Friday, 27 July 2018

131. वयम रक्षाम- आचार्य चतुरसेन शास्त्री

आर्य और अनार्य जाति के संघर्ष की गाथा।

वयम रक्षाम उपन्यास पढना एक रोचक अनुभव रहा। यह उपन्यास मात्र एक कहानी भर नहीं बल्कि यह आर्य और अनार्य जाति का इतिहास भी है। 


'उन दिनों तक भारत के उत्तराखण्ड में ही आर्यों के सूर्य-मण्डल और चन्द्र मण्डल नामक दो राजसमूह थे। दोनों मण्डलों को मिलाकरआर्यावर्त कहा जाता था। उन दिनों आर्यों में यह नियम प्रचलित था कि सामाजिक श्रंखला भंग करने वालों को समाज-बहिष्कृत कर दिया जाता था। दण्डनीय जनों को जाति-बहिष्कार के अतिरिक्त प्रायश्चित जेल और जुर्माने के दण्ड दिये जाते थे। प्राय: ये ही बहिष्कृत जन दक्षिणारण्य में निष्कासित, कर दिये जाते थे। धीरे-धीरे इन बहिष्कृत जनों की दक्षिण और वहां के द्वीपपुंजों में दस्यु, महिष, कपि, नाग, पौण्ड, द्रविण, काम्बोज, पारद, खस, पल्लव, चीन, किरात, मल्ल, दरद, शक आदि जातियां संगठित हो गयी थीं।'

Tuesday, 24 July 2018

130. वंस एगेन Once Again - गजाला

नौ वर्ष बाद COME BACK
वंस एगेन- गजाला करीम, एक्शन उपन्यास.
---------------------------
       
  
लगभग नौ वर्ष बाद उपन्यास जगत में वापसी करने वाली गजाला करीम का 'Once Again' एक लघु उपन्यास है।
     यह उपन्यास उन लोगों के चेहरे से नकाब उतारता है जो देश के खिलाफ काम करते हैं। जिनका दिखाने का चेहरा अलग है और वास्तविक चेहरा अलग है।  वर्तमान में आतंकवाद एक बड़ी समस्या है और यह उपन्यास आतंकवाद के चेहरे को बेनकाब करता है।
   
    ‌ अगर उपन्यास की कहानी की बात करें तो यह एक लघु उपन्यास है। जिसमें एक्शन है लेकिन साथ में देश के प्रति जान देने वाली जासूस गजाला का रोचक अंदाज भी है।

Wednesday, 18 July 2018

129. सफेद खून- सुरेन्द्र मोहन पाठक

तिहरे कत्ल का सनसनीखेज उपन्यास
सफेद खून- सुरेन्द्र मोहन पाठक, जासूसी उपन्यास, मर्डर मिस्ट्री, पठनीय।
----------------
    प्राइवेट डिटेक्टिव सुधीर कोहली को एक महिला का फोन आया की आज शाम आठ बजे छतरपुर फार्म हाउस पर उससे मिले।
"आपको छतरपुर आना होगा।"- वह बोली
"छतरपुर ।"- मैं अचकचाकर बोला।
"घबराइए नहीं। यह जगह भी दिल्ली में है।"
"दिल्ली में तो है लेकिन.....।"
"यहाँ हमारा फार्म है।"
              जब शाम को सुधीर कोहली वहाँ पहुंचा तो मिसेज कमला ओबराय अपने मृत्यु पति अमरजीत इबराय के पास उपस्थित थी।

Saturday, 14 July 2018

128. बस्तर पाति- पत्रिका,मई 2018

बस्तर पाति- त्रैमासिक पत्रिका, संयुक्त अंक।
छतीसगढ से प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका 'बस्तर पाति' का यह एक संयुक्त अंक है। इसमें अंक संख्या 14,15,16 अर्थात सितंबर 2017 से मई 2018 तक को एक अंक में प्रस्तुत किया गया।
            यह पत्रिका किसी न किसी एक साहित्यकार पर केन्द्रित होती है और इसका प्रस्तुत अंक साहित्यकार हरिहर वैष्णव पर केन्द्रित है। इसके साथ-साथ यह अंक संपादकों की रचनाओं पर केन्द्रित अंक है।

Tuesday, 3 July 2018

127. सड़क के किनारे- सआदत हसन मंटो

मंटो की कहानियाँ.
-------------
              मंटो‌ का साहित्य क्षेत्र में एक विशेष नाम है। इनकी अधिकांश कहानियाँ समाज के वर्जित क्षेत्र का वर्णन करती हैं तो वहीं इनकी स्वतंत्रता संग्राम के समय हुये दंगों, जातिय हिंसा और औरत वर्ग पर बहुत अच्छा लिखा है।
   कहानी संग्रह के संपादक नूरनबी अब्बासी ने लिखा है "जीवन के प्रति मण्टो का कुछ विचित्र सा दृष्टिकोण था। वह इस समाज में रह कर इसकी गंदगी को देखते थे। उसका विरोध करते थे पर साथ ही इस समाज की जड़-जनता -से भी अलगाव पसंद था।"

       प्रस्तुत संग्रह में अधिकांश कहानियाँ स्त्री वर्ग को लेकर लिखी गयी हैं। पन्द्रह कहानियों में से दो-तीन कहानियाँ ही ऐसी हैं जो स्त्री वर्ग पर नहीं लिखी गयी।

सौ कैण्डल पाॅवर का बल्ब कहानी एक ऐसी औरत की कहानी है जो जिस्म का व्यापार तो करती है, चाहे उसकी मजबरी हो लेकिन वह अपना अस्तित्व खत्म करना चाहती।
  खुदफरेब कहानी तीन ऐसे दोस्तों की कथा है जिनके लिए स्त्री एक मन बहलाने की वस्तु है। तो वहीं बर्मी लड़की कहानी एक ऐसी लड़की की है जिसका कोई घर -ठीकाना नहीं लेकिन वह अपनी आर्थिक स्थिति के लिए एक अजनबी लड़के को अपना दोस्त बना लेती है।

