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Tuesday, 18 November 2025

आग का समंदर- कर्नल रंजीत

इस शहर में लोग आत्मदाह कर रहे थे 
आग का समंदर - कर्नल रंजीत

उस शहर में हर कोई जल रहा था । सरे आम लोग स्वयं पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा रहे थे और प्रशासन चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। मौत का यह खेल तब तक जारी था तब मेजर बलवंत ने इसकी तह में जाकर रहस्य को उजागर नहीं कर दिया।

कर्नल रंजीत की कलम से निकला मेजर बलवंत सीरीज का एक ज्वलंत उपन्यास 'आग का समंदर' ।

आकाश पर छाई घटाओं ने उस अंधेरी रात के अधकार को और अधिक बढ़ा दिया था। हल्की-हल्की बूंदाबांदी शुरू हो चुकी बी। मौसम हर पल और अधिक खराब होता चला जा रहा था।
       इण्टरनेशनल एयरपोर्ट पर मौसम खराब होने के कारण कई उडाने स्थगित कर दी गई थी। और जो विमान एयरपोर्ट पर लेड कर रहे थे वे भी बहुत ही सावधानी से उतर रहे थे।
एयरपोर्ट के लांज में एक टेबल के गिर्द बैटे पांचों नौजवानों की नजरें थोड़ी-थोड़ी देर के बाद अपनी कलाई पर बंधी घड़ियों की ओर उठ जाती थीं, और फिर वे एक लम्बी सांस छोड़कर नई सिगरेट सुलगाने लगते थे।


विमान के आने का समय तो ठीक नौ बजे था। लेकिन अब तो साढ़े दस बज चुके हैं।" एक नौजवान ने गठीले बदन के दूसरे नौजवान की ओर झुककर बहुत ही धीमी आवाज में कहा, "कहीं ऐसा तो नहीं कि दुबई में भी इसी तरह मौसम खराब हो गया और उड़ाने कैसिल कर दी गई हो?"

