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Sunday, 16 November 2025

रात के अंधेरे में - कर्नल रंजीत

कहानी एक गर्वीली हत्यारिन की 
रात के अंधेरे में - कर्नल रंजीत

" बताओ अप्सरा की बेटी कौन है ?" मेजर ने पूछा।
"मैं यह कभी नहीं बताऊंगी।" मिसेज निगाम्बो ने कहा।
मेजर कुछ और कहना ही चाहता था कि कानों के पर्दे फाड़ डालने वाली चीख सुनाई दी।
और अभिनेता वेद प्रकाश की बांहों में आ गिरी।
"बे सिर पैर की औरत ?"
"हां, बेसिर-पैर की। वह खुली आस्तीनों वाला सुर्ख गाउन पहने थी। दोनों हाथों पर दस्ताने। दस्तानों पर खून। गाउन के कॉलर खड़े हुए, लेकिन खड़े कॉलरों -के बीच न गर्दन, न चेहरा, न सिर।"

एक से एक बढ़कर अविश्वसनीय किन्तु सत्य घटनाओं से भरपूर जासूसी उपन्यास ।

कर्नल रंजीत की अद्भुत रहस्यमयी लेखनी का नवीनतम चमत्कार - रात के अंधेरे में ।

लोकप्रिय कथा साहित्य में कर्नल रंजीत का नाम अदभुत कथा‌नक के लिए याद किया जाता है। इनके उपन्यासों के कथानक और पात्र दोनों ही विचित्र होते हैं। ऐसा ही विचित्रता से भरा हुआ एक उपन्यास है 'रात के अंधेरे में' । यह श्री लंका की पृष्ठभूमि पर आधारित रहस्य और रोमांचक से भरपूर उपन्यास पठनीय है।

तो हम पहले 'रात के अंधेरे में' उपन्यास के प्रथम अध्याय 'दो चीखें' का आरम्भिक अंश पढते हैं।

दो चीखें
वह चमकीला दिन था। सुहानी धूप खिली हुई थी। मेजर, मालती, डोरा, सुधीर और सोनिया बंगले के लॉन में दोपहर का खाना खा रहे थे। डोरा की नजर बंगले के गेट पर पड़ी, जिसमें से एक लम्बे कद का सुन्दर-सजीला नौजवान तेज-तेज कदम उठाता हुआ उनकी ओर आ रहा था।
मालती ने अपनी आंखों पर हाथ रखकर उस नौजवान की ओर देखा तो उसने हाथों में पकड़े छुरी-कांटे प्लेट में रख दिए और नेपकिन से अपने होंठ पोंछती हुई उस नौजवान की ओर दौड़ी।
"मालती को क्या हुआ ?" सोनिया बोल उठी।
"देखती नहीं सोनिया, कौन आ रहा है?" डोरा ने कहा, "केमिकल इंजीनियर सुनील ! मालती दौड़ती हुई गई है। अगर उसके पंख लग जाते, तो वह उड़कर इस नौजवान के पास पहुंच जाती।"
डोरा हंसने लगी।
सबकी नज़रें मालती और उस नौजवान की ओर उठ गई थीं। सुनील और मालती एक-दूसरे से लिपट गए थे। उन दोनों के होंठ आपस में मिल गए थे। मालती के बदन में खुशी और जोश से थरथरी पैदा हो गई थी। सुनील की बांहें भी गरमाई हुई थीं।
वे दोनों बांहों में बांहें डालकर आ रहे थे। दोनों के चेहरे खुशी से चमक रहे थे।
डोरा, सोनिया और सुधीर सुनील को देखकर बहुत खुश हुए । उन्होंने पुकारकर कहा,-"सुनील‌ भैया ।"
सुनील ने उन सबको हाथ जोड़कर नमस्ते की और मेजर बलवंत के पांव छुए । (रात के अंधेरे में उपन्यास का प्रथम पृष्ठ)