हालांकि इस संग्रह की ज्यादातर कहानियाँ मेरे सिर के उपर से गुजर गयी क्योंकि मंटो ने कोई कहानी कहने की बजाय मात्र कुछ घटनाओं का वर्णन किया है। अब वे घटनाएं कहानी बने या ना बने इससे लेखक का कोई अभिप्राय नहीं उन्होंने तो जैसा समाज देखा वैसा लिख दिया।  फिर भी कुछ कहानियाँ मन को छू लेती हैं।  ऐसी ही मन को छू लेने वाली कहानी है फ़ोभा बाई
     फ़ोबा बाई एक ऐसी औरत की कहानी है जो नृत्यांगना है लेकिन वह अपने बेटे को एक इज्जतदार जीवन देना चाहती है। इसलिए वह अपने पुत्र को अपने से अलग रखकर पढाती है, इस कहानी का अंत बहुत ही मार्मिक है। ऐसी ही एक और मार्मिक कथा है अल्ला दिता।
     एक मनुष्य वासना की दलदल में कैसे अपने रिश्ते भूल जाता है और कैसे एक औरत दूसरी औरत की दुश्मन हो जाती है इसका यथार्थ वर्णन अल्ला दिता कहानी में मिलता है।
    कहानी सड़क के किनारे एक मजबूर माँ की कथा जिसके लिए अपना बच्चा जान से भी प्यारा है, चाहे वह कुँवारी ही माँ बन जाये। वह कहती है - " मेरा जीवन नष्ट हो जायेगा?...हो...जाने दो......मेरी आत्मा का टुकड़ा मुझसे मत छीनों...तुम नहीं जानते यह कितना मूल्यवान है...यह मोती है जो मुझे उन क्षणों ने प्रदान किया है...।"
       
     संग्रह में कहानियाँ
1. सौ कैण्डल पाॅवर का बल्ब
2. खुदफरेब
3. बर्मी लड़की
4. खुशिया
5. फोभा बाई
6. बादशाहत का खात्मा
7. निक्की
8. शादी
9. महमूदा
10. शांति
11. राम खिलावन
12. औरत जात
13. अल्ला दिता
14. झूठी कहानी
15. सड़क के किनारे
-----------
पुस्तक- सड़क के किनारे (कहानी संग्रह)
लेखक- सआदत हसन‌ मंटो
प्रकाशक- नवयुग प्रकाशन- दिल्ली

126. नफरत की दीवार-अनिल मोहन

नफरत में‌ लिपटी एक मासूम‌‌ जिंदगी।
नफरत की दीवार- अनिल‌ मोहन, थ्रिलर उपन्यास, पठनीय, मध्यम।
------------------------
एक ऐसे इंसान की कहानी, जो हर नये दिन के साथ नफरत की मजबूत दीवारों की गिरफ्त में फंसता चला गया।

      अजय को बचपन से ही घर से नफरत मिली और यह नफ़रत दिन प्रति दिन‌ बढती ही गयी

उपन्यास का आरम्भ होता है जब अजय अपनी पत्नी सुनीता के साथ घर में प्रवेश करता है। सुनीता का घर में  प्रथम दिवस, गृह प्रवेश और उसका व्यवहार पाठको को आश्चर्यचकित करता है।
- मैं‌ सिर्फ इज्जतदार लोगों की ही इज्जत करती हूँ, ऐरे-गैरे से तो मुझे बात करना ही पसंद नहीं। (पृष्ठ-11)
- मैं तुम दोनो से भी बड़ी चुडैल हूँ, इस बात को हरदम अपने दिमाग में रखना।(पृष्ठ-11)
      अब पाठक के आश्चर्य का यह कारण है की वह ऐसा क्यों करती है लेकिन अगले पृष्ठ पर यह रहस्य खुल जाता है। जब अजय के भाई विमल- सुरेश और उनकी‌ पत्नियां सुधा और अनिता आपस में चर्चा करते हैं।

   अजय अगर छब्बीस साल की उम्र होने तक शादी कर लेता है तो उसे रामदयाल जी की संपत्ति में से हिस्सा मिलेगा अन्यथा नहीं।
जब अजय अपनी शादी की बार चलाता है तो अजय के भाई सुरेश और विमल अजय को उसकी मंगेतर कल्पना सहित खत्म करने का प्लान बनाते हैं और सफल भी हो जाते हैं।
लेकिन एक दिन अजय घर आ पहुंचता लेकिन कल्पना के साथ नहीं, अपनी पत्नी सुनीता।
- अजय जीवित कैसे बच गया?
- क्या हुआ कल्पना का?
- सुनीता कौन है?
- अजय से उसके परिवार वाले नफरत क्यों करते हैं?
- संपत्ति और वसीयत और शादी का आपस में क्या संबंध है?
- अजय के भाई उसके दुश्मन क्यों है?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर तो अनिल मोहन जी का उपन्यास 'नफरत की दीवार' पढकर ही मिलेगा।

                    उपन्यास का प्रथम चरण है जब अजय सुनीता के साथ शादी करके घर पहुंचता है, तब एक आश्चर्य होता है की अजय को मारने की किसने कोशिश की, अजय कैसा बचा और उसकी प्रेयसी कल्पना कहां है, और अचानक सुनीता से शादी करके घर कैसे पहुंच गया?
द्वितीय चरण वह है जिसमें अजय के बचपन का वर्णन है यह चरण बहुत ही भावुक है।
तृतीय चरण वह है जिसमें अजय अपने दुश्मनों से बदला लेता है।
             

उपन्यास में‌ गलती-

उपन्यास के अंत में रंजन का कत्ल हो जाता है लेकिन कोई स्पष्ट ही नहीं हो पाता की कत्ल किसने किया।
तभी रंजन की चीख गूंजी और वह जुदा होकर दूर जा गिरा। .....रंजन के पेट में मूठ तक चाकू धंसा था।(पृष्ठ-202)

- उपन्यास में 'मंगेतर' शब्द को जगह-जगह पर 'मंगेदर' लिखा गया है।

- राधिका एक जगह अजय को वसीयत की सत्यता बताती है। यह दृश्य उपन्यास में किसी भी दृष्टि से‌ मेल नहीं खाता।
राधिका को क्या जरुरत थी इस सत्य को बताने की?

