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Saturday, 23 August 2025

664. जानी दुश्मन- कर्नल रंजीत

एक फिल्म अभिनेत्री की हत्या
जानी दुश्मन- कर्नल रंजीत

नमस्ते पाठक मित्रो,
कर्नल रंजीत के उपन्यास पठन क्रम में एक रोचक उपन्यास मुझे मिला जिसका नाम है 'जानी दुश्मन' । यह एक रोचक उपन्यास है जो सिलसिलेवार हत्याओं पर आधारित है।

जानी दुश्मन
अभिनेत्री की हत्या
प्रियम्बदा ने अपने बाल संवारते हुए एक नजर आदम-कद नाइने पर पड़ते अपने अक्स पर डाली तो उसे लगा, वह आइने में जिस अक्स को देख रहीं है, वह अक्स उसका अपना नहीं किसी और का है। हर समय उदास और गम में डूबी-डूबी-सी आंखों में एक नई चमक थी, एक नया उल्लास था और चेहरे पर ऐसी ताजगी जैसी सुबह-सुबह खिले गुलाब के फूल की पंखुड़ियों पर दिखाई देती है। तराचे हुए सन्तरे की फांक जैसे भरे-भरे होंठों पर एक अन-चाही मुस्कान थिरक रही थी ।
और फिर अनचाहे, अनजाने वह हेमन्त के नए गीत के मुखड़े को गुनगुनाने लगी-
छलका दो मदिरा के प्याले, तन-मन की सुध-बुध खो जाए।
होंठों से यदि तुम छू दो तो । यह विष भी अमृत बन जाए।
गीत के बोल गुनगुनाते-गुनगुनाते अनायास ही उसके पांव बेडरूम के फर्श पर थिरक उठे। पैरों में पड़ी पायल के घुंघरू तालबद्ध लय में बज उठे ।
और फर्श पर थिरकते-गुनगुनाते उसने मेज पर रखा श्री-इन-वन ऑन कर दिया।
उसके होठों की मादक-गुनगुन और उसकी पायल की मनहर रुनझुन थ्री-इन-वन में लगे कैसेट में कैद होती चली गयी ।
सहसा द्वार के बाहर किसी के कदमों की आहट सुनकर वह चौक पड़ी। उसने गुनगुनाते हुए ही दरवाजे की ओर देखा । उसकी नौकरानी श्यामा काफी की ट्रे लिए अन्दर आ रही थी।
"दीदी, हेमन्त बहुत देर से नीचे ड्राइंग रूम में बैठे है।" श्यामा ने काफी की ट्रे सेंटर टेबिल पर रखते हुए कहा।
"तुने मुझे बताया क्यों नहीं ?" ('जानी दुश्मन' उपन्यास प्रथम पृष्ठ से)

   यह कहानी आरम्भ होती है प्रसिद्ध गायिका और अभिनेत्री प्रियंबदा से जिस से मिलने के लिए गीतकार हेमंत आता है। और उपन्यास का कथानक प्रथम दृश्य से ही रोमांचकारी हो उठता है।
         कहानी में प्रथम हत्या प्रसिद्ध गायिका और अभिनेत्री प्रियंवदा की होती है और संयोग से हत्या के तुरंत बाद वहाँ गीतकार हेमंत, निर्देशक कुमार दोषी, निर्माता रतन चावला के अतिरिक्त प्रियंवदा की बहन सुप्रिया DSP दुष्यंत वाडेकर के साथ वहाँ पहुंच जाती है।
कत्ल के बाद इंस्पेक्टर सुरेश परांजपे शक के आधार पर और DSP के निर्देशानुसार रतन चावला, कुमार दोषी और हेमंत को गिरफ्तार कर लेता है।
सार्जेण्ट ने हेमन्त, रतन चावला और कुमार दोषी के हाथों में हथकड़ियां लगा दीं और दो कांस्टेबिलों के साथ उन्हें लेकर नीचे चला गया । (उपन्यास अंश)
एक प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री और गायिका की हत्या की खबर ने देशभर में सनसनी पैदा कर दी और वहीं प्रियंवदा को लेकर बन रही वह फिल्में जो अभी अधूरी थी उनके निर्माता-निर्देशक के लिए यह खबर अत्यंत दुखदायी थी ।
     