"नहीं भई, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं इन्क्वायरी ऑफिस से पूछ चुका हूं। दुबई में मौसम साफ है और विमान दुबई एअरपोर्ट से फ्लाई कर चुका है।" गठीले बदन के नौजवान ने तसल्ली देने वाले अन्दाज में कहा, "हां, यह अलग बात है कि रास्ते में मौसम की खराबी की वजह से विमान की रफ्तार काफी धीमी करनी पड़ी हो। वरना विमान के न आने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है ।"
"जब इतनी देर इन्तजार किया है तो थोड़ी देर और सही." लम्बे कद के एक नौजवान ने कहा और सिगरेट ऐश ट्रे में मसलकर नई सिगरेट सुलगाने लगा
। (आग का समंदर- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)
  लोकप्रिय कथा साहित्य में कर्नल रंजीत अपने विचित्र कथानक के लिए विशेषरूप से चर्चित रहे हैं । इनकी कहानियाँ उलझावपूर्व होने के साथ-साथ देश के विभिन समस्यों, घटनाओं को भी समाहित करती हैं। प्रस्तुत उपन्यास 'आग का समंदर' मनुष्य के स्वार्थ का भयंकर मंजर प्रस्तुत करता है।
कहानी आरम्भ होती है डाक्टर मोदी के अपहरण से। डाक्टर मोदी अपने आविष्कार से भारत देश को समृद्ध करना चाहते हैं और इनके आविष्कार को अपहरणकर्ता हथियाना चाहते हैं। लेकिन डाक्टर मोदी का स्पष्ट उत्तर था-
"मिस्टर विलियम, मैंने आपको पहले ही जवाब दे दिया था। मेरी खोज मेरे देशवासियों के लिए है। उस खोज द्वारा मैं अपने देश की सेना के जवानों और अफसरों को एक ऐसा कवच, पहना देना चाहता हूं जिस पर किसी भी गोली, बम या गैस का प्रभाव न पड़ सके। जो उनके बदन को सम्पूर्ण आघातों से सुरक्षित रख सके। मेरी वह खोज तुम जैसे अन्तर्राष्ट्रीय अपराधियों के लिए नहीं है," कहते-कहते डॉक्टर मोदी का दुबला-पतला शरीर उत्तेजना से कांपने लगा।(उपन्यास अंश)
    वहीं एक और घटना घटित होती है। वह है सुषमा नामक एक युवती की जिसने अपने पति और उनके दोस्तों पर जानलेवा हमला किया।
कोर्ट में उपस्थित युवती की बात भी सुनी जाये-
"पुलिस ने तुम पर चार्ज लगाया है कि तुमने इस शहर के तीन नौजवानों को जान से मार डालने की कोशिश की थी जिनमें एक तुम्हारा पति भी है। ये सभी नौजवान शहर के सम्भ्रान्त, साधनसम्पत्र और सम्मानित परिवारों के नौजवान हैं। सभी उच्च शिक्षा प्राप्त हैं और अपने-अपने पिता के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।"
मजिस्ट्रेट की बात सुनकर युवती चौंक पड़ी। फिर उसके मुंह से एकदम निकला, "मैंने इन लोगों को मारने की कोशिश की, यानी लोग मरे नहीं, अभी जिंदा है ?" 
  डाक्टर मोदी की बेटी का नाम रंजना है। रंजना के साथ उसकी मम्मी है और स्वयं डाक्टर मोदी लापता है। एक संयोग के चलते रंजना और सुषमा की मुलाकात होती है। सुषमा वही है जिस पर हत्या के आरोप हैं।
  वहीं शहर में एक और भयंकर समस्या चल रही है।
'पूरे देश में अचानक एक भयानक हंगामा मच गया था। सबसे पहले किए गए आत्मदाह के बाद आत्मदाह की घटनाओं की जैसे बाढ़ आ गई थी।'
यह घटनाएं शासन- प्रशासन को हिलाने के लिए पर्याप्त थी और घटना कोई एक होती तो बात अलग थी यह तो एक सिलसिला बन गया था और न तो इसका कारण पता चल रहा था और  न ही यह सिलसिला खत्म हो रहा था ।
इन घटनाओं ने आत्मदाह को संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया था और यह संदेह का घेरा तब और विस्तृत होता चला गया, जब आये दिन किसी-न-किसी युवती की जली-अधजली लाश पुलिस को जहां-तहां मिलने लगी। उन लाशों के पास बस एक छोटी-सी चिट पुलिस को मिलती जिस पर लिखा होता, 'मैं विरोध में आत्मदाह कर रही हूं' लेकिन उस स्लिप पर आत्मदाह करने वाली युवती का जो नाम-पता लिखा होता था, पुलिस द्वारा छानबीन करने पर या तो उस नाम की कोई युवती ही न मिलती या फिर वह पता गलत होता। उनमें से कुछ ऐसी अधजली युवतियां भी मिलीं थी, जो मरते दम बड़ी कठिनाई से बस इतना ही कह पाई थीं, "मुझे जलाया गया है।" लेकिन किसने जलाया, क्यों जलाया इस सम्बंध में कुछ बताने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई थी।"
  - इन आत्मदाह की घटनाओं के पीछे आखिर था कौन ?
-  डाक्टर मोदी का अपहरणकर्ता कौन थे ?
सरकार ने मेजर बलवन्त को डॉक्टर मोदी की खोज के लिए बुलाया था। लेकिन राजधानी में बढ़ती हुई आत्महत्या की घटनाओं की जांच-पड़ताल का काम भी उसे सौंप दिया गया।
      और इस तरह इस कहानी में मेजर बलवंत का प्रवेश होता है। और जब मेजर बलवंत का प्रवेश होता है तो कुछ नये रहस्य भी सामने आते हैं। मेजर बलवंत की भागदौ़ड़ उस दिन कामयाब होती है जब डाक्टर मोदी के घर पर हमला होता है। उपन्यास का यह विवरण स्मरणीय है। यहां डाक्टर मोदी के कुत्तों का कमाल, डाक्टर मोदी की सूझबूझ और वैज्ञानिक आविष्कार काम आते हैं जो काफी प्रभावित करते हैं।
मेजर बलवंत को भी यहाँ से एक रास्ता नजर आता है और वह रास्ता है उन अपराधियों द्वारा वास्तविक अपराधी तक पहुंचने का ।
मेजर बलवन्त ने उसके सिर को एक और झटक दिया और गुर्राकर बोला, "तुम शायद नहीं जानते, मेरा नाम मेजर बलवन्त हैं। इस नाम को सुनते ही दुनिया के बड़े-से-बड़े अपराधी के होश फाख्ता हो जाते हैं।"
   मेजर बलवंत के सामने अपराधी कब तक टिकते लेकिन वास्तविक अपराधी तो अभी बहुत दूर था। बहुत दूर था सुषमा के ससुराल वालों का कर्मकाण्ड, बहुत दूर था डाक्टर मोदी का पता और बहुत दूर था शहर में होने वाले अग्निदाह की सच्चाई का पता ।