संवाद-
    उपन्यास संवाद के स्तर पर कोई विशेष नहीं है फिर भी कई जगह कुछ संवाद पठनीय हैं।

- सच्चे प्यार की चाहत न तो कभी कम हो सकती है और न ही समाप्त हो सकती है। (पृष्ठ-192)

निष्कर्ष-
   ‌    ‌  उपन्यास का आरम्भ बहुत रोचक और संस्पेंश से भरा है और मध्यांतर भाग अजय के बचपन से संबंधित बहुत ही भावुक है।
                   उपन्यास के आरम्भ में पाठक जहां पल-पल चौंकता है वहीं मध्यांतर में उसकी आँखों से आँसू बह जाते हैं‌ लेकिन उपन्यास का समापन बदला प्रधान हिंसक फिल्म की तरह है जिसमें कोई ज्यादा आनंद नहीं आता। बस लेखक ने उपन्यास का समापन करना था जैसे-तैसे कर दिया।
      उपन्यास एक बार पढी जा सकती है। अच्छी है।

---------------------------
उपन्यास- नफरत की दीवार
लेखक - अनिल मोहन
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 236
मूल्य-60₹

125. डकैती मास्टर- अनिल मोहन

इण्डिया बैं‌क की डकैती की कहानी।
डकैती मास्टर- अनिल मोहन, थ्रिलर उपन्यास, रोचक, पठनीय।
-----------------------------------------
     जवाहर सिंह कालिया वह शख्स था जिसने देवराज चौहान से डकैती की एक डील की थी ।
"माल रोड़ पर इण्डिया बैंक की ब्रांच है।"- जवाहर सिंह कालिया ने गंभीर स्वर में कहा - " उसमें लाॅकर की सुविधा भी उपलब्ध है। 402 नंबर लाॅकर में पड़ा सारा सामान तिनका-तिनका, बेशक वह रुपया हो या सोना-हीरे हों या फिर कागजात हों, मुझे चाहिए। यह काम है।"(पृष्ठ-07)
     देवराज चौहान और जगमोहन ने वह डील स्वीकार की। और जगमोहन के साथ एक प्लान बनाया।
"तुम....!" देवराज चौहान मुस्काया-"सिर्फ 402 नंबर लाॅकर के बारे में ही नहीं सोच रहे बल्कि वहां मौजूद सब लाॅकरों के बारे में सोच रहे हो। जाहिर है, जब 402 नंबर लाॅकर खाली करने के लिए बैंक में डकैती डालोगे तो बाकी लाॅकरों पर भी हाथ मारोगे।"(पृष्ठ-13)
               देवराज चौहान ने डकैती की। लेकिन यह एक संयोग था की डकैती के दौरान एक शख्स वहां आ पहुंचा।

124. खून की प्यासी- अनिल मोहन

घर में तीन सदस्य एक गायब....और शेष दोनों पर शक।
खून की प्यासी- अनिल मोहन, थ्रिलर उपन्यास।
----------------

"प्रणाम भाभी।" एयरपोर्ट से बाहर आते ही राजेश ने प्रसन्नता भरी मुद्रा में चालीस वर्षीय विमला देवी के पांवों को छूकर कहा-"सब ठीक हैं ना?"
        "सब ठीक है देवर जी।"- विमला देवी ने उसके सिर पर आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ रखकर हँसते हुए कहा-" अमेरिका से काॅर्स ठीक तरह पूरा करके आये हो ना?"
"बिलकुल भाभी। बिजनेस मैनेजमेंट में टाॅप किया है। अब भैया के साथ सारे बिजनेस को संभालूंगा, ताकि उनके कंधों का बोझ कुछ कम हि सके।"- राजेश ने कहा।(पृष्ठ-07)
             वीरेन्द्र प्रताप सिन्हा का छोटा भाई राजेश जब अमेरिका से अपना काॅर्स पूरा करके घर लोटा तो उस तीन सदस्य घर में खुशी का माहौल था। लेकिन एक छोटी सी फोन काॅल ने सारी खुशियों को ग्रहण लगा दिया।
" जी हां, कौन हैं आप?" वीरेन्द्र प्रताप ने शांत लहजे में कहा।
"आपका शुभचिंतक.........आपका छोटा भाई राकेश आपके खिलाफ बहुत गहरी साजिश रच रहा है। ताकि वह करोङों‌ की दौलत का अकेला मालिक बन सके...और...।" (पृष्ठ-10,11). 
   
            वीरेन्द्र प्रताप सिन्हा की पत्नी विमला देवी का अपहरण हो गया और इल्जाम‌ लगा  वीरेन्द्र सिन्हा के छोटे भाई राजेश पर।  दुसरी तरफ राजेश ने इल्जाम‌ लगया मैनेजर पंकज वर्मा पर।
राजेश के सबूत और गवाह झूठ साबित हुए और दूसरी तरफ पंकज वर्मा गायब था।
      
       तो फिर सत्य क्या था?
-विमला देवी को गायब किसने किया?
- पंकज वर्मा ने या राजेश ने?