प्रियंबदा की हत्या के बाद केस में प्रवेश होता है प्रसिद्ध जासूस मेजर बलवंत और उसकी टीम का । और मेजर यह घोषणा करता है-
'तब तो मेरा यह संदेह ठीक है कि प्रियंबदा की हत्या के पीछे कोई भयानक साजिश है ।'(पृष्ठ-49)
वह भयानक साजिश क्या थी और उसे अंजाम कौन दे रहा था ? यह पता लगाने का काम अब मेजर बलवंत के पास था और वह पुलिस के सहयोग से अपनी कार्यवाही आगे बढाता है।
वहीं उपन्यास में एक और कहानी समानांतर चलती है वह कहानी है रोजी ऑर्थर की जो गोवा से मुम्बई नौकरी के सिलसिले में अपनी आण्टी लूसी फास्टर के पास आती है और एक हत्या के गवाह बनती है। लेकिन रोजी पूरे परिदृश्य से अचानक गायब हो जाती है।
  रोजी ऑर्थर की कहानी और प्रियंबदा की कहानी बराबर चलती हैं और दोनों में लगातार हत्याएं होती हैं।
       इन मर्डरकेसों से सम्बन्धित तीनों लड़कियां गुम थीं । प्रियम्बदा की नौकरानी श्यामा, सुषमा सान्याल की नौकरानी शोभा और प्रिन्स होटल की रिसेप्शनिस्ट जूलिया। इन तीनों के अलावा विजय पटवर्धन की पत्नी ममिला पटवर्धन भी लापता थी, लेकिन उसके सम्बन्ध में दुष्मन्त वाडेकर और इंस्पेक्टर परांजपे का विचार था कि उसका अपहरण किया गया है। उन्होंने जो चीख सुनी थी वह मिला पटवर्धन की ही थी। शायद वह अपने पति की हत्या होते देखकर या फिर हत्यारे द्वारा अपने ऊपर किए गए आक्रमण से भयभीत होकर चीख उठी थी । (पृष्ठ- 89)
   जिस तरह से हत्याएं हो रही थी और विशेषकर पुलिसकर्मियों की पुलिस स्टेशन में हत्याएं, फिल्म निर्माता- निर्देशक असित सान्याल से संबंधित लोगो क हत्याएं और हत्यारे द्वारा एक विशेष तेज छुरे द्वारा हत्याएं उनको देख कर मेजर बलवंत का कहना था- दुश्मन सिर्फ चालाक और मक्कार ही नहीं धोखेबाज और बेरहम भी है। हो सकता है ।
    और यह भी सत्य है की वह बेरहम ही था लेकिन वह ऐसा क्यों बना ? यह जानना भी आवश्यक है। लेकिन लेखक महोदय ने जो तर्क दिये हैं वह ज्यादा ठोस नहीं है और उस पर भी एक व्यक्ति विशेष को तंग करने का कारण भी ठोस नहीं है।
  उपन्यास का कथानक अच्छा था पर अंत इतना अच्छा नहीं था। अगर गहन विश्लेषण करें तो उपन्यास के काफी कमजोर पक्ष सामने आते हैं। 
 उपन्यास का कथानक फिल्म क्षेत्र के लोगों से संबंधित है, अगर लेखक महोदय कोशिश करते तो इस क्षेत्र का वर्णन कर सकते थे। 
हमारे उपन्यास साहित्य में लेखक कभी कत्ल की पहेली से आगे बढे ही नहीं । जासूस पत्रकार हो सकता है पर उपन्यास में पत्रकारिता के विषय में कुछ भी नहीं होता ।

