्सन ने कहा।