              वीरेन्द्र सिन्हा ने भी अपनी पत्नी को ढूंढने की बहुत कोशिश की पर कोई सबूत हाथ न लगा।
  06 माह बाद जब इस केस को‌ पुन: खोला गया तो फिर एक के बाद एक ऐसे रहस्य सामने आनर लगे की सभी दंग रह गये।
       कहानी एक ऐसे मोङ पर जा पहुंची जहाँ तक कोई सोच भी नहीं सकता था। अपराधी वर्ग का बिछाया हुआ एक ऐसा जाल था जिसमें एक- एक कर सभी उलझते चले गये। स्वयं पुलिस विभाग भी हैरान रह गया।
        
         उपन्यास की कहानी मध्यांतर तक बहुत ही रहस्यात्मक ढंग से आगे बढती है और पाठक आश्चर्यचकित सा रह जाता है। जब एक-एक कर रहस्य से पर्दे उठते हैं तो बहुत अच्छा लगता है। लेकिन उपन्यास मध्यांतर के पश्चात अपनी गति खोती नजर आती है।
  पहले उपन्यास में जहाँ रहस्य था वहीं बाद में उपन्यास बदला प्रधान फिल्म की तरह हो जाती है। अपराधी वर्ग से बदला लिया जाता है।
          अब एक-एक अपराधी मारे जाते हैं। आखिर इनको मार कौन रहा है। किसी को कुछ भी पता नहीं चलता लेकिन जब अंत में कातिल सामने आता है तो एक झटका सा लगता है की यार किस को कातिल ठहरा दिया।

             उपन्यास अच्छा था, उपन्यास का आरम्भ बहुत अच्छा था, मध्यांतर तक उपन्यास शानदार था लेकिन‌ बाद में अपराधियों से बदला ले‌ने के लिए उपन्यास अपने मूल तथ्य से भटक जाता है।

खून की प्यासी- उपन्यास का शीर्षक भी एक ऐसे व्यक्ति पर आधारित है जैसे जादूगर द्वारा पिटारे में से कबूतर निकाल गया हो।

कमियां- मुझे उपन्यास के अंत यह नहीं पता चला की वीरेन्द्र सिन्हा को अपने भाई राजेश के प्रति सजग करने वाला वह शुभचिंतक कौन था?
  और उसने वीरेन्द्र सिन्हा को फोन क्यों किया?

निष्कर्ष-               उपन्यास का आरम्भ और कहानी बहुत जबरदस्त है। उपन्यास में एक के बाद एक रहस्य पाठक को जबरदस्त झटका देने वाले हैं। कहानी बहुत घुमावदार है। पाठक को जब लगता है यह अपराधी होगा तो तब अगले पृष्ठ पर धारणा बदल जाती है। ऐसा कई बार होता है लेकिन यह रहस्य-रोमांच उपन्यास के मध्य भाग से पूर्व तक तो ठीक है लेकिन उपन्यास के मध्य भाग पश्चात उपन्यास अपने साफ इंसाफ नहीं कर पाता और कहानी का अंत/अपराधी जिस व्यक्ति को दिखाया गया है वह भी कोई उचित न लगा।
  उपन्यास एक बार पढा जा सकता है।
--------------
उपन्यास- खूनी की प्यासी
लेखक- अनिल मोहन
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स मेरठ
पृष्ठ- 222
मूल्य- 60₹

      

Monday, 25 June 2018

123. विधि का विधान- अनिल मोहन

चलती वैन से लूट की कथा।
विधि का विधान- अनिल मोहन, उपन्यास, रोचक, औसत।
-------------------------------
      
मध्य प्रदेश में पुरातत्व विश्लेषण विभाग को खुदाई के दरम्यान, तरबूज के साईज के दो हीरे मिले हैं। वह बेहद कीमती, अमूल्य, बेशकीमती हीरे हैं। विशेषज्ञों का कहना है की ऐसे कीमती, हीरे शायद दुनियां‌ में कहीं भी नहीं हैं। अब उनकी कीमत का तुम‌ लगा ही सकते हो। (पृष्ठ-31)
                    जब देवराज चौहान को इन हीरों‌ की खबर लगी तो उसने अपने मित्र जगमोहन के साथ मिलकर इन हीरों‌ को लूटने का सोचा।
                देवराज चौहान‌ ने कुछ लोगों को साथ लिया और हीरे लूट को लूटने का प्लान बनाया।
          अनिल मोहन जी का एक विशेष पात्र देवराज चौहान और उसका साथी जगमोहन डकैती के लिए प्रसिद्ध हैं।  उपन्यास 'विधि का विधान' में भी वे एक ऐसी डकैती का प्लान बनाते है, जबकि उनके पास कोई अच्छा प्लान भी नहीं है।