    कैमिकल इंजीनियर सुनील को एक काम हेतु श्रीलंका जाना था और वह चाहता था कि मालती भी उसके साथ चले। वहीं एक और दल भी श्री लंका जा रहा था ।
भारत सरकार की ओर से नाटककारों की एक पार्टी और श्रीलंका जा रही है। नाटककारों का यह दल भारत और श्रीलंका के सांस्कृतिक सम्बन्धों को और भी सुदृढ़ बनाएगा। (पृष्ठ- 06)
नाटकदल में विभिन्न कलाकार शामिल थे ।
भारतीय नाटककारों के दल में चार मुख्य अभिनेता और तीन मुख्य अभिनेत्रियां थे। इनके अतिरिक्त दस-बारह छोटे-बड़े अभिनेता और अभिनेत्रियां और भी थे। छः-सात प्रबन्धक और अन्य लोग थे।
नाटककारों के दल की मुख्य अभिनेत्रियों में मिस अनुराधा वासुदेवन, मिस रोहिणी नागर और मिसेज अंजली निगम थीं और मुख्यं अभिनेताओं में प्रभाकर ओहरी, वेदप्रकाश सभरवाल और विजय गायकवाड़ थे।
(पृष्ठ-7,8)
   श्रीलंका के प्रसिद्ध व्यापारी और पूर्व सफल वकील कभी नाटक के एमेच्योर आर्टिस्ट रह चुके थे -मिस्टर घपूरा ने श्रीलंका सरकार से प्रार्थना की थी कि भारतीय नाटककारों का दल उनके बंगले में ठहराया जाए।(पृष्ठ-07)
    और इस तरफ भारतीय नाट्य दल के साथ मालती और सुनील भी मिस्टर घपूरा के आलिशान-विशाल बंगले में स्थान पा गये थे ।
मिस्टर घपूरा की पत्नी मैथानी जवान थी और स्वयं मिस्टर घपूरा साहब पचास की उम्र के थे । और उनके परिवार में दो बेटियां थी,जो लगभग 21-24 वर्ष की थीं।
    और यहीं से ही मिस्टर घपूरा के परिवार में रहस्यमयी और विचित्र घटनाएं घटित होनी आरम्भ हो जाती हैं,घटनाएं मानों भारतीय दल के इंतजार में ही थी और इन घटनाओं का आरम्भ भी भारतीय नाटकदल के सदस्यों के साथ ही होता है । और पहली घटना घटित होती है अभिनेत्री अनुराधा के साथ ।
"बहुत ही डरावनी चीज़ थी। मैं पलंग पर बैठी बिस्तर की सलवटें हठा रही थी कि मुझे अपने कमरे की खिड़की पर रहस्यपूर्ण सरसराहट महसूस हुई। मैंने खिड़की की ओर नजर उठाई। खिड़की में एक भयानक आदमी खड़ा था। वह एक अमानवीय और किसी खूंखार जानवर से मिलता-जुलता था। वह अपने होंठों पर जीभ फेर रहा था, पागल की तरह। उसका चेहरा बहुत ही भयानक था और शैतान जैसा था। अंधेरे में उसकी आंखें जानवरों की आंखों की तरह चमक रही थीं। मैं चीखी तो वह दबी-दबी हंसी हंसने लगा। मुझे यहां से वापस भेज दो ! मुझे बचाओ !"(पृष्ठ-10)
     और फिर तो पूरी नाटक मंडली और घर परिवार में यह बात चर्चा का विषय बन जाता है की अनुराधा ने एक रहस्यमयी जानवर को देखा है। तो कोई उसे रहस्यमयी आदमी बताता है , लेकिन जो भी था वह था रहस्यमयी । अभी रात बाकी थी और घटनाएं तो जैसे भारतीय लोगों की परीक्षा ले रही थी। कुछ समय पश्चात मालती ने भी कहा की उसने मिस्टर घपूरा की लाश देखी है और लाश को घसीटने वाले दूसरे ग्रह के निवासी थे।
है ना यह सब विचित्र । और सोचिए वहां रहने वाली नाटकदल को यह सब कितना विचित्र लगा होगा । विचित्र तो मिस्टर घपूरा और उ‌नके परिवार को भी लगा।

