सुनील लंदन में
आखिरी शिकार- सुरेन्द्र मोहन पाठक
सुनील सीरीज- 38
सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के सुनील सीरीज के 'आखिरी शिकार' उपन्यास के साथ एक बार फिर हम उपस्थित हैं। प्रस्तुत उपन्यास अंतरराष्ट्रीय जासूसी पर आधारित एक स्पाई थ्रिलर उपन्यास है।चीनी एजेंटों के चंगुल में फंसी दस स्पाई एजेंटों की एक भारतीय टीम जैसे-तैसे करके आजाद तो हो गयी लेकिन इसके लिये उनको भारी कीमत चुकानी पड़ी । टीम के सदस्यों का मानना था कि टॉर्चर से बचने हेतु उन्हीं की टीम का एक सदस्य चीनियों से जा मिला था और वही अब अपने राज को राज रखने के लिये एक-एक करके उनको खत्म करता जा रहा था । क्या सुनील गद्दार को अपने आखिरी शिकार तक पहुंचने से रोक पाया ?
उपन्यास की समीक्षा से पूर्व हम उपन्यास के प्रथम दृश्य को देखते हैं और जानते हैं कैसे लंदन में सुनील अपने अभियान पर निकलता है।
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आखिरी शिकार- सुरेन्द्र मोहन पाठक |
सुनील ने हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठा लिया।
"हैलो।" वह माउथपीस में बोला।
"मिस्टर सुनील!" - लगभग फौरन उसे दूसरी ओर से एक सशंक ब्रिटिश स्वर सुनाई दिया।
"यस?" - सुनील बोला ।
“मैं लन्दन में आपका स्वागत करता हूं।" - दूसरी ओर से आवाज आई।
सुनील के कान खड़े हो गये। कर्नल मुखर्जी ने भारत में उसे जिस संभावित वार्तालाप के विषय में बताया था, वह उस वार्तालाप का प्रथम वाक्य था।
"धन्यवाद ।”- सुनील भावहीन स्वर से बोला- "लेकिन लन्दन में मेरा स्वागत करने के अतिरिक्त और क्या कर सकते हो?"
“मैं बहुत कुछ कर सकता हूं, सर।" - उत्तर मिला- "जैसे मैं आपको लन्दन का वह चेहरा दिखा सकता हूं जो बहुत कम लोगों ने बहुत कम बार देखा है।"
वार्तालाप ठीक उसी ढंग से चल रहा था जैसा कर्नल मुखर्जी ने उसे संकेत दिया था।
"बदले में मुझे क्या करना होगा?" - सुनील ने पूछा।
(आखिरी शिकार- सुरेन्द्र मोहन पाठक,प्रथम पृष्ठ से)
नमस्ते पाठक मित्रो,
सुरेन्द्र मोहन पाठक जी द्वारा लिखे गये 'सुनील सीरीज -38' उपन्यास 'आखिरी शिकार' की चर्चा हम करने जा रहे हैं । यह उपन्यास सुनील का अंतरराष्ट्रीय अभियान है और इसमें सुनील 'C.I.B. की ब्रांच 'स्पेशल इंटेलीजेंस' के डायरेक्ट कर्नल मुखर्जी' की तरफ से लंदन में एजेंट की रक्षार्थ वहां पहुंचता है।
लन्दन में कामनवैल्थ के प्रधान मन्त्रियों की कान्फ्रेंस जारी थी और सुनील उसी कान्फ्रेंस को कवर करने के लिये अपने अखबार 'ब्लास्ट' द्वारा भेजा गया था। वह प्रेस के अन्य प्रतिनिधियों के समूह में प्रधानमंत्री के साथ ही लन्दन आया था। भारतीय न्यूज एजेन्सियों और अन्य अखबारों के लगभग सभी प्रतिनिधि होटल क्राउन में ही ठहरे हुये थे।(उपन्यास अंश)
शीघ्र ही सुनील अपने अभियान पर कार्यरत हो हाता है और एक एजेंट के माध्यम से 'दस एजेंट ग्रुप' के पास पहुंच जाता है। (ऊपर आप उपन्यास के प्रथम दृश्य में देख चुके हैं कैसे सुनील से एजेंट सम्पर्क करता है)