122. जगत और चंपा डकैत- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक

चंपा नामक डकैत की कहानी ?
जगत और चम्पा डकैत- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक, जासूसी उपन्यास, अपठनीय।
----------------------
     जासूस जगत को एक काम मिला। दिल्ली से एक कार मुंबई गोपाली के पास पहुंचाने का। यह भी एक संयोग था की दिल्ली की एक पत्रकार किरण भी मुंबई जा रही थी।
"अगर आप पसंद करें तो मैं साथ चलूं?"
"नहीं बिलकुल पसंद नहीं करुंगा।"
"क्यों?"
......
"......नंबर एक तो मेरे पांवों में चक्कर है, नंबर दो हर सफर में मेरे साथ कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाती है।" (पृष्ठ-15)
      और अनंतः दोनों एक साथ मुंबई को चल दिये।
            और गड़बड़ हुयी, रास्ते में हुयी।  रास्ते में एक शहर था सरूरपुर।
तीसरा पहर था, सामने बोर्ड लगा था- सरूरपुर नगरपालिका आपका स्वागत करती है। कोई साधारण सा शहर। (पृष्ठ-28)
         क्या हुआ उस शहर में। गड़बड़ हो गयी और जगत का सफर यहाँ से एक नयी दिशा को हो गया।
       शहर के इस तरफ सात किलोमीटर पर सरूरपुर किले और महल के खण्डहर हैं, तकरीबन दो सौ साल पुराने। अब वो जगह अजीब ही है, पहले वहाँ हुआ करता था बल्लू काने का चोर दल। इसी नगर में गांव से ब्याही आयी चम्पा। यूं तो उसका घरेलु नाम कल्लो है। अब वहां कल्लो अर्थात् चम्पा का डकैत गिरोह रहता है.........इस बार उसने रिश्ते में अपनी जेठानी का चार बरस का लङका उठवा लिया है, और एक लाख फिरौती की मांग की है। (पृष्ठ-29)
                 सरुरपुर पहुंचे जगत को जब इस घटना का पता चला तो उसने चम्पा डकैत से उस बच्चे को छुड़वा लेने का वायदा किया। यहाँ पर लगा की अवश्य ही चम्पा और जगत की लङाई होगी और उपन्यास कुछ रोचक बनेगा लेकिन जगत ने एक छोटी सी चालाकी से चम्पा को मूर्ख बना कर बच्चे को आजाद करवा लिया और स्वयं चम्पा को भी अपने साथ ग्वालियर ले चला।
             तब लगा की कहानी में कुछ रोचक मोङ आयेगा। मोङ तो अवश्य आता वह न तो रोचक था और न ही कहानी से संबंधित। ग्वालियर के रास्ते में‌ शिवपुरी में जगत को जासूस जगन और बंदूक सिंह मिल गये और  शेष कथा यही पर सिमट गयी।
     ‌‌‌‌शिवपुरी में अजब सिंह नाम का एक बहुत बङा स्मगलर है। जगन और बंदूक सिंह उसी को पकङने के लिए यहाँ उपस्थित हैं। ‌अपने  जासूस महोदय भी मुंबई और चम्पा डकैत को भूल कर अजब सिंह के अजीब से चक्कर में‌ फंस कर उपन्यास की कहानी को ही अजब -गजब बना देते हैं।
   ‌‌‌       अजब सिंह की एक सहयोगी है रसभरी। पहले रसभरी को पकङा जाता है और कोशिश होती है की मानवता के नाते रसभरी को कुछ नुकसान न हो। दूसरी तरफ अजब सिंह को भी मानवता के नाते तब तक गिरफ्तार नहीं करना जब तक उसकी बेटी की शादी न हो जाये।
      जगत भी चम्पा को अपने साथ इसीलिए चिपकाए हुए है की वह डकैत का जीवन छोङ कर एक अच्छे नागरिक का जीवन जीये।
      तीनों जासूस और इनके सहयोगी उपन्यास में‌ जासूस कम‌ और  समाज सेवक ज्यादा नजर आते हैं।
         उपन्यास ना कोई अच्छा अंत भी नहीं है। कहानी के स्तर पर भी उपन्यास अच्छा नहीं  है। पूरा उपन्यास 'कहीं की ईंट, कहीं‌ का रोङा' वाली पंक्ति को सार्थक करता नजर आता है।

  निष्कर्ष-    
प्रस्तुत उपन्यास किसी भी स्तर पर पठनीय नहीं है। कहानी का कहीं को तालमेल नहीं है और न ही कोई समापन। उपन्यास में कहीं कहानी है भी नहीं। यह उपन्यास पढना समय की बर्बादी है।
-----------------
उपन्यास- जगत और चम्पा डकैत
लेखक- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक
प्रकाशक- रजत प्रकाशन
पृष्ठ -235
मूल्य-20₹