लेकिन ठहरो जरा,
अभी रात बाकी है और बात भी बाकी है।
   अब जो घटना घटित होती है वह घटित होती है मिस्टर घपू्रा की बेटी कौशाम्बी के साथ । कौशाम्बी के अनुसार उसने बिना पैर का आदमी देखा है। 
एक उदाहरण देखें-
"इस खिड़की में... "अंजली ने तुतलाते हुए कहा, "इस खिड़की में एक औरत खड़ी थी, जिसका सिर नहीं था।"(65)
    जहां बिना सिर के, बिना पैर के आदमी हों,जहां दूसरे ग्रह के आदमी लाश को घसीट रहे हों और वह आदमी बाद में जिंदा नजर आये तो... सोचो... उन लोगों की क्या दशा होगी ? कितना भयभीत होंगे, कैसे समय बिताया होगा ।
    और जब ऐसे घटनाएं निरंतर श्रीलंका के प्रतिष्ठित व्यापारी के घर पर घटित हो रही हॊं तो स्वाभाविक है वह इनका समाधान भी खोजेगा और वह समाधान के लिए किसी तांत्रिक के पास तो नहीं जायेगा, वह निश्चित ही किसी बुद्धिमान जासूस से संपर्क करेगा ।
"मैं किसी साधारण जासूस को यहां बुलाना नहीं चाहता। मैं नहीं चाहता कि वह अपने ऊटपटांग प्रश्नों से हमें परेशान करे और हमारा समय नष्ट करे। मेजर बलवन्त को आमन्त्रित किया जाए तो क्या वह मेरा निमंत्रण स्वीकार कर लेंगे ?"
मेजर बलवंत ने मिस्टर घपूरा का आमंत्रण स्वीकार किया और अपनी टीम सोनिया, सुधीर, डोरा और कुत्ते क्रोकोडायल के साथ आ पहुंचा श्रीलंका में मिस्टर घपूरा के घर ।
यहां पर मेजर बलवंत को मिस्टर से मिस अप्सरा के विषय में पता चलता है और पता चलता है एक गर्वीली हत्यारिन विषय के बारे में ।
"हां। मिस अप्सरा अपूर्व सुन्दरी थी। उसके रूप-सौन्दर्य, नाज़ और अदाओं की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई थी। उस समय उसकी आयु 23 वर्ष की थी। उसके विषय में प्रसिद्ध था कि वह शराब पीने में मर्दों को हरा देती है और नशे में कभी-कभी भड़क उठती है। उसके हाथ और बाजू सुडौल और आकर्षक होते हुए भी बहुत ही मजबूत और ताकतवर थे।" मिस्टर घपूरा ने अपने हाथों की ओर देखा और मुट्ठियां भींच लीं। (पृष्ठ-30)
   फिर आरम्भ होती है मेजर बलवंत की कार्यवाही । और उनकी सघन खोजबीन से एक बात स्पष्ट होती है।- घपूरा परिवार का हर सदस्य स्वयं अपने आप में एक कहानी था (56)
   मेजर बलवंत जैसे जैसे आगे बढते हैं वैसे वैसे हत्याओं और विचित्र घटनाओं का दौर शुरु हो जाता है। मेजर बलवंत भी इन घटनाओं से चकित रह जाते हैं। लेकिन पमे बुद्धिकौशल औ साथियों के सहयोग से मेजर बलवंत गर्वीली हत्यारिन, अप्सरा की बेटी,बेसिर-पैर के लोग, दुसरे ग्रह के लोग और हत्यारे की पहेली को हल कर ही लेते हैं।
    वास्तव में यह उपन्यास अद्भुत, रोचक और विचित्र घटनाओं का एक ऐसा जाल है जिसका कोई ओर-छोर नजर नहीं आता । घटनाएं भी इतने विचित्र ढंग से घटित होती हैं कि पाठक कुछ भी समझ नहीं पाता । एक के बाद एक विचित्र घटनाएं पाठक को रोमांचित कर देती हैं लेकिन मेजर बलवंत आखिर रहस्य का पता लगा ही लेते हैं ।‌ तभी मोक्राना ने कहा था- "ओह मेजर साहब, इतनी गहराई तक केवल आप ही पहुंच सकते हैं।" डॉक्टर मोक्राना ने कहा।(122))
       अब उपन्यास के विषय में कुछ और बातों पर चर्चा कर ली जाये ।
चीख :- मेजर बलवंत के उपन्यासों में रहस्यमयी चीख तो अनिवार्य है। यहाँ भी ऐसी ही चीखें वातावरण और पाठक दोनों को स्तब्ध कर देती हैं।

- अभी चुम्बन पूरा भी न हुआ था कि एक और चीख उभरी। यह चीख किसी पुरुष की थी। यह चीख पास से ही आई थी।(15)

- कौशाम्बी ने कहा, "कौन है ?"
और इसके बाद एक के बाद एक चार चीखें सुनाई दीं-हृदयबेधी भयाक्रान्त चीखें।(
19)

- मेजर कुछ और कहना चाहता था कि कानों के पर्दों को फाड़ डालने वाली चीख सुनाई दी। मेजर कुर्सी से उठकर दरवाजे की ओर दौड़ा। वह कॉरीडोर में आ गया। उसी समय दूसरी चीख सुनाई दी। चीख की आवाजें भारतीय नाटक मण्डली के एक कमरे से आई थी।(64)
पात्र वर्णन :-
कर्नल रंजीत के उपन्यासों में विहंगम दृष्टि से देखे गये पात्रों का ऐसा सजीव वर्णन होता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ।
"मैं उसे अच्छी तरह नहीं देख पाई। उसके बदन पर गहरे नीले रंग का झालरदार चोगा था-वकील या पादरी जैसा चोगा। चोगे के नीचे मखमली वास्कट थी, जिसमें मोटे-मोटे छ: सफेद बटन लगे हुए थे। उसके अन्दर कमीज़ थी-सफेद कमीज़, जिसका गला फूलदार टाई जैसा था। धारीदार पतलून थी।" कौशाम्बी ने बताया।(21)
    यह स्थित तब की है जब कौशाम्बी कहती है 'मैं उसे अच्छी तरह नहीं देख पाई ।' अब सोचो अगर कौशाम्बी उस व्यक्ति को देख लेती तो कैसा विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती ।
ऐसा ही एक और उदाहरण देखें -