कर्नल रंजीत के उपन्यासों में रहस्यमयी घटनाएं और पात्र अनिवार्य रूप से उपस्थित होते हैं और यह इनके उपन्यासों की अतिरिक्त विशेषता भी है और उपन्यास को दिलचस्प बनाने का माध्यम भी।
प्रस्तुत उपन्यास में भी एक रहस्यमयी चमगादड़ उपस्थित है।
- "दादा उसका रंग बहुत ही काला था। भयानक रूप से काला और चमकीला। उस पर नजर ही नहीं ठहर पा रही थी। मैंने बस उसकी आंखें देखी थी, उल्लू की आंखों की तरह गोल-गोल और बहुत ही चमकीली डरावनी आंख उसके पंख बिल्कुल चिमगादड़ जैसे थे, लेकिन वह चिम-गादड़ की तरह उड़ नहीं रहा था। मेंढ़क की तरह फुदक-फुदककर चल रहा था, अपने पंखों को फड़फड़ाते हुए । भगवान ही जाने वह क्य। बला थी ।"

अब चर्चा करते हैं मेजर बलवंत के उपन्यासों में आने वाली कुछ अतिरिक्त विशेषताएँ की । यह विशेषताएँ इनके लगभग उपन्यासों में उपस्थित हैं जो इन्हें अन्य लेखकों से अलग करती हैं। यहाँ मात्र मर्डर मिस्ट्री ही नहीं होती बल्कि लेखक का एक विशेष अंदाज भी होता है। 

तेज नजर-
कर्नल रंजीत के उपन्यासों में एक नजर/ सरसरी नजर से देखे गये किसी पात्र का विवरण भी अतिसुक्ष्म मिलता है।
"वह औरत सिल्क को प्रिंटेड साड़ी पहने हुए थी, उसकी वार्डर की किनारी मेरून रंग की थी। वह मेरून रंग का ही ब्लाउज पहने हुए थी। ब्लाउज उसके बाजुओं पर बहुत ही कसा हुआ था।" कांस्टेबल ने बताया ।

चीख-
कर्नल रंजीत के उपन्यासों में चीख आपको अवश्य सुनाई देगी और विशेषकर 'मनोज पॉकेट बुक्स' से प्रकाशित उपन्यासों में तो चीख का विवरण कुछ ज्यादा ही मिलता है।
प्रस्तुत उपन्यास का एक उदाहरण देखें-
अभी उसने सदर दरवाजे में कदम नहीं रखा था कि सहमा किसी स्त्री की हृदय बेधी चीख उसके कानों से टकराई।

स्त्री दर्द की चर्चा-
उपन्यास में भारतीय नारी के दुख दर्द का बहुत अच्छा चित्रण किया गया है। हालांकि यह विस्तृत रूप में नहीं है पर फिर भी एक स्त्री पात्र के माध्यम से लेखक ने अच्छे से परिभाषित किया है-
शीला ने बड़े दार्शनिक अन्दाज में कहा, "आप कितनी भी कोशिश कर लीजिए, लेकिन नारी की नियत को आप बदल नहीं सकते। अनादि काल से वह पुरुष के अत्याचारों की शिकार होती आई है, और होती रहेगी। प्रकृति ने उसे ऐसा बनाया है कि वह हमेशा, हर काल में पुरुष की भोग्या बनी रहेगी। संवैधानिक समता, समान अधिकार, नारी के रूप-यौवन, आकर्षण और देह रचना को बारूदी सुरंग नहीं बना सकते जो पुरुष के छूते ही फट जाए और उसे समाप्त कर दे।"
संवाद -
वैसे तो जासूसी उपन्यासों में स्मरणीय संवाद बहुत कम ही देखते को मिलते हैं पर कभी-कभार लेखक कुछ ऐसी बातें लिख देते हैं जो जीवन का सार ही हैं।
प्रस्तुत उपन्यास में कर्नल रंजीत का विशेष संवाद देखें-