Wednesday, 13 June 2018

121. हिमालय की चीख- बसंत कश्यप

खजाने के चक्कर में......मौत की घाटी में।
हिमालय की चीख- बसंत कश्यप, हाॅरर-थ्रिलर, रोचक, पठनीय।
हिमालय सीरिज का प्रथम भाग।
-------------------------
           कई वर्ष पूर्व एक उपन्यास पढा था 'डंके की चोट'। उपन्यास तिलिस्म, हाॅरर, जासूसी और थ्रिलर का इतना जबरदस्त मिश्रण था की मैं उसके आकर्षण से एक दशक बाद तक भी बाहर न निकल सका। उस उपन्यास का आगामी भाग भी लंबे समय पश्चात मिला था। और अब पता चला की डंके की चोट उपन्यास का भी एक पूर्व भाग है 'हिमालय की चीख'।
         ‌‌‌‌‌‌ चार भागों में बिखरी एक अदभुत दास्तान है बसंत कश्यप के ये उपन्यास। इन उपन्यासों की एक विशेषता ये भी है की कहानी एक उपन्यास में पूर्ण लगती है, लेकिन वह पूरी होती नहीं।
         बसंत कश्यप का उपन्यास 'हिमालय की चीख' जहां पर खत्म होता है, इस उपन्यास के पात्र तक मर जाते हैं लेकिन कहानी यथावत और पहले से भी ज्यादा रोचकता लिए हुए आगे चलती है। यह क्रम डंके की चोट में भी है।
मुझे अभी तक इस कहानी के दो भागों के नाम याद हैं दो के नहीं और  लगभग चार भाग में से तीन भाग अलग-अलग समय पढ चुका हूँ।
                 अगर बात करें बसंत कश्यप के उपन्यास 'हिमालय की चीख' की तो यह स्वयं में पूर्ण होते हुए भी आगे कहानी के लिए बहुत स्पेश छोङ देता है और उसी पर आगे लगभग तीन पार्ट लिख गये हैं।
    नेशनल लाइब्रेरी एशिया के संग्रह में एक दुर्लभ पाण्डुलिपि है।‌ जो सन् 1820ई. में लिखी गयी थी। जिसमें विवरण है हिमालय क्षेत्र में एक दुर्लभ खजाने का। इसी खजाने की तलाश में कलकत्ता के कुछ बुद्धिजीवी वर्ग वहां  जाते हैं।
          हिमालय का वह स्थान जहां वह दुर्लभ खजाना है उस जगह स्थित है मौत की घाटी और उस घाटी में‌ है लुईंग की आत्मा। खून की प्यासी आत्मा।
मौत की घाटी-
                       हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों में एक निर्जन स्थान पर एक महल है और वह क्षेत्र कहलाता है मौत की घाटी। जहां खजाने की तलाश में हजारों लोग मारे गये। अब अब कलकत्ता के 14 लोग और पहुंचे हैं।
लुईग की आत्मा-
                         लुईंग की आत्मा जो की उस दुर्लभ खजाने की रक्षक है। जिसने मौत की घाटी में प्रवेश करने वाले किसी भी शख्स को जिंदा नहीं छोङा।
हा, अगर इस गुङिया को इंसान हाथों में‌ लेता है तो उसके खून की गर्मी से सोने के पत्थर में कैद यह आत्मा बाहर हो जायेगी। अपने विषाक्त प्रभाव से यह सोने को भी राख बनाकर अपने छूने वाले इंसान के जिस्म में प्रवेश कर जायेगी। इसके अलावा अगर इस गुङिया के ऊपर ताजे खून की बूंद गिर जाती है तो यह सोने के पत्थर को राख में बदल कर बाहर आ जायेगी।"(पृष्ठ-190-91)
      और एक जब लुइंग की आत्मा इस गुङिया से बाहर आयी तो इसने वो कहर मचाया जिसका वर्णन भी मुश्किल है।  एक -एक कर सारे खजाने लालची मारे गये।
    
  आलम खान जीता-जागता पिशाच का रूप धारण कर चुका था। उसके सिर के बाल एकदम जंगली चूहे के ऊपर के कांटों की भांति खङे थे।  उसके खुले मुँह के ऊपर के दो दांत बाहर निकल चुके थे, जिनसे फटे मसूढों से रिसकर खुन टपक रहा था।  उसके गालों की चमङी फट चुकी थी, जहां से मांस बाहर की तरफ उबल रहा था। आँखें‌ कटोरियों से बाहर निकलती प्रतीत हो रही थी.....
...उसके हलक से भयानक गुर्राहटें उबल रही थी, जिससे समूचे गलियारे का वातावरण गूंज रहा था। (पृष्ठ-)
    लुईंग की आत्मा वह रक्तबीज थी जिसे छूने वाला पिशाच का रुप धारण कर लेता था और वह बहुत भी भयानक मौत मरता था। 
                             उपन्यास के एक-एक पात्र मौत के घाट उतरता चला गया। बची तो सिर्फ एक ज्योत्सना श्राफ। ज्योत्सना श्राफ ही एक मात्र वह पात्र है जो मौत के मुँह से जिंदा लौट आती है। लेकिन वह भी हिमालय ‌की बेटी बन कर वहीं रह जाती है।
                 ‌  लेकिन इतना रक्तपात होने के बाद भी लोगों का खजाने के प्रति मोह कम नहीं होता और मौत की घाटी में कुछ और लोग भी पहुंचते हैं।(डंके की चोट)
          उपन्यास बहुत ही खौफनाक है जो पाठक को पृष्ठ दर पृष्ठ बदलने को मजबूर करता है। कहानी बहुत ही रोचक है।
               आखिर वह दुर्लभ खजा‌ना है क्या और कौन लोग हैं जो उस खजाने के लिए अपनी जान तक देने को भी तैयार हैं। ऐसे लोगों की दिलचस्प गाथा है 'हिमालय की चीख'।
   
निष्कर्ष-
         बसंत कश्यप का उपन्यास 'हिमालय की चीख' बहुत ही रोचक उपन्यास है। इसकी कहानी पाठक को स्वयं में बांधने में सक्षम है।  
           हालांकि इस उपन्यास की कथा इस में‌ पूर्ण होती प्रतीत होती है। लेकिन कहानी का यहीं समापन नहीं है। 'हिमालय की चीख' तो इस महागाथा की‌ भूमिका‌ मात्र कह सकते हैं।
         यह श्रृंखला बहुत ही रोचक और पठनीय है। इसमें तिलस्म, हाॅरर, जासूसी, हास्य आदि का समुचित मिश्रण है जो पाठक को वर्षों तक याद रहेगा।         
प्रथम भाग-    हिमालय की चीख
द्वितीय भाग-  डंके की चोट ( समीक्षा पढने के लिए शीर्षक पर  क्लिक करें)
तृतीय भाग-    तिरंगा तेरे हिमालय का (अप्रकाशित)
चतुर्थ भाग-    द लीजैण्ड आॅफ भारता
यह उपन्यास पढने के लिए मित्र विक्रम चौहान से मिली।
इस सीरिज पर 'बेव सीरिज' की चर्चा चल रहे है। (लेखक मतानुसार)
-------
उपन्यास- हिमालय की चीख
लेखक - बसंत कश्यप
प्रकाशक- गौरी पॉकेट बुक्स
पृष्ठ- 202