"हां, बेसिर की औरत। वह खुली आस्तीनों वाला सुख गाउन पहने हुए थी। उसके दोनों हाथों पर दस्ताने थे। उसके गाउन के कॉलर कुत्ते के कानों की तरह खड़े थे। सुर्ख गाउन के कॉलरों के बीच खाली जगह थी, जो काली थी। उस काली जगह में दो गोल चीजें चमक रही थीं; लेकिन गाउन के कॉलरों के बीच न गर्दन थी, न चेहरा था, न सिर था। उसके दाहिने हाथ के दस्ताने पर खून था। खून की पांच लकीरें थीं। बायें हाथ में शीशे की तरह चमकती हुई कोई चीज़ थी, जिसे मैं अच्छी तरह देख नहीं पाई। उसने खिड़की की सलाखों में से अपना हाथ बढ़ाया तो मेरे मुंह से चीख निकल गई। उसने हाथ बाहर खींच लिया। मैंने खिड़की के बाहर किसी को कराहते हुए और फिर मौत की हिचकी हुए सुना। मैं दोबारा चीख उठी और कमरे से बाहर दौड़ गई।(65)

शायरी :
कर्नल रंजीत के उपन्यासों में शायरी भी एक अनिवार्य तत्व है।
वह बोझ क्या उठाएं, वह काम क्या दिखाएं,
पाउडर का दूध पीकर जो भी जवां हुए हैं।"(71)

वैसे ही बाल, वैसे ही चेहरे हैं सबके हाय,
लड़की है कौन, कौन है लड़का, कोई बताय।"
(94)

यादगार कथन -
मनुष्य विभिन्न विचारों का सम्मिश्रण है। वह अन्याय और अत्याचार भी करता है और दया भी करता है। अपने किए पर शर्मिन्दा भी होता है और यह भी मान लेता है कि उससे अन्याय हुआ। (पृष्ठ-119)

जरा स्पष्ट करें :-
आप उंगलियों के विशेषज्ञों से कहिए कि वे इस बात की जांच ज़रा ध्यान से करें कि वे निशान किसी स्त्री की उंगलियों के हैं या पुरुष की उंगलियों के हैं।" (81)
क्या fingerprint से स्त्री- पुरुष का पता लगाया जा सकता है ?
कुछ और बातें :-
उपन्यास की पृष्ठभूमि श्री लंका है।
इस उपन्यास में सुनील कैमिकल इंजीनियर है, वह पूर्णरूप से मेजर बलवंत की टीमा का हिस्सा नहीं है।
- मालती कैमिकल इंजिनियर सुनील से प्रेम करती है।

मनुष्य की भावनाएं और विचार एक ऐसा सागर हैं, जिसकी कोई थाह नहीं है। संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो संगीन अपराध करते हैं, लेकिन उनके दिल में कांटे की चुभन जितना भी दर्द नहीं होता। और इसी संसार में ऐसे भी अनेक आदमी हैं, जो अपनी मामूली सी भूल पर जीवन-भर पश्चाताप करते रहते हैं और पछतावे का कांटा उनके दिल में रात-दिन खटकता रहता है और वे उस भूल का प्रायश्चित्त करने की चेष्टा करते रहते हैं, और कभी-कभी उस भूल का प्रायश्चित्त करने के लिए अपनी जान तक दे देते हैं या अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। (पृष्ठ-118)
  यह कहानी ऐसे ही घटनाक्रम और व्यक्ति पर केन्द्रित है जिसने अपनी एक भूल का प्रायश्चित करना चाहा लेकिन वह प्रायश्चित उसकी मौत का कारण बन गया । कभी कभी अच्छे कार्य, दूसरों की मदद भी स्वयं के लिए जानलेवा साबित हो जाते हैं।
   "हां, यह संसार बहुत ही विचित्र है। यहां सीमा से अधिक भलाई मनुष्य की मृत्यु बन जाती है।"

     कर्नल रंजीत द्वारा लिखित उपन्यास 'रात के अंधेरे में' श्रीलंका की पृष्ठभूमि पर लिखा गय एक रोचक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है।

उपन्यास- रात के अंधेरे में
लेखक-    कर्नल रंजीत
पृष्ठ-        129
प्रकाशक- मनोज पब्लिकेशन, दिल्ली

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