    अंततः मेजर बलवंत अपनी टीम के साथ वास्तविक अपराधी को जब सामने आता है और एक कड़की सच्चाई से जनता को अवगत करवाता है तो जनता की मनुष्य की भौतिक लिप्सा, गिरती मानवता और खत्म होते रिश्तों पर  बढते धन के मोह से विचलित हुये बिना नहीं रह पाती ।
उपन्यास का कथानक काफी रोचक और उलझाव लिए हुये है। कहानी एक अपहरण से आरम्भ होकर देश की अखण्डता से जा मिलती है और सामने आते हैं ऐसे लोग जो देश की अखण्डता और सुरक्षा के किए घातक हैं।
   उपन्यास में कुछ बातें मानवीय पक्ष को बहुत अच्छे से प्रस्तुत करती है ।
विवाह के प्रति सुषमा के विचार पढनीय है-
"तुम जानती हो कि अदालत में झूठ बोलने का अंजाम क्या होता है?"
"जी हां, जानती हूं। इसीलिए सच कहती हूं मी लार्ड। विवाह पति-पत्नी के बीच एक समझौता होता है। एक पार्टानरशिप होती है। और जब उन दोनों में से कोई भी एक  पार्टनरशिप या समझौते के नियमों को भंग कर देता है तो पार्टनरशिप खत्म हो जाती है। वह व्यक्ति पार्टनर होने का अधिकार खो बैठता है। इसलिए मैंने निवेदन किया है कि अब मैं विवाहित नहीं हूं और न कोई मेरा पति है।"

मेजर बवलंत के मानवतावादी विचार देखें-
मैं तो समूचे संसार के मनुष्यों को एक ही मानता हूं। वास्तव में उनकी एक ही जाति है-मानव जाति। मेरे लिए न कोई ऊंचा है न नीचा है। न कोई छूत है न अछूत है। आत्मदाह करने वालों को मैं कायर मानता हूं। कर्मक्षेत्र से पलायन वीरता का नहीं कायरता का प्रतीक होता है विलियम ।" डॉक्टर मोदी ने दृढ़ता भरे स्वर में कहा, “मैं ऐसे लोगों पर थूकता हूं जो परमात्मा की बनाई हुई जाति में भेद की दीवारें खड़ी करते हैं।"
   कर्नल रंजीत के उपन्यासों में कुछ न कुछ रहस्यमयी अवश्य होता है। हालांकि प्रस्तुत उपन्यास थ्रिलर ज्यादा है लेकिन एक अंश यहाँ भी रहस्यमयी है-
-वह हड़बड़ाकर उठ बैठे।
उन्हें लगा जैसे उनका लम्बा-चौड़ा बेडरूम भयानक अट्टहास करते भूत-प्रेतों, शंखिनी-डंकनियों से भर गया हो। कभी स्त्रियों, पुरुषों और बच्चों के बिलख-बिलखकर रोने की आवाजें सुनाई देने लगतीं तो कुछ पल के बाद ही दिल दहला देने वाले ठहाकों तथा चीत्कारों में डूब जाता।

   कर्नल रंजीत द्वारा रचित उपन्यास 'आग का समंदर' इस दृष्टि से आग का समंदर है की शहर में कहीं न कहीं कोई न कोई आत्मदाह कर रहा है। सारा शहर आग का समंदर ही बन चुका है। और इसी आग के समंदर में से मेजर बलवंत को ढूंढना है उस आदमी को जो इस शहर को आग का समंदर बना रहा है।
    भारत की एकता और अखण्डता को अक्षुण्ण रखने के लिए संघर्षरत मेजर बलवंत का यह उपन्यास काफी रोचक है।

उपन्यास- आग का समंदर
लेखक-   कर्नल रंजीत
पृष्ठ-       140
प्रकाशक- मनोज पब्लिकेशन, दिल्ली

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अधूरी औरत ।। रेत की दीवार ।। देख लिया तेरा कानून ।। रात के अंधेरे में ।।

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