Monday, 11 June 2018

120. मौत के चेहरे- चंदर

लोकप्रिय जासूसी उपन्यास साहित्य में चंदर नाम काफी चर्चित रहा है। चर्चित होने के भी दो कारण है एक तो इनके जासूसी उपन्यास और द्वितीय कारण है चंदर के संयुक्त नाम से एक दम्पति उपन्यास लिखते थे। श्रीमती चन्द्रकांता जैन और आनंदप्रकाश जैन।
मेरे विचार से इस तरह के दम्पति द्वारा लिखे जाने वाला यह प्रथम प्रयास है।
अब चर्चा करते हैं उपन्यास 'मौत के चेहरे' की। यह एक थ्रिलर उपन्यास है और इसके नायक हैं भोलाशंकर जो भारतीय जासूसी संस्था 'स्वीप' के लिए कार्य करते हैं। यह भोलाशंकर सीरीज का सातवां उपन्यास है।
'इण्डियन एयरलाइंस के कैरेवल विमान को नई दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर अभी उतरने में पन्द्रह मिनिट शेष थे। (उपन्यास की प्रथम पंक्तियाँ)
      इस विमान में प्रसिद्ध जासूस भोलाशंकर अपनी महिला मित्र सविता के साथ उपस्थित था। इस विमान के अंदर के घटना घटित होती है। प्रथम दृष्टया वह एक सामान्य सी घटना नजर आती है लेकिन जैसे ही भोलाशंकर इसमें प्रवेश करता है तो वह घटना भारत के विरूद्ध एक अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र साबित होती है।
स्वीप संस्था द्वारा भोलाशंकर को इस केस की खोजबीन में नियुक्त किया जाता है।
        मेरे द्वारा पढा गया यह चंदर का प्रथम उपन्यास है।‌ लोकप्रिय जासूसी साहित्य में चंदर का एक समय विशेष नाम रहा है। जैसा सुना जाता है इनके उपन्यास और उपन्यास पात्र मौलिक होते थे। कहानी के स्तर पर भी उपन्यास अच्छे थे। चंदर उस दौर के लेखक हैं जब लोकप्रिय उपन्यास साहित्य का गढ इलाहाबाद होता था।
'मौत के चेहरे' उपन्यास की कहानी 'भाभा एटमिक रिसर्च सेंटर' के महत्वपूर्ण कागजात चोरी होने की है। उन कागजों के पीछे चीनी जासूस और अंतरराष्ट्रीय अपराधी संगठन 'टौंग' लगा हुआ है।
       एक घटना के तहत के कागज गायब हो जाते हैं। अब भारतीय जासूसी संस्था स्वीप भोलाशंकर को इन कगजों को वापस लाने की जिम्मेदारी सौंपती है।
         हालांकि यह थ्रिलर उपन्यास इसका घटनाक्रम तो उपन्यास के आरम्भ के पांच-दस पृष्ठों पर पता चल जाता है। शेष जो रहता है वह है एक त्रिकोणीय श्रृंखला। एक तरफ खतरनाक अपराधी संगठन टौंग है, एक तरफ चीनी जासूस हैं और एक तरफ भारतीय जासूस भोलाशंकर।
        अब देखना यह है की उन कागजों को चुराना किसने है, आगे वह कागज किसके पास पहुंचते हैं और भोलाशंकर कहां तक कामयाब होता है।
उपन्यास में 'टौंग दल' के सदस्यों को काफी प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया गया है। विशेष कर उनकी हत्या करने की कार्यशैली‌।


उपन्यास की एक विशेष कमी और विशेषता यह लगी की उपन्यास का अधिकांश घटनाक्रम जहाज में ही चलता है। पहला घटनाक्रम जहाँ जहाज में कागज गायब होते हैं वहीं द्वितीय घटनाक्रम भी जहाज में ही होता है। लगभग अस्सी फिसदी उपन्यास जहाज में चलता है।
         कहानी के स्तर एक बार पढे जाने वाला उपन्यास है। एक ही जगह और चुनिंदा पात्रों के आधारित उपन्यास में रोचकता कायम नहीं हो पाती। लेखक ने कुछ प्रयोग किये हैं लेकिन उनका कहीं उपयोग कहीं नजर नहीं आता।

यह एक मध्यम स्तर का थ्रिलर उपन्यास है। पढते वक्त न तो ज्यादा उत्सुकता रहेगी और न ही निराशा होगी। उपन्यास एक बार पढा जा सकता है।

उपन्यास- मौत के चेहरे
लेखक- चंदर
प्रकाशक- कुसुम प्रकाशन, इलाहाबाद
पृष्ठ- 160

119. एक्सीडेंट- एक रहस्य कथा- अनुराग कुमार जीनियस

रहस्य से भरी एक कहानी....
एक्सीडेंट-एक रहस्य कथा- अनुराग कुमार जीनियस, सस्पेंश, रोचक।
---------------
  भानुप्रताप के छोटे बेटे ऋषभ की सङक दुर्घटना में मौत हो गयी। लाश परिवार को सौंप दी गयी और उसका विधिवत अंतिम संस्कार कर दिया गया। पर अगले ही दिन उनके सामने जीता जागता ऋषभ वापस आ खङा हुआ, जिसे इस दुर्घटना के बारे में कुछ भी पता नहीं था।
वह असली ऋषभ था या बहुरुपिया, ये गुत्थी तेज तर्रार पुलिस इंस्पेक्टर दुर्गेश से भी नहीं सुलझ पाई।
  एक अनोखी कहानी, जिसका रहस्य अंत पढे बगैर नहीं जाना जा सकता। (उपन्यास के अंतिम आवरण पृष्ठ से)
      
         युवा उपन्यासकार अनुराग कुमार जीनियस का ' एक लाश का चक्कर' के बाद यह दूसरा उपन्यास है। जहाँ उनका प्रथम उपन्यास इतनी गहरी कहानी लिये हुये था, लेकि‌न पात्र और पृष्ठ संख्या की अधिकता के कारण रोचकता बरकरार न रख पाया वहीं इनका द्वितीय उपन्यास 'एक्सीडेंट- एक रहस्य कथा' वास्तव में रहस्य से भरपूर है। लेखक ने कहानी पर पूरा नियंत्रण रखा है। अनावश्यक पात्र और कहानी के अनावश्यक विस्तार से बचाव रखा है।
    