यहां आकर सुनील को पूरी कहानी मालूम होती है।
"हम दस आदमी थे"- जान फ्रेडरिक बोला “जो भारत के लिये चीन में एक लम्बे अरसे से जासूसी कर रहे थे। हम दस आदमियों में तीन हिन्दोस्तानी थे, दो चीनी थे, दो अरब थे, दो अंग्रेज थे और एक थाईलैंडवासी था। हिन्दोस्तानियों में से अनिल साहनी और रोशनी तुम्हारे सामने बैठे हैं। ज्योति विश्वास को मरे एक साल हो गया है। दो चीनी थे ली ता नान और तांग पेई। दोनों मर चुके हैं-ली ता नान को मरे एक साल हो गया है और तांग पेई कुछ दिन पहले मरा है। दो अरब थे-लैला नाम की एक युवती और तौफीक इस्माइल नाम का एक युवक । लैला तौफीक इस्माइल की प्रेमिका थी। लैला को मरे एक साल हो गया है और तौफीक इस्माइल कुछ ही दिन पहले मरा है। दो अंग्रेजों में से एक मैं तुम्हारे सामने बैठा हूं और दूसरा था जार्ज टेलर जो कि लापता है। थाईलैंडवासी का नाम जे. सिंहाकुल था। वह भी कुछ दिन पहले दूसरी दुनिया में पहुंच गया है।"(उपन्यास अंश)
कहते हैं और हम सुनते हैं कि चीन देश में दस में से तीन एजेंट पकड़े गये थे और तीन वहां मारे गये और अंत में छह एजेंट चीन से भागकर लंदन पहुंच गये। लेकिन यहां भी किस्मत ने ऐसा दगा दिया की एक-एक कर उन एजेंटों को मौत के घाट उतार दिया गया। ऐसे समय में शेष बचे तीन एजेंट सुनील की मदद लेते हैं और अपने आखिरी शिकार को ढूंढने की कोशिश करते हैं।
अब आखिरी शिकार होता कौन है और उसे कैसे पकड़ा जाता है यह रोचक और पठनीय विषय है।
उपन्यास की कहानी काफी रोचक है और एक बार पढने के बाद आप प्रवाह में बहते चले जाते हैं । जहाँ आरम्भ में कहानी साधारण सी नजर आती वहीं अंत तक पहुंचते-पहुंचते कहानी में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं की पाठक चकित रह जाता है ।
सुनील 'ब्लास्ट' नामक समाचार पत्र का रिपोर्टर है लेकिन आरम्भिक उपन्यासों में वह 'C.I.B. की ब्रांच 'स्पेशल इंटेलीजेंस' के डायरेक्ट कर्नल मुखर्जी के कहने पर कुछ अंतर्राष्ट्रीय/ अंतरराष्ट्रीय अभियानों मॆं काम कर चुका है। प्रस्तुत उपन्यास में भी वह कर्नल मुखर्जी के कहने पर ही इस अभियान का हिस्सा बनता है।
जैसे ही सुनील लंदन में अभियान पर सक्रिय होता है वैसे ही दूसरा ग्रुप सुनील को लंदन से बाहर निकालने में सफल हो जाता है।
उसके बाद सुनील का पुनः अभियान पर लौटना और पुलिस द्वारा सुनील को ढूंढना मुख्य कथा में ट्विस्ट ले आता है। जहां सुनील को 'दस एजेंट ग्रुप' की मदद करनी है वहीं उसे स्वयं को पुलिस से बचाना भी है ।
आखिरी शिकार की तलाश में निकले दोनों ग्रुप्स की यह कहानी मनोरंजक है। उपन्यास का अंत प्रभावित करने में सक्षम है।
उपन्यास- आखिरी शिकार
लेखक - सुरेन्द्र मोहन पाठक
प्रकाशक- तुलसी साहित्य पब्लिकेशन्स, मेरठ
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