जीवन में यदि कोई मूल्यवान वस्तु होती है, तो वह क्षण, जिस क्षण हम कोई निर्णय लेते हैं। यह क्षण ही तो होता है, जो व्यक्ति को सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचा देता है या फिर विनाश की अतल गहराइयों में झोंक देता है।
पात्र परिचय-
कर्नल रंजीत के उपन्यासों में पात्रों की संख्या बहुत ज्यादा होती है और कभी कभी अधिक पात्र होने के कारण कथा को समझना भी मुश्किल हो जाता है।
प्रस्तुत उपन्यास में पात्र परिचय देखें
मेजर बलवंत-मुख्य कथा नायक, जासूस
मेजर के सहयोगी- डोरा, सुधीर, सोनिया, सुनील,मालती
प्रियंवदा- गायिका, अभिनेत्री
सुप्रिया-  प्रियंवदा की बहन
हेमंत-   गीतकार
श्यामा-  प्रियंवदा की नौकरानी
दुष्यंत वाडेकर- DSP (पुलिस मुम्बई)
कुमुद- दुष्यंत वाडेकर की बहन
सुरेश परांजपे- पुलिस इंस्पेक्टर
राजू गायकवाड़- पुलिस इंस्पेक्टर
राज सिंह, देवसरे- पुलिसकर्मी (सार्जेंट)
कुलकर्णी-       - पुलिस इंस्पेक्टर
रतन चावला-   फिल्म प्रोड्यूसर
कुमार दोषी-  फिल्म निर्देशक
असित सान्याल- फिल्म निर्माता
सुषमा- असित सान्याल की पत्नी
शीला - असित सान्याल की नौकरानी
अमित सान्याल, सुमित सान्याल- असित सान्याल के भाई
मिसेज लूसी फास्टर- आंटी, एक वृद्ध महिला
रोजी आर्थर-  लूसी फास्टर की भतीजी
सेमुअल-  लूसी फास्टर का पुत्र
हेनरी ऑर्थर- SP गोवा पुलिस, रोजी का पिता
जूलिया- प्रिंस होटल की कर्मचारी
मिस्टर पटवर्धन- प्रिंस होटल में ठहरा एक व्यक्ति
शर्मिला पटवर्धन-   मिस्टर पटवर्धन की पत्नी
वीरेन्द्र-  टैक्सी ड्राइवर
प्रदीप सिन्हा- एक पात्र
राजेश्वरी-  होस्टल वार्डन
दिल बहादुर- मेजर बलवंत का चौकीदार
उषा-   माँ जी
आशा/ जेक्लीन - उपन्यास पात्र

   अंत में उपन्यास के प्रथम पृष्ठ पर उपन्यास का विवरण भी पढ लीजिए-
जानी दुश्मन
वह रेल से कट मरा ।
दुनिया ने समझा से उसने आत्महत्या कर ली ।
लेकिन क्या सचमुच उसने अपने-आप को खत्म कर लिया था ?
अनेक हत्याएं हुईं। इनमें दो औरतों ने भी साथ दिया। कौन-सा कारण था कि वे दोनों उसका साथ देने के लिए विवश थीं ? 
विशालकाय नकली चिमगादड़, मेंढक की तरह फुदक-फुदक कर चलने वाला आदमी, धुएं की अजीबो-गरीब लकीर, टेप में भरी हुई अनोखी आवाज, इन सब का क्या रहस्य था ?
जासूसी उपन्यास लेखन के सम्राट कर्नल रंजीत की चमत्कारी कलम से एक और ना सनीसनीखेज उपन्यास जानी दुश्मन, पढ़िए और जानिए कि वह दुश्मन कौन था ?

कर्नल रंजीत द्वारा लिखित और अभिनव पॉकेट बुक्स दिल्ली से प्रकाशित 'जानी दुश्मन' कर्नल रंजीत शृंखला का एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। जिसमें सिलसिलेवार कुछ हत्याएं होती हैं और अंत में मुख्य अपराधी पकड़ लिया जाता है।
  उपन्यास में दो समानांतर कहानियाँ चलती हैं जो अंत में एक नहीं हो पाती ।
कथानक के आधार पर उपन्यास सामान्य है और सिलसिलेवार हत्याएं और उनके पीछे का तर्क असंगत है।
उपन्यास- जानी दुश्मन
लेखक-    कर्नल रंजीत
पृष्ठ-        200
प्रकाशक- अभिनव पॉकेट बुक्स, दिल्ली
प्रकाशन तिथि- 1990 (प्रथम संस्करण)

कर्नल रंजीत के अन्य उपन्यासों की समीक्षा-

चीखती चट्टानें     खामोश मौत है 
खून के छींटें
सिरकटी लाशें
वह कौन था ?


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