               उपन्यास की कहानी युवा ऋषभ के एक्सीडेंट से होती है, उसे मृत मान कर उसकी कथित लाश का अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। लेकिन इन सबसे अनजान ऋषभ आगामी दिन घर लौट आता है।
'य..ये ..ये  सब क्या है? मेरी तस्वीर पर माला क्यों टांगी गयी है? ऐसा तो तब होता है जब कोई मर जाता है।"
"तुमने बिलकुल ठीक कहा। किसी की तस्वीर पर माला तभी टांगी जाती है जब वह मर जाता है।"- दुर्गेश ने कौतुहल को मन में दबाकर कहा।
" फ...फिर मेरी तस्वीर पर माला क्यों टांगी गयी है?"- वह गुस्से में घरवालों पर नजरें गङाते हुए बोला।
"क्योंकि तुम मर गये थे?"
"क्या! क्या कहा?...मैं मर गया था। ऋषभ उछल पङा।  (पृष्ठ-15)
        
- आजकल देश में लङके-लङकियों की औसत लंबाई में भारी कमी आयी है और इस तरफ किसी का  ज्यादा - कि ऐसा क्यों हो रहा है-  ध्यान भी खींचा नहीं जान पङता। एक दिन ऐसा भारत दूसरा चीन - लंबाई के मामले में - न बन जाए। (पृष्ठ-109)
         लेखक ने कम शब्दों में एक गंभीर बात को रेखांकित किया है। आजकल लंबाई के साथ-साथ असमय बाल सफेद होना, नजर कमजोर होना जैसे कई रोग प्रचलन में हैं लेकिन इस तरफ कोई भी ध्यान नहीं देना चाहता। हम भौतिकता की दौङ में इतना खो गये की स्वयं को ही भूल गये।
  ‌लेखक को एक विशेष विषय पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए धन्यवाद।
       उपन्यास में बहुत सी जगह रोचक प्रसंग हैं जो पाठक को सहज की आकृष्ट कर लेते हैं। विशेष कर लाली और इंस्पेक्टर दुर्गेश के रोचक दृश्य पाठक को प्रभावित करने में सक्षम हैं।
उपन्यास में शाब्दिक गलतियाँ-
     हालांकि यह सामान्य गलतियाँ है इन्हें नजरांदाज किया जा सकता है।
शाम को थाने से फोन आया कि मिट्टी थाने आ गयी।(पृष्ठ- 12)
- मिट्टी शब्द सामान्य ग्रामीण परिवेश में प्रयुक्त होता है। यहाँ लाश/शव शब्द ज्यादा उपयोगी था।
- लाली ने पल्लो ठीक कर लिया था। (पृष्ठ-17)
-  यहाँ पल्ला शब्द आना था।
- दरवाजा आॅटोमेटिक था अपने आप उडक गया था।(पृष्ठ-36)
- आपकी बात सही है ऋषभ से शादी की बात करी गयी है...।(पृष्ठ-40)
- निशान। ऋषभ की जांघ पर कटे का निशान है। (पृष्ठ- 67)
उपन्यास में जांघ और नितंब शब्द में‌ लेखक बहुत ज्यादा असमंजस में‌ नजर आता है। कहीं जांघ शब्द लिखता है, तो कहीं जांघ को नितंब। एक बार नहीं कई बार।
          अनुराग कुमार जीनियस का प्रस्तुत उपन्यास 'एक्सीडेंट-एक रहस्य कथा' वास्तव में उतना जबरदस्त रहस्य लिए हुए है की पाठक क्लाइमैक्स पर चौंकता है, बुरी तरह से चौंकता है। 
                 पाठक उपन्यास पढते वक्त स्वयं एक जासूस होता है, वह भी उपन्यास के अंत से पहले असली अपराधी तक पहुंचना चाहता है लेकिन इस उपन्यास में पाठक बहुत कोशिश बाद भी असली अपराधी तक नहीं पहुंच पाता।
          कभी-कभी, कहीं-कहीं लगता है की जैसे ऋषभ एक बहरुपिया है तो कहीं -कहीं लगता है उसके साथ कोई हादसा पेश आया है। ऋषभ का परिवार और पुलिस तक भी इस घटना को समझने में नाकाम रहती है।
       एक समय ऐसा आता है जब विश्वास हो जाता है की ऋषभ सही है कोई बहरुपियां नहीं है लेकिन अगले ही पल ऋषभ कोई न कोई ऐसी गलती कर जाता है की वह एक फ्राॅड लगने लगता है।
           अब सत्यता क्या है यह तो उपन्यास पढकर ही जाना जा सकता है। लेकिन इतना तय है की पाठक जब क्लाईमैक्स पढेगा तो स्वयं आश्चर्यचकित रह जायेगा। उपन्यास अंतिम चरण में पहुंच कर बहुत ज्यादा घुमाव लेती है।
निष्कर्ष-
     प्रस्तुत उपन्यास बहुत रोचक और पठनीय है। इसकी कहानी वास्तव में एक रहस्य लिए हुये है और जब यह रहस्य खुलता है तो पाठक चंभित रह जाता है।
       उपन्यास पाठक का भरपूर मनोरंजन करने में सक्षम है।
------
उपन्यास- एक्सीडेंट- एक रहस्य कथा।
लेखक- अनुराग कुमार जीनियस
संस्करण- प्रथम, जनवरी-2018
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स-
पृष्ठ-205
मूल्य- 150₹
संपर्क-
लेखक- anuragkumargenius5@gmail.com
प्रकाशक- soorajpocketbooks@